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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ठ व्यंजनों में बारहवाँ व्यंजन जिसके उच्चारण का स्थान भारत के प्राचीन वैयाकरणों ने मूर्धा कहा है । इसका उच्चारण करने में बहुधा जीभ का अग्रभाग और कभी मध्य भाग तालु के किसी हिस्से में लगाना पड़ता है । यह अघोष महाप्राण वर्ण है ।

ठ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. शिव ।

२. महाध्वनि ।

३. चंद्रमंडल या सूर्य— मंडल ।

४. मंडल । घेरा ।

५. शून्य ।

६. गोचर । इंद्रियग्राह्य वस्तु ।