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भार

विक्षनरी से

संज्ञा

  1. वजन, बोझ; कितनी भारी किसी वस्तु, व्यक्ति, आदि, है

अनुवाद

प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

भार ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. एक परिमाण जो बीस पसेरी का होता है ।

२. विष्णु ।

३. बोझ । क्रि॰ प्र॰—उठाना ।—ढोना ।—रखना ।—लादना ।

४. वह बोझ जिसे बहँगी के दोनों पल्लों पर रखकर कंधे पर उठाकर ले जाते हैं । उ॰— मीन पीन पाठीन पुराना । मरि भरि भार कहाँरन आना ।— तुलसी (शब्द॰) । क्रि॰ प्र॰—उठाना ।—काँधना ।—ढोना ।—भरना ।

५. सँभाल । रक्षा । उ॰— पर घर गोपन ते कहेउ कर भार जुरावहु । सूर नृपति के द्वार पर उठि प्रात चलावहु ।— सुर (शब्द॰) ।

६. किसी कर्तव्य के पालन का उत्तरदायित्व । जिम्मेदारी । मुहा॰—किसी का भार उठाना =किसी का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेना । भार उतारना =(१) कर्तव्य पूरा करना । (२) ज्यों त्यों किसी काम को पूरा करना । बला टालना । बेगार टालना । भर देना व डालना=बोझ रखना । बोझ डालना । उ॰— मंजुल मंजरी पै हो मनिंद विचारि के भार सम्हारि कै दीजिए ।—प्रताप (शब्द॰) ।

७. ढोल या नगाड़ा बजाने की एक पद्धति (को॰) ।

८. बहँगी जिसपर बोझ उठाते हैं (को॰) ।

९. कठिन काम (को॰) ।

१०. आश्रय । सहारा । बल । उ॰— दोहूँ खंभ ठेक सब मही । दुहुँ के भार सृष्टि सभ रही — जायसी (शब्द॰) ।

भार ^२ संज्ञा सं॰ [हिं॰ भाड़] दे॰ 'भाड़' ।