मोहर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

मोहर संज्ञा स्त्री॰ [फा़॰]

१. किसी ऐसी वस्तु पर लिखा हुआ नाम, पता या चिह्न आदि जिसे कागज वा कपड़े पर छाप सवें अक्षर, चिह्न आदि दबाकर अंकित करने का ठप्पा । उ॰—इस मोहर की अँगुठी से आपको विश्वास हो जाएगा । (अँगुठी देता है) ।—हरिशचंद्र (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—करना ।—छापना ।—देना ।—लगाना ।

२. उपर्युक्त वस्तु की छाप जो कागज वा कपड़े आदि पर ली गई हो । स्याही लगे हुए ठप्पे को दबाने से बने हुए चिह्न या अक्षर । उ॰—मोहर में अपना नाम वा चिह्न होता है जिसमें पत्र पर लगी हुई मोहर देखते ही उस पत्र के पढ़ने के प्रथम परिज्ञान हो जाता है कि यह पत्र अमुक का है ।—मुरारिदान (शब्द॰) ।

३. स्वर्णमुद्रा । अशरफी । उ॰—(क) करि प्रणाम मोहर बहु दीन्हो । दिओ असीस यतीश न लीन्हों ।—रघुराज (शब्द॰) । (ख) जो कुजाति नहि मानै बाता । गगरा खोदि दिखायौ ताता । गाड़े बीच अजिर के माहीं । मोहर भरे नृप मानत नाहीं ।—रघुनाथदास (शब्द॰) ।

मोहर † ^१ संज्ञा पुं॰ [हिं॰ मुँह + आर (प्रत्य॰)]

१. द्वार । दरवाजा । उ॰—ठाढ़ि मोहारे धन सुसुकै, मन पछताइल हो ।—धरम॰, पृ॰ ६४ ।

२. मुँहड़ा । अगला भाग । उ॰—रुप को कुप बखानत है कवि कोऊ तलाब सुधा ही के संग को । कोऊ तुफंग मोहार कहै दहला कलपद्रुम भाषत अंग को ।—शंभु (शब्द॰) ।