वाद

विक्षनरी से
Jump to navigation Jump to search

हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

वाद संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. वह बातचीत जो किसी तत्व के निर्णय के लिये हो । तर्क । शास्त्रार्थ । दलील । विशेष—'वाद' न्याय के सोलह पदार्थों में दसवाँ पदार्थ माना गया है । जब किसी बात के संबंध में एक कहता है कि यह इस प्रकार है और दूसरा कहता है कि नहीं, इस प्रकार है, और दोनों अपने अपने पक्ष की युक्तियों को सामने रखते हुए कथोप- कथन में प्रवृत्त होते हैं, तब वह कथोपकथन 'वाद' कहलाता है । यह वाद शास्त्रीय नियमों के अनुसार होता है, और उसमें दोनों अपने अपने कथन को प्रमाणों द्वारा पुष्ट करते हुए दूसरे के प्रमाणों का खंडन करते हैं । यदि कोई निग्रहस्थान में आ जाता है, तो उसका पक्ष गिरा हुआ माना जाता है और वाद समाप्त हो जाता है ।

२. किसी पक्ष के तत्वज्ञों द्वारा निश्चित सिद्धांत । उसूल । जैसे— अद्वैतवाद, आरंभवाद, परिणामवाद ।

३. बहस । झगड़ा ।

४. भाषण (को॰) ।

५. वक्तव्य । उक्ति । आरोप (को॰) ।

५. वर्णन । वृत्त (को) ।

६. उत्तर (को॰) ।

७. विवृति । व्याख्या (को॰) ।

८. ध्वनन । ध्वनि (को॰) ।

९. विवरण । अफवाह (को॰) ।

१०. अभियोग । नालिश । (को॰) ।

११. संमति । सलाह (को॰) ।

१२. अनुबध । इकरारनामा (को॰) ।