खाना

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हिन्दी[सम्पादन]

संज्ञा[सम्पादन]

खाना पु॰

  1. भोजन

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क्रिया[सम्पादन]

खाना

  1. भोजन करना

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प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

खाना ^१ क्रि॰ स॰ [सं॰ खादन, पा॰ खाअन, खान] [प्रे॰ रूप खिलाना]

१. आहार को मुँह में चबाकर निगलना । भोजन करना । भक्षण करना । पेट में डालना । विशेष—इसका प्रयोग घन पदार्थों के लिये होता है, द्रव के लिये नहीं, यद्यपि किसी के मुँह से ( अधिकतर बँगला में ) 'जल खाना' आदि सुना जाता है । संयो॰ क्रि॰—जाना ।—डालना ।—लेना । यो॰—खाना कमाना । खाना पीना । खाना उड़ाना । मुहा॰—जिसका खाना, उससे गुर्राना = जिसका अन्न खाना, उसी को आँख दिखाना । उपकार न मानना । खाता कमाता आदमी = खाने पीने भर को कमानेवाला आदमी । वह मनुष्य जिसके पास धन संचित न हो । खाना कमाना = काम धंधा करके जीविका निर्वाह करना । मेहनत मजदुरी करके गुजर करना । खाने के दाँत और दिखाने के और = बाहार कुछ, अंदर कुछ । करना कुछ और, प्रकगठ करना कुछ और । खा पका जाना या डालना = खर्च कर डालना । उड़ा डालना । खानापीना = (१) भोजन पान करना । (२) सुख से दिन बिताना । जैसे,—लड़के बाले भूखों मरते हैं और आप खाता पीता है । खानापीना लहूकरना—क्रुद्ध या खिन्न करके खाने पीने को निरानंद कर देना । क्रोध या खेद उत्पन्न करना । खाने पीने से अच्छा या खुश-सुखसे जीवन निर्वाह करनेवाला । खाओ वहाँ, तो पानी पिया यहाँ-खाने के बाद पानी पीने के लिये भी वहाँ न ठहरो; तुरंत यहाँ चले आओ । आने में क्षण भर की भी देर न करो । खाओ वहाँ, तो हाथ धोओ यहाँ = तुरंत चले आओ । खाना न पचाना-वैन न पड़ना । जी न मानना । जैसे,—जबतक वह इधर गप नहीं मारता, तबतक उसका खाना नहीं पचता । विशेष—'खाना' क्रिया का प्रयोग कभी कभी अकर्मक के समान भी होता है । जैसे—वह खाने गया है ।

२. हिंसक जंतुओं का शिकार पकड़ना और भक्षण करना । जैसे—उसे शेर खा गया । मुहा॰—खा जाना—मार डालना । जैसे-वह ऐसा ताकत है मानो खा जायगा । कच्चा खा जाना—मार डालना । प्राण ले लेना । जैसे—जी चाहता है, उसे कच्चा खा जाऊँ । खाने दौडना—चिड़चिड़ाना । क्रुद्ध होना । जैसे—जब उसके पास रुपया माँगने जाते हैं, तब वह खाने दौड़ता है । विशेष—विषैल कीड़ों के काटने के अर्थ में केवल 'काला' (साँप) के साथ इस क्रिया का प्रयोग होता है । जैसे—तुझे काला खाया । उ॰—)क) आजुहि मेरे घर केलन आई । जात कहूँ कारे तेहि खाई—सूर (शब्द॰) (ख) ताकी माता खाई कारे । सो मर गई शाप के मारे ।—सूर (शब्द॰) । पर अलंकृत या मुहावरेदार भाषा में अत्युक्ति का भाव लेकर इस क्रिया से खटमल, मच्छड़ आदि का बहुत काटना भी व्यक्त किया जाता है । जैसे—(क) आज रात खटमलों ने खा डाला । (ख) यहाँ तो मच्छर खाए डालते हैं ।

३. किसी इंद्रिय या अंग को उसके अरुचिकर विषय उपस्थित करके पीड़ित करना । तंग करना । दिक करना । कष्ट देना । जैसे—(क) तुम तो हमारे कान खा गए । (कडे़ शब्द से ) । (ख) क्यों सिर या जान खाते हो ।

४. (कीडों का) किसी वस्तु को कुतरना या काटना । जैसे,—किताब को कीडे़ खा गए । लकड़ी को दीमक खा गए । छुरी को मुर्चा खा गया ।

५. मुँह में रखकर रस आदि चुसना । चबाना । जैसे—पान खाना, तंबाकू खाना ।

६. नष्ट करना । बरबाद कतरना । सत्या- नाश करना । जैसे—(क)तुम्हारी चालाकी तुम्हें खा गई । (ख) क्रोध मनुष्य को खा जाता है । (ग) विदेशी माल देसी कारीगरी को खा गया ।

६. उड़ा देना । दूर कर देना । न रहने देना । जैसे,—चूना दीवार के रंग को खा गया । हजम करना । मार लेना । हड़प जाना । जैसे—वे कोंठी का बहुत रुपया खा गए ।

९. खर्च करना । उडाना । जैसे,— तनखाह में से कुछ बचाते भी हो कि सब खा डालते हो ?

१०. बाईमानी से रुपया पैदा करना । रिश्वत आदि लेना । जैसे,—अमल और नौकर चाकर सब जगह खाते पीते हैं ।

११. खर्च करवाना । रुपया लगाना । जैसे,—यह मकान उनकी सारी कमाई खा गया ।

१२. अमाना । समाना ।

खाना ^२ संज्ञा पुं॰ [फा॰ खानह्]

१. आलय । घर । मकान । जैसे, डाक खाना, दवाखाना, कुडाखाना आदि ।

२. किसी चीज के रखने का घर । केस । जैसे—चश्में का खाना, घड़ी का खाना आदि ।

३. आलमारी, मेज या संदूक आदि में चीजें रखने के लिये पटरियों या तख्तों के द्वारा किया हुआ विभाग ।

४. सारणी या चक्र का विभाग । कोष्ठक । क्रि॰ प्र॰—बनाना ।—पूरना ।—भरना ।

५. संदूक । पेटी ।—(लश॰) ।