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वर्ष

विक्षनरी से

संज्ञा

पु.

(साल)

अनुवाद

प्रकाशितकोशों से अर्थ

शब्दसागर

वर्ष संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. वृष्टि । जलवर्षण ।

२. काल का एक मान जिसमें दो अयन और बारह महीने होती हैं । उतना समय जितने में सब ऋतुओं की एक आवृत्ति हो जाती है । संवत्सर । साल । विशेष—वर्ष चार प्रकार के होते हैं—सौर, चांद्र सावन और नाक्षत्र । सौर वर्ष ३६५ दिन, ५ घंटे, ४८ मिनट और ४६ सेकंड का होता है । यह उतना समय है, जितने में पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर लेती है । पृथ्वी के इसी भ्रमण के कारण सूर्य का सत्ताईस नक्षत्रों और बारह राशियों में गमन दिखाई पड़ता है । लोग कहते हैं कि अब सूर्य अमुक नक्षत्र या राशि में है । घूमते समय पृथ्वी की धुरी सीघी न रहकर कुछ टेढ़ी रहती है और उसके मार्ग की कक्षा गोल न होकर अंडाकार होती है । इसी से सूर्य कुछ महीनों तक भूमध्यरेखा के उत्तर और कुछ महीनों तक दक्षिण में उदय होता दिखाई पड़ता है । ये दोनों 'उत्तर अयन' और 'दक्षिण अयन' कहलाते हैं । वर्ष में केवल दो दिन सूर्य भूमध्य या विषुवत् रेखा पर उदय होता हैं । इन दोनों को सायन कद्दते । एक सायन तुला राशि में और दूसरा मेष में होता है । सूर्य कर्क राशि में आकार दक्षिण की ओर बढ़ने लगता है और धनु राशि में पहुँचने तक भूमध्यरेखा के दक्षिण ही रहता है । मकर राशि से फिर उत्तर की ओर बढ़ने लगता है और कर्क राशि में पहुँचने तक उत्तर ही रहता है । प्राचीन भारतीय आर्यों में राशियों का व्यवहार न था; इससे सौर वर्ष दो अयनों का ही माना जाता था । ग्रहों का उदय राशियों में न माना जाकर २७ नक्षत्रों में माना जाता था । इससे कभी कभी बड़ी अव्यवस्था होती थी । चांद्र वर्ष ३५४ दिन, ८ घंटे, ४८ मिनट और ३६ सेकंड का होता है । इतने काल में चंद्रमा पृथ्वी की बारह परिक्रमाएँ कर लेता है । इस प्रकार सौर वर्ष और चांद्र वर्ष में प्रति वर्ष १० दिन, २१ घंटे का अंतर पड़ता है । हिंदू पंचांग में यह अंतर प्रति तीसरे वर्ष, १३ महीने का वर्ष मानकर दूर किया जाता है । उस बढ़े हुए महीने को 'अधिमास' या 'मलमास' कहते हैं । सावन वर्ष पूरे ३६० दिनों का होना है और उसके महीने तीस तीस दिन के होते हैं । वैदिक काल में सावन मास ही अधिक चलता था और प्रत्येक मास की तिथि की गणना चंद्रमा के ही हिसाब से होती थी । शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक १५ दिन का शुक्ल पक्ष होता था । नाक्षत्र वर्ष ३२४ दिन का और उसका प्रत्येक महीना २७-२७ दिन का होता है । इन चार प्रकार के वर्षों के अतिरिक्त प्राचीन काल में और कई प्रकार के वर्षों का प्रचार था । जैसे,— सप्तर्षि वर्ष ।

३. पुराण में माने हुए सात द्वीपों का एक विभाग ।

४. किसी द्वीप का प्रधान भाग, जैसे,—भारतवर्ष ।

५. मेघ । बादल ।

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