विश्वास

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हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

अनुवाद[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

विश्वास करना । सच मानना । प्रतीत करना । उ॰—प्रिय बिना प्रिया से रहा नहीं याता था । पर उनको उसका हरिण न पतियाता था ।—शंकु॰, पृ॰ १५ ।

विश्वास संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. वह धारणा जो मन में किसी व्यक्ति के प्रति उसका सद्भाव, हितैषिता, सत्यता, दृढ़ता आदि अथवा किसी सिद्धांत आदि की सत्यता अथवा उत्तमता का ज्ञान होने के कारण होती है । किसी के गुणों आदि का निश्चय होने पर उसके प्रति उत्पन्न होनेवाला मन का भाव । एतबार । यकीन । जैसे,—(क) मैं तो सदा ईश्वर पर विश्वास रखता हूँ । (ख) उन्हें आपका पूरा पूरा विश्वास है । (ग) आप विश्वास रखें, ऐसा कभी न होगा । क्रि॰ प्र॰—करना ।—मानना ।—रखना ।—होना । मुहा॰—विश्वास जमाना = किसी के मन में विश्वास उत्पन्न करना या दृढ करना । विश्वास दिलाना = किसी के मन में विश्वास उत्पन्न करना ।

२. मन की धारणा जो विषय या सिद्धांत आदि की सत्यता का पूरा पूरा प्रमाण न मिलने पर भी उसकी सत्यता के संबंध में होती है । जैसे— (क) बहुत से अशिक्षित भूत प्रेत पर विश्वास रखते हैं । (ख) और धर्मों की अपेक्षा बौद्ध धर्म पर उनका कुछ अधिक विश्वास है ।

३. केवल अनुमान के आधार पर होनेवाला मन का दृढ़ निश्चय । जैसे,—मेरा तो यही विश्वास है कि वह अवश्य आवेगा ।

४. गुप्त भेद या समाचार ।