सारंगी

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

सारंगी संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ सारङ्ग] एक प्रकार का बहुत प्रसिद्ध बाजा जिसका प्रचार इस देश में बहुत प्राचीन काल से है । उ— विविध पखावज आवज संचित बिचबिच मधुर उपंग । सुर सहनाई सरस सारंगी उपजत तान तरंग ।—सूर (शब्द॰) । विशेष—यह काठ का बना हुआ होता है और इसकी लंबाई प्राय: डेढ़ हाथ होती है । इसके सामने का भाग, जो परदा कहलाता है, पाँच छह अंगुल चौड़ा होता है, और नीचे का सि/?/ अपेक्षाकृत कुछ अधिक चौड़ा और मोटा होता है । इसमें ऊपर की ओर प्राय: ४ या ५ खूँटियाँ होती है जिन्हें कान कहते है । उन्ही खूँटियों से लगे हुए लोहै और पीतल के कई तार होते है । जो बाजे की पूरी लंबाई में होते हुए नीचे की ओर बँधे रहते है । इसे बजाने के लिये लकड़ी का एक लंबा और दोनो ओर कुछ झुका हुआ एक टुकड़ा होता है । जिसमें एक सिरे से दूसरे सिरे तक घोड़े की दुम के बाल बँधे होते हैं । इसे कमानी कहते हैं । बजाने के समय यह कमानी दाहिने हाथ में ले ली जाती है और उसमे लगे हुए घोड़े के बाल से बाजे के तार रेते जाते हैं । उधर बायेँ हाथ की उँगलियाँ तारों पर रहती है जो बजाने के लिये स्वरों के अनुसार ऊपर नीचे और एक तार से दूसरे तार पर आती जाती रहती हैं । इस बाजे का स्वर बहुत ही मधुर और प्रिय होता है; इसलिये नाचने गाने का पेशा करनेवाला लोग अपने गाने के साथ प्राय: इसी का व्यवहार करते हैं ।