ही

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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ही ^१ अव्य॰ [सं॰ हि (निश्चयार्थक)] एक अव्यय जिसका व्यवहार जोर देने के लिये या निश्चय, अनन्यता, अल्पता, परिमिति तथा स्वीकृति आदि सूचित करने के लिये होता है । जैसे,— (क) आज हम रुपया ले ही लेंगे । (ख) वह गोपाल ही का काम है । (ग) मेरे पास दस ही रुपए हैं । (घ) अभी यह प्रयाग ही तक पहुँचा होगा । (च) अच्छा भाई हम न जायँगे, गोपाल ही जायँ । इसके अतिरिक्त और प्रकार के भी प्रयोग इस शब्द के प्राप्त होते हैं । कभी इस शब्द से यह ध्वनि निकलती है कि 'औरों की बात जाने दीजिए' । जैसे,—तुम्हीं बताओ इसमें हमारा क्या दोष ? ।

ही ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰ हृत्,प्रा॰, अप॰ हिअ > ही] दे॰ 'हिय', 'हृदय' । उ॰—(क) मन पछितैहैं अवसर बीते । दुर्लभ देह पाइ हरि- पद भजु करम बचन अरु ही ते ।—तुलसी ग्रं॰, पृ॰ ५५७ । (ख) उघरहिँ विमल बिलोचन ही के । मिटहिँ दोष दुख भव रजनी के ।—मानस १ ।१ । य़ौ॰—हीतल ।

ही पु ^३ क्रि॰ अ॰ [सं॰ √भू, प्रा॰ भव, हव, हिव, हो] ब्रजभाषा के 'होनो' ( = होना) क्रिया के भूतकाल 'हो' ( = था) का स्त्रीलिंग गत रूप । थी । उ॰—एक दिवस मेरे गृह आए, मैं ही मथति दही ।—सूर (शब्द॰) ।

ही ही संज्ञा स्त्री॰ [अनु॰] ही ही शब्द करके हँसने की क्रिया । तुच्छतापूर्वक हँसना । यौ॰—ही ही ठी ठी करना (१) व्यर्थ और तुच्छतापूर्वक हँसना ।

२. हँसी मजाक करना । उ॰—चारों ओर झोँटा फैलाकर डाकना कूदना बंद कर और उससे—उससे-समझी ? ही ही ठी ठी रोक ।—शराबी, पृ॰ १२ ।