गरुड

विक्षनरी से
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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

गरुड संज्ञा पुं॰ [सं॰ गरुड]

१. विष्णु के वाहन जो पक्षियों के राजा माने जाते हैं । विशेष—ये विनता के गर्भ से उत्पन्न कश्यप के पुत्र हैं । इनकी उत्पत्ति के विषय में यह कथा है एक बार कश्यप जी ने पुत्रप्राप्ति की इच्छा से यज्ञ का अनुष्ठान किया । उनके यज्ञ के लिये इंद्र, बालखिल्य तथा और और देवता लकड़ी आदि सामग्री इकट्ठी करने लगे । इंद्र ने थोड़ी ही देर में लकड़ी का ढेर लगा दिया और अंगुष्ट भर के बालखिल्यों को पलाश की एक टहनी घसीटते देखकर वह उनकी हँसी करने लगा । इसपर बालखिल्यगण कुपित होकर कश्यप का पुत्र दूसरा इंद्र उत्पन्न करने के प्रयत्न में लगे । अंत में कश्यप ने उन्हें समझाकर शांत किया और कहा कि तुम जिसे उत्पन्न करना चाहते हो, वह पक्षियों का इंद्र होगा । अंत में विनता के गर्भ से कश्यप ने अग्नि और सूर्य के समान गरुड़ और अरुण दो पुत्र उत्पन्न किए । गरुड़ बिष्णु के वाहन हुए और अरुण सूर्य के सारथी । गरुड़ सर्पों के शत्रु समझे जाते हैं । पर्या॰—गरुत्मान् । तार्क्ष । वैक्तेय । सुपर्ण । नागांतक । पन्नगा- शन । पक्ष्नगारि । पक्षिराज । विष्णुरथ । तरस्वी । अमृताहरण । शाल्मलिस्थ । खगेश्वर । यौ॰—गरुड़गामी । गरुड़ासन । गरुड़केतु । गरुड़ध्वज ।

२. बहुतों के मत से उकाब पक्षी, जो गिद्ध की तरह का और बहुत बलवान् होता है । विशेष—इसकी चोंच की नोक कुछ मुड़ी होती है और इसके पैर पंजों तक छोटे-छोटे परों से ढके रहते हैं । यह अपने चंगुल में भेड़ बकरी के बच्चों तक को उठा ले जाता और खाता है । अपने बल के कारण यह पक्षिराज कहा जाता हैं । पश्चिम की प्राचीन जातियों में रोमक (रोमन) लोग उकाब को जोव (प्रधान देवता इंद्र) का पक्षी मानते थे और उसे मंगल तथा विजय का चिह्न समझते थे । अब भी रूस, आस्ट्रेलिया और जर्मनी आदि देश उकाब का चिह्न ध्वजा आदि पर धारण करते है । इन सब बातों से संभव जान पड़ता है कि गरुड़ उकाब ही का नाम हो ।

३. एक सफेद रंग का बड़ा पक्षी जो पानी के किनारे रहता है । विशेष—यह तीन साढ़े तीन फुट ऊँचा होता है और इसकी गरदन सारस की तरह लंबी होती है जिसके नीचे एक थैली सी लटकती रहती है । यह् मछलियाँ, केकड़े आदि पकड़कर खाता है । इसे पँड़वा ढेक भी कहते हैं ।

४. सेना की एक प्रकार की व्यूहरचना । गरुडव्यूह । विशेष—इसमें अगला भाग नोकदार, मध्य का भाग विस्तृत पिछला भाग पतला होता है ।

५. बीस प्रकार के प्रासादों में से एक । विशेष—इसमें बीच का भाग चौड़ा तथा अगला और पिछला भाग नुकीला होता ।

६. चौदहवें कल्प का नाम ।

७. जैन मत के अनुसार वर्तमान अवसर्पिणी के सोलहवें अर्हत् का गणधर ।

८. श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम ।

९. छप्पय छंद का एक भेद ।

१०. नृत्य में एक प्रकार का स्थानक जिसमें बाएँ पैर को सिकोड़कर दहिने पैर का घुटना जमीन पर टेकते हैं ।