सिरका

विक्षनरी से
Jump to navigation Jump to search

हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

सिरका संज्ञा पुं॰ [फा़॰ सिरकह्] धूप में पकाकर खट्टा किया हुआ ईख, अंगूर, जामुन, आदि का रस । उ॰—(क) भई मिथौरी सिरका बरा । सोंठ लाय के खरसा धरा ।—जायसी (शब्द॰) । (ख) हे रे कलाली तौं क्या किया । सिरका सातै प्याला दिया ।—संतवाणी॰, पृ॰ ३३ । विशेष—ईख, अंगूर, खजुर, जामुन आदि के रस को धूप में पकाकर सिरका बनाया जाता है । यह स्वाद में अत्यंत खट्टा होता है । वैद्यक में यह तीक्ष्ण, गरम, रुचिकारी, पाचक, हलका, रूखा, दस्तावर, रक्तपित्तकारक तथा कफ, कृमि और पांडु रोग का नाश करनेवाला कहा गया है । यूनानी मतानुसार यह कुछ गरमी लिए ठंढा और रुक्ष, स्निग्धताशोधक, नसों और छिद्रों में शीघ्र ही प्रवेश करनेवाला, गाढ़े दोषों को छाँटनेवाला, पाचक, अत्यंत क्षुधाकारक तथा रोध का उद् घाटक है । यह बहुत से रोगों के लिये परम उपयोगी है ।