फल

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हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

फल पु॰

अनुवाद[सम्पादन]


प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

फल संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. वनस्पति में होनेवाला वह बीच अथवा पोषक द्रव्य या गूदे से परिपूर्ण बीजकोश जो किसी विशिष्ट ऋतु में फूलों के आने के बाद उत्पन्न होता है । विशेष— वैज्ञानिक दृष्टि से बीज (दाने, अनाज आदि) और बीजकोश (साधारण बोलचालवाले अर्थ में फल) में कोई अंतर नहीं माना जाता, परंतु व्यवहार में यह अंतर बहुत ही प्रत्यक्ष है । यद्यपि गेहूँ, चना, जौ, मटर, आम, कटहल, अंगूर, अनार, सेव, बादास, किशमिश आदि सभी वैज्ञानिक दृष्टि से फल हैं, पर व्यवहार में लोग गेहूँ, चने, जौ, मटर आदि की गिनती बीज या अनाज में और आम, कटहल, अनार, सेब आदि करी गिनती फलों में करते हैं । फल प्रायः मनुष्यों और पशुपक्षियों आदि के खाने के काम में आते हैं । इनके अनेक भेद भी होते हैं । कुछ में केवल एक ही बीज या गुठली रहती है, कुछ में अनेक । इसी प्रकार कुछ के ऊपर बहुत ही मुलायम और हलका आवरण या छिलका रहता है, कुछ के ऊपर बहुत कड़ा या काँटेदार रहता है ।

२. लाभ । उ॰— फल कारण सेवा करे निशदिन जाँचे राम । कहै कबीर सेवक नहीं चहै चौगुनो दाम ।—कबीर (शब्द॰) ।

३. प्रयत्न वा क्रिया का परिणाम । नतीजा । उ॰— (क) सुनहु सभासद सकल सुनिंदा । कही सुनी जिन संकर निंदा । सो फल तुरत लहब सब काहू । भली भाँति पछिताब पिताहू ।— तुलसी (शब्द॰) । (ख)तब हरि कह्यो कोऊ जनि डरियो अबहिं तुरत मैं जैहौं । बालक ध्रुव वन करत गहन तप ताहि तुरत फल दैहौं ।—सूर (शब्द॰) ।

४. धर्म या परलोक की दृष्टि से कर्म का परिणाम जो सुख और दुःख है । कर्मभोग । उ॰— (क) कोउ कह जो भल अहइ विधाता । सब कहँ सुनिय उचित फलदाता ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) सो फल मोहि विधाता दीन्हा । जो कछु उचित रहा सो कीन्हा ।—तुलसी (शब्द॰) ।

५. गुण । प्रभाव । उ॰— (क) नाम प्रभाव जानु सिव नीके । कालकूट फल दीन्ह अमी के ।— तुलसी (शब्द॰) । (ख) मज्जन फल पेखिय ततकाला । काक होंहि पिक बकउ मराला ।— तुलसी (शब्द॰) ।

६. शुभ कर्मों के परिणाम जो संख्या में चार माने जाते हैं और जिनके नाम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं । उ॰— (क) सेवत तोहि सुलभ फल चारी बरदायिनि त्रिपुरारि पियारी ।—तुलसी (शब्द॰) । (ख) आनंद महँ आनँद अबध आनँद बधावन होइ । उपमा कहौं चारि फल की, मोको भलो न कहैंगो कवि कोइ ।— तुलसी (शब्द॰) । (ग) होइ अटल जगदीश भजन में सेवा तासु चारि फल पावै । कहूँ वीर वहिं कमम चरण बिनु भृंगी ज्यों दसहूँ दिसि धावै ।—सूर (शब्द॰) ।

७. प्रतिफल । बदला । प्रतिकार । उ॰— एक बार जो मन देइ सेवा । सेवहि फल प्रसन्न होइ देवा ।—जायसी (शब्द॰) ।

८. बाण, भाले, छुरी, कटारी, तलवार आदि का वह तेज अगला भाग जो लोहे का बना होता है और जिससे आघात किया जाता है । जैसे, तीर की गाँसी, भाले की अनी, इत्यादि, सब फल कहलाती है ।

९. हल की फाल ।

१०. फलक ।

११. ढाल ।

१२. उद्देश्य की सिद्धि । उ॰— मति रामहिं सों गति रामहिं सो रति राम सों रामहिं को बलु है । सबकी न कहै तुलसी के मते इतनो जगजीवन को फलु है ।—तुलसी (शब्द॰) ।

१३. पासे पर की बिंदी या चिह्न ।

१४. न्याय शास्त्र के अनुसार वह अर्थ जो प्रवृत्ति और दोष से उत्पन्न होता है । इसे भी गौतम जी ने अपने प्रमेय के अंतर्गत लिया है ।

१५. गणित की किसी क्रिया का परिणाम । जैसे योगफल, गुणन- फल इत्यादि ।

१६. त्रैराशिक की तीसरी राशि वा निष्पत्ति में प्रथम निष्पत्ति का द्वितीय पद ।

१७. क्षेत्रफल ।

१८. फलित ज्योतिष में ग्रहों के योग का परिणाम जो सुख दुःख आदि के रूप में होता है ।

१९. मूल का ब्याज वा वृद्धि । सूद ।

२०. मूनाफा । लाभ (को॰) ।

२१. हानि । नुकसान । (को॰) ।

२२. आर्तव । रज (को॰) ।

२४. त्रिफला (को॰) ।

२५. प्रयोजन ।

२६. जायफल ।

२७. कंकोल ।

२८. कोरैया का पेड़ ।

यह भी देखिए[सम्पादन]