स्वर्ग

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वह स्थान (लोक) जहाँ कई धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मरने के पश्चात उन मनुष्यों की आत्मा जाती है जिन्होंने अच्छे कर्म किये हैं।

हिन्दू धर्म के अनुसार देवों का वास स्वर्ग में है।

अनुवाद[सम्पादन]

हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

स्वर्ग संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. हिंदुओं के सात लोकों में से तीसरा लोक जो ऊपर आकाश में सूर्य लोक से लेकर ध्रुव लोक तक माना जाता है । उ॰—(क) असन बसन पसु वस्तु विविध विधि सब मनिं महँ रहु जैसे । स्वर्ग नरक चर अचर लोक बहु बसत मध्य मन तैसे ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) स्वर्ग, भूमि, पाताल के, भोगहिं सर्व समाज । शुभ संतति निज तेजबल, करत राज के काज ।—निश्चल (शब्द॰) ।(ग) ... देवकी के आठवें गर्भ में लड़का होगा, सो न हो लड़की हुई; वह भी हाथ से छूट स्वर्ग को गई ।—लल्लू (शब्द॰) । विशेष—किसी किसी पुराण के अनुसार यह सुमेरु पर्वत पर है । देवताओं का निवासस्थान यही स्वर्गलोक माना गया है और कहा गया है कि जो लोग अनेक प्रकार के पुण्य और सत्कर्म करके मरते हैं, उनकी आत्माएँ इसी लोक में जाकर निवास करती हैं । यज्ञ, दान आदि जितने पुण्य कार्य किये जाते हैं, वे सब स्वर्ग की प्राप्ति के उद्देश्य से ही किए जाते हैं । कहते हैं, इस लोक में केवल सुख ही सुख है, दुःख, शोक, रोग, मृत्यु आदि का नाम भी नहीं है । जो प्राणी जितने ही अधिक सत्कर्म करता है, वह उतने ही अधिक समय तक इस लोक में निवास करने का अधिकारी होता है । परंतु पुण्यों का क्षय हो जाने अथवा अवधि पूरी हो जाने पर जीव को फिर कर्मानुसार शरीर धारण करना पड़ता है, और यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक उसकी मुक्ति नहीं हो जाती । यहाँ अच्छे अच्छे फलोंवाले वृक्षों, मनोहर वाटिकाओं और अप्सराओं आदि का निवास माना जाता है । स्वर्ग की कल्पना नरक की कल्पना के बिलकुल विरुद्ध है । प्रायः सभी धर्मों, देशों और जातियों में स्वर्ग और नरक की कल्पना की गई है । ईसाइयों के अनुसार स्वर्ग ईश्वर का निवासस्थान है । और वहाँ फरिश्ते तथा धर्मात्मा लोग अनंत सुख का भोग करते हैं । मुसलमानों का स्वर्ग बिहिश्त कहलाता है । मुसलमान लोग भी बिहिश्त को खुदा और फरिश्तों के रहने की जगह मानते हैं और कहते हैं कि दीनदार लोग मरनेपर वहीं जायँगे । उनका बिहिश्त इंद्रियसुख की सब प्रकार की सामग्री से परिपूर्ण कहा गया है । वहाँ दूध और शहद की नदियाँ तथा समुद्र हैं, अंगूरों के वृक्ष हैं और कभी वृद्ध न होनेवाली अप्सराएँ हैं । यहूदियों के यहाँ तीन स्वर्गों को कल्पना की गई है । पर्या॰—स्वर् । नाक । त्रिदिव । त्रिदशालय । सुरलोक । द्यौ । मेंदर । देवलोक । ऊर्ध्वलोक । शक्रभुवन । मुहा॰—स्वर्ग के पथ पर पैर देना = (१) मरना । (२) जान जोखिम में डालना । उ॰—कहो सो तोहिं सिंहलगढ़ है, खंड सात चढ़ाव । फेरि न कोई जीति जय, स्वर्ग पंथ दे पाव ।— जायसी (शब्द॰) । स्वर्ग जाना या सिधारना = मरना । देहांत होना । जैसे,—वे तीस ही वर्ष की अवस्था में स्वर्ग सिधारे (किसी की मृत्थु पर उसके संमानार्थ उसका स्वर्ग जाना या सिधारना कहा जाता है ।) उ॰—बहुते भँवर बवंडर भये । पहुँच न सके स्वर्ग कहँ गये ।—जायसी (शब्द॰) । यौ॰—स्वर्गसुख = बहुत अधिक और उच्च कोटि का सुख । वैसा सुख जैसा स्वर्ग में मिलता है । जैसे,—मुझे तो केवल अच्छी अच्छी पुस्तकें पढ़ने में ही स्वर्गसुख मिलता है । स्वर्ग की धार = आकाशगंगा । उ॰—नासिक खीन स्वर्ग की धारा । खीन लंक जनु केहर हारा ।—जायसी (शब्द॰) ।

२. ईश्वर । उ॰—न जनों स्वर्ग बात धौं काहा । कहूँ न आयकही फिर चाहा ।—जायसी (शब्द॰) ।

३. सुख ।

४. वह स्थान जहाँ स्वर्ग का सुख मिले । बहुत अधिक आनंद का स्थान ।

५. आकाश । उ॰—(क) हौं तेहि दीप पतँग होइ परा । जिव जिमि काढ़ स्वर्ग ले धरा ।—जायसी (शब्द॰) । (ख) लाक्षागृह पावक तब जारा । लागी जाय स्वर्ग सों धारा ।—सबल (शब्द॰) ।

६. प्रलय (क्व॰) । उ॰—भा परलै अस सबहीं जाना । काढ़ा खड्ग स्वर्ग नियराना ।—जायसी (शब्द॰) ।

स्वर्ग जानेवाला ।

२. जो स्वर्ग की ओर गमन कर चुका हो । मरा हुआ । मृत । स्वर्गीय ।