लोहा

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हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

पू.

  1. एक प्रसिद्ध धातु

उदाहरण[सम्पादन]

  1. वर्तमान में कई वस्तुओं के निर्माण में लोहा उपयोगी होता है।
  2. लोहे को बाहर नमी वाले जगह में रखने पर जंग लग जाती है।

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

लोहा ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ लोह]

१. एक प्रसीद्ध धातु जो संसार के सभी भागों में अनेक धातुओं के साथ मिली हुई पाई जाती है । विशेष— इसका रग प्रायः काला होता है । वायु या जल के 'संसर्ग से इसमे मोचो लग जाता है । भारतवर्ष में इस धातु का ज्ञान वैदिक काल से चला आता है । वेदो में लोहे को साफ करने की विधि पाई जाती है और उसके बन कठिन और तीक्ष्ण हथियारों का उल्लेख मिलता है । लोहे का ज्ञान पहले पहले संसार में किसे, कव, कहाँ और किस प्रकार हुआ, इसका उल्लेख नहीं मिलता । वैद्यक शास्त्र के अनुसार लाहा पाँच प्रकार का होता है—काँची, पाडि, का, कालिग और वज्रक । इनमें काँची, पाड और कालिग क्रमशः दाक्षण की काचापुरी, पंडा और कलिंग देश के लाहे के लोहे क नाम है, जा वहाँ को खाना से निकलते थे । जान पड़ता है, ब्रज्रक उस लोहे का कहते थे, जो आकाश से उल्का के रुप में गिरता था, क्योंकि बहुत दिनों से संसार में यह बात चलो आता है कि बिजली से या उल्कापात में लोहा गिरना है । कति हर एक स्थान के शुद्द किए लोहे का कहते हैं । इन्हीं पाँच प्रकार के लोहों का प्रयोग वैद्यक में सर्वश्रेष्ठ मानकर लिखा गया है । यह बलप्रद, शोथ, शूल, अर्श कुष्ट, पांडु, प्रमेह मेद और वायु का नाशक, आँखों की ज्योति और आयु को बढ़ानेवाला, गुरू तथा सारक माना जाता है । कुछ लोगों का तो यह भी मत है कि लोहा सब रोगों का नाश कर सकता है; और मृत्यु तक की हटा देता है । वैद्यक में लोहे के भस्म का प्रयोग होता है । भारतवर्ष का लोहा प्राचीन काल में संसार भर में प्रख्यात था । यहाँ के लोगो को ऐसे उपाय मालूम थे जिनसे लोहे पर सेकड़ों वर्षों तक ऋतु का प्रभाव नहीं पड़ता था; और वर्षा तथा वायु के सहन से तथा मिट्टी में गड़े रहने से उसमें मोर्चा नहीं लगता था । दिल्ली का प्रसिद्ध स्तंभ इसका उदारहण हे, जिसे पंद्रह सौ वर्ष से अधिक बीत चुके हैं । उसपर अभी तक कहीं मोर्च का नाम तक नहीं है ।आज कल लोहे को जिस प्रणाली से साफ करते हैं, वह यह है,—खान से निकले हुए लोहे को पहले आग में डालकर जला देते हैं, जिससे पानी और गंधक आदि के अंश उसमे से निकल जाते हैं । फिर उस लोहे को कोयले या पत्थर के चूने के साथ मिलाकर बड़ी में डालकर गलाते हैं । इससे आक्सिजन का अंश, जो पहली बार जलाने से नही निकल सकता है, निकल जाता है । इतना साफ करने पर भी लोहे में पोत सैंकड़ा दो से पाँच अंश तक गंधक, कार्वन, सिलिका, फासफौ- रस, अलूमीनम आदि रह जाते हैँ । उन्हें अलग करने के लिये उसे फिर भट्टी तैयार करके लगाते हैं, और तब धन से पोटते हैं । पहले को देगचून और दूसरे को लोहा या कमाया हुआ लोहा कहते हैं ।इस कच्चे लोहे में भी सैकड़ा पीछे ॰ १५ से .॰५ तक कार्बन मिला रहता है ।उसी कार्बन का निकालना प्रधान काम है । इस्पात में सैकड़े पीछे .६ से .२ तक कार्बन होता है । उत्तम लोहा वही माना जाता है, जिसपर अम्ल या एसिड आदि का कुछ भी प्रभाव न पड़े । विशुद्ध लोहे का रंग चाँदी की तरह सफेद होता है और जिला करने पर वह चमकने लगता है । याद लोहे को घिसा जाय, तो उससे एक प्रकार की गंध सी निकलती है । पुराणो में लिखा है कि प्राचीन काल में जब देवताओं ने लामिल दत्य का वध किया, तब उसी के शरीर से लोहा उत्पन्न हुआ । तीक्ष्ण, मुड़ और कांत लोहों के पर्याय भी अलग अलग है । तीक्ष्ण के पर्याय शस्त्रा- यस, शास्त्र्य, पिंड, शठ, आयस, निशित, तीव्र, खग, चित्रायस, मुंडज । इत्यादि । मुंड के पर्याय—दृषत्सार, शिलात्मज, अश्मज, कृषिलौह इत्यादि । कुछ लागों का कथन है कि आदि में 'लोहा' ताँबे को कहते थे । कारण यह है कि 'लौह' शब्द का प्रधान या यौगिक अर्थ है— ला । पीछे इसका प्रयोग लोहे के लिये करने लगे । पर यह कथन कई कारणों से ठीक नहीं जान पडता । एक कारण यह है कि वेदों में लौह और अयस् शब्दों का प्रोयग प्रायः सब धातुओं के लिये मिलता है । दूसरे यह कि अब लोहे को आधुनिक विद्वान लाल रेग का कारण मानने लगे हैं । उनकी धारणा है कि रक्त में लोहे के अंश ही के कारण ललाई है, और मिट्टी में लोहे का अंश मिला रहने स ही मिट्टी । के वर्तन और ईंटें आदि पकाने पर लाल हो जाती है ।

लोहा ^२ वि॰ [वि॰ स्त्री॰ लोही]

१. लाल ।

२. वहुत अधिक कड़ा । कठोर ।