शूल

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त्रिशूल

हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

शूल ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. प्राचीन काल का एक प्रकार का अस्त्र जो प्रायः बरछे के आकार का होता था ।

२. सूली जिससे प्राचीन काल के लोगों को प्राणदंड दिया जाता था ।

३. दे॰ 'त्रिशूल' ।

४. कोई बड़ा, लंबा और नुकीला काँटा ।

५. वायु के प्रकोप से होनेवाला एक प्रकार का बहुत तेज दर्द । विशेष—यह दर्द प्रायः पेट, पसली, कलेजे या पेड़ू आदि में होता है । वैद्यक के अनुसार बहुत अधिक व्यायाम या मैथुन करने, घोड़े पर चढ़ने, रात के समय जागने, बहुत अधिक ठंढा जल पीने, रूखे द्रव्यों का सेवन करने, सूखा मांस खाने, विरुद्ध भोजन करने, शारीरिक वेगों को रोकने, बहुत अधिक शोक या उपवास करने अथवा बहुत अधिक हँसने के कारण वायु का प्रकोप होता है जिससे पेट में या उसके आस पास बहुत तीव्र पीड़ा होती है । इस पीड़ा में ऐसा अनुभव होता है कि कोई अंदर से बहुत नुकीला काँटा या शूल गड़ा रहा है; इसी से इले शूल कहते हैं । यह रोग आठ प्रकार का—वातज, पित्तज, कफज, संनिपातज, आमज, वातश्लैष्मिक, पित्तश्लैष्मिक और वात- पैत्तिक—कहा गया है; और इसे शांत करने के लिये स्वेद, अभ्यंग, मर्दन और स्निग्ध तथा उष्ण द्रव्यों के सेवन का विधान है ।

६. किसी नुकीली वस्तु के चुभने के समान होनेवाली पीड़ा । कोंच । टीस ।

७. पीड़ा । क्लेश । दुःख । दर्द । उ॰—(क) तुम लछिमन निज पुरहि सिधारो बिछुरन मेट देहु लघु बंधू जियत न जैहै शूल तुम्हारो ।—सूर (शब्द॰) । (ख) मन तोसों कोटिक बार कही । समुझ न चरण गहत गोविंद के उर आध शूल सही ।—सूर (शब्द॰) ।

८. ज्योतिष में विष्कंभ आदि सत्ताइस योगों के अंतर्गंत नवाँ योग । विशेष—कहते हैं, जो बालक इस योग में जन्म लेता है, वह डरपोक, दरिद्र, मूर्ख, विद्याहीन, शूलरोगी, दुसरों का अनिष्ट करनेवाला और अपने बंधु बांधव को शूल के समान खटकनेवाला होता है । इस योग में किसी प्रकार का शुभ काम करने का निषेध है ।

९. छड़ । सलाख । सींख । उ॰—खाने को बहुधा शूल पर भुना हुआ मांस मिलता है, सो भी कुसमय ।—लक्ष्मणसिह (शब्द॰) ।

१०. मृत्यु ।

११. झंडा । पताका ।

१२. पोस्ते की पत्तियों की वह तह जो अफीम की चक्की जमाने के समय उसके चारो ं ओर ओर ऊपर नीचे लगाई जाती है । (बंगाल) ।

१३. ग्रंथि- वात । गठिया (को॰) ।

शूल ^२ वि॰ काँटे की तरह नोकवाला । नुकीला ।