फूल

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हिन्दी[सम्पादन]

फूल

पु.

पुष्प

संज्ञा[सम्पादन]

अनुवाद[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

फूल ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰फुल्ल]

१. गर्भाधानवाले पौधों में वह ग्रंथि जिसमें फल उत्पन्न करने की शक्ति होती है और जिसे उदिभदों की जननेद्रिय कह सकते हैं । पुष्प । कुसुम । सुमन । विशेष— बड़े फूलों के पाँच भाग होते है । —कटोरी, हरा पुट, दल (पंखड़ी) गर्भकेसर ओर परागकेसर । नाल का वह चौड़ा छोर, जिसपर फूल का सारा ढाँचा रहता है, कटोरी कहलाता है । इसी के चारों ओर जो हरी पत्तियों सी हीती हैं उनके पुट के भीतर कली की दशा में फूल बंद रहता है । ये आवरणपत्र भिन्न भिन्न पौधों में भिन्न भिन्न आकार प्रकार के होते है । घुंड़ी के आकार का जो मध्य भाग होता है उसके चारों ओर रंग विरंग के दल निकले होते हैं जिन्हें पंख़डी कहते है । फूलों की शोभा बहुत कुछ इन्ही रँगीली पंखड़ियों के कारण होती है । पर यह ध्यान रखना चाहिए कि फूल में प्रधान वस्तु बीच की घुंड़ी ही है । जिसपर पराग- केसर और गर्भकेसर होते है । क्षुद कोटि के पोधों में पुट, पंखड़ी आदि कुछ भी नहीं होती, केवल खुली घुंड़ी होती है । वनस्पति शास्त्र की द्दष्टि से तो घुंड़ी ही वास्तव में फूल है और बाकी तो उसकी रक्षा या शोभा के लिये है । दोनों प्रकार के केसर पतले सूत्र के आकार के होते हैं । परागकेसर के सिरे पर एक छोटी टिकिया सी हीती है जिसमें पराग या घुल रहती है । यह परागकेसर पुं॰ जननेंद्रिय है । गर्भकेसर बिलकुल बीच में होते है जिनका निचला भाग या आधार कोश के आकार का होता है । जिसकै भीतर गर्भांड़ बंद रहते हैं और ऊपर का छोर या मुँह कुछ चौढ़ा सा होता है । जब परागकेसर का पराग झड़कर गर्भकेसर के इस मुँह पर पड़ता है तब भीतर ही भीतर गर्भ कोश में जाकर गर्भाड़ को गर्भित करता है, जिससे धीरे धीरे वह बीज के रूप में परिणत होता है और फल की उत्पत्ति होती है । गर्भाधान के विचार से पौधे कई प्रकार के होते है—एक तो वे जिनमें एक ही पेड़ में स्त्री॰फूल और पुं॰ फूल अलग अलग होते हैं । जैसे, कुम्हड़ा, कदुदु, तुरई ,ककड़ी इत्यादि । इनमें कुछ फुलों में केवल गर्भकेसर होते हैं और कुछ फूलों में केवल परागकेसर । ऐसे पौधों में गर्भकोश के बीच पराग या तो हवा से उड़कर पहुँचता है या कीड़ों द्बारा पहुँचाया जाता है । मक्के के पौधे में पु॰ फूल ऊपर टहनी के सिरे पर मंजरी के रूप में लगते है और जीरे कहलाते है और स्त्री॰ फूल पौधे के बीचोबीच इधर उधर लगते हैं और पुष्ट होकर बाल के रूप में होते हैं । ऐसे पौधे भी होती है जिनमें नर और मादा अलग अलग होते हैं । नर पौधे में पराग केसरवाली फूल लगते हैं और मादा पोधे में गर्भकेसरवाले । बहुत से पोधों में गर्भकेसर और परागकेसर एक ही फूल में होते हैं । किसी एक सामान्य जाति के अंतर्गत संकरजाति के पौधे भी उत्पन्न हो सकते हैं । जैसे किसी एक प्रकार के नीबु का पराग दुसरे प्रकार के नीबू के गर्भकोश में जा पड़े तो उससे एक दोगला नीबू उत्पन्न हो सकता है । पर ऐसा एक ही जाति कै पौधों के बीच हो सकता है । फूल अनैक आकार प्रकार के होते है । कुछ फूल बहुत सूक्ष्म होते हैं और गुच्छों में लगते हैं । जैसे, आम के नीम के तुलसी के । ऐसे फूलों को मंजरी कहते हैं । फुलों का उपयोग बहुत प्राचीन काल से सजावट और सुंगध के लिये होता आया है । अबतक संसार में बहुत सा सुगंध द्रब्य (तेल, इत्र आदि) फुलों ही से तैयार होता है । सुकुमारता, कोमलता और सौंदर्य के लिये फूल सब देश के कवियों में प्रसिदध रहा है । मुहा॰— फूला आना = फूल लगाना । फूल उतारना = फूल तोड़ना । फूल चुनना = फूल तोड़कर इकटठा करना । फूस झड़ना = मुँह से प्रिय ओर मधुर बातें निकलना । उ॰— झरत फूल मुँह ते वहि केरी । —जायसी (शब्द॰) । क्या फूल झड़ जायँगें ?= क्या ऐसा सुकुमार है कि अमुक काम करने के योग्य नहीं हैं ? फूल लोढ़ना = फूल चुनना । फुल सा = अत्य़ंत सुकुमार, हलका या सुंदर । फूल सूँधकर रहना = बहुत कम खाना । जैसे,— वह खाती नहीं तो क्या फूल सुँधकर रहती है ? (स्त्री॰ व्यंग्य में) । फूलों का गहना =(१)