मोम

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

मोम संज्ञा पुं॰ [फा़॰ मोम]

१. वह चिकना और नरम पदार्थ जिससे शहद की मक्खियाँ अपना छत्ता बनाती हैं । मधुमक्खी के छत्ते का उपकरण । विशेष—मोन प्रायः पीले रंग का होता है और इसमें से शब्द की सी गंध आती है । साफ करने पर इसका रंग सफेद हो जाता है । यह बहुत थोड़ी गरमी से गल या पिघल जाता है; और कोमल होने के कारण थोड़े से दबाव द्धारा भी, गीली मिट्टी या आटे आदि की भाँति, अनेक रुपों में परिवर्जित किया जा सकता है । इसकी बत्तियाँ बनाई जाती है, जो बहुत ही हलकी और ठंढी रोशनी देती हैं । ओषधि के रुप में इसका व्यवहार होता है और यह मरहमों आदि में डाला जाता है । खिलौने और ठप्पे आदि बनाने में भी इसका व्यवहार होता है । यौ॰—मोम की नाक =(१) जिसकी संमति बहुत जल्दी बदल जाती हो । अस्थिरमति । (२) वह जो जरा सी बात म े मिजाज बदले । मोम की मरियम =बहुत ही कोमल और सुकुमार स्त्री । मुहा॰—मोम करना या मोम बनाना =द्रवीभूत कर लेना । दयार्द्र कर लेना । मोम होना =दयार्द्र हो जाना । पिघल जाना । कठोरता छोड़ देना ।

२. रुप रंग और गुण आदि में इसी से मिलता जुलता वह पदार्थ जो मधुमक्खी की जाति के तथा कुछ और प्रकार के कीड़े पराग आदि से एकत्र करते हैं अथवा जो वृ्क्षों पर लाख आदि के रुप में पाया जाता है ।

३. मिट्टी के तेल में से, एक विशेष रासायनिक क्रिया के द्धारा, निकाला हुआ इसी प्रकार का एक पदार्थ । जमा हुआ मिट्टी का तेल । विशेष—अंतिम दोनों प्रकार के मोमों का व्यवहार भी प्रायः पहले प्रकार के मोम के समान ही होता है ।