भौँह

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

भौँह संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ भ्रू] आँख के ऊपर की हड्डी पर जमे हुए रोएँ या बाल । भृकुटी । भौं । भँव । उ॰—भौंह लता बड़ देखिअ कठोर, अजने आँजि हासि गुन जोर ।—विद्यापति, पृ॰ २४३ । मुहा॰—भौंह चढ़ाना या तानना =(१) नाराज होना । क्रुद्ध होना । उ॰—बदत काहू नहीं निधरक निदरि मोहिं न गनत । बार बार बुझाइ हारी भौंह मो पर तनत ।—सूर (शब्द॰) । (२) त्योरी चढ़ाना । बिगड़ना । भहि जोहना=प्रसन्न रखने के लिये संकेत पर चलना । खुशामद करना । उ॰— अकारन क हितू और को है । बिरद गरीबनेवाज कौन को भोंह जासु जन जोहै ।—तुलसी (शब्द॰) । भौंह ताकना = किसी की प्रवृत्ति या विचार का ध्यान रखना । रुख देखना ।