मंतर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

मंतर † संज्ञा पुं॰ [सं॰ मन्त्र] दे॰ मत्र' । उ॰—मुप्त प्रगट सत मतर आहै समझहू आपिहू माहि ।—जग॰ श॰, पृ॰ ८९ । मुहा॰—मंतर न होना = कोई उपचार न होना । उ॰—खाना खाना मक्खियों की भिन्न के सबब से मुश्किल हो जाता है और खटमल के काटे का तो मंतर ही नहीं ।—सैर कु॰, पृ॰ ३९ ।