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शून्य

विक्षनरी से

'धरा' पर भी रहकर हमनें देखे सपनें सुहाने हैं ; असम्भव को भी सम्भव कर दिखाने हैं ; उम्मीदों में हम हमेशा 'शून्य' को रखते हैं; छोड़ दिया बहुत पहले ही कुछ पास रखना ; इसलिए अक्सर खुशियाँ हम बाँट दिया करते हैं; दौलत-शोहरत की ख्वाहिंश भी नहीं रखते ; बस दुआओं की चाहत होती हैं आपसे ; वहीं पहुँचनें के लिए जहाँ मनुष्य कोई पीड़ित हो और मैं उनके काम आ सकूँ ।

प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

शून्य ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. वह स्थान जिसमें कुछ भी न हो । खाली स्थान ।

२. आकाश ।

३. एकांत स्थान । निर्जन स्थान ।

४. विंदु । विंदी । सिफर ।

५. अभाव । राहित्य । कुछ न होना । जैसे,—तुम्हारे हिस्से में शून्य है ।

६. स्वर्ग ।

७. विष्णु ।

८. ईश्वर । उ॰—कहैं एक तासों शिवे शून्य एकै । कहैं काल एकै महा विष्णु एकै । कहैं अर्थ एकै परब्रह्म जानो । प्रभा पूर्ण एकै सदा शून्य मानो ।—केशव (शब्द॰) ।

९. कान का एक आभूषण (को॰) ।

शून्य ^२ वि॰

१. जिसके अंदर कुछ न हो । खाली ।

२. निराकार । उ॰—रूप रेख कछु जाके नाहीं । तौ का करब शून्य के माही ।—विश्राम (शब्द॰) ।

३. जो कुछ न हो । असत् ।

४. विहीन । रहित । जैसे,—संज्ञाशून्य । विशेष—इस अर्थ में इस शब्द का प्रयोग यौगिक शब्द बनाने में अंत में होता है । जैसे, विवेकशून्य ।

५. एकांत । निर्जन (को॰) ।

६. खिन्न । उदास । उत्साहहीन (को॰) ।

७. तटस्थ । निरपेक्ष (को॰) ।

८. निर्दोंष (को॰) ।

९. अर्थहीन । निरर्थक (को॰) ।