शंखिनी

विक्षनरी से
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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

शंखिनी संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ शङ्खिनी]

१. एक प्रकार की वनौषधि । विशेष—इसकी लता और फल शिवलिंगी के समान होते हैं । अंतर केवल यही है कि शिवलिंगी के फल पर सफेद छींटे होते हैं जो शंखिनी के फल पर नहीं होते । इसके बीज शंख के समान होते हैं जिनका तेल निकलता है । वैद्यक में यह चरपरी, स्निग्ध और कड़वी, भारी, तीक्ष्ण, गरम, अग्निदीपक, बलकारक, रुचिकारी और विषविकार, आमदोष, क्षय, रुधिरविकार तथा उदरदोष आदि को शांत करनेवाली मानी जाती है । पर्या॰—यवतिक्ता । महातिक्ता । भद्रातिक्ता । सूक्ष्मपुष्पी । द्दढ़पादा । विसर्पिणी । नाकुली । नेञमीला । अक्षपीड़ा । माहेश्वरी । तिक्ता । यावी ।

२. पद्मिनी आदि स्त्रियों के चार भेदों में से एक भेद । उ॰—कोइ शंखिनि युत रोष दय़ा बिन बेगि प्रचारै ।—विश्राम (शब्द॰) । विशेष—कहते हैं, ऐसी स्त्री कोपशील, कोविद, सलीम शरीरवाली, बड़ी बड़ी और सजल आँखोंवाली, देखने में सुंदर, लज्जा और शंकारहित, अधीर, रतिप्रिय, क्षार गंधयुक्त और अरुण नखवाली होती है, यह वृषभ जाति के पुरुष के लिये उपयुक्त होती है ।

३. गुदाद्बार की नस ।

४. मुँह की नाड़ी । उ॰—मुख अस्थान शंखिनी केरा । ये नाड़िन के नाम निबेरा ।—विश्राम (शब्द॰) ।

५. एक देवी का नाम ।

६. सीप ।

७. एक शक्ति जिसकी पूजा बौद्ब लोग करते हैं ।

८. एक तीर्थस्थान का नाम ।

९. एक प्रकार की अप्सरा ।

१०. शंखाहुली ।

शंखिनी डंकिनी संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ शङ्खिनी] एक प्रकार का उन्माद । विशेष—इस उन्माद रोग के लक्षण इस प्रकार कहे गए हैं ।— सर्वांग में पीड़ा होना, नेत्र बहुत दुखना, मूर्छा होना, शरीर काँपना, रोना, हँसना, बकना, भोजन में अरुचि, गला बैठना, शरीर के बल तथा भूख का नाश, ज्वर चढ़ना और सिर में चक्कर आना, आदि ।

शंखिनी फल संज्ञा पुं॰ [सं॰ शङ्खिनीफल] सिरस का वृक्ष ।