मोहना

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

मोहना ^१ क्रि॰ अ॰ [सं॰ मोहन]

१. किसी पर आशिक या अनुरक्त होना । मोहित होना । रीझना । उ॰—(क) सुंदर वपु अति श्यामल सोहै । देखत सुर नर को मन मौहै ।—केशव (शब्द॰) । (ख) देखत रुप सकल सुर मोहै ।—तुलसी (शब्द॰) । (ग) चारयो दल दूलह चारु बने । मोहे सुर औरन कौन गने ।—केशव (शब्द॰) ।

२. मूर्छित होना । बेहोश हो जाना । उ॰—अष्टम सर्ग महा समर कुश लव भरतहिं साथ । जुग बंधुन कर मोहिबो भरत नास तिन हाथ ।—शिरमौर (शब्द॰) ।

मोहना ^२ क्रि॰ स॰ [सं॰ मोहन]

१. अपने ऊपर अनुरक्त करना । मुग्ध करना । मोहित करना । लुभा लेना । उ॰—(क) पंडित अति सिगरी पुरी मनहु गिरा गति गुढ़ । सिंह नियुत जनु चंडिका मोहति मूढ़ अमूढ़ ।—केशव (शब्द॰) । (ख) बैठे जराय जरे पलका पर रामसिया सबको मन मोहै ।—केशव (शब्द॰) । (ग) अहो भले लतिका तरु सोहै । कलिन कोंपलन सों मन मोहै ।—प्रतापनारायण मिश्र (शब्द॰) ।

२. भ्रम में डाल देना । संदेह पैदा कर देना । धोखा देना । उ॰—(क) तुम आदि मध्य अवसान एक । जग मोहत हौ वपु धरि अनेक ।—केशव (शब्द॰) । (ख) अति प्रचंड रघुपति कै माया । जेहि न मोह अस को जग जाया ।—तुलसी (शब्द॰) ।

मोहना ^३ संज्ञा स्त्री॰ [सं॰]

१. तृण ।

२. एक प्रकार की चमेली ।