यदि

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

यदि एक चोंगे में कोई बात कही जायगी और दूसरे चोंगे में (जो दूर पर होगा) किसी का कान लगा होगा तो वह बात सुनाई पडे़गी । पर यह युक्ति थोडी़ ही दूर के लिये काम दे सकती है । अधिक दूर के लिये बिजली के प्रवाह का सहारा लिया जाता है । चुंबक की एक छड़, जिसमें रेशम (या और कोई ऐसा पदार्थ जिससे होकर बिजली का प्रवाह न जा सके) से लिपटा हुआ ताँवे का तार कमानी की तरह घुमाकर जडा़ रहता है, एक नली के भीतर बैठाई रहती है । चुंबक के एक छोर के पास लोहे का एक पत्तर बँधा रहता है । यह पत्तर काठ की खोली में रहता है—जिसका मुँह एक ओर चोंगे की तरह खुला रहता है । इस प्रकार दो चोगों की आवश्यकता टेलीफोन में होती है एक बोलने के लिये, दूसरा सुनने के लिये । इन दोनों चोंगों के बीच तार लगा रहता है । शब्द वायु में उत्पन्न तरंग या कंप मात्र हैं । मुँह से निकला हुआ शब्द चोंगे के भीतर की वायु को कंपित करता है जिसके कारण बँधे हुए लोहे के पत्तर में भी कंप होता है अर्थात् वह आगे पीछे जल्दी जल्दी हिलता है । इस हिलने से चुंबक की शक्ति एक बार घटती और एक बार बढ़ती रहती है । इस प्रकार तार की मंडलाकार कमानी के एक बार एक ओर दूसरी बार दूसरी ओर बिजली उत्पन्न होती रहती है । इसी बिजली के प्रवाह द्वारा बहुत दूर के स्थानों पर भी शब्द पहुँचाया जाता है । टेलिफोन के द्वारा स्थल पर हजारों कोस दूर तक की और समुद्र में सैकड़ों कोस तक की कही बातें सुनाई पड़ती है ।

यदि अव्य॰ [सं॰] अगर जो । विशेष— इस अव्यय का उपयोग वाक्य के आरंभ में संशय अथवा किसी बात की अपेक्षा सूचित करने के लिये होता है । जैसे— (क) यदि वे न आए तो? । (ख) यदि आप कहें तों में देदूँ ।