सीसा

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

सीसा ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ सीसक] एक मूल धातु जो बहुत भारी और नीलापन लिए काले रंग की होती है । विशेष—आधुनिक रसायन में यह मूल द्रव्यों में माना गया है । यह पीटने से फैल सकता है, और तार रूप में भी हो सकता है, पर कुछ कठिनता से । इसका रंग भी जल्दी बदला जा सकता है । इसकी चद्दरें, नलियाँ और बंदूक की गोलियाँ आदि बनती हैं । इसका घनत्व ११ ।३७ और परमाणुमान २०६ ।४ है । सीसा दूसरी धातुओं के साथ बहुत जल्दी मिल जाता और कई प्रकार की मिश्र धातुएँ बनाने में काम आता है । छापे के टाइप की धातु इसी के योग से बनती है । आयुर्वेद में सीसा सप्त धातुओं में है और अन्य धातुओं के समान यह भी रसौषध के रूप में व्यवहृत होता है । इसका भस्म कई रोगों में दिया जाता है । वैद्यक में सीसा आयु, वीर्य और कांति को बढ़ानेवाला, मेहनाशक, उष्ण तथा कफ को दूर करनेवाला माना जाता है । इसकी उत्पत्ति की कथा भावप्रकाश में इ स प्रकार है,—वासुकि एक नाग कन्या को देखकर मोहित हुए थे । उन्हीं के स्खलित वीर्य से इस धातु की उत्पत्ति हुई । पर्या॰—सीस । सीसक । गंडपदभव । सिंदूरकारण । वर्ध । स्वर्णादि । यवनेष्ट । सुवर्णक । वध्रक । चिच्चट । जड । भुजंगम । अग । कुरंग । पिरपिष्टक । बहुमल । चीनपिष्ट । त्रपु । महावल । मृदुकृष्णायस । पद्म । तारशुद्धिकर । शिरावृत्त । वयोवंग ।

सीसा ‡पु ^२ संज्ञा पुं॰ [फा़॰ शीशह्] दे॰ 'शीशा' ।