दूध

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संज्ञा

अनुवाद

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प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

दूध संज्ञा पुं॰ [सं॰ दुग्ध, प्रा॰ दुध्ध]

१. सफेद रंग का वह प्रसिद्ध तरल पदार्थ जो स्तनपायी जीवों की मादा के स्तनों में रहता है और जिससे उनके बच्चों का बहुत दिनों तक पोषण होता है । पय । दुग्ध । विशेष—दूध का स्वाद कुछ मीठा होता है और इसमें एक प्रकार की विलक्षण हलकी गंध होती है । भिन्न भिन्न जातियों के प्राणियों के दूध के संयोजक अंश तो समान ही होते हैं, पर उसके भाग में बहुत कुछ अंतर होता है । एक ही जाति के भिन्न भिन्न प्राणियों और कभी कभी एक ही प्राणी में भिन्न भिन्न समयों में भी दूध के भाग में कुछ अंतर होता है । दूध का ४/५ से १/१० तक अंश जल होता है और शेष भाग प्रोटीन, चरबी, शर्करा और नमक आदि का होता है । दूध जब थोड़ी देर तक यों ही छोड़ दिया जाता है तब उसकी चरबी ऊपर आ जाती है और वही पुरिवर्तित होकर मलाई और मक्खन बन जाती है । दूध में जब विशेष प्रकार की और उचित मात्रा में खटाई का अंश मिल जाता है तब वही जमकर दही बन जाता है । कभी कभी ऐसा भी होता है कि दूध में से जल और उसके संयोजक अंश अलग हो जाते हैं । इसे दूध का फटना कहते हैं । (मनुष्य जाति की) स्त्रियों के दूध से बहुत अधिक मिलता जुलता दूध गाय या भैंस का होता है, इसी लिये मनुष्य बहुधा गाय या भैंस का दूध पीते, उसका दही जमाते, मिठाइयों के लिये खोआ या छेना बनाते तथा उसमें से मथकर मक्खन आदि निकालते हैं । कहीं कहीं बकरी और ऊँटनी आदि का दूध भी पीया जाता है । वैद्यक में भिन्न भिन्न प्राणियों के दूध के भिन्न भिन्न गुण बतलाए गए हैं । आजकल पाश्चात्य विद्वानों ने दूध का विश्लेषण करके उसके संयोजक पदार्थों के संबंध में जो कुछ निश्चय किया है उसके अनुसार १०० अंश दूध में

८६. ८ अंश पानी,

४. ८ अंश चीनी,

२. ६ अंश मेदा (मक्खन),

४. ॰ अंश केसिन और (अंडे की) सफेदी और ॰.७ अंश खनिज पदार्थ (जैसे खड़िया, फास्फरस आदि) होता है । मुहा॰—दूध उगलना = बच्चे का दूध पीकर कै कर देना । दूध उछालना = खौलते हुए दूध को ठंढा करने के लिये कड़ाही आदि में उसे बार बार किसी छोटे बरतन में निकालना और उसमें से धार बाँधकर कढ़ाई में दूध गिराना । दूध को ठंढा करने के लिये बार बार उसे धार बाँधकर नीचे गिराना । दूध उतरना = छातियों में दूध भर जाना । दूध और काँजी सा मिलना = विरोध लिए मिलना । उ॰—कुछ न फल है दूध काँजी सा मिले । जो मिलें तो दूध जल जैसा मिलें ।— चुभते॰, पृ॰ ६४ । दूध और चीनी सा मिल चलना = दो का मिलकर और उत्तम हो जाना । उ॰—नित्य नैमित्तिक व्यवहार में वे दोनों दूध और चीनी की तरह मिल चले थे ।—प्रेमघन॰, भा॰ २, पु॰ २४४ । दूध और जल सा मिलना = सम भाव से मिलना । अभेद भाव से मिलना । उ॰—मिल गए पर चाहिए फटना नहीं । तो परस्पर हों निछावर जो हिलें । कुछ न फल है दूध काँजी सा मिलें । जो मिलें तो दूध जल जैसा मिलें ।—चुभते॰, पृ॰ ६४ । दूध का दूध और पानी का पानी करना = बिलकुल ठीक ठीक न्याय करना । पूरा पूरा न्याय करना । ऐसा न्याय करना जिसमें किसी पक्ष के साथ तनिक भई अन्याय न हो । जैसे,—आपने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया, नहीं तो ये लोग लड़ते लड़ते मर जाते । उ॰—हम जातहिं वह उधरि परैगी दूध दूध पानी सो पानी ।—सूर (शब्द॰) । दूध का दूध पानी का पानी होना = सच और झूठ का खुल जाना । उ॰—मगर खैर, अब तो दूध का दूध और पानी का पानी हो गया ।—सैर कु॰, पृ॰ ४२ । दूध का बच्चा = वह बच्चा जो केवल दूध के ही आधार पर रहता हो । बहुत ही छोटा और केवल दूध पीनेवाला बच्चा । दूध का सा उबाल = शीघ्र शांत होनेवाला क्रोध या मनोवेग आदि । दूध की मक्खी = तुच्छ और तिरस्कृत पदार्थ । दूध की मक्खी की तरह निकालना या निकालकर फेंक देना =किसी मनुष्य को बिलकुल तुच्छ और अनावश्यक समझकर अपने साथ या किसी कार्य आदि से एकदम अलग कर देना । उस तरह अलग कर देना जिस तरह दूध में से मक्खी अलग की जाती है । जैसे,—सब लोगों ने उनको सभा से दूध की मक्खी की तरह निकाल दिया । उ॰—मनसा बचन कर्मना अब हम कहत नहीं कछु राखी । सूर काढ़ि डारयो ब्रज तें ज्यों दूध माँझ ते माखी ।—सूर (शब्द॰) । मुँह से दूध की बू आना = अभी तक बच्चा और अनुभवहीन होना । विशेष अनुभव और ज्ञान न होना । दूध के दाँत = वे दाँत जो बच्चों को पहले पहल दूध पीने की अवस्था में निकलते हैं और छह सात वर्षो की अवस्था में जिनके गिर जाने पर दूसरे दाँत निकलते हैं । दूध के दाँत न टूटना = अभी तक बच्चा होना । ज्ञान और अनुभव न होना । जैसे,—अभी तक तो उसके दूध के दाँत भी नहीं टूटे हैं, वह क्या मेरे सामने बात करेगा । दूध दुहना = स्तनों को दबाकर दूध की धार निकालना । दूध देना = अपने स्तनों में से दूध छोड़ना । अपनी छातियों में से दूध निकालना । जैसे,—उनकी भैंस ८ सेर दूध देती है । दूध चढ़ना = (१) स्तन से निकलनेवाले दूध की मात्रा का कम होना । जैसे,—इधर कई दिनों से इसकी मा का दूध चढ़ गया है । (२) स्तन से निकलनेवाले दूध की मात्रा बढ़ना । दूध चढ़ाना = दुहते समय गाय का अपने दूध को स्तनों में ऊपर की ओर खींच लेना जिससे दुहनेवाला उसे खींचकर बाहर न निकाल सके । (प्राय: गाय भैंसें आदि अपने बछड़ों के लिये स्तनों में दूध चुरा रखती हैं, इसी को दूध चढ़ाना कहते हैं ।) छठी का दूध याद आना = दे॰ 'छठी' के मुहा॰ । दूध छुड़ाना = बच्चे की दूध पीने की आदत छुड़ाना । किसी क ो दूध छोड़ने में प्रवृत करना । दूध डालना = बच्चों का पीए हुए दूध की कै कर देना । दूध तोड़ना = (१) गाय आदि का दूध देना बंद या कम कर देना । (२) गरम दूध को ठंढा करने के लिये हिलाना या घँघोलना । दूधों नहाओ पूतों फलो = धन और संतान की वृद्धि हो । संपत्ति और संतान खूब बढे़ (आशीर्वाद) । दूध पिलाना = बालक का मुँह स्तन के साथ लगाकर उसे दूध कू धार खींचने देना । दूध पीता बच्चा = गोद का बच्चा । बहुत छोटा बच्चा । दूध पीना = स्तन को मुँह में लगाकर उसमें से दूध की धार खींचना । स्तनपान करना । किसी चीज का दूध पीना = (किसी चीज का) ऐसी दशा में रहना जिसमें उसके नष्ट होने आदि का खटका न रहे । जैसे,—आप घबराइए नहीं, आपके रुपए दूध पीते हैं । दूध फटना = खटाई आदि पड़ने के कारण दूध का जल अलग और सार भाग या छेना अलग हो जाना । दूध बिगड़ना । दूध फाड़ना = किसी क्रिया से दूध का पानी और छेना या सार भाग अलग करना । दूध बढा़ना = दूध छुडाना । बच्चे की दूध पीने की आदत छुडा़ना । उ॰— दूध बढ़ाने के पीछे गंगा जी ने दोनों लड़के वालमीक जी को सौंप दिए ।—सीताराम (शब्द॰) । (स्तनों में) दूध भर आना = बच्चे की ममता या स्नेह के कारण माता के स्तनों में दूध उतर आना । माता का प्रेम बढ़ना ।

२. अनाज के हरे बीजों का रस जो पीछे से जमकर सत्त हो जाता है । मुहा॰—दूध पड़ना = अनाज में रस पड़ना । अनाज का तैयारी पर आना ।

३. दूध की तरह का वह तरल पदार्थ जो अनेक प्रकार के पौधों की पत्तियों और डंठलों में रहता और उनके तोड़ने पर निकलता है । जैसे, मदार का दूध, बरगद का दूध ।