मन

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मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयोः अतः बंध एवं मोक्ष का कारण केवल मन हैं । मन प्रबल हैं और मनसे ही सर्व कार्य सिद्ध होते हैं । यद्यपि, मन स्थिर होना अति दुष्कर हैं । स्थिर मन - स्थित प्रज्ञता । जीवत्व से शिवत्वकी प्राप्तिकी चावी मन की प्रशान्तता ही हैं ।

अनुवाद[सम्पादन]

हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

मन में ठानना । इरादा करना । नीयत बिगड़ना = दे॰ 'नीयत बद होना' । नीयत भरना = जी भरना । मन तृप्त होना । इच्छा पूरी होना । नीयत में फर्क आना = बुरा संकल्प या विचार होना । अनुचित या बुरी बात की और प्रवृत्ति होना । बेईमानी या बुराई सूझना । नीयत लगी रहना = घ्यान बना रहना । इच्छा बनी रहना । जी ललचाया करना ।

मन ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ मनस्]

१. प्राणियों में वह शक्ति या कारण जिससे उनमें वेदना, संकल्प, इच्छा द्वेष, प्रयत्न, बोध और विचार आदि होते हैं । अंतःकरण । चित्त । विशेष—वैशेषिक दर्शन में मन एक अप्रत्यक्ष द्रव्य माना गया है । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, और संस्कार इसके गुण बतलाए गए हैं और इसे आणुरूप माना गया है । इसका धर्म संकल्प विकल्प करना बतलाया गया है तथा इसे उभयात्मक लिखा है; अर्थात् उसमें ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रिय दोनों के धर्म हैं । (एकादर्श मनो विद्धि स्वगुणे- नोभयात्मकम् । — गोता) । योगशास्त्र में इसे चित्त कहा है । बौद्ध आदि इसे छठी इंद्रिय मानते हैं । विशेष दे॰ 'चित्त' ।

२. अंतःकरण की चार वृत्तियों में से एक जिससे संकल्प विकल्प होता है । मुहा॰—किसी से मन अटकना या उलझना = प्रीति होना । प्रेम होना । मन आना या मन में आना = समझ पड़ना । जँचना । उ॰—(क) मंगल मूरति कंचन पत्र की मैन रचो मन आवत नीठि है ।—दास (शब्द॰) । (ख) और दीन बहु रतन पखाना । सोन रूप जो मनहि न आना ।—जायसी (शब्द॰) । मन का खराब होना = (१) मन फिरना । (२) नाराज होना । अप्रसन्न होना । (२) रोगी होना । बीमार होना । अपने मन का होना = (१) अपनी इच्छा या रुचि आदि के अनुकूल होना । उ॰—वही कारण था कि लोग अपने मन के नहीं हो सकते ।—प्रेमघन॰, भा॰ २, पृ॰ २७६ । (२) किसी की सलाह या बात पर ध्यान न देना । स्वतंत्र, स्वच्छंद एवं जैसा जी में आवे वैसा करना । मन टूटना = साहस छूटना । हताश होना । उ॰—फूटो निज कर्म नहिं लूटो सुख जानकी को टूटो न धनुष टूट गए मन सबके ।—हनुमन्नाटक (शब्द॰) । मन का दाग = मन का मैल । पापवृत्ति । दुष्प्रवृत्ति । उ॰— साखी शब्द बहुत सुना, मिटा न मन का दाग । संगति से सुधरा नहीं, ता का बड़ा अभाग ।—कबीर सा॰ सं॰, पृ॰ ५६ । मन की दौड़ = मन की गति । मन का पहुँच । उ॰—है जहाँ पर न दौड़ मन की भी, वाँ विचारी निगाह क्या दौड़े ।—चोखे॰, पृ॰ २ । मन बिगड़ना = (१) मन का हट जाना । मन का उदासी न हो जाना । (२) मतली आना । कै मालूम होना । (३) उन्मत्त होना । पागल होना । मन बढ़ना = साहस बढ़ना । उत्साह बढ़ना । प्रोत्साहित होना । उ॰—(क) सुनि मन धीरज भयल हो रमैया राम । मन बड़ि रहल लजाय हो रमैया राम ।— कबीर (शब्द॰) । (ख) आपस के नित के बैर से शत्रुओं का मन बढ़ा ।—शिवप्रसाद (शब्द॰) । किसी का मन बूझना † = किसी के मन की थाह लेना । उ॰—तुम्हारा मन बूझने के लिये ही मैंने यह बातें कहीं ।—हरिऔध (शब्द॰) । मन का बूझना या मानना = मन में शांति होना । मन में धर्य आना । मन मन = मन ही मन । मन में । उ॰—पिय सँग सोवत सोय न जाई । मन मन इमि सोचै सुख दाई ।—नंद॰ ग्रं॰, पृ॰ १४६ । मन मानना = मन में शांति होना । संतोष होना । जैसे,—हमारा मन नहीं मानता; हम उन्हें देखने अवश्य जायँगे । मन का भेद पाना = हृदय को गूढ़ बात समझना । मन का रहस्य जानना । उ॰—मन का भेद न पावै कोई ।— जग॰ श॰, पृ॰ ५४ । मन का मारा = खिन्नहृदय । दुखी चितवाला । मन का मैला = मन का खोटा । कपटी । घाती । मन की मनें रहना = दे॰ 'मन की मन में रहना' । उ॰— मन की मनें रही मन माया । जयों तरंग जल जलें समाया ।— पृ॰ रा॰, २६ ।८६ । मन खो जाना = विस्मयान्वित होना । चकित होना । उ॰—पै यह सगुन सरूप तुम्हारौ । ह्याँ मन खोयौ जात हमारौ ।—नंद॰ ग्रं॰, पृ॰ २६९ । मन छूना = (१) मन को आह्लादित करना । मन को प्रसन्न करना । मन को प्रभावित करना । (२) आंतरिक बात समझना । हृदय की बात जानना । (३) पूर्ण प्राप्ति न कराना । पूरी तरह से किसी वस्तु को न देना । नाम करना । उ॰—मन छूना, शोभा बरसना, दिन ढलना या डूबना उदासी टपकना, इत्यादि ऐसी ही कविसमयसिद्ध उक्तियाँ हें जो बोलचाल में रूढ़ि होकर आ गई हैं ।—रस॰ पृ॰ ४१ । मन ठिकाने रहना = चित्त स्थिर रहना । मन शांत रहना । उ॰—चर्चा वार्ता बिना मन ठिकाने रहत नाहीं ।—दौ सौ बावन॰, भा॰ १, पृ॰ ११७ । मन धरना = (१) दे॰ 'मन छूना' । (२) मन में धारण करना । उ॰—कसौ कसौटी तासु का, जो कसनी ठहराइ । खोटे खरे जु मन धरे, त्यागैं बिरद लजाइ ।—ब्रज॰ ग्रं॰, पृ॰ १० । मन हरा होना = मन प्रसन्न होना । चित्त प्रसन्न रहना । मन की मन में रहना = इच्छा पूरी न होना । जैसे,—मन की मन में ही रह गई; और वे चले गए । मन के लड्डू खाना = ऐसी बात को सोचकर प्रसन्न होना, जिसका होना असंभव या दुःसाध्य हो । व्यर्थ की आशा पर प्रसन्न होना । उ॰—विरह से पागल प्रेमी लोग मन के लड्डू से भूख बुझा लेते हैं ।— हरिश्चंद्र (शब्द॰) । मन खोलना = दुराव छाड़ना । निष्कपट होना । शुद्ध हृदय होना । मन चलना = इच्छा होना । प्रवृत्ति होना । जैसे,—बीमारी में किसी चीज पर मन नहीं चलता । किसी का मन टटोलना या मन को टटोलना = किसी के मन की थाह लेना । किसी की इच्छा को जानना । जैसे,—आओ, कुछ आमोद प्रमोद की बातें कर उसका मन टटोलें । मन डोलना = (१) मन का चलायमान होना । मन का चंचल होना । (२) लालच उत्पन्न होना । लोभ आना । मन डोलाना = (१) मन में चंचलता उत्पन्न करना । मन चलायमान करना । उ॰—भोजन करत गह्यो कर रुकमिनि सोई देहु जो मन न डोलावै । सूरदास प्रभु जब निधिदाता जापर कृपा सोई जन पावै ।—सूर (शब्द॰) । (२) लालच उत्पन्न करना । लोभ दिलाना । अपना मन डोलना = लालच करना । मन देना = (१) जी लगाना । मन लगाना । उ॰—(क) एक बार जो मन देइ सेवा । सेवहि फल प्रसन्न होइ देवा ।—जायसी (शब्द॰) । (ख) रघुपतिपुरी जनमु तब भयऊ । पुनि ते मन सेवा मम दयऊ ।—तुलसी (शब्द॰) । (२) ध्यान देना । किसी को मन देना = किसी पर आसक्त होना । मोहित होना । किसी पर मन धरना = ध्यान देना । मन लगाना । उ॰— (क) त्रास भयो अपराध आप लखि अस्तुति करत खरे । सूरदास स्वामी मनमोहन तामें मन न धरे ।—सूर (शब्द॰) । (ख) जोई भक्ति भाजन मन धरे । सोई हरि सों मिलि अनुसरे ।—लल्लू (शब्द॰) । मन तोड़ना या हारना = भग्नोत्साह होना । साहस छोड़ना । उ॰—अंग बिनु है सबै नहीं एको फवै सुनत देखत नयन सूर सब भेद गुनि मनहि तोरे ।—सूर (शब्द॰) । (किसी से) मन फट जाना या फिर जाना = घृणा होना । नफरत होना । उ॰—राण अनै अमरेस रै, वले प्रगटयौ बेध । मन फाटौ खाटाँ चिताँ, खूँटे ढाध न खेध ।—रा॰ रू॰, पृ॰ ३४५ । मन फिराना = दे॰'मन फेरना' मन फेरना = चित्त को हटाना । मन को किसी ओर से अलग करना । प्रवृत्ति बदलना । उ॰—फिरि फिर फेरि फेरि फैरयो मैं हरी को मन फेरै फिरी पुनि पुनि भाग की भली घरी ।— केशव (शब्द॰) । मन बढ़ाना = साहस दिलाना । उत्साह बढ़ाना । प्रोत्साहित करना । उ॰—दियो शिरपाय नृपराउ ने महर को आप पहरावनी सब दिखाए । अतिहि सुख पाइ कै लियौ सिर नाइ कै हरषि नँदराय कै मन बढ़ाए ।—सूर (शब्द॰) । मन बहना या बह पड़ना = चित्त का किसी ओर ढल जाना । मन का बरबस किसी ओर चले जाना । उ॰— ज्यों जोगो जन मन बाहि परे । बहुरि जोग बल निर्मल करे ।— नंद॰ ग्रं॰, पृ॰ २९१ । मन में बसना = मन में खुभना । पसंद आना । अच्छा लगना । रुचना । भाना । जैसे,— उनका सूरत तो मेरे मन में बस गई है । उ॰—गुर के भेला जिव डरे कावा छीजनहार । कुमति कमाई मन बसे लागु जुवा की लार ।—कबीर (शब्द॰) । मन बहलाना = खिन्न या दुःखी चित्त को किसी काम में लगाकर आनंदित करना । दुःख छोड़कर आनंद से समय काटना । चित्त प्रसन्न करना । जी बहलाना । उ॰—ना किसान अव समाचार तहँ आप सुनैहै । ना नाऊ की बातें सबको मन बहलैहै ।—श्रीधर पाठक (शब्द॰) । मन भरना = (१) प्रतीति होना । निश्चय या विश्वास होना । (२) संतोष होना । तुष्टि होना । तृप्ति होना । उ॰—यह बीसों फूलों पर गया, पर इसका मन न भरा ।— अयोध्या (शब्द॰) । मन भर जाना = (१) अघा जाना । तृप्त ि होना । (२) अधिक प्रवृत्ति न रह जाना । मन भाना = भला लगना । पसंद होना । रुचना । उ॰—(क) वामिनि को बामदेव कामिनि को कामदेव रण जयथंभ रामदेव मनये जू ।—केशव (शब्द॰) । (ख) भाँति अनेक विहंगम सुंदर फूलैं फलैं तरु ते मन भावैं । प्रताप (शब्द॰) । (ग) हरिहर ब्रह्मा के मन भाई । विधि अक्षर लै युगुति बनाई ।—कबीर (शब्द॰) । (घ) कहेहु नीक मोरेहु मन भावा । यह अनुचित नहिं नेवत पठावा ।—तुलसी (शब्द॰) । (ङ) बाला वैसँधि मैं छवि पावै । मन भावै मुँह कहत न आवै ।—नंद॰ ग्रं॰, पृ॰ १२१ । मन भारी करना = दुःखी होना । उदास होना । मन मरना = इच्छा समाप्त होना । किसी प्रकार की रुचि न होना । उ॰—मन मरना, मन छूना शोभा बरसना, उदासी टाकना इत्यादि ऐसी ही कविसमयसिद्ध उक्तियाँ हैं जो बोलचाल में रूढ़ि होकर आ गई हैं ।—रस॰, पृ॰ २१ । मन मरा होना = बिलकुल उदास या निष्क्रिय होना । उ॰—चीठ पर है चीट चित को लग री । आज उनका मन बहुत ही है मरा ।—चुभते॰, पृ॰ २८ । मन मानना = (१) संतोष होना । तसल्ली होना । उ॰— (क) मधुकर कहि कैसे मन माने । जिनके एक अनन्य ब्रत सूझे क्यों दूजो उर आनै—सूर (शब्द॰) । (ख) राजा भा निश्चै मन माना । बाँधा रतन छोड़ि के आना ।—जायसी (शब्द॰) । (२) निश्चय होना । प्रतीति होना । उ॰—(क) कै बिनु सपथ न अस मन माना । सपथ बोलु बाचा परमाना ।—जायसी (शब्द॰) । (३) अच्छा लगना । रुचना । पसंद आना । भाना । उ॰—सप्त प्रबंध सुभग सोपाना । ज्ञान नयन निरखत मन माना ।—तुलसी (शब्द॰) । (४) स्नेह होना अनुराग होना । उ॰—सखी री श्याम सों मन मान्यो । नौके करि चित कमल नैन सों घालि एक ठों सान्यों ।—सूर (शब्द॰) । मन मारना = इच्छा नष्ट करना । इच्छा को दबाना । उ॰—दिन गए सिंघ मार लेने के । है भला कौन भार मन पाता ।—चुभते॰, पृ॰ ७१ । किसी से मन मिलना = (१) प्रेम होना । अनुराग होना । (२) मित्रता होना । दोस्ती होना । उ॰—ए जेते दिन मन मिल गए तिय पिय बिन मीको, तेते दिन मेरे आन लेखे ।—अकबरी॰, पृ॰ २९ । मन में आना = (१) मन में किसी भाव का उत्पन्न होना । उ॰—तासों उन कटु बचन सुनाए । पै ताके मन कछू न आए ।—सूर (शब्द॰) । (२) समझ पड़ना । ध्यान में आना । उ॰—यह तनु क्यो ही दियौ न आवे । और देत कछु मन नहिं आवे ।— सूर (शब्द॰) । (३) अच्छा जान पड़ना । भला लगना । मन में आनना † = दे॰'मन में लाना' । मन में जमना या बैठना = (१) ठीक जँचना । उचित या युक्तियुक्त प्रतीत होना । (२) विचार में आना । ध्यान में आना । मन में ठानना = निश्चय करना । दृढ़ संकल्प करना । मन में धरना = दे॰ 'मन में रखना' । मनमें भरना = हृदयंगम करना । मन में जमाना । मन में रखना = (१) गुप्त रखना । प्रकट न करना । जैसे,— अभी यह बात मन में ही रखना; किसी से कहना मत । (२) स्मरण रखना । जैसे,—हमारी सब बातें मन में रखना, भूल न जाना । मन में होरी लगना = बिरह व्यथा से पीड़ित होना । उ॰—होरी नाहक खेलूँ मैं वन में, पिया बिनु होरी लगी मेरे मन में ।—भारतेंदु ग्रं॰, भा॰ २, पृ॰ ३८४ । मन में लाना = विचार करना । सोचना । ध्यान देना । उ॰— कहै पदमाकर झकोर झिल्ली शोरन को मोरन को महत न कोऊ मन ल्यावती ।—पद्याकर (शब्द॰) । मन मोहना या मन को मोहना = किसी के मन को अपनी ओर आकृष्ट करना । लुभाना । अनुरक्त करना । उ॰—जग अदपि दिगंबर पुष्पवती नर निरखि निरखि मन मोहै । केशव (शब्द॰) । मन मिलना = दो मनुष्यों को प्रकृति या प्रवृत्तियों का अनुकूल अथवा एक समान होना । जैसे,—मन मिले का मेला । नहीं तो सबसे भला अकेला । (शब्द॰) । मन मारना = (१) खिन्न चित्त होना । उदास होना । उ॰—(क) भूसुत शत्रु थान किन हेरत लखत मोहिं मन मारैं । सुनि रिपु पुत्रबधू किन बैरिन मोकों देत सवारैं ।—सूर (शब्द॰) । (ख) मौन गहौं मन मारे रहौं निज पीतम की कहौं कौन कहानी ।—प्रताप (शब्द॰) । (२) इच्छा को दबाना । मन को वश में करना । उ॰—मन नहिं मार मना करी सका न पाँच प्रहारि । सील साँच सरधा नहीं अजहूँ इंद्रि उधारि ।—कबीर (शब्द॰) । मन मारे हुए या मन मारे = दुःखी । उदास । खिन्नचित । उ॰—(क) कहँ लगि सहिय रहिय मन मारे । नाथ साथ धनु हाथ हमारे ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) प्रिया वियोग फिरत मन मारे परे सिंधु तट आनि । ता सुंदरि हित मोहिं पठायो सकौं न हौं पहिचानि ।—सूर (शब्द॰) । (ग) भवन ही मन मारि बैठी सहज सखि इक आई । देखि तनु अति विरह व्याकुल कहति बचन बनाई ।—सूर (शब्द॰) । (घ) उर धरि धीरज गउए दुआरे । पूछहिं सकल देखि मन मारे ।—तुलसी (शब्द॰) । मन मैला करना = मन में खिन्न होना । अप्रसन्न या असंतुष्ट होना । उ॰—माइ मिले मन का करिहौ मुह ही के मिले ते किए मन मैले ।—केशव (शब्द॰) । किसी से मन मोटा होना = किसी से अनबन होना । किसी का मन मोटा होना = विराग होना । उदासीन होना । मन मोड़ना = प्रवृत्ति या विचार को दूसरी ओर लगाना । उ॰—विधाता ने हमारा तुम्हारा वियोग कर दिया; मुझे अब मन मोड़ लेना पड़ा ।—तोताराम (शब्द॰) । किसी का मन रखना = किसी की इच्छा पूर्ण करना । किसी के मन में आई हुई बात पूरी करना । जैसे,—यहाँ के राजाओं से सारे बादशाह दबत थे और इनका वे लोग सब तरह मन रखते थे । उ॰—पत रखे जो पत रखाना हो हमें । चूक है मन रख न जो हम मन रखें ।—चोखे॰, पृ॰ ३८ । मन लगना = (१) जी लगना । तबीयत लगना । (२) चित विनाद होना । उ॰—बिरहागि ह्वै दुगुनी जगै । मन बाग देंखत ना लगै ।—गुमान (शब्द॰) । मन लगाना = (१) चित्त लगाना । मनोयोग देना । (२) चित्त विनोद करना । मन की उदासी मिटाना । (३) प्रेम करना । अनुराग करना । मन लाना पु = मन लगाना । जी लगाना ।

मन पु ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ मणि] मणि । बहुमूल्य पत्थर ।

मन ^३ संज्ञा पुं॰ [?] चालीस सेर का एक मान या तौल ।