वाक्य

विक्षनरी से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हिन्दी[सम्पादन]

शब्द[सम्पादन]

जब एक से अधिक शब्द का उपयोग किया जाता है, तो उसे एक वाक्य कहते हैं। लेकिन इससे किसी तरह का अर्थ निकलना चाहिए। अन्यथा उसे केवल गलती/त्रुटि ही कहा जाएगा।

उदाहरण[सम्पादन]

  1. वाक्य कई प्रकार के होते हैं।
  2. सरल वाक्य में पूर्णविराम के अलावा कोई और चिन्ह उपयोग नहीं होता है।
  3. कोई वाक्य जिसमें प्रश्न पूछा जाता है, उसमें प्रश्नवाचक चिन्ह ("?") का उपयोग किया जाता है।
  4. यदि किसी में आश्चर्य का भाव उत्पन्न हो रहा हो, तो ऐसे वाक्य में उस शब्द में ! का उपयोग होता है।
  5. कोई दो वाक्य एक समान रूप से जोड़ने हेतु (",") चिन्ह का उपयोग करते हैं।
  6. यदि पहले वाक्य में संज्ञा है, तो दूसरे भाग में उसके स्थान पर सर्वनाम का उपयोग होता है।

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

वाक्य संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. वह पद समूह जिससे ओता को वक्ता के अभिप्राय का बोध हो । भाषा को भाषावैज्ञानिक आर्थिक इकाई का बोधक पद समूह । वाक्य में कम से कम कारक (कर्तृ आदि) जो संज्ञा या सर्वनाम होता है, और क्रिया का होना आवश्यक है । क्रियापद और कारक पद से युक्त साकांक्ष अर्थबोधक पद- समूह या पदोच्चय । उद्देश्यांश और विवेयांशवाले सार्थक पदों का समूह । विशेष—नैयायिकों और अलंकारियों के अनुसार बाक्य में (१) आकांक्षा, (२) योग्यता और (३) आसक्ति या सन्निधि होनी चाहिए । 'आकांक्षा' का अभिप्राय यह है कि शब्द यों ही रखे हुए न हों, वे मिलकर किसी एक तात्पर्प का बोध कराते हों । जैसे, कोई कहे—'मनुष्य चारपाई पुस्तक' तो यह वाक्य न होगा । जब वह कहेगा—'मनुष्य चारपाई पर पुस्तक पढ़ता है ।' तब वाक्य होगा । 'योग्यता' का तात्पर्य यह है कि पदों के समूह से निकला हुआ अर्थ असंगत या असंभव न हो । जैसे, कोई कहे—'पानी में हाथ जल गया' तो यह वाक्य न होगा । 'आसक्ति' या 'सन्निधि' का मतलब है सामीप्य या निकटता । अर्थात् तात्पर्यबोध करानेवाले पदों के बीच देश या काल का व्यवधान न हो । जैसे, कोई यह न कहकर कि 'कुत्ता मारा, पानी पिया' यह कहे—'कुत्ता पिया मारा पानी' तो इसमें आसक्ति न होने से वाक्य न बनेगा; क्योंकि 'कुता' और 'मारा' के बीच 'पिया' शब्द का व्यवधान पड़ता है । इसी प्रकार यदि काई 'पानी' सबेरे कहे और 'पिया' शाम को कहे, तो इसमें काल संबंधी व्यवधान होगा । काव्य भेद का विषय मुख्यतः न्याय दर्शन के विवेचन से प्रारंभ होता है और यह मीमांसा और न्यायदर्शनों के अंतर्गत आता है । दर्शन शास्त्रीय वाक्यों के ३ भेद-विधिवाक्य, अनुवाद वाक्य और अर्थवाद वाक्य किए गए हैं । इनमें अंतिम के चार भेद- स्तुति, निंदा, परकृति और पुराकल्प बताए गए हैं । वक्ता के अभिप्रेत अथवा वक्तव्य की अबाधकता वाक्य का मुख्य उद्देश्य माना गया है । इसी की पृष्ठ भूमि में सस्कृत वैयाकरणों ने वाक्यस्फोट की उद्भावना की है । वाक्यपदोयकार द्वारा स्फोटात्मक वाक्य की अखंड सत्ता स्वीकृत है । भाषाबैज्ञानिकों की द्दष्टि में वाक्य संश्लेषणात्मक और विश्लेषणा- त्मक होते हैं । शब्दाकृतिमूलक वाक्य के शब्दभेदानुसार चार भेद हैं—समासप्रधान, व्यासप्रधान, प्रत्ययप्रधान और विभक्तिप्रधान । इन्हीं के आधार पर भाषाओं का भी वर्गीकर ण विद्वानों ने किया है । आधुनिक व्याकरण की द्दष्टि से वाक्य के तीन भेद होते हैं—सरल वाक्य. मिश्रित वाक्य और संयुक्त वाक्य ।

२. कथन । उक्ति (को॰) ।

३. न्याय में युक्ति । उपपत्ति । हेतु

४. विधि । नियम । अनुशासन (को॰) ।

५. ज्योतिष में गणना की सौर प्रक्रिया (को॰) ।

६. प्रतिज्ञा । पूर्व पक्ष (को॰) ।

७. आदेश । प्रभुत्व । शासन (को॰) ।

८. विधिस्मंत साक्ष्य वा प्रमाण (को॰) ।

९. वाक्रप्रदत्त होना (को॰) ।

अन्य शब्द[सम्पादन]