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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

ज हिंदी वरणमाला में चवर्ग के अंतर्गत एक व्यंजन वर्ण । यह स्पर्श वर्ण है और चवर्ग का तीसरा अक्षर है । इसका बाह्म प्रयत्न संवार और नाद घोष है । यह अल्पप्राण माना जाता है । 'झ' इस वर्ण का महाप्राण है । 'च' के समान ही इसका उच्चारण तालु से होता है ।

ज ^१ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. मृत्युंजय ।

२. जन्म ।

३. पिता ।

४. विष्णु ।

५. विष ।

६. भुक्ति ।

७. तेज ।

८. पिशाच ।

९. वंन ।

१. छंदशास्त्रानुसार एक गण जो तीन अक्षरों का होता है । /?/वनण । विशेष—इसके आदि और अंत के वर्ण लघु और मध्य का वर्ण गुरु होता है । (/?/) । जैसे, महेश, रमेश, सुरेश आदि । इस का देवता साँप और फल रोग माना गया है ।

ज ^२ वि॰

१. वेगवान । वेगित । तेज ।

२. जीतनैवाला । जेता ।

ज ^३ प्रत्य॰ उत्पन्न । जात । जैसे,—देशज, पित्तज, वातज, आदि । विशेष—वह प्रत्यय मायः तत्पुरुष समास के पदों के अंत में आता है । पंचमी तत्पुरुष आदि में पंचम्यंत पदों की विभक्ति लुप्त हो जाती है, जँसे, पादज, द्विज इत्यादि । पर सप्तमी तत्पुरुष में '/?/ 'शरत्', 'काल' और /?/ इन चार शब्दों के अतिरिक्त , जहाँ विभक्ति बनी रहती है (जैसे, प्रावृषिज, शरदिज, कालेज, दिविज) शेष स्थलों में विभक्ति का लोप विवक्षित होता है, जैसे, मनसिज, मनोज, सरसिज, सरोज इत्यादि ।

ज पु ^४ अव्य॰ पादपूर्ति के लिये प्रयुक्त । उ॰—चंद्र सूर्य का गम नहीं जहाँ ज दर्शन पावै दास ।—रामानंद॰ पृ॰ १० ।