मध्यम

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

मध्यम ^१ वि॰ [सं॰] जो दो विपरीत सीमाओं के बीच में हो । जो गुण, विस्तार, मान आदि के विचार से न बहुत बड़ा हो, न बहुत छोटा । मध्य का बीच का ।

मध्यम ^२ संज्ञा पुं॰

१. संगीत के सात स्वरों में से चौथा स्वर । विशेष—इसका मूलस्थान नासिका , अतःस्थान कंठ और शरीर में उत्पत्तिस्थान बक्षस्थल माना जाता है । कहते हैं, यह मयूर का स्वर है, इसके अधिकारी देवता महादेव आकृति विष्णु की संतान दीपक राग, वर्ण नील, जाति शूद्र, ऋतु ग्रीष्म, बार बुध और छंद बृहती है और इसका अधिकार कुश द्वीप में है । संक्षेप में इसे 'म' कहते या लिखते है । यह साधारण और तीव्र दो प्रकार का होता है । इसको स्वर (षड़ज) बनाने से सप्तक इस प्रकार होता है—मध्यम स्वर पंचम ऋषभ, धैवत गांधार, कोमल निषाद । मध्यग, स्वर (षड़ज) पंचम ऋषभ, धँवत, गांधार निषाद तीव्र मध्यम को स्वर (षड़ज) बनाने से सप्तक इस प्रकार होता है—तीव्र मध्यम स्वर, कोमल धेवत ऋषभ, कोम ल निषाद गांधार, निषाद मध्यम, कोमल, ऋषभ पंचम, कोमल गांधार धैवत, मध्यम, निषाद ।

२. वह उपपति जो नायिका के क्रोध दिखलाने पर अपना अनुराग न प्रकट करे और उसकी चेष्टाओं से उसके मन का भाव जाने ।

३. साहित्य में तीन प्रकार के नायकों में से एक ।

४. एक प्रकार का मृग ।

५. एक राग का नाम ।

६. मध्य देश ।