सिंह

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

सिंह संज्ञा पुं॰ [सं॰] [स्त्री॰ सिंहनी]

१. बिल्ली की जाति का सबसे बलवान् पराक्रमी और भव्य जंगली जंतु जिसके नर वर्ग की गरदन पर बड़े बड़े बाल या केसर होते हैं । शेर बबर । विशेष—यह जंतु अब संसार में बहुत कम स्थानों में रह गया हैं । भारतवर्ष के जंगलों में किसी समय सर्वत्र सिंह पाए जाते थे, पर अब कहीं नहीं रह गए हैं । केवल गुजरात या काठियावाड़ की ओर कभी कभी दिखाई पड़ जाते हैं । उत्तरी भारत में अंतिम सिंह सन् १८३९ में दिखाई पड़ा था । आजकल सिंह केवल अफ्रिका के जंगलों में मिलते हैं । इस जंतु का पिछला भाग पतला होता है, पर सामने का भाग अत्यंत भव्य और विशाल होता है । इसकी आकृति से विलक्षण तेज टपकता है और इसकी गरज बादल की तरह गूँजती है, इसी से सिंह का गर्जन प्रसिद्ध है । देखने में यह बाघ की अपेक्षा शांत और गंभीर दिखाई पड़ता है और जल्दी क्रोध नहीं करता । रंग इसका ऊँट के रंग का सा और सादा होता है । इसके शरीर पर चित्तियाँ आदि नहीं होतीं । मुँह व्याघ्र की अपेक्षा कुछ लंबोतरा होता है, बिलकुल गोल नहीं होता । पूँछ का आकार भी कुछ भिन्न होता है । यह पतली होती है और उसके छोर पर बालों का गुच्छा सा होता है । सारे धड़ की अपेक्षा इसका सिर और चेहरा बहुत बड़ा होता है जो केसर या बालों के कारण और भी भव्य दिखाई पड़ता है । कवि लोग सदा से वीर या पराक्रभी पुरुष की उपमा सिंह से देते आए हैं । यह जंगल का राजा माना जाता है । पर्य्या॰—मृगराज । मृगेंद्र । केसरी । पंचानन । हरि । पंचास्य ।

२. ज्योतिष में मेष आदि आदि बारह राशियों में से पाँचवीं राशि । विशेष—इस राशि के अंतर्गत मघा, पूर्वा फाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी के प्रथम पाद पड़ते हैं । इसका देवता सिंह और वर्ण पीतधूम्र माना गया है । फलित ज्योतिष में यह राशि पित्त प्रकृति की, पूर्व दिशा की स्वामिनी, कूर और शब्दवाली कही गई है । इस राशि में उत्पन्न होनेवाला मनुष्य क्रोधी, तेज चलनेवाला, बहुत बोलनेवाला, हँसमुख, चंचल और मत्स्यप्रिय बतलाया गया है ।

३. वीरता या श्रेष्ठतावाचक शव्द । जैसे,—पुरुष सिंह ।

४. छप्पय छंद का सोलहवाँ भेद जिसमें ५५ गुरु, ४२ लघु कुल ९७ वर्ण या १५२ मात्राएँ होती हैं ।

५. वास्तुविद्या में प्रासाद का एक भेद जिसमें सिंह की प्रतिमा से भूषित बारह कोने होत े हैं ।

६. रक्त शिग्रु । लाल सहिंजन ।

७. एक राग का नाम ।

८. वर्त्तमान अवसर्पिणी के २४ वें अर्हत् का चिह्न जो जैन लोग रथयात्रा आदि के समय झंडों पर बनाते हैं ।

९. एक आभूषण जो रथ के बैलों के माथे पर पहनाते हैं ।

१०. एक कल्पित पक्षी ।

११. वेंकट गिरि का एक नाम ।

१२. कृष्ण के एक पुत्र का नाम (को॰) ।

१३. विद्याधरों का एक राजा (को॰) ।

सिंह संनहन ^२ संज्ञा पुं॰ सिंह का हनन [को॰] ।