संकर

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

संकर ^१ संज्ञा पुं॰ [ सं॰ सङ्कर]

१. वह धूल जो झाडू देने के कारण उड़ती है ।

२. आग के जलने का शब्द ।

३. दो पदार्थों का परस्पर मिश्रण । दो चीजों का आपस में मिलना ।

४. न्याय के अनुसार किसी एक स्थान या पदार्थ में अत्यंताभाव और समानाधिकरण का एक ही में होना । जैसे,—मन में मूर्तत् व तो है, पर भूतत्व नहीं है; और आकाश में भूतत्व है, पर मूर्तत्व नहीं है । परंतु पृथ्वी में भूतत्व भी है और मूर्तत्व भी है ।

५. वह जिसकी उत्पत्ति भीन्न वर्ण या जाति के पिता और माता से हुई हो । दोगला ।

६. मल । विष्ठा (को॰) ।

७. काव्यशास्त्र के अनुसार एक वाक्य में दो या अधिक अलंकारों का मिश्रण (को॰) ।

८. ऐसी वस्तु जो किसी वस्तु से छू जाने पर दूषित हो जाय (को॰) ।

९. भिन्न जाति या वर्ण का मिश्रण । जो भिन्न वर्णों का एक में (विवाहादि द्वारा) मिलना (को॰) । यौ॰—वर्णसंकर = दोगला ।

संकर ^२ संज्ञा पुं॰ [ सं॰ शङ्कर, प्रा॰ संकर] दे॰ 'शंकर' । शिव । उ॰—करेहु सदा संकर पद पूजा । नारी धरम पतिदेव न दूजा । मानस, १ ।१०२ ।

संकर पु ^३ संज्ञा स्त्री॰ [ सं॰ श्रृङ्खल, प्रा॰ संकल] दे॰ 'संकल' । उ॰— संकर सिंघ कि छुट्टि, छुट्टि इंद्रह कि गरुअ गज ।—पृ॰ रा॰, ५ ।५६ ।