मूँगा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

मूँगा ^१ संज्ञा पुं॰ [हिं॰ मूँग]

१. समुद्र में रहनेवाले एक प्रकार के कृमियों के समूहपिंड की लाल ठठरी जिसकी गुरिया बनाकर पहनते हैं । इसकी गिनती रत्नों में की जाती है । विशेष—समुद्रतल में एक प्रकार के कृमि खोलड़ी की तरह का घर बनाकर एक दूसरे से लगे हुए जमते चले जाते हैं । ये कृमि अचर जीवों में हैं । ज्यों ज्यों इनकी वंशवृद्धि होती जाती है, त्यों त्यों इनका समूहपिंड थूहर के पेड़ के आकार में बढ़ता चला जाता है । सुमात्रा और जावा के आसपास प्रशांत महासागर में समुद्र के तल में ऐसे समूहपिंड हजारों मील तक खड़े मिलते हैं । इनकी वृद्धि बहुत जल्दी जल्दी होती है । इनके समूह एक दूसरे के ऊपर पटते चले जाते हैं जिससे समुद्र की सतह पर एक खासा टापू निकल आता है । ऐसे टापू प्रशांत महासागर में बहुत से हैं जो 'प्रवालद्वीप' कहलाते हैं । मूँगे की केवल गुरिया ही नहीं बनती; छड़ी, कुरसी आदि चीजें भी बनती हैं । आभूषण के रूप में मूँगे का व्यवहार भी मोती के समान बहुत दिनों से है । मोती और मूँगे का नाम प्रायः साथ साथ लिया जाता है । रत्नपरीक्षा की पुस्तकों में मूँगे का भी वर्णन रहता है । साधारणतः मूँगे का दाना जितना ही बड़ा होता है, उतना अधिक उसका मूल्य भी होता है । कवि लोग बहुत पुराने समय से ओठों की उपमा मूँगे से देते आए हैं । पर्या॰—प्रवाल । विद्रुम ।

२. एक प्रकार का रेशम का कीड़ा जो आसाम में होता है ।

मूँगा ^२ संज्ञा स्त्री॰ [देश॰] एक प्रकार का गन्ना जिसके रस का गुड़ अच्छा होता है ।