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हिन्दी[सम्पादन]

प्रकाशितकोशों से अर्थ[सम्पादन]

शब्दसागर[सम्पादन]

द संस्कृत या हिंदी वर्णमाला में अठारहवाँ व्यंजन जो तवर्ग का तीसरा वर्ण है । इसका उच्चारण स्थान दंतमूल है; दंतमूल में जिह्वा के अगले भाग के स्पर्श से इसका उच्चारण होता है । यह अल्पप्राण है और इसमें संवार, नाद और घोष नामक बाह्य प्रयत्न हैं ।

द ^१ वि॰ [सं॰]

१. उत्पन्न करनेवाला ।

२. देनेवाला । दाता । विशेष—इस अर्थ में इसका व्यवहार स्वतंत्र रूप से नहीं होता ; बल्कि किसी शब्द के अंत में जोड़ने से होता है । जैसे, सुखद (सुख देनेवाला), जलद (जल देनेवाला, बादल) आदि ।

द ^२ संज्ञा पुं॰ [सं॰]

१. पर्वत । पहाड़ ।

२. दान ।

३. दाता ।

द ^३ संज्ञा स्त्री॰

१. भार्या । कलत्र । स्त्री ।

२. रक्षा ।

३. खंडन ।