सात

विक्षनरी से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

हिन्दी[सम्पादन]

विशेषण[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

संख्या

अनुवाद[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

सात ^१ वि॰ [सं॰ सप्त, प्रा॰ सत्त] पाँच और दो । छह से एक अधिक ।

सात ^२ संज्ञा पुं॰ पाँच और दो के योग की संख्या जो इस प्रकार लिखी जाती है—७ मुहा॰—सात की नाक कटना = परिवार भर की बदनामी होना । सात पाँच = चालाकी । मक्कारी । धूर्तता । जैसे,—वह बेचारा सात पाँच नहीं जानता; सीधा आदमी है । सात धार होकर निकलना = भोजन का बिना पचे पतली दस्त होकर निकलना । सात पाँच करना = (१) बहाना करना । (२) झगड़ा करना । उपद्रव करना । (३) चालबाजी करना । धूर्तता करना । सात परदे में रखना = (१) अच्छी तरह छिपा कर रखना । (२) बहुत सँभालकर रखना । सातवें आसमान पर चढ़ना = बहुत घमंडी बनना । अत्याधिक अभिमान दिखाना । उ॰—मिसेज रालिंसन तो जैसे सातवैं आसमान पर चढ़ गई ।—जिप्सी, पृ॰ १६९ । सात समुद्र पार = बहुत दूर । उ॰—सात समुद्र पार, सहस्रों कोस की दूरी पर बैठे ।—प्रेमघन॰, भा॰ २, पृ॰ ३७२ । सात सलाम पु = अनेकानेक प्रणाम । अत्यंत विनीतता । उ॰—पंथी एक सँदेसड़उ कहिज्यउ सात सलाम ।—ढोला॰, दू॰ १३६ । सातों भूल जाना = होश हवाश चला जाना । इंद्रियों का काम न करना (पाँच इंद्रियाँ, मन और बुद्धि ये सब मिलकर सात हुए) । सात रा्जाओं की साक्षी देना = बहुत दृढ़तापूर्वक कोई बात कहना । किसी बात की सत्यता पर बहुत जोर देना । उ॰—मनसि बचन अरु कर्मना कछु कहति नाहिन राखि । सूर प्रभु यह बोल हिरदय सात राजा साखि ।—सूर (शब्द॰) । सात सींकें बनाना = शिशु के जन्म के छठें दिन की एक रीति जिसमें सात सींके रखी जाती है । उ॰—साथिये बनाइकै देहि द्वारे सात सींक बनाय । नव किसोरी मुदित ह्नै ह्नै गहति यशुदाजी के पायँ ।—सूर (शब्द॰) ।

सात पु ^३ संज्ञा पुं॰ [सं॰ शान्त] साहित्य शास्त्र में वर्णित रसों में से ९ वाँ रस । विशेष—दे॰ 'शांत' । उ॰—बीभछ अरिन समूह, सात उप्पनौ मरन भय ।—पृ॰ रा॰, २५ ।५०१ ।

सात ^४ वि॰ [सं॰]

१. प्रदत्त । दिया हुआ ।

२. नष्ट । ध्वस्त [को॰] ।

सात ^५ संज्ञा पुं॰ [सं॰] आनंद । प्रसन्नता [को॰] ।

यह भी देखिए[सम्पादन]