अम्बर

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हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

  1. आकाश
  2. गगन
  3. नभ
  4. आसमान

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

अंबर ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰ अम्बर]

१. आकाश । आसमान । शून्य । उ॰— अंबर कुंजा कुरलियाँ गरजि भरे सब ताल ।-कबीर ग्रं॰, पृ॰ ७ । मुहा॰—अंबर के तारे डिगना = आकाश से तारे टूटना । असंभव बात का होना । उ॰—अंबर के तारे डिंगैं, जूआ लाड़ैं बैल । पानी में दीपक बलै, चलै तुम्हारी गैल (शब्द॰) । यौ॰—अंबरचर् = (१) पक्षी । (२) विद्याधर । अंबरचारी = ग्रह । अंबरद = कपास । अंबरपुष्प = आकाशकुसुम । अंबरशैल = ऊँचा पहाड़ । अंबारस्थली = पृथ्वी ।

२. बादल । मेघ (क्व॰) । उ॰—आषआढ़ में सोवौं परी सब ख्वाब देखौं कामिनी । अंबर नवै, बिजली खबै, दुख देत दोनों दामिनी— (शब्द॰) ।

३. वस्त्र । कपड़ा । पट । उ॰—नभ पर जाइ विभी— षत तबही । बरषि दिए मनि अंबर सबही ।—मानस, ७ ।११६ ।

४. स्त्रियों की पहनने की एक प्रकार की एकरंगी किनारेदार धेती । उ॰—करषत सभा द्रुपद तनया कौ अंबर अछय कियौ ।—सूर॰, १ ।१२१ ।

५. कपास ।

६. अभ्रक धातु । अबरक ।

७. राजपूताने का एक पुराना नगर (संभवतः जयपुर की राजधानी आमेर) ।

८. प्राचीन ग्रंथों के अनुसार उत्तरी भारत का एक देश ।

९. शून्य (को॰) ।

१०. गंध द्रव्य । कश्मीरी केशर । उ॰—पचीस छाव अंबरं, असीस मुक्कली भरं ।—पृ,॰ रा॰, ६६ ।५८ ।

११. परिधि । मंडल (को॰) ।

१२. पड़ोस । सामीप्य । पास का देश (को॰) ।

१३. ओष्ठ । ओठ (को॰) ।

१४. दोष । बुराई (को॰) ।

१५. हाथियों का नास करनेवाला (को॰) ।

अंबर ^२ संज्ञा पुं॰

१. एक सुगंधित वस्तु । विशेष—यह ह्वेल मछली की तथा कुथ और समुद्री मछलियों की अंतड़ियों में जमी हुई चीज है जो भारतवर्ष, अफ्रीका और ब्राजील के समुद्री किनारों पर बहती हुई पाईजाती है । ह्वेल का शइकार भी इसके लिये होता है । अंबर बहुत हल्का और शीघ्र जलनेवाला होता है तथा आँच दिखाते रहने से बिलकुल भाप होकर उड़ जाता है । इसका व्यवहार औषधियों में होने के कारण यह नीकोबार (कालापानी का एक द्धीप) तथा भारत समुद्र के और टापुओं से आता है । प्राचीन काल में अरब, युनानी और रोमन लोग इसे भारतवर्ष से ले जाते थे । जहाँगीर ने इससे राजसिंह सन का सुंगंधित किया जाना लिखा है । उ॰—जिनन पास अंबर है इस शहर बीच । खरीद करनहार है सब वही च—दक्खिनी॰, पृ॰

७९. ।

२. एक इत्र । उ॰—तेल फुलेल सुगंध उबटनो अंबर अतर लगावै रे ।— भक्ति॰, पृ॰ ३६० ।

अंबर ^३पु संज्ञा पुं॰ [सं॰ अमृत प्रा॰ अमरित, अमरिअ, अप॰ [अंबरि] अमृत । सुधा । —अनेकार्थ॰, पृ॰ ११४ ।

अंबर ^४पु संज्ञा पुं॰ [अ॰ अमारी, हिं॰ अंबारी] हाथी की पीठ पर का हौदा जिसपर छज्जेदार मंडप होता है । अंबारी । उ॰—चढ़ी चौडाल अंबरं । मनोकि मेघ घुम्मरं ।—रु॰ रा॰, ६६ ।५७ ।

संस्कृत[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

  1. आकाश

अन्य भाषा में[सम्पादन]

  • अंग्रेजी : sky
  • तेलुगु : ఆకాశము (आकाशमु)