पाँच

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हिन्दी[सम्पादन]

विशेषण[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

संख्या

अनुवाद[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

पाँच ^१ वि॰ [सं॰ पञ्च] जो गिनती में चार और एक हो । जो तीन और दो हो । चार से एक अधिक । उ॰— पाँच कोष नीचे कर देखो इनमें सार न जानी । — कबीर श॰, भा॰ २, पृ॰ ६६ । मुहा॰—पाँचों उँगलियाँ घी में होना= सब तरह का लाभ या आराम होना । खूब बन आना । जैसे,— इस समय तो आपकी पाँचो उँगलियाँ घी में होंगी । पाँचो सवारों में नाम लिखाना = जबरदस्ती अपने से अधिक योग्य व श्रेष्ठ मनुष्यों में मिल जाना । औरों के साथ अपने को भी श्रेष्ठ गिनाना । विशेष— इस मुहावरे के संबंध में एक किस्सा है । कहते हैं, एक बार चार अच्छे सवार कहीं जा रहे थे । उनके पीछे पीछे एक दरिद्र आदमी भी एक गधे पर सवार जा रहा था । थोडी़ दूर जाने पर एक आदमी मिला जिसने उस दरिद्र गधे सवार से पूछा कि क्यों भाई, यो सवार कहाँ जा रहे हैं । उसने बहुत बिगड़कर कहा, हम पाँचों सवार कहीं जा रहे हैं तुम्हें पूछने से मतलब ।

पाँच ^२ संज्ञा पुं॰

१. पाँच की संख्या ।

२. पाँच का अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है —५ ।

३. कई एक आदमी । बहुत लोग । उ॰— मोरि बात सब बिधिहि बनाई । प्रजा पाँच कत करहु सहाई ।— तुलसी (शब्द॰) ।

४. जाति बिरादरी के मुखिया लोग । पंच । उ॰— साँचे परे पाँचों पान पाँच में परै प्रमान, तुलसी चातक आस राम श्याम घन की ।— तुलसी (शब्द॰) ।

यह भी देखिए[सम्पादन]