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हिन्दी वर्णमाला का सातवाँ अक्षर

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प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ए संस्कृत वर्णमाला का ग्यारहवाँ और देवनागरी वर्ममाला का आठवाँ स्वर वर्ण । शिक्षा में यह संध्यक्षर माना गया है और इसका उच्चारण कंठ और तालु से होता है । यह अ और इ के योग से बना है, इसीलिये यह कंठतालव्य है । संस्कृत में मात्रानुसार इसके केवल दीर्घ और प्लुत दो ही भेद होते है; पर हींदी में इसका ह्यस्व या एकमात्रिक उच्चारण भी सुना जाता है । जैसे,—एहि विधि राम सबहिं समुझावा ।—तुलसी । भाषा वैज्ञानिक इसे स्पष्ट करने के लिये इनके ऊपर एक टेढ़ी 'ए' की मात्रा 'लगाते हैं । पर इसके लिये कोई और संकेत नहीं माना गया है । मौके के अनुसार ह्यस्व पढ़ा जाता है । प्रत्येक के सानुनासिक और निरनुनासिक दो भेद होते हैं ।

ए ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰] विष्णु ।

ए ^२ अव्य॰[हिं॰] एक अव्यय जिसे संबोधन या बुलाने के लिये प्रयोग करते हैं । उ॰—ए! बिधिना जो हमैं हँसतीं अब नेक कहीं उतको पग धारैं । —रसखान (शब्द॰) ।

ए ^३ पु सर्व॰ [सं॰ एष, > प्रा॰ एह] यह । उ॰—दुरैं न निधरघटयौ दियै ए रावरी कुचाल । विषु सी लागाति है बुरी, हँसी खइसी की लाल । —बिहारी र॰, दो॰ ४८२ ।