अगर

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साँचा:also

हिन्दी[सम्पादन]

व्युत्पत्ति १[सम्पादन]

संस्कृत अग्र (agra) से, लुआ त्रुटि package.lua में पंक्ति 80 पर: module 'Module:etymology languages' not found। से।

क्रिया विशेषण[सम्पादन]

साँचा:hi-adv

  1. आगे ।
    जैसे 'अगरज' में 'अगर'।

व्युत्पत्ति २[सम्पादन]

हिं॰ अगल बगल

क्रिया विशेषण[सम्पादन]

साँचा:hi-adv

  1. अगर बगर — 'अगल बगल' का वैकल्पिक रूप।

व्युत्पत्ति ३[सम्पादन]

Borrowing from फ़ारसी اگر (agar), माध्यम फ़ारसी 𐭧𐭲 (agar) से।

संयोजक[सम्पादन]

अगर (उर्दू वर्तनी اگر)

  1. यदि । जो ।
    साँचा:hi-x
    उसे हमने बहुत ढूँढ़ा न पाया । अगर पाया तो खोज अपना न पाया ।—शेर॰, भा॰ १, पृ॰ ४१२ ।
    साँचा:syn
  2. किसी एक वस्तु की दूसरी वस्तु पर निर्भरता दर्शाता है
  3. मुहा॰— अगर मगर करना = (१) हुज्जत करना । तर्क करना । (२) आगा पीछा करना ।

व्युत्पत्ति ४[सम्पादन]

संस्कृत अगरु (agaru) से।

संज्ञा[सम्पादन]

अगर पु

  1. एक पेड़ जिसकी लकड़ी सुगंधित होती है। ऊद
    चंदन अगर सुगंध और घृत विधि करि चिता बनायो। — सूर॰ ९ । ५० ।
    साँचा:syn
उपयोग नोट्स[सम्पादन]

यह पेड़ भूटान, आसाम, पूर्वी बंगाल, खसिया और मर्तबान की पहाड़ियों में होता हैं । इसकी ऊँचाई ६० से १०० फुट और घेरा ५ से८ फुट तक होता हैं । जब यह २० वर्ष का होता है तब इसकी लकड़ी अगर के लिय काटी जाती है । पर कोई कोई कहते हैं कि इसकी लकड़ी ५०-६० वर्ष के पहले नहीं पकती । पहले तो इसकी लकड़ी बहुत साधारण पीले रंग की और गंधरहित होती हैं, पर कुछ दिनों में धड़ और साखाओं में जगह जगह एक प्रकार का रस आ जाता हैं जिसके कारण उन ,स्थानों की लकड़ियाँ भारी हो जाती हैं । इन स्थानों से लकड़ियाँ काट ली जाती हैं और अगर के नाम से बिकती हैं । यह रस जितना अधिक होता है उतनी ही लकड़ी उत्तम और भारी होती है । पर ऊपर से देखने से यह नहीं जाना जा सकता कि किस पेड़ में लकड़ी अच्छी निकलेगी । बिना सारा पेड़ काटे इसका पता नहीं लग सकता । एक अच्छे पेड़ में (३००) तक का अगर निकल सकता है । पेड़ का हल्का भाग जिसमें यह रस या गोंद कम होता है, 'दूम' कहलता है और सस्ता अर्थात् (१). (२) सेर बिकता हैं, पर असली काली काली लकड़ी, जो गोंद अधिक होने के कारण भारी होती है, 'गरकी' कहलाती है और (१६) या (२०) सेर बिकती है । यह पानी में डूब जाती है । लकड़ी का बुरादा धूप, दसांग आदि में पड़ता है । बंबई में जलाने के लिये इसकी अगरबत्ती बहुत बनती है । सिलहट में अगर का इत्र बहुत बनता है । चोवा नाम का सुगंधित लेप इसी से बनता है ।

व्युत्पत्ति ५[सम्पादन]

संस्कृत अक्षर (akṣara) से।

संज्ञा[सम्पादन]

अगर पु

  1. वर्णहरफ़ (डिं) ।
    उठारे सहज जोधार असुंसरा लड़े हरि चापड़े मार लीधा उचार दध अगर रो ।—रघु॰ रू॰, पृ॰ १३१ ।

व्युत्पत्ति ६[सम्पादन]

संस्कृत आगार (āgāra) से, डिं॰ अग्गर से।

संज्ञा[सम्पादन]

अगर पु

  1. आगारगृह
    जे सँसार अँधियार अगर में भए मगनबर ।—का॰ कौमुदी १, ।