ज्ञान

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हिन्दी

संज्ञा

  1. विद्या; किसी विषय की जानकारी

व्युत्पत्ति

संस्कृत से।

अनुवाद

प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

ज्ञान संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. वस्तुओं और विषयों की वह भावना जो मन या आत्मा को हो । बोध । जानकारी । प्रतीति । क्रि॰ प्र॰—होना । विशेष—न्याय आदि दर्शनों के अनुसार जब विषयों का इंद्रि- यों के साथ, इंद्रियों का मन के साथ और मन का आत्मा के साथ संबंध होता है तभी ज्ञान उत्पन्न होता है । मान लीजिए, कहीं पर एक घड़ा रखा है । इंद्रियों ने उस घड़े का साक्षात्कार किया, फिर उस साक्षात्कार की सूचना मन को दी । फिर मन ने आत्मा को सूचित किया और आत्मा ने निश्चित किया कि यह घड़ा है । ये सब व्यापार इतने शीघ्र होते हैं कि इनका अनुमान नहीं हो सकता । एक ही साथ दो विषयों का ज्ञान नहीं हो सकता । ज्ञान सदा अयुगपद् होता हैं । जैसे,—मन यदि एक ओर है और हमारी आँख किसी दूसरी ओर है तो इस दूसरी वस्तु का ज्ञान नहीं होगा । न्याय में जो प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द, ये चार प्रमाण माने गए हैं, उन्ही के द्वारा सब प्रकार का ज्ञान होता है । चक्षु, श्रवण आदि इंद्रियों द्वारा जो ज्ञान होता है वह प्रत्यक्ष कहलाता है । व्याप्य पदार्थ को देख व्यापक पदार्थ का जो ज्ञान होता है उसे अनुमान कहते हैं । कभी कभी एक वस्तु (व्याप्य) के होने से दूसरी वस्तु (व्यापक) का अभाव नहीं हो सकता, ऐसे अवसर पर अनुमान से काम लिया जाता है । जैसे, धुएँ कौ देखकर अग्नि का ज्ञान । अनुमान तीन प्रकार का होता है—पूर्ववत्, शेषवत् और सामान्यतो दृष्ट । कारण को देख कार्य के अनुमान को पूर्ववत् (कारणलिंगक) अनुमान कहते हैं । जैसे, बादलों का उभड़ना देख होनेवाली वृष्टि का ज्ञान । कार्य को देख कारण के अनुमान को शेषवत् (या कार्यलिंगक) अनुमान कहते हैं । जैसे, नदी का जल बढ़ता हुआ देख वृष्टि का ज्ञान । व्याप्य क्रो देख व्यापक के ज्ञान को सामान्यतोदृष्ट अनुमान कहते हैं । जैसे, धुएँ को देख अग्नि का ज्ञान, पूर्ण चंद्रमा को देख शुक्ल पक्ष का ज्ञान इत्यादि । प्रसिद्ध या ज्ञान वस्तु के साधार्य द्वारा जो दूसरी वस्तु का ज्ञान कराया जाता है, उसे उपमान कहते है । जैसे,—गाय ही ऐसी नीलगाय होती है । दूसरों के कथन या शब्द के द्वारा जो ज्ञान होता है उसे शब्द कहते हैं । जैसे गुरु का उपदेश आदि । सांख्य शास्त्र प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द ये तीन ही प्रमाण मानता है उपमान को, इनके अंतर्गत मानता है । ज्ञान दो प्रकार का होता है—प्रम ा अर्थात् यथार्थ ज्ञान और अप्रमा या अयथार्थ ज्ञान । वेदांत में ब्रह्म को ही ज्ञानस्वरूप माना है अतः उसके अनुसार प्रत्येक का ज्ञान पृथक् नहीं हो सकता । एक वस्तु से दूसरी वस्तु में या एक के ज्ञान से दूसरे के ज्ञान में जो विभिन्नता दिखाई देती है, वह विषय रूप उपाधि के कारण है । वास्तविक ज्ञान एक ही है जिसके अनुसार सब विभिन्न दिखाई पड़नेवाले पदार्थों के बीच में केवल एक चित् स्वरूप सत्ता या ब्रह्म का ही बोध होता है । पाशचात्य दर्शन में भी विषयों के साथ इंद्रियों के संयोग रूप ज्ञान को ही ज्ञान का मूल अथवा प्रथम रूप माना है । किसी एक वस्तु के ज्ञान के लिये भी यह भावना आवश्यक है कि वह कुछ वस्तुओं के समान और कुछ वस्तुओं से भिन्न है अर्थात् बिना साधर्म्य और वैधर्म्य की भावना के किसी प्रकार का ज्ञान होना असंभव है । इस साक्षात्करण रूप ज्ञान से आगे चलकर सिद्धांत रूप ज्ञान के लिये संयोग, सहकालत्व आदि की भावना भी आवश्यक है । जैसे,—'वह पेड़ नदी के किनारे है' इस बान का ज्ञान केवल पेड़' 'नदी' और किनारा का साक्षात्कार मात्र नहीं है बल्कि इन तीन पृथक् भावों का समाहार है । प्राणिविज्ञान के अनुसार खोपड़ी के भीतर जो मज्जा-तंतु- जाल (नाड़ियाँ) और कोश हैं, चेतन व्यापार उन्हीं की क्रिया से संबंध रखते हैं । इनमें क्रिया को ग्रहण करने और उत्पन्न करने दोनों की शक्ति है । इंद्रियों के साथ विषयों के संयोग द्वारा संचालन नाड़ियों के द्वारा भीतर की ओर जाता है और कोशों को प्रोत्साहित करके परमाणुओं में उत्तेजना उत्पन्न करता है । भूतवादियों के अनुसार इन्हीं नाड़ियों और कोशों की क्रिया का नाम चेतना है, पर अधिकांश लोग चेतना को एक स्वतंत्र शक्ति मानते हैं । क्रि॰ प्र॰—होना । मुहा॰—ज्ञान छाँटना=अपनी विद्या या जानकारी प्रकट करने के लिये लंबी चौड़ी बातें करना ।

२. यथार्थ ज्ञान । सम्यक् ज्ञान । तत्वज्ञान । आत्मज्ञान । प्रमा । केवलज्ञान । विशेष—मीमांसा को छोड़कर प्रायः सब दर्शनों ने ज्ञान से मोक्ष माना है । न्याय में ज्ञान द्वारा मिथ्या ज्ञान का नाश, मिथ्या ज्ञान के नाश से दोष का नाश, दोष न रहने पर प्रवृत्ति से निवृत्ति, प्रवृत्ति के नाश से जन्म से निवृत्ति और जन्म की निवृत्ति से दुःख का नाश, दुःख के नाश से मोक्ष माना जाता है । सांख्य ने पुरुष और प्रकृति के बीच विवेक ज्ञान प्राप्त होने से जब प्रकृति हठ जाती है तब मोक्ष का ज्ञान होना बतलाया है । वेदांत का मोक्ष ऊपर लिखा जा चुका है ।