राजा

विक्षनरी से
Jump to navigation Jump to search

हिन्दी

व्यक्तिवाचक संज्ञा

किसी राज्य पर राज करने वाला राजा कहलाता है।

उदाहरण

  • इस राज्य के राजा ने अपने राज्य की अच्छी देखभाल की है।

अनुवाद

प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

राजा की कृपा से प्राप्त सहायता । सरकारी रिआयत ।

५. पृष्ठ भाग का रक्षक [को॰] ।

राजा कर पूत । —जायसी (शब्द॰) ।

२. साधुयों का एक भेद । उ॰—सेवरा खेवरा बान पर, सीध साधक अवध्त । आसन मारे बैठ सब जारि आतमा भूत ।—जायसी (शब्द॰) ।

राजा । (३) मुगलवंश का अंतिम प्रतापी नरेश । यह शाहजहाँ का तृतीय पुत्र था । इसका शासनकाल ईस्वी १३५९ से १७०७ तक था । ग्रंथों में औरंग, औरँग और नौरंग आदि इसके नाम प्राप्त होते हैं । औरगनशीन = सिंहासनारूढ़ ।

राजा संज्ञा पुं॰ [सं॰ राजन्] [स्त्री॰ राक्षी, हिं॰ रानी]

१. किसी देश, जाति या जत्ये का प्रधान शासक जो उस देश, जाति या जत्थे को नियम से चलाता, उनमें शांति रखता तथा उसकी और उसके स्वत्वों की, दूसरों के आक्रमण से, रक्षा करता है । बादशाह । आधिराज । प्रभु । विशेष— महाभारत से पता चलता है कि पहले मनुष्यों में न तो कोई शासक था और न दंडकर्ता । सब लोग धर्मपूर्वक मिल जुलकर रहते थे और आपस में एक दूसरे की रक्षा करते थे । इस प्रकार उन्हों न तो किसी शसन की आवश्यकता होती थी और न शासक की । पर यह सुव्यवस्था बहुत दिनों तक न रह सकी । लोगों के चित्त में विकार उत्पन्न हो गया, जिससे वे कर्तव्यपालन में शिथिल हो गए । उनमें सहानुभूति न रही और लोभ, मोह आदि कुवासनाओं ने उन्हें घेर लिया । सब लोग विषय वासना में ग्रस्त हो गए और वैदिक कर्मकांड का लोप हो गया । इससे स्वर्ग में देवता घबराए और दौड़े हुए ब्रह्मा जी पास पहुँचे । ब्रह्मा जी ने उन्हें आश्वासन दिया और मनुष्यों की शासव्यवस्था के लिये एक लाख अध्यायों का एक बृहद् ग्रंथ बनाया । देवता लोग उस ग्रंथ को लेकर विष्णु के पास पहुँचे और उनसे प्रार्थना की कि आप किसी ऐसे पुरुष को आज्ञा दीजिए, जो मनुष्यों को इस शास्त्रानुसार चलावे । विष्णु भगवान् ने उस सास्त्र के अनुसार शासन करने के लिये राजा की सृष्टि की । किसी किसी पुराण के अनुसार वैवस्वत मनु और किसी के अनुसार कर्दम- जी के पुत्र अंग मनुष्यों के पहले राजा हुए । पूर्व काल में मनुष्यों की इतनी अधिकता न थी और न उनकी इतनी घनी बस्तियाँ थीं । एक कुल में उतपन्न लोगों की संख्या बढ़ते बढ़ते बहुत से जत्थे बन गए थे, जो अपने कुल के सबसे श्रेष्ठ या वृद्ध के शासन में रहते थे । वह शासक प्रजापति कहलाता था और शेष लोग प्रजा अर्थात् पुत्र । वेदों में भरत, जमदग्नि, कुशिक आदि जातियों के नाम आए हैं, जिनके पृथक् पृथक् प्रजापति थे । इनमें से अनेक जातियाँ पंजाब आदि प्रांतों में बस गई और कृषि कर्म करने लगीं । पहले तो उनमें पृथक् पृथक् प्रजापति थे; पर धीर धीरे जनसंख्या बढ़ती गई और अनेक देश उनसे भर गए । ऐसे आर्यो को शालीन कहा है । फिर उनमें प्रजापतियों से काम न चला और भिन्न भिन्न देशों में शांति स्थापित करने और दूसरे दोशों के आक्रमण से अपनी रक्षा करने के लिये प्रजापति से अधिक शक्तिमान ् एक शासक की नियुक्ति की आवश्यकता पड़ी । पहले पहल यह प्रथा भरत जाति में चली थी; इसीलिये राजसूय यज्ञ में 'भोः भारताः अर्य वः सर्वेपां राजा' । कहकर राजा को राजसिंहासन पर बैठाया जाता था । पहले यह राजा प्रजाओं के द्वारा प्रतिष्ठित होता था; और प्रजा का अहित करने पर लोग उसे पदच्युत भी कर देते थे । वेणु आदि राजाओं का पदच्युत होना इसका उदाहरण है । जब उन शालीनों में वर्णव्यवस्था स्थापित हो गई, तब राजा का पद पैतृक हो गया और उसकी शक्ति सर्वोपरि मानी गई । मनु ने राजा को अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्र, यम, कुबेर, वरुण और महेंद्र या इद्र की मात्रा या अश से उत्पन्न लिखा है और उसे चार वर्णों का शासक कहा है । ज्यों ज्यों प्रजाओं की शक्ति धीमी पड़ने लगी, त्यों त्यों राजा का आधिकार सर्वोपरि होता गया और अंत में वह देश या राज्य का एकाधिपति स्वामी हो गया । दूसरे वर्ग के आर्यों में, जो इधर उधर जत्थे या गण बाँधकर चलते फिरते रहते थे और जिन्हें व्रात्य या यायावर कहते थे, प्रजापति की प्रथा बनी रही और यही प्रजापति गणनाथ बन गया । ऐसी आर्यों में न तो वर्ण की ही व्यवस्था थी और न उनमें राजा का एकाधिपत्य ही हुआ । उनमें प्रजापति राजा तो कहलाने लगा, पर वह सारा काम गण की संमति से करता था । ऐसे व्रात्य आर्य कोशल, मिथिला, और विहार आदि प्रांतों से आकर बसे थे और उपनिषद् या ब्रह्मविद्या के अभ्यासी थे । मिथिला के राजा जनक इन्हीं यायवर आर्यों में थे और वहाँ के व्याध भी ब्रह्मज्ञान के उपदेष्टा थे । इनसे लिच्छवि लोगों में गण की प्रथा महात्मा बुद्धदेव के काल तक प्रचलित थी, इसका पता त्रिपिटक से चलता है । पर्या॰—नृपति । पार्थिव । भूप । महीक्षित् । भूभृत । पार्थ । नाभि । नाराज । महींद्र । नरेंद्र । दंडधर । स्कंध । भूभुज् । प्रभु अर्थपति । विशेष— बहुत से शब्दों के साथ समस्त होकर यह शब्द आकार की बड़ाई या श्रेष्ठता सूचित करता है । जैसे,— राजदंत, राजमाष, राजशुक, राजशालि, इत्यादि ।

२. अधिपति । स्वामी । मालिक ।

३. एक उपाधि जिसे अँग्रेजी सरकार बड़े रईसों, जमींदारों या अपने कृपापात्रों को प्रदान करती थी । जैसे,—राजा राममोहन राय, राजा शिवप्रसाद ।

४. धनवान् वा समृद्धिशाली पुरुष ।

४. प्रेमपात्र । प्रिय व्यक्ति । (बाजारू) ।