मोरचा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

मोरचा संज्ञा पुं॰ [फा़॰ मोरचह्]

१. लोहे की ऊपरी सतह पर चढ़ आनेवाली लाल या पीली रंग की बुकनी की सी तह । जंग । विशेष—लोहे पर जमनेवाली यह तह वायु और नमी के योग से रासायनिक विकार होने से उत्पन्न होती है । यह लाल बुकनी वास्तव में विकारप्राप्त लोहा ही है ।

२. दर्पण पर जमी हुई मैल । उ॰—(क) जब लग हिय दरपन रहै कपट मोरचा छाइ । तब लग सुंदर मीत मुख कैसे दृगन दिखाइ ।—रसनिधि (शब्द॰) । (ख) पहिर न भूषन कनक के कहि आवत एहि हेत । दरपन के से मोरचा देह दिखाई देत ।—बिहारी (शब्द॰) । विशेष—प्राचीन काल में दर्पण लोहे को माँजते माँजते चमकदार बनाए जाते थे, इसी से दर्पण के साथ 'मोरचा' शब्द का प्रयोग चला आ रहा । 'दर्पण' के लिये फारसी का 'आईना' शब्द वास्तव में 'आहना' का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ 'लोहे का' होता है । क्रि॰ प्र॰—जमना ।—लगना । मुहा॰—मोरचा खाना =मोरचा लगाने से खराब होना ।

मोरचा ^२ संज्ञा पुं॰ [फा़॰ मोरचाल]

१. वह गड्ढा जो गढ़ के चारों और रक्षा के लिये खोद दिया जाता है ।

२. वह सेना जो गढ़ के अंदर रहकर शत्रु से लड़ती है ।

३. वह स्थान जहाँ से सेना, गढ़ या नगर आदि की रक्षा की जाती है । वह स्थान जहाँ खड़े होकर शत्रुसेना से लड़ाई की जाती है । मुहा॰—मोरचाबंदी करना =गढ़ के चारों ओर गड्ढा खोदकर या टीले बनाकर यथास्थान सेना नियुक्त करना । मोरचा जीतना =शत्रु के मोरचे पर अधिकार कर लेना । मोरचा बाँधना =दे॰ 'मोरचाबंदी करना' । उ॰—बढ़ि बढ़ि बाँधे मोरचे लाग देखि नियराइ ।—हम्मीर॰, पृ॰ २७ । मोरचा मारना =दे॰ 'मोरचा जीतना' । मोरचा लेना =युद्ध करना ।