सोचना

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

सोचना क्रि॰ अ॰ [सं॰ शोचन, शोचना ( =दुख, शोक, अनुताप)]

१. किसी प्रकार का निर्णय करके परिणाम निकालने या भवितव्य को जानने के लिये बुद्धि का उपयोग करना । मन में किसी बात पर विचार करना । गौर करना । जैसे,— (क) मैं यह सोचता हूँ कि तुम्हारा भविष्य क्या होगा ।(ख) कोई बात कहने से पहले सोच लिया करो कि वह कहने लायक है या नहीं ।(ग) इस बात का उतर मैं सोचकर दूँगा ।(घ) तुम तो सोचते सोचते सारा समय बिता दोगे । उ॰—सोचत है मन ही मन मैं अब कीजै कहा बतियाँ जगछाई । नीचो भयो ब्रज को सब सीस मलीन भई रसखानि दुहाई । —रसखान (शब्द॰) ।

२. चिंता करना । फिक्र करना । उ॰—(क) अब हरि आइहैं जिन सोचै । सुन विधुमुखी बारि नयनन ते अब तु काहे मोचै ।— सूर (शब्द॰) ।(ख)कौनहुँ हेतन आइयो प्रितम जाके धाम । ताको सोचति सोच हिय केशव उक्ताधाम । —केशव (शब्द॰)

३. खेद करना । दुःख करना । उ॰—माथे हाथ मूँदि दोउ लोचन । तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन । —तुलसी (शब्द॰) ।

सोचना क्रि॰ सं॰ [हिं॰ सोचना] दे॰ 'सूचना' । उ॰—सुदिन सुनखत सुधरी सोचाई । बेगि वेदविधि लगन धराई । —तुलसी (शब्द॰) ।