स्वप्न

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

स्वप्न संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. सोने की क्रिया या अवस्था । निद्रा । नींद ।

२. निद्रावस्था में कुछ मूर्तियों, चित्रों और विचारों आदि की संबद्ध या असंबद्ध श्रृंखला का मन में आना । निद्रावस्था में कुछ घटना आदि दिखाई देना । जैसे,—इधर कई दिनों से मैं भीषण स्वप्न देखा करता हूँ ।

३. वह घटना आदि जो इस प्रकार निद्रित अवस्था में दिखाई दे अथवा मन में आवे । जैसे,—उन्होंने अपना सारा स्वप्न कह सुनाया । विशेष—प्रायः पूरी नींद न आने की दशा में मन में अनेक प्रकार के विचार उठा करते हैं जिनके कारण कुछ घटनाएँ मन के सामने उपस्थित हो जाती हैं । इसी को स्वप्न कहते हैं । यद्यपि वास्तव में उस समय नेत्र बंद रहते हैं और इन बातों का अनुभव केवल मन को होता है, तथापि बोलचाल में इसके साथ 'देखना' क्रिया का प्रयोग होता है ।

४. शिथिलता । अकर्मण्यता । निरुत्साह । आलस्य (को॰) ।

५. मन में उठनेवाली ऊँची कल्पना या विचार, विशेषतः ऐसी कल्पना या विचार जो सहज में कार्य रूप में परिणत न हो सके । जैसे,—आप तो बहुत दिनों से इसी प्रकार के स्वप्न देखा करते हैं । मुहा॰—स्वप्न टूट जाना = (१) नींद से जाग उठना । (२) कल्पना लोक से यथार्थ में उतर आना ।