और

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हिन्दी[सम्पादन]

समुच्चयबोधक[सम्पादन]

  1. दो शब्दों या वाक्यों को जोड़नेवाला शब्द

उदाहरण[सम्पादन]

  • चार बच्चे और तीन बच्चियाँ
  • यह और वह

अनुवाद[सम्पादन]

यह भी देखिए[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

और ^१ अव्य॰ [सं॰ अपर, प्रा॰ अवर] एक संयोजक शब्द । दो शब्दों या वाक्यों को जोड़नेवाला शब्द । जैसे, —(क) घोड़े और गधे चर रहे हैं । (ख) हमने उनको पुस्तक दे दी और घर का रास्ता दिखला । दिया ।

और ^२ वि॰

१. दूसरा । अन्य । भिन्न । जैसे, —यह पुस्तक किसी और मनुष्य को मत देना । मुहा॰—और और = अन्यान्य । विभिन्न । दूसरे प्रकार के । उ॰— अनेक भावों के और और आलंबन खड़े होते रहते हैं ।— रस॰, पृ॰१३६ । और का और = (१) कुछ का कुछ । विप- रीत । अंड़बंड । जैसे, —वह सदा और का और समझता है । और का और होना = भारी उलट फेर होना । विशेष परिवर्तन होना । उ॰—द्विज पतिया दे कहियो श्यामहिं । अब ही और की और होत कछु लागै बारा । ताते मैं पाती लिखी तुम प्रान अधारा—सूर (शब्द॰) । और क्या = (१) हाँ । ऐसा ही है । जैसे,—(क) प्रश्न—क्या तुम अभी आओगे ? उत्तर—और क्या ? (ख) क्या इसका यही अर्थ है ? उत्तर—और क्या ? विशेष—ऐसे प्रश्नों के उत्तर में इसका प्रयोग नहीं होता जिनके अंत में निषेधार्थक शब्द 'नहीं' या 'न' इत्यादि भी लगे हों, जैसे, —तुम वहाँ जाओगे या वहीं? (२) आश्चर्यसूचक शब्द । (३) उत्साहवर्धक वाक्य । और तो और = (१) और बातों को जाने दो । और सब तो छोड़ दो । जैसे, —और तो और पहले आप इसी की करके देखिए । (२) दे॰ 'और तो क्या' । (३) दूसंरों का ऐसा करना तो उतने आश्चर्य की बात नहीं । दूसरों से या दूसरों के विषय में ऐसी संभावना हो भी । जैसे, —(क) और तौ और, स्वयं सभापति जी नहीं आए । (ख) और तो और यह छोकड़ा भी हमारे सामने बातें करता है । और ही कुछ होना = सबसे निराला होना । विलक्षण होना । उ॰—वह चितवनि औरै कछू जिहि बस होत सुजान ।—बिहारी (शब्द॰) । और तो क्या = 'और बातें तो दूर रहीं' । और बातों का तो जिक्र ही क्या । उचित तो बहुत कुछ था । जैसे, —और तौ क्या, उन्होंने पान तंबाकू के लिये भी न पूछा । औरलो; और सुनो = यह वाक्य किसी तीसरे से उस समय कहा जाता है जब कोई व्यक्ति एक के उपरांत दूसरी और अधिक अनहोनी बात कहता है या कहनेवाले पर दोषारोपण करता है । और सौ और पु = दे॰ ओर का और' । उ॰—अधर मधुर मधु सहित मुख हुतो सबन सिर मौर । सो अब बगरे फलन ज्यौं भयौ और सौं और ।—ब्रज॰ ग्रं॰, पृ॰ ९३ ।

२. अधिक । ज्यादा । विशेष । जैसे,—अभी और कागज लाओ, इतने से काम न चलेगा ।