सूर्य

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हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

पु.

अनुवाद[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

सूर्य संज्ञा पुं॰ [सं॰] [स्त्री॰ सूर्या, सूर्याणी]

१. अंतरिक्ष में पृथ्वी, मंगल, शनि आदि ग्रहों के बीच सबसे बड़ा ज्वलंत पिंड जिसकी सब ग्रह परिक्रमा करते हैं । वह बड़ा गोला जिससे पृथ्वी आदि ग्रहों को गरमी और रोशनी मिलती है । सूरज । आफताब । विशेष—सूर्य पृथ्वी से चार करोड़ पैसठ लाख मील दूर है । उसका व्यास पृथ्वी के व्यास से १०८ गुना अर्थात् ४,३३,॰॰० कोस है । घनफल के हिसाब से देखें तो जितना स्थान सूर्य घेरे हुए है, उतने में पृथ्वी के ऐसे ऐसे १२,५०,॰॰० पिंड आएँगे । सारांश यह कि सूर्य पृथ्वी से बहुत ही बड़ा है । परंतु सूर्य जितना बड़ा है, उसका गुरुत्व उतना नहीं है । उसका सापेक्ष गुरुत्व पृथ्वी का चौथाई है । अर्थात् यदि हम एक टुकड़ा पृथ्वी का और उतना ही बड़ा टुकड़ा सूर्य का लें तो पृथ्वी का टुकड़ा तौल में सूर्य के टुकड़े का चौगुना होगा । कारण यह है कि सूर्य पूथ्वी के समान ठोस नहीं है । वह तरल ज्वलंत द्रव्य के रूप में है । सूर्य के तल पर कितनी गरमी है, इसका जल्दी अनुमान ही नहीं हो सकता । वह २०,॰॰० डिग्री तक अनुमान की गई है । इसीताप के अनुसार उसके अपरिमित प्रकाश का भी अनुमान करना चाहिए । प्रायः हम लोगों को सूर्य का तल बिलकुल स्वच्छ और निष्कलंक दिखाई पड़ता है, पर उसमें भी बहुत से काले धब्बे हैं । इनमें विचित्रता यह है कि एक निश्चित नियम के अनुसार ये घटते बढ़ते रहते हैं, अर्थात् कभी इनकी संख्या कम हो जाती है, कभी अधिक । जिस वर्ष इनकी संख्या अधिक होती है, उस वर्ष में पृथ्वी पर चुंबक शक्ति का क्षोभ बहुत बढ़ जाता है और विद्युत् की शक्ति के अनेक कांड दिखाई पड़ते हैं । कुछ वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इन लांछनों का वर्षा से भी संबंध है । जिस साल ये अधिक होते हैं, उस साल वर्षा भी अधिक होती है । भारतीय ग्रंथों में सूर्य की गणना नव ग्रहों में है । आधुनिक ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार सूर्य ही मुख्य पिंड है जिसके पृथ्वी, शनि, मंगल आदि ग्रह अनुचर हैं और उसकी निरंतर परिक्रमा किया करते हैं । विशेष दे॰ 'खगोल' । सूर्य की उपासना प्रायः सब सभ्य प्राचीन जातियों में प्रचलित है । आर्यों के अतिरिक्त असीरिया के असुर भी 'शम्श' (सूर्य) की पूजा करते थे । अमेरिका के मेक्सिको प्रदेश में बसनेवाली प्राचीन सभ्य जनता के भी बहुत से सूर्यमंदिर थे । प्राचीन आर्य जातियों के तो सूर्य प्रधान देवता थे । भारतीय और पारसीक दोनों शाखाओं के आर्यों के बीच सूर्य को मुख्य स्थान प्राप्त था । वेदों में पहले प्रधान देवता सुर्य, अग्नि और इंद्र थे । सूर्य आकाश के देवता थे । इनका रथ सात घोड़ों का कहा गया है । आगे चलकर सूर्य और सविता एक माने गए और सूर्य की गणना द्वादश आदित्यों में हूई । ये आदित्य वर्ष के १२ महीनों के अनुसार सूर्य के ही रूप थे । इसी काल में सूर्य के सारथि अरुण (सूर्योदय की ललाई) कहे गए जो लँगड़े माने गए हैं । सूर्य का ही नाम विवस्वत् या विवस्वान भी था जिनकी कई पत्नियाँ कही गई हैं, जिनमें संज्ञा प्रसिद्ध है । पर्या॰—भास्कर । भानु । प्रभाकर । दिनकर । दिनपति । मार्तंड । रवि । तरणि । सहस्रांशु । तिग्मदीधिति । मरीचिमाली । चंडकर । आदित्य । सविता । सूर । विवस्वान । दिवाकर ।

२. बारह की संख्या ।

३. अर्क । आक । मंदार ।

४. बलि के एक पुत्र का नाम ।

५. शिव का एक नाम (को॰) ।

यह भी देखिए[सम्पादन]