विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/आ

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हिंदी वर्णमाला का दूसरा अक्षर जो 'अ' का दीर्घ रूप है ।

आँकिक
सज्ञा पुं० [सं० आङ्किक] संख्याता । गणक । गणना करनेवाला ।

आंकुशिक
सज्ञा पुं० [सं० आ़ङ्कुशिक] अंकुश से आघात करनेवाला [को०] ।

आंक्षी
सज्ञा स्त्री० [सं० आङ्क्षी] एक प्रकार का वाद्य [को०] ।

आंग (१)
वि० [सं० आङ्ग] [वि० स्त्री० आंगी] १. अंग या शरीरसंबंधी । २. शब्द के आधार या अंग से संबंध रखनेवाला (व्या०) । ३. अंग या अवयवयुक्त या उससे संबंध रखनेवाला । ४. गौणा या निम्न पात्रों से संबंध रखनेवाला (नाटय०) । ५. वेदों के अंग से संबंध रखनेवाला । ३. अंग देश में पैदा किया हुआ या उत्पन्न [को०] ।

आंग (२)
सज्ञा पुं० १. अंग देश का राजकुमार । २. सुकुमार शरीर । पु ३. अंग । शरीर ।

आंगक (१)
वि० [सं० आङ्गक] [वि० आंगकी] अंग देश में उत्पन्न [को०]

आंगक (२)
सज्ञा पुं० १ अंग देश का निवासी व्यक्ति । २. अंग देश का शासक [को०] ।

आंगदी
सज्ञा स्त्री० [सं०आङ्गदी] राजा अंगद की राजधानी [को०] ।

आंगविद्य
वि० [सं० आङ्गविद्य] १. अंगविद्या संबंधी । २. अंगविद्या । का जानकार या ज्ञानी [को०] ।

आंगार
सज्ञा पुं० [सं० आङ्गर] कोयले का ढेर या समूह [को०] ।

आंगारिक
वि० [सं० आङ्गरिक] कोयला सुलगाने या जलानेवाला [को०] ।

आंगिक (१)
वि० [सं० आङ्गिक] [स्त्री० आंगिकी] १. अंगसंबंधी । अंग का । २. अंग की चेष्टा द्वारा व्यक्त या प्रकट किया हुआ, जैसे आंगिक अभिनय (नाटय०) ।

आंगिक (२)
सज्ञा पुं० १. चित्त के भाव को प्रकट करनेवाली चेष्टा, जैसे भ्रूविक्षेप, हाव आदि । २. रस में कायिक अनुभाव । ३. नाटक में अभिनय के चार भेदों में से एक । विशेष—चार भेद ये है—(क) आंगिक=शरीर की चेष्टा बनाना, हाथ, पैर हिलाना आदि । (ख) वाचिक=बातचीत आदि की नकल । (ग) आहार्य=वेशभूषा आदि बनाना । (घ) सात्विक=स्वरभंग, कंप, वैवर्ण्य आदि की नकल । यौ०—आंगिकाभिनय । ४. मृदंग या ढोल का वादक [को०] । ५. बाँहदार या बँहोलीदार पुरुषों का परिधान जो घुटनों के नीचे तक पहुँचता था अंगा [को०] ।

आंगिरस (१)
सज्ञा पुं० [सं० आङ्गिररस] [वि० स्त्री० आंगिरती] १. अंगिरा के पुत्र बृहस्पति, उतथ्य और संवर्त । २. अंगिरा के गोत्र का पुरुष । ३. अथर्ववेद की चार ऋचाओं का सूक्त जिसके द्रष्टा । अंगिरा थे ।

आंगिरस (२)
वि० [सं० आङ्गिरस] १. अंगिरासंबंधी । अंगिरा का । २. अंगिरा से उत्पन्न [को०] ।

आंगिरस सत्र
सज्ञा पुं० [सं० आङ्गिरस+सत्र] यज्ञाविशेष । बृहस्पति- सत्र [को०]

आंगूष
सज्ञा पुं० [सं० आङ्गूष] स्तुति । ऋचा । स्तोत्र [को०] ।

आंग्ल
वि० [अं० ऐंग्लो] अँगरेजों से संबंधित । अँगरेजी ।

आंचन
सज्ञा पुं० [सं० आञ्चन] काँटा, बाण या इसी प्रकार की कोई नुकीली चीज शरीर से बाहर निकालना । [को०] ।

आंचलिक
वि० [सं०अञ्चल] अंचल या स्थानविशेष का ।

आँचलिकता
सज्ञा स्त्री० [सं० आञ्वलिक + ता (प्रत्य०)] क्षेत्र विशेष से संबंध रखनेवाली स्थिति ।

आंछन
सज्ञा पुं० [सं० आञ्छन] टूटी हुई हड्डी बैठाना । उतरा हुआ पैर या जोड़ ठीक करना [को०] ।

आंजन (१)
वि० [सं० आञ्जम] १. अंजनसंबंधी या अंजनयुक्त । २. स्थूल । मोटा [को०] ।

आंजन (२)
सज्ञा पुं० १. आँख का अंजन । २. अंजना के पुत्र हनुमान् । मारुति ।

आंजनिक्य
सज्ञा पुं० [सं० आञ्जनिक्य] आँख का अंजन बनाने में काम आनेवाली चीज [को०] ।

आंजनी
सज्ञा स्त्री० [सं०आञ्जनी] १. आँख का अंजन । २. अंजन की डिबिया [को०] ।

आंजनीकारी
सज्ञा स्त्री० [सं०आञ्जनीकारी] अंजन तैयारी करनेवाली या लगनेवाली स्त्री [को०] ।

आंजनेय
सज्ञा पुं० [सं० आञ्जनेय] अंजना के पुत्र हनुमान् । उ०— आंजनेय को अधिक कृती उन कार्तिकेय से भी लेखो ।— साकेत, पृ० ३८२ ।

आंजलिक
सज्ञा पुं० [सं० आञ्जलिक] एक प्रकार का अर्धचंद्राकार बाण [को०] ।

आंजलिक्य
सज्ञा पुं० [सं० आञ्जलिक्य] नम्रता से अंजलि या हाथ जोड़ना [को०] ।

आंजल्यक
सज्ञा पुं० [सं० आञ्जल्यक] करबद्ध होना । हाथ जोड़ना [को०] ।

आंजस
वि० [सं० आञ्जस] [वि० स्त्री० आंजसी] सद्यस्क । तात्का- लिक । क्रमिक [को०] ।

आंजिनेय
सज्ञा पुं० [सं० आञ्जिनेय] १. एक प्रकार की छिपकली [को०] ।

आंड (१)
वि० [सं० आण्ड] अंडे से उत्पन्न [को०] ।

आंड (२)
सज्ञा पुं० १. ब्रह्मा । हिरण्यगर्भ । २. अंडों का ढेर है । ३. अंडकोश [को०] ।

आंडज (१)
वि० [सं० आण्डज] अंडे से अत्पन्न [को०] ।

आंड़ज (२)
सज्ञा पुं० १. पक्षी । २. पक्षी का शरीर । ३. सर्प [को०] ।

आंडिक, आंडीक
वि० [सं० आण्डिक, आण्डीकडक] अंड्युक्त [को०] ।

आंडी
सज्ञा स्त्री० [सं० आण्डी] अंडकोष [को०] ।

आंडीर
वि० [सं० आण्डीर] १. बहुत अंडोंवाल । २. लवान । प्रौढ़ (जैसे, बैल) [को०] ।

आंत
वि० [सं० आन्त] [वि० स्त्री० आंती] अंतिम [को०] ।

आंतर (१)
वि० [सं० आन्तर] छिपा हुआ । भीतरी । गुप्त । उ०— इसके बाह्म और आंतर सौंदर्य के भेद करना मेरे विचार से असंगत है ।—जय० प्र०, पृ० ३८ ।

आंतर (२)
संज्ञा पुं० १. भीतरी स्वभाव । अंतःप्रकृति । २. जिगरी दोस्त । ३. हृदय [को०] ।

आंतःपुरिक (१)
वि० [सं० आन्तःपुरिक] अंतःपुरसंबंधी [को०] ।

आंतःपुरिक (२)
संज्ञा पुं० अंतःपुर की वार्ता या कार्य [को०] ।

आंतरज्ञ
वि० [सं० आन्तरज्ञ] आंतरिक या गुह्य तत्व को जाननेवाला [को०] ।

आंतरतम्य
संज्ञा पुं० [सं० आन्तरतम्य] घनिष्ठ या निकट संबंध, जैसे दो अक्षरों का [को०] ।

आंतरप्रपंच
संज्ञा पुं० [सं० आन्तर+प्रपञ्च] भ्रम के कारण उत्पन्न धारणा [को०] ।

आंतरागारिक
वि० [सं० आन्तरागारिक] भांडार या भांडागारिक के कर्तव्यों से संबंध रखनेवाला [को०] ।

आंतरायिक
वि० [सं आन्तरायिक] १. अंतर से उपस्थित होनेवाला । २. समय समय पर उद्धृत [को०] ।

आंतराल (१)
वि० [सं० आन्तराल] अंतर की प्रकृति की जानकारी रखनेवाला [को०] ।

आंतराल (२)
संज्ञा पुं० [सं० आन्तराल] एक दार्शनिक संप्रदाय ।

आंतारिक
वि० [सं० आन्तर + इक (प्रत्य०)] १. आंतर या हृदय- संबंधी । उ०—जब एक व्यक्ति अपने आंतर सत्य को प्राप्त करने के लिये अपनी सारी शक्तियों को केंद्रीभूत करता है... ।—मुँशी अभि० ग्रं, पृ० ४७ । २. घरेलू । भीतरी । उ०—नंद आंतरिक विग्रह के कारण जर्जारित हो गया था ।-चंद्र०, पृ० ३२ ।

आंतरिकता
संज्ञा स्त्री० [सं० आंतरिक+ता (प्रत्य०)] घनिष्ठता । आत्मीयता । उ०—वह कुछ सकुचाया और फिर जैसे उसने मुझे सह लिया और आंतारिकता भी बढ़ गई ।—भस्मावृत०, पृ० १० ।

आंतरिक्ष (१)
वि० [सं, आन्तरिक्ष] [वि० स्त्री० आंतारिक्ष] १. अंतरिक्ष संबंधी । २. अंतरिक्ष में उत्पन्न [को०] ।

आंतरिक्ष (२)
संज्ञा पु० १. पृथ्वी और आकाश के बीच का स्थान । २. वर्षा का जल [को०] ।

आंतरीक्ष
वि०, संज्ञा पुं० [सं० आन्तरीक्ष] दे० 'आंकरिक्ष' [को०] ।

आंतरीय
वि० [सं० आन्तर + ईय (प्रत्य०)] आंतरिक । भीतरी । हार्दिक । उ०— ....यदि आंतरीय कष्ट न हो तो भी... ।-प्रेम घन०, भा० २, पृ० १९० ।

आंतर्गेहिक
वि० [सं० आन्तर्गेहिक] [वि०, स्त्री० आंतर्गेहिकी] घर के भीतर का । घर के भीतर उत्पन्न [को०] ।

आंतर्नेदिक
वि० [सं० आन्तर्वेदिक] वेदिका या वेदी के भीतर का [को०] ।

आंतर्वेशिक
संज्ञा पुं० [सं० आन्तर्वोशिक] दे० 'अंतर्वोशिक' । उ०—आंतर्वेशिक से प्रश्न हुआ, कितनी नई दासियाँ अंतःपुर में आई हैं ।—इरा०, पृ० ४७ ।

आंतर्वेश्मिक
वि० [सं० आन्तर्वेश्मिक] घर के अंदर या भीतरी भाग से संबंध रखनेवाला [को०] ।

आंतिका
संज्ञा स्त्री० [सं० आन्तिका] बड़ी बहन [को०] ।

आंत्र (१)
वि० [सं० आन्त्र] आँत का । आँत संबंधी [को०] ।

आंत्र (२)
संज्ञा पुं० आँत [को०] ।

आंत्रिक
वि० [सं० आन्त्रिक] आँत संबंधी [को०] ।

आंदोल
संज्ञा पुं० [सं० आन्दोल] १. हिलना डुलना । भूलना । २. काँपना । कंपन [को०]

आंदोलक
संज्ञा पुं० [सं० आन्दोलक] झूला ।

आंदोलन
१. बार बार हिलना डुलना । इधर से उधर हिलना । काँपना । भूलना । उ०—आलोक रश्मि से बुने उषा अंचल में आंदीलन अमंद ।-कामायनी, पृ० १६८ । २. उथल पुथल करनेवाला सामूहिक प्रयत्न । हलचल । धूम; जैसे, शिक्षा के प्रचार के लिये वहाँ खूब आंदोलन हो रहा है । उ०—इसके पीछे तो खड़ी बोली की लिये एक आंदोलन ही खड़ा हुआ ।—इतिहास०, पृ० ५०९ ।

आंदोलित
वि० [सं० आन्देलित] [वि० स्त्री० आंदे लिता] हिलता डुलता हुआ झोके खाता हुआ । उ०—इन कवियों के मन में एक आँधी उठ रही थी जिसमें आंदोलित होते हुए वे उड़े जा रहे थे ।— इतिहास०, पृ० ६५० । २. कंपनयुक्त । हलचल से भरा ।

आंधस
संज्ञा पुं० [सं० आन्धस] मंड । मांड [को०] ।

आंधसिक (१)
संज्ञा पुं० [सं० आन्धसिक] पाचक । पाककार । रसोइया [को०] ।

आंधसिक (२)
वि० भोजन या खाना बनानेवाला [को०] ।

आंध्य
वि० [सं० आन्ध्य] १. अंधता । अंधापन । २. अंधकार [को०] ।

आंध्र (१)
संज्ञा पुं० [सं० आन्ध्र] १. ताप्ती नदी के किनारे का देश । २. भारत का तेलुगु भाषी प्रदेश या राज्य ।

आंध्र (२)
वि० आंध्र देश का निवासी ।

आंब
संज्ञा पुं० [सं० आम्ब] अन्न का एक प्रकार या भेद [को०] ।

आंबष्ठ
संज्ञा पुं० [सं० आम्बष्ठ] अँबष्ठ देश का निवासी व्यक्ति [को०] ।

आंबिकेय
संज्ञा पुं० [सं० आम्बिकेय] १. अंबिका का पुत्र । धृतराष्ट्र । २. कार्तिकेय [को०] ।

आंबुद
वि० [सं० आम्बुद] अंबुद या बादल संबंधी [को०] ।

आंभस
वि० [सं० आम्भस] [विं० स्त्री० आंभसी] १. जल संबंधी । २. द्रव । तरल [को०] ।

आंभसिक (१)
वि० [सं० आम्भसिक] जल में रहनेवाला । जलचर [को०] ।

आंभसिक (२)
संज्ञा पुं० मछली [को०] ।

आंभसी
संज्ञा स्त्री० [सं० आम्भसी] घेरंड संहिता में वर्णित पाँच धारणामुद्राओं में से एक । जलचरी मुद्रा ।

आंशिक
वि० [सं०] अंशसंबंधी । अंश विषयक । कुछ । थोड़ा ।

आंशुक जल
संज्ञा पुं० [सं०] किरण दिखाया हुआ पानी । वह जल जो एक तांबे के बर्तन में रखकर दिन भर धूप में और रात भर चाँदनी या ओस में रखकर छान लिया जाय । वैद्यक में इसका बड़ा गुण लिखा है ।

आंश्य
वि० [सं०] अंश से संबंध रखनेवाला [को०] ।

आँ
अव्य० [अनुध्व०] १. विस्मयसूचक शब्द; जैसे,—आँ, क्या कहा ? फिर तो कहो । २. बालक के रोने के शब्द का अनुकरण ।

आँक (१)
संज्ञा पुं० [सं० अंक] १. अंक । चिह्न । निशान । २. संख्या का चिह्न । अदद । उ०—(क) तुलसी महीस देखे, दिन रजनीस जैसे, सूने पर सून से मनो मिटाए आँक के ।-तुलसी ग्रं०, पृ० ३१८ । (ख) कहत सबै बेंदी दियै आँक दस गुनौ होत ।— बिहारी र०, दो० २२७ । ३. अक्षर । हरफ । उ०—(क) बिरह तचैं उघरयौ सु अब सेंहुड़ कैसो आँकु ।-बिहारी र०, दो० ४५७ । (ख) गुण पै अपार साधु, कहैं आँक चारि ही में अर्थ बिस्तारि कविराज टकसार है ।-प्रिया० (शब्द०) । ४. गढ़ी हुई बात । ५. दृढ़ निश्चय । निश्चित सिद्धंत । उ०— जाउँ राम पहिं आएसु देहू । एकहि आँक मोर मत एहू ।— मानस, २ ।१७८ । (ख) एकहि आँक इहइ मन माहीं । प्राप्त काल चलिहौं प्रभु पाहीं ।-मानस, २ ।१८३ । ६. अंश । हिस्सा । उ०—काम-संकल्प डर निरखि बहु बासनहिं आस नहिं एकहू आँक निरबान की ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५६३ । ७. किसी मनुष्य के नाम पर प्रसिद्ध वंश; जैसे, वे बड़े कुलीन हैं, वे अमुक आँक के हैं । ८. अँकवार । गोद । उ०—पीछे ते गहि लाँकरी, गही आँक री फेरि ।-सं० सप्तक, पृ० २४३ । मुहा०—आँक भरना=आलिंगन करना । उ०—छीतस्वामी गिरिवरधर मगन भए आँको भरत, सुख स्वाद इहै, समै कौ कहत न बनि आवै ।-छीत०, पृ० ४१ । ९. भाग्य । उ०—एक को आँक बनावत मेटत पोथिय काँख लिए दिन जैहै ।-घनानंद (भू०) पृ० ५३ । १०. शान । उ०—कठिन काठियावाड़ चुटीले के परिपोखे, चंचल चपल चलाँक बाँकपन आँक अनोखे ।-रत्नाकर, भा० १, पृ० ११२ । ११. अँकुर । उ०—जाम्यों आँक अकार नेह दिन दिन बढ़त करम संदेह ।— भीखा शा०, पृ० ४७ । १२. नौ मात्रा के छंदों की संख्या । अंक । १३. छकड़े या बैलगाड़ियों की बल्लियों के नीचे दिया हुआ । लकड़ी का मजबूत ढाँचा जिसमें धुरी पहिए में पहनाई जाती है ।

आँक (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'आँख' । उ०—जितवा है बिन जिव में सुनता है बिन कान । देखता है बिन आँक से, कादर बिन तन जान ।-दक्खिनी० पृ० ३८५ ।

आँकड़ा (१)
संज्ञा पुं० [सं० अंक, हिं० आँक + ड़ा (प्रत्य०)] १. आँक । अदद । संख्या का चिह्न । उ०—जनसंख्या से संबंधित समस्त आँकड़े जनगणाना । १९५१ पर आधारित हैं ।-शुक्ल अभि० ग्रं०, (विविध) पृ० २ ।

आँकड़ा (२) †
संज्ञा पुं० [देश०] चौपायों की एक बीमारी ।

आँकड़ा (३) †
संज्ञा पुं० [सं० अर्क, हिं० आक्र + ड़ा (प्रत्य०) ।] मदार । आक ।

आँकन †
संज्ञा पुं० [सं० अ + कण = दाना] ज्वार की बाल की खुड़ी जिसमें से दाना निकाल लिया गया हो ।

आँकना
क्रि० स० [सं० अंकन] चिह्नित करना । निशान लगाना । दागना । उ०—खिन खिन जीव सँड़ासन आँका । औ नित डोम छुआवहि बाँका ।-जायसी (शब्द०) । २. कूतना । अंदाज करना । तखमीना करना । मूल्य लगाना । उ०—सन् १९५१ की पशुगणना के अनुसार राज्य में पशुधन से प्राप्त होनेवाले पदार्थें का मूल्य २१ करो़ड़ रुपए आँका गया है ।-शुक्ल अभि० ग्रं०, (विविध), पृ० १७ । ३. अनुमान करना । ठहराना । निश्चित करना । उ०—आम कों कहत आमली है आमली कों आम आक ही अनारन कों आँकिबो करति है ।— पद्माकर, ग्रं० पृ० २१८ ।

आँकबाँक
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आक बाक' । उ०—जैसें कछु आँक बाँक बकत हैं । आजु हटि, तैसें जिन नाउँ मुख काइ को निकसि जाइ ।-केशव ग्रं०, पृ० ५३१ ।

आँकम †
संज्ञा पुं० [सं० अँक] आलिंगन । उ०—बाहु वलय आँकम भरे भाग, आपन आइति नहि आपस आँग ।—विद्यापति, पृ० २०७ ।

आँकर (१)
वि० [सं० आकर = खान, जो गहरी होती है] १. गहरा । 'स्याह' या 'सेव' का उलटा । विशेष—जोताई दो तरह की होती है-एक आँकर अर्थात् खूब गहरी (अँवाय) और दूसरी स्याह या सेव । २. बहुत अधिक । उ०—मोहमद मात्यो रात्यो कुमति कुनारि सों बिसारि बेद लोक लाज आँकरो अचेतु है ।-तुलसी (शब्द०) ।

आँकर (२)
वि० [सं० अक्रय्य] महँगा ।

आँकल
संज्ञा पुं० [सं० अंक, हिं० आँक = दाग] दागा हुआ साँड़ ।—(डिं०) ।

आँकु़ड़ा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आँकड़ा' ।

आँकुर
संज्ञा पुं० [हिं०] पुं० 'अंकुर' । उ०—दुहुक आसा दीप मिझ एल, मदन आंकुर भाँगु ।-विद्यापति, पृ० ३७ ।

आँकुस †
संज्ञा पुं० [सं० अङ्कुश] दे० 'अंकुश' । उ०—जोबन अस मैमंत न कोई, नवै हस्ति जौ आँकुस होई ।-जाघसी ग्रं०, पृ० ७४ ।

आँकू
वि० [सं० अंक, हिं० आँक + ऊ (प्रत्य०)] आँकने या कूतनेवाला । तखमीना करनेवाला ।

आँख (१)
संज्ञा स्त्री [सं० अक्षि, प्रा० अक्खि, पं० अँक्ख] देखने की इंद्रिय । वह इंद्रिय जिससे प्राणियों को रूप अर्थात् वर्ण- विस्तार तया आकार का ज्ञान होता है । विशेष—मनुष्य के शरीर में यह एक ऐसी इंद्रिय है, जिंसपर आलोक के द्वारा पदार्थों का बिंब खिंच जाता है । जो जीव आरीह नियमानुसार अधिक उन्नत हैं, उनकी इंद्रियों की बनावट अधिक पेचीली और जटिल होती है, पर क्षुद्र जीवों में इनकी बनावट बहुत सादी, कहीं कहीं तो एक बिंदी के रूप में होती है; उनपर रक्षा के लिये पलक और बरौनी इत्यादि का बखेड़ा नहीं होता । बहुत क्षुद्र जीवों में चक्षुरिंद्रिय की जगह या संख्या नियत नहीं होती । शरीर के किसी स्थान में एक, दो, चार, छः बिदियाँ सी होती हैं जिनसे प्रकाश का बोध होता है । मकड़ियो की आठ आँखैं प्रसिद्ध हैं । । रीढ़वाले जीवों की आँखें खोपड़े के नीचे गड़ढों में बड़ी रक्षा के साथ बैठाई रहती हैं और उनपर पलक और बरौनी आदि का आवरण रहता है । वैज्ञानिकों का कथन है कि सभ्य जातियाँ वर्णभेद अधिक कर सकती हैं और पुराने लोग रंगों में इतने भेद नहीं कर सकते थे । आँख बाहर से लंबाई लिए हुए गोल तथा दोनों किनारों पर नुकीली दिखाई पड़ती है । सामने जो सफेद काँच की सी झिल्ली दिखाई पड़ती है उसके पीछे एक और झिल्ली है जिसके बीचोबीच एक छेद होता है । इसके भीतर उसी से लगा हुआ एक उन्नतोदर काँच के सदृश पदार्थ होता है जो नेत्र द्वारा ज्ञान का मुख्य कारण है, क्योंकि इसी के द्वारा प्रकाश भीतर जाकर रेटिना पर के ज्ञानतंतुओं पर कंप वा प्रभाव डालता है । पर्या०—लोचन । नयन । नेत्र । ईक्षण । अक्षि । दृक् । दृष्टि । अंबक । विलोचन । वीक्षण । प्रेक्षण । चक्षु । यौ०—उनोंदी आँख = नींद से भरी आँख । वह आँख जिसमें नींद आने के लक्षण दिखाई पड़ते हों । कंजी आँख = नीली और भूरी आँख । बिल्ली की सी आँख । कँटीली अख = घायल करनेवाली आँख । मोहित करनेवाली आँख । गिलाफी आँख = पपोटों से ढकी हुई आँख; जैसे कबुतर की । चंचल आँख = यौवन के उमंग के कारण स्थिर न रखनेवाली आँख । चरबाँक आँख = चंचल आँख । चियाँ सी आँख = बहुत छोटी आँख । चोर आँख=(१) वह आँख जिसमें सुरमा या काजल मालूम न हो । (२) वह आँख जो लोगों पर इस तरह पड़े कि मालूम न हो । धँसी आँख = भीतर की ओर धँसी हुई आँख । मतवाली आँख = मद से भरी आँख । मदभरी आँख, रसभरी आँख = वह आँख जिससे भाव टपकता हो । रसीली आँख, शरबती आँख = गुलाबी आँख । मुहा०—आँख=(१) ध्यान । लक्ष्य । जैसे, उनकी आँख बुराई ही पर रहती है । (२) विचार । विवेक परख । शिनाख्त । जैसे—(क) उसके आँख नहीं है; वह क्या सौदा लेगा । (ख) राजा के आँख नहीं कान होता है । (३) कृपादृष्टि । दया भाव; जैसे, —अब तुम्हारी वह आँख नहीं रही । (४) संतति । संतान । लड़का बाला; जैसे—(क) सोगिन मर गई, आँख छोड़ गई । (ख) एक आँख फूटती है तो दूसरी पर हाथ रखते हैं । (अर्थात् जब एक लड़का मर जाता हे तब दूसरे की देखकर धीरज धरते हैं और उसकी रक्षा करते हैं ।) (ग) मेरे लिये तो दोनों आँखे बराबर हैं । आँख आना = आंख में लाली, पीड़ा और सूजन होना । आँख उठना = आँख आना । आँख में लाली और पीड़ा होना । आँख उठाना = ताकना । देखना । सामने नजर करना । जैसे—आँख उठाई तो चारों और मैदान देख पड़ा । () बुरी नजर से देखना । बुरा बर्ताव करना । हानि पहुँचाने की चेष्टा करना । जैसे— हमारे रहते तुम्हारी ओर कोई आँख उठा सकता है ? आँख डठाकर न देखना = (१) ध्यान न देना । तिरस्कार करना; जैसे—(क) मैं उनके पास घंटों बैठा रहा पर उन्होंने आँख उठाकर भी नहीँ देखा । (ख) ऐसी चीजों को तो हम आँखउठाकर भी नहीँ देखते । (२) सामने न ताकना । लज्जा या संकोच सो बराबर दृष्टि न करना; जौसे—वह लड़का तो आँख ही ऊपर नहीं उठाता, हम समझावें क्या । आँख उलट जाना= (१) पुतली का ऊपर चढ़ जाना । आँख पथराना (यह मरने के समय होता है); जैसे,—आँखें उलट गई, अब क्या आशा है । (२) घमंड से नजर बदल जाना । अभिमान होना; जैसे—इतने ही धन में तुम्हारी आँख उलट गई हैं । आँख ऊँची न होना=लज्जा से बराबर ताकने का साहस न होना । लज्जा से दृष्टि नीचे रहना; जैसे, —उस दिन से फिर उसकी आँख हमारे सा मने ऊँची नहीं हुई । आँख ऊपर न उठाना = (१) लज्जा या भय से नजर ऊपर की ओर न करना । दृष्टि नीची रखना । आँख ओट, पहाड़ ओट = (१) निःसंकोच होना । (२) जब आँख के सामने नहीं, तब क्या दूर, क्या नजदीक । आँख कड़ु आना = अधिक ताकने या जागने से एक प्रकार की पीड़ा होना । आँख का अंधा, गाँठ का पूरा = मूर्ख धनवान । अनाड़ी मालदार । वह धनी जिसे कुछ विचार या परख न ही; जैसे—(क) हे भगवान् भेजो कोई आँख का अंधा गाँठ का पूरा । (ख) जो आँख का अँधा होगा, वही यह सड़ा कपड़ा लेगा । आँख का काँटा होन = (१) खटकना । पीड़ा देना । (कंटक होना । बाधक होना । शत्रु होना; जैसे,— उसी के मारे तो हमारी कुछ चलने नहीं पाती; वही तो हमारी आँख का काँटा हो रहा है । आँख का काजल चुराना = गहरी चोरी करना । बड़ी सफाई के साथ चोरी करना । आँख का जाना = आँख फूटना; जैसे,—उसकी आँख शीतला में जाती रही । आँख का जाला = आँख की पुतली पर एक सफेद झिल्ली जिसके कारण धुंध दिखाई देता है । आँख का डेंला = आँख का बट्टा । आँख का वह उभड़ा हुआ सफेद भाग जिसपर पुतली रहती है । आँख का तारा = (१) आँख का तिल । कनीनिका । (२) बहुत प्यारा व्यक्ति । (३) संतति । आँख का तिल = आँख की पुतली की बीचोबीच छोटा गोल तिल के बराबर काला धब्बा जिसमें सामने की वस्तु का प्रति बिंब दिखाई पड़ता है । यह यथार्थ में एक छेद है जिससे आँख के सबसे पिछले परदे का काला रंग दिखाई पड़ता है । आँख का तारा । कनीनिका । आँख का तेल निकालना = आँक को कष्ट देना । ऐसा महीन काम करना जिसमें आँखों पर बहुत जोर पड़े, जैसे सीना पिरोना, लिखना, पढ़ना आदि । उ०—कयों न खो देंगे आँख का तिल वे, आँख का तेल जो निकालेंगे ।— चोखेठ, पृ० १७ । आँख कान खुला रहना = सचेत रहना । सावधान होना । होशियार रहना । आँख का परदा = आँख के भीतर की झिल्ली जिससे होकर प्रकाश जाता है । आँख का पर्दा उठना = ज्ञानचक्षु का खुलना । अज्ञान या भ्रम का दूर होना । चेत होना; जैसे—उसकी आँख का परदा उठ गया है, अब वह ऐसी बातों पर विश्वास न करेगा । आँख पर पर्दा पड़ना = कुछ सुझाई न पड़ना । मोहग्रस्त होना । आँख का पानी ढल जाना = लज्जा छूट जाना । लाज शर्म का जाता रहना, जैसे, —जिसकी आँख का पानी ढल गया है, वह चाहे जो कर डाले । आँख का पानी मरना = दे० 'आँख का पानी ढलना' । आँख की किरकिरी = आँख का काँटा । चक्षुशूल । खटकनेवाली वस्तु या व्यक्ति । आँखों की ठंढक = अत्यंत प्यार व्यक्ति या वस्तु । आँख की पुतली = आँख के भीतर कार्निया और लेंस के बीच का रंगीन भूरी झिल्ली का वह भाग जो सफेदी पर की गोस काट से होकर दिखाई पड़ता है । इसी के बीच में वह तिल या कृष्णतारा दिखाई पड़ता है जिसमें सामने की वस्तु का प्रतिबिंब झलकता है । इसमें मनुष्य का प्रतिबिंब एक छोटी पुतली के समान दिखाई पड़ना है, इसी से इंसे पुतली कहते हैं । (२) प्रिय व्यक्ति । प्यारा मनुष्य । जैसे,—वह हमारी आँख की पुतली है; उसे हम पास से जाने न देंगी । आँख की पुतली फिरना = आँख की पुतली का चढ़ जाना । पुतली का स्थान बदलाना । आँख का पथराना (यह मरने का पूर्वलक्षण है) । आँख की बदी भौं के आगे = किसी के दोष को उसके इष्ट मित्र या भाई बंधु के सामने ही कहना । आँख की सूइयाँ निकालता = किसी काम के कठिन और अधिक भाग के अन्य व्यक्ति द्वारा पूरा हो जाने पर उसके शेष अल्प और सरल भाग को पूरा करके सारा फल लेने का उद्योग करना; जैसे,—इतने दिनों तक तो मर मरकर हमने इसको इतना दुरुस्त किया; अब तुम आए हो आँखों की सूइयाँ निकालने । विशेष—इस मुहाविरे पर एक कहानी है । एक राजकन्या का विवाह बन में एक मृतक से हुआ जिसके सारे शरीर में सूईयाँ चूभी हुई थीं । राजकन्या नित्य बैठकर उन सूहयों को निकाला करती थी । उसकी एक लौंड़ी भी साथ थी जो यह देखा करती थी । एक दिन राजकन्या कहीं बाहर गई । लौंड़ी ने देखा कि मृतक के शरीर की सारी सूइयाँ निकल चुकी हैं, केवल आँखों की बाकी हैं । उसने आँकों की सूइयाँ निकाल डालीं और वह मृतक जी उठा । उस लौंड़ी ने अपने को उसकी विवाहिता बत- लाया; और जब वह राजकन्या आई, तब उसे अपनी लौंड़ी कहा । बहुत दिनों तक वह लौंडी इस प्रकार रानी बनकर रही । पर पीछे से सब बातें खुल गईं और राजकन्या के दिन फिरे । आँखों के आगे अँधेरा छाना=मास्तिष्क पर आघात लगने या कमजोरी से नजर के सामने थोड़ी देर के लिये कुछ न दिखाई देना । बेहोशी होना । मूर्च्छा आना । आँखों के आगे अँधेरा होना = संसार सूना दिखाई देना । विपत्ति या दुःख के समय घोर नैराश्य होना । जैसे,—लड़के के मरते ही उनकी आँखों के आगो अँधरा हो गया । आँखों के आगे उजाला होना = प्रकाश होना । ज्ञान होना । आँखों में चमक आना = प्रसन्न होना । आँखों के आगी चिनगारी छूटना = आँखो का तिलमिलाना । तिलमिली लगना । मस्तिष्क पर आघात पहुँतने पर चकाचौंध सी लगना । आँखों के आगे नाचना = दे० 'आँखों में नाचना' । आँखों के आगे पलकों की बुराई = किसी के इष्ट-मित्र के आगे ही उसकी निंदा करना । जैसे—नहीं जानते थे कि आँखों के आगे पलकों की बुराई कर रहे हैं, सब बातें खुल जायँगी ? आँखों के आगे फिरना = दे० 'आँखो में फिरना' । आँखों के आगे रखना = आँखों के सामने रखना । आँखों के कोए = आँखों के डेले । आँखों के डोरे = आँखों के सफेद डेलोंपर लाल रंग की बहुत बारीक नसें । आँखो के तारे छूटना = दे० 'आँखों के आगे चिनगारी छूटना' । आँखों के सामने नाचना = दे० 'आँखों में नाचना' । आँखों के सामने रखाना= निकट रखना । पास से जाने न देना । जैसे,—हम तो लड़र्कों को आँखों के सामने ही रखाना चाहते हैं । आँखों के सामने होना = संमुख होना । आगे आना । आँखों को रो बैठना = आँखों को खो देना । आँध होना; जैसे,— यदि यही रोना धोना रहा तो आँखों को रो बैठेगी (स्त्री०) । आँख खटकना = (१) आँख टीसना । आँख किराकिराना । उ०—कुमकुम मारो गुलाल, नंद जू के कृष्णालाल, जाय कहूँगी कंसराज से आँख खटक मोरी भई है लाला ।—होली (शब्द०) । (२) किसी से मनमुटाव होना । आँख खुलना = (१) पलक खुलना । परस्पर मिली या चिपकी हुई पलकों का अलग हो जाना; जैसे,—(क) बच्चे की आँखों धो डालो तो खुस जायँ ।—(ख) बिल्ली के बच्चों ने अभी आँखें नहीं खोली । (२) नींद टूटना; जैसे,—तुम्हारी आहट पाते हो मेरी आँखें खुल गईं । (३) चेत होना । ज्ञान होना । भ्रम का दूर होना; जैसे,—पश्चिमीय शिक्षा से भारतवासियों की आँखें खुल गईं । (४) चित्त स्वस्थ होना । ताजगी आना । होश- हवास—दुरुस्त होना । तबियत ठिकाने आना । जैसे,—इस शरबत के पीते ही आँखें खुल गईं । आँख खुलवाना = (१) आँख बनवाना । (२) मुसलमानों के विवाह की रीति जिसमें दुलहिन के सांमने एक दर्पण रखा जाता है और वे उसमें एक दूसरे का मुँह देखते हैं । आँख खोलना = (१) पलक उठाना । ताकना । (२) आँख बनाना । आँख का जाला या माँड़ा निकालना । आँख को दुरुस्त करना; जैसे,—डाक्टर ने यहाँ बहुत से अंधीं की आँखें खोलीं । (३) चेताना । सावधान कराना । ज्ञान का संचार करना । वास्तविक बोध करना; जैसे,—उस महात्मा ने सदुपदेश से हमारी आँखें खोल दीं । (४) ज्ञान का अनुभव करना । वाकिफ होना । सावधान होना । उ०—भाई बंधु और कुटुंब कबीला झूठे मित्र गिनावे । आँख खोल जब देख बावरेसब सपना कर पावे ।—कबीर (शब्द०) । (५) सुध होना । स्वस्थ होना; जैसे— चार दिन पर आज बच्चे ने आँख खोली है । आँख गड़ना— (१) आँख किरकिराना । आँख दुखना; जैसे-हमारी आँखें कई दिनों से गड़ रही हैं, आवेंगी क्या ? (२) आँख देखकर तुम आँख बैठना; जैसे,—उसकी गड़ी आँखें देखकर तुम उसे पहचान लेना । (३) दृष्टि जमना । टकटकी बंधना । जैसे,—(क) किस चीज पर तुम्हारी आँखें इतनी देर से गड़ी हुई हैं । (ख) उसकी आँखें तो लिखने में गड़ी हुई हैं, उसे इधर उधर की क्या खबर । (४) बड़ी चाह होना । प्राप्ति की उत्कट इच्छा होना, जैसे,—जिस वस्तु पर तुम्हारी आँख गड़ती है, उसे तुम लिए बिना नहीं छोड़ते । आँखगड़ना = (१) टकटकी बाँधना । स्तब्ध दृष्टि से ताकना । (२) नजर रखना । चाहना । प्राप्ति की इच्छा करना । जैसे,—अब तुम इसपर आँख गड़ाए हो, काहे को बचेगी । आँखें धुलना = चार आँखें होना । खूब घूराघूरी होना । दृष्टि से दृष्टि मिलना; जेसे, घंटों से खूब आँखें घुल रही हैं । आँखें चढ़ना = नशी, नींद या सिर की पीड़ा से पलकों का तन जाना और नियामित रूप से न गिरना । आँखों का लाल होना; जैसे—देखते नहीं उसकी आँखें चढ़ी हुई हैं और मुँह से सीधी बात नहीं निकलती । आँख चमकाना = आँखों से तरह तरह के इशारे करना । आँख की पुतली उधर घुमाना । आँख मटकाना । आँख चरने जाना = दृष्टि का जाता रहना, जैसे—तम्हारी आँख क्या चरने गई थी जो सामने से चीज उठ गई । आँख चार करना, चार आँखे करना = देखादेखी करना । सामने आना; जैसे,—जिस दिन से मैने खरी खरी सुनाई, वे मुझसे चार आँखें नहीं करते । आँखें चार होना, चार आँखें होना = (१) देखादेखी करना । सामना होना । एक दूसरे के दर्शन होना, जैसे,—आँखें चार होते हो वे एक दूसरे पर मरने लगे । (२) विद्या का होना, जैसे,—हम तो अपढ़ हैं, पर तुम्हें तो चार आँखें हैं, तुम ऐसी भूल क्यों करते हो । आँखचीर चीर कर देखना= दे० 'आँख फाड़ फाड़ कर देखना' । आँख चुराना =नजर बचाना । कतराना । सामने न होना । जैसे—उस दिन से रुपया ले गया है, आँख चुराता फिरता है । (२) लज्जा से बराबर न ताकना । दृष्टि नीची करना (३) रुखाई करना । ध्यान न देना, जैसे—अब वे बड़े आदमी हो गए हैं, अपने पुराने मित्रों से आँख चुराते हैं । आँख चुराकर कुछ करना = छिपकर कोई काम करना । आँख चूकना = नजर चूकना । दृष्टि हट जाना । असावधानी होना, जैसे,—आँखचूकी कि माल यारों का । आँख छ़त से लगना = (१) आँख ऊपर को चढ़ना । आँख टँगना । स्तब्ध होना । आँख का एकदम खुली रहना । (यह मरने के पूर्व की अवस्था है ।) (२) टकटकी बँधना । आँख छि़पाना = (१) नजर बचाना । कतराना । टाल- मटूल करना । (२) लज्जा से बराबर न ताकना । दृष्टि नीची कराना । (३) रुखाई करना । बेसुरौवती करना । ध्यान न देना । आँख जमना=नजर ठहरना । दृष्टि का स्थिर रहना; जैसे,—पहिया इतनी जल्दी जल्दी घूमता है कि उसपर आँखानहीं जमती । आँख झपकना (१) आँखा बंद होना । पलक गिरना । (२) नींद आना । झपकी लगना, जैसे,—आँख झपकी ही थी कि तुमने जगा दिया । आँख झपकाना = आँक मारना । इशारा करना । आँख झेंपना = दृष्टि नीची होना । लज्जा मालूम होना, जैसे,—सामने आते ही आँख झेपती है । आँख टँगना =(१) आँख ऊपर को चढ़ जाना । आँख की पुतली का स्तब्ध होना । आँखा का एकदम खुला रहना (यह मरने का पूर्वलक्षण है) (२) टकटकी बँधना, जैसे,—तुम्हारे आसरे में हमारी आँखें टंगी रह गईं, पर तुम न आए । आँख टेढ़ी करना = (१) भौं टेढ़ी करना । रोष दिखाना । (२) आँखें बदलना । रुखा ई करना । बेमुरौवती करना । आँखें ठंढी होना=तृप्ति होना । संतोष होना । मन भरना । इच्छी पूरी होना, जैसे,—अब तो उसने मार खाई, तुम्हारी आँखें ठंढ़ी हुईं ? आखें डबडबाना= (१) (क्रि० अ०) औखों में आँसू भर आना । आँखों में आँसू आना, जैसे,—यह सुनते ही उसकी आखों डबडबा आईं । (२) (क्रि० स०) आँख में आँसू लाना । आँसू भरना, जैसे,— वह आँखों डबडबाकर बोला । आँखा डालना= दृष्टि डालना । देखाना । ध्यान देना । चाह करना । इच्छा करना, जैसे—भले लोग पराई वस्तु पर आँख नहीं डालते । आंखें ढँकर ढकर करना = पलकों की गति ठीक न रहना । आँखों का तिलमिलाना जैसे,—इतने दिनों के उपवास से उसकी आँखें ढकर ढकर कर रही हैं । आँखे तरसना = देखने के लिये आकुल होना । दर्शन के लिये दुखी होना; जैसे—तुम्हें देखने के लिये आँखें तरस गईं । आँखें तरेरना = क्रोध से आँखें निकाल कर देखना । क्रोध की दृष्टि से देखना । उ०—सुनि लछिमन बिहँसे बहुरि नयन तरेरे राम ।—मानस, १ ।२७८ । आँख तले न आना = कुछ भी न जँचना । उ०—देव देखि तब बालक दोऊ । अब न आँखि तर आवत कोऊ ।—मानस, १ ।२७८ । आँखों तले न लाना = कुछ न समझना । तुच्छ समझना; जैसे,— वह किसी को अपनी आँखों तले लाता है जो तुम्हारी बात मानेगा ? आँख दबाना = पलक सिकोड़ ना । आँख भचकाना; जैसे, (क) वह जरा आँख दबाकर ताकता है । तब प्रभु ने आग की ओर आँख दबाय सैन की, वह तुरंत बुझ गई । आँख दिखाना = क्रोध से आँखें निकालकर देखना । क्रोध की दृष्टि से देखना । कोप जताना । उ०—(क) जानै ब्रह्म सो विप्रबर आँखि देखावहिं डाटि ।—मानस, ७ ।९९ । (ख) सुनि सरोष भृमुनायकु आए । बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए ।— मानस, १ ।२९३ । (ग) बाजराज के बालकहिं लवा दिखा- वत आँखि ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ११५ । आँख दीदे से डरना= दे० 'आँख नाक से डरना' । आँखें दुखना = आँख में पीड़ा होना । आँखों देखते = (१) आँखों के सामने । देखते हुए । जानबूझकर; जैसे,—(क) आँखों देखते तो हम ऐसा अन्याय नहीं होने देंगे ।—(क) आँखों देखते मक्खी नही निगली जाती । (२) देखते देखते । थोड़े ही दिनों में; जैसे—आँखों से देखाते इतना बड़ा घर बिगड़ गया । आँखों देखा = आखों से देखा हुआ । अपना रखा । उ०—जल में उपजे जल में रहे । आँखों देखा खसरो कहे ।— (पहेली, काजल ।); जैसे, —यह तो हमारी आँखों देखी बात है । आँखें दौड़ाना = नजर दौड़ाना । डीठ पसारना । चोरों ओर दृष्टि फरेना । इधर उधर देखना; जैसे,—मैंने इधर उधर बहुत आँख दौड़ाई पर कहीं कुछ न देख पड़ा । आँख न उठना = (१) लज्जा से दृष्टि नीची रहना । (२) एहसान से दबा रहना । (३) दे० 'आँख न आना' । आँख न उठाना=(१) नजर न उठाना । सामने न देखना । बराबर न ताकना (२) लज्जा से दृष्टि नीची किए रहना (३) किसी काम में बराबर लगे रहना; जैसे,—वह सबेरे से जो सीने बैठा तो दिन भर आँख न उठाई । आँख न खोलना=(१) आँख बंद रखना । (२) सुस्त पड़ा रहना । बेसुध रहना । गाफिल रहना; जैसे,—आज चार दिन हुए बच्चे ने 'आँख न खोली । बादल का आँख न खोलना = बादल का घिरा रहना । आकाश का बादलों से ढका रहना । मेंह का आँख न खोलना = पानी का न थमना । वर्षा का न रुकना । आँख न ठहरना = चमक या द्रुत गति के कारण दृष्टि न जमना । जैसे,—(क) वह ऐसा भड़कीला कपड़ा है कि आँख नहीं ठहरती । (ख) पहिया इतनी तेजी से घूमता था कि उसपर आँख नहीं ठहरती थी । आँख न पसीजना = आँख में आँसु न आना । (एक) आँख न भाना = बिलकुल अच्छा न लगना; जैसे,—ये बातें हमें एक आँख नहीं भीतीं । आँख नाक से डरना = ईश्वर से डरना जो पापियों को अँधा और नकटा कर देता है । पाप से डरना जिससे आँख नाक जाती रहती है; जैसे—भाई, मुझ दीन से न डर तो अपनी आँख नाक से तो डर । आँख निकालना = आँख दिखाना । क्रोध की दृष्टि से देखना; जैसे,—हमपर क्या आँख निकालते हो; जिसने तुम्हें कुछ कहा हो उसके पास जाओ ।—(२) आँख के डेले तो छुरी से काटकर अलग कर देना । आँख फोड़ना; जैसे,—उस दुष्ट सरदार ने शाह आलम की आँख निकाल ली । आँख नीची करना = दृष्टि नीची करना । सामने न ताकना जैसे—वहाँ आँख नीची किए चला जा रहा था । (२) लज्जा या संकोच से बराबर नजर न करना । दृष्टि न मिलाना । जैसे,— कब तक आँखे नीची किए रहोगे ? जो पूछते हैं, उसका उत्तर दो । आँख नीची होना = सिर नीचा होना । लज्जा उत्पन्न होना । अप्रतिष्ठा होना; जैसे,—कोई ऐसा काम न करना चाहिए जिससे हर आदमी के सामने आँख नीची हो । आँख नीली पीली करना = बहुत क्रोध करना । तेवर बदलना । आँख दिखलाना । आँख पटपटा जाना =(१) आँख फूट जाना (स्त्रियाँ गाली देने में अधिक बोलती हैं) । (२) अत्याधिक भूख या प्यास से व्याकुल होना । आँख पट्टम होना = आँख फूट जाना आँख पड़ना = (१) दृष्टि पड़ना । नजर पड़ना; जैसे,—संयोग से हमारी आँख उसपर पड़ गई नहीं तो वह बिलकुल पास आ जाता । (२) ध्यान जाना । कृपादष्टि होना; जैसे,— गरीबों पर किसी की आँख नहीं पड़ती । (३) चाह की दृष्टि होना । पाने की इच्छा होना; जैसे,—उसकी इस किताब पर बार बार आँख पड़ रही है । (४) कुदृष्टि पड़ना । ध्यान जाना; जैसे,—जिस वस्तु पर तुम्हारी आँख पड़े, भला वह रह जाय ? आँख पथराना = पलक का नियमित गति से न गिरना और पुतली की गति का मारा जाना । नेत्र स्तब्ध होना (यह मरने का पूर्वलक्षण है); जैसे,—(क) अब उनकी आँखे पथरा गई हैं, और बोली भी बंद हो गई है ।— (ख) तुम्हारी राह देखते देखते आँखे पथरा गईं । आँखों पर आइए या बैठिए = आदर के साथ आइए । सादर पधारिंए । (जब कोई बहुत प्यारा या बड़ा आता है या आने के लिये कहता है, तब लोग उसे ऐसा कहते हैं) । आँखों पर ठिकरी रख लेना = (१) जान बूझकर अनजान वनना । (२) रुखाई करना । बेमुरौवती करना । शील न करना । (३) गुण न मानना । उपकार न मानना । कृतघ्नता करना । (४) लज्जा खो देना । निर्लज्ज होना । बेहया होना । आँखों में पट्टी बाँधना = (१) दोनों आँखों के ऊपर कपड़ा ले जाकर सिर के पीछे बाँधना जिससे कुछ दिखाई न पड़े । आँखों को ढकना । (२) आँख बंद करना । ध्यान न देना; जैसे—तुमने खूब आँखों पर पट्टी बाँध ली है कि अपना भला बुरा नहीं सूझता । आँखों पर परदा पड़ना = अज्ञान का अंधकार छाना । प्रमाद होना । भ्रम होना; जैसे,— तुम्हारी आँखों पर परदा पड़ा है; सच्ची बात क्यों मन में धँसेगी । (२) विचार का जाता रहना । विवेक का दूर होना; जैसे,—क्रोध के समय मनुष्य की आँखों पर परदा पड़ जाता है ।(३) कमजोरी से आँखों के सामने अँधेरा छाना; जैसे—भूख प्पास के मारे हमारी आँखों पर परदा पड़ गया है । आँखों पर वलकों का वोझ नहीं होता = (१) अपनी चीज का रखना भारी नहीं मालुम होता (२) अपने कुटुंबियों को खिलाना पिलाना नहीं खलता । (३) काम की चीज महँगी नहीं मालूम होती । आँखों पर बिठाना । = बहुत आदर सत्कर करना । आवगत । प्रीतिपूर्वक व्यवहार करना; जैसे—वह हमारे घर तो आवें, हम उन्हें आँखों पर बिठावेंगे । आँखों पर रखना = बहुत प्रिय करके रखना । बहुत आराम से रखना; जैसे,—आय निश्चित रहिए; मैं उन्हें अपनी आँखों पर रखूँगा । आँखपसारना या फैलाना = दूर तक दृष्टि बढ़ाकर देखना । नजर दौड़ाना । आँखें फटना = चोट या पीड़ा से यह मालूम पड़ना कि आँखे निकली पड़ती है; जैसे,—सिर के दर्द से आँखे फटी पड़ती हैं । (२) पु आंखे बढ़ना । आँखों की फाँक का फैलना । उ०—दौरत थोरे ही में थकिए, थहरै पग, आवत जाँघ सटी सी । होत घरी घरी छीन खरी कटि, और है पास सुबास अटी सी । हे रघुनाथ? बिलोकिबे को तुम्हें आई न खिलन सोच पटी सी । मैं नहीं जानति हाल कहा यह काहे ते जाति है औखि फटी सी ।— रघूनाथ (शब्द०) । आँख फड़कना = आँख की पलक का बार बार हिलना । वायु के संचार से आँख की पलक का बार बार फड़- फड़ाना । (दाहिनी या बाईं आँख के फड़कने से लोग भावी शुभ अशुभ का अनुमान करते हैं) । उ० सुनु मंथरा बात फुर तोरी । दहिन आँखि नित फरकइ मोरी ।—मानस, २ ।२० । आँख फाड़ फाड़ कर देखना = खूब आँख खोलकर देखना । उत्सुकता से देखना । जैसे उधर क्या है जो आँख फाड़फाड़कर देख रहे हो । आँखे फिर जाना । = (१) नजर बदल जाना । पहले की सी कृपा या स्नेह दृष्टि न रहना । बेमुरौवती आ जाना; जैसे— जबसे वे हम लोगों के बीच से गए, तबसे तो उनकी आँखे ही फिर गई ।—(२) चित्त में विरोध उत्पन्न हो जाना । मन में बुराई आना । चित्त में प्रतिकूलता आना; जैसे,—उसकी आँखे फिर गई वह बुराई करने से नहीं चूकेगा । आँख फूटना = (१) आँख का जाता रहना । आँख की ज्योति का नष्ट होना । (२) आँख रहते कुछ दिखाई न पड़ना; जैसे— तुम्हारी क्या आँखे फूटी हैं, जो सामने की वस्तु नहीं दिखाई देती । (आँख एक बहुत प्यारी वस्तु है इसी से स्त्रियाँ प्राय? इस प्रकार की शपथ खाती हैं कि मेरी आँखे फूट जायँ, यदि मैंने ऐसा कहा हो) (३) बुरा लगना । कुढ़ना होना । उ०— (क) उसको देखने से हमारी आँखे फुटती हैं । (ख) किसी की सुखी देखकर तुम्हारी आँखें क्यों फटती हैं । आँख फेरना= (१) निगाह फेरना नजर बदलना । पहले की सी कृपा या स्नेहदृष्टि न रखना । मित्रत्रा तो़ड़ना । (२) विरुद्ध होना । प्रतिकूल होना । वाम होना । (३) अनुकूल होना । कृपा करना । उ०—फेर दी आँख जी आया जैसे रसाल बौराया ।—गीतगुंज, पृ. ४० । आँखफैलाना = आश्वर्य से स्तब्ध होना । आश्चर्यचकित होना । आँख फैलाना = दृष्टि फैलाना । दीठ पसारना । दूर तक देखना । नजर दौड़ाना । आँखफोड़ना = (१) आँखों को नष्ट करना । आँखों की ज्योंति का नाश करना । (२) कोई काम ऐसा करना जिसमें आँखों पर जोर पड़े । कोई ऐसा काम करना, जिसमें देर तक दृष्टि गड़ानी पड़े; जैसे लिखना पढ़ना, सीना, पिरोना; जैसे-(क) घंटों बैठकर आँखें फोड़ी है, तब इतना सीया गया है (ख) घंटों चूल्हे के आगे बैठकर आँखें फोड़ी हैं तब रसोई बनी है । आँख फोरना= दे० 'आँख फोड़ना' । उ०—सुरपति सुत जानै बल थोरा । राखा जियत आँखि गहि फोरा ।—मानस, ३ । ३५ । आँख बंद करके कोई काम करना, आँखमूँद कर कोई काम करना = (१) बिना पूछे पाछे कोई काम करना । बिना जाँच परताल किए कोई काम करना । बिना कुछ सोचे विचारे कोई काम करना । बिना आगा पीछा किए कोई काम करना; जैसे— (क) आँख मूँदकर दवा पी जाओ । (ख) जितना रुपया वे माँगते गए हम उनको आँख बंद करके देते गए । (२) दूसरी बातों की ओर ध्यान न देकर अपना काम करना । और बातों की परवाह न करके अपना नियत कर्तव्य करना । किसी के कुछ कहने—सुनने की परवाह न करके अपना काम करना; जैसे,—तुम आँख मूँदकर अपना काम किए चलो, लोगों को बकने दो । आँख बंद होना = (१) आँख भपकना । पलक गिरना; जैसे—कहो तो वह पाँच मिनट तक ताकता रह जाय, आँख बंद न करे । (२) मृत्यु होना । मरण होना; जैसे,—जिस दिन इसके बाप की आँखें बंद होंगी, यह अन्न को तरसेगा । आँख बचाकर कोई काम करना = इस रीति से कोई काम करना कि दूसरे न देख पाएँ । छिपाकर कोई काम करना; जैसे; —बुराई भी करते तो जरा आँख बचाकर । आँख बचाना = नजर बचाना । सामना न करना । कतराना; जैसे,—रुपया लेने को ले किया, अब आँख बचाते फिरते हो । आँख बचे का चाँटा = लड़कों का एक खेल जिसमें यह बाजी लगती है कि जिसे असावधान देखें, उसे चाँटा लगावें । आँख बदल जाना = पहले की सी कृपादृष्टि या स्नेहदृष्टि न रह जाना । पहले का सा व्यवहार न रह जाना नजर बदल जाना । मिजाज बदल जाना । बतवि में रूखापन आ जाना; जैसे, —(क) अब उनकी आँखे बदल गई हैं, क्यों हम लोगों की कोईबात सुनेंगे ।—(ख) गौं निकल गई, आँख बदल गई ।—(शब्द०) । (२) आकृति पर क्रोध दिखाई देना । क्रोध की दृष्ट़ि होना । रिस चढ़ना; जैसे,—थोड़े ही में उनकी आँखे बदल जाती हैं । आँख बनवाना = आँख का जाला कटवाना = आँख का माड़ा निकलवाला । आँख की चिकित्सा करना; जैसे, —जरा आँखबनवा आओ तो कपड़ा खरीदाना । आँख बराबर करना= (१) आँख मिलाना । सामने ताकना; जैसे,—वह चोर लड़का अब मिलने पर आँख बराबर नहीं करता । (२) मुंह पर बातचीत करना । सामने डटकर बातचीत करना । ढिठाई करना; जैसे,—उसकी क्या हिम्मत है कि आँख बराबर कर सके । आँखबराबर होना=दृष्टि सामने होना । नजर से नजर मिलाना; जैसे,—जबसे उसने वह खोटा काम किया तबसे मिलने पर कभी उसकी आँख बराबर नहीं होती । आँख बहना=(१) आँसु बहाना । (२) आँख की बीनाई या रोशनी जाती रहना । आँख वहाना= आँसू बहाना । रोना । आँख बिगड़ना=(१) दृष्टि कम होना । नेत्र की ज्योंति घटना । आँख में पानी उतरना या जालाइत्यादि पड़ना । (२) आँख उलटना । आँख पथराना; जैसे,— उनकी आँखों बिगड़ गई हैं और बोली भी बंद हो गई है' । आखें बिछना = भव्य स्वागत-सत्कार होना । आँख बिछाना = प्रेम से स्वागत करना; जैसे,—वे यदि मेरे घर पर उतरे, तो मैं अपनी आँखों बिछाऊँ । (२) प्रेमपूर्वक प्रतीक्षा करना । बाट जोहना । टकटकी बाँधकर राह देखना, जैसे,—हम तो कब से आँख बिछाए बैठे हैं, वे आवें तो । आँख बैठना=(१) आँख का भीतर की ओर धँस जाना । चोट या रोग आँख का डेला गड़ जाना (२) आँख फूटना । आँख भर आना = आँख में आँसू आना । आँख भर देखना=खूब अच्छी तरह देखना । तृप्त होकर देखना । अघाकर देखना । इच्छा भर देखना । उ०—गाज् परै यहि लाज पै री अँखियाँ भरि देखन हू नहिं पाई ।—(शब्द०); जैसे,—तनिक वे यहाँ आ जाते, हम उन्हें आँखा भर देखा तो लेते । आँख भर लाना = आँसू भर लाना । आँखा डबडबाना । रोवाँसा हो जाना । आँख भैं ठेढ़ी करना = आँख दिखाना । क्रोध की दृष्टि से देखाना । तेवर बदलना; जैसे,—हमपर क्या आँखा भौं टेढ़ी करते हो, जिसने तुम्हारी जीज ली हो उसके पास जाओ । आँख मचकाना = (१) आँख खोलना और फिर बंद करना । पलकों को सिकोड़कर गिराना । (२) इशारा करना । सैन मारना, जैसे,— तुमने आँखा मचका दी, इसी से वह भड़क गया । आँखमलना= सोकर उठने पर आँखों को जल्दी खुलने के लिये हाथ से धीरे धीरे रगड़ना, जैसे,—इतना दिन चढ़ गया, तुम अभी चारपाई पर बैठै आँख मलते हो । आँख मारना = (१) इशारा करना । सनकारना । पलक मारना । आँख मटकाना (२) आँखा से निषेध करना । इशारे से मना करना, जैसे,—वह तो रुपये दे रहा था, पर उन्होंने आँख मार दी । आँख मिलना = साक्षात्कार होना । देखा देखी होना । नजर से नजर मिलना । आँख मिलाना = (१) आँख सामने करना । बराबर ताकना । नजर मिलाना । (२) सामने आना । संमुख होना । मुँह दिखाना, जैसे,—अब इतनी बेईमानी करके वह हमसे क्या आँख मिलावेगा । आँख मुँदना = आँखा बंद होना । आँख मूँदना = (१) आँख बंद करना । पलक गिराना । (२) मरना, जैसे—सब कुछ उनके दम तक है, जिस दिन वे आँख मूँदेंगे, सब जहाँ का तहाँ हो जायगा । (३) ध्यान न देना, जैसे,—उन्हें जो जी में आवे करने दो, तुम आँखा मूँद लो, उ०—मँदे आँखि कतहुँ कोउ नाहीं ।—मानस, १ ।२८० । आँखों में = दृष्टि में । नजर में । परख में । अनुमान में; जैसे,—(क) हमारी आखों में तो इसका दाम अधिक है । (ख) हमारी आँखों में यह जँव गई है । आँख में आँख डालना = (१) आँखा से आँख मिलाना । बराबर ताकना । (२) ढिठाई से साकता, जैसे- बैठा आँखा में आँख डालता है, अपना काम नहीं देखता । आँख में काजल घुलना = काजल का आँख में खूब लगना ।आँख में खटकना = नजरों में बुरा लगना । अच्छा न लगना, जैसे—उनका रहना हमारी आँखों में खटक रहा । है । आँखों मै खून उतरना = क्रोध से आँख लाल होना । रिस चढ़ना । आँख में गड़ना = (१) आँख में खटकना । बुरा लगना । (२) मन मे बसना । जँवना । पसंद आना । ध्यान पर चढना; जैसे,— वह वस्तु तो तुम्हारी आँख मे गड़ी हुई है । उ०—जाहु भले हौ, कान्ह, दान अँग अँग तो माँगत । हमारो यौवन रूप आँख इनके गड़ी लागत ।—सूर (शब्द०) । किसी की आँखो में घर करना =(१) आँख में बसना । हृदय में समाना । ध्यान पर चढना । (२) किसी को मोहना या मोहित करना; जैसे—पहली ही भेंट में उसने राजा की आँखो में घर कर लिया । आँखो में चढना = नजर में जँवना । पसंद आना । आँखो में चरबी छाना =(१) घमंड, बेपरवाही या असावधानी से सामने की चीज न दिखाई देना । प्रमाद से किसी वस्तु की ओर ध्यान न जाना; जैसे,—देखते नहीं वह सामने किताब रखी है, आँखो में चरबी छाई है ?(२) मदांध होना । गर्व से किसी की ओर ध्यान न देना । अभिमान में चूर होना; जैसे,—आजकल उनकी आँखों में चरबी छाई है; क्यों किसी को पहचानेंगे । आँख में चुभना = (१) आँख मे धँसना । (२) आँख में खटकना । नजरों में बुरा लगना । (३) दृष्टि में जँचना । ध्यान पर चढना । पसंद आना; जैसे,—तुम्हारी घड़ी हमारी आँखो में चुभी हुई है; हम उसे बिना लिए न छोडेंगे । आँखो में चुभना = (१) नजर में खटकना । बुरा लगना । (२) आँखों में जँचना । पसंद आना । (३) आँखो पर गहरा प्रभाव डालना; जैसे,—इसके दुपट्टे का रंग तो आँखो में चुभा जाता है । आँख में चोभ आना = चोट आदि लगने से आँखो में ललाई आना । आँखो में झाँई पडना = आँखो का थक जाना । उ०—आँखडियाँ झाँई परीं, पंथ निहरि निहरि । जीभडियाँ छाला परयो, राम पुकारि पुकारि ।—कबीर (शब्द०) । आँखो में टेसू फूलना, आँखो में तीसी फूलना, आँखो में सरसों फूलना = चारों ओर एक ही रंग दिखाई पडना । जो बात जी मे समाई हुई है, उसी का चारों ओर दिखाई पडना । जो बात ध्यान में चढी है, चारों ओर वही सूझना ।(२) नशा होना । तरंग उठना; जैसे-भाँग पीते ही आँखो में सरसों फूलने लगी । (३) घमंड होना । गर्व से किसी को न देखना । आँखो में तकला या टेकुआ चुभाना = आँख फोड़ना । (स्त्रीयाँ जब किसी पर उसकी दृष्टि की वजह से बहुत कुपित होती हैं, तब कहती हैं कि 'जी चाहता है कि इसकी आँखो में टेकुआ चुभा दूँ) । आँखो में तरावट आना = आँखो में ठंढक आना । तबयीत का ताजी होना । आँखो में धूलदेना, आँखो में धूल डालना = सरासर धोखा देना । भ्रम में डालना, जैसे,—अभी तुम किताब ले गए हो, अबब हमारी आँखो में धूल डालते हो । उ०—(क) हरि की माया कोउ न जानै आँखि धूरि सी दीन्हीं । लाल ढीगनि की सारी ताको पीत उढनीयाँ कीनी ।— सूर (शब्द०) । (ख) सोई अब अमृत पिवति है मुरली, सबहिनि के सिर नाँखि । लियौ छँडाइ सकल सुनि सूरज बैनु धूरि दै आँखि ।—सूर (शब्द०) । आँखो में नाचना = दे० आँखो में फिरना । आँखो में नून देना = आँख फोडना । आँखों में नून राई = आँखे फूटें । (स्त्रीयाँ उन लोगों के लीये कहतीहैं जो उनके बच्चों को नजर लगाते हैं । किसी बच्चे कौ नजर लगने का संदेह होने पर वे उसका नाम लेकर और बच्चे के चारों और राई नमक घुमाकर आँखो में छोडती हैं) । आँखो में पालन = बडे सुख चैन से पालना । बड़े लाड प्यार से पालन पोषण करना, जैसे,—जो लड़के आँखो में पाले गए, उनकी यह दशा हो रही है । आँखो में फिरना = ध्यान पर चढना । स्मृति में बना रहना, जैसे,—उसकी सूरत मेरी आँखों के सामने फिर रही है । आँखो में बसना = ध्यान पर चढना । हृदय में समाना । किसी वस्तु का इतना प्रिय लगना कि उसका ध्यान हर समय चित्त में बना रहे, जैसे-उसकी मूर्ति तुम्हारी आँखों में बस गई है । आँखों में बैठना = (१) नजर में गड़ना । पसंद आना । (२) आँखों पर गहरा प्रभाव डालना । आँखों में धँसना (चटकीले रंग के विषय में प्रायः कहते हैं कि 'इस कपडे का रंग तो आँखों में बैठा जाता है ।') । आँखों में भंग घुटना = आँखों पर भाँग का खूब नशा छाना । गहागड्ड नशा होना । आँखों में रहना = (१)लाड़ प्यार से रखना । प्रेम से रखना । सुख से रखना; जैसे,—आप निश्चिंत रहिए मैं इस लडके को आँखो में रखूँगा । उ०—आँखिन में सखि राखिबे जोग इन्है किमि कै बन- वास दियो है ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १६६ । (२) सावधानी से रखना । यत्न और रक्षापूर्वक रखना । हिफाजत से रखना । जैसे, —मैं इस चीज को आँखों में रखूँगा, कहीं इधर उधर न होने पाएगी । आँखों में रात कटना = किसी कष्ट, चिंता या व्यग्रता से सारी रात जागते बीतना । सारी रात नींद न पडना । वियोग में तड़पना । आँखों में रात काटना= किसी कष्ट, चिंता या व्यग्रता के कारण जागकर रात बिताना । किसी कष्ट, चिंता या व्यग्रता के कारण रात भऱ जागना; जैसे,—बच्चे की बीमारी से कल आँखों में रात काटी । आँखों में शील होना = चिंता में कोपलता होना । दिल में मुरौवत होना; जैसे,—उसकी आँखों में शील नहीं है, जैसे होगा, वैसे अपना रुपया लेगा । आँखों में समाना = हृदय में बसना । ध्यान पर चढ़ना । चित में स्मरण बना रहना; जैसे,—दमंयती की आँखों में तो नल समाए थे; उसने सभा में और किसी राजा की ओर देखा तक नहीं । आँख मोडना = दे० 'आँख फेरना' । आँख रखना = (१) नजर रखना । चौकसी करना; जैसे,—देखना, इस लड़के पर भी आँख रखना कहीं भागने न पावे ।—(२) चाह रखना । इच्छा रखना; जैसे,—हम भी उस वस्तु पर आँख रखते हैं । (३) आसरा रखना । भलाई की आशा रखना; जैसे,—उस कठोरहृदय से कोई क्या आँख रखे । आँख लगना = नींद लगना । झाकी आना । सोना । उ०—जब जब वै सुधि कीजियै, तब तब सब सुधि जाँहि । आँखनु आँखि लगी रहे, आँखै लागति नाँहि ।— बिहारी र०, दो० ६२; जैसे,—आँख लगती ही थी कि तुमने जगा दिया । (२) प्रीति होना । दिल लगाना । उ०— (क) धार लगै तरवार लगै पर काहु से काहु की आँख लगै ना ।—(शब्द०) । (ख) ना खिन टरत टारे, आँखि न लगत पल, आँखिन लगैरी श्यामसुंदर सलोने से ।—देव (शब्द०) । (३) टकटकी लगना । दृष्टि लगना; जैसे,—हमारी आँखें उसी ओर तो लगी है; पर वे कहीं आते दिखाई नहीं देते । उ०—पलक आँख तेहि मारग, लागी दुनहु रहहिं । कोउ न संदेशी आवही, तेहिक सँदेस कहाहिं ।—जायसी (शब्द०) । आँखों लगना = आँखो में लगना । ऊपर पड़ना । ऊपर आना । शरीर पर बीतना । उ०—झरज रज लागे मोरी अँखियनि रोग दोष जंजाल । -सूर०, १० । १३८ । आँख लगाना = (१) टकटकी बाँधकर देखना । प्रीति लगाना । नेह जोड़ना । आँख लगी =(१) जिससे आँख लगी हो । प्रेमिका । (२) सुरैतीन । उढरी । आँख लड़ना = (१) देखा देखी होना । आँख मिलना । घुराघुरी होना । नजर- बाजी होना । (२) प्रेम होना । प्रीति होना; जैसे,—अब तो आँखे लड़ गई हैं; जो होना होगा सो होगा । आँख लडाना = आँख मिलाना । घूरना । नजरबाजी करना । (लडकों का यह एक खेल भी है जिसमें एक दूसरे को टकटकी बाँधकर ताकते हैं । जिसकी पलक गिर जाती है, उसकी हार मानी जाती है) । आँख ललचाना = देखने की प्रबल इच्छा होना । आँख लाल करना = आँख दिखाना । क्रोध का दृष्टी से देखना । क्रोध करना । आँख वाला = (१) जिसे आँख हो । जो देख सकता हो; जैसे,—भाई, हम अंधे सही; तुम तो आँखवाले हो देखकर चलो । (२) परखवाला । पहचाननेवाला । जानकार । चतुर; जैसे,—तुम तो आँखेवाले हो तुम्हे कोई क्या ठगेगा । आँख सामने न करना = सामने न ताकना । नजर न मिलाना । दृष्टी बराबर न करना (लज्जा और भय से प्रायः ऐसा होता है ।); जैसे— जब से उसने मेरी पुस्तक चुराई कभी आँख सामने न की । (२) सामने ताकने या वाद प्रतिवाद करने का साहस न करना । मुँह पर बातचीत करने की हिम्मत न करना; जैसे,—भला उसकी मजाल है कि आँख सामने कर सके । आँख सामने न होना = लज्जा से दृष्टि बराबर न होना । शर्म से नजर न मिलना; जैसे,—उस दिन से फिर उसकी आँख सामने न हुई । आँखों सुख कलेजे ठंढक = पुरी प्रसन्नता । एन खुशी । (जब किसी बात को लोग प्रसन्नतापूर्वक स्वीकृत करते हैं तब यह वाक्य बोलते हैं ।) आँख सेंकना = (१) दर्शन का सुख उठाना । नेत्रानंद लेना । (२) सुंदर रूप देखना । नज्जारा करना । उ०—जरा आँखे सेक आइए, भैरवी उड़ रही होगी—रसीली नयनोंवालियों ने फंदा मारा ।— फिसाना०, भा०,१, पृ०३ । आँख से आँख मिलाना =(१) सामने ताकना । दृष्टि बराबर करना । (२) नजर लड़ाना । आँखों से उतरना = नजरों से गिरना । दृष्टि में नीचा ठहरना; जैसे—वह अपनी इन्हीं चालों से सबकी आँखों से उतर गया । आँखों से उतारना या उतार देना = (१) किसी वस्तु या व्यक्ति को जानबुझकर भुला देना । (२) किसी वस्तु या व्यक्ती का मूल्य कम कर देना । आँखों से ओझल होना = नजर से गायब होना । सामने से दूर होना । आँखों से काम करना = इशारों से काम निकालना । आँखों से कोई काम करना = बहुत प्रेम और भक्ति से कोई काम करना; जैसे,—तुम मुझे कोई काम बतलाओ तो, मैं आँखों से करने के लीये तैयार हुँ । आँखों से गिरना = नजरों से गिरना । दृष्टि में तुच्छ ठहरना, जैसे,— अपनी इसी चाल से तुम सबकी आँखो से गिर गए । आँखसे भी न देखना = ध्यान भी न देना । तुच्छ समझना; जैसे,— उससे बातचीत करने की कौन कहे मैं तो उसे आँखों से भी न देखूँ । आँखों से लगाकर रखना = बहुत प्रिय करके रखना । बहुत आदर-सत्कार से रखना । आँखो से लगाना = प्यार करना । प्रेम से लेना; जैसे,—उसने अपनी प्रिया के पत्र को आँखों से लगा लिया । आँख होना = परख होना । पहचान होना । शिनाख्त होना । जैसे,—तुम्हे कुछ आँख भी है कि चीजों का दाम ही लगाना जानते हो ।(२) नजर गड़ाना । इच्छा होना । चाह होना, जैसे,—उस तसवीर पर हमारी बहुत दिनों से आँख है । (३) ज्ञान होना । विवेक होना । उ०—देखों राम कैसो कहि कदै किए. किए हिये, हूजिये कृपाल हनुमान जू दयाल हौ । ताही समै फैलि गए कोटि कोटि कपि नए लौचैं तनु खैचैं चीर भयो यों विहाल हो । भई तब आँखें दुख सागर को चाखैं, अब वही हमें राखैं भाखें वारों धन माल हो । । —प्रिया० (शब्द०) ।

आँख (२)
संज्ञा पुं० [सं० अक्षि, प्रा० अक्खि पं० अंक्ख] आँखों के आकार का छेद या चिह्न, जैसे,—(१) प्रालू के उपर के नखाक्षत के समान दाग । (२) ईख की गाँठ पर की ठोंठी जिसमें से पत्तियोँ निकलती हैं । (३) अनन्नास के उपर के चिह्न या दाग । (४) सूई का छेद ।

आँखड़ी †
संज्ञा पुं० [ हिं० आँख + डी(प्रत्य०)] आँख । उ०—(क) आँखडियाँ झाँई परी पंथ निहारि निहारि, जीभडियाँ छाला परयो, राम पुकारि पुकारि । —कबीर (शब्द०) । (ख) मुझे पुकारे ताना मारे, भर आएँ आँखडियाँ ।—ठंडा०, पृ०२० ।

आँखफोडटिड्डा (१)
संज्ञा पुं० [सं० आक=मदार + हिं० फोड़ना] हरे रंग का एक कीडा या फतिंगा जो प्रायः मदार के पेड़ पर रहता और उसकी पत्तीयाँ खाता है । होता तो है यह उँगली के ही बराबर, पर इसकी मुँछे बडी लंबी होती हैं ।

आँखफोड़टिड्डा (२)
वि० [हिं० आँख + फोड + टिड्डा] कृतघ्न । बेमु- रौंवत । ईर्ष्यालु ।

आँखफोड़तोता
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आँखफोड़ टिड्डा' । उ०— किसलीये आँख यों बचाते हो, मैं नहीं आँखफोड तोता हूँ ।— चोखे०, पृ० ५० ।

आँखफोरवा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आँखफोड टिड्डा' । उ०—कठ- फोरवा आँखाफोरवा को आँख मुँद निगल जाता है । — प्रेमघन० भा० २, पृ०२१ ।

आँखमिचौनी
संज्ञा स्त्री [हिं० आँख + √ मीच + औनी (प्रत्य०)] दे० 'आँखमिचौली' । उ०—छाया की आँखमिचौनी मेघों का मतवालापन ।—यामा, पृ०१६ ।

आँखमिचौली
संज्ञा स्त्री [हिं०आँख+ √ मीच + औली प्रत्य०] लडकों का एक खेल । लडकों द्वारा आँख मूँदकर छिपने और खोजने का एक खेल । विशेष—इस खेल में एक लडका किसी दूसरे लड़के की आँख मूँदकर बैठता है । इस बीच और लड़के छिप जाते हैं । तब उस लडके की आँख खोल दी जाती हैं और वह लड़कों को छूने के लीये ढूँढता फिरता है । जिस लड़के को वह छू पाता है, वह चोर हो जाता है । यदि वह किसी लडके को नहीं छू पाता और सब लडके एक नियत स्थान को चूम लेते हैं, तो फिर वही लडका चोर बनाया जाता है । यदि सात बार वही लड़का चोर हुआ तो फिर उसकी टाँगे बाँधी जाती है और उसके चारों और एक कुंडल या गोंडले खींच दीया जाता है । लडके बारी बारी से उस गोड़ले के भीतर पैर रखते हैं और उस लड़के को 'बुढ़िया' 'बुढ़िया' कहकर चिढ़ाकर भागते हैं । यह चोर या बुढ़िया बना हुआ लड़का मंडल के भीतर जिसको छू पाता है, वह चोर हो जाता है ।

आँखमिहीचनी पु †
संज्ञा स्त्री० [ हिं० आँख + मिहीचनी = मीचना] दे० 'आँखमिचौली' । उ०—आँखमिहीचनी खेलत मोंहिं दुहू बिधि सोध कहूँ नटि जाई न । —देव ग्र०, पृ० ११ ।

आँखमीचली पु †
संज्ञा स्त्री [हिं० आँख + √ मीच + ली (प्रत्य०) ] दे० 'आँखमिचौली' । उ०—कहुँ खेलत मिलि ग्वाल मंडली आँकमीचली खेल । चढ़ीचढ़ा को खेल सखन में खेलत हैं रस रेल । —सूर (शब्द०) ।

आँखमुचाई, आँखमुँदाई
संज्ञा स्त्री [हिं० आँख + √ मीच + आई (प्रत्य०) तथा आँख+ √ मूद + आई प्रत्य०] दे० 'आँखमिचौली' ।

आँखा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आखा' ।

आँखि पु
संज्ञा स्त्री [हिं०] दे० 'आँख' । उ०—सो वह आँखि मींड़ि मीड़ि कै फिर फिरि कै देखने लाग्यो । —दो सौ बावन, भा० २, पृ०९ ।

आँखी पु †
संज्ञा स्त्री [हिं०] दे० 'आँख' । ड०—आँखी मद्धे पाखी चमकै पाँखी मद्धे द्वारा ।—कबीर श०, भा० १, पृ० ५५ ।

आँग पु †
संज्ञा पुं० [सं० अङ्ग] १. अंग । उ०—(क) बानिनि चली सेंदुर दिये माँगा । कयथिनि चली समाइ न आँगा । जायसी ग्रं०, पृ०८१ । (ख) कहि पठई जियभावती, पिय आवन की बात । फूली आँगन मैं फिरै, आँग न आँग समाप्त ।—बिहारी र०, दो० २५४ । २. कुच । स्तन । उ०—कहै पदमाकर क्यों आँग न समात आँगी लागी काह तोहि जागी उर में उचाई है ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० ८४ । ३. चराई जो प्रति चौपाये पर ली जाती है ।

आँगन
संज्ञा पुं० [सं० अङ्गण] घर के भीतर का सहन । घर के भीतर का वह चौखूटा स्थान जिसके चारों ओर कोठरियाँ और बरामद हों । चौक । अजिर । उ०—आँगन खेलैं नंद के नंदा । —सूर०, १० । ११७ ।

आँगल पु †
संज्ञा स्त्री० [ सं० अर्गल ] अगरी । अर्गला । उ०—तब वा बाई ने किवाड़ दै कै आँगल मारि दई । —दो सौ बावन०, भा० १, पृ० ३४१ ।

आँगी पु †
संज्ञा स्त्री० [सं०अङिगका० प्रा० अंगिआ] अँगिया । उ०—उठि आपुही आसन दै रसख्याल सों लाल सो आँगी कढ़ावति है । —भिखारी ग्रं०, भा०२, पृ० १७४ ।

आँगी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'आँधी' ।

आँगुर पु
संज्ञा पुं० [हिं०] पुं० 'अंगुल' । उ०—द्वादस आँगुर पवन चलतु है नाहिं सिमटि घर औना ।-जग० बानी, भा० २, पृ०९५ ।

आँगुरी पु
संज्ञा स्त्री [ सं० अङ्गुली ] उँगली । उ०—गयी अचानक अगुरी छाती छैलु छूवाइ ।—बिहारी र०, दो० ३८६ ।मुहा०—आँगुरी फोरना= ऊँगलीयाँ चटकाना । उ०—बिमल अँगोछी पोंछि भूषन सुधारि सिर आँगुरिन फोरि त्रिन तोरि तोरि डारती ।—भिखारी० ग्रं०, भा० २ पृ०१५७ ।

आँच
संज्ञा स्त्री [सं० अर्चि=आग की लपट, पा० अच्चि] १. गरमी । ताप; जैसे,— (क) आग और दूर हटा दो, आँच लगती है । (ख) कोयले की आँच पर भोजन अच्छा पकता है । उ०—धौरी धेनु दुहाइ छानि पय मधुर आँचि में औटि सिरायौ ।—सूर०, १० ।१६०० । क्रि० प्र०—आना ।— पहुँचना ।— लगना । २. आग की लपट । लौ; जैसे,—चूल्हे में और आँच कर दो, तवे तक तो आँच पहुँचती ही नहीं । क्रि० प्र०—करना ।— फैलना ।— लगना । ३. आग । अग्नी; जैसे—(क) आँच जला दो । (ख) जाऔ थोडी सी आँच लाओ । मुहा०—आँच खाना । गरमी पाना । आग पर चढना । जैसे,— यह बरतन आँच खाते ही फूट जाएगा । आँच दिखाना=आग के सामने रखकर गरम करना; जैसे, —जरा आँच दिखा दो तो बरतन का सब घी निकल आवे । ४. ताव । जैसे,—अभी इस रस में एक आँच की कसर है ।(ख) उसके पास सौआँच का अभ्रक है । मुहा०—आँच खाना=ताव खाना । आवश्यकता से अधिक पकना । जैसे,—दूध आँच खा गया है, इससे कुछ कडुआ मालूम पडता है । ५. तेज । प्रताप । जैसे,—तलवार की आँच । ६. आघात । चोट । ७. हानि । अहित । अनिष्ट । जैसे,—(क) तुम निंश्चिंत रहो, तुमपर किसी प्रकार की आँच न आवेगी ।— (ख) साँच को आँच क्या । उ०—निहचिंत होइ के हरि भजै मन में राखै साँच । इ पाँचन को बस करै,ताहि न आवै आँच ।—कबीर (शब्द०) । क्रि० प्र०—आता ।— पहुँचना । ८. विपत्ति । संकट । आफत । संताप । जैसे,—इस आँच से नीकल आवें तो कहों । उ०— आए नर चारि पाँच, जानी प्रभु आँच, गडि लीयो सो दिखायो आँच, चलै भक्त भाइ कै । —प्रिया०(शब्द०) । ९. प्रेम । मुहब्बत । जैसे,—माता की आँच बड़ी होती है । १०. काम । ताप ।

आँचका
संज्ञा पुं० [देश०] वह लटकता हुआ रस्सा जिसके छोर पर के छल्ले में से होकर वह रस्सा जाता है जिसपर खडे़ होकर खलासी जहाज का पाल खोलते और लपेटते हैं ।

आँचना (१) पु
क्रि० स० [हिं० आँच] जलाना । तापना । उ०— कोप कृसानु गुमान अँवा घट जो जिनके मन आँच न आँचै । तुलसी ग्रं०, पृ०२२६ ।

आँचना (२)पु
क्रि० सं० [ सं० अच्चत] प्रवृत्त होना । गतिशील होना । उ०—मुद्रा खोलि गोबिंद चंद जब बाचन आँचे । परम प्रेम रस साँचे अच्छर न परत बाँचे ।—नंद० ग्रं०, पृ०२०४ ।

आँचना (३) †
क्रि० सं० [हिं०] दे० 'आँचवना' । उ०—नाचो है रुद्रताल, आँचो जग ऋजु अराल । —आराधना,पृ०५५ ।

आँचर पु
संज्ञा पुं० [ हिं०] दे० 'आँचल' । उ०—पौंह ऊँवै, आँचरु उलटि, मोरि, मुहुँ मोरि मोरि० नीठि नीठि भीतर गई, दीठि दीठि सौं जोरि ।—बिहारी र०, दो०२४२ ।

आँचल
संज्ञा पुं० [ सं० अच्चल] १. धोती, दुपट्टा आदि बिना सिले हुए वस्त्रों के दोनों छोरों पर का भाग । पल्ला । छोर । उ०— पिअर उपरना काखा सोती । दुहुँ आँचरन्हि लगे मनि मोति । मानस, १ ।३२६ । २. साधुओं का अँचला । ३. स्त्रियों की साडी या ओढनी का वह छोर या भाग जो सामने छाती पर रहता है । उ०—वह मग में रुक, मानो कुछ झुक आँचल सभाँरती फेर नयन । —ग्राम्या,पृ० १७ । मुहा०—आँचल डालना = मुसलमान लोगों में विवाह की एक रीति । (जब दुल्हा दुलहिन के घर जाने लगता है, तब उसकी बहन दरवाजे से उसके सिर पर आँचल डालकर उसकी घऱ में ले जाती है । इसका नेग बहन को मीलता है) । आँचल = दबाना = दुध पीना । स्तन मुँह में डालना । जैसे,—बच्चे ने आज दिन भर से आँचल मुंह में नहीं दबाया । आँचल देना = (१) बच्चे को दुध पिलाना (स्त्री०) । जैसे, बच्चे को किसी के सामने आँचल मत दीया करो ।— (२) विवाह की एक रीति । (जब बारात वर के यहाँ से चलने लगती है, तब दजुल्हे की माँ फउसके उपर आँचल डालती है और उसे काजल लगाती है । इस रीति को आँचल देना कहते हैं ।) ३. आँचल से हवा करना (स्त्री०) । जैसे—(क) दीए को आँचल दे दो; व्यर्थ जल रहा है । (ख) थोडा आंचल दे दो तो आग सुलग जाय । आँचल पडना = आँचल छु जाना । जैसे,—देखो, बच्चे पर आँचल न पड जाय । (स्त्रीयाँ बच्चे पर आँचल पडना बुरा समझती हैं और कहती हैं कि इससे बच्चों की देह फुल जाती है) । आँचल फाडना = बच्चे की जीने के लीये टोटका करना । (जिस स्त्री के बच्चे नहीं या बाँझ होती है, वह किसी बच्चेवाला स्त्री का आँचल घात पाकर कतर लेती है, और उसे जलाकर खा जाता है । स्त्रीयों का विश्वास है कि ऐसा करने से जिसका आँचल कतरा जाता है, उसके बच्चे तो मर जाते हैं और जो आँचल कतरती हैं, उसके बच्चे जीने लगते हैं) । आँचल में बाँधना = (१) हर समय साथ रखना । प्रतिक्षण पास रखना । जैसे,—वह किताब क्या हम आँचल में बाँधे फिरते हैं; जो इस वक्त माँग रहे हो । (२) कपडे के छोर में इस अभीप्राय से गाँठ देना कि उसे देखने से वक्त पर कोई बात याद आ जाय । जैसे,—तुम बहुत भुलते हो, आँचल में बाँध रखो । आँचल में बात बाँधना = (१) किसी कही हुई बात को अच्छी तरह स्मरण रखना । कभीं न भुलना । जैसे,—कीसी के झगडे में पडना बुरा है यह बात आँचल में बाँध रखो । (२) दृढ निश्चय करना । पुरा विश्वास रखना । जैसे,—इस बात को आँचल में बाँध रखो कि उन लोगों में अवश्य खटपट होगी । आँचल में सात बातें बाँधना = टोटका करना । जादु करना । आँचल लेना = (१) किसी स्त्री का अपने यहाँ आई हुई दुसरी स्त्री का आँचल छुकर सत्कार या अभिवादन करना । (२) किसी स्त्री का अपने से बडी स्त्री का आँचल से पैर छुना । पाँव छुना । पाँव पडना । जैसे—जीज, बुआ आई है; उठकर आँचल ले । आँचल सँभालना= आँचल ठीक करना । शरीर को अच्छी तरह ढकना । उ०— फुलवा बिनत डार डार गोविन के संग कुमार चंद्रबदन चमकत वृषमानु की लली । हे हे चंचल कुमारि अपनो आँचल सँभार आवत बृजराज आज बिनन को कली । (शब्द०) ।

आ चलपल्लु
संज्ञा पुं० [ हिं आँचल+पल्ला] कपडे के एक छोर पर टँका हुआ चौडा ठप्पेदार पट्टा ।

आँचु
संज्ञा पुं० [ देश.] एक कँटीली झाडी जिसमें शरीफे के आकार के छोटे छोटे फल लगते हैं ।इन फलों में मीठे रस से भरे दाने रहते हैं ।

आँजन
संज्ञा पुं० [ सं० अज्जन ] दे० 'अंजन' ।

आँजना
क्रि० स० [सं० अज्जन] अंजन लगाना । उ०—(क) ललना गन जब जेहि धरहि धाइ । लोचन आँजहि फगुआ मनाइ । तुलसी (शब्द०) । (ख) रुप ही अनुप हीजु आँजे माँजे न्हाए झाएँ, भुषन बनाए बीरा बीरा खाए जानिबी ।-गंग ग्र०, पृ० ३३ । २. बिलंब करना । जैसे, आँ जो मत, काम चटपट कर डालो ।

आँट
संज्ञा पुं० [हिं अंटी] १. हथेली में तर्जनी और अँगुठे के बीच का स्थान । विशेष—इसमें कभी कभी जुआरी लोग कौडी छुपा लेते हैं । २. दाँव । वश । उ०—नए बीससियहि लखि नए दुरजन दुपह- सुभाइ । आँटे परि प्राननु हरत काँटैं जौं लगि पाई । बिहारी र०, दो० ३११ । मुहा०—आँट पर चढना = दाँव पर चढना । उ०—जहाँ तक हो आँट पर न चढो । —चोटी०,पृ०१४४ । ३. बैर । लागडाँट । ४. गिरह । गाँठ । जैसे-धोती की आँट में रुपया रख लो । ५. पुला । गट्ठा । पेंच । यौ०—आँट साँट ।

आँटना पु
क्रि० अ० [हिं० अटना] १. समाना । अँटना । अमाना । २. पुरा पडना । काफी होना । उ०—अगलही कह पानी गहि बाँटा । पीछलहि कहँ नहिँ काँदु आँटा । जायसी (शब्द०) । ३. आना । मिलना । उ०—(कोइ) फुल पाव, कोई पाती, जेहि के हाथ जो आँट । जायसी ग्रं०, पृ० ८२ । ४. पहुँचना । उ०— मच्छ छुवहिं आवहिं गडि काँटी । जहाँ कमल तहँ हाथ न आँटी ।—जायसी (शब्द०) ।

आँटी
संज्ञा स्त्री [सं० अण्ड] १. लंबे तृणों का छोटा गट्ठा । पुला । २. लडकों के खेलने की गुल्ली । उ०—दियो जनाय वात सो हरी स्वरुप बालके । गोविंद स्वामी संग आँटि दंड खेल हालके ।—रघुराज० (शब्द०) । ३. कुश्ती का एक पेंच जिसमें विपक्षो की टाँग में टाँग अडाते हैं और उसे कमर पर लादकर गिराते और चित करते हैं । क्रि० प्र०—मारना । ४. सुत का लच्छा । ५. धोती की गिरह । टेंट । मुर्रा । उ०— आपकी आँटी निकसी नाहीं तो करज बहुत सिर लीन्हा । कबीर ग्रं०,पृ० १० । क्रि० प्र०—देना । लगाना । मुहा०—आँटी काटना = गिरह काटना । जेब काटना ।

आँटसाँट
संज्ञा स्त्री० [ हिं० आँट+सटना] १. गुप्त अभिसंधि । साजिश । २. मेलजोल ।

आँठी
संज्ञा स्त्री [ सं० अष्टि, प्रा अट्ठि] १. दही, मलाई आदि वस्तुओं का लच्छा । थक्का । जैसे—उनके मुँह से कफ की सुखी आँठी गिरती है । २. गिरह । गाँठ । ३. गुठली । बीज । ४. नवोढा के उठते हुए स्तन ।

आँड़ †
संज्ञा पुं० [सं० अण्ड] अंडकोश ।

आँडी
संज्ञा स्त्री [ सं० अण्ड] १. अँटी । गाँठ । कंद । उ०—सेंधा लोन पर सब हाँडी । काटी कंद मुर कै आँडी । —जायसी ग्रं० पृ० २४५ । २. कोल्हु की जाट का गोला, सिरा वा मुँड । ३. बैलगाडी के पहिए के छेद के चारों और जडी हुई लोहे की सामी । बंद ।

आँडु
विं [सं० अण्ड=अण्डकोश] जिस (चौपाए) के अंडकोश न कुचे गए हों । अंडकोशयुक्त । विशेष—यह शब्द विशेष कर बैल के लीय़े ही प्रयुक्त होता है ।

आँडेबाँडे खाना
क्रि० अ० [ हिं अंडबंड अथवा डाँड=मेंड+ बाँध] इधर उधर फिरना । इधर उधर हवा खाना । चक्कर खाना । विशेष—फुल बुझौगल के खेल में जब लडकों के दल बँध जाते है और दोनों दलों के महंतों को आपस में किसी फुल को निश्चित करना होता है, तब वे अपने अपने दल के लडकों को यह कहकर इधर उधर हटा देते हैं कि 'आँडेबाँडे खाओ' । लडके 'आँडे बाँडे' कहते हुए इधर उधर चले जाते हैं और फिर फुल बुझने के लिय़े आते हैं ।

आँत
संज्ञा स्त्री [ सं० अन्न] प्राणीयो के पेड के भीतर वह लंबी नली जो गुदा मार्ग तक रहती है । विशेष—खाया हुआ पदार्थ पेट में कुछ पचकर फिर इस नली में जाता है जहाँ से रस तो अंग प्रत्यंग में पहुँचाया जाता है और मल या रद्धी पदार्थ बाहर निकला जाता है । मनुष्य की आँत उसके डील से पाँच या छ?गुनी लंबी होती है । मांसभक्षी जीवों की आँत शाकाहारियों से छोटी होती है । इसका कारण शायद यह है की माँस जल्दी पचता है । मुहा०—आँत उतरना—एक रोग जिसमें आँत ढीला होकर नाभि के नीचे उतर आती है और अँडकोश में पीडा उत्पन्न होती है । आँत का बल खुलना—पेट भरना । भोजन से तृप्त होना । बहुत देर तक भुखे रहने के उपरांत भोजन मिलना । जैसे,— आज कई दिनों के पीछे आँतो का बल खुला है । आँतो का बल खुलवाना-पेट भर खीलाना । आँते अकुलाना, कुल- कुलाना, कुलबुलाना-भुख के मारे बुरी दशा होना । आँते गले में आना—नाको दम होना । जँजाल में फँसना । तंग होना । जैसे,—इस काम को अपने उपर लेते तो हो, पर आँते गले में आँवेंगी । आँते मुँह में आना—दे० 'आँते गले में आना' । आँतो में बल पडना—पेट में बल पडना । पेट एंठना । जैसे,—हँसते हँसते आँतो में बल पडने लगा । आँते समेटना- भुख सहना । जैसे,—रात भर आँतें समेटे बैठे रहे । आँतेसुखना=भुख के मारे बुरी दशा होना । जैसे,—कल से कुछ खाया पीया नहीं है ; आँतें सुख रही हैं ।

आँतकट्टु
संज्ञा पुं० [हिं० आँत+कटना] चौपायों का एक रोग जिसमें उन्हे दस्त होता है ।

आँतर † (१)
संज्ञा पुं० [सं० अन्तर = भीतर] खेत का उतना भाग जितना एक बार जोतने के लिय़े घेर लिया जाता है ।

आँतर (२)
संज्ञा पुं० [सं० अन्तर=दो वस्तुओं के बीच का स्थान] १. पान के भीटे के भीतर की क्यारीयों के बीच का स्थान जो आने जाने के लिय़े रहता है । पासा । २. ताने में दोनों सिरों की खुँटियो के बीच को दो लडकियाँ जो थोडी थोडी दुर पर साँथी अलग करने के लिय़े गाडी जाती हैं (जुलाहे) । ३. भिन्नता । अंतर । उ०—जीव ब्रह्म आँतर नहिं कोय । एकै रुप सर्वघट होय ।—दरिया० बानी, पृ० १६ । ४. दुरी । फासला । उ०— आँतर जनु हो तोहार । तेंदुर का उर हार ।—विद्यापती, पृ०३३० ।

आँतरा पु
संज्ञा पुं० [हिं० आंतर] दे० 'अँतर' । उ०—साध स्वाँग में आँतरा जैसा दिवस और रात ।- दरिया० बानी,पृ०३५ ।

आँदू
संज्ञा पुं० [सं० अन्दु = बेडी] १. लोहे का कडा । बेडी । उ०— हुलै इतै पर मैन महावत लाज के आँदु परे जऊ पाइन । त्यों पदमाकर कौन कहों गति माते मतंगनी की दुखदाइन । — पद्माकर ग्रं०, पृ०१३० । २. बाँधने का सीकड । उ०—अँजन आँदु सौं भरे जधपि तुव गज नैन । तदपि चलावत रहत है झुकि झुकि चोटैं सैन । स० सप्तक,पृ०१९३ ।

आँध (१)
संज्ञा स्त्री [सं० अन्ध] १. अँधेरा । धुंध । २. रतौंधी ।३. आफत । कष्ट । जैसे,—तुम्हें वहाँ जाते क्यों आँध आती है । क्रि० प्र०—आना ।

आँध (२)पु (१)
वि० १. अंधा । नेत्रहीन । २. कामांध । मोहित ।उ०— संकर को मन हरयौ कामिनी, सेज छाडि भु सोयौ । चारु मोहिनी आइ आँध कियौ, तब नख तैं रोयौ ।—सूर०,१ ।४३ ।

आँधना पु
क्रि० अ० [हिं० आँधी] वेग से धावा करना । टुटना । उ०—भुसुंडिय और फुबंडिय साधि । परे दुहुँ ओरन ते भट आँधि । —(शब्द) ।

आँधर
वि० [सं० अन्ध, प्रा० अंधल] [ स्त्री आँधरी] अँधा । उ०— सूर कूर, आँधरौ, मैं द्वार परयौ गाऊँ । सूर०, १ ।१६६ । यौ०—आँधर अँधुआ = अँधा । उ०—माया के बँधुआ आँधर अँधुआ साधु जाने एह जाने एह बातें । सं० दरिया,पृ० १४१ ।

आँधरा पु †
वि० [सं० अन्ध, प्रा० अंधरअ] [ स्त्री०आँधरी ] अंधा ।

आँधारंभ पु
संज्ञा पुं० [हिं० आँधर=अंधा (मुर्ख) जैसा+आरम्भ] अँधेरखाता । बिना समझा बुझा आचरण । उ०—करता दीसै किरतन, उँचा करि करि दंभ । जानै बुझै कछू नहीं,यों ही आँधारंभ । —कबीर (शब्द०) ।

आँधी (१)
संज्ञा स्त्री [ सं० अन्ध=अँधेरा,अंधा करनेवाली] बडे वेग की हवा जिससे इतनी धुल उठे कि चारों और अँधेरा छा जाय । अंधड । अंधबाव । विशेष—भारतवर्ष में आँझधी का समय बसंत और ग्रीष्म है । त्रि० प्र०—आना ।— उठना ।— चलना । मुहा०— आँधी उठाना= हलचल मचाना । धूम धाम मचाना । आँधी के आम = (१) आँधी में आप गिरे हुए आम । (२) विना परिश्रम के मिली हुई चीज । बहुत सस्ती चीज । (३) थोड़े दिन रहनेवाली चीज ।

आँधी (२)
वि० आँधी तरह तेज । किसी चीज को झटपट करनेवाला । चालाक । चुस्त । जैसे, — काम करने में तो वह आँधी है । मुहा०— आँधी होना=बहुत तेज चलना ।

आँब पु †
संज्ञा पुं०[हिं०] दे० 'आम' । उ०— फले सोहाए मधुर फल, आँब गए झकझोरि ।— भिखारी० ग्रं०, पृ० १३६ ।

आँबा पु †
संज्ञा पुं०[हिं०] 'आम' । उ०— प्रौर यह वैष्णव आँबा लेन कौं बजार में गयो । सो वजार में कहूँ आँबा न मीले ।— दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ३४ ।

आँबाहल्दी
संज्ञा स्त्रीं० [हिं०] दे० 'आमाहल्दी' ।

आँयबाँय
संज्ञा पुं०[अनु.] अनापसनाप । अडंबडं । व्यर्थ की बात । असंबद्ध प्रलाप ।

आँव
संज्ञा पुं० [सं० आम= कच्चा] एक प्रकार का चिकना सफेद लसदार विकृत द्रव्य मल जो अन्न न पचने से होता है । क्रि० प्र०—गिरना ।—पड़ना ।

आँबठ †
[सं० ओष्ठ हिं० ओठ] १. किनारा । बारी ।२. कपड़े का किनारा । बरतन की बारी ।

आँवड़ना
क्रि० अ० [हिं० √ उमड़] उमड़ना । उ०— भरे रूचि भार सुकुमार सरिसिज सार सोभा रूप सागर अपार रस आँवड़े ।— देव (शब्द०) ।

आँवड़ा (१)पुं०
[वि० उमड़ना] गहरा । उ०— जेता मेठा वोलवा, तेता साधु न जान । पहिले थाह दिखाइ के, आँवड़े देसी आनि । कबीर (शब्द०) ।

आँवड़ा (२) †
संज्ञा पुं०[सं० आम्रातक प्रा० अंबाडय] एक प्रसिद्ध खट्टा फल । अमड़ा ।

आँवन
संज्ञा पुं०[सं० आनन= मुँह] १. लोहे की सामी जो पहिए के उस छेद के मुँह पर लगी रहती है जिसमें होकर धुरी का दंड जाता है । मुहँड़ी । २. वह औजार जिससे लोहे के छेद को लोहार लोग बढ़ाते हैं ।

आँवर पु †
संज्ञा पुं० [सं० आमलक, प्र० आमलय] दे० 'आँवला' । उ०— आलूचा अमिली अँवहलदी, आल आँवरा साल अफलदी ।— सुजान०, पृ० ९६१ ।

आँवल
संज्ञा पुं०[सं० उल्वम=जरायु । अथवा, अंबर = आच्छादन] झिल्ली जिससे गर्भ में बच्चे लिपटे रहते हैं । यह झिल्ली प्राय? बच्चा होने पीछे गिर जाती है । खेंड़ी । जेरी । साम । यौ० — आँवल नाल ।

आँवलागट्टा
संज्ञा पुं० [हि० आँवला+ हिं० गट्टा वा गाँठ] आँवले का सूखा हुआ फल । विशेष— यह दवा में तथा सिर मलने के काम आता है ।

आँवला
संज्ञा पुं० [सं० आमलक, प्रा० आमलओ] १. एक प्रसिद्ध पेड़ । २. इस पेड़ का फल । विशेष— इसकी पत्तियाँ इमली की तरह महीन महीन होती हैं । इसकी लकड़ी कुछ सफेदी लिए होती है और उसके ऊपर काछिलका प्रति वर्ष उतरा करता है कार्तिक से माघ तक इसका फल रहता है जो गोल कागजी नीबू के बराबर होता है । इसका ऊपर का छिलका इतना पतला होता है कि उसकी नसें दिखाई देती हैं । यह स्वाद में कसैलापन लिए हुए होता है । आयुर्वेद में इसे शीतल, हलका तथा दाह पित्त और प्रमेह का नाश करनेवाला बतलाया है । इसके संयोग से त्रिफला, च्यवनप्राश आदि औषध बनते हैं । आवले का मुरब्वा भी बहुत अच्छा होता है । आँवले की पत्तियों से चमड़ा भी सिझाया जाता है । इसकी लकड़ी पानी में नहीं सड़ती । इसी से कूओ के नीमचक आदि इसी से बनते हैं । ३. विपक्षी को नीचे लाने का कुरती का एक पेंच । विशेष— जब विपक्षी का हाथ अपनी गरदन पर रहे, तब अपना भी वही हाथ उसकी गरादन पर चढ़ावे और दूसरे से शत्रु के उस हाथ को जो अपनी गरदन पर है झटका देकर हटाते हुए उसको नीचे लावे । इसका तोड़ विषम पैतरा करे अथवा शत्रु की गरदन पर का हाथ केहुनी पर से हटाकर पैतरा बढ़ाते हुए बाहरी टाँग मार गिरावे ।

आँवलापती
संज्ञास्त्री० [हि० आँवला+ पत्ती] एक प्रकार की सिलाई जिसमें पत्ती की तरह दोनों ओर तिरछे टाँके मारे जाते हैं ।

आँवलासारगंधक
संज्ञा स्त्री० [हिं० आँवला+ सं० सार+ गंधक] खूब साफ की हुई गंधक जो पारदर्शक होती है, यह खाने में अधिक खट्टी होती है ।

आँवा
संज्ञा पुं० [सं० आपाक— आँवा] वह गड्ढा जिसमें कुम्हार लोग मिट्टी के बरतन पकाते हैं । जैसे, — कुम्हार आँवा लगा रहा है । क्रि० प्र० — लगाना । मुहा०— आँवाँ का आँवाँ बिगड़ाना = सारे परिवार का बिगड़ना । सारे परिवार का कुत्सित विचार होना । आँवाँ । बिगड़ना = आवें क् बरतनों का ठीक ठीक न पकना ।

आँस (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० काश— क्षत, हि० गाँस] संवेदना । दर्द ।

आँस (२)पु
संज्ञा पुं० [हि०] दे० ' अंश' । उ०— बिछुरत सुंदर अधर तै, रहत न जिहि धट साँस । मुरली सम पाई न हम प्रेम प्रीति को आँस । —स० सप्तक, पृ० १८७ ।

आँस (३) पुं० †
संज्ञा पुं०[ सं० अस्त्र] आँसू । उ० —रूप रस पीवत अघात ना हुते तब सोई अब आँस ह्वै उबरि गिरिबो करै ।— रत्नाकर, भा० १, पृ० १२१ ।

आँस (४)
१ संज्ञा स्त्री० [सं० अंशु प्रा० अंसु] १. सुतली । डोरी । २. रेशा ।

आँसी
संज्ञा स्त्री० [सं० अंश = भाग] १. भाजी । बैना । मिठाई जो इष्ट- मित्रों के यहाँ बाँटी जाती है ।— ल+लन बाल के द्वैही दिना तों परी मन आइ सनेह की फाँसी । काम कलोलनि में मतिराम लगे मनो बाँटन मोद की आँसी ।— मतिराम ।— (शब्द०)२. भाग । हिस्सा । उ०— नारि कुलीन कुलीननि लै रमै मैं उनमैं चहौं एक न आँसी । — भिखारी ग्रं०, भा० पृ १५९ ।

आँसु पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आसू' । उ०— माता । भरतु गोद बैठारे आँसु पोछि मृदु बचन उचारे ।— मानस, २ ।१६५ ।

आँसू
संज्ञा पुं०[ सं० अक्षु, पा० अस्सु, प्रा अंसु] वह जल जो आँख के भीतर उस स्थान पर जमा रहता है, जहाँ से नाक की ओर नली जाती है । उ०— जो घनीभूत लपीड़ा थी मस्तक में स्मृति सी छाई, दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आई ।— आँसू, पृ० १४ । विशेष— यह जल आँख की झिल्लियों को तर रखता है और डेले पर गर्द या तिनके को नहीं रहने देता, धोकर साफ कर देता है । आँसू भी थूक की तरह पैदा होता रहता है और बाहरी या मानसिक आघात से बढता है । किसी प्रबल मनोवेग के समय, विशेषकर पीड़ा और शोक में आँसू निकलते हैं । क्रोघ और हर्ष में भी आँसू निकलते हैं । अधिक होने पर आँसू गालों पर बहने लगता है और कभी कभी भीतरी नली के द्वारा नाक में भी चला जाता है और नाक से पानी बहने लगता । क्रि० प्र०—आना ।—गिरना ।—गिराना ।—चलना ।—रूकना ।—टपकाना ।— डालना ।—ढालना ।—निकालना ।— बहना ।— बहाना । यौ०.— आँसू की धार । आँसू की लड़ी । मुहा०— आँसू गिराना =रोना । जैसे, — क्यों झूठ झूठ आँसू गिराते हो । आँसू डबडबाना? = आँसू निकलना । रोने की दशा होना । जैसे- यह सुनते ही उसके आँसू डबडबा आए । आँसू ढालना? = आँसू गिराना । रोना । जैसे, - परगट ढारि सकै नहिं आँसू । घुट घुट माँस गुपृत होय नासू ।— जायसी (शब्द०) । आँसू तोड़ = कुसमय की वर्ष (ठग) । आँसू थमना = आँसू रूकना । रोना बंद होना । जैसे, — जब से उन्होंने यह समाचार सुना है, तब से उनके आँसू नहीं थमते है । उ०— थमते थमते थमेंगे आँसू । रोना है कुछ हँसी नहीं है ।— मीर (शब्द०) । आँसू पीकर रह जाना = भीतर ही भीतर रोकर रह जाना । अपनी व्यथा को रोकर प्रकट न करना । मन ही मन मसोसकर रह जाना । जैसे, —(क) मेरे देखते उसने बच्चे पर हाथ चलाया था; और मैं आँसू पीकर रह गया । (ख) इतना दु?ख उस पर पड़ा वह आँसू पीकर रह गया । आँसू पुछना = आश्रासन मिलना । ढारस बँधना । जैसे, — उस बेचारे की सारी संपत्ति चली गई पर घर बच जाने से आँसू पुँछ गए । (शब्द०) । आँसू पोंछना = (१) बहते हुए आँसू को कपड़े से सुखाना । (२) ढारस बँधाना । दिलासा देना । तसल्ली देना । अश्र्वासन देना । जैसे— (क) उसका घर ऐस सत्यानाश हुआ कि कोई आँसू पोंछनेवाला भी न रहा । (ख) हमारा सारा रूपया मारा गया, आँसू पोंछने के लिये १००) मिले हैं ।— आँसु भर आऩा = आँसू निकल पड़ना । आँसू भर लाना = रोने लगना । जैसे, — यह सुनते ही वह आँसू भर लाया । आँसु का तार बँधना = बराबर आँसू बहना । आँसू ओँ से मुँह धोना = बहुत आँसू गिराना । बहुत रोना । अत्यंत विलाप करना ।

आँसूढ़ाल
संज्ञा पुं० [हि० आँसू + ढ़ालना] घोंड़ों और चौपायों की एक बीमारी जिसमें उनकी आँखों से आँसू बहा करता है ।

आँहड़
संज्ञा पुं० [सं० आ + भाँड़] बरतन ।

आँहड़ बीहँड़ †
वि० [प्रि० आहंड़ = खोजना, भटकना + विहड = टूटना, बिखरना] तितरबितर । ऊबड़खाबड़ ।

आँहाँ
प्रव्य [हिं० ना + हाँ] नहीं । विशेष— यह शब्द किसी प्रश्न के उत्तर में जीभ हिलाने के क्षम से बचने के लिये बोला जाता है स्वर और ऊष्म, विशेषकर 'ह' के उच्चारण में बहुत कम प्रयत्न करना पड़ता है ।

आ (१)
अव्य० [सं०] एक अव्यय जिस का प्रयोग सीमा, अभिव्यत्कि, ईषत् और अतिक्रमण के अर्थोँ में होता है । जैसे— (क) सीमा- आसमुद्र = समुद्र तक । आमरण =मरण तक । आजानुबाहु = जानु तक लंबी बाहुवाल । आजन्म = जन्म से (ख) अभिव्याप्ति— आपाताल = पाताल के अंतमार्ग तक । आजीवन- जीवन भर । (ग) ईषत् (थोड़ा, कुछ)— आपिंगल = कुछ कुछ पीला । आकृष्ण = कुछ काल । (घ) अतिक्रमण— आकालिक = बेमौसम का ।

आ (२)
उप० [सं०] यह प्राय? गत्यर्थक धातुओं के पहले लगता है औऱ उनके अथों में कुछ थोड़ी सी विशेषता कर देता है; जैसे आपाता आघूर्णन, आरोहण, आकंपन, आघ्राण । जब यह 'गम' (जाना) 'या' (जाना), 'दा' (देना) तथा 'नी' (ले जाना) धातुकों के पहले लगता है, तब उनके अर्थों को उलट देता है; जैसे 'गमन' (जाना) से आगमन (आना), 'नयन' (ले जाना) से 'आनयन' (लाना), 'दान' (देना) से 'आदाम' (लेना) ।

आ (३)
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्मा । पितामह ।

आइंदा (१)
वि० [फा० आइँदह्] आनेवाला । आगंतुक । भविष्य । जैसे, — आइंदा जमाना ।

आइंदा (२)
संज्ञा पुं० भाविष्य काल । आनेवाला समय । जैसे-अ अइंदा के लिये खबरदार हो रहो ।

आइंदा (३)
क्रि वि० । आगे । भविष्य में । जैसे, — हमने समझा दिया, आइंदा वह जाने उसका काम जाने । यौ०.— आइंदे । आइंदे को । आइंदे में । आइंदे से । ये सबके सब क्रि० वि० समान प्रयुक्त होते हैं ।

आइ पुं० †
संज्ञा स्त्री० [सं० आयु] १. आयु । जीवन । उ०— जेहि सुमाय चितवाहि हितु जानी । सो जानै जनु आइ खुटानी ।—मानस, १ ।२६९ ।

आईटम
संज्ञा पुं० [अ०] मद । उ०— बजट बनाने लगता है, तो हर एक आइटम में दो चार लाख देता है । - रंगभूमि, भा० २, पृ० ६०५ ।

आइड़ियल
वि० [अं०] श्रेष्ठ । आदर्श ।

आइना †
संज्ञा पुं० [फा० आइनह्] दे० ' आईना' । उ०— है निराली प्रभु- कला जिसमें बसी, सवह निराला आईना है फूटता । - चोखे०, पृ० २३ ।

अइस पुं०
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आयसु' ।

आइसु पुं०
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आयसु' ।

आई (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० आयु] १. आयु । जिवन । उ०— सतयुग लाख वर्ष की आई, त्रेता दश सहस्त्र कह गाई ।— सूर (शब्द०) ।२. मृत्यु । मौत (अ०) भरा कटोरा । दूध का, ठढ़ा करके, कपी । तेरी आई मैं मरूँ, किसी तरह तू जी—(शब्द०) ।

आई (२)
क्रि० अ० 'आना' का भूतकाल स्त्री०? यो०— आई गई = आकर गुजरी हुई बात । मुहा०— आई गई करना = (१) बीती को बिसारना । (२) टाल जाना । उपेक्षा करना । आई गई होना = (१) घटित होकर गुजर जाना ।२ अनुपस्थित होना ।

आई (३) †
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्यिका, प्रा० अज्जिआ] १. पितामही । दादी ।२. माँ ।

आई (४)
प्रत्य० [हिं०] एक प्रत्यय जो भाववाचक संज्ञा बनाने के लिये विशेषण शब्दों के अंत में जोड़ा जाता है, जैसे, 'कठिन' से 'कठिनाई', बड़ा' से 'बड़ाई', 'छोटा' से 'छुटाई', 'मीठा' से 'मिठई' आदि ।२१. एक प्रत्यय जो धातुओं में लगकर भाववाचक संज्ञाएँ बनाता है । जैसे, 'पढ़' 'पढाई', लिख से, लिखाई', 'लड़' से 'लड़ाई' ' भिड़' से 'भिड़ाई' आदि ।

आईन
संज्ञा पुं० [फा०] [वि० आईनी] १. नियम । विधि । कायदा । जाब्दा ।२. कानून । राजनियम । यौ०— आईनदाँ— वकील । कानून जाननेवाला ।

आईना
संज्ञा पुं० [फा० आईवह्] १. आरसी । दर्पण । शीशा । यौ०— आईनादार । आईमनाबंदी । आइनासाज । अइनासाजी । मुहा०—आईना होना = स्पष्ट होना । जैसे, — यह बात तो आप पर आईना हो गई होगी । आईने में मुँह देखना— अपनी योग्यता को जाँचना । (यह मुहावरा उस समय बोला जाता है जब कोई व्यक्ति अपनी योग्यता से भी अधिक काम करने की इच्छा प्रकट करता है; जैसे,— पहले आइने में अपनामुँह तो देख लो, फिर बात करना । २. किवाड़े का दिलह । वि० दे० 'दिलहा' । यौ०— आईनेदार = वह किवाड़ा जिसमें आईना या दिलहा हो ।

आईनादार
संज्ञा पुं० [फा०] वह नौकर जो आईना दिखलाने का काम करे । नाई । हज्जाम । विशंषय— दसहरे, दीवाली आदि त्योहारों पर नाई आईना दिखाता है और उसके बदले में लोगों से कुछ ईनाम पाता है ।

आईनाबंदी
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. कमरे या बैठक में झाड़ फानूस आदि की सजावट ।२. कमरे या घर के फर्श में पत्थर या ईंट की जुड़ाई ।३, रोशनी के लिये तरतीब से टट्टियाँ खड़ी करना ।

आईनासाज
संज्ञा पुं० [फा० आईनह् + साज] आईना बनानेवाला ।

आईनासाजी
संज्ञा स्त्री०[फा० आईनह् साजी] १. काँच की चद्दर के टुकड़े पर कलई करने का काम२. आइनासाज का पेशा

आईनी
वि० [फा० आईन] कानूनी । राजनियम के अनुकूल ।

आउंस
संज्ञा पुं० [अं०] एक अंग्रेजी मान जो दो प्रकार का होता है । एक ठोस वस्तुऔं के तौलने में और दूसरा द्रव पदार्थोँ के नापने में काम आता है । तोलने का आउंस हिंदुस्तानी सवा दो तोले के बराबर होता है । ऐसे बारह आउंसों का एक पाउंड़ होता है । नापने का आउंस सोलह ड़्राम का होता है और एक ड़्राम साठ बूँदों का होता है ।

आउ पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० आयु] जीवन । उम्र । उ०— अहि बन रहत गई हम्ह आउ । तरिवर चलत न देखा काऊ ।— जीयसी ग्रं०, पृ०२८ । (ख) संकट सुकृत को सोवत जानि जिव रवुराउ ।सहस द्वादस पंचसत में कछुक है अब आउ ।— तुलसी ग्रं०, पृ० ४२२ ।

आउज पुं०
संज्ञा पुं० [सं० आतोघ, प्रं० आप्रोज्ज, आवज्ज] ताशा । उ०— घंटा - घंटि- पखाउज- आउज झांझ- बेनु- ड़फ - तार । नूपुर धुनि- मंजीर मनोहर वरकंकन- झनकार ।— तुलसी ग्रं०, २६५ ।

आउझ पुं०
संज्ञा पुं० [ सं० आतोघ, प्रा० आवज्ज] दे० 'आउज' ।

आउट
वि० [अं०] खेल में हारा हुआ । बहिर्भूत । विशेष— यह क्रिकेट अदि खेल बोला जाता है । जब बल्लेवाले किसी खिलाड़ी के खेलते समय गेंद विकेट में लग जाती है वा बल्ले से मारी हुई गेंद लोक ली जाती है, तब वह आउट समझा जाता है, और बल्ला रख देता है ।

आउबाउ पु †
संज्ञा पुं०[सं० वायु > आउ अनुध्व०] अंड़ बंड़ बात । अनर्थक शब्द । असंबद्ध प्रलाप । क्रि० प्र०— बकना । उ०— मानस मलीन करतब कलिमल पीन जीह हू न जपेउ नाम बकेउ आउबाउ मैं । —तुलसी ग्रं०, पृ० ५८८ ।

आउस
संज्ञा पुं० [सं० आशु, बँग० आउस] धान का एक भेद जो बंगाल में मई जून में बोया जाता है और अगस्त सितंबर में काटा जाता है । यह दो प्रकार का होता है— एक मोटा, दूसरा महीन या लेपी । भदई । ओसहन ।

आऊषा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० आयुष्य] उम्र । अवस्था । उ०— उनासिए पुत्री अवतरी । तिन आऊषा पूरी करी । — अर्ध० पृ० ५७ ।

आकंप
संज्ञा पुं० [सं० आकम्प] दे० 'आकंपन' [को०] ।

आकंपन
संज्ञा पुं० [सं० आकम्पत] [वि्० आकंपित] काँवता । काँपकंपी ।

आकंपित
वि० [सं० आकम्पित] काँपा हुआ । हिला हुप्रा ।

आक (१)
संज्ञा पुं० [सं० अर्क, प्रा० अक्क] मंदार । अकौप्रा । अकवन । उ०— (क) पुरवा लागि भूमि जल पूरी । आक जवास भई तस झूरी ।— जायसी ग्रं०, पृ० १५३ । (ख) कबिरा चंदन बीरवै, बेधा ऐक पलाश । आप सरीख कर लिया, जो होते उन पास । — कबीर (शब्द०) । (ग) देत न अघात रीझि जात पात आक ही के भीलानाथ जोगी अब औढर ढ़रत हैं । - तुलसी ग्रं० पृ० २३७ । मुहा०— आक की बुढ़िया = (१) मदार का घूआ । (१) बहुत बूढी़ स्त्री ।

आक (२) पुं०
वि० [सं० अक =दुख] दुखी । उ० — ताक करम भेषज विदित, लखात नहीं मतिहीन । तुलसी सठ अकवस बिहठि दिन दिन दीन मलीन । —स० सप्तक, पृ ४७ ।

आकड़ा
संज्ञा पुं० [सं० अर्क, हिं० + ड़ा (प्रत्य.)] मदार । अकौआ । अर्क ।

आकब †
संज्ञा पुं० [सं० आखबन= खोदता] १. घास फुल, जिसे जोते हुए खेत से निकालकर बाहर फेंकते हैं । २३. जोते हुए खेत से घास फुस निकालने की क्रिया । चिखुरना ।

आकबत
संज्ञा स्त्री० [अ० आक़त] मंरने के पीछे अवस्थ । पर- लोक । जैसे, - बाबा, दिया लिया ही आकवत में काम आवेगा । यौ०—आकबतअ देश । आकहतअंदेशी । क्रि० प्र० बिगड़ना = (१) परलोक बिगड़ना । परलोक नष्ठ । होना । (२) अंजाम बिगड़ना । बुरा परिणाम होना ।—बिगाड़ना । मुहा०— आकबत में दिया दिखाना= परलोक में काम आना ।

आकबतअं देश
वि० [अ० आकबत + फा० अंदेश] परिणाम सोचनेवाला । अग्रसोची । दूरंदेश । दीर्घदर्शी ।

आकबतअं देशी
संज्ञा स्त्री० [आक़बत + फा़० अंदेशी] परिणाम का विचार । परिणामदर्शिता । दीर्घदर्शिता । दूरंदेशी । क्रि० प्र०—करना ।

आकबतीलंगर
संज्ञा पुं० [ अ० आक़बत + फा़० ई० (प्रत्य.) + हिं० लंगर] एक प्रकार का लंगर जो जहाज पर अगले मस्तूल की रस्सियों या रिंगिन के पास बीच के टूटक में रहता है और आफत के वक्त ड़ाला जाता हैं ।

आकबाक
संज्ञा पुं० [प्रा० *वक्कइ > √ बक से अनुध्व० .] अकबक । अंकबंड़ बात । ऊटपटाँगबात । उ०— (क) आकबाक बकति बिया मैं बूड़ि बूड़ि जाति पी की सुधि आएँ जी की सुधि बुधि खोइ देत । — देव (शब्द०) । (ख) । आकबाक बकि और की वृथा न छाती छोल । — सुंदर ग्र०, भा० २, पृ० ७३७ ।

आकर (१)
संज्ञा पुं० [सं] १. खानि । उत्पत्तिस्थान । उ०—सदा- सुमन- फल सहित सब, द्रुम नव नाना जाति । प्रगटी सुंदर सैल पर, मनि आकर बहु भाँति ।— मानस,१ ।६५ । २. खजाना । भांड़ार । यौ०—गुणाकर । कमलाकर । कुसुमाकर । करूणाकर । रत्नाकर । ३. भेद । किस्म । जाति । उ०—आकार चारि लाख चौरासी जाति जीव जल थल न भवासी । —मानस, १ ।८ ।४. तलवार के बत्तीस हायों में से एक । तलवार चलाने का एक भेद ।

आकर (२)
वि० १. श्रेष्ट । उत्तम ।२. आधिक । उ० — चंपा प्रीति जो तेल है, दिन दिन आकर बास । गलि गलि आप हेराय जो, मुए न छाँड़ै पास । — जायसी (शब्द०) ।३. गणित । गुणा । जैसे, पाँच आकर, दस आकर । उ०— अस भा सूर पुरूष निरमरा । सूर जाहि दस आकर करा । — जायसी (शब्द०) । ४. दक्ष । कुशल । व्युत्पन्न ।

आकरकढ़ा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आकरकरहा' ।

आकरकरहा
संज्ञा पुं० [अ०] एक जड़ी जिसे मुँह में रखने जीभ में चुनचुनाहट होती है और मुँह से पानी निकलता है । यह एक वृक्ष की लकड़ी है । आकरकढ़ा । दे०'अकरकरा' ।

आकरखाना पुं०
क्रि० स० [हिं०] दे० 'आकर्षना' ।

आकरिक (१)
वि० पुं० खान खोदनेवाला ।

आकरिक (२)
संज्ञा पुं० वह मनुष्य जो खान को स्वयं खोदे या औरों से खोदावे और उससे धातु निकाल ।

आकरी (१)
वि० [सं० आकर = खान (धातु और पत्थरक आदि की)] कठोर । उ०— नारी बोलै आकरी तब दुख पावै नाह । सुंदर बोलै मधुर मुख तब सुख सीर प्रवाह ।— सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ७०७ ।

आकरी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० आकार + ई० (प्रत्य.)] खान खोदने का काम । उ०— चाकरी न आकरी न खेती न बनिज भिख जानत न छर कछु कसब कबारू है । — तुलसी ग्रं०, पृ० ११२ ।

आकरी (३)
संज्ञा पुं० [सं० अकरिन्] दे० 'आकरिक' ।

आकर्ण
वि० [सं०] कान तक फैला हुआ । यौ० —अकर्णचक्षु । आकर्णकृष्ट ।

आकर्णन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आकर्णित] सुनना । कान करना । अकनना ।

आकर्णित
वि० [सं०] सुना हुआ ।

आकर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक जगह के पदार्थ का बल से दूसरी जगह जाना । खिंचाव । कशिंश । क्रि० प्र०— करना—खींचना । उ०— तैसे ही भुवभार उतारन हरि हलधर अवतार । कालिंदी आकर्ष कियो हरि मारे दैत्य अपार ।— सूर । (शब्द०) । २. पासे का खेल ।३. बिसात जिसपर पासा खेला जाय । चौपड़ । ४. इंद्रिय । ५. धनुष चलाने का अभ्यास । ६. कसौटी । ७. चुंबक ।

आकर्षक (१)
वि० [सं०] १. वह जो दूसरे को अपनी ओर खींचे । आकर्षण करनेवाला । खींचनेवाला ।२. सुंदर ।

आकर्षण (२)
संज्ञा पुं० चुंबक [को०] ।

आकर्षण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आकर्षित, आकृष्ट] १. किसी वस्तु का दूसरी वस्तु के पास उसकी शक्ति या प्रेरणा से लाया जाना । २. खिचाव । २. तंत्रशास्त्र का एक प्रयोग जिसके द्वारा दूर देशस्थ पुरूष या पदार्थ पास में आ जाता है । क्रि० प्र०—करना । होना । यौ० — आकर्षण मंत्र । आकर्षण विघा । आकर्षण शत्कि ।

आकर्षणशत्कि
संज्ञा पुं० [सं०] भौतिक पदार्थों की एक शक्ति जिससे वे अन्य पदाथों को अपने ओर खींचते हैं । विशेष—यह शक्ति प्रत्येक परामाणु में रहती है । क्या कारण, क्या कार्य रूप में सब परमाण या उनसे उत्पन्न सब पदाथों की और आकृष्ट होते हैं । इसी से द्वयण, त्रसरेणु तथा समस्त चराचर जगत् का संगठन होता है । इसी से पाषाणादि के परमाणु आपस में जुड़े रहते हैं । पृथवी के ऊपर कंकड़, पत्थर तथा जीव आदि सब इसी शक्तिके बल पर ठहरे रहते हैं । जल के चंद्रमा की ओर आकृष्ट हो ने से समुद्र में ज्वार भाटा उठता है । बड़े बड़े पिंड़, ग्रहमंड़ल, सूर्य, चंद्रादि सब ईसी शक्ति से आकाशमंड़ल में निराधार स्थित हैं और नियम से अपनी अपनी कक्षा पर भ्रमण करते हैं । पृथ्वी भी इसी शक्ति से बृहत् वायुमंड़ल को धारण किए हुए हैं । सूर्य से लेकर परमाणु तक में यह शतक्ति विघमान है । यह शक्ति भिन्न भिन्न रूपों से भिन्न भिन्न पदार्थों और दशाओं में काम करती हैं । मात्रानुसार इसका प्रभाव दूरस्थ और निकटवर्ती सभी पदाथोँ पर पड़ता है । धारण या गुरूत्वाकर्षण, चुंबकाकर्षण, संलग्ना- कर्शण, केशाकर्षण, रासायनिकाकर्षण आदि इनके अनेक प्रभेद है ।

आकर्षीणी
संज्ञा पुं० [सं० ] १. एक लग्गी जिससे फल फुल तोड़ते हैं । अँकुसी । लकसी ।२. प्राचीन काल का एक सिक्का ।३. शरीर परधारण की जानेवीली विशेष प्रकार की मुद्रा या चिहन (को०) ।

आकर्षन पुं०
संज्ञा पुं० [सं० आकर्षण] दे० ' आकर्षण' ।

आकर्षना पुं०
क्रि स० [सं० आकर्षण से नाम.] खींचना । उ०— आकरष्यो धनु करन लगि, छाँड़े शर इकतीस ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) कालिंदी को निकट बुलायो जलक्रीड़ा के काज । लिये आकरषि एक छन में हलि कति समरथ यदुराज ।— सूर (शब्द०) ।

आकर्षिक
वि० [सं० ] [वि० स्त्री० आकर्षिकी ] दे० 'आकर्षक' [को०] ।

आकर्षित
वि० [सं०] खींचा हुआ ।

आकलन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आकलनीय, आकलित] १. ग्रहण । लेना ।२. संग्रह । बटोरना । संचय । इकट्ठा करना । ३. गिनती करना । ४. अनुष्ठान । संपादन ।५. अनुसंधान० जाँच । ६. इच्छा । कामना [को०] ।७. वर्णन करना [को०] ।

आकलना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दे० 'आकलन' २. पूजा । भक्ति [को०] ।

आकलनीय
वि० [सं०] १. ग्रहण करने योग्य । लेने योग्य । २. संग्रह करने योग्य । ३. गिनती करने योग्य । ४. अनुष्ठान करने योग्य । ५. जाँचने योग्य । पता लगाने योग्य ।

आकलित
वि० [सं०] १. लिया हुआ । पकड़ा हुआ । २. ग्रथित । गूँथा हुआ । ३. गिना हुआ । परिगणित ।४. आनुष्ठित । संपादित । कृत । ५. अनुसंधान किया हुआ । जाँचा हुआ । परिक्षित ।

आकली (१) †
संज्ञा स्त्री० [सं० आकुल + ई (प्रत्य०) या सं० आकल्य = बीमारी] आकुलता । बेचैनी ।

आकली (२)
संज्ञा स्त्री० [ देश०] चटक पक्षी । गौरैया ।

आकल्प (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वेश रचना । सिंगार करना; जैसे, रत्नाकल्प ।२. पोशाक । पहनावा [को०] ।३. बीमारी (को०) । ४. जोड़ना । बढ़ाना [को०] ।

आकल्प (२)
क्रि० वि० कल्प पर्यंत ।

आकल्य
संज्ञा पुं०[सं०] बीमारी । अस्वस्थता [को०] ।

आकष
संज्ञा पुं०[सं०] कषौटी ।

आकसमात पु †
क्रि० वि० [हिं०] दे० ' अकस्मात' । उ० — पंथी माँहि पंथ चलि आयौ आकसमात । — सुंदर ग्रं०, भा०२. पृ० ७५८ ।

आकस्मात पु †
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'अकस्मात' ।

आकस्मिक
वि० [सं०] जो बिना किसी कारण के हो । जो अचानक हो । सहसा होनेवाला । जिसके होने का पहले से अनुमान न हो । यौ०— अकस्मिक अवकाश, आकस्मिक छुट्टी = आचानक काम से ली जानेवाली छुट्टी ।

आकांक्षक
वि० [सं० आकाङ्क्षक] इच्छा रखनेवाला । अभिलाषॉ करनेवाला ।

आकांक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं० आकाङ्क्षा] [वि० आकांक्षक, आकांक्षित, आकांक्षी] १. इच्छा । अभिलाष । वांछा । चाह । २. अपेक्षा । ३. अनुसंधान ।४. न्याय के अनुसार वाक्यार्थज्ञान के चार प्रकार के हेतुओं में से एक । विशेष— वाक्य में पदों का परस्पर संबंध होता है और इसी संबंध से वासक्यार्थ का ज्ञान होता है । जब वाक्य में एक पदका अर्थ दूसरे पद अर्थज्ञान पर आश्रित रहता है । तब यह कहते हैं कि इस पद के ज्ञान की आकांक्षा है; जैसे,— ' देवदत्त आया' इस वाक्य में आया पद का ज्ञान देवदत्त के ज्ञान के आश्रित है । ५. जैनियों के अनुसार एक अतिचार । जैनियों अतिरिक्त अन्य मतवालों की विभूति देख उसके ग्रहण करने की इच्छा । यौ०— आकांक्षातिचार ।

आकांक्षित
वि० [वि० आकाङ् क्षित] १. इच्छित । अभिलषित । वांछित । २. अपेक्षित ।

आकांक्षी
वि० [सं० आकांक्षिन्] [वि० स्त्री० आकांक्षिणी] १. इच्छा रखनेवाली । इच्छुक । चाहनेवाला ।२. खोज करनेवाला ।

आका (१) †
संज्ञा पुं० [सं० आकाय] १. कौड़ा । अलाव । २. भट्ठी । ३. पजावा । आँवाँ ।

आका (२)
संज्ञा पुं० [अ० आका़] मालिक । स्वामी ।

आकाप
संज्ञा पुं०[सं०] १. चिता की अग्नि । २. चिता ।३. अवास । निवास [को०] ।

आकार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्वरूप । आकृति । मूर्ति । रूप । सूरत । २. ड़ील डौल । कद ३. बनावट । संघटन । ४. निशान । चिहन । ५. चेष्टा । ६. 'आ' वर्ण । ७. बुलीव ।८. प्रकार । ढंग । उ०— सुंदर कर आनन समीप, अति राजत इहिं आकर । जलरह मनौ बैर बिधु सौं तजि, मिल्त लए उपहार ।— सूर०, १० ।२८३ । यौ०— अकारगुप्ति । आकारगोपन = हृदय या मन के भाव को कल्पित चेष्टा से छिपाना ।

आकार (२)
वि० रूपवाला । साकार । उ०— कोई आकार कह कोई निराकर कह तत्व की छोड़ि नि?तत्व धाई । — कबीर रे०, पृ० १८ ।

आकारण
संज्ञा पुं० [सं०] १. आह्वान । बुलावा ।२. चुनौती [को०] ।

आकारवान
वि० [सं० आकारवत्] १. आकार या शरीरवाला । १. सुगठित । सुंदर [को०] ।

आकारांत
वि० [सं० आकारान्त] जिसके अंत में 'आ' स्वर हो [को०] ।

आकारित
वि० [सं०] १. आहूत ।२. स्वीकृत । ३. मांगा या चाहा हुआ [को०] ।

आकारी पु
वि० [सं० आकरण = आह्वान] [स्त्री० आकारिणी] आह्वान करनेवाला । बुलानेवाला । उ०— गौर मुख हिम किरण की जु किरणावली श्रवत मधुगान हिय पियत रंगी । नागरी सकल संकेत आकारिणी गनत गुन गननि मति होति पंगी ।— नागरी० (शब्द०) ।

आकारीठ पुं०
संज्ञा पुं० [सं० आकारण = बुलाना] संग्राम । युद्ध । (ड़िं०)

आकाश
संज्ञा पुं०[सं०] १. अंतरिक्ष । आसमान । गगन । ऊँचाई पर का वह चारों और फैला हुआ अपार स्थान जो नीला और शून्य दिखाई देता । जैसे, — पक्षी आकाश में उड़ रहे हैं । २. साधारण?स वह स्थान जहाँ वायु के अतिरित्क और कुछ न हो; जैसे, — वह योगी ऊपर उठा और बड़ी देर तक आकाश में ठहरा रहा । ३. शून्य स्थान । वह अनंत विस्तृत अवकाश जिसमें विश्व के छोटे बड़े सब पदार्थ, वंद, सूर्य, ग्रह, उपग्रह आदि स्थित हैं और जो सब पदार्थों के भीतर व्याप्त है । विशेष—वैशेषिककार ने आकाश को द्रव्यों में गिना है । उसके अनुयायी भाष्यकार प्रशस्तपाद ने आकाश, काल और दिशा को एक ही मान है । यद्यपि सूत्र के १७ गुणों में शब्द नहीं हैं, तथापि भाष्यकार ने कुछ और पदार्थों के साथ शब्द को भी ले लिया है । न्याय में भई आकाश को पंचभूतों में माना है और उससे श्रोत्तेंद्रिय की उत्पत्ति मानी है । सांख्यकार ने भी आकाश को प्रकृति का एक विकार और शब्दतन्मात्रा से उत्पन्न माना है और उसका गुण शब्द कहा है । पाश्चात्य दार्शनिकों में से अधिकांश ने आकाश के अनुभव और दूसरे पदार्थों के अनुभव के बीच वही भेद मान है जो वर्तमान प्रत्यक्ष अनुभव और व्यतीत पदार्थों या भविष्य संभावनाओं की स्मृति या चिंतन प्रसूत अनुभव में है । कांट आदि ने आकाश की भावना को अंतःकरण से ही प्राप्त अर्थात् उसी का गुण माना है । उनका कथन है कि जैसे रंगों का अनुभव हमें होता है, पर वास्तव में पदार्थों में उनकी स्थिति नहीं है, केवल हमारे अंतःकरण में है, उसी प्रकार भी है । यौ०—आकाशकुसुम । आकाशगंगा । आकाशचारी । आकाशचोटी । आकाशजल । आकाशदीपक । आकाशधुरी । आकाशध्रुव । आकाश— नीम । आकाशपुष्प । आकाशभाषित । आकाशफल । आकाशबेल । आकाशमंडल । आकाशमुखी । आकाशमूली । आकाशलोचन । आकाशवल्ली । आकाशवाणी । आकाशवृत्ति । आकाशव्यापी । आकाशास्तिकाय । पर्या०—द्यौ । द्यु । अभ्र । व्योम । पुष्कर । अंबर । नभ । अंतरिक्ष । गगन । अनंत । सुरवर्त्म । खं । वियत् । विष्णुपद । तारापथ । मेघाध्वा । महापिल । विहायस । मरुद्वर्त्म । मेघवेश्म । मेघवर्त्म । कुताभि अक्षर । विविष्टप । नाक । अनंग । मुहा०—आकाश की कोर = क्षितिज ।आकाश खुलना = आसमान का साफ होना । बादल का जाना । बादल हटना । जैसे,—दो दिन की बदली के पीछे आज आकाश खुला है । आकाश छूना या चूमना = बहुत ऊँचा होना । जैसे,—काशी के प्रासाद आकाश छूते हैं । आकाश पाताल एक करना = (१) भारी उद्योग करना । जैसे,—जब तक उसने इस काम को पूरा नहीं किया, आकाश पाताल एक किए रहा । (२) आंदोलन करना । हलचल करना । धूम मचाना । जैसे,—वे जरा सी बात के लिये आकाश पाताल एक कर देते हैं । आकाश पाताल का अंतर=बड़ा अंतर । बहुत फर्क । उ०—तौ भी इनमें उनमें आकाश और पाताल का अंतर है । प्रेमघन०, भा० २, २०३ । आकाश बाँधना=अनहोनी बात कहना । असंभव बात कहना । उ०—कहा कहति डरपाइ कछू मेरौ घटि जैहै । तुम बाँधति आकाश बात झूठी को सैहै ।—सूर (शब्द०) । आकाश से बातें करना = बहुत ऊँचा होना । जैसे,—माधवराव के धरहरे आकाश से बातें करते हैं । ४. अबरक । अभ्रक । ५. छिद्र । विवर [को०] । ६. (गणित में) शून्य [को०] । ७. प्रकाश । स्वच्छता [को०] । ८. ब्रह्मा [को०] ।

आकाशकक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] आकाश में वह मंडल जहाँ तक सूर्य की किरणों का संचार है । सूर्यसिद्धांत के अनुसार इस मंडल की परिधि १८१२०६९२००००००००योजन है ।

आकाशकल्प
संज्ञा पुं० [सं०] ब्रह्म [को०] ।

आकाशकुसुम
संज्ञा पुं० [सं०] १. आकाश का फूल । खपुष्प । अन— होनी बात । असंभव बात ।

आकाशगंगा
संज्ञा स्त्री० [सं० आकाशगङ्गा] १. बहुत से छोटे छोटे तारों का एक विस्तृत समूह जो आकाश में उत्तर—दक्षिण फैला है । विशेष—इसमें इतने छोटे छोटे तारे हैं जो दूरबीन के ही सहारे दिखाई पड़ते हैं । खाली आँख से उनका समूह एक सफेद सड़क की तरह बहुत दूर तक दिखाई पड़ता है । इसकी चौड़ाई बरा- बर नहीं है, कहीं अधिक कहीं बहुत कम है । इसकी कुछ शाखाएँ भी कुछ इधर उधर फैली दिखाई पड़ती हैं । इसी से पुराणों में इसका यह नाम है । देहाती लोग इसे आकाशजनेऊ, हाथी की डहर या केवल डहर अथवा दूधगंगा कहते हैं । २. पुराणानुसार वह गंगा जो आकाश में है । पर्या०—मंदाकिनी । वियदगंगा । स्वर्गंगा । स्वर्णदी । सुरदीर्धिका ।

आकाशग (१)
वि० [सं०] आकाशचारी [को०] ।

आकाशग (२)
संज्ञा पुं० पक्षी [को०] ।

आकाशगा
संज्ञा स्त्री० [सं०] आकाशगंगा [को०] ।

आकाशचमस
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा [को०] ।

आकाशचारी (१)
वि० [सं० आकाशचारिन्] [स्त्री० आकाशचारिणी] आकाश में फिरनेवाला । आकाशगामी ।

आकाशचारी (२)
संज्ञा पुं० १. सूर्यादि ग्रह नक्षत्र । २. वायु । ३. पक्षी । ४. देवता । ५. राक्षस ।

आकाशचोटी
संज्ञा पुं० [सं०आकाश+हिं० चोटी] शीर्षविंदु । वह कल्पित विंदु जो ठीक सिर के ऊपर पड़ता है ।

आकाशजननी
वि० [आकाशजननिन्] दुर्ग आदि के प्राचीर में बने झरोखे या छिद्र [को०] ।

आकाशजल
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जल जो ऊपर से बरसे । मेह का पानी । विशेष—मघा नक्षत्र में लोग बरसे हुए पानी को बरततों में भर कर रख लेते हैं । यह औषध के काम आता है । २. ओस ।

आकाशदीप
संज्ञा पुं० [सं०] आकाशदीया ।

आकाशदीया
संज्ञा पुं० [सं० आकाश+हिं० दीया] वह दीपक जो कार्तिक में हिंदू लोग कंडील में रहकर एक ऊँचे बाँस के सिरे पर बाँधकर जलाते हैं । विशेष—कार्तिक माहात्म्य के अनुसार २१ हाथ की ऊँचाई पर दिया जलाना उत्तम है, १४ हाथ पर मध्यम और ७ हाथ पर निकृष्ट है ।

आकाशधुरी
संज्ञा स्त्री० [सं० आकाश+हिं० धुरी] खगोल का ध्रुव । आकाशध्रुव ।

आकाशध्रुव
संज्ञा पुं० [सं०] आकाशधुरी ।

आकाशनदी
संज्ञा स्त्री० [सं०] आकाशगंगा ।

आकाशनिद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] खुले हुए मैदान में सोना ।

आकाशनीम
संज्ञा स्त्री० [सं० आकाश+हिं० नीम] एक प्रकार का पौधा जो नीम के पेड़ पर होता है । नीम का बाँदा ।

आकाशपथिक
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य [को०] ।

आकाशपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] आकाश का फूल । आकाशकुसुम । खपुष्प । विशेष—यह असंभव बातों के उदाहरणों में से हैं ।

आकाशफल
संज्ञा पुं० [सं०] संतान या लड़का लड़की ।

आकाशबेल, आकाशबेलि
संज्ञा स्त्री० [सं० आकाश+हिं० बेल] अमरबेल ।

आकाशभाषित
संज्ञा पुं० [सं०] नाटक के अभिनय में एक संकेत । बिना किसी प्रश्नकर्ता के आपसे आप वक्ता ऊपर की ओर देखकर किसी प्रश्न को इस तरह करता है, मानो वह उससे किया जा रहा है और फिर वह उसका उत्तर देता है । इस प्रकार के कहे हुए प्रश्न को 'आकाशभाषित' कहते हैं । विशेष—भारतेंदु हरिश्चंद्र के 'विषस्य विषमौषधम्' में इसका प्रयोग बहुत है । उ०—हरिश्चंद्र—अरे सुनो भाई, सेठ, साहूकार, महाजन, दूकानदारों, हम किसी कारण सेअपने को हजार मोहर पर बेचते हैं । किसी को लेना हो तो लो । (इधर उधर फिरता है । ऊपर देखकर) क्या कहा ? "क्यों तुम ऐसा दुष्कर्म करते हो ?" आर्य, यह मत पूछो, यह सब कर्म की गति है । (ऊपर देखकर) क्या कहा ? "तुम क्या कर सकते हो, क्या समझते हो और किस तरह रहोगे?" इसका क्या पूछना है । स्वामी जो कहेगा वह करेंगे, इत्यादि ।—सत्य हरिश्चंद्र ।

आकाशमंडल
संज्ञा पुं० [सं० आकाशमंडल] नभमंडल । खगोल ।

आकाशमांसी
संज्ञा स्त्री० [सं०] क्षुद्र जटामाँसी [को०] ।

आकाशमूखी
संज्ञा पुं० [सं० आकांश + हिं० मुखी] एक प्रकार के साधु जो आकाश की ओर मुँह करके तप करते हैं । ये लोग अधिकांश शैव होते हैं ।

आकाशमूली
संज्ञा स्त्री० [सं०] जलकुंभी । पाना ।

आकाशयाम
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो आकाशमार्ग से गमन करे । २. वायुयान । बैलून [को०] ।

आकाशयोधी
संज्ञा पुं० [सं० आकाशयोधिन्] वह लोग जो ऊँची जमीन या टीले पर से लड़ाई कर रहे हों । [को०] ।

आकाशरक्षी
संज्ञा पुं० [सं० आकाशरक्षिन्] वह जो किले की बाहरी दीवार या बुर्ज पर खड़ा होकर पहरा दे [को०] ।

आकाशलोचन
संज्ञा पुं० [सं०] वह स्थान जहाँ से ग्रहों की स्थिति या गति देखी जाती है । मानमंदिर । आबजरवेटरी ।

आकाशवचन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'आकाशभाषित' [को०] ।

आकाशवर्त्म
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वायुमंडल ।

आकाशवल्ली
संज्ञा स्त्री० [सं०] अमरबेल ।

आकाशवाणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह शब्द या वाक्य जो आकाश से देवता लोग बोलें । देववाणी । २. बेतार की युक्ति से प्रसारित वाणी या ध्वनि । रेडियो ।

आकाशवृत्ति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] अनिश्चित जीविका । ऐसी आमदनी जो बँधी न हो ।

आकाशवृत्ति (२)
वि० [सं० आकाशवृत्तिक] १. जिसे आकाशवृत्ति का हगी सहारा हो । २. (खेत) जिसे आकाश के जल ही का सहारा हो, जो दूसरे प्रकार से न सींचा जा सकता हो ।

आकाशसलिल
संज्ञा पुं० [सं०] १. वृष्टि । २. ओस [को०] ।

आकाशस्फटिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. ओला । बनौरी । २. सूर्यकांत या चंद्रकांत मणि [को०] ।

आकाशास्तिकाय
संज्ञा पुं० [सं०] जैनशास्त्रानुसार छह प्रकार के द्रव्यों में से एक । यह एक अरूपी पदार्थ है जो लोक और अलोक दोनों में है और जीव तथा पुद्गगल दोनों को स्थान या अवकाश देता है । आकाश ।

आकाशी
संज्ञा स्त्री० [सं० आकाश+ई० (प्रत्य०)] वह चाँदनी जो धूप आदि से बचने के लिये तानी जाती है ।

आकाशीय
वि० [सं०] १. आकाशसंबंधी । आकाश का । २. आकाश में रहनेवाले । आकाशस्थ । ३. आकाश में होनेवाला । ४. दैवागत । आकस्मिक ।

आकास पु
संज्ञा पुं० [सं० आकाश] द० 'आकाश' । उ०—लंका राज विभीषण राजै, ध्रुव आकास विराजैं, । सूर०, १ । ३६ ।

आकासबानी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'आकाशवाणी' । उ०—सूर, आकासबानी भई तबै तहँ, यहै बैदेहि है, करु जुहारा ।-सूर०, ९ । ७६ ।

आकिंचन
संज्ञा पुं० [सं० आकञ्चिन] गरीबी । निर्धनता । अकिंचनता [को०] ।

आकिंचन
वि० दे० 'आकिंचन' । उ०—आकिंचन इंद्रियदमन, रमन राम इकतार । तुलसी ऐसे संत जन, बिरले या संसार ।— तुलसी ग्रं०, पृ० १२ ।

आकिल
वि० [अ० आकिल] बुद्धिमान् । ज्ञानी । अकलमंद ।

आकिलखानी
संज्ञा पुं० [अ० आकिल+फा० खाँ (नाम)] एक प्रकार का रंग जो कालापन लिए लाल होता है । एक प्रकार का खैरा या काकरेजी रंग ।

आकीर्ण (१)
वि० [सं०] १. व्याप्त । पूर्ण । भरा हुआ । २. बिखरा या फैला हुआ । [को०] । यौ०—कंटककीर्ण । जनाकीर्ण ।

आकीर्ण (२)
संज्ञा पुं० भीड़ [को०] ।

आकुंचन
संज्ञा पुं० [सं० आकुञ्चन] [वि० आकुंचनीय आकुंचित] १. सिकुड़ना । बटुरना । सिमटना । संकोच । २. वैशेषिक शास्त्र के अनुसार पाँच प्रकार के कर्मों में पदार्थों का सिकुड़न । ३. ढेर लगाना [को०] । ४. टेढ़ा करना [को०] । ५. सेना का एक विशेष प्रकार का बढ़ाव [को०] ।

आकुंचनीय
[सं० आकुञ्चनीय] सिकुड़ने योग्य । सिमटने योग्य ।

आकुंचित
वि० [सं० आकुञ्चित] १. सिकुड़ा हुआ । सिमटा हुआ । २. टेढ़ा । कुटिल । वक्र ।

आकुंठन
संज्ञा पुं० [सं० आकुण्ठन] [वि० आकुंठित] १. गुठला होना । कुंद होना । लज्जा । शर्म ।

आकुंठित
वि० [सं० आकुण्ठित्] १ गुठला । कुंद । २. लज्जित । शर्माया हुआ । ३. स्तब्ध । जड़ा । जैसे,—उनकी बुद्धि आकुंठित हो गई है ।

आकुट्टी हिंसा
संज्ञा स्त्री० [प्रा० आकुठ्ठी+सं० हिंसा] उत्साहपूर्वक ऐसा निषिद्धकर्म करना जिससे किसी प्राणी को दुःख हो ।

आकुल (१)
वि० [सं०] [संज्ञा आकुलता] १. व्यग्र । घबराया हुआ । उ०—भारत अब भी आकुल विपत्ति के घेरे में ।— दिल्ली०, पृ० २१ । २. व्यस्त । बिखरा हुआ । जैसे,—केश । ३. उद्विग्न । क्षुब्ध । ४. विह्वल । कातर । ५. अस्वस्थ । ६. व्याप्त । संकुल । ७. तारतम्यहीन । जिसका कोई ठीक सिल- सिला न हो [को०] । ८. जंगली । ऊबड़ खाबड [को०] ।

आकुल (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. खच्चर । २. आबाद जगह [को०] ।

आकुलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] [वि० आकुलित] १. व्याकुलता । घब- राहट । उ०—वह आकुलता । अब कहाँ रही जिसमें सब कुछ ही जाय भूल ।—कामायनी, पृ० १४५ । २ व्याप्ति ।

आकुलत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'आकुलता' [को०] ।

आकुलित
वि० [सं०] १. व्याकुल । घबराया हुआ । उ०—अब सांध्य मलय आकुलित दुकूल कलित हो, यों छिपते हो क्यों ।—चंद्र० पृ० ६३ ।

आकूणित
वि० [सं०] ईषत् संकुचित [को०] ।

आकूत
संज्ञा पुं० [सं०] १. आशय । अभिप्राय । २. हार्दिक भावना [को०] । ३. कामना इच्छा [को०] ।

आकूति
संज्ञा पुं० [सं०] १. अभिप्राय । आशय । मतलब । २. पुराणानुसार मनु की तीन कन्यायों में से एक जो रुचि प्रजापति को ब्याही थी । ३. उत्साह । अध्यवसाय । ४. सदाचार । आप्तरीति । ५. कर्मेंद्रिय [को०] । ६. वायुपुराण के अनुसार एक कल्प का नाम [को०] ।

आकूती
संज्ञा स्त्री० [सं० आकूति] स्वायंभुव मनु तीन कन्याओं में से एक ।

आकृत (१)
वि० [सं०] व्यवस्थित । निर्मित । गठित । २. समीप लाया हुआ [को०] ।

आकृत (२) पु
संज्ञा स्त्री० [सं० आकृति] मूर्ति । रूप ।

आकृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बनावट । गढ़न । ढाँचा । २. अवयव । विभाग । उ०—जानु सुजघन करभकर आकृति, कटि प्रदेस किंकिन काजै ।—सूर०, १ । ६९ । विशेष—इसका प्रयोग हिंदी में चेतन के लिये अधिक और जड़ के लिये कम होता है । २. मूर्ति । रूप । ३. मुख । चेहरा । जैसे,—उसकी आकृति बड़ी भयावनी है । ४. मुख का भाव । चेष्टा । जैसे,—मरते समय उस मनुष्य की आकृति बिगड़ गई । ५. २२ अक्षरों का एक वर्णवृत्त । हँसी । भद्रक । मंदारमाला इसका भेद है । यह यथार्थ में एक प्रकार का सवैया है । उ०— भासत गौरि गुसाँइन को बर राम धनू दुइ खंड कियो । मालिनि को जयमाल गुहो हरि के हिय जानकि मेलि दियो । रावन की उतरी मदिरा चुपचाप पयान जो लंक कियो । राम बरी सिय मोदभरी नभ में सुर जै जैकार कियो ।— (शब्द०) । ६. जातिविशेष [को०] । ७. (गणित में) २२ की संख्या [को०] । यौ०.—आकृतिगण । आकृतिच्छत्रा । आकृतियोग ।

आकृष्ट
वि० [सं०] खींचा हुआ । आकर्षित ।

आकृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. खिंचाव । २. (ज्योतिष में) गुरुत्वाकर्षण । ३.धनुष की डोरी का खिंचना । ४. तंत्रोक्त आकर्षण क्रिया [को०] ।

आकेकर
वि० [सं०] अर्धोन्मीलित (नेत्र) [को०] ।

आकोकर
संज्ञा पुं० [सं०] मकर राशि [को०] ।

आकोप
संज्ञा पुं० [सं०] ईषत् कोप । जरा सा गुस्सा [को०] ।

आकौशल
संज्ञा पुं० [सं०] कुशलता का अभाव [को०] ।

आक्रंद
संज्ञा पुं० [सं० आक्रन्द] १. रोदन । रोना । २. चिल्लाना । चीखना । चिल्लाहट । ३. बुलाना । पुकार । ४. मित्र । भाई । बंधु । ५. चोर युद्ध । कड़ी लड़ाई । ६. ध्वनि । आवाज । शब्द । ७. ग्रहयुद्ध में किसी एक ग्रह के दूसरे ग्रह की अपेक्षा बलवान् या विजयी होने की अवस्था । ८. प्रधान शत्रु के पीछे रहकर सहायता करनेवाला शत्रु राजा या राष्ट्र ।

आक्रंदन
संज्ञा पुं० [सं० आक्रन्दन] १. रोना । २. चिल्लाना ।

आक्रंदिक
वि० [सं० आक्रन्दिक] उस स्थान पर पहुँचनेवाला जहाँ से चिल्लाहट सुनाई दे [को०] ।

आक्रंदित (१)
वि० [सं० आक्रन्दित] १. जोर जोर से रोने चिल्लानेवाला । २. आहूत (सहायतार्थ) [को०] ।

आक्रंदित (२)
संज्ञा पुं० १. जोर की चिल्लाहट । २. पश्चात्ताप । रोना पीटना [को०] ।

आक्रंदी
वि० [सं० आक्रान्दिन्] रोने चिल्लानेवाला [को०] ।

आक्रम पु
संज्ञा पुं० [सं० आक्रम=परास्त करना] १. पराक्रम । शूरता । (डिं०) । २. दे० 'आक्रमण' ।

आक्रमण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आक्रमणीय, आक्रमित, आक्रांत] १. बलपूर्वक सीमा का उल्लंघन करना । हमला । चढ़ाई । धावा । जैसे,—महमूद ने कई बार भारत पर आक्रमण किया । २. आघात पहुँचाने के लिये किसी पर झपटना । हमला । जैसे,— डाकुओं ने पथिकों पर आक्रमण किया । ३. घेरना । छेंकना । मुहासिरा । ४. आक्षेप करना । निंदा करना । जैसे,—इस लेख में लोगों पर व्यर्थ आक्रमण किया है । ५. निकट जा पहुँचना [को०] । ६. भोजन [को०] । ७. शक्ति [को०] ।

आक्रमणकारी
वि० [सं० आक्रमणकारिन्] [स्त्री०य आक्रमणकारिणी] आक्रमण करनेवाला । आक्रामक ।

आक्रमित
वि० [सं० आक्रमिता] जिस पर आक्रमण किया गया हो ।

आक्रमितानायिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह प्रौढ़ा नायिका जो मनसा, वाचा, कर्मणा अपने प्रिय को वश में करें ।

आक्रय
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यापारी । २. व्यापार [को०] ।

आक्रांत
वि० [सं० आक्रान्त] १. जिसपर आक्रमण किया गया हो । जिसपर हमला हुआ हो । २. घिरा हुआ । आवृत्त । छिका हुआ । ३. वशीभूत । पराजित । विवश । ४. पीड़ित । दलित । दबाया हुआ । ५. व्याप्त । आकीर्ण । ६. प्राप्त [को०] । ७. सज्जित [को०] । यौ०—आक्रांतनायिका = वह नायिका जिसका प्रेमी या पति जीत लिया गया हो । आक्रांतमित = जिसकी मति मारी गई हो ।

आक्रांति
संज्ञा स्त्री० [आक्रान्ति] १. उथल पुथल । उपद्रव । २. अधिकार करना [को०] । ३. दबाना । चाँपना [को०] । ४. ऊपर चढ़ना [को०] । ५. शक्ति । ताकत [को०] ।

आक्रामक
वि० [सं०] आक्रमणकारी [को०] ।

आक्रीड़
संज्ञा पुं० [सं० आक्रीड] १. क्रीड़ा का स्थान । २. कीड़ा । खेल कूद । कुलेल [को०] । यौ०—आक्रोड़गिरि, आक्रीड़पर्वत=क्रीड़ा के लिये निर्मित कृत्रिम पर्वत ।

आक्रीड़न
संज्ञा पुं० [सं० आक्रीडन] खेलना कूदना [को०] ।

आक्रीड़ी
वि० [सं० आक्रीडिन्] खेलनेवाला [को०] ।

आक्रुष्ट (१)
वि० [सं०] शापित । केसा हुआ । (जिसे) गाली दी गई हो ।

आक्रुष्ट (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. डाँट फटकार । २. परुष भाषण [को०] ।

आक्रोश
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आक्रुष्ट, आक्रोशित] १. कोसना । शाप देना । गाली देना । २. धर्मशास्त्रानुसार कुछ दोष लगाते हुए जाति कुल आदि का नाम लेकर किसी को कोसना । विशेष—वह नारद के मत से तीन प्रकार का है-निष्ठुर, अश्लील और तीव्र । तू मूर्ख है, तुझे धिक्कार है, इत्यादि कहना निष्ठुर है । माँ बहिन आदि की गाली देना अश्लील और महापातकादि दोषों का आरोप करना तीव्र है । ३. शपथ [को०] । यौ०—आक्रोशपरिषह = जैनशास्त्रानुसार किसी के अनिष्ट वचन को सुनकर कोप न करना ।

आक्रोशक
वि० [सं०] १. डाँटने फटकारनेवाला । २. गाली देनेवाला [को०] ।

आक्रोशन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'आक्रोश' [को०] ।

आक्रोशित
वि० [सं०] दे० 'आक्रुष्ट' ।

आक्लांत
वि० [सं आक्लान्त] सना हुआ । पोता हुआ । यौ०—रुधिराक्लांत=खून से तर बतर ।

आक्लिन्न
वि० [सं०] १. आर्द्र । ओदा । तर । २. नरम । कोमल । ३. दयार्द्र [को०] ।

आक्लेद
संज्ञा पुं० [सं०] नमी । तरावट । गीलापन [को०] ।

आक्ष
वि० [सं०] १. अक्षांश संबंधी । २. अक्षसंबंधी [को०] ।

आक्षकी, आक्षिकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] बहेड़े के बीज से तैयार होनेवाली मदिरा [को०] ।

आक्षद्यूतिक
वि० [सं०] जूए से प्रभावित या संपन्न [को०] ।

आक्षपटलिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. लेखा जोखा या कागज पत्र रखनेवाला । २. गणनाधिकारी [को०] ।

आक्षपाटिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. जूए का निर्णायक । २. द्यूतगृह का प्रबंधक या संचालक [को०] ।

आक्षपाद
(१) वि० [सं०] अक्षपाद या गौतम का शिष्य ।

आक्षपाद (२)
संज्ञा पुं० १. न्यायदर्शन का अनुयायी । नैय्यायिक । २. न्यायदर्शन [को०] ।

आक्षारण
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० आक्षारण] व्यभिचार का दोषा- रोप [को०] ।

आक्षारित
वि० [सं०] १. मैथुनापराधी । जिसने संभोग किया हो । २. संभुक्त [को०] ।

आक्षिक
(१) वि० [सं०] [वि० स्त्री० आक्षिकी] १. पासा फेंकनेवाला । २. जूए से उपार्जन करनेवाला । ३. जुए द्वारा जीता हुआ । ४. जूए या पासे से संबधित [को०] ।

आक्षिक (२)
संज्ञा पुं० १. वृक्षविशेष । २. सूए से अर्जित द्रव्य । ३. जूए में हारी हुई रकम ।

आक्षिक ऋण
संज्ञा पुं० [पुं०] जूआ खेलने के लिये आया हुआ ऋण ।

आक्षिक पण
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की शलाका [को०] ।

आक्षिप्त
वि० [सं०] १. फेंका हुआ । गिराया हुआ । उ०—विषय- सुख-आलसा दंस-मसकादि, खल झिल्ली रूपादि सब सर्प स्वामी । तत्र आक्षिप्त तव विषय माया, नाथ अंध मैं मंध व्याला- दगामी ।-तुलसी ग्रं०, पृ० ४८९ । २. दूषित । अपवादित । ३. निंदित । ४. अभिभूत । बहकाया हुआ (को०) । ५. घबड़ाया हुआ (को०) । ६. प्रक्षिप्त । जोडा़ हुआ (को०) । ७. छीना हुआ (को०) । ८. समकक्ष (को०) ।

आक्षीब
वि० [सं०] १. थोड़ी मदिरा पिए हुए । २. मत्त । नशे में बुत [को०] ।

अक्षीव
संज्ञा [सं०] सहिजन ।

आक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आक्षेपी, आक्षिप्त] १. फेंकना । गिराना । २. आरोप । दोष लगाना । अपवाद या इलजाम लगाना । ३. कटुक्ति । निंदा । ताना । जैसे,—उस लेख में बहुत लोगों पर आक्षेप किया गया है । ४. एक रोग जिसमें रोगी को अंग में कँपकँपी होती है । यह वातरोग का एक भेद है । ५. ध्वनि । व्यंग्य । अग्निपुराण के अनुसार यह ध्वनि का पर्याय है, पर अन्य अलकारियों ने इसमें कुछ विशेषता वतलाई है; अर्थात् जिस ध्वनि की सूचना निषेधात्मक वर्णन द्वारा मिले, उसे आक्षेप कहना चाहिए । उ०—दर्शन दे मोहि चंद ना, दर्शन को नहिं काम । निरख्यो तब प्यारी बदन, नवल अमल अभिराम ।-(शब्द०) । ६. किसी वर्णन में न दी हुई प्रासंगिक बात को ऊपर से जोड़ना । शब्दों द्वारा न कही हुई बात को अपनी ओर से लगाना । अध्याहार । उ०—मुक्तक में जहाँ नायक नायिका का चित्रण नहीं होता वहाँ उनका ग्रहण आक्षेप द्वारा होता है ।—रस०, पृ० १२८ । ७. निधि (को०) । ८. आपत्ति । संदेह (को०) । ९. धड़कन (को०) । १०. स्तब्धता (को०) । ११. पोतना । लगाना (को०) । १२. पहुँच (बाण की) ।

आक्षेपक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० आक्षेपिका] फेंकनेवाला । २. खींचनेवाला । ३. आक्षेप करनेवाला । निंदक ।

आक्षेपक (२)
संज्ञा सं० [सं०] १. एक वातरोग जिसमें वायु कुपित होकर धमनियों में प्रवेश कर जाती है और बार बार शरीर को कँपाया करती है । २. शिकारी (को०) ।

आक्षेपण (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० आक्षेपमी] आकर्षण करनेवाला । संमोहित करनेवाला [को०] ।

आक्षेपण (२)
संज्ञा पुं० १. फेंकना । पवारना । २. निंदा करना [को०] ।

आक्षेपी
वि० [सं० आक्षेपिन्] दे० 'आक्षेपक' ।

आक्षोट, आक्षोड
संज्ञा पुं० [सं०] अखरोट ।

आक्षोदन
संज्ञा पुं० [सं०] शिकार । आखोट । मृगया [को०] ।

आक्साइड
संज्ञा पुं० [अं०] आक्सीजन और किसी तत्व (एलिमेंट) के मेल से बना एक पदार्थ या द्रव्य । अम्लजिद । विशेष—भिन्न भिन्न तत्वों के संयोग से भिन्न प्रकार के आक्साइड बनते हैं, जैसे पारे से आक्साइड आफ मर्करी, जस्ते से आक्साइड आफ जिंक, लोहे से आक्साइड आफ आइरन इत्यादि ।

आक्सीजन
संज्ञा पुं० [अं०] एक गैस या सूक्ष्म वायु । अम्लज । अम्लजन । प्राणद । प्राणप्रद । ओषजन । विशेष—वह रूप, रस, गंधरहित पदार्थ है और वायुमंडलगत वायु से कुछ भारी होता है तथा पानी में घुल जाता है । यह जल में ८९ फी सदी होता है । धातु में लगकर यह मोरचा उत्पन्न करता है । प्राणियों के जीवन के लिये यह बहुत आव- श्यक है । यह बहुत से पदार्थों में संयुक्त रूप मिलता है ।

आखंडल
संज्ञा पुं० [सं० आखण्डल] इंद्र ।

आख
संज्ञा पुं० [सं०] खंता । खंती । रंभा ।

आखण
वि० [सं०] (खोदने या खनने में) कड़ा । जैसे,—पत्थर [को०] ।

आखत पु †
संज्ञा पुं० [सं० अक्षत, प्रा० अक्खत] १. अक्षत । उ०—सेवा सुमिरन सूजिबो पात आखत थोरे ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४५७ । २. चंदन या केसर में रँगा हुआ चावल यो मूर्ति के मस्तक पर स्थापना के समय और दूल्हा दुलहिन के माथेपर विवाह के समय लगाया जाता है । ३. वह अन्न जो गृहस्थ लोग नेगी परजों को विवाहादि अवसरों पर किसी विशेष कृत्य के उपलक्ष में देते हैं ।

आखता
वि० [ला० आखता] जिसके अंडकोश चीरकर निकाल लिए गए हों । बधिया । विशेष—यह शब्द प्रायः घोड़े के लिये प्रयुक्त होता है; पर कोई कोई इस शब्द का कुत्ते और बकरे के लिये भी प्रयोग करते हैं ।

आखन (१) पु
क्रि० वि० [सं० आ+क्षण] प्रति क्षण । हर घड़ी ।

आखन (२)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'आख' [को०] ।

आखना (१) पु
क्रि० सं० [सं० आख्यान, प्रा० आक्खान, पुं० √ आखना] उ०—कहना । बोलना । उ०—(क) बार बार का आखिये, मेरे मन की सोय । कलि तो ऊखल होयगी, साई और न होय ।—कबीर (शब्द०) । (ख) सत्यसंध साँचे सदा, जे आखर आखे । प्रनतपाल पाए सही, जो फल अभिलाखे ।— तुलसी (शब्द०) ।

आखना (२)
क्रि० स० [सं० आकांक्षा] चाहना । इच्छा करना । उ०— तोहि सेवा बिछुरन नहिं आखौं । पींजर हिये घालि कै राखौं ।—जायसी ग्रं०, पृ० २२ ।

आखना (३)
क्रि० स० [सं० अक्षि, प्रा० आक्खि=आँख] देखना । ताकना । उ०—अलक, भुअंगिन अधरहि आखा । गहै जो नागिन सो रस चाखा ।—जायसी ।—(शब्द०) । (ख) आत्म और विषै को सुख वाच्य पद आनंद को । विषै सुख त्यागि आत्म सुख लक्ष्य आखिये ।—निश्चल (शब्द०) ।

आखना (४)
क्रि० स० [हिं० आखा] मोटे आटे को आखे में डालकर चालना । छानना ।

आखनिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. खनक । २. चूहा । ३. शूकर । ४. चोर । ५. कुदाल [को०] ।

आखर (१)पु
संज्ञा पुं० [सं० अक्षर, प्रा० अक्खर] अक्षर । उ०—(क) तब चंदन आखर हिय लिखे । भीख लेइ तुइ जोग न सिखे ।—जयसी ग्रं०, पृ० ८४ । (ख) कबिहि अरथ आखर बलु साँचा । अनुहरि ताल गतिहि नटु नाँचा ।—मानस, २ । २४० । क्रि० प्र०—देना=बात देना । प्रतिज्ञा करना ।

आखर (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. फवड़ा । कुदाल । २. खनक । ३. जानवर की माँद । विवर । ४. अग्नि का एक नाम [को०] ।

आखा (१)
संज्ञा पुं० [सं० आक्षरण=छानना] झीने कपड़े से मढ़ा हुआ एक मेड़रेदार बरतन जिसमें मोटे आटे को रखकर चालने से मैदा निकलता है । एक प्रकार की चलनी । आँधी ।

आखा (२)
संज्ञा पुं० [देश०] खुरजी । गठिया ।

आखा (३)
वि० [सं०अक्षय, प्रा० अक्खय] १. कुल । पुरा । समूचा । समस्त । उ०—कहियैं जिय न कछू सक राखौ । लाँबी मेलि दई हैं तुमकौ, बकत रहौ दिन आखौ ।—सूर०, १० । ३५४० । जैसे,—उसे आज आखा दिन बिना खाए बीता । २. अनगढ़ा । समूचा । जैसे,—आखा लखड़ी (लश्करी) ।

आखातीज
संज्ञा स्त्री० [सं० अक्षयतृतीया] वैशाख सुदी तीज । अक्षयतृतीया । विशेष—इस दिन हिंदुओं के यहाँ बट का पूजन होता है और ब्राह्मणों को पंख, सुराहियाँ, ककड़ी, आयि ठंढक पहुँचानेवाली चीजें दी जाती हैं ।

आखानवसी
संज्ञा स्त्री० [सं० अक्षयनवमी] कार्तिक शुक्ला नवमी । दे० 'अक्षय नवमी' ।

आखिर (१)
वि० [फा० आखिर] अंतिम । पीछे का । पिछा । यौ०—आखिर जमाना । आखिर दम ।

आखिर (२)
संज्ञा पुं० १. अंत । जैसे,—आखिर को वह ले के टला । २. परिणाम । फल । नतीजा । जैसे,—इस काम का आखिर अच्छा नहीं ।

आखिर (३)
वि० समाप्त । खतम । उ०—उपजै औ पालै अनुसरै । बावन अक्षर आखिर करै ।—कबीर (शब्द०) ।

आखिर (४)
क्रि० वि० १. अंत में । अंत को । जैसे—(क) आखिर उसे यहाँ से चला ही जाना पड़ा । (ख) वह कितना ही क्यों न बढ़ जाय, आखिर है तो नीच ही । २. हारकर । हार मानकर थककर । लाचार होकर । जैसे,—जब उसने किसी तरह नहीं माना, तब आखिर उसके पैर पड़ना पड़ा । ३. अवश्य । जरूर । जैसे,—आपका काम तो निकल गया, आखिर हमैं भी तो कुछ मिलना चाहिए । ४. भला । अच्छा । खैर । तो । जैसे,—अच्छा आज बच गए, जाओ, आखिर कभी तो भेंट होगी ।

आखिरकार
क्रि० वि० [फा० आखिरकार] अंत में । अंजाम को । अंत को । जैसे,—सुनते सुनते आखिरकार उससे नहीं रहा गया और वह बोल उठा ।

आखिरत
संज्ञा स्त्री० [अ० आखिरत] १. परलोक । २. अंत । ३. फल [को०] ।

आखिरी
वि० [फा० आखिरी] अंतिम । सबसे । पिछला । उ०—केशव को लगना, स्यात्, आखिरी घाव अभी तक बाकी है ।-साम०, पृ० ३१ ।

आखु
संज्ञा पुं० [सं०] १. मूसा । चूहा । यौ०—आखुकर्णपर्णीका, आखुकर्णी, आखुपर्णिका आखुपर्णी = मूसाकानी लता । आखुग, आखुपत्र, आखुभुक् = बिलार । आखुरथ = आखुवाहन = गणेश । २. देवताल । देवहाड । ३. सूअर । शूकर । ४. कुदाल । फावड़ा [को०] । ५. चोर [को०] । ६. कृपण । कंजुस [को०] ।

आखुकरीष
संज्ञा पुं० [सं०] वाल्मीक [को०] ।

आखुघात
संज्ञा पुं० [सं०] मूस पकड़ने या मारनेवाला । मुसहर [को०] ।

आखुपाषाण
संज्ञा पुं० [सं०] १. चुंबक पत्थर । २. संखिया नामक विष ।

आखबाहन पु
संज्ञा पुं० [सं० आखुवाहन] गणेश । उ०—अभिलाष लाख लाहन समुझि राखु आखुवाहन हृदय ।—भिखारी० ग्रं०, भा० १, पृ० १ ।

आखुभुक्
संज्ञा पुं० [सं०] विडाल । बिलार [को०] ।

आखुबिषहा
संज्ञा पुं० [सं०] देवताली लता [को०] ।

आखेट
संज्ञा पुं० [सं०] अहेर । शीकार । मृगया ।

आखेटक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] शीकार । अहेर ।

आखेटक (२)
वि० [सं०] शिकार करनेवाला । शिकारी । अहेरी ।

आखेटिक (१)
वि० [सं०] १. कुशल शिकार करनेवाला । २. भयानकी । डरावना [को०] ।

आखेटिक (२)
संज्ञा पुं० १. शिकारी । २. शिकारी कुत्ता [को०] ।

आखेटी
वि० [सं० आखेटिन] [वि० स्त्री० आखेटिन] शिकारी । अहेरी ।

आखोट
संज्ञा पुं० [सं० आक्षोट] अखरोट ।

आखोर (१)
संज्ञा पुं० [सं० आक्षोर] १. जानवरों के खाने से बची हुई घास या चारा । पखोर । २. चरनी । ३. जानविरों के पानी पीने का हौद । ४. कूड़ा करकट । ५. निकम्मी वस्तु । सड़ी गली चीज । मुहा०—आखोर की भरती = (१) निकम्मों का समूह । (२) निकम्मी चीजों का अटाला ।

आखोर (२)
वि० १. निकम्मा । बेकाम । २. सड़ा गला । रद्दी । ३. मैला कुचैला ।

आख्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नाम । २. कीर्ति । यश । ३. विवरण । व्याख्या । ४. आकृति । चेहरा [को०] । ५. सौंदर्य । गरिमा [को०] ।

आख्यात (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. तिङ्त क्रिया । २. राजवंश के लोगों का वृत्तांत । ३. प्रयाणकाल का आनुमानिक सूचक [को०] ।

आख्यात (२)
वि० १. प्रसिद्ध । नामवर । विख्यात । २. कहा हुआ । उक्त ।

आख्यातव्य
वि० [सं०] वर्णन करने योग्य । कहने योग्य । बयान करने लायक ।

आख्याता
वि० [सं० आख्यात] कहनेवाला । उपदेशक । शिक्षक [को०] ।

आख्याति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नामवरी । ख्याति । शुहरत । २. कथन ।

आख्यान
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आख्यात, आख्यातव्य, आख्येय] १. वर्णन । वृत्तांत । बयान । २. कथा । कहानी । किस्सा । ३. उपन्यास के तौ भेदों में से एक । वह कथा जीसे कवि ही कहे, पात्रों से न कहलावे ।विशेष—इसका आरंभ कथा के किसी अंश से कर सकते हैं, पर पीछे से पूर्वापर संबंध खुल जाना चाहिए । इसमें पात्रों की बातचीत बहुत लंबी चौड़ी नहीं हुआ करती । चूँकि कथा कहनेवाला कवि ही होता है और वह पूर्वघटना का व्रणन करता है, इससे इसमें अधिंकतर भूतकालिक क्रिया का प्रयोग होता है, पर दृश्यों को ठीक ठीक प्रत्यक्ष कराने के लिये कभी कभी वर्तमानकालिक क्रिया का भी प्रयोग होता है । जैसे,— सूर्य डूब रहा है, ठंढी हवा चल रही है, इत्यादि । आजकल के नएढंग के उपन्यास इसी के अंतर्गत आ सकते हैं । ४. जवाब । उत्तर [को०] । ५. भेदक धर्म [को०] । ६. प्रबंधक काव्य का अध्याय या सर्ग [को०] । ७. पौराणिक कथा [को०] ।

आख्यानक
संज्ञा पुं० [सं०] १. वर्णन । वृत्तांत । बयान । २. कथा । किस्सा । कहानी । ३. पूर्ववृत्तांत । कथानक ।

आख्यानकी
संज्ञा स्री० [सं०] इंद्रवज्रा तथा उपेंद्रवज्रा के मेल से निर्मित छंदविशेष [को०] ।

आख्यानिकी
संज्ञा पुं० [सं०] दंडक वृत्त के भेदों में से एक जिसके विषम चरणों में त, त, ज, ग, ग, और सम में ज, त, ज, ग, ग हो । उ०—गोविंद गोविंद सदा रटौ जू । असार संसार तबै तरौ जू । श्रीकृष्ण राधा भजु नित्य भाई । जु सत्य चाहो अपनी भलाई (शब्द०) । विशेष—इसके विरुद्ध अर्थात् इसके विषम रचण का लक्षण सम चरण में आने और सम चरण का लक्षण विषम चरण में आवे, तो उस वृत्त को ख्यानिकी कहेंगे ।

आख्यापक (१)
वि० [सं०] [स्त्री० आख्यायिकी] कहनेवाला ।

आख्यायक (२)
संज्ञा पुं० दूत ।

आख्यापन
संज्ञा पुं० [सं०] प्रकट करना । प्रकाश करना । कहना । कथन ।

आख्यायक (१)
वि० [सं०] बतानेवाला । सूचना देनेवाला [को०] ।

आख्यायक (२)
संज्ञा पुं० १. दूत । २. नेता । प्रवक्ता [को०] ।

आख्यायिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कथा । कहानी । किस्सा । २. कल्पत कथा जिससे कुछ शिक्षा निकले । ३. एक प्रकार का आख्यान जिसमें पात्र भी अपने अपने चरित्र अपने मुँह से कुछ कुछ कहते हैं । विशेष—प्राचीनों में इसके विषय में मत भेद हैं । आग्निपुराण के अनुसार यह गद्दकाव्य का वह भेद है जिसमें विस्तारपूर्वक कर्ता की वंशप्रशंसा, कन्याहरण, संग्राम वियोग और विपत्ति का वर्णन हो; रीति, आचरण और स्वभाव विशेष रूप से दिखाए गये हों, गद्दसरल हो और कहीं कहीं छंद हो । इसमें परिच्छेद के स्थान पर उच्छवास होना चाहिए । वाग्भट्ट के मत से वह गद्दकाव्य जिसमें नायिका ने अपना वृत्तांत आप कहा हो, भविष्यद्विषयों की पूर्वसूचना हो, कन्या के अपहरण, समागम और अभ्युदय का हाल है, मित्रादि के मुँह से चरित्र कहलाए गए हों और बीच बीच में कहीं कहीं पद्द भी हों ।

आख्येय
वि० [सं०] दे० 'आख्यातव्य' ।

आगंता
वि० [सं० आगन्तृ] आगे की उच्छावाला [को०] ।

आगंतु
वि० [सं० आगन्तु] १. आनेवाला । २. बाहर से आनेवाला । ३. पथभ्रष्ट । भटका हुआ । ४. अचानक होनेवाला । दे० 'आगंतुक' [को०] ।

आगंतुक (१)
वि० [सं० आगन्तुक] [स्त्री० आगंतुका, आगंतुकी] १. जो आवे । आगमनशील । २. जो इधर उधर से घूमना फिरता आ जाय । उ०—लगा कहने आगंतुक व्यक्ति मिटाया उत्कंठा सविशेष ।—कामायनी, पृ० ५० ।

आगंतुक (२)
संज्ञा पुं० १. अतिथि । पहुना । २. वह पशु जिसके स्वामी का पता न हो । २. अचानक होनेवाला रोग । ३. प्रक्षिप्त पाठ (को०) । यौ.—अगंतुक ज्वर = वह ज्वर जो चोट, भूत, प्रेत के भय या अधिक श्रम करने आदि से अचानक हो जाय । आगंतुक अनि- मित्त लिंगनाश = एक प्रकार का चक्षुरोग जिसमें आँख की ज्योति मारी जाती है । प्राचीनों के अनुसार यह रोग देवता, ऋषि, गंधर्व, बड़े सर्प और सूर्य के देखने से हो जाता है । आगंतुकब्रण=वह घाव जो चोट के पकने से हो । आगंतुक व्याधि=किसी विमारी के बीच में होनेवाली बिमारी ।

आग (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० अग्नि, प्रा० अग्नि] १. तेज और प्रकाश का पुंज जो उष्णता की पराकाष्ठा पर पहुँची हुई वस्तुओं में देखा जाता है । अग्नि । बैसंदर । २. जलन । ताप । गरमी । जैसे,— वह डाह की आग से झुलसा जाता है । ३. कामाग्नि । काम का वेग । जैसे,—तुम्हें ऐसी ही आग उनसे जाकर मिलो न । ४. वात्सल्य प्रेम । जैसे,—जो अपने बच्चे की आग होती है वह दूसरे के बच्चे की नहीं । ५. डह । ईर्षा । जैसे,—जिस दिन से हमें इनाम मिला है, उसी दिन से उसे बड़ी आग है ।

आग (२)
वि० जलता हुआ । बहुत गरम । जैसे,—चिलम तो आग हो रही है । १. जो गुण में उष्ण हो । जो गरमी फूँके । जैसे,— अरहर की दाल तो आजकल के लिये आग है । मुहा०—आग उगलना=कड़ुए वचन सुनान । जली कटी सुनाना । आग उठाना = झगड़ा उठाना । कलह या उपद्रव उत्पन्न करना । आग कँजियाना या झँवाना=आग का ठंढा होना । दहकते हुए कोयले का ठंढ़ होकर काला पड़ जाना । आग करना = (१) आग जलाना । (२) बहुत गर्म करना । आग की तरह जलता हुआ बनाना । आग का पतंगा = चिनगारी । जलता हुआ कोयला । आग का पुतला = क्रोधी । चिड़चिडा़ । आग का बाग = (१) सुनार का अंगीठा । २. आतिशबाजी । आग कुरेदना = (१) गुस्सा भड़काना । क्रुद्ध करना । २. दबे या पुराने गुस्से को उभाड़ना । आग के मोल=बहुत मँहगा । जैसे,—यहाँ तो चीजें आग के मोल बिकती हैं । आग खाना, अंगार हगाना = जैसा करना, वैसा पाना । जैसे,— हमें क्या, जो आग खाएगा, वह अँगार हगेगा । आग गाड़ना = कंडे को राख में सुरक्षित रखना । आग जोड़ना = आग सुलगाना । आग जलाना । आग झाड़ना = पत्थर या चकमक से आग बनाना । आग दिखाना=(१)आग लगाना । जलाने के लिये आग छुलाना । (२) तोप में बत्ती देना । आग देना=(१) चिता में आग लगाना । दाहकर्म करना । (२) आतिश- बाजी में आग लगाना । आग लगाना । फूँकना । उ०—लागी कंठ आगि देह होरी । छार भई जरि अंग न मोरी ।—जायसी ग्रं०, पृ० ३०० । (३) बरबाद करना । नष्ट करना । जैसे,—उसके पास हे क्या, उसने तो अपने घर में आग दे दी । (४) तोप में बत्ती देना = रंजक पर पलीता छुलना । आग धोना = अंगारों के ऊपर से राख दूर करना । जैसे,—आग धोकर चिलम पर रखना । आग पर आग डालना = किसी भड़के हुए व्यक्ति को और भड़काना । आग पर पानी डालना = झगड़ा शांत करना । आग पर लोटना = बेचैन होना । विकल होना । तडपना । उ०—वह बिरह के मारे आग पर लोट रहा है । २. डाल से जलना । ईर्षा करना । जैसे,—यह हमें देखकर आग पर लोट जाता है । आग पानी का बैर = स्वाभाविक शत्रुता । जन्म का बैर । आग फँकना = (१) व्यर्थ की बकवाद कनरा । बात बघारना । झूठी शेखी हाँकना । जैसे,— उसकी क्या बात है, वे तो यों ही आग फाँका करते हैं । (२) असंभव कार्य को संभव करने की चेष्टा । आग फुँकना=क्रोध उत्पन्न होना । रिस लगना । जैसे,—यह बात सुनते ही मेरे तन में आग फूँक गई । आग फूँक देना = जलन उत्पन्न करना । गरमी पैदा करना । जैसे,—इसदवा ने तो और आग फूँक दी है । आग फूश का बैर = स्वाभाविक शत्रुता । जन्म का बैर । आग बनाना = आग सुलगाना । आगबबूला (बगूला) होना या बनाना = क्रोध के आवेश में होना । अत्यंत कुपित होना । जैसे,—इस बात के सुनते ही वह आगबबूला हो गया । आग बरसना = (१) बहुत गरमी पड़ना । (२) लू चलना । २. गोलियों की बौछार होना । अग बरसना = शत्रु पर खूब गोलियाँ चलाना । जैसे,—सिपाहियों ने किले पर खूब आग बरसाई । आग बुझा लेना = कसर निकलना । बदला लेना । जैसे,—अच्छा मौका है, तुम भी अपनी आग बुझा लो । आग बोना=(१) आग लगाना । उ०—योगी आहि वियोगी कोई । तुम्हरे मँडप आगि जिन बोई ।—जायसी, (शब्द०) । २. चुगलखोरी करके झगड़ा उत्पात खड़ा करना । जैसे,— यह सब आग तुम्हारी ही बोई तो है । आग भड़कना=(१) आग का धधकना । २. लड़ाई उठना । उत्पात खड़ा होना । जैसे,—दोनों दलों के बीच आजकल खूब आग भड़की है । ३. उद्वेग होना । जोश होना । क्रोध और शोक आदि भावों का तीव्र और उद्दीप्त होना । जैसे,—(क) शत्रु को सामने देखकर उसकी आग और भड़क उठी । (ख) अपने मृत पुत्र की टोपी देखकर माता की आग और भड़क उठी । आग का भड़कना = (१) आग धधकना । २. लड़ाई लगाना । ३. क्रोध और शोक आदि भावों के उद्दिप्त करना । जोश बढ़ाना । आग भभूका होना = क्रोध से लाल होना । आग में कूदना = जान बूझकर विपत्ति मोल लेना । आग में घी डालना = (१) क्रोधित व्यक्ति को और क्रुद्ध करना । (२) आहुति डालना । होम करना । आग में कूदना = अति करना । जैसे,—सीधे चलो, क्यों आग में सूतते हो । आग में झोंना = (१) आफत में डाल देना । (२) लड़की को ऐसे घर ब्याह देना जहाँ उसे हर घड़ी कष्ट हुआ करे । आग में पानी डालना = झगड़ा मिटाना । बढ़ते हुआ क्रोध को धीमा करना । आग लगना = आग से किसी वस्तु का जलना । उ०—नयन चुवहि जस महवट नीरू । तेहि जल आग सिर चीरू । ।—जायसी (शब्द०) । जैसे—उसके घर में आग लग गई । (२) क्रोध उत्पन्न होना । कुढ़न होना । बुरा लगना । मिर्चा लगना । जैसे,—(क) उसकी कड़वी बातें सुनकर आग लग लई । (ख) तुम तो मनमाना बके, अब हमारे जरा सी कहने पर आग लगती है । (३) ईर्षा होना । डाह होना । जैसे,—किसी को सुख चैन से देख कि बस आग लगी । (४) लाली फैलना । लाला फूलों का चारों ओर फूलना । उ०—बागन बागन आग लगी है (शब्द०) । (५) महँगी फैलाना । गिरानी होना । जैसे,—(क) बाजार में तो आजकल आग लगी है । (ख) सब चीजों पर तो आग लगी है कोई ले क्या । (६) बदनामी फैलना । जैसे,—देखो चारों ओर आग लगी है, सँभलकर काम करो (७) हटना । दूर होना । जाना । उ०— कभी यहाँ से तुन्हें आग भी लगेगी (स्त्री०) । (८) किसी तीव्र भाव का उदय होना । जैसे,—उसे देखते ही हृदय में आग लग गई । ९. सत्यानाश होना । नष्ट होना । जैसे,—आग लगे तुम्हारे इस चाल पर (यह मुहाविरा स्त्रियों में अधिक प्रचलित है । वे इसे अनेक अवसर पर बोला करती हैं, कभी चिढ़कर, कभी हावभाव प्रकट करने के हेतु और कभी यों ही बोल देती हैं) जैसे,—(क) आग लगे मेरी सुध पर, क्या करने आई थी, क्या करने लगी । (ख) आग लगे, यह छोटा सा लड़का कैसा स्वाँग करता है । (ग) आग लगे, कहाँ से मैं इसके पास आई । आग लगाना=(१) आग से किसी वस्तु को जलाना । जैसे,—उसने अपने ही घर में आग लगा दी । (२) गरमी करना । जलन पैदा करना । जैसे,—उस दवा ने तो बदन में आग लगा दी । (३) उद्वेग बढ़ाना । जोश बढ़ाना । किसी भाव को उद्दीपिन करना । भड़काना । ४. ईर्षा उत्पन्न करना । ५. क्रोध उत्पन्न करना । ६. चुगली करना । जैसे,—उसी ने तो मेरे भाई से जाकर आग लगाई है । ७. बिगाड़ना । नष्ट करना । जैसे,—जो चीज उसे बनाने को दी जाती है, उसी में वह आग लगा देती है । (स्त्री०) । ८. फूँकना । उड़ाना । बरबाद करना । जैसे,—वह अपनी सारी संपत्ति में आग लगाकर बैठा है । ९. खूब धूमधाम करना । बड़े बड़े काम करना । (व्यंग्य) जैसे,—तुम्हारे पुरखों ने विवाह में कौन सी आग लगाई थी कि तुम भई लगाओगे । आग लगाकर पानी को दौड़ाना = झगड़ा उठाकर फिर सबको दिखाकर उसकी शांति का उद्दोग करना । आग भी न लगाना = बहुत तुच्छ समझना । जैसे,—उससे बोलने की कौन कहे, मैं तो उसको आग भई न लगाऊँ । (स्त्री०) । आग लगने पर कुआँ खोदना = (१) कोई कठिनाई कार्य आ पड़ने पर उसके परने के सीधे उपाय छोड़ बड़ी लंबी चौड़ी युक्ति लगाना । (२) ऐन मौके पर कोई कार्य करने लग जाना । आग लगाकर तमाशा देखना = झगड़ा या उपद्रव खड़ा करके अपना मनोरंजन करना । आग लेने आना = आकर फिर थोड़ी देर में लौट जाना । उलटे पाँव लौटना । थोड़ी देर के लियेआना । जैसे,—(क) जरा बैठा भाई, क्या आग लेने आए हो? (ख) आग लेने आई, घरवाली बन बैठी । आग से पानी होना या हो जाना = क्रुद्ध से शांत होना । रिस का जाता रहना । जैसे,—उसकी बातें ही ऐसी मीठी होती हैं कि आदमीअग से पानी हो जाय । आग होना =(१) गर्म होना । लाल अंगार होना । २. क्रुद्ध होना । रोष में भरना । जैसे,—यह बात सुनते ही आग हो गए । किसी की आग में कूदना या पड़ना = किसी की विपत्ति अपने ऊपर लेना । तलवों से आग लगाना—शरीर भर में क्रोध व्याप्त होना । रिस से भर उठना । जैसे,=उसकी झूठी बात से और भी तलवों से आग लग गई । पानी में आग लगाना = (१) ऐसी अनहोनी बातें कहना जिनका होना संभव न हो । (२) असंभव कार्य करना । (३) जहाँ लड़ाई की कोई बात न हो वहाँ भी लड़ाई लगा देना । पेट की आग = भूख । जैसे,—कोई दाता ऐसे है जो पेट की आग बुझावे । पेट में आग लगना = भूख लगना । जैसे,— इस लड़के के पेट में सबेरे से ही आग लगती है । मुँह में आग लगना = मरना । जैसे,—उसके मुँह में कब आग लगेगी । (शवदाह के समय मुर्दे के मुँह में आग लगाई जाती है ।) आग लगे मेंह मिलता या पाना=ताव पर किसी काम का चटपट होना । उ०—याकें तौ आजु ही मिलौं कि अरि जाऊँ ऐसें । आगि लागे मेरी माई मेहु पाइयतु है-केशव ग्रं०, भा० १, पृ० ६६ । आग पर आग मेलना=जले को जलाना । दुःख पर दुःख देना । उ०—विरह आगि पर मेलै आगी । बिरह घाव पर घाव बजागी ।—जायसी ग्रं०, पृ० १०६ । यौ०—आगजंत्र=तोप ।—(डिं०) । आगबाण = अग्निबाण । आग लगन = हाथी का एक रोग जिससे उसके सारे शरीर में फफोले पड़ जाते हैं ।

आग (३)पु †
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'आगे' । उ०—चित डोलै नहिं खूँटी टरई पल पल पेखि आग अनुसरई ।—जायसी (शब्द०) ।

आग (४) पु
संज्ञा पुं० [सं० अग्र, प्रा० आग] १. दे० 'आग' । उ०— तू रिसभरी न देखेसि आगू । रिस महँ काकर भयउ सोहागू ।— जायसी ग्रं०, पृ० ३७ । २. ऊख का अगौरा या अगला हिस्सा । उ०—जोरी भली बनी है उनकी, राजहंस अरु काग । सूरदास प्रभु ऊख छाँड़िकै, चतुर चचोरत आग ।—सूर०, १० । ३६५२ । ३. हल के हरसे की नोक के पास के खड्डे जिनमें रस्सी अटका कर जुआठे से बाँधते हैं ।

आगजनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० आग+प्रा० जन+हिं० ई (प्रत्य०)] अग्निकांड । उपद्रवियों द्वारा लगाई जानेवाली आग ।

आगड़ा
संज्ञा पुं० [सं० अ=नहीं+हिं० गाढ़=पुष्ट] ज्वार इत्यादि की वह बाल जिसके दाने मारे गए हों ।

आगण
संज्ञा पुं० [सं० अग्रहायण] अगहन । मार्गशीर्ष । (डिं०) ।

आगत (१)
वि० [सं०] [स्त्री० आगता] आया हुआ । प्राप्त । उपस्थित । यौ०—अभ्यागत । आगतपतिका । क्रमागत । स्वागत । दैवागत । गतागत । तथागत ।

आगत (२)
संज्ञा पुं मेहमान । पाहुना । अतिथि ।

आगत (३)
संज्ञा पुं० दे० 'आयात' । जैसे,—प्रागत कर ।

आगतत्व
संज्ञा पुं० [सं०] उत्स । मूल । उद्गम [को०] ।

आगतपतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] अवस्थानुसार नायिका एक दस भेदों में से एक । वह नायिका जिसका पति परदेश से लौटा हो । उ०—आवत बलम बिदेस तैं हरषित होइ जु बाम । आगतपतिका नाइका ताहि कहत रसधाम ।-पद्माकर ग्रं०, पृ० १३६ ।

आगतसाध्वस
वि० [सं०] भयभीत । डरा हुआ [को०] ।

आगतस्वागत
संज्ञा पुं० [सं० आगत+स्वागत] आए हुए व्यक्ति का आदर । आदरसत्कार । आवभगत ।

आगति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आगमन । अवाई । २. प्राप्ति [को०] । ३. वापसी [को०] । ४. मबल । उत्स [को०] । मौका [को०] ।

आगपीछा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आगापीछा' ।

आगम (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अवाई । आगमन । आमद । उ०—श्याम कह्यो सब सखन सों लवहु गोधन फेरि । संध्या को आगम भयो ब्रज तँन हाँकौ हेरि ।—सूर (शब्द०) । २. भविष्य काल । आनेवाला समय । ३. होनहार । भवितव्यता । संभा- वना । उ०—आइ बुझाइ दीन्ह पथ तहाँ । मरन खेल कर आगम जहाँ ।—जायसी ग्रं०, पृ० ९८ । यौ०—आगमजानी । आगमज्ञानी । आगमवक्ता । क्रि० प्र०—करना = ठिकना करना । उपक्रम बाँधना । जैसे,— यह नहीं कहते कि चंदा इकट्ठा करके तुम अपना आगम कर रहे हो । उ०—मैं राम के चरनन चित दीनों । मनसास वाचा और कर्मना बहुरि मिलन को आगम कीनों ।—तुलसी (शब्द०) ।—जनाना=होनेहार की सूचना देना । उ०— कबहुँ ऐसा विरह उवावै रे । प्रिय बिनु देखे जिय जावै रे । तौ मन मेरा धीरज धरई । कोई आगम आनि जनावै रै ।-दादू (शब्द०) ।—बाँधना=आनेवाली बात का निश्चय करना । जैसे,—अभी से क्या आगम बाँधते हो; जब वैसा समय आवेगा तब देखा जायगा । ४. समागम । संगम । उ०—अरुण, श्वेत सित झलक पलक प्रति को बरनै उपमाइ । मुन सरस्वती गंगा जमुना मिलि आगम कीन्हों आइ ।—तुलसी (शब्द०) । ५. आमदनी । आय । जैसे,—इस व्रष उनका आगम कम और व्यय अधिक रहा । यौ०—अर्थागम । ६. व्याकरण में किसी शब्दसाधन में वह वर्ण जो बाहर से लाया जाय । ८. उत्पत्ति । ८. योगशास्त्रनुसार शब्दप्रमाण । ९. वेद । उ०—आगम निगम पुरान अनेका । पढ़े सुने कर फल प्रभु एका ।—मानस, ८ । ४९ । १०. शास्त्र । ११. संत्र शात्र । १२. नीतिशास्त्र । नीति । १३. संत्रशास्त्र का वह एंग जिसमें सृष्टि, प्रलय, देवताओं की पूजा, उनका साधन, पुरश्चरण और चार प्रकार का ध्यानयोग होता है । १४. प्रवाह । धारा [को०] । १५. ज्ञान [को०] । १६. संपति की बृद्धि [को०] । १८. सिद्धांत [को०] । १८. नदी का मुहाना । १९. (व्याकरण में) प्रकृति और प्रत्यय [को०] । २०. सड़क या मार्ग की यात्रा । [को०] । २१. लिखित प्रमाणपत्र [को०] ।

आगम (२)
वि० [सं०] आनेवाला । आगामी । उ०—दरसन दियो कृपा करि मोहन बेग दियो वरदान । आगम कल्प रमण तुव ह्वै है श्रीमुख कही बखान ।—सूर (शब्द०) ।

आगमजानी
वि० [सं० आगमज्ञानिन् अथवा हिं० आगम=भविष्य+ जानो=ज्ञाता] आगमज्ञानी । होनहार का जाननेवाला ।

आगमिज्ञानी
वि० [सं० आगमज्ञानिन्] भविष्य का जाननेवाला । आगमजानी ।

आगमन
संज्ञा पुं० [सं०] १. अवाई । आना । आमद । उ०—मुनि आगमन सुना जब राजा । मिलन गएउ लै बिप्र समाजा ।— मानस, १ । २०८ । २. प्राप्ति । आय । लाभ । ३. उत्पत्ति । उद्गम [को०] । ४. संभओगार्थ नारी के पास आना [को०] ।

आगमना
संज्ञा पुं० [सं०] १. आगे चलनेवाली सेना । २. पूर्व दिशा ।

आगमनिरपेक्ष
वि० [सं०] साक्षिपत्र आदि से मुक्त । साक्षिपत्र आदि की अपेक्षआ न रखनेवाला [को०] ।

आगमनी
संज्ञा स्त्री० [सं० आगमन+हिं० ई (प्रत्य०)] स्वागत के अवसर पर किया जानेवाला समारोह या उत्सव । उ०—अपनी आगमनी बना रही मैं आप क्रद्ध हुं कारों में ।-चक्र, पृ० ८१ ।

आगमनीत
वि० [सं०] पठित । परीक्षित । अधीत [को०] ।

आगमपतिका
संज्ञा पुं [सं०] दे० 'आगतपतिका' ।

आगमरहित
वि० [सं०] १. साक्ष्यरहित । २. शास्त्र से परे [को०] ।

आगमवक्ता
वि० [सं०] १. भविष्यवक्ता । ज्योतिषी ।

आगमवाणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] भविष्यवाणी ।

आगमविद्दा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वेदविद्दा । २. तंत्रविद्दा । वैदि- केतर विद्दा ।

आगमवृद्ध
वि० [सं०] ज्ञानवृद्ध । शास्त्रज्ञ [को०] ।

आगमवेदी
वि० [सं० आगमवेदिन्] १. वेदज्ञ । २. शास्त्रज्ञ [को०] ।

आगमक्षृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] परंमरा । प्रथा [को०] ।

आगमसोची
वि० [सं० आगम+हिं० सोच+ई (प्रत्य०)] आगे का भला बुरा सोचनेवाला । अग्रसोची । दूरदर्शी ।

आगमापायी
वि० [सं० आगमापायिन्] जिसकी उत्पत्ति और विनाश हो । विनाशधर्मी । अनित्य ।

आगमित
वि० [सं०] १. पठित । शिक्षइत । २. निश्चित । निर्धारित ३. ले आया हुआ । [को०] ।

आगमिष्ट
वि० [सं०] शीघ्रता या प्रसन्नतापूर्वक आनेवाला [को०] ।

आगमी (१)
वि० [सं० आगम=भविष्य] सामुद्रिक विचारनेवाला । ज्योतिषी । अड़ड़पोपो । उ०—अवध आजु आगमी एकु आयो । करतल निरखि कहत सब गुनगन बहुतन परिचय पायो ।—तुलसी ग्रं०, पृ० २८६ ।

आगमी (२)
वि० भविष्यवक्ता । होनहार कहनेवाला ।

आगमी (३)
वि० [सं० आगमिन्] १. भविष्य । २. पहुँचनेवाला । ३. शास्त्रज्ञ ।

आगर (१)
संज्ञा पुं० [सं० आकर=खाना] [स्त्री० आगरी] १. खान । आकर । २. समूह । ढेर । विशेष—यह शब्द प्रायः समासंत में आता है । जैसे,—गुण- आगर । बल-आगर । ३. कोष । निधि । खजाना । उ०—अस वह फूल बास का आगर भा नासिका समुंद । जेति फूल वह फूलहि ते सब भए सुगंद ।—जायसी (शब्द०) । ४. वह गड्ढा जिसमें नमक जाता है । ५. नमक का कारखाना ।

आगर (२)
संज्ञा पुं० [सं० अर्गल=व्योड़ा] ब्योंड़ा । अगरी । उ०— आगर इक लोह जटित लीन्हों बरिबंड । दुहुँ करनि असुर हयो भयो मांस पिंड ।—सूर० ९ । ९६ ।

आगर (३)
संज्ञा पुं० [सं० आगार=घर] १. घर । गृह । २. छाजन का एक भेद जिसमें फूस या खर की जड़ ओलती की ओर करके छवाई होती है । ३. छाजन । छप्पर । उ०—तृण तृण बरि भा झूरी खरी । भा बरषा आगर सिर परी ।— जायसी (शब्द०) ।

आगर (४)
वि० [सं० आकर=श्रेष्ठ] [स्त्री० आगरि, आगरी] १. श्रेष्ठ । उत्तम । बढ़कर । उ०—(क) दई दीन्ह अस जगत अनूपा । एक एक ते आगर रूपा ।—जायसी (शब्द०) । (ख) जिनको साँई रँग दिया कबहुँ न होय कुरंग । दिन दिन बानी आगरी चढ़ै सवाया रंग ।—कबीर (शब्द०) । २. चतुर । होशियार । दक्ष । कुशल । उ०—जो लाँघै सत योजन सागर । करै सो रामकाज अति आगर ।-तुलसी (शब्द०) ।

आगर
५) संज्ञा पुं० [सं०] अमावस्या [को०] ।

आगरबध
संज्ञा पुं० [सं० आ+गल+बद्व] कंठमाला (डिं०) ।

आगरी
संज्ञा पुं० [हिं० आगा] नमक बनानेवाला पुरुष । लोनिया ।

आगल (१)
संज्ञा पुं० [सं० अर्गल] अगरी । ब्योंड़ा । बेंड़ा ।

आगल (२)
क्रि० वि० [हिं० अगला] सामने । आगे (लश०) ।

आगल (३)
वि० अगला । उ०—आगल से पाछल भयो, हरि सो कियो न भेंट । अब पछिताने का भया, चिड़िया चुगि गई खेत ।—(शब्द०) ।

आगला पु
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'अगला' ।

आगवन पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आगमन' । उ०—जिमि तुम्हार आगवन सुनि भए नृपत्ति बलहीन ।—मानस, १ । २३८ ।

आगवाह पु
संज्ञा पुं० [सं० आग्निवाह=धूम] धूआँ (हिं०) ।

आगस्
संज्ञा पुं० [सं०] १. पाप । २. अपराध । दोष । ३. दंड सजा [को०] ।

आगस्ती
संज्ञा स्त्री० [सं०] अगस्त की दिशा । दक्षिण ।

आगस्त्य
वि० [सं०] १. दक्षिण दिशा । २. अगस्त्य संबंधी [को०] ।

आगा (१)
संज्ञा पुं० [सं० अग्र, प्रा० अग्ग] १. किसी चीज के आगे का भाग । अनाड़ी । २. शरीर का अगला भाग । जैसे,—ऊँचे आगे का हाथी अच्छा होता है । ३. छाती । वक्षःस्थल । ४. मुख । मुँह । मुहरा । ५. ललाट । माथा । ६. लिंगेंद्रिय । ७. अँगरखे कुरते आदि की में आगे का टुकड़ा । ८. पगड़ी का छज्जा । ९. घर के सामने का भाग । मुहरा । १० सेना या फौज का अगला भाग । सेनामुख । हरावल । ११. नाव का अगला भाग । माँग । गलही । १२. घर के सामने का मैदान । घर के आगे का सहन । १३. पेशखीमा । आगड़ा । १४. पहि- नावे का वह भाग जो आगे रहता है । पल्ला । आंचल । १५. आगे आनेवाला समय । भविष्य । परिणाम । जैसे,—(क) उसका आगा मारा गया है । (ख) उसका आगा अँधेरा है । मुहा०—आगा काटना=यात्रा या कार्य में विघ्न डलना । आगा तागा लेना = आवभगत करना आदर सत्कार करना । आगा भारी होना = (१) गर्भ रहना । पैर भारी होना । जैसे,— व्याह होते ही उसका आगा भारी हो गया । (२) कहारों की बोली में राह में ठोकर गड़ढे आदि का होना जिससे गिरने का भय हो । आगा मारना = किसी के कार्य में बाधा डालना । किसी की उन्नति में रुकावट डालना । जैसे,—किसी का आगा मारना अच्छा नहीं । आगा मारा जाना=भावी उन्नति में विघ्न पड़ना । आगम मारा जाना । जैसे,—परीक्षा में फेल होने से उसका आगा मारा गया । आगा रुकना=भावी उन्नति में बाधा पड़ना । आगा रोकना = (१) आक्रमण रोकना । (२) कोई बड़ा कार्य आ पड़ने पर उसे सँभालना । मुँहड़ा सँभालना । जैसे,—इतनी बड़ी बारात अवेनी; उसका आगा रोकना भी तो कोई सहज बात नहीं है । (num>३) किसी के सामने इस तरह खड़े होना कि ओट हो जाय । आड़ करना । जैसे,—आगा मत रोको, जरा किनारे खड़े हो । (४) किसी की उन्नति में बाधा डालना । आगा लेना = शत्रु के आक्रमण को रोकना । भिड़ना । आगा सँभा- लना = (१) मुहड़ा सँभालना । कोई बड़ा कार्य आ पड़ने पर उसका प्रबंध करना । (२) किसी खुले गुप्त अंग को ढकना । (३) वार रोकना । भिड़ना । जैसे,—राजपूताने की लड़ाइयों मे पहले भील ही लोग आगा सँभालते थे ।

आगा (२)
संज्ञा पुं० [तु० आगा] १. मालिक । सरदार । २. काबुली । अफगान । ३. ज्येष्ठ भाई [को०] ।

आगाज
संज्ञा पुं० [फा० आगाज] प्रारंभ । आदि । शुरू ।

आगाता
वि० [सं० आगतृ] गाकर पाने या कमानेवाला [को०] ।

आगाध
वि० [सं०] १. अत्यंत गहरा । २. जो कठिनाई से प्राप्त हो [को०] ।

आगान (१)
संज्ञा दे० [सं० आ+गान=बात] बात । प्रसंग । आख्यान । वृत्तांत । उ०—और कृष्ण के ब्याह को भूत सुनहु आगन । पापहरण भवनिधि-तरण करन सकल कल्याण ।-गोपाल (शब्द०) ।

आगन (२)
संज्ञा पुं० [सं०] वह व्यक्ति जो गाना गाकर उपार्जन करे । गायक [को०] ।

आगापीछा
संज्ञा पुं० [हिं० आगा+पीछा] १. हिचक । सोच विचार । दुबिधा । जैसे,—इस काम के करने में तुम्हें आगा पीछा क्या है ? क्रि० प्र०—करना । जैसे,—अच्छे काम में आगा पीछा करना ठीक नहीं ।—(शब्द०) ।—होना । २. परिणाम । नतीजा । पूर्वापर संबंध । जैसे,—कोई काम करने के पहले उसका आगा पीछा सोच लेना चाहिए । क्रि० प्र०—देखना ।—सोचना । ३. शरीर का अगला और पिछला भाग । शरीर के आगे और पीछे के गुप्त अंग । जैसे,—भला इतना कपड़ा तो दो जिसमें आगा पीछा ढँके । ४. आगे और पीछे की दशा । जैसे,—जरा आगा पीछा चला करो ।

आगामि, आगामी
वि० [सं० आगामिन्] [स्त्री० आगामिनी] भविष्य । होनहार । आनेवाला ।

आगामिक
वि० [सं०] १. भविष्यकालसंबंधी । २. आनेवाला [को०] ।

आगामुक
वि० [सं०] १. आनेवाला । २. भावी [को०] ।

आगार
संज्ञा पुं० [सं०] १. घर । मंदिर । मकान । २. स्थान । जगह । जैसे,—अग्न्यागार । ३. जैन मतानुसार बाधक नियम और व्रतभंग । ४. खजाना । उ०—खान असी अकबर अली जानत सब रस पंथ । रच्यो देव आगार गुनि यह सुखसागर ग्रंथ । —देव (शब्द०) ।

आगारगोधिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] छिपकिली । गृहगोधा [को०] ।

आगारदाही
वि० [सं० आगारदाहिन्] घर जलानेवाला ।

आगारधूम
१. गृह से निकलनेवाला धुआँ । २. एक पौधे का नाम [को०] ।

आगाह (१)
वि० [फा०] जानकार । वाकिफ । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

आगाह (२) पु
संज्ञा पुं० [हिं० अग+ आह (प्रत्य०)] आगम । होनहार । उ०—चाँद गहन आगाह जनावा । राजमूलि गहि शाह चलावा ।—जायसी (शब्द०) ।

आगाही
संज्ञा स्त्री० [फा०] जानकारी । वाकफियत । उ०—यही सबब है कि मुझे उन सब बातों से आगाही हो गई ।-संतति, भा० २१, पृ० १२ ।

आगि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'आग' । उ०—दुरदिन परे रहीम कहि दुरथल जैयत भागि । ठाढ़े हुजा घूर पर जब घर लागत आगि ।—कविता कौ०, भा०१, पृ० १९२ ।

आगिल पु
वि० [हिं० आग+ इल (प्रत्य०) १. आगे का । अगला । उ०—पल में परलय बीतिया लोगन लगी तमारि । आगिल सोच निवारि कै पाछे करो गोहारि ।—कबीर । (शब्द०) । २. भविष्य का । होनेवाला । उ०—आगिल बात समुझि डरु मोही ।—मानस, २ । १८ ।

आगिला पु †
वि० [हिं०] दे० आगला' । उ०—आगिला अगनि होइबा अबधू, तौ आपण होइबा पांणी ।—गोरख०, पृ० २३ ।

आगिवर्तक पु
संज्ञा पुं० [सं० अग्निवर्त] पुराणनुसार मेघ का एक भेद । उ०—सुनत मेघवर्तक सजि सैन लै आए । जलवर्त वारिवर्त पवनवर्त वज्रवर्त आगिवर्तक जलद सँग लाएँ ।—सूर (शब्द०) ।

आगी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'आग' । उ०—जीवन तें जागी आगी, चपरि चौगुनी लागी, तुलसी भभरि मेध भागे मुख मोरि कै । —तुलसी ग्रं०, पृ० १७५ ।

आगुआ
संज्ञा पुं० [हिं० आगे] तलवार इत्यादि की मुठिया के नीचे का गोल भाग ।

आगू पु †
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'आगे' । उ०—वासर चौथे याम सतानंद आगू दिए ।—रामचं०, पृ० २५ ।

आगे
क्रि० वि० [सं० अग्र, प्रा० अग्ग] १. और दूर पर । और बढ़कर । 'पीछे' का उलटा । जैसे—उनका मकान अभी आगे है । २. समक्ष । संमुख । सामने । जैसे,—उसने मेरे आगे यह काम किया है । ३. जीवनकाल में । जीते जी । जीवन में । उपस्थिति में । जैसे—वह अपने आगे ही इसे मालिक बना गए थे । —४. इसके पीछे । इसके बाद । जैसे,—मै कह चुका हुँ, आगे तुम जानो तुम्हारा काम जाने ।—५. भविष्य में । आगे को । जैसे—अब तक जो किया सो किया, आगे ऐसा मत करना । ६. अंतर । बाद । जैसे,—चैत के आगे बैसाख का महीना आता है । ७. पुर्व । पहले । जैसे,—वह आप के आने से आगे हो गया है । ८. अतिरिक्त । अधिक । जैसे,—इससे आगे एक कौड़ी नहीं मिलने की । ९. गोद में । जैसे,— (क) उसके आगे एक लड़की है । —(ख) गाय के आगे बछवा है या बछिया ? मुहा०—आगे आगे=थोड़े दिनों बाद । क्रमश? । जैसे—देखो तो आगे आगे क्या होता है । आगे आना=(१) सामने आना । जैसे,—नाई ! सिर में कितने बाल ? अभी आगे आते हैं । २. सामने पड़ना । मिलना । जैसे,—जो कुछ उसके आगे आता है, वह खा जाता है । ३. संमुख आना । सामना करना । भिड़ना । जैसे,—अगर कुछ हिम्मत हो तो आगे आओ । ४. फल मिलना । बदला मिलना । उ०—(क) जो जैसा करै सो तैसा पावै । पूत भतार के आगे आवै । (ख) मत कर सास बुराई । तेरी धी के आगे आई । (शब्द०) । ५. घटित होना । घटना । प्रकट होना । जैसे,—देखो जो हम कहते थे, वही आगे आया । आगे करना=(१) उपस्थित करना । प्रस्तुत करना । जैसे,—जो कुछ घर में था, वह आपके आगे किया । (२) अगुआ बनाना । मुखिया बनाना । जैसे,—इस काम में तो उन्हीं को आगे करना चाहिए । उ०—कमल सहाय सुर सँग लीन्हा । राघव चेतन आगे कीन्हा ।—जायसी (शब्द०) । (३) अगुआना । अग्रगंता बनाना । उ०—राजै राकस नियर बोलावा । आगे कीन्ह पंथ जनु पावा ।—जायसी ग्रं०, पृ० १७४ । (४) आगे बढ़ाना । चलाना । उ०—चक्र सुदर्शन आगे कियो । कोटिक सूर्य प्रकाशित भयो ।—सूर (शब्द०) । (५) किसी आफत में जालना । जैसे,—जब शेर निकला तो वह मुझे आगे कर आप पेड़ पर चढ़ गया । आगे का उठा=खाने से बचा हुआ । जूठा । उच्छिष्ट । जैसे,—नीच जाति के लोग बड़े आदमियों के आगे का उठा खा लेते हैं । आगे का उठा खाने- वाला=(१) जूठा खानेवाला । टुकड़खोर । (२) दास । (३) नीच । अंत्यज । (४) तुच्छ । नाचीज । आगे का कदम पीछे पड़ना=(१) घटती होना । ह्णास होना । तनज्जुली होना । अवनति होना । जैसे,—उनका पहले अच्छा जमाना था, पर अब आगे का कदम पीछे पड़ रहा है । (२) भय से आगे न बढ़ा जाना । दहशत छा जाना । जैसे,—शेर को देखते ही उनका आगे का कदम पीछे पड़ने लगा । आगे का कपड़ा=(१) घूँघट । (२) अंचल । आगे का कपड़ा खींचना=घूँघट काढ़ना । आग की उखेड़=कुशती का एक पेंच । खिलाड़ी की प्रतिद्धंद्धी की पीठ पर जाकर उसकी कमर की लपेट को पकड़कर जिधर जोर चले, उधर फेंकना । अग्रोत्तोलन । आगे को=आगे । भविष्य में । फिर । पुन? । जैसे, अब की बार तुम्हें छोड़ दिया, आगे को ऐसा न करना । आगे चलकर, आगे जाकर=भविष्य में । इसके बाद । जैसे—तुम्हारा किए का फल आगे चलकर मिलेगा । आगे डालना=देना । खाने के लिये सामने रखना । जैसे,—(क) कुत्ते के आगे टुकड़ा डाल दो । (ख) बैल के आगे चारा डालो । (यह अवज्ञासूचक है और प्राय? इसका प्रयोग पशु आदि नीच श्रेणी के प्राणियों के लिये होता है ।) आगे डोलना=आगे फिरना । सामने खेलना कूदना । लड़कों का होना । जैसे,—बाबा, दो चार आगे डोलते होते तो एक तुम्हें भी दे देती । आगे डोलता=बच्चा । लड़का । जैसे,—उसके आगे डोलता कोई नहीं है । आगे देना=सामने रखना । उपस्थित करना । जैसे,—घोड़े तो इसे खाएँगे नहीं बैलों के आगे दौ । आगे दौड़ पीछे चौड़=(१) कीसी काम को जल्दी जल्दी करते जाना और यह न देखना कि किए हुए काम की क्या दशा होती है । (२) आगे बढ़ते जाना और पीछे का भूलते जाना । आगे घरना=(१) आदर्श बनाना । जैसे,—किसी सिद्धांत को आगे धरकर काम करना अच्छा होता है । २. प्रस्तुत करना । उपस्थित करना । पेश करना । भेंट करना । भेंट देना । आगे निकलना=बढ़ जाना । जैसे,— (क) वह दौड़ में सबसे आगे निकल गया । (ख) केवल तीन ही महीने की पढ़ाई में लह अपने दर्जे के सब लड़कों से आगे निकल गया । आगे पीछे=एक के पीछे एक । जैसे,— (क) सिपाही आगे पीछे खड़े होकर कवायद कर रहे हैं । (ख) सब लोग साथ ही आना, आगे पीछे आने से ठीक नहीं होगा । (२) प्रत्यक्ष या परोक्ष । गुप्त या प्रकट । सामने और पीठ पीछे । जैसे,—मैने किसी की कभी आगे पीछे बुराई नहीं की है । (३) और धीरे । आस पास । जैसे,—देखना सब के सब आगे पीछे रहना, दूर मत पड़ना । (४) पहले या पीछे । जैसे,— आगे पीछे सभी चल बसेंगे, यहाँ कोई बैठा थोड़े ही रहेगा । (५) कुछ काल के अनंतर । यथावकाश । जैसे,—पहले इस काम को तो कर डालो और सब आगे पीछे होता रहेगा । (६) इधर का उधर । अंड बंड । उलट पलट । जैसे,—लड़के ने सारे कागजों को आगे पीछे कर दिया । अनुपस्थिति में । गैरहाजिरी में । जैसे,—मेरे सामने तो किसी ने आपको कुछ नहीं कहा, आगे पीछे की कौन जाने । किसी के आगे पीछे होना=किसी के वंश में किसी प्राणी का होना । जैसे,— उनके आगे पीछे कोई नहीं है; व्यर्थ रुपए के पीछे मरे जाते हैं । आगे रखना=(१) अर्पण करना । देना । चढ़ाना । (२) उपस्थित करना । पेश करना । भेंट करना । जैसे,—घर में जो कुछ पान फूल था, लाकर आगे रखा । आगे से=(१) सामने से । जैसे,—अभी वह हमारे आगे से निकल गया । (२) आइंदा से । भविष्य में जैसे,—जो कुछ किया सो अच्छा किया, आगे ऐसा मत करना । (३) पहले से । पुर्व से । बहुत दिनों से । जैसे,—(क) यह आगे से होता आया है । (ख) हम उसे आगे से जानते थे । आगे से लेना=अभ्यर्थना करना । उ०—हरि आगमन जानिकै भीषम आगे लैन सिधाए । सुरदास प्रभु दरसन कारन नगर लोग सब आए ।—सूर०, १० ।४१७८ । आगे होना=(१) आगे बढ़ना । अग्रसर होना । जैसे,—सरदार यह कह आगे हुआ और उसके साथी पीछे चले । (२) बढ़ जाना । जैसे,—वह पढ़ने में सबसे आगे हो गया । (३) सामने आना । मुकाबिला करना । जैसे,—इतने आदमियों में वही अकेला शेर के आगे आया । (४) मुखिया बनाना । जैसे,—सब काम में वे आगे होते हैं, पर उनको पूछता कौन है । (५) परदा करना । आड़ करना । जैसे,—बड़े घरों में स्त्रियाँ जेठ के आगे नहीं आतीं । आगे होकर लेना=अभ्यर्थना करना । उ०— आगे ह्वै जेहि सुरपति लेई । अर्द्धसिंहासन आसन देई ।— तुलसी । (शब्द०) ।

आगोश
संज्ञा स्त्री० [फा०] गोद । उ०—आगोश में भवाँ की करती हैं कत्ल अ खियाँ । कोई पूछता नहीं है मसजिद में कत्ल होये ।—कविता कौ०, भा०४, पृ० १४ ।

आगौ पु
वि० अग्रगण्य । जो सबसे पहले माना जाय ।

आगौन पु
संज्ञा पुं० [सं० आगमन, प्रा० आगवन] अवाई । आगमन ।

आग्निक
वि० [सं०] [स्त्री० आग्निकी] यज्ञ की अग्नि से संबंधित [को०] ।

आग्नींद्र, आग्नेंद्र
वि० [सं० आग्नीन्द्र, आग्नेन्द्र] अग्नि और इंद्र को समर्पित [को०] ।

आग्नीध्र (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. यज्ञ के सोलह ऋत्विजों में से एक । २. वह यजमान जो साग्निक हो या अग्निहोत्र करता हो । ३. यज्ञमंडप । ४. हरिवंश के अनुसार स्वायंभुव मनु के बारह लड़कों में से एक । ५. विष्णुपुराण के अनुसारा प्रियव्रत राजा के दस पुत्रों में से एक ।

आग्नीध्र (२)
वि० [सं०] अग्निध्र या यज्ञ में अग्नि प्रज्वलित करनेवाले से संबंध रखनेवाला [को०] ।

आग्नेय (१)
वि० [सं०] [स्त्री० आग्नेयी] १. अग्नि संबंधी । अग्नि का । २. जिसका देवता अग्नि हो । जैसे,—आग्नेय मंत्र । ३. अग्नि से उत्पन्न । ४. जिससे आग निकले । जलानेवाला । जैसे— आग्नेय अस्त्र । ५. अग्नि के समान लाल । क्रोध से लाल । उ०—देवयानी आग्नेय नेत्रों से उत्तर देती है, 'जाओ, तुम देवराज इंद्र के पास लौट जाओ' ।—मुंशी अभि० ग्रं०, पृ० ७२ । ६. दक्षिण पूर्वी । अग्निकोण का । अग्निकोण से संबंधित । ७. आग से शीघ्र ही जल उठनेवाला (जैसे,—लाह, घी, लोबान) [को०] ।

आग्नेय (२)
संज्ञा पुं० १. सुवर्ण सोना । सोना । २. रक्त । रुधिर । ३. कृतिका नक्षत्र । ४. अग्नि के पुत्र कार्तिकेय । ५. दीपन औषध । ६. ज्वालामुखी पर्वत । ७. प्रतिपदा । ८. एक प्राचीन देश जो दक्षिण में किष्किंधा के समीप था । इसकी प्रधान नगरी महिष्मती थी । ६. वह पदार्थ जिससे आग भड़क उठे, जैसे— बारूद, लाह इत्यादि । १. ब्राह्नण । ११. अग्निकोण । १२. उन जहरीले कीड़ों की एक जाति जिनके काटने या डंक मारने से जलन होती है । विशेष—सुश्रुत में कौंडिल्यक (गुडगुलार), लाल चींटा, भिड़, पनबिछिया, भौंरा आदि २४ कीड़े इसके अंतर्गत गिनाए हैं । १३. अग्निपुराण । १४. अगस्त्य का एक नाम । १५. घी । यौ०—आग्नेयस्नान=भस्मस्नान । भस्म पोतना ।

आग्नेय कीट
संज्ञा पुं० [सं०] आग में कूद पड़नेवाला फतिंगा [को०] । विशेष—प्राचीन काल में चोर अपने साथ पेटारी में ये कीड़े साथ ले जाते थे । मकान में अगर कोई दिया जलता रहता था तो वे इन कीड़ों की खोल देते थे जो उड़कर उस दिए को बुझा देते थे ।

आग्नेयगिरि
संज्ञा पुं० [सं०] ज्वालामुखी पर्वत [को०] ।

आग्नेपुराण
संज्ञा पुं० [सं०] अग्निपुराण [को०] ।

आग्नेयास्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राचीन काल के अस्त्रों का एक भेद जिनसे आग निकलती थी या जिसके चलाने से आग बरसती थी । २. अग्निविस्फोट अस्त्र या वह अस्त्र जो अग्नि उत्पन्न होने या विस्फोट होने से चले । जैसे,—बंदूक, पिस्तौल आदि ।

आग्नेयी (१)
वि० स्त्री० [सं०] १. अग्नि को दीपन करनेवाली (औषध) । २. पूर्व और दक्षिण के बीच की (दिशा) ।

आग्नेयी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अग्नि की पत्नी । स्वाहा । २. अग्नि की पुत्री जो उरु की पत्नी थी [को०] । ३. प्रतिपदा तिथि । परिवा [को०] ।

आग्या पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० आज्ञा] दे० 'आज्ञा'—१ । उ०—ज्यौं गुरु आग्या सुनि चटसार ।चट पढ़ि उठत एख ही बार ।—नंद० ग्रं०, पृ० २८९ ।

आग्यौ पु †
वि० [सं० अग्र] भविष्य । उ०—तौ तुम कोउ तारयो नहीं, जौ मोंसौ पतित न दाग्यौ । हौं स्त्रवननि सुनि कहत न एकौ, सूर सुधारौ आग्यौ । —सूर०, १ ।७३ ।

आग्र जाणिक
संज्ञा पुं० [सं० अग्र+ज्ञानीक] आगे की बात जाननेवाला व्यक्ति । ज्योतिषी । —वर्ण०, पृ० ९ ।

आग्रभोजनिक
संज्ञा पुं० [सं०] वह ब्राह्मण जो भोजन में अग्रस्थान का अधिकारी हो [को०] ।

आग्रमास
संज्ञा पुं० [सं०] चित्रक वृक्ष । चीते का पेड़ [को०] ।

आग्रयण
संज्ञा पुं० [सं०] १.अहिताग्नियों का नवशस्योष्टि । नवान्न विधान । नए अन्न से यज्ञ या अग्निहोत्र । विशेष—इसका विधान श्रौतसूत्रानुसार होता है । यह तीन अस्त्रों में से तीन फसलों में किया जाता है । सावें से वर्षा ऋतु में ब्रीहि या चावल से हेमंत ऋतु में और जौ से वसंत ऋतु में । गृह्यसूत्रानुसार जब इनका अनुष्ठान होता है, तब इन्हैं नव- शस्येष्टि कहते हैं । २. अग्नि का एक भेद [को०] । ३. यज्ञ का समम [को०] ।

आग्रस्त
वि० [सं०] १. बिंधा हुआ । २. छिदा हुआ । छेदयुक्त [को०] ।

आग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] १. अनुरोध । हठ । जिद । जैसे,—वह बार बार मुझसे अपने साथ चलने का आग्रह कर रहा है । २. तत्परता । परायणता । दृढ़ निशचय । उ०—राक्षस बड़े आग्रह और सावधानी से चंद्रगुप्त और चाणक्य के अनिष्ट साधन में प्रवृत्त हुए ।—हरिश्चंद्र (शब्द०) । ३. बल । जोर । आवेश । उ०—और आप अपने मुख से अपने इस वाक्य का आग्रह दिखाते हैं 'सर्व गुह्वातमं भूय? श्रृणु में परमं वच?' । -हरिशचंद्र (शब्द०) । ४. आक्रमण [को०] । ५. हरण । ग्रहण [को०] । ६. अनुग्रह । कृपा [को०] । ७. धैर्य । नैतिक बल [को०] ।

आग्रहायण
संज्ञा पुं० [सं०] १. अगहन मास । मार्गशीर्ष मास । २. मृगशिरा नक्षत्र ।

आग्रहायणक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'आग्रहायण' ।

आग्रहायणिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. अगहन की पूर्णमासी । २. मृगशिरा नक्षत्र [को०] ।

आग्रहायणी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अगहन मास । २. मृगशिरा नक्षत्र । ३. पाक यज्ञविशेष [को०] ।

आग्रहायणी (२)
वि० [सं०] १. अगहन की पूर्णिमा को दिया जाने वाला । २. अगहन की पूर्णिमा से युक्त [को०] ।

आग्रहारिक
वि० [सं०] १. दान के रुप में गाँव या भूमि लेनेवाला । उ०—मार्ग में जो अग्रहार गाँव पड़ते थे उनके अनपढ़ आग्रहारिकलोग मंगल के लिये ग्राममहत्तरों के हाथ में जलकुंभ उठाए हुए आ रहे थे । —हर्ष०, पृ० १३२ । २. अग्रहार का हरण करनेवाला [को०] । ३. अग्रहार की देखभाल करनेवाला [को०] ।

आग्रहिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] सहायता । अनुग्रह [को०] ।

आग्रही
वि० [सं० अग्रहीन्] हठी । जिद्दी ।

आग्रायण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'आग्रयण' ।

आघ पु
संज्ञा पुं० [सं० अर्घ, प्रा० अग्घ=मूल्य] १. मूल्य । कीमत । २. आदर । मान । उ०—विदर मूँछ जाणो वृथा इधक पटाँरो आघ । —बाँकी० ग्रं०, भा०२, पृ० ८६ ।

आघट्टक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] रक्त अपामार्ग । लाल चिचड़ी ।

आघट्टक (२)
वि० [सं०] घर्षण उत्पन्न करनेवाला । रगड़नेवाला [को०] ।

आघट्टन
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० आघट्टना] १. रगड़ । घर्षण । २. संपर्क [को०] ।

आघट्टित
वि० [सं०] रगड़ा हुआ । मार्दित [को०] ।

आघण पु
संज्ञा पुं० [सं० अग्रहायण] अगहन उ०—आघण कर दिन छोटा होई । —बीसल० रा०, पृ० ६७ ।

आघर्ष, आघर्षण
संज्ञा पुं० [सं०] रगड़ । घर्षण [को०] ।

आघर्षणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] घर्षण या रगड़ने में प्रयुक्त होनेवाली कूँची, ब्रश आदि [को०] ।

आघाट
संज्ञा पुं० [सं०] १. गाँव की सीमा । गाँव की हद । सिवान । विशेष—इस अर्थ में इस शब्द का रप्रथा प्राचीन शिलालेखों में मिलता है । 'आघाटक' या 'आघाटन' शब्द भी इसी अर्थ में आया है । २. अपामार्ग । चिचड़ी [को०] । ३. एक तरह का बाजा [को०] ।

आघात
संज्ञा पुं० [सं०] १. घक्का । ठोकर । २. मार । प्रहार । चोट । आक्रमण । जैसे,—निरपराधों पर आघात करना अच्छा नहीं । ३. वधस्थान । बूचड़खाना । ४. प्रतिध्वनि । उ०— लियो तँबोल माथ धरि हनुमत, कियौ चतुरगुन गात । चढ़ि गिरि सिखर शब्द इक उच्चरयौ गनन, उठयौ आघात ।-सूर० ९ ।७४ । ५. वध । मारण (को०) । ६. वध करनेवाला व्यक्ति [को०] । ७. विपत्ति । दुर्भाग्य [को०] । ८. मूताघात रोग [को०] ।

आघातज्वर
संज्ञा पुं० [सं०] किसी चोट या आघात से होनेवाला ज्वर [को०] ।

आघातन
संज्ञा पुं० [सं०] बधस्थान । २. वध । हनन [को०] ।

आघार
संज्ञा पुं० [सं०] १. यज्ञ और होम आदि में वे आहुतियाँ जो आदि में प्रजापति और इंद्र देवता को घी की अविच्छित्र धार से 'प्रजापतये स्वाहा' और 'इंद्राय स्वाहा' कहकर वाक्य कोण से अग्नि कोण तक और फिर नैऋत्य से ईशान तक दी जाती हैं । ऋग्वेदी इसे मौन होकर करते हैं और यजुर्वेदी जोर से मंत्र का उच्चारण करके करते हैं । २. घी [को०] । ३. सिंचन । सींचना [को०] ।

आघी †
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्घ, प्रा० अग्घ= मुल्य] १. रुपये का वह लेन देन जिसमें उधार लेनेवाला महाजन को आनेवाली फसल की उपज में से फ्री रुपए दर से अन्न आदि ब्याज के स्थान में देता हैं । २. वह अत्र जो इस लेन देन में ब्याज के रुप में दिया जाय । क्रि० प्र०—पर लेना ।—पर देना ।—देना ।—लेना ।

आघु पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'आघ' । उ०—गढ़रचना, बरुनी अलक चितवनि भौह कमान । आघु बकाइ हीं चढ़ैं, तरुनि तुरंगम तान ।—बिहारी र०, दो० ३१६ ।

आघूर्ण
वि० [सं०] १. घूमता हुआ । फिरता हुआ । २. हिलता हुआ ।

आघूर्णन
संज्ञा पुं० [सं०] १. चक्कर । घुमाव । २. इधर उधर डोलना । दोलन [दो०] ।

आघूर्णित
वि० [सं०] इधर उधर फिरता हुआ । भटकना हुआ । चकराया हुआ । यौ०.—आघूर्णित लोचन=जिसकी आँखें चढ़ी हों ।

आघृणि
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य [को०] ।

आघोष
संज्ञा पुं० [सं०] चारों ओर प्रचार करने के लिये किसी बात को ऊँचे स्वर से कहना [को०] ।

आघोषण
संज्ञा पु० [सं०] [स्त्री० आघोषणा] घोषणा [को०] ।

आघोषणापटह
संज्ञा पुं० [सं०] आघोषणा+ पटह] जनसाधारण को सूचित करने के लिये या उनके आवाहन के लिये प्रयुक्त नगाड़ा ।

आघोषित
वि० [सं०] घोषित ।

आघ्राण
संज्ञा पुं० [सं० वि० आघ्रात, आघ्रेय] १. सूँघना । बास लेना । २. अघाना । आसूदगी । तृप्ति ।

आघ्रात (१)
वि० [सं०] १. सूँघा हुआ । २ तृप्त । आघाया हुआ । ३. सुगंधित । सुवासित [को०] ।

आघ्रांत (२)
संज्ञा पुं० [सं०] ग्रहण के दस भेदों में से एक जिसमें चंद्रमंडल या सूर्यमंडल एक ओर मलिन देख पड़ता है । फलित ज्योतिष के अनुसार ऐसे ग्रहण से अच्छी वर्षा होती है ।

आघ्रेय
वि० [सं०] सूँघा जाने योग्य [को०] ।

आचंचल
वि० [सं० आ+ चञ्चल] अस्थिर । चंचल । उ०—चंद्रोदय आरंभकाल में आचंचल सागर में ।—पार्वती, पृ० १२३ ।

आचंभ
वि० [हिं०] दे० 'अचंभा' । उ०—आचंभ रुप इच्छिनि सुनी जन जन बत्त बखानियाँ ।—पृ० रा०, १२ ।१० ।

आच पु
संज्ञा पुं० [सं० सच=संधान करना] हाथ । उ०—जिकाँ भलाँ धन जोड़ियौ, उधमियौ निज आच ।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० ४८ । (डिं०) । यौ०—आचप्रभव=क्षत्रिय ।

आचमन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आचमनीय, आचमित] १. जल पीना । २. शुद्धि के लिये मुँह में जल लेना । ३. किसी धर्म संबंधी कर्म के आरंभ में दाहिने हाथ में थोड़ा सा लेकर मंत्रपुर्वक पीना यह पुजा के षोडशोपचार में से एक है । ४. सुगंधबाला । नेत्रबाला ।

आचमनक
संज्ञा पुं० [सं०] १. आचमन का पात्र । २. आचमन का जल । ३. पीकदान [को०] ।

आचमनी
संज्ञा स्त्री० [सं० आचमनीय] एक छोटा चम्मच जो कलछी के आकार का होता है । इसे पंचपात्र में रखते हैं और इससे आचमन करते और चरणामृत आदि देते हैं ।

आचमनीय, आचमनीयक
वि० [सं०] १. आचमन के योग्य । पीने योग्य । २. कुल्ला करने योग्य ।

आचमित
वि० [सं०] पिया हुआ ।

आचय
संज्ञा पुं० [सं०] १. चुनने का कार्य । २. राशि या ढेर [को०] ।

आचयक
वि० [सं०] १. चयन या एकत्र करनेवाला । २. चयन करने में कुशल । ३. फूल आदि चयन करनेवाला [को०] ।

आचर पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आँचर' । उ०—ससि नव छंदे अनुरागक आँकुर धएल मोएँ आचरे गोइ ।-विद्यापति, पृ० ७७ ।

आचरज पु
संज्ञा पुं० [सं० आशचर्य] दे० 'अचरज' । उ०—मुनि मन मोह आचरज भारी ।—मानस, १ ।१२४ ।

आचरजित पु
वि० [सं० आशचर्यित] आश्चर्यित । चकित । विस्तित ।

आचरण
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आचरणीय, आचरित] १. अनुष्ठान । २. व्यवहार । बर्ताव । चाल चलन । जैसे,—उनका आचरण अच्छा नहीं है । ३. आचारशुद्धि । सफाई । ४. रथ । छकड़ा । ५. चिह्णन । लक्षण । ६. बौद्धों के अनुसार वे १५ आचरण जो सदाचार माने जाते हैं । विशेष—ये इस प्रकारा हैं-(१) शील । (२) इंद्रियसंवर । (३) मात्राशिता । (४) जागरणनुयोग । ५. श्रद्धा । (६) ह्नी । (७) बहुश्रुतत्व । (८) उत्ताप अर्थात् पछतावा । (९) पारक्रम । (१०) स्मृति । (११) मति । (१२) प्रथम ध्यान । (१३) द्वितीय ध्यान । (१४) तृतीय ध्यान । (१५) चतुर्थ ध्यान । ७. करना [को०] । ८. अनुसरण । अनुगमन [को०] ।

आचरणीय
वि० [सं०] १. अनुष्ठान करने योग्य । २. व्यवहार करने योग्य । बर्ताव करने योग्य । करने योग्य ।

आचरन पु
संज्ञा पुं० [सं० आचरण] दे० 'आचरण' । उ०—सगुन समय सुमिरत सुखद भरत आचरनु चारु ।-तुलसी ग्रं०, पृ० ९२ ।

आचरना पु
क्रि० स० [सं० आचरण से नाम०.] आचरण करना । व्यवहार करना । उ०—इहै भक्ति वैराग्य ज्ञान यह हरि तोषन यह शुभ व्रत आचरु । तुलसिदास शिवमत मारग यह चलत सदा सपनेहु नाहिन डरु । —तुलसी (शब्द०) ।

आचरित (१)
वि० [सं०] १. किया हुआ । अनुष्ठान किया हुआ । २. नित्य का । रोजमर्रा का । नियमित [को०] । ३. व्यवहृत, जैसे—स्थान [को०] ।

आचरित (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. धर्मशास्त्र के अनुसार ऋणी से धन लेने के पाँच प्रकार के उपायों में से एक । ऋणी के स्त्री, पुत्र, पशु आदि को लेकर या उसके द्वार पर धरना देकर ऋण को चुका लेना । २. चरित्र । व्यवहार [को०] ।

आचरितदायन
संज्ञा पुं० [सं०] ऋण का वह चुकता जो स्त्री, पुत्र को बाँधने या दरवाजे पर धरना देने से हो ।

आचारितदव्य
वि० [सं०] आचरण करने योग्य [को०] ।

आचर्ज
संज्ञा पुं० [सं० आशचर्य] दे० 'आशचर्य' उ०—गगन की डोरि एह सुरति छूटे नहीं अजब आचर्ज सम दरस बानी ।— सं० दरिया, पृ० ८५ ।

आचार्य
वि० [सं०] [संज्ञा आचर्य] १. आचरण करने योग्य । २. जाने योग्य [को०] ।

आचांत
वि० [सं० आचान्त] १. आचमन किया हुआ । २. आचमन करने योग्य [को०] ।

आचांति
संज्ञा स्त्री० [सं० आचान्ति] अचान ।

आचान
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'आचमन' ।

आचानक
क्रि० वि० [हिं०] दे० 'अचानक' ।

आचाम
संज्ञा पुं० [सं०] १. भात । स२. माँड़ । ३. आचमन ।

आचामक
संज्ञा पुं० [सं०] आचमन करनेवाला व्यक्ति ।

आचार
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यवहार । चलन । रहन सहन । २. चरित्र । चाल ढाल । ३. शील । ४. शुद्धि । सफाई । ५. भोजन । आहार [को०] । ६. आचरण का तरीका [को०] । ७. नित्य नैमित्तिक नियम [को०] । यौ०.—अनाचार । दुराचार । शिष्टाचार । समाचार । सदाचार । कुलाचार । देशाचार । भ्रष्ट्रचार ।

आचारज पु
संज्ञा पुं० [सं० आचार्य] दे० 'आचार्य' । उ०—आचारज बासिष्ठ भौ ऋत्वज बत्स प्रवीन ।—हम्मीर रा०, पृ० ५९ ।

आचारजी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० आचार्यी] पुरोहिताई । आचार्य होने का भाव । उ०—उनके घर किसकी आचारजी है ?

आचारतंत्र
संज्ञा पुं० [सं०आचारतन्त्र] बौद्धों के चार तंत्रों में से एक [को०] ।

आचारदीप
संज्ञा पुं० [सं०] आरती आदि पुजनविधियों में प्रयुक्त होनेवाला दीप [को०] ।

आचारपतित
वि० [सं०] आचारभ्रष्ट्र [को०] ।

आचारपूत
वि० [सं०] शुद्धआचरण करनेवाला [को०] ।

आचारभेद
संज्ञा पुं० [सं०] आचार या आचरण संबंधी नियमों का अंतर [को०] ।

आचारभ्रष्ट
वि० [सं०] आचार या आचरण की मर्यदा से रहित । पतित [को०] ।

आचारलाज
संज्ञा पुं० [सं०] राजा आदि पर डाला जानेवाला लावा [को०] ।

आचारवर्जित
वि० [सं०] १. आचारविरुद्ध या आचारशून्य । २. जाति से बहिष्कृत । जातिच्युत [को०] ।

आचारवान्
वि० [सं० आचारवत्] [वि० स्त्री० आचारवती] पवित्रता से रहनेवाला । शुद्ध आचार का । उ०—शुचि आचारवती कल्याणी गिरजा जब अभिजाता । सुर्यवंदना अरुणाचल पर करती सद्य?स्नाता । —पार्वती, पृ० ६१ ।

आचारविचार
संज्ञा पु० [सं०] आचार और विचार । पवित्र आचरण । विशेष—इस शब्द का प्रयोग अकसर आचार ही के अर्थ में होता है । जैसे,—वह बड़े आचारविचार से रहता है ।

आचारवेदी
संज्ञा स्त्री० [सं०] आचार की वेदी । आर्यार्व्त [को०] ।

आचारहीन
वि० [सं०] आचरणभ्रष्ट । जिसमें आचार विचार न हो । पतित [को०] ।

आचारिक
संज्ञा पुं० [सं०] स्वास्थ्य संहिता । स्वास्थ्य संबंधी नियम [को०] ।

आचारी (१)
वि० [सं० आचारिन्] [वि० स्त्री० आचारिणी] आचारवान् । चरित्रवान् । शु्द्ध आचार का । उ०—सोइ सयान जो परधन हारी । जो कर दंभ सो बड़ आचारी । —मानस, ७ । ९८ ।

आचारी (२)
संज्ञा पुं० [सं०] रामानुज संप्रदाय का वैष्णोव । श्रीवैष्णव ।

आचारी (३)
संज्ञा स्त्री० [सं०] हुरहुर । हिलमोचिका ।

आचार्य
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० आचार्या, आचार्याणी] [वि० आचार्यी] १. उपनयन के समय गायत्री मंत्र का उपदेश करनेवाला । गुरु । विशेष—पाणिनि ने चार प्रकार के शिक्षकों का उल्लेख किया है । आचार्य, प्रवक्ता, श्रोत्रिय, अध्यापक । इनमें आचार्य का स्थान सर्वोच्च था । शिष्य का उपनयन कराने का अधिकार तो आचार्य को ही था । स्वयं आचार्य का काम करनेवाली स्त्री आचार्या कहलाती है । आचार्य की पत्नी को आचार्यानी कहते हैं । २. वेद पढ़ानेवाला । ३. यज्ञ के समय कर्मोपदेशक ४. पुज्य । पुरोहित । ५. अध्यापक । ६. ब्रह्नासूत्र के चार प्रधान भाष्यकार ।—(क) शंकर, (ख) रामानुज, (ग) मध्व और (घ) वल्लभाचार्य ७. वेद का भाष्यकार । ८. शास्त्रीय व्याख्या करनेवाला । तात्विक दृष्टि से गुण दोष का विवेचन करनेवाला । ९. किसी महाविद्यालय का प्रधान अधिकारी और अध्यापक । प्रिंसिपल । प्राचार्य [को०] । १. किसी शास्त्र या विषय का धुरंधर पंडित या ज्ञाता [को०] । यौ०.—आचार्यकुल=गुरुकुल । आचार्यवान्=उपनीत ।

आचार्यक
संज्ञा पुं० [सं०] १. आचार्योंपदेश, शिक्षा, पाठ आदि । २. व्याख्या करने की शक्ति या योग्यता । व्याख्यातृत्व । ३. आचार्य का पद [को०] ।

आचार्यकरण
संज्ञा पुं० [सं०] माणवक या बटु को उपनीत करने का कार्य [को०] ।

आचार्यदेव
वि० [सं०] आचार्य को देव माननेवाला [को०] ।

आचार्यी
वि० स्त्री० [सं०] आचार्य की । आचार्य संबंधिनी । जैसे— आचार्यी दक्षिणा ।

आचिंत पु
वि० [सं० अचिन्त्य] (परमेशर) जो चिंतन में नहीं आ सकता । उ०—तेज अंड आचिंत का, दीन्हा सकल पसार । अंड शिखा पर बैठकर, अधर दीप निरधार ।-कबीर (शब्द०) ।

आचिंत्य (१)
वि० [सं० आचिन्त्य़] सब प्रकार से चिंतन करने योग्य ।

आचिज्ज पु
संज्ञा पुं० [सं० आशचर्य, प्रा० आचिज्ज] दे० 'आश्चर्य' । उ०—एह बत्त आचिज्ज उपजि मो पित्त तु तब्बह ।— पृ० रा०, ३ ।२० ।— आचित (१)— संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल का एक मान जो दस भार या २५ मन का होता था । २. गाड़ी भर का भोझ । एक छकड़े का भार ।

अचित (२)
वि० १. व्याप्त । २. एकत्र किया हुआ [को०] । ३. भरा हुआ [को०] । ४. बँधा हुआ [को०] । ५. फैलाया हुआ [को०] ।

आचीर्ण
वि० [सं०] खाया हुआ । आस्वादित [को०] ।

आचूषण
संज्ञा पुं० [सं०] १. चूसना । २. चूसकर बाहर निकालना । रक्त चूसने का यंत्र लगाकर चूसना [को०] ।

आच्छद
संज्ञा पुं० [सं० आच्छद] आवरण । वस्त्र ।

आच्छन्न
वि० [सं०] १. ढका हुआ । आवृ त । २. छिपा हुआ । तिरोहित ।

आच्छाक
संज्ञा पुं [सं] नील का सा एक पौधा जिससे लाल रंग बनता है । आल । पर्या०—रैजनद्रुम । पक्षीक । पक्षिक । आच्छुक ।

आच्छाद
संज्ञा पुं० [सं०] वस्त्र । परिधान [को०] ।

आच्छादक
संज्ञा पुं० [सं०] ढँकनेवाला । जो ढाँके ।

आच्छादन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आच्छादित, आच्छन्न] ढकना । आवरण । उ०—धीरे धीरे हिम आच्छादन हटने लगा धरातल से । -कामायनी, पृ० २३ । २. वस्त्र । कपड़ा । ३. छाजन । छवाई । ४. छिपाना [को०] । ५. परिधान [को०] । ६. ठाठ । ठाठर [को०] । ७. लोप [को०] ।

आच्छादित
वि० [सं०] १. ढँका हुआ । आवृत्त । उ०—फिर देखी भीमा मूर्ति रण देखी जो आच्छादित किए हुए संमुख समग्र नभ को ।—अनामिका, पृ० १५२ । २. छिपा हुआ । तिरोहित ।

आच्छादी
वि० [सं० आच्छादिन्] आच्छादान करनेवाला [को०] ।

आच्छाद्य
वि० [सं०] १. ढकने योग्य (स्तन) । २. गोप्य । गोपनीय [को०] ।

आच्छिन्न
वि० [सं०] १. हटाया हुआ । २. नष्ट किया हुआ [को०] ।

आच्छुक
संज्ञा पुं० [सं०] अच्छाक । आक्षिक [को०] ।

आच्छुरित (१)
वि० [सं०] १. मिश्रित । मिला हुआ । २. नख से चिह्निनत या खँरोचा हुआ । क्षुब्ध [को०] ।

आच्छुरित (२)
संज्ञा पुं० १. नखवाद्य । नखों को रगड़कर शब्द करना । २. अट्टहास [को०] ।

आच्छुरितक
संज्ञा पुं० [सं०] नखक्षत । २. अट्टहास [को०] ।

आच्छेत्ता
वि० [सं० आच्छेतृ] छेदन करनेवाला । काटनेवाला [को०] ।

आच्छेद
संज्ञा पुं० [सं०] १. काटना । काट डालना । २. किंचित् या कुछ काटना । ३. अपहरण । बलपूर्वक हरण करना [को०] ।

आच्छेदन
संज्ञा पुं० [सं०] आच्छेद ।

आच्छेप पु
संज्ञा पुं० [सं० आक्षेप] दे० 'आक्षेप' । उ०—पहिले कहिए बात कछु पुनि ताको प्रतिषेध । ताहि कहत आच्छेप हैं, भूषन सुकवि सुमेध ।—भूषण ग्रं०, पृ० ३९ ।

आच्छोटन
संज्ञा पुं० [सं०] १. चुटकी बजाना । २. डँगली फोड़ना । उँगली चटकाना ।

आच्छोदन
संज्ञा पुं० [सं०] अहेर । आखेट । मृगया [को०] ।

आछढ़ना पु †
क्रि० अ० [देष.] धक्का देना । उ०—उचित बयस भोर मनमथ चोर ठेलि आछढ़ि आकरए अगोर ।—विद्यापति, पृ० ५९२ ।

आछत † पु
क्रि० अ० [प्रा० अच्छ, हिं० आछना का कृदंत रुप, जिसका प्रयोग क्रि. वि० वत् होता है ।] होते हुए । रहते हुए । विद्यमानता में । मौजूदगी में । सामने । जैसे,—हमारे आछत उसे और कौन ले जा सकता है ।—(शब्द०) । उ०—आँखिन आछत आँधरो जीव करै बहु भाँति । धीर न बीरज बिनु करै तृष्णा कृष्णा राति ।—केशव (शब्द०) ।

आछना पु
क्रि० अ० [सं० अस्=होना अथवा सं० आ+क्षि, प्रा० अच्छ] १. होना । २. रहना । विद्यामान होना । उ०—भँवर आइ बनखँड सन, लेइ कमल कै बास । दादुर बास न पावइ, भलहि जो आछै पास ।—जायसीग्रं०, पृ० ९ । विशेष—इस क्रिया के और सब रुपों का व्यवहार अब बोलचाल से उठ गया है; केवल आछत; आछते (होते हुए) रह गया है ।

आछरि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अप्सरा, प्रा० अच्छरा] दे० 'अप्सरा' ।

आछा पु
वि० [हिं०] दे० 'अच्छा' । उ०—हरि आवत गाइनि के पाछे । मोर मुकुट मकराकृत कुंडल नैन बिसाल कमल तैं आछे ।—सूर०, १० ।५०७ ।

आछादित पु
वि० [सं० आच्छादित] दे० आच्छादित' । उ०— गंज चर्म आछादितं, भ्रंम, नास, रहै बीर भैरों गनं आस पासं । —पृ० रा०, १ ।३८९ ।

आछी (१) पु
वि० स्त्री० [हिं० अच्छा] १. अच्छी । भली । उत्तम । उ०—ले पौढी आँगन ही सुत कौं छिटकि रही आछी उजिय— रिया ।—सूर०, १० । २४६ । २. स्वस्थ । नीरोग । ठीक । उ०—तब विट्ठल श्री गुसाई जी सों बिनती करे, जो महाराज मेरी देह आछी नाहीं ।—दो सौ बावन०, भा०१, पृ० १४० ।

आछी (२)पु
वि० [सं० आशिन्] खानेवाला । उ०—पान फूल आछी सब कोई । तुम कारन यह कीन रसोई ।—जायसी (शब्द०) ।

आछी (३) †
संज्ञा स्त्री० [सं० आक्षिक] सुगंधित फूलवाला एक पेड़ जिसकी लकड़ी हल्के पीले रंग की होती है ।

आछे पु †
क्रि० वि० [सं० अच्छ=स्वच्छ, हिं०, अच्छा] अच्छी तरह । उ०—तिनके लच्छन-लच्छ अब आछे कहौ बखानि ।—नंद० ग्रं०, पृ० २९४ ।

आछे पु † (२)
वि० [हिं०] दे० 'अच्छा' । उ०—जे परमेशवर पै चढ़ै; तेई आछे फूल । —भूषण ग्रं०, पृ० ७१ ।

आछेप पु
संज्ञा पुं० [सं० आक्षेप] आक्षेप नामक अलंकार । उ०—तहाँ कहत आछेप हैं कबिजन मत उत्सेध ।—मतिराम ग्रं०, पृ० ४०० ।

आछै पु
क्रि० वि० [सं० अक्षय, प्रा० अच्छै] दे० 'अक्षय' । उ०— आछै संगै रहै जु वा । ता कारणि अनंत सिधा जोरोशवर हूवा ।—गोरख०, पृ०, २ ।

आछो पु
वि० [हिं०] दे० 'अच्छा' । उ०—कल न परत, कमल मुख देखैं; भूल्यों काम, धाम आछो बदन निहारि ।-नंद० ग्रं० पृ० ३५२ ।

आछोटण पु
संज्ञा पुं० [सं० आच्छोदन=मृगया] शिकार । आखेट । अहेर ।—(डिं०) ।

आछोप पु
वि० [हिं०] दे० 'अछेप' । उ०—जाके भागवतु लेखियै, सतकर्म पेखिबै तास की जाति आछोप छीपा ।—संत रवि०, पृ० १३२ ।

आछौ पु
वि० [हिं०] दे० 'आच्छा' । उ०—आछौ गात अकारथ गारयौ । करी न प्रीति कमल लोचन सौं जनम जुआ ज्यौं हारयौ ।—सूर०, १ । १०१ । २. मंगल । शुभ । उ०— आछौ दिन सुनि महरि जसोदा, सखिनि बोलि सुभ गान करयौ ।—सूर०, १० । ८८ ।

आज (१)
क्रि० वि० [सं० अद्य, पा० अज्ज] १. वर्तमान दिन में । जो दिन बीत रहा है उसमें । जैसे, —आज किसका मुँह देखा था जो सारा दिन भटकते बीता । २. इन दिनों । वर्तमान समय में । जैसे,—(क) जो आज उनकी चलती है वह दूसरे की नहीं । —(ख) आज करे सो कल पावेगा ।

आज (२)
संज्ञा पुं० १. वर्तमान दिन । जो दिन बीत रहा है । जैसे, आज की रात वह इलाहाबाद जायगा । २. इस वक्त । जैसे,— खबरदार आज से ऐसा मत करना । मुहा०—आज को=(१) इस समय । जैसे,—आज को यह बात कही, कल को दूसरी बात कहेगा । —(२) इस अवसर पर । ऐसे समय में । ऐसे मौके पर । जैसे,—आज को वह न हुए, नहीं तो बतला देते । आज तक=(१) आज के दिन तक । जैसे,—उसे बाहर गए बरसों हुए, पर आज तक उसका कोई खत नहीं आया । —(२) इस समय तक । इस घड़ी तक । जैसे,—कल का गया आज तक न पलटा । आज दिन=इस समय । वर्तमान समय में । जैसे, —आज दिन उनकी टक्कर का दूसरा विद्धान् नहीं । आज बरसकर फिर बरसेगा=ऐसा ही फिर होगा । आज लौं=आज तक । आज से=इस समय से । इस वक्त से । अब से । भविष्य में । जैसे,—अब तक किया सो किया आज से न करना । आज हो कि कल=थोड़े दिनों में । दो चार दिन के अंदर ही । जैसे,—उनका अब क्या ठिकाना, आज मरें कि कल ।

आज (३)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० आजी] १. बकरासंबंधी । २. बकरे से उत्पन्न [को०] ।

आज (४)
संज्ञा पुं० १. गृघ्र । गिद्ध । २. आज्या घृत्त । घी । ३. क्षेपण । फेंकना [को०] ।

आजक
संज्ञा पुं० [सं०] बकरों का झुँड [को०] ।

आजकल
क्रि० वि० [हिं० आज+ कल] इन दिनों । इस समय । वर्तमान दिनों में । जैसे—आजकल उनका मिजाज नहीं मिलता । मुहा०—आजकल में=थोड़े दिनों में । शीघ्र । जैसे,—घबराओ मत, आजकरल में देता हूँ । आजकल करना, आजकल बताना=टालमटोल करना । हीला हवाला करना । जैसे,— (क) व्यर्थ आजकल क्यों करते हो, देना हो तो दो । (ख) जब मैं माँगने जाता हूँ, तब वह मुझको आजकल बता देता है । आजकल लगाना=अब तब लगना । मरने में दो ही एक दिन की देर होना । मरणकाल निकट आना । जैसे,— उनका तो आजकल लगा है, जा कर देख आओ । आजकल होना=(१) टालमटोल होना । हीला हवाला होना । जैसे,— महीनों सें तो आजकल हो रहा है, मिले तब जानें ।— (२) दे० 'आजकल लगना' । आज मरे कल दूसरा दिन= मरने के पीछे जो चाहे सो हो, मरने के बाद कोई चिंता नहीं रहती ।

आजकार
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का बैल । नंदी [को०] ।

आजगर
वि० [सं०] [वि० स्त्री० आजगरी] १. अजगर संबंधी । २. अजगर के समान [को०] ।

आजगव
संज्ञा पुं [सं] १. शिवधनुष । महादेव का धनुष । पिनाक । २. शिव के धनुष जैसा दृढ़ धनुष [को०] ।

आजनन (१)
संज्ञा पु० [सं०] प्रसिद्ध या ज्ञात कुल । सद्रवंश [को०] ।

आजनन (२)
क्रि० वि० [सं०] जन्म से ही [को०] ।

आजन्म
क्रि० वि० [सं०] १. जन्म से । जन्म से लेकर । उ०— आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं ।—मानस, ६ ।१३० । २. जीवन भर । जन्म भर । जिंदगी भर । आजीवन । जब तक जिए तब तक ।

आजमाइश
संज्ञा स्त्री० [फा० आजमाइश] १.परीक्षा । इम्तहान । परख । २. खड़ी फसल का सरकारी अधिकारी द्वरा मूल्य लगाना या आँकना ।

आजमाना
क्रि० स० [फा० आजमाइ+परीक्षा] [वि०य आजमूदा] परीक्षा करना । परखना । जाँच करना । उ०—हम कहाँ किस्मत आजमाने जायँ ।—शेर०, पृ० ४९३ ।

आजमीढ़ (१)
वि० [सं० आजमीढ़] अजमीढ़ राजा के वंश का ।

आजमीढ़ (२)
संज्ञा पुं० अजमीढ़ देश का राजा ।

आजमूदा
वि० [फा० आजमूदह] आजमाया हुआ । परीक्षित ।

आजर्जरित
वि० [सं०] फटा हुआ । टुकड़े टुकड़े । तार तार [को०] ।

आजयन
संज्ञा पुं० [सं०] १. विजय । २. युद्ध [को०] ।

आजवन
संज्ञा पुं० [सं०] १. त्वरा । वेग । २. युद्ध । ३. आक्रमण [को०] ।

आजवह (१)
वि० [सं०] [वि० आजवहा] जिसे बकरी ले जाय या ढोए ।

आजवह (२)
संज्ञा पुं० हिमायल का पर्वतीय देश जहाँ भोजन आदि की सामग्री बकरियों पर लदकर जाती है ।

आजस्रिक
वि० [सं०] अजस्त्र या प्रतिदिन होनेवाला [को०] ।

आजा
संज्ञा पुं० [सं० आर्यक, प्रा, अज्जश्र] [स्त्री० आजी] पितामह । दादा । बाप का बाप । उ०—आजा को घर अमर है बेटा के सिर भार । तीन लोक नाती ठगा, पंडित करौ विचार ।— कबीर (शब्द०) ।

आजागुरु
संज्ञा पुं० [हिं० आजा+ गुरु] १. गुरु का गुरु । २. गुरु का आजा या दादा ।

आजात
वि० [सं०] उच्च या ख्यात कुल में उत्पन्न [को०] ।

आजाति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जन्म । उर्त्पति । २. अच्छा वंश [को०] ।

आजाद
वि० [फा० आजाद] १. जो बद्ध न हो । छूटा हुआ । बरी । जैसे,—राज्याभिषेक के अवसर पर बहुत से कैदी आजाद किए गए । २. बेफिक्र । बेपरवाह । ३. स्वतंत्र । जो किसी के अधीन न हो । स्वाधीन । उ०—साहब ने इस गुलाम को आजाद कर दिया । लो बंदगी कि बंदगी से छूट गए हम ।—शेर० पृ० ४५९ । ४. निडर । निर्भर । अशंक । बेधड़क । ५. स्पष्ट- वक्ता । हाजिरजवाब । ६. उद्धत । ७. अकिंचन । निष्परिग्रह । ८. कहीं एक जगह न रहनेवाला । बेपता । बे-निशान । ९. एक प्रकार के मुसलमान फकीर जो दाढ़ी, मूँछ और भौ आदि मुँड़ाए रहते हैं और न रोजा रखते हैं और न नमाज पढ़ते हैं । ये सूफी संप्रदाय के अंतर्गत हैं और अद्वैतवादी हैं । क्रि० प्र०—करना ।—रहना ।—होना । यौ०—आजाद तबीयत, आजाद मिजाज=स्वेच्छाचारी । मन—मौजी । आनंदी ।

आजादगी
संज्ञा स्त्री० [फा० आजादगी] स्वतंत्रता ।

आजादाना
क्रि० वि० [फा० आजादानह्] आजाद की तरह । स्वतंत्रतापूर्वक । स्वच्छंदतापूर्वक ।

आजादी
संज्ञा स्त्री० [फा० आजादी] १. स्वतंत्रता । स्वाधीनता । २. निरंकुशता [को०] ।

आजान (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. जन्म । जनन । २. उत्पत्ति या जन्म का कारण । ३. जन्मस्थान [को०] ।

आजान (२)
क्रि० वि० [सं०] सृष्टिकाल से [को०] ।

आजान (३) पु
वि० [हिं० अजान] अनजान । न जाननेवाला । उ०—करतलह सु कवि कित्तिय सुबर, पथ थक्के आजान जिम ।—पृ० रा०, २५ ।५९८ ।

आजानज
वि० [सं०] सृष्टिकाल में उत्पन्न, जैसे देव आदि [को०] ।

आजानदेव
संज्ञा पुं० [सं०] वे देवता जो सृष्टि के आदि में देवता रुप में ही उत्पन्न हुए थे । विशेष—देवता दो प्रकार के होते हैं-एक कर्मदेव, जो कर्म से देवता हो जाते हैं ओर दूसरे आजानदेव जो देवता रुप में ही उत्पन्न होते हैं ।

आजानि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जननी । माता । २. जन्म । उत्पत्ति । ३. अच्छा वंश [को०] ।

आजानु
वि० [सं०] जाँघ तक लंबा । घुटने तक लंबा । यौ०—आजानुबाहु । आजानुभुज । आजानुलंबी ।

आजानुबाहु
वि० [सं०] जिसकी बाहु जाँघ तक लंबी हो । जिसके हाथ घुटने तक लंबे हों ।

आजानुभुज
वि० [सं०] दे० 'आजानुबाहु' । उ०—आजानुभुज सरचाप धर संग्रामजित खरदूषनं ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४७८ ।

आजानुलंबी
वि० [सं० आजानुलम्बिन्] घुटने तक लंबा [को०] ।

आजानेय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] घोड़े की एक जाति जो उत्तम मानी जाती है ।

आजानेय (२)
वि० १. अच्छी नस्ल का (घोड़ा) । ३. उच्चकुल में उत्पन्न । ३. निर्भय [को०] ।

आजार
संज्ञा पुं० [फा० आजार] १. रोग । बीमारी । व्याधि । उ०—उस मसीहा को दिखा दो तो कुछ आजार नहीं, अभी हो जाय शिफा ।—श्यामा०, पृ० १०१ । क्रि० प्र०—देना । २. दु?ख । कष्ट । तकलीफ । उ०—तेरे बीमार सा बीमार न होगा कोई । जिसको जाहिर में जो देखा तो कुछ आजार नहीं ।—कविता कौ०, भा०४, पृ० २२६ । क्रि० प्र०—देना ।—पहुँचना ।—पाना ।—लगाना ।

आजि
संज्ञा पुं० [सं०] १. युद्ध । रण । संग्राम । लड़ाई । उ०— चतुरंग सैन भगाइकै, तब जीतियौ वह आजि ।—रामचं०, पृ० १७४ । २. दौड़ [को०] । ३. युद्धक्षेत्र या दौड़ का स्थान [को०] । ४. सीमा । घेरा [को०] । ५. पथ । मार्ग [को०] । ६. क्षण [को०] । ७. निंदा [को०] ।

आजिक्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] युद्ध [को०] ।

आजिगमिषु
वि० [सं०] आने की इच्छा रखनेवाला [को०] ।

आजिगीषु
वि० [सं०] जय का इच्छुक [को०] ।

आजिग्रह
वि० [सं०] ग्रहण या हरण करनेवाला [को०] ।

आजिज
वि० [अ० आजिज] [संज्ञा आजिजी] १. दीन । विनीत । २. हैरान । तंग । उ०—इंद्रित से आजिज तुम रहते इंद्री मारि गिराओ ।—पलटू० बानी० भा० ३, पृ० ५८ । क्रि० प्र०—आना ।—होना ।

आजिजी
संज्ञा स्त्री० [अ० आजिजी] १. दीनता । विनीत भाव । नम्रता । २. हैरानी । ३. निराशा । ४. कमजोरी ।

आजिमुख
संज्ञा पुं० [सं०] युद्ध की अग्रपंक्ति [को०] ।

आजी
संज्ञा स्त्री० [सं० आर्यिका, प्रा० आञ्जिआ अथवा हिं० आजा] दादी । पितामही ।

आजीव
संज्ञा पुं०[सं०] १. जीविका । धंधा । २. जीविका का साधन या उपाय । ३. उचित लाभ या आय । वाजिब आमदनी । विशेष—जो लोग कारीगरों और श्रमिकों की आमदनी को घटाने का यत्न करते थे, उनके ऊपर चाणक्य ने १००० पण जुरमाना लिखा है । ४. राज्यकर । सरकारी टैकस या महसूल । विशेषयह भिन्न भिन्न पदार्थों पर लगता था ।

आजीवक
संज्ञा पुं० [सं०] १. गोशाल द्वारा प्रवर्त्तित धार्मिक संप्रदाय का साधु (जैन) । उ०—इतने में एक आजीवक उसी स्थान पर आकर चंदन से पूछने लगा ।—इरा०, पृ० ७२ । २. भिखमंगा । भिक्षुक [को०] ।

आजीवन
क्रि० वि० [सं०] जीवनपर्यंत । जिंदगी भर । जब तक जीए तब तक ।

आजीवनिक
वि० [सं०] जीविका के लिये प्रयत्न करनेवाला [को०] ।

आजीवांत
क्रि० वि० [सं० आजीवान्त] मरने की घड़ी तक । प्राण निकलने के क्षण तक ।

आजीविक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'आजीवक' [को०] ।

आजीविका
संज्ञा स्त्री० [सं०] वृत्ति । रोजी । रोजगार । जीवन का सहारा । जीवनानिर्वाह का अवलंब । उ०—तेरी बहुत अच्छी आजीविका है ।—शकुंतला, पृ० १०१ ।

आजीवितांत
क्रि० वि० [सं० आजीवितान्त] जीवनपर्यंत [को०] ।

आजीवी
वि० [सं० आजीविन्] जीविकायुक्त । २. एक प्रकार के भिक्षुक (एकदंड़ी) [को०] ।

आजीव्य (१)
वि० [सं०] १. जीविका योग्य । जिविका बनाने योग्य । ३. निवास योग्य । ४. उपजाऊ [को०] ।

आजीव्य (२)
संज्ञा पुं० [सं०] जीविका या रोजी का साधन [को०] ।

आजु पु
क्रि, वि०, संज्ञा पुं० [हिं० आजु] दे० 'आज' । उ०—(क) आजु अनरसेहि भोर के, पय पियत न नीके ।-तुलसी ग्रं०, पृ० २७४ । (ख) बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी । आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी ।—मानस, २ ।१०२ ।

आजुर्दगी
संज्ञा स्त्री० [फा० आजुर्दगी] रंज । खेद । दु?ख ।

आजुर्दा
वि० [फा० आज़र्दह्] खिन्न । दु?खी । उ०—वे लोग कैसे कुछ आजुर्दा खातिर हैं ।—प्रेमघन, भा०२, पृ० १०१ ।

आजू (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बेगार । २. बिना वृत्ति लिए काम करने— वाला नौकर (को०) । ३. नरक निवास या वास (को०) ।

आजू (२) पु
संज्ञा पुं० [अ० वजूअ] दे० 'वजू । उ०—ज्ञान का गुसल कर पाक का आजू कर पंक तकबीर परतीत पाई—कबीर० रे०, पृ० २४ ।

आज्ञप्त
वि० [सं०] १. आदेश दिया हुआ । २. सूचित [को०] ।

आर्ज्ञप्त
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आज्ञा । आदेश । २. सूचना । यौ०—आज्ञप्तिहर=संदेशवाहक । दूत ।

आज्ञा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बड़ों का छोटों को किसी काम के लिये कहना । आदेश । हुक्म । जैसे,—राजा ने चोर को पकड़ने की आज्ञा दी । २. छोटों को उनकी प्रार्थना के अनुसार बड़े का उन्हें कोई काम करने के लिये कहना । स्वीकृति । अनुमति । जैसे,—बहुत कहने सुनने पर हाकिम न लोगों को जुआ खेलने की आज्ञा दीं । क्रि० प्र०—करना ।—देना ।—मानना ।—लेना ।—होना । यौ०—आज्ञाकारी । आज्ञावर्ती । आज्ञापक । आज्ञापालन । आज्ञाभंग ।

आज्ञाकर
वि० [सं०] दास । सेवक [को०] ।

आज्ञाकारी
वि० [सं० आज्ञाकारिन्] [स्त्री० आज्ञाकारिणी] १. आज्ञा माननेवाला । हुक्म माननेवाला । आज्ञापालक । उ०— लोकपाल, जम, काल, पवन, रवि, ससि सब आज्ञाकारी । तुलसिदास प्रभु उग्रसेन के द्वार बैंत कर धारी ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ५०८ । २. सेवक । दास । टहलुआ ।

आज्ञाचक्र
संज्ञा पुं० [सं०] योग और तंत्र में माने हुए शरीर के भीतर के छह चक्रों में से छठा, जो सुषुम्ना नाड़ी के बीचोबीच दोनों भौं के बीच दो दल के कमल के आकार का माना गया है ।

आज्ञाता
वि० [सं० आज्ञातृ] आज्ञा देने या करनेवाला [को०] ।

आज्ञादान
संज्ञा पुं० [सं०] आज्ञा करना या देना [को०] ।

आज्ञाधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह गिरवी जो राजा की आज्ञा से रखी या रखाई गई हो ।

आज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] अवगम । ज्ञान । बोध [को०] ।

आज्ञापक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० आज्ञापिका] १. आज्ञा देनेवाला । आज्ञा करनेवाला । २. प्रभु । स्वामी ।

आज्ञापत्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह लेख जिसके अनुसार किसी आज्ञा का प्रचार किया जाय । हक्मनामा ।

आज्ञापन
संज्ञा पुं० [सं०][वि० आज्ञापित] सूचना । जताना ।

आज्ञापरिग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] आज्ञा प्राप्त करना या स्वीकार करना [को०] ।

आज्ञापालक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० आज्ञापालिका] १. आज्ञा पालन करनेवाला । आज्ञाकारी । आज्ञा के अनुसार चलनेवाला । फरमाँबरदार । २. दास । टहलुआ ।

आज्ञापालन
संज्ञा पुं० [सं०] आज्ञा के अनुसार काम करना । फरमाँबरदारी ।

आज्ञापित
वि० [सं०] सूचित । जाना हुआ ।

आज्ञाप्य
वि० [सं०] आज्ञा या निर्देश के योग्य [को०] ।

आज्ञाप्रतिघात
संज्ञा पुं० [सं०] १. आज्ञा का उल्लंघन । २. विद्रोह [को०] ।

आज्ञाभंग
संज्ञा पुं० [सं० आज्ञाभङ्ग] आज्ञा न मानना । हुक्म उद्वली । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

आज्ञायी
वि० [सं० आज्ञायिन्] बोध या ज्ञानवाला । समझनेवाला [को०] ।

आज्ञांविधेय
वि० [सं०] आज्ञा माननेवाला । आज्ञाकारी [को०] ।

आज्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. घृत । घी । उ०—नौकरशाही दे चुकी, भारत तुझे स्वराज्य । डाल न आशा आग में असहयोग का आज्य । —शंकर०, पृ० २०६ । २. (व्यापक भाव में) घृत की जगह तेल, दूध आदि हवनीय पदार्थ [को०] । ३. प्रात?कालिक होत्र के मंत्र [को०] । ४. वह सूक्त जिसमें उक्त मंत्र है [को०] । यौ०—आज्यग्रह, आज्यधानी=घृतपात्र । आज्यदोह । आज्यप= घृत पीनेवाला । आज्यपा । आज्यभाग । आज्यभुक् । आज्यस्थाली ।

आज्यदोह
संज्ञा पुं० [सं०] सामवेद की तीन ऋचाओं का एक सूक्त जिसका जप या पाठ पवित्र करनेवाला होता है ।

आज्यधन्वा
संज्ञा पुं० [सं० आज्यधन्वन्] वह जिसके धनुष में घृत की मालिश की गई हो [को०] ।

आज्यपा
संज्ञा पुं० [सं०] सात पितरों में से एक । मनु के अनुसार ये वैश्यों के पितर है जो पुलस्त्य ऋषि के लड़के थे ।

आज्यभाग
संज्ञा पुं० [सं०] घृत की दो आहुतियाँ जो अग्नि और सोमदेवताओं को उत्तर और दक्षिण भागों में आधार के पीछे दी जाती हैं । विशेष—इनके अविच्छिन्न होने का नियम नहीं है । ऋग्वेदी लोग 'अग्नेय स्वाहा' से उत्तर ओर और 'सोयाम स्वाहा' से दक्षिण ओर आहुति देते हैं, पर यजुर्वेदी लोग उत्तर और दक्षिण दिशाओं में भी पूर्वार्ध और पश्चिमार्ध का विभाग करके उत्तर और दक्षिण दोनों के पूर्वार्द्ध भाग ही में देते हैं । आधार और आज्यभाग आहुति के बिना हवि से आहुति नहीं दी जाती ।

आज्यभुक्, आज्यभुज
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि ।

आज्यलेप
संज्ञा पुं० [सं०] घी का मलहम [को०] ।

आज्यवारि
संज्ञा पुं० [सं०] घृतसमुद्र । सात पौराणिक समु्द्रों में से एक [को०] ।

आज्यविलापिनो
संज्ञा स्त्री० [सं०] घृतपात्र [को०] ।

आज्यस्थाली
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक यज्ञपात्र जो बटली के आकार का होता है और जिसमें हवन के लिये घी रखा जाता है ।

आज्यहोम, आज्याहुति
संज्ञा पुं० [सं०] घी का होम [को०] ।

आझा †
संज्ञा स्त्त्री० [सं० आकांक्षा] इच्छा । उ०—प्राणहारा जादव खग प्राजा, अमरौ खान पूरवण आझा ।—रा०, रु० पृ० २६७ ।

आझाल पु †
वि० [सं आ+ज्वाला] तेजस्वी उ०—प्रखई प्रोहित बंस उजालौ, आयौ प्रिय दरसण आझौलो ।—रा० रु०, पृ० ३०० ।

आटना
क्रि० अ० [सं० अटन=घूमना से प्रेर० रुप आटन=घुमाना, फेरना ।] पोतना । दबाना । उ०—(क) घोड़ों ही की लीद में मारौं आटि पठान ।—सुजान०, पृ० ७० । (ख) क्यों इस वृद्ध पुरुष को अनुग्रह से आटे देते हो ।-तोताराम ।-(शब्द०) ।

आटरूष
संज्ञा पुं० [सं०] १. पौधा । अडूसा । २. एक वृत्त का नाम । अटरूष [को०] ।

आटविक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. वन में निवास करनेवाला व्यक्ति । २. छह प्रकारी की सेनाओं में से एक । ३. वन्य जातियों का प्रधान पुरुष या मुखिया [को०] ।

आटविक (२)
वि० [सं०] १. वन का । वन्य । जंगली । २. वनवासियों संबंधी [को०] ।

आटा (१)
संज्ञा पुं० [सं० आर्द=जोर से दाबना, प्रा० * अट्ट] १. किसी अन्न का चूर्ण । पिसान । चून । २. पिसा हुआ गेहू या जौ । मुहा०—कंगाली या गरीबी में आटा गीला होना=धन की कमी के समय पास से कुछ और जाता रहना । आटा दाल का भाव मालूम होना=संसार के व्यवहार का ज्ञान होना । आटा दाल की फिक्र=जीविका की चिंता । आटे का आपा=भोली स्त्री । अत्यंत सीधी सादी स्त्री । आटा माटी होना=नष्ट भ्रष्ट होना । ३. किसी वस्तु का चूर्ण । बुकनी ।

आटा
२ अटना क्रिया भूतकालिक रुप । उ०—अगिलहिं कहँ पानी लेई बाँटा । पछिलहिं कहँ नहिं काँदौ आटा ।—जायसी ग्रं०, पृ० ६ ।

आटि
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक चिड़िया का नाम । आड़ी । आटी । एक प्रकारी की मछली [को०] ।

आटिक, आटिक्य
वि० [सं०] [वि० स्त्री० आटिकी] यात्रा के लिये प्रस्तुत । यात्रा के योग्य [को०] ।

आटिमुख
संज्ञा पुं० [सं०] शल्यक्रिया संबंधी एक शस्त्र जिसका आकार आडी चिड़िया के मुख या चोंच का सा होता है । [को०] ।

आटी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० अटक] डाट । रोक । टेक ।

आटी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक चिड़िया का नाम । आड़ी [को०] ।

आटीकन
संज्ञा पुं० [सं०] गाय के बछड़े का उछलना कूदना [को०] ।

आटीकर
संज्ञा पुं० [सं०] साँड़ । वृषभ [को०] ।

आटीक्रैट
संज्ञा पुं० [अं०] १. निरंकुश या स्वेच्छाचारी राजा या सम्राट् । वह राजा या शासक जो दूसरों पर अपनी शक्ति का अबाध प्रयोग या मनमानी करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता हो । २. वह जिसे किसी विषय में अमर्यादित अधिकार प्राप्त हो या जो किसी विषय में अपना अमर्यादित अधिकार मानता हो । मनमानी करनेवाला । स्वेच्छाचारी । निरंकुश ।

आटोक्रैसो
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. दूसरों पर अनियंत्रित या अमर्यादित अधिकार जो किसी एक ही व्यक्ति को हो । दूसरों पर मनमाना करने का अधिकार । स्वेच्छाचारिता । निरंकुशता । २. किसी निरंकुश स्वेच्छाचारी राजा या सम्राट् की शक्ति । एकतंत्रता ।

आटोप
संज्ञा पु० [सं०] १. आच्छादन । फैलाव । २. आडंबर । विभव । ३. पेट की गुड़गुड़ाहट । ४. फूलना । शोथ [को०] । ५. भीड़ [को०] । ६. आधिक्य । प्राचु्र्य [को०] । ७. गर्व । घमंड [को०] । यौ०—घटाटोप । उ०—घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी । मुखहि निसान बजावहिं भेरी ।—मानस ६ ।३८ ।

आट्टोप
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक रोग जिसमें पेट की नसें तन जाती हैं । २. पेट की नसों का तनाव ।

आठ
वि० [सं० अष्ट, प्रा० अट्ठ] एक संख्या । चार का दूना । मुहा०—आठ आठ आँसू रोना=बहुत अधिक विलाप करना । आठों गाँठ कुम्मौत=(१) सर्वगुणसंपन्न । (२) चतुर । (३) छँटा हुआ । घूर्त । आठों पहर=दिन रात । आठो पहर जामे से बाहर रहना=हर समय क्रुद्ध रहना । बराबर झल्लाए रहना ।

आठक पु †
वि० [सं० अष्ट, पा० अट्ठ+हिं० एक] आठ ।

आठवाँ
वि० [सं० अष्टम, पा० अट्ठवँ, प्रा० अट्ठय, अट्टवँ] संख्या में आठ के स्थान पर का । अष्टम । जैसे,—इस पुस्तक का आठवाँ प्रकरण अभी पढ़ना है ।

आठैं, आठों
संज्ञा स्त्री० [सं० अष्टमी] अष्टमी तिथि । जैसे,—आठों का मेला उ०—संबत सरस बिभावन, भादों आठैं तिथि, बुधवार ।-सूर०, १० ।८६ ।

आठौगाँठ
वि० [हिं० आठों+गाँठ] सर्वांग । उ०—स्यामा सुगति सुबंस की आठौं गाँठि अनुप । छुटी हाथ तैं पातरी प्यारी छरी स्वरुप ।—भिखारी० ग्रं०, पृ० २७ ।

आडंबर (१)
संज्ञा पुं० [सं० आडंबर] १. गंभीर शब्द । २. तुरही का शब्द । ३. हाथी की चिग्घाड़ । ४. ऊपरी बनावट । तड़क भड़क । टीम टाम । झूठा आयोजन । ढोंग । कपटवेष जिससे वास्तविक रुप छिप जाय । जैसे,—(क) उसमें विद्या तो ऐसी ही वैसी है, पर वह आडंबर खूब बढ़ाए हुए है ।—(ख) आजकल के साधुओं के आडंबर ही आडंबर देख लो । क्रि० प्र०—करना ।—फैलना ।—बढ़ाना ।—रचना । ५. आच्छादन । यौ०—मेघाडंबर । ६. तंबू । ७. बड़ा ढोल जो युद्ध में बजाया जाता है । पटह । ८. कोलाहल करना । जोर जोर से या आधिक बोलना [को०] । ९. बादलों का गर्जन । मेघगर्जन [को०] । १०. युद्धघोषण या आक्रमण की सूचना देने का पटह या नगाड़ा [को०] । ११. प्रसन्नता । आह्वलाद [को०] । १२. पलक [को०] । १३. अंग- संवाहन । मालिश [को०] । १४. क्रोध । कोप [को०] ।

आडंवर (२)
वि० आधिक । उच्च । अपार [को०] ।

आडंबराघात
संज्ञा पुं० [सं० आडम्बराघात] पटह या नगाड़ा बजानेवाला आदमी [को०] ।

आडंबरी
वि० [सं० आडम्बरिन् आडंबर करनेवाला । ऊपरी बनावट करनेवाला । २. घमंडी । अभिमानी [को०] ।

आ़ड़ (१)
संज्ञा स्त्री० [अल=वारण, रोक] १. ओट । परदा । ओझल । जैसे,—(क) वह दीवार की आड़ में छिपा बैठा है । (ख) कपड़े से यहाँ आड़ कर दो । क्रि० प्र०—करना ।—होना । मुहा०—आड़े देना पु=ओट करना । आड़ के लिये सामने रखना । उ०—आड़े दै आले बसन, जाड़े हुँ की राति । साहसु करै सनेह बस, सखी, सबै ढिग जाति ।—बिहार र०, दो० २८३ । २. रक्षा । शरण । पनाह । सहारा । आश्रय । जैसे,— (क) अब वे किसकी आड़ पकड़ेंगे? (ख) जब तक उनके पिता जीते थे, तब तक बड़ी भारी आड़ थी । क्रि० प्र०—घरना ।—पकड़ना ।—लेना । ३. रोक । अड़ान । ४. ईँट वा पत्थर टुकड़ा । जिसे गाड़ी के पहिए के पीछे इसलिये अड़ाते हैं जिसमें पहिया पीछे न हट सके । रोड़ा । ५. संगीत में अष्टताल का एक भेद । ६. थूनी । टेक । ७. तिल की बोंड़ी जिसमें तिल भरे रहते हैं । ८. एक प्रकार का कलछुला जो चीनी के कारखानों में काम आता है ।

आड़ (२
संज्ञा स्त्री० [सं० अल=डंक, पा० अड, प्रा० आड़] बिच्छू या भिड़ आदि का डंक ।

आड़ (३
संज्ञा स्त्री० [सं० आलि= रेखा] १. लंबी टिकली जिसे स्त्रियाँ माथे पर लगाती हैं । उ०—गौरी गदकारी परै हँसत कपोलनु गाड़ । कैसी लसति गँवारि यह सुनकिरवा की आड़ ।—बिहारी र०, दो० ७०८ । २. स्त्रियों के मस्तक पर का आड़ा तिलक । उ०—केसव, छबीलो छत्र सीसफूल सारथी सो केसर की आड़ि अधि रथिक रची बनाइ ।—केशव ग्रं०, भा०१, पृ० ९० । (ख) मंगल बिंदु सुरंग, ससि मुखु केसरि आड़ गुरु । इक नारी लहि संगु, किय रसमय लोचन जगत ।— बिहारी र०, दो०, ४२ । ३. माथे पर पहनने का स्त्रियों का एक गहना । टीका ।

आड़गीर
संज्ञा पुं० [हिं० +आड़ फा० गीर] खेत के किनारे की घास ।

आड़ण
संज्ञा स्त्री० [हिं० आड़ना=रोकना] ढाल ।—(डिं०) ।

आड़ना
क्रि० स० [अल=वारण करना] १. रोकना । छेकना । उ०—अँचलन दियो न आजु अलि हरि छबि- अमी अघाइ । आड़यो प्यासे दृगनि को लाज निगोड़ी आइ । -भिखारी०, ग्रं० पृ० ४५ । २. बाँधना । ३. मन करना । न करने देना । ४३. गिरवी रखना । गहने रखना । जैसे,—सौ रुपए की चीज आड़ करके तो (२५) लाया हूँ ।

आड़बंद
संज्ञा पुं० [हिं० आड़+ फा० बंद] १. फकीरों का लँगोट । २. पहलवानों का लँगोट जिसे जाँघिए के ऊपर कसते हैं ।

आड़बन †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आड़बंद' ।

आड़ा (१
संज्ञा पुं० [सं० आलि=रेखा प्रा० आल, आड़ अथवा सं० अराला प्रा० *आल] [स्त्री० आड़ी] १. एक धारीदार कपड़ा । २. जहाज का लट्ठा । शहतीर । ६. नाव या जहाज में लगे हुए बगली तख्ते । ४. जुलाहो का लकड़ी का वह समान जिसपर सूत फैलाया जाता है ।

आड़ा (२
वि० १. आँखों के समानांतर दाहिनी ओर से बाई ओर को बाईं ओर से दाहिनी ओर को गया हुआ । २. वार से पार तक रखा हुआ । मुहा०—आड़े आना=(१) रुकावट डालना । बाधक होना । जैसे,—जो काम हम शुरु करते हैं, उसी में तुम बेहतर आड़ेआते हो । (२) कठिन समय में काम आना । गाढ़ें में काम आना । संकट में खड़ा होना । उ०—कमरी थोड़े दाम की आवै बहुतै काम । खासा मलमल बाफता उनकर राखै मान । उनकर राखै मान बुँद जहँ आड़े आवै । वकुचा बाँधै मोट राति को झारि बिछावै ।-गिरधर (शब्द०) । आड़ा तिरछा होना= बिगड़ना । मिजाज बदलना । जैसे,—आड़े तिरछे क्यों होतो हो, सीधे सीधे बातें करो । आड़े पड़ना=बीच में पड़ना । रुकावटट डालना । उ०—कबीरा करनी आपनी कबहुँ न निष्फल जाय । सात समुद्र आड़ा परै मिलै अगाऊ आय ।—कबीर (शब्द०) । आड़े हाथों लेना=किसी को व्यंग्यक्ति द्वारा लज्जित करना । जैसे,—बात ही बात में उन्होनें बलदेव को ऐसा आड़े हाथों लिया कि वह भी याद करेगा । आड़ा होना=रुकावट डालना । आगे न बढ़ने देना ।—मैं पीछे मुनि धीय के, चह्वयौ चलन करि चाव । मर्यादा आड़ी भई, आगे दियो न राव ।— लक्ष्मण (शब्द०) ।

आड़ा (३
संज्ञा पुं० [हिं० अड्ड़ा] दे० 'अड्ड़ा' । उ०—होइ निचिंत बैठे तेहि आड़ा । तब जाना खोंचा हिय गाड़ ।—जायसी ग्रं०, पृ० २८ ।

आड़ाखेमटा
संज्ञा पुं० [हिं० आड़ा+ खमटा] मृदंग का साढ़े तेरह मात्राओं का एक ताल । विशेष—इसमें तीन आघात और एक खाली रहता है । कोई कोई इसमें खाली का व्यवहार नहीं करते । इस ताल के बोल ये हैं- धा तेरे केटे धेने धागे नागे तेन । ताके तेरे केटे धेन धागे नागे तेन ।

आड़ाचौताल
संज्ञा पुं० [हिं० आड़ा+ चौताल] मृदंग का एक ताल । यह ताल सात मात्राओं का होता है । विशेष—इसमें चार आधात और तीन खाली होतो हैं । इस ताल के बोल यों हैं—धाग् धागे दिंता, केटे धागे दिंता गदि धेने धा मतांतर से इसके बोल यों हैं- धागे तेटे केटे ताग तागे तेटे, केटे तागे धेतता तेटेकता गदि धेने धा ।

आड़ाठेका
संज्ञा पुं० [हिं० आड़ा+ ठेका] नौ मात्राओं का एक ताल । विशेष—इसमें चार दीर्घ और अणु मात्राएँ होती है । चार दीर्घ मात्राओं की आठ दून मात्राएँ और चार अणु मात्राओं की एक मात्रा । इस प्रकार सब मिला कर नौ मात्राएँ होती हैं । किंतु जब ठेरे में ४ दीर्घ मात्राएँ दी जाती हैं तो उनमें से प्रत्येक के साथ एक एक मात्रा अणु भी लगा दी जाती है । इसके मृदंग के बोल ये हैं—धाकेटे ताग धी + . +१ + + ऐन धा धा धिन ऐन ताकेटे तागाधि ऐन धा धा तिऐन धा ।

आड़ापंचताल
संज्ञा पुं० [हिं० आड़ा+ पंच+ ताल] पाँच आवात और नौ मात्राओं का एक ताल । + १ १ विशेष—इसके बोल ये हैं-धि किय, धिना धि धि ना ना तु ना, कुत्ता१ धि धि, ना धि धि ना ।

आड़ालोट
संज्ञा पुं० [हिं० आड़ा+ लोटना] डावाँडोलपरन । कंप । क्षोभ (लश०) । क्रि० प्र०—मारना=जाहाज का लहराना । जहाज का डगमगाना ।

आडि, आडि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक प्रकार की मछली । २. एक जलपक्षी जिसको शरालि क्षी कहते हैं । यह गिद्ध की तरह होता है ।

आडिटर
संज्ञा पुं० [अं०] आय व्यय का चिट्ठा जाँचनेवाला । आय- व्यय परीक्षक ।

आडिवी
संज्ञा पुं० [सं० आड़ीविन्] [स्त्री० आडिविनी] काक । कौआ [को०] ।

आड़ी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० आड़ा] १. तबला, मृदंग आदि बजाने का एक ढंग जिसमें किसी ताल के पूरे समय के तीसरे छठे या बारहवें भाग ही में पूरा ताल बजा लिया जाता है । २. चमारों की छुट्टी ।

आड़ी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'आरी' ।

आड़ी (३)
वि० [हिं० आड़+ ई (प्रत्य०)] सहायक । अपने पक्ष का । विशेष—जब किसी खेल में लड़कों के दो दल हो जाते हैं तब एक लड़का अपने दल के लड़के को आड़ी कहता ।

आड़ी (४)
वि० स्त्री० पड़ी । बेंड़ी । मुहा०—आड़ी करना= चाँदी सोने के वर्क पीटनेवालों की बोली में लंबे पीटे हुए वर्क चौड़ा पीटना ।

आडू
संज्ञा पुं० [सं०] १. चंद्रमा [को०] ।

आड़ू
संज्ञा पुं० [सं० अंड अथवा आलु] १. एक प्रकार का फल जिसका स्वाद खटमीठा होता है । देहरादून की ओर यह फल बहुत अच्छा होता है । इसे शफतालू भी कहते हैं । यह फल दो प्रकार का होता है-एक चकैया, दूसरा गोल । २. इस फल का वृक्ष ।

आढ़ (१)
संज्ञा पुं० [सं० आढक] चार प्रस्थ अर्थात् चार सेर की एक तौल ।

आढ़ (२) पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० आड़] १. ओट । पनाह । २. सहारा । ठिकाना । उ०—ज्यौं ज्यौ जल मलीन त्यों त्यौ जगमण मुख मलीन लहै आढ़ न ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४६४ । ३. पु अंतर । बीच । जैसे,—(क) एक दिन आढ़ देकर आना । (ख) एक कोस-आढ़-देकर ठहरेंगे । मुहा०—आढ़ आढ़ करना=बीच में अवधि डालना । आजकल करना । टाल मटूल करना । जैसे,—उ०—(क) हरि तेरी माया को न बिगोयो । शंकर को चित हरयो कामिनी सेज छाड़ि भू सोयो । जारि मोहिनी आढ़ आढ़ कियो तब नख सिख तें रायो ।—सूर (शब्द०) । (ख) आढ़ आढ़ करत असाढ़ आयो, एरो आली डर से लगत देखि तम के जमाक ते । श्रीपति ये मैन माते मोरन के बैन सुनि परत न चैन बुँदियान के झमाक ते ।—श्रीपति । (शब्द०) ।

आढ़ (३)
वि० [सं० आढय=संपन्न] कुशल । दक्ष । उ०—स्वारथ लागि रहे वे आढ़ा । नाम लेत पावक डाढ़ा ।—कबीर, (शब्द०) ।

आढ़ (४)
संज्ञा स्त्री० [सं० आढि] एक प्रकार की मछली ।

आढ़ (५)
संज्ञा स्त्री० [हिं० आड़=टीका] माथे पर पहनने का स्त्रियों का एक आभूषण । टीका ।

आढक
संज्ञा पु० [सं०] १. एक तौल जो चार सेर के बराबर होती है । २. अन्न नापने का काठ का बरतन जिसमें अनुमान से चार सेर अन्न आता है । ३. अरहर ।

आढकिक
वि० [सं०] १. आढकवाला आढकयुक्त । २. एक आढक से बोया हुआ (खेत) [को०] ।

आढकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अरहर नाम का अन्न । २. सौराष्ट्र मृत्तिका । गोपीचंदन ।

आढ़त
संज्ञा स्त्री० [हिं० आड़ना=जमानत देना] १. किसी अन्य व्यापारी का माल रखकर कुछ कमीशन लेकर उसकी बिक्री करा देने का व्यवसाय । २. वह स्थान जहाँ आढ़त का माल रहता हो । ३. वह धन जो बिक्री कराने के बदले मिलता है ।

आढ़तदार
संज्ञा पुं० [हिं० आढ़त+ फा दार (प्रत्य.)] वह जो व्यापारियों का माल अपने यहाँ रखकर दूकानदारों के हाथ बेचता हो । आढ़त का काम करनेवाला । अढ़तिया ।

आढ़तिया
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'अढ़तिया' ।

आढ्यंकर
वि० [सं० आढयङ्कर] असंपन्न को संपन्न करनेवाला ।

आढ्यंभविष्णु
वि० [सं० आढयम्भीविष्णु] धनी होनेवाला [को०] ।

आढ्य
वि० [सं०] १. संपूर्ण । पूर्ण । २. युक्त । विशिष्ट । ३. धनी [को०] । यौ०—आढयकुलीन=धनी कुल में उत्पन्न । आढयचर, आढय- पुर्व=पहले का धनी । आढयरोग=गठिया । वात रोग । गुणाढय । धनाढय । पुण्याढय । सनाढय ।

आढ्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] धन [को०] ।

आढ्यरोगी
वि० [सं० आढ्यरोगिन्] गठिया का रोगी [को०] ।

आढ्यवात
संज्ञा पुं० [सं०] वातरोग जनित पक्षाघात या लकवा [को०] ।

आणक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक रुपये का सोलहवाँ भाग । आना । २. एक प्रकार का रतिबंध । पार्श्वसंभोग [को०] ।

आणक (२)
वि० अधम । कुत्सित ।

आणव (१)
वि० [सं०] [स्त्री० आणावी] अत्यंत सूक्ष्म ।अणु । अत्यंत छोटा [को०] ।

आणव (२)
संज्ञा पुं० अणुता । अत्यंत सूक्ष्मता [को०] ।

आणविक
वि० [सं०] अणु से संबद्ध । अणु संबंधी ।

आणवीन
वि० [सं०] अणुधान्य (सावाँ आदि) बोने योग्य [को०] ।

आतं पु
संज्ञा पुं० [सं० आत्म, हिं० आतम] आत्मा । उ०—आगम पंथ वाटा चढ़ी सुर्ति घाटा, गगन गैल फाटा सो आतं निआतं । घट०, पृ,० ३८६ ।

आतंक
संज्ञा पुं० [सं०] १. रोब । दबदबा । प्रताप । उ०—सहित गुमान गरब आतंक, सुनि राजा के बचन निसंक । हम्मीर ह०, पृ० १८ । २. भय । शंका । क्रि० प्र०—छझाना ।—जमना ।—फैलना । ३. रोग । बीमारी । यौ०—आतंक-निग्रह । ४. मुरचंग की ध्वनि । ५. पीड़ा । कष्ट उ०—हो निर्भय निर्जैय शक्ति के मद से यदि, पावस के प्रवाह सा फैला भय, आतंक, विषाद ।—पार्वती पृ० ८९ । ९. संदंह [को०] । ७. निशचय का अभाव [को०] ।

आतंकवादी
वि० [सं० आतङ्क+ वादिन्] जो राजनीतिक लक्ष्य की सिद्धि के लिये बल या अस्त्र शस्त्र में विशवास रखता हो । जैसे, आतंकवादी संघटन ।

आतकित
वि० [सं० आतङ्किन] भीत । त्रस्त । डरा हुआ । उ०— पशु फिरते सानंद विहगकुल मंगल के स्वर गाते ।आतंकित थे असुर, मनुज थे उत्सव पर्व मनाते । पार्वती०, पृ० ५४ ।

आतंचन
संज्ञा पुं० [सं० आतञ्चन] १. दूध के जमाने के लिये डाला जानेवाला जावन । जामन । २. संकुचित या संकीर्ण करनेवाला पदार्थ या व्यक्ति । ३. दही । ४. जमाने का कारण । ५. जमने में दूध का जलीय अंश । ६. प्रेषक । ७. संतोषकारक या तोषकारक । ८. संकट । विपत्ति । ९. वेग । गति । १०. धातुओं के मिश्रण में संयोजक तत्व । ११. स्थूलकरण । मोटा करना [को०] ।

आत
संज्ञा पुं० [सं० आतु] शरीफा । सीताफल । उ०—दिखा रहा था तरु वृंद में खड़ा स्व आततायीपन, पेड़ आत का ।—प्रिय० प्र० २०५ ।

आतत
वि० [सं०] १. चढ़ा या चढ़ाया हुआ । खिंचा हुआ । फैला हुआ (धनुष या उसकी डोरी) [को०] ।

आततज्य
वि० [सं०] जिसके ज्या (धनुष की डोरी) आतत (चढ़ी या खिंचा) हो [को०] ।

आतताई पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आततायी' । उ०—बरनि बताई, छिति व्योम की तताई जेठ आयौ आतताई पुटपाक सौ करत है । —कविता०, पृ० ५९ ।

आततायी
संज्ञा पुं० [सं० आततायिन्] [स्त्री० आततायिनी] १. आग लगानेवाला । २. विष देनेवाला । ३. वधोद्यत शस्त्रधारी । ४. जमीन छीन लेनेवाला । ५. धन हरनेवाला । ४. स्त्री हरनेवाला । ७. क्रूर व्यक्ति । अत्याचारी । लोकपीड़क । संताप देनेवाला व्यक्ति ।

आतन
संज्ञा पुं० [सं०] १. तानना । फैलना । विस्तृत करना । २. दृश्य [को०]

आतप
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आतपी, आतप्त] १. धूप । घाम । उ०—मृदुल मनोहर सुंदर गाता । सहत दुसह बन आतप बाता । —मानस, ४ ।१ । २. गर्मी । उष्णता । ३. सूर्य का प्रकाश । ४. ज्वर । बुखार । यौ०—आतपक्लांत ।

आतपत्र, आतपत्रक
संज्ञा पुं० [सं०] छाता । छतरी । उ०—आतपत्र सा रुचिर शीश पर राजित जिनके व्योम वितान ।—पार्वती, पृ० ३० ।

आतपन
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०] ।

आतपलंघन
संज्ञा पुं० [सं० आतपलङ् घन] सूर्य के ताप में से गुजरना [को०] ।

आतपात्यय
संज्ञा पुं० [सं०] १. ग्रीष्म का बीतना । २. सूर्यास्त [को०] ।

आतपाभाव
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य के ताप का अभाव [को०] ।

आतपी (१)
संज्ञा पुं० [आतापिन्] सूर्य ।

आतपी (२)
वि० धूप का । धूप संबंधी ।

आतपीय
वि० [सं०] सूर्यताप संबंधी । धूपवाला [को०] ।

आतपोदक
संज्ञा पुं० [सं०] मृगतृष्ण ।

आतम (१)पु
वि० [हिं०] दे० 'आत्म' । उ०—आतम रूप सकल घट दरस्यो, उदय कियौ रवि ज्ञान ।—सूर०, २ ।३३ ।

आतम (२) पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'आत्म' । उ०—एकै आतम हम तुम मांही ।—सूर० ११ ।४ ।

आतमक पु
वि० [सं० आत्मक] दे० 'आत्मक' । उ०—प्रथम मंगलाचरन को तीनि आतमक जानि । नमस्कार अरु ध्यान पुनि, आसिरबाद बखान ।—भिखारी, ग्रं०, भा०१, पृ० १ ।

आतमगामी पु
वि० [सं० आत्म+ गामिन्] आत्मविद् । उ०— ज्ञान आतमानिष्ठ गुनत यों आतमगामी, कृष्ण अनावृत परम ब्रह्म परमातम स्वामी ।—नंद०, ग्रं०, पृ० ४१ ।

आतमज्ञान पु
संज्ञा पुं० [सं० आत्मज्ञान] आत्मज्ञता । उ०— ताते आतमज्ञान धन पायो नाहिं अजान ।—दीन० ग्रं०, पृ० १४२ ।

आतमबादी पु
विं [सं० आत्मवादिन्] दे० 'आत्मवादी' । उ०— जे मुनिनायक आतमबादी ।—मानस ७ ।७० ।

आतमहन पु
वि० [सं० आत्महन्] दे० 'आत्महन्' । उ०—जो न तरै भवसागर नर समाज अस पाइ । सो कृतनिंदक, मंद मति आतमहन् गति जाइ ।—तुलसी (शब्द०) ।

आतमा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० आत्मा] दे० 'आत्मा' । उ०—समय- सिंधु नाम—बोहित भजि निज आतमा न तारयो ।—तुलसी- ग्रं०, पृ० ५५९ ।

आतर
संज्ञा पुं० [सं०] नदी पार जाने का महसूल । नाव का भाड़ा । उतराई ।

आतर्द
संज्ञा पुं० [सं०] छिद्र । सूराख [को०] ।

आतर्दन
संज्ञा पुं० [सं०] १. धक्का देकर खोलने का कार्य । २. छिद्र । छेद । सूराख [को०] ।

आतर्पसा
संज्ञा पुं० [सं०] मांगलिक लेपन । ऐपन ।

आतश
संज्ञा स्त्री० [फा०] आग । अग्नि । उ०—आदि अंत मन मध्य न होते, आतश पवन न पानी । लख चौरासी जीव जंतु नहिं, साखी शब्द न बानी ।—कबीर (शब्द०) । यौ०.—आतशखाना । आतशजनी । आतशदान । आतशपरस्त । आतशबाज । आतशबाजी ।

आतशक
संज्ञा स्त्री० [फा०] [वि० आतशकी] फिरंग रोग । उपदंश । गर्मी ।

आतशखाना
संज्ञा पुं० [फा० आतशखाफनह्] १. अग्नि रखने का स्थान । वह स्थान जहाँ कमरा गर्म करने के लिये आग रखते हैं । २. वह स्थान जहाँ पारिसियों की अग्नि स्थापित हो ।

आतशगाह
संज्ञा पुं० [फा०] दे० 'आतशखाना' ।

आतशजदगी
संज्ञा स्त्री० [फा० आतशजदजगी] आग लगाने का काम करना [को०] ।

आतशजन
वि० [फा० आतशजन] आप लगानेवाला [को०] ।

आतशजनी
संज्ञा स्त्री० [फा० आतशजनी] आग लगाने का काम ।

आतशदान
संज्ञा पुं० [फा़०] अँगीठी । बोरसी ।

आतशपरस्त
सं० पुं० [फा०] १. अग्नि की पूजा करनेवाला मनुष्य । २. अग्निपूजक । पारसी ।

आतशफिशाँ (१)
वि० [फा आतशफि़शाँ] आग उगलनेवाला [को०] ।

आतशाफिशाँ
संज्ञा पुं० अग्निपर्वत । ज्वालामुखी पहाड़ [को०] ।

आतशबाज
संज्ञा पुं० [फआ० आतशाबाज] आतशबाजी बनानेवाला । हर्वाईगर ।

आतशबाजी
संज्ञा स्त्री० [फा० आतशबाजी] १. बारुद के बने हुए खिलौनों के जलने का दृश्य । २. बारुद के बने हुए खिलौने । जैसे,—अनार, महाताबी, छछूँदर, बान, चकरी, बमगोला, फुलझड़ी, हवाई आदि । ३. अगौनी (बुंदेल०) ।

आतशमिजाज
वि० [फा० आतश+ अ० मिजाज] शीघ्र उत्तेजित या क्रुद्ध होनेवाला । बिगड़ैल [को०] ।

आतशी
वि० [फा़०] १. अग्नि संबंधी । २. अग्नि उत्पादक । जैसे,— आतशी शीशा जो सूर्यकरणों की उष्णाता एकत्र करके आग पैदा करता है । ३. जो आग में तपाने से न फटे, न तड़के, जैसे,—आतशी शीशा । यौ०.—आतशी आईना, आतशी शीशा=वह शीशा जिसके नीचे रखी हुई रुई आदि सूर्यताप से जल जाती है ।

आतस पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'आतश' । उ०—ज्यों छिन एक ही में छुटि जाति है आतस के लगे आतसबाजी ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २४६ ।

आतशबाज पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आतशबाज' । उ०—आतसबाज अनेक मिले बारुद बनावत । -प्रेमघन०, भा०१, पृ ८२० ।

आतशबाजी पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'आतशबाजी' । उ०—ज्यों छिन एक ही में छुटि जाति है आतस के लगे आतसबाजी ।— पद्माकर ग्रं०, पृ० २४६ ।

आतापि, आतापी
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक असुर जिसे अगस्त्य मुनि ने अपने पेट में पचा लिया था । २. चील पक्षी ।

आतायी
संज्ञा पुं० [सं० आतायिन्] चिल पक्षी [को०] ।

आतार
संज्ञा पुं० [सं०]दे० 'आतर' ।

आतासंदेश
संज्ञा पुं० [सं० आतु+ बं० संदेश] एक प्रकार की बँगला मिठाई । इसमें आत (शरीफा) की सी सुगंध आती है और कभी कभी शरीफे के आकारांश की भी इसमें थोड़ी झलक आती है । यह छेने की बनती है ।

आति, आती
संज्ञा स्त्री [सं०] एक पक्षी । आडी [को०] ।

आतिथेय
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० आतिथेयी] १. अतिथि के सत्कार की सामग्री । २. अतिथिसेवा में कुशल मनुष्य । ३. मेजबान ।

आतिथेयी
वि० [सं० आतिथियिन्] अतिथिसेवा करनेवाला [को०] ।

आतिथ्य
संज्ञा पुं० १. अतिथि का सत्कार । पहुनाई । मेह— मानदारी । २. अतिथि को देने योग्य वस्तु । ३. मेहमान । अतिथि ।यौ०.—आतिथ्यसत्कार, आतिथ्यसत्क्रिया=अतिथि का संमान या स्वागत आदि करना ।

आतिरश्चीन
वि० [सं०] थोड़ा तिरछा [को०] ।

आतिरेक्य, आतिरैक्य
संज्ञा पुं० [सं०] अतिरेक होना । आधिक्य [को०] ।

आतिवाहिक
संज्ञा पुं० [सं०] मरने के पीछे का वह लिंगशरीर जिसे धारण करके जीव यमलोकादि में भ्रमण करता है । यह शरीर वायुमय होता है । इसका दूसरा नाम 'भोगशरीर' भी है ।

आतिश
संज्ञा स्त्री० [फा० आतश] दे० 'आतश' । —इश्क पर जोर नहीं, है यह वो आतिश गालिब । कि लगाए न लगे और बुझाए न बने ।—शेर०, पृ० ५३९ ।

आतिशदान
संज्ञा पुं० [फा० आतशादान] दे० 'आतशदान' । उ०— आतिशदान के कार्निश पर धरे हुए बक्स औऱ बोतल चमक उठे ।—आकाश०, पृ० ५० ।

आतिशयिक
वि० [सं०] अत्यधिक [को०] ।

आतिशय्य
संज्ञा पुं० [सं०] अतिशय होने का भाव । अधिक्य । बहुतायत । अधिकाई । ज्यादती ।

आतीपाती
संज्ञा स्त्री० [हिं० पाती=पत्ता] पहड़वा । पहाड़ी डिलो । एक खेल । विशेष—इसमें बहुत से लड़के जमा होकर एक लड़के को चोर बनाकर उसे किसी पेड़ की पत्ती लेने भेजते हैं । उसके चले जाने पर सब लड़के छिप रहते हैं । पत्ती लेकर लौट आने पर वह लड़का जिसको ढुँढ़कर छू लेता हैं, फिर वही चोर कहलाता है । उस लड़के को भी उसी प्रकार पत्ती लेने जाना पड़ता है । यह खेल बहुधा चाँदनी रातों में खेला जाता है ।

आतुर (१)
वी० [सं०] १. व्याकुल । व्यग्र । घबराया हुआ । जैसे,— इतने आतुर क्यों होते हो; तुम्हारा काम सब ठीक कर दिया जायगा । २. अधीर । उद्विग्न । बेचैन । यौ०—आतुरसंन्यास । कामातुर । क्रोधातुर । ३. उत्सुक । दुखी । रोगी ।

आतुर (२)
क्रि० वि० शीघ्र । जल्दी । उ०—सर मज्जन करि आतुर आवहु । दिक्ष्या देउँ ज्ञान जिहि पावहु ।-मानस, ६ ।५६ ।

आतुरता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १.घबराहट । बेचैनी । व्याकुलता । व्यग्रता । उ०—तिय की लखि आतुरता पिय की आखियाँ अति चारु चलीं जल च्वै ।—तुलसी ग्रं०, पृ० १६४ । २. जल्दी । शीघ्रता ।

आतुरताई पु
संज्ञा स्त्री० [सं० आतुरता+ हिं० आई (प्रत्य.)] उतावलापन । शीघ्रता । जल्दीबाजी । उ०—उठि कह्वये भोर भयो झँगुली दै मुदित महरि लाखि आतुरताई । बिहंसी ग्वालि जानि तुलसी प्रभु सकुचि चले जननी उर धाई ।-तुलसी ग्रं०, पृ० ४३५ ।

आतुरशाला
संज्ञा पुं० [सं०] चिकित्सालय । अस्पताल [को०] ।

आतुरसंन्यास
संज्ञा पुं० [सं०] वह संन्यास जो मरने के कुछ पहले त्वरापूर्वक धारण कराया जाता है ।

आतुरालय
संज्ञा पुं० [सं०] अस्पताल । चिकित्सागृह [को०] ।

अतुरिया पु
संज्ञा स्त्री० [सं० आतुर+ हिं० इया (प्रत्य०)] अधिक्य । उ०—दीपक ज्योति मलीन भई मनि भूषन जोति की आतुरिया है ।—भिखारी ग्रं०, भा०,१, पृ० १२१ ।

आतुरी (१)पु
संज्ञा स्त्री० [सं० आतुर+ ई (प्रत्य०)] १. घबराहट । व्याकुलता । २. शीघ्रता । जल्दीबाजी । उतावलापन । बेसब्री ।

आतुरी (२) पु
क्रि० वि० घबराहट । आतुरतापूर्वक । उ०—नारि गई फिरि भवन आतुरी । नंद घरनि अब भई चातुरी ।— सूर०, १० ।३९१ ।

आतुरी (३)पु
वि० घबराया हुआ । व्याकुल ।

आतुर्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. रोग । बीमारी । २. एक प्रकार का ज्वर [को०] ।

आतृण्ण (१)
वि० [सं०] १. विद्ध । बिंधा हुआ । २. कटा हुआ । घायल [को०] ।

आतृण्ण (२)
संज्ञा पुं० १. छिद्र । छेद । २. खुला हुआ घाव या जख्म [को०] ।

आतृप्य
संज्ञा पुं० [सं०] सीताफल । शरीफा [को०] ।

आतोदी
वि० [सं० आतोदिन्] आघात द्वारा बजनेवाले बाजों को बजानेवाला [को०] ।

आतोद्य, आतोद्यक,
संज्ञा पुं० [सं०] आघात से बजनेवाला बाजा [को०] ।

आत्त
वि० [सं०] १. लिया हुआ । प्राप्त । गृहीत । २. निकाला हुआ । ३. पकड़ा हुआ । हृत । ४. अनुभव किया हुआ । अनुभूत । ५. आरब्ध । प्रारंभ किया हुआ [को०] ।

आत्तगंध
वि० [सं० आत्तगन्ध] १. सूँघा हुआ । २. तिरस्कृत । अपमानित । ३. पराजित । पराभूत [को०] ।

आत्तगर्व
वि० [सं०] गलितगर्व । जिसका गर्व हर लिया गया हो ।

आत्तदंड
वि० [सं० आत्तदण्ड] दंडित । सजायाफता [को०] ।

आत्तप्रतिदान
संज्ञा पुं० [सं०] पाई हुई वस्तु को लौटाना या फेरना (को०) ।

आत्तमनस्क
वि० [सं०] हर्षित । तुष्ट [को०] ।

आत्तमना
वि० [सं० आत्तमनस्] प्रसन्न । हृष्ट [को०] ।

आत्तलक्ष्मी
वि० [सं०] धन से वंचित [को०] ।

आत्तवचस्
वि० [सं०] वाक् या वाणी से रहित [को०] ।

आत्मंभरि
संज्ञा पुं० [सं० आत्मम्भरि] १. जो अकेले अपने को पाले । २. जो देवता पितर आदि को बिना अर्पित किए ही भोजन करे । उदरंभरि [को०] ।

आत्म
वि० [सं० आत्मन्] अपना । स्वकीय । निज का ।

आत्मक
वि० [सं०] [स्त्री० आत्मिका] मय । युक्त । विशेष—यह शब्द अकेले नहीं आता, केवल यौगिक बनाने के काम में किसी शब्द के अंत में आता है ।—जैसे—गद्यात्मक= गद्यमय । पद्यात्मक=पद्यमय ।

आत्मकथा
संज्ञा स्त्री० [सं० आत्म+ कथा] अपने ही मुख से कहा हुआ या अपना लिखा हुआ जीवनवृत्तांत । आत्मचरित्त । आपबीती । उ०—सुनकर क्या तुम भला करोगे ?—मेरी भोली आत्मकथा? —लहर, पृ० ११ ।

आत्मकल्याण
संज्ञा पुं० [सं०] अपना भला । अपनी भलाई ।

आत्मकाम
वि० [सं०] [वि० स्त्री० आत्मकामा] १. स्वयं से ही प्रेम करनेवाला । गर्विष्ठ । २. आत्मतत्व का प्रेमी [को०] ।

आत्मकृत
वि० [सं०] १. अपना किया हुआ । २. अपने विरुद्ध किया हुआ [को०] ।

आत्मक्रीड़ा
संज्ञा स्त्री० [सं० आत्मक्रीड़ा] आत्मतत्व के साथ क्रीड़ा [को०] ।

आत्मगत (१)
वि० [सं०] १. अंतरात्मा का । आंतारिक । उ०—बढ़ रहा था तेज तप का हुआ कृशतर गात । खिली मुख पर दीप्ति कोई आत्मगत अज्ञात ।—पार्वती, पृ० १४५ । २. मान- सिक [को०] ।

आत्मगत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] नाटक के पात्र का अपने ही मन में सोचना या विचार करना जिसे श्रोताओं को अवगत कराने के लिये जोर जोर से कहना पड़ता है । स्वगत ।

आत्मगति
संज्ञा स्त्री० [सं०] अपनी गति (को०) ।

आत्मगत्या
क्रि० वि० [सं०] अपनी ही गति से । अपने ही कार्य से [को०] ।

आत्मगुप्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. केवाँच । २. शतावर ।

आत्मगुप्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] किसी जानवर के रहने की छिपी जगह । माँद [को०] ।

आत्मगौरव
संज्ञा पुं० [सं०] अपनी बड़ाई या प्रतिष्ठा का ध्यान । उ०—सती के पवित्र आत्मगौरव की पुराणगाथा गूँज उठी भारत के कोने जिसे दिन । —लहर, पृ० ६३ ।

आत्मग्राहो
वि० [सं० आत्मग्राहिन्] स्वार्थी । खुदगर्ज [को०] ।

आत्मघात
संज्ञा पुं० [सं०] अपने हाथों अपने को मार डालने का काम । खुदकुशी । आत्महत्या ।

आत्मघातक (१)
वि० [सं०] अपने हाथों अपने को मार डालनेवाला ।

आत्मघाती
वि० [सं० आत्मघातिन्] [वि० स्त्री० आत्मघातिनी] जो अपने हाथों अपने को मार डाले । उ०—आत्मघाती बन प्रकृति के रमण में खो शक्ति सारी ।—पार्वती, पृ० २ ।

आत्मघोष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अपनी भाषा में अपना ही नाम पुकारनेवाला—कौआ । २. मुर्गा । २. वह व्यक्ति जो अपनी प्रशंसा आप करे (को०) ।

आत्मघोष (२)
वि० अपने मुँह से अपनी बड़ाई करनेवाला ।

आत्मचिंतन
संज्ञा पुं० [सं० आत्मचिन्तन] आत्म या आत्मा संबंधी चिंतन । उ०—हृदय नहीं है परिचित मन से, मन है विमुख आत्मचिंतन से ।—प्रेमांजलि, पृ० ४५ ।

आत्मचतुर्थ
वि० [सं०] तीन हिस्सेदारों के अतिरिक्त चौथे भाग या हिस्सेवाला । चौथाई का हिस्सेदार [को०] ।

आत्मचरित
संज्ञा पुं० [सं०] अपने जीवन का वृत्त या हाल । उ०— पुराने हिंदी साहित्य में यही एक आत्मचरित मिलता है ।— इतिहास०, पृ० २२२ ।

आत्मज (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० आत्मजा] १. पुत्र । लड़का । २. कामदेव । ३. रक्त । खून ।

आत्मज (२)
वि० [सं०] स्वयं उत्पन्न [को०] ।

आत्मजन्म
संज्ञा पुं० [सं०] पुत्र का जन्म [को०] ।

आत्मजन्मा
संज्ञा पुं० [सं०] [आत्मजन्मन्] दे० 'आत्मज (१) ।

आत्मजय
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्रियनिग्रह करने का कार्य [को०] ।

आत्मजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुत्री । दुहिता [को०] ।

आत्मजात
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'आत्मज' ।

आत्मजिज्ञासा
संज्ञा स्त्री० [सं०] [वि० आत्मजिज्ञासु] अपने को जानने की इच्छा ।

आत्मजिज्ञासु
वि० [सं०] अपने को जानने की इच्छा रखनेवाला ।

आत्मज्योति
संज्ञा स्त्री० [सं०] आत्मा की ज्योति । अंतरात्मा का प्रकाश [को०] ।

आत्मज्ञ
संज्ञा पुं० [सं०] जो अपने को जान गया हो । जिसे निज स्वरूप का ज्ञान हो ।

आत्मज्ञान
संज्ञा पुं० [सं०] निजत्व की जानकारी । जीवात्मा और परमात्मा के विषय में जानकारी ।२. ब्रह्ना का साक्षात्कार ।

आत्मज्ञानी
संज्ञा पुं० [सं० आत्मज्ञानिन्] १. जो आत्मतत्व को जान गया हो । आत्मा और परमात्मा के संबंध में जानकारी रखनेवाला ।

आत्मतंत्र (१)
संज्ञा पुं० [सं० आत्मतंत्र] अपना आधार [को०] ।

आत्मतंत्र (२)
वि० १. अपने वश या अधिकार में किया हुआ । २. अपने पर अवलंबित । स्वतंत्र [को०] ।

आत्मतत्व
संज्ञा पुं० [सं०] आत्मा या परमात्मा का तत्व [को०] ।

आत्मतत्वज्ञ
वि० [सं०] आत्मा या परमात्मा के तत्व का जानकरा [को०] ।

आत्मता
संज्ञा स्त्री० [सं०] सार । प्रकृति [को०] ।

आत्मतुष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आत्मज्ञान से उत्पन्न संतोष या आनंद । २. आत्मसंतोष ।

आत्मतृप्त
संज्ञा पुं० [सं०] स्वयं में संतुष्ट [को०] ।

आत्मत्याग
संज्ञा पुं० [सं०] १. परोपकार बुद्धि से अपने लाभ की ओर ध्यान न देना । दूसरों के हित के लिये अपना स्वार्थ छोड़ना । २. आत्मघात । खुदकुशी (को०) ।

आत्मत्यागी
वि० [सं० आत्मत्यागिन्] १. आत्मघाती । २. अविश्वासी [को०] ।

आत्मद्रोही
वि० [सं० आत्मद्रोहिन्] [वि० स्त्री० आत्मद्रोहिणी] अपने को हानि पहुचानेवाला । अपनी हानि करनेवाला ।

आत्मधारणभूमि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह अधीन राज्य या भूमि जिसका शासनप्रबंध वहीं की सेना और संपत्ति से हो, जाय, साम्राज्य को उसके शासन का कोई खर्च न उठाना पड़े (को०) ।

आत्मन्
संज्ञा पुं० [सं०] निजत्व । अपनापन । अपना स्वरुप । विशेष—इसका प्रयोग प्रायः यौगिक शब्दों में होता है और यह 'निज' या 'अपना' का अर्थ देता है । जैसे,—आत्मकल्याण । आत्मरक्षा । आत्महत्या । आत्मश्लाघा इत्यादि ।

आत्मनिवेदन
संज्ञा पुं० [सं०] १. अपने आपको या आपना सर्वस्व अपने इष्टदेव पर चढ़ा देना । आत्मसमर्पण । २. नवधाभक्ति में से अंतिम भक्ति ।

आत्मनिवेदनासक्ति
संज्ञा पुं० [सं०] अपने सर्वस्व और शरीर को अपने इष्ट देव को सौंप देने की प्रबल इच्छा ।

आत्मनिष्ठ
वि० [सं०] आत्मज्ञान में रत । ब्रह्मानिष्ठ । मुमुक्षु ।

आत्मनिष्ठा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आत्मज्ञान की रति । २. अपने प्रति निष्ठा । आत्मविश्वास [को०] ।

आत्मनीय
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुत्र । २. साला । ३. विदूषक ।

आत्मनेपद
संज्ञा पुं० [सं०] १. संस्कृत व्याकरण में धातु में लगनेवाले दो प्रकार के प्रत्ययों में से एक । २. वह क्रिया जो आत्मनेपद प्रत्यय लगने से बनी हो ।

आत्मप्रशंसा
संज्ञा पुं० [सं०] अपने मुँह से अपनी बड़ाई ।

आत्मप्रसार
संज्ञा पुं० [सं०] आत्मविस्तार । अपना फैलाव । उ०— मनुष्य उस कोटि की पहुँची हुई सत्ता है जो उस अल्पक्षण में ही आत्मप्रसार को बद्ध रखकर सतुंष्ट नहीं हो सकती ।-रस०, पृ० १४८ ।

आत्मप्रेरणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अपने भीतर से प्राप्त प्रेरणा । आंतरिक प्रेरणा । उ०—आत्मप्रेरणा की पीड़ा से आकुल थे सब प्राणी ।—पार्वती, पृ० ५६ ।

आत्मबोध
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'आत्मज्ञान' । उ०—आत्मबोध और जगद्वोध के बीच ज्ञानियों ने गहरी खाई खोदी पर हृदय ने कभी उसकी परवा न की ।—रस०, पृ० ५५ ।

आत्मभू (१)
वि० [सं०] १. अपने शरीर से उत्पन्न । २. आप ही आप उत्पन्न ।

आत्मभू (२)
संज्ञा पुं० १. पुत्र । २. कामदेव । ३. ब्रह्ना । ४. विष्णु । ५. शिव ।

आत्मभूत
वि० [सं०] आत्ममय । वह जो अपना अंग बन गया हो । अपनाया हुआ ।

आत्मयोनि
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मा । २. विष्णु । ३. महेश । ४. कामदेव ।

आत्मरक्षक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० आत्मरक्षिका] अपनी रक्षा करनेवाला ।

आत्मरक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] अपना बचाव । अपनी हिफाजत ।

आत्मरक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'आत्मरक्षण' । २. इंद्रवारुणी वृक्ष [को०] ।

आत्मरत (१)
वि० [सं० आत्मरति] १. जिसे आत्मज्ञान हुआ हो । ब्रह्मज्ञानप्राप्त । ब्रह्मज्ञानी । २. स्वयं को प्रेम करनेवाला ।

आत्मरत (२)
संज्ञा पुं० [सं०] महेंद्रवारुणी । बड़ी इंद्रायन ।

आत्मरति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आत्मज्ञान । ब्रह्मज्ञान । २. स्वयं से प्रेम करना ।

आत्मवंचक
वि० [सं० आत्मवञ्चक] अपने को आप ठगनेवाला । अपनी हानि स्वयं करनेवाला । अज्ञानी ।

आत्मवाद
संज्ञा पुं० [सं०] अहंभाव । उ०—प्रथम हम हम करत पहुँच्यौ आत्मवाद कठोर ।—बुद्ध०, पृ० १४५ ।

आत्मविक्रय
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आत्मविक्रयी] अपने को आप ही बेच डालना । विशेष—मनु के अनुसार यह कर्म एक उपपातक है ।

आत्मविक्रयी
वि० [सं० आत्मविक्रयिन्] अपने को बेचनेवाला ।

आत्मविक्रेता
संज्ञा पुं० [सं० आत्मविक्रेतृ] वह दास जो अपने आपको बेचकर दास हुआ हो ।

आत्मविचय
संज्ञा पुं० [सं०] अपनी तलाशी या नंगाझोली देना ।

आत्मविद्
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुद्धिमान व्यक्ति । आत्मज्ञानी । २. अपने तथा अपने कुटुंब परिवार को जाननेवाला व्यक्ति । ३. शिव का एक नाम [को०] ।

आत्मविद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. वह विद्या जिससे आत्मा और परमात्मा का ज्ञान हो । ब्रह्नविद्या । अध्यात्मविद्या । २. मिस्मेरिज्म ।

आत्मविश्वास
संज्ञा पुं० [सं०] अपनी शक्ति पर विश्वास । अपनी योग्यता का भरोसा ।

आत्मविस्मृत
वि० [सं०] स्वयं को भूला हुआ ।

आत्माविस्मृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] अपने को भूल जाना । अपना ध्यान न रखना । आत्मविस्मरण ।

आत्मशल्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] सतावरी ।

आत्मशासन
संज्ञा पुं० [सं० आत्म+शासन] दे० 'स्वराज' (क्व०) ।

आत्मश्लाघा
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आत्मश्लाघी] अपनी तारीफ ।

आत्मश्लाघी
वि० [सं० आत्मश्लाघिन्] अपनी प्रशंसा करनेवाला ।

आत्मसंभव (१)
वि० [सं० आत्मसम्भव] [वि० स्त्री० आत्मसंभाव] अपने शरीर से उत्पन्न ।

आत्मसंभव (२)
संज्ञा पुं० पुत्र ।

आत्मसंमान
संज्ञा पुं० [सं० आत्मसम्मान] आत्मगौरव । अपने गौरव का भाव ।

आत्मसंयम
संज्ञा पुं० [सं०] अपने मन को रोकना । इच्छाओं को वश में रखना ।

आत्मसंवेदन
संज्ञा पुं० [सं०] अपनी आत्मा का अनुभव । आत्मबोध ।

आत्मसंस्कार
संज्ञा पुं० [सं०] अपना सुधार ।

आत्मसमुद्भव (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० आत्मसमुदभवा] १. अपने शरीर से उत्पन्न । २. अपने ही आप उत्पन्न ।

आत्मसमुद्भव (२)
संज्ञा पुं० १. ब्रह्मा । २. विष्णु । ३. शिव । ४. कामदेव ।

आत्मसमुद्भवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कन्या । २. बुद्धि ।

आत्मसाक्षी
संज्ञा पुं० [सं० आत्मसाक्षिन्] जीवों का द्रष्टा ।

आत्मसिद्ध
वि० [सं०] अपने आप होनेवाला । बिना प्रयास ही होनेवाला ।

आत्मसिद्धि
संज्ञा स्त्री० [सं०] आत्मभाव की प्राप्ति । मुक्ति मोक्ष ।

आत्महत्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अपने आपको मार डालना । खुदकुशी २. अपने आपको दुःख देना ।

आत्महन्
वि० [सं०] १. जो अपने आप को मार डाले । आत्मघाती । २. जो अपनी भलाई के प्रति उदासीन हो या उसकी उपेक्षा करे (को०) । ३. अविश्वासी (को०) । ४. मंदिर आदि में नौकरी करनेवाला (सेवक या पुजारी) (को०) ।

आत्महिंसा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'आत्महत्या' ।

आत्मा
संज्ञा स्त्री० [सं०] [वि० आत्मिक, आत्मीय] १. जीव । २. चित्त । ३. बुद्धि । ४. अहंकार । ५. मन । ६. ब्रह्वम । विशेष—इस शब्द का प्रयोग विशेषकर जीव और ब्रह्म के अर्थ में होता है । इसका यौगिक अर्थ 'व्याप्त' है । जीव शरीर के प्रत्येक अंग व्याप्त है और ब्रह्म संसार के प्रत्येक अणु और अवकाश में । इसीलिये प्राचीनों ने इसका व्यवहार दोनों के लिये किया है । कहीं कहीं 'प्रकृति' को भी शास्त्रों में इस शब्द से निर्दिष्ट किया गया है । साधारणतः जीव, ब्रह्नम औऱ प्रकृति तीनों के लिये या यों कहिए, अनिर्वचनीय पदार्थों के लिये इस शब्द का प्रयोग हुआ है । इनमें 'जीव' के अर्थ में इसका प्रयोग मुख्य और 'ब्रह्म' और 'प्रकृति' के अर्थों में क्रमशः गौण है । दार्शनकों के दो भेद हैं-एक आत्मवादी और दूसरे अनात्म- वादी । प्रकृति ने पृथक् आत्मा को पदार्थविशेष माननेवाले आत्मवादी कहलाते हैं । आत्मा को प्रकृति-विकार-विशेष माननेवाले अनात्मवादी कहलाते हैं, जिनके मत में प्रकृति के अतिरिक्त आत्मा कुछ है ही नहीं । अनात्मावादी आजकल योरप में बहुत हैं । आत्मा के विषय में इनकी धारणा यह है कि यह प्रकृति के भिन्न भिन्न वैकारिक अंशों के संयोग से उत्पन्न एक विशेष शक्ति है, जो प्राणियों में गर्भावस्था से उत्पन्न होती है और मरणपर्यंत रहती है । पीछे उन तत्वों के विश्लेषण से, जिनसे यह उत्पन्न हुई थी, नष्ट हो जाती है । बहुत दिन हुए भारतवर्ष में यहीं बात 'बृहस्पति' नामक विद्वान ने कही थी जिसके विचार चार्वाक दर्शन के नाम से प्रख्यात हैं और जिसके मत को चार्वाक मत कहते हैं । इनका कथन है कि 'तच्चैतन्य-' विशिष्टदेह एव आत्मा देहातिरिक्त आत्मनि प्रमाणभावात् । देह के अतिरिक्त अन्यत्र आत्मा के होने का कोई प्रमाण नहीं हैं, अतः चैतन्यविशिष्ट देह ही आत्मा है । इस मुख्य मत के पीछे कई भेद हो गए थे और वे क्रमशः शरीर की स्थिति और ज्ञान की प्राप्ति में कारणभूत इंद्रिय, प्राण, मन, बुद्धि और अहंकार को ही आत्मा मानने लगे । कोई इसे विज्ञान मात्र अर्थात् क्षणिक मानते हैं । वैशेषिक दर्शन में आत्मा को एक द्रव्य माना है और लिखा है कि प्राण, अपान, निमेष, उन्मेष जीवन, मन, गति, इंद्रिय, अंतर्विकार जैसे-भूख, प्यास, ज्वर, पीड़ादि, सुख, दुःख इच्छा, द्वेष और प्रयत्न आत्मा के लिंग हैं । अर्थात् जहाँ प्राणादि लिंग वा चिह्न देख पड़े वहाँ आत्मा रहती है । पर न्यायकार गौतम मुनि के मत से 'इच्छा' द्वेष, प्रयत्न, सुख दुःख और ज्ञान (इच्छा-द्वेष-प्रयत्न-सुख,-दुःख-ज्ञानान्या- त्मनो लिङ्गम्) ही आत्मा के चिह्न हैं । सांख्यशास्त्र के अनुसार आत्मा एक अकर्ता साक्षीभूत प्रसंग और प्रकृति से भिन्न एक अतींद्रिय पदार्थ है । योगशास्त्र के अनुसार यह वह अतींद्रिय पदार्थ है जिसमें क्लेश, कर्मविपाक और आशय हो । ये दोनों (सांख्य और योग) आत्मा के स्थान पर पुरुष शब्द का प्रयोग करते हैं । मीमांसा के अनुसार कर्मों का कर्ता और फलों का भोक्ता एक स्वतंत्र अतींद्रिय पदार्थ है । पर मीमांसकों में प्रभाकर के मत से 'अज्ञान' और कुमारिल भट्ट के मत से 'अज्ञानोपहत चैतन्य' ही आत्मा है । वेदांत के मत से नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, स्वभाव ब्रह्म का अंशविशेष आत्मा है । बुद्वदेव के मत से एक अनिर्वचनीय पदार्थ, जिसकी आदि और अंत अवस्था का ज्ञान नहीं है, आत्मा है । उत्तरीय बौद्धों के मत से यह एक शून्य पदार्थ है । जैनियों के मत से कर्मों का कर्ता फलों का भोक्ता और अपने कर्म से मोक्ष और बंधन को प्राप्त होनेवाला, एक अरूपी पदार्थ है । मुहा०—आत्मा ठंढी होना=(१) तुष्टि होना । तृप्ति होना । संतोष होना । प्रसन्नता होना । जैसे,—उसको भी दंड मिले तब हमारी आत्मा ठंढी हो । (२) पेट भरना । भूख मिटना । जैसे,—बाबा कुछ खाने को मिले तो आत्मा ठंढ़ी हो । आत्मा मसोसना=(१) भूख सहना । भूख दबाना । जैसे,—इतने दिनों तक आत्मा मसोसकर रहो । (२) किसी प्रबल इच्छा को दबाना । किसी आवेग को भीतर ही सहना । ७. देह । शरीर । ८. सूर्य । ९. अग्नि । १०. वायु । ११. स्वभाव । धर्म । १२. पुत्र [को०] ।

आत्माधीन (१)
वि० [सं०] अपने वश में ।

आत्माधीन (२)
संज्ञा पुं० १. पुत्र । २. विदूषक । ३. साला (को०) ।

आत्मानंद
संज्ञा पुं० [सं० आत्मानन्द] आत्मा का ज्ञान । आत्मा में लीन होने का सुख ।

आत्मानुभव
संज्ञा पुं० [सं०] १. अपना अनुभव या तजुरबा । स्वानुभूति । २. आत्मा की अनुभूति ।

आत्मानुरूप
संज्ञा पु० [सं०] जो जाति, वृत्ति और गुण आदि में अपने समान हो । स्वानुरुप ।

आत्माभिमान
संज्ञा पुं० [सं०] अपनी इज्जत या प्रतिष्ठा का खयाल । मान अपमान का ध्यान । स्वाभिमान ।

आत्माभिमानी
संज्ञा पुं० [सं० आत्माभिमानिन्] जिसे अपनी इज्जत या प्रतिष्ठा का बड़ा खयाल हो । जिसे मान अपमान का ध्यान हो । स्वाभिमानी ।

आत्मामिष संधि
संज्ञा स्त्री० [सं० आत्मामिषसन्धि] कामंदकीय नीति के अनुसार वह संधि जो स्वयं सेना के साथ शत्रु के पास जाकर की जाय ।

आत्माराम
संज्ञा पुं० [सं०] १. आत्माज्ञान से तृप्त योगी । २. जीवा ३. ब्रह्म । ४. तोता । सुग्गा ।

आत्मावलंबी
संज्ञा पुं० [सं० आत्मावलम्बिन्] जो सब काम अपने बल पर करे । जो किसी कार्य के लिये दूसरे की सहायता का भरोसा न रखे । स्वावलंबी ।

आत्मिक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० आत्मिका] १. आत्मासंबंधी । २. अपना । ३. मानसिक ।

आत्मीकृत
वि० [सं०] अपनाया हुआ । स्वीकृत ।

आत्मीय (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० आत्मीया] निज का । अपना । स्वकीय ।

आत्मीय (२)
संज्ञा पुं० [सं०] स्वजन । अपना संबंधी । रिश्तेदार । इष्टमित्र । निकट का व्यक्ति ।

आत्मीयता
संज्ञा स्त्री० [सं०] अपनायत । स्नेह—संबंध । मैत्री ।

आत्मोत्सर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] परोपकार के लिये अपने को दुःख या विपत्ति में डालना । दूसरे की भलाई के लिये अपने हिताहित का ध्यान छोड़ना । स्वार्थत्याग ।

आत्मोद्धार
संज्ञा पु० [सं०] अपनी आत्मा को संसार के दुःख से छुड़ाना या ब्रह्म में मिलाना । मोक्ष ।

आत्मोद्भव
संज्ञा पु० [सं०] १. पुत्र । २. कामदेव । ३. दुःख । पीड़ा [को०] ।

आत्मोद्भवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १.कन्या । २. बुद्धि । ३. माशपर्णी [को०] ।

आत्मोन्नति
संज्ञा पुं० [सं०] १. आत्मा की उन्नति । २. अपनी तरक्की । स्वविकास ।

अत्मोपजीवी
संज्ञा पुं० [सं० आत्मोपजीविन्] १. अपने श्रम से जीविकोपार्जन करनेवाला । २. रोजही या दैनिक मजदूरी पर काम करनेवाला श्रमिक । ३. अभिनेता [को०] ।

आत्मोपम
संज्ञा पुं० [सं०] पुत्र [को०] ।

आत्यंतिक
वि० [सं० आत्यन्तिक] [वि० स्त्री० आत्यन्तिकी] १. जो बहुतायत से हो । २. जिसका ओर छोर न हो । यौ०—आत्यंतिकदुःखनिवृत्ति=मोक्ष । आत्यंतिकप्रलय=पूर्ण प्रलय ।

आत्ययिक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० आत्ययिकी] १. विनाशक । २. दुर्भाग्य पूर्ण । ३. आवश्यकीय । ४. देर क्या हुआ । विलंबित [को०] ।

आत्रेय (१)
वि० [सं० अत्रि] १. अत्रि के गोत्रवाला ।

आत्रेय (२)
संज्ञा पुं० १. अत्रि के पुत्र—दत्त, दुर्वासा, चंद्रमा । २. आत्रेयी नदी के तट का प्रदेश जो दीनाजपुर जिले के अंतर्गत है । ३. शिव की एक उपाधि [को०] ।

आत्रेयी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. उपनिषद् काल की एक विदुषी तपस्विनी जो वेदांत में बड़ी निष्णात थी । २. पश्चिमी बंगाल की एक नदी का नाम । तिस्ता । ३. रजस्वाला स्त्री । ४. अत्रि गोत्र की स्त्री ।

आथ पु
संज्ञा पुं० [सं० अर्थ] धन । पूँजी । उ०—आथ तेणे अभि- लाष इम, इण भुजनूँ आवंत ।-बाँकीदास ग्रं०, भा०३, पृ० ६ ।

आथना (१)पु
क्रि० अ० [सं० अस=होना, सं० अस्ति, प्रा० अत्थि] होना । उ०—(क) कबिरा पढ़ना दूर कर, आथि पड़ा संसार । पीर न उपजै जीव की, क्यों पावै करतार ।—कबीर (शब्द०) । (ख) काया माया संग न आथी । जेहि जिउ सौंपा सोई साथी ।-जायसी ग्रं०, पृ० ६० ।

आथना (२) पु
क्रि० अ० [सं० अस्त, प्रा० अत्थ] अस्त होना । डूबना । समाप्त होना ।

आथर्वण
संज्ञा पुं० [सं०] १. अथर्ववेद का जाननेवाला ब्राह्मण । २. अथर्ववेदविहित कर्म । ३. अथर्वा ऋषि का पुत्र । ४. अथर्वा गोत्र में उपन्न व्यक्ति ।

आथी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० स्थातृ, हिं० थाती अथवा सं० आथकी= आर्थिक स्थिति प्रा०* अत्थिई, * आथह] पूँजी । धन । उ०— साथी आथि निजाथि जो सकै साथ निरबाहि ।—जायसी (शब्द०) ।

आथी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्थ] अर्थसंपन्नता । अमीरी । खुशहाली ।

आदंश
संज्ञा पुं० [सं०] १. दाँत से काटना । २. दाँत काटने से बना हुआ घाव । ३. दाँत [को०] ।

आदत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. स्वभाव । प्रकृति । २. अभ्यास । टेव । बान । उ०—तू भी मजबूर है जाती नहीं आदत तेरी ।— कविता कौ, भा०, ४, पृ० ५४५ । क्रि० प्र०—डालना ।—पड़ना ।—लगना ।—लगाना ।

आदम
संज्ञा पुं० [अ० आदम, तुल० सं० आदिम] १. इबरानी और अरबी लेखकों के अनुसार मनुष्यों का आदि प्रजापति । उ०— आदम आदि सुद्धि नहिं पावा । मामा हौवा कहँते आवा ।— कबीर (शब्द०) । २. आदम की संतान । मनुष्य । जैसे,— चलते चलते वह एक ऐसे जंगल में पहुँचा जहाँ न कोई आदम था न आदमजाद । यौ०—आदमकद । आदमखोर । आदमचश्म । आदमजाद ।

आदमकद
वि० [सं० आदम+कद] आदमी के कद के बराबर । उ०—कमरे में बड़े बड़े आदमकद आइने रखे जाते हैं ।— गबन, पृ० १०९ ।

आदमखोर
वि० [अ० आदम+फा० खोर] आदमी को खानेवाला । मानवभक्षी (शब्द०) ।

आदमचश्म
संज्ञा पुं० [अ० आदम+फा० चश्म=चक्षु] वह घोड़ा जिसकी आँख की स्याही मनुष्य की आँख की स्याही के समान हो । ऐसा घोड़ा बड़ा नटखट होता है ।

आदमजाद
संज्ञा पुं० [अ० आदम+फा० जाद=पैदा] १. आदम की संतान । २. मनु की संतान । मनुष्य ।

आदमियत
संज्ञा पुं० [अ०] १. मनुष्यत्व । इंसानियत । २. सभ्यता । क्रि० प्र०—पकड़ना ।—सीखना ।

आदमी
संज्ञा पुं० [अ०] आदम की संतान । मनुष्य । मानव जाति । मुहा०—आदमी बनना=सभ्यता सीखना । अच्छा व्यवहार सीखना । शिष्टता सीखना । आदमी बनना=शिष्ट और सभ्य करना । २. नौकर । सेवक । जैसे,—जरा अपने आदमी से मेरी यह चिटठी डाकखाने भिजवा दो ।

आदमीयत
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. मनुष्यत्व । इंसानियत । उ०— गर फरिश्तावश हुआ कोई तो क्या । आदमीयत चाहिए इंसान में ।—कविता कौ०, भा०४, पृ० ५५१ । २. सभ्यता ।

आदर
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आदरणीय आदृत, आदर्य] संमान । सत्कार । प्रतिष्ठा । इज्जत । कदर । जैसे,—(क) वे बड़े आदर के साथ हमें अपने घर ले गए । (ख) तुलसीदास के रामचरितमानस का समाज में बड़ा आदर है ।

आदरणीय
वि० [सं०] आदरयोग्य । आदर करने के लायक । संमाननीय ।

आदरना पु
क्रि० स० [सं० आदर से नाम] आदर करना । मानना । उ०—जो प्रबंध बुध नाहिं आदरही । सो श्रम बादि बाल कवि करहीं ।-मानस, १ ।१४ ।

आदरभाव
संज्ञा पुं० [सं० आदर+ भा] सत्कार । संमान । कदर । प्रतिष्ठा । जैसे,—जहाँ अपना आदर भाव नहीं, वहाँ क्यों जायँ? उ०—ऊधौ, चलौ बिदुर कैं जइयै । दुरजौधन कैं कौन काज जहँ आदर भाव न पइयैं । —सूर०, १ ।२३९ ।

आदरस पु
संज्ञा पुं० [सं० आदर्श] दे० 'आदर्श' । उ०—दरसो सारसरस भरे दृग आदरस मँगाय ।—स० सप्तक, पृ० २५८ । यौ०—आदरसमंदिर=शीशमहल । उ०—आछे अवलोकि रही आदरस मंदिर में इंदीवर सुंदर गुबिंद को मखारबिंद ।— पद्माकर ग्रं०, पृ० १०१ ।

आदर्य
वि० [सं०] आदर के योग्य । आदरणीय ।

आदर्श
संज्ञा पुं० [सं०] १. दर्पण । शीशा । आईना । २. वह जिससे ग्रंथ का अभिप्राय झलक जाय । टीका । व्याख्या । ३. वह जिसके रूप और गुण आदि का अनुकरण किया जाय । नमूना । जैसे,—उसका चरित्र हम लोगों के लिये आदर्श है । यौ०—आदर्शमंडल । आदर्शमंदिर । आदर्शरूप ।

आदर्शक
संज्ञा पुं० [सं०] दर्पण । शीशा [को०] ।

आदर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रदर्शित करना । दिखलाना । २. शीशा । दर्पण [को०] ।

आदर्शबिंब
संज्ञा पुं० [सं० आदर्श बिम्ब] गोला शीशा [को०] ।

आदर्शमंडल
संज्ञा पुं० [सं० आदर्श मंडल] १. एक तरह का साँप । २. गोल आईना । ३. दर्पण का तल [को०] ।

आदर्शमंदिर
संज्ञा पुं० [सं० आदर्श मंदिर] शीशमहल ।

आदर्शवाद
संज्ञा पुं० [सं० आदर्श+ वाद] [अं० आइडियलिज्म] वस्तुओं के ज्यों के त्यों वर्णन् को प्रमुखता या महत्व न देकर न करके उनके आदर्शरूप का वर्णन् करना । पश्चिम के दर्शन, शिक्षा दर्शन और साहित्यिक वादों आदि में प्रचलित विशेष विचारधारा ।

आदर्शवादी
वि० [सं० आदर्शवादिन्] [अं० आइडियलिस्ट] आदर्शवाद को माननेवाला या उसके अनुसार रचना करनेवाला ।

आदर्शात्मक
वि० [सं०] काल्पनिक आदर्श के रूप में विषयों के चित्रण या निरूपण से युक्त । आदर्शवाद से संबंध रखनेवाला । आदर्शपरक ।

आदहन
संज्ञा पुं० [सं०] १ ईर्ष्या । जलन । २श्मशान । चिताभूमि ।

आदा †
संज्ञा पुं० [सं० आर्द्रक] अदरक ।

आदान
संज्ञा पुं० [सं०] १. लेना । ग्रहण करना । २. अर्जन । ३. रोग का लक्षण । ४. बाँधना । सुनियोजित करना । ५. घोड़े को फँसाना या बंधनग्रस्त करना । जकड़बदी । ६. क्रिया या कार्य । ७. पराभूत करना [को०] ।

आदानप्रदान
संज्ञा पुं० [सं०] लेना देना ।

आदानसमिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] जैनों के अनुसार आचारनियंत्रण के लिये स्थापित पंचसमिति में से एक जिससे यह ध्यान रहता है कि किसी जिव को कष्ट न हो [को०] ।

आदापन
संज्ञा पुं० [सं०] कोई वस्तु ग्रहण करने के लिये किसी को बुलाना या अभिप्रेरित करना [को०] ।

आदाब
संज्ञा पुं० [अ०] १. नियम । कायदा । २. लिहाज । आन । ३. नमस्कार । प्रणाम । सलाम । जोहार । मुहा०—आदाब अर्ज करना=प्रणाम करना । आदाब बजा लेना= नियमानुसार प्रणाम करना ।

आदि (१)
वि० [सं०] प्रथम । पहला । शुरू का । आरंभ का । जैसे,— वाल्मीकि आदिकवि माने जाते हैं । उ०—गाइ गाउँ के वत्सला मेरे आदि सहाई । —सूर०, १ ।२३८ ।

आदि (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. आरंभ । बुनियाद । मूल कारण । जैसे,— (क) इस झगड़े का आदि यही है । (ख) हमने इस पुस्तक को आदि से अंत तक पढ़ डाला । २. परमात्मा । परमेश्वर । उ०—आदि किएउ आदेश सुत्रहि ते अस्थूल भए ।—जायसी ग्रं०, पृ० ३०८ । मुहा०—आदि से अंत तक=आद्योपांत । शुरू से आखीर तक । संपूर्ण । समग्र । सब ।

आदि (३)
अव्य० वगैरह । आदिक । उ०—सिंहसावक ज्यों तजै गृह, इंद्र आदि डरात । सूर०, १ ।१०६ ।

आदिक
अव्य० [सं०] आदि । वगैरह । उ०—कौसिल्या आदिक महतारी, आरति करहिं बनाइ ।—सूर० ९ ।२९ ।

आदिकर
वि० [सं०] आदि करनेवाला । स्त्रष्टा [को०] ।

आदिकरणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक पौधा [को०] ।

आदिकर्ता
वि० [सं०] आदिकर । स्रष्टा [को०] ।

आदिकर्म
संज्ञा पुं० [सं०] कर्म का आदि या आरंभ [को०] ।

आदिकवि
संज्ञा पुं० [सं०] वाल्मीकि ऋषि । उ०—जान आदिकवि नाम प्रभाऊ । भएउ सुद्ध कहि उलटा नाऊँ ।— मानस, १ ।१९ । २. शुक्राचार्य ।

आदिकांड
संज्ञा पुं० [सं० आदिकाण्ड] वाल्मीकि रामायण का पहला कांड [को०] ।

आदिकारण
संज्ञा पुं० [सं०] पहला कारण जिससे सृष्टि के सब व्यापार उत्पन्न हुए । मूलकारण । विशेष—सांख्यवाले प्रकृति को आदिकारण मानते हैं । नैयायिक पुरुष या ईश्वर को आदि कराण कहते हैं ।

आदिकाल
संज्ञा पुं० [सं०] प्रारंभिक काल या समय [को०] ।

आदिकालीन
वि० [सं०] प्रारंभिक या आदिकाल से संबंध रखनेवाला [को०] ।

आदिकाव्य
संज्ञा पुं० [सं०] वाल्मीकि रामायण । विशेष—यह महाकाव्य सबसे पुराना या पहला माना जाता है ।

आदिकृत्
वि० [सं०] स्रष्टा [को०] ।

आदिकेशव
संज्ञा पुं० [सं०] १. काशी स्थित एक देवविग्रह । २. विष्णु [को०] ।

आदिगदाधर
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु [को०] ।

आदिजिन
संज्ञा पुं० [सं०] ऋषभदेव (जैन) [को०] ।

आदितः
क्रि० वि० [सं०] प्रारंभ से । आदि से [को०] ।

आदित पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'आदित्य' । उ०—हरि दरसन सत्राजित आयौ । लोगनि जान्यौ आदित आवत हरि सौं जाइ सुनायौ । —सूर०, १० ।४८०८ ।

आदिताल
संज्ञा पुं० [सं०] संगीत में ताल का प्रकारविशेष [को०] ।

आदितेय
संज्ञा पुं० [सं०] १. अदिति का पुत्र । २. देव । ३. सूर्य [को०] ।

आदित्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. अदिति के पुत्र । २. देवता । ३. सूर्य । ४. इंद्र । ५. वामन । ६. वसु । ७. विश्वेदेवा । ८. बारह मात्राओं के छंदों की संज्ञा; जैसे—तोमर लीला । ९. मदार मदार का पौधा । यौ०—आदित्यपुराण=एक उपपुराण । आदित्यपर्णिका, आदित्यपर्णानी, आदित्यपर्णी, आदित्यवल्लभा=एक जलीय लता । आदित्यसुक्त, आदित्यस्तोत्र, आदित्यहृदय=सूर्य संबंधी सुक्त या स्तोत्र ।

आदित्यकेतु
संज्ञा पुं० [सं० आदित्य+ केतु] १. एक राजा जिसके वंशजों ने नौ पीढ़ी तक ३७५ वर्ष दिल्ली में राजा किया था । २. धृतराष्ट्र का एक पुत्र [को०] । ३. सूर्य का सारथि [को०] ।

आदित्यगति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सूर्य का मार्ग [को०] ।

आदित्यगर्भ
संज्ञा पुं० [सं०] एक बोधिसत्व [को०] ।

आदित्यज्योति
वि० [सं०] जिसमें सूर्य जैसा तेज या ज्योति हो [को०] ।

आदित्यदर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] चार मास के बालक को सूर्यदर्शन कराने का एक संस्कार [को०] ।

आदित्यपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक पौधा । २. आक का पत्र या पत्ता [को०] ।

आदित्यपाक
वि० [सं०] सूर्यताप में पकाया हुआ [को०] ।

आदित्यपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] लाल फूल का मदार ।

आदित्यभक्ता
संज्ञा स्त्री० [सं०] हुरहुर ।

आदित्यमंडल
संज्ञा पुं० [सं० आदित्यमण्डल] सूर्य के चतुर्दिक् पड़नेवाला वलय या घेरा [को०] ।

आदित्यलोक
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्यलोक [को०] ।

आदित्यवार
संज्ञा पुं० [सं०] एतवार । रविवार ।

आदित्यव्रत
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आदित्यव्रतिक] सूर्य का व्रत [को०] ।

आदित्यशयन
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य की निद्रा या शयन [को०] ।

आदित्यसंवत्सर
संज्ञा पुं० [सं०] सौर वर्ष [को०] ।

आदित्यसूनु
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य का पुत्र-१. शनैश्चर । २. यम । ३. कर्ण । ४. सुग्रीव । ५. मनु [को०] ।

आदित्यानुवर्ती
वि० [सं० आदित्यानुवर्तिन्] सूर्य का अनुवर्तन या अनुगमन करनेवाला [को०] ।

आदित्व
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्वता । प्राथमिकता [को०] ।

आदित्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] लेने की इच्छा [को०] ।

आदित्सु
वि० [सं०] ग्रहण करने या लेने का इच्छु [को०] ।

आदिदीपक
संज्ञा स्त्री० [सं०] छंद की विशेष व्यवस्था (जिसमें क्रियापद वाक्य के आदि में आता है) [को०] ।

आदिदेव
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मा । २. विष्णु । ३. शिव । ४. गणेश । ५. सूर्य [को०] ।

आदिदैत्य
संज्ञा पुं० [सं०] हिरण्यकशिपु [को०] ।

आदिनव
संज्ञा पुं० [सं०] १. अभाग्य । २. जुए की हार [को०] ।

आदिनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] १. आदिबुद्ध । २. एक जैन तीर्थँकर [को०] ।

आदिपर्व
संज्ञा पुं० [सं० आदिपर्वन्] महाभारत के पहले पर्व का नाम [को०] ।

आदिपर्वत
संज्ञा पुं० [सं०] मुख्य पर्वत [को०] ।

आदिपुराण
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मपुराण । २. एक जैन धर्मग्रंथ [को०] ।

आदिपुरुष, आदिपूरुष
संज्ञा पुं० [सं०] १. परमेश्वर । विष्णु । २. हिरण्यकशिपु [को०] ।

आदिप्लुत
वि० [सं०] (शब्द०) जिसका आदिस्वर प्लुत हो (व्या०) [को०] ।

आदिबल
संज्ञा पुं० [सं०] उत्पादक या जनन शक्ति (सुश्रुत) [को०] ।

आदिभूत (१)
वि० [सं०] आदि में उत्पन्न [को०] ।

आदिभूत (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मा । २. विष्णु [को०] ।

आदिम
वि० [सं०] पहले का । पहला । प्रथम । उ०— आखेट के लियो उक्त आदिम नरों का झुड बीच में मिलता ।— इंद्र०, पृ० ८८ ।

आदिमत
वि० [सं०] जिसका आरंभ आदि हो [को०] ।

आदिमूल
संज्ञा पुं० [सं०] मूल कारण [को०] ।

आदियोगाचार्य
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०] ।

आदिरस
संज्ञा पुं० [सं०] शृंगाररस (साहित्य शा०) ।

आदिराज
संज्ञा पुं० [सं०] १. मनु । २. पृथु [को०] ।

आदिरूप
संज्ञा पुं० [सं०] प्रथम रूप या लक्षण (रोग का) [को०] ।

आदिल
वि० [अ०] न्यायी । न्यायवान् । उ०— नौसेरवाँ जो आदिल कहा । साहि अदल-सरि सोउ न अहा ।— जायसी ग्रं०, पृ० ६ ।

आदिलुप्त
वि० [सं०] (शब्द) जिसका प्रथम अक्षर लुप्त हो [को०] ।

आदिवराह
संज्ञा पुं० [सं०] वराहरूप विष्णु । विष्णु [को०] ।

आदिवाराह
वि० [सं०] आदि वराह संबंधी [को०] ।

आदिविपुला
संज्ञा पुं० [सं०] छंदविशेष । वह आर्य जिसके प्रथम दल के प्रथम तीन गमों में पाद अपूर्ण हो ।

आदिविपुलाजघनचपला
संज्ञा पुं० [सं०] छंदविशेष । वह आर्य जिसके प्रथम पाद के गणत्रय में पाद अपूर्ण हो, दूसरे दल में दूसरा और चौथा गण जगण हो ।

आदिशक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मूल या आदि स्थानीय शक्ति । महामाया । २. दुर्गा [को०] ।

आदिशरीर
संज्ञा पुं० [सं०] १. मूल शरीर । २. सूक्ष्म शरीर [को०] ।

आदिश्यमान
वि० [सं०] आदेश पाया हुआ । जिसको आज्ञा दी गई हो ।

आदिष्ट
वि० [सं०] आदेश पाया हुआ । जिसको आज्ञा दी गई हो । आज्ञप्त । आदेशप्राप्त ।

आदिष्टसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० आदिष्टसन्धि] 0वह संधि जो प्रबल शत्रु को कोई भूमिखंड देने की प्रतिज्ञा करके की जाय । (कामं द०) ।

आदिसर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] मूल या आदि की सृष्टि [को०] ।

आदी (१)
वि० [अ०] अभ्यस्त । उ०— अब उतर आए हैं वो तारीफ पर । हम जो आदी हो गए दुश्नाम के ।— कविता कौ०, भा० ४, पृ० ५५३ ।

आदी † (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० आर्द्रक] अदरक ।

आदी (३)
क्रि० वि० [सं० आदि] बिलकुल । नितांत । जरा भी । उ०— (क) मातु न जानसि बावक आदी । हौं बादला सिंघ रनवादी । जायसी ग्रं०, पृ० २८२ ।

आदीचक
संज्ञा पुं० [सं० आर्द्रक + चक] एक प्रकार की अदरक जिसकी भाजी बनती है । अदरक की एक प्रकार की खट्टी चटनी ।

आदीनव
संज्ञा पुं० [सं०] १. दोष । २. क्लेश । विपर्ति । ३. दुःख । बेचैनी (को०) ।

आदीपक
वि० [सं०] १. आग लगानेवाला । २. दाहक । ३. उत्तेजक [को०] ।

आदीपन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आदीपित, आदीप्त, आदीप्य] १. उत्तेजित करना । २. आग लगाना । ३. उत्सव आदि के अवसर पर दीवार, फर्श आदि की सफाई या पुताई करना [को०] ।

आदीपित
वि० [सं०] प्रज्वलित । जलता हुआ [को०] ।

आदीप्य
वि० [सं०] जलने योग्य [को०] ।

आदीर्घ
वि० [सं०] कुछ लंबाई युक्त अंडाकार [को०] ।

आदीर्य
वि० [सं०] फटा हुआ । दरका हुआ [को०] ।

आदृत
वि० [सं०] आदर किया हुआ । संमानित ।

आदृत्य
वि० [सं०] आदरणीय [को०] ।

आदृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दृष्टि । नजर [को०] । यौ०— आदृष्टिगोचर, आदृष्टिप्रसार = दृष्टि की सीमा के भीतर ।

आदेय (१)
वि० [सं०] लेने योग्य । यौ०— उपादेय । अनादेय ।

आदेय (२)
संज्ञा पुं० [सं०] वह लाभ जो सुगमता से प्राप्त हो, सिरक्षित रखा जा सके तथा शत्रु द्वारा म लिया जा सके (को०) ।

आदेयकर्म
संज्ञा पुं० [सं०] जैनशास्त्रानुसार वह कर्म जिससे जीव को वाक्सिद्धि होती है; अर्थात वह जो कहे वही होता है ।

आदेव (१)
संज्ञा पुं० [सं०] देव सहित पूरी सृष्टि [को०] ।

आदेव (२)
वि० [सं०] देवभक्त । देवपूजक [को०] ।

आदेवक
वि० [सं०] १. खेल या क्रीडा करनेवाला । २. जुआ खेलनेवाला [को०] ।

आदेवन
संज्ञा पुं० [सं०] १. खेल का स्थान । २. खेल का साधन या सामग्री । ३. खेल (जूए) में होनेवाला लाभ [को०] ।

आदेश
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० आदिष्ट, आदिश्यमान, आदेशक] १. आज्ञा । २. उपदेश । ३. विवरण (को०) । ४. प्रणाम । नमस्कार । उ०— शंख बडो बढ सिद्धि बखाना । किय आदेश सिद्धि बड़ माना ।— जायसी (शब्द०) । ५. ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों का फल । ६. भविष्यकथन (को०) । ७. व्याकरण में एक अक्षर के स्थान पर दूसरे अक्षर का आना । अक्षरपरिवरितन ।

आदेशक
वि० [सं०] १. आज्ञा देनेवाला । २. उपदेश देनेवाला ।

आदेशकारी
वि० [सं० आदेशकारिन्] आज्ञा पालन करनेवाला [को०] ।

आदेशन
संज्ञा पुं० [सं०] आज्ञा देना । निर्देशन [को०] ।

आदेशी
वि० [सं० आदेशिन] १. आदेश देनेवाला । २. भविष्यकथन करनेवाला । २. (वह वर्ण या अक्षर) जिसके लिये कोई अन्य वर्ण या अक्षर रखा गया हो [को०] ।

आदेश्य
वि० [सं०] आदेश के योग्य [को०] ।

आदेष्टा
वि० [सं० आदेष्ट्ट] आदेश देनेवाला [को०] ।

आदेस पु
संज्ञा पुं० [सं० आदेश] दे० 'आदेश' ।

आद्यंत
क्रि० वि० [सं० आघन्त] आदि से अंत तक । आद्योपांत शुरू से आखीर तक ।

आद्य (१)
वि० [सं०] १. पहला । आरंभ का । २. प्रधान । प्रथम । आद्विती (को०) ।

आद्य (२)
वि० [सं० √ अद् = (खाना) > आघ] खाने योग्य । जिसके खाने से शारिरिक या आत्मिक बल बढे ।

आद्यकवि
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मा । २. वाल्मीकि [को०] ।

आद्यबीज
संज्ञा पुं० [सं०] जगत् या सृष्टि का मूल कारण । सांख्य के अनुसार प्रधान या प्रकृति [को०] ।

आद्यमाषक
संज्ञा पुं० [सं०] एक तोल जो पाँच गुंजा या रत्ती के बराबर होता था [को०] ।

आद्यश्राद्ध
संज्ञा पुं० [सं०] मृतक के लिये ग्यारवें दिन जो सोलह श्राद्ध किए जाते हैं उनमें से पहला ।

आद्या
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुर्गा । प्रधान शक्ति । २. दश महाविद्याओं में से प्रथम देवी ।

आद्युदात्त
वि० [सं०] [संज्ञा आघुदात्तत्व] जिसका पहला वर्ण उदात्त हो [को०] ।

आद्यून
वि० [सं०] १. अध्ययन करनेवाला । पेटू । २. बुभुक्षित । भूखा । ३. लोभी । लालची । ४. आदिरहित [को०] ।

आद्योत
संज्ञा पुं० [सं०] प्रकाश । ज्योति । चमक [को०] ।

आद्योपांत
क्रि० वि० [सं० आघोपान्त] शुरू से आखीर तक [को०] ।

आद्रा
संज्ञा पुं० [सं० आर्दा] १. एक नक्षत्र । २. जब सूर्य इस नक्षत्र का हो । इस नक्षत्र में लोग धान बोना अच्छा मानते हैं । उ०—(क) चित्रा गेहुँ आद्रा धान । न उनके गेरूवी न उनके घाम । (ख) आद्रा घाम पुनर्वसु पइया । गा किसान जब बोवा चिरइया । (शब्द०) ।

अद्रिसार
वि० [सं०] लौहनिर्मित । लोहे से बना हुआ [को०] ।

आध
वि० [सं० अर्द्ध प्रा० अद्रध हिं० आधा] किसी वस्तु के दो बराबर भागों में से एक । आधा । निस्फ । उ०— जै जै कार भयो भुव मापत नीनि पैंड भइ सारी । आधा पैंड बसुधा दै राजा नातरू तलि सत हारी ।— सुर०, ८ ।१४ । विशेष— यह वास्तव में आधा का अल्पार्थक रूप है और यौगिक शब्दों एवं प्रायः तौल और नाप के सूचक शब्दों के साथ व्यवहृत होता है । जैसे, — आधा सेर आध पाव, आध छटाँक, आध गज । यौ०— एक आध = कुछ तोडे से । चंद । जैसे,— एक आध आदमियों के विरोध करने से होता है । (शब्द)

आधमन
संज्ञा पुं० [सं०] प्रतिज्ञा [को०] ।

आधमराय
संज्ञा पुं० [सं०] ऋणग्रस्त होना [को०] ।

आधर्मिक
वि० [सं०] धर्महीन । अधर्मी [को०] ।

आधवन
संज्ञा पुं० [सं०] कंपित करना । हिलना डुलना [को०] ।

आधा
वि० [सं० आर्द्ध, वा अद्धो, प्रा० अद्ध] [स्त्री० आधी] किसी वस्तु के दो बराबर हिस्सों में से एक ।यौ०— आधा साझा । आधा सीसी । मुहा०— आधो आध = दो बराबर भागों में । जैसे — इन केलों को आधो ऐध बाँट लो । [यह क्रि० वि० की तरह आता है; जैसे, बीचो बीच ] आधा तीतर आधा बटेर = कुछ एक तरह का और कुछ दुसरी तरह का । बेजोड़ । बेमल । अंजबंड । क्रमविहीन । आधा होना = दुबला होना । जैसे,— वह सोच के मारे आधा हो गया । आधे आध = दो बराबर हिस्सों में बँटा हुआ । उ०— लागे जब संग युग सेर भोग धरयो रंग आधे आध पाव चले नूपुर बजाइ के । — प्रिया० (शब्द०) । आधे कान सुनना = यों ही या ऊपर से सुन लेना । उ०— फैले बरसाने में न रावरी कहानी यह बानी कहूँ राधे आधे कान सुनि पावे ना । — रत्नाकार, भा० १, पृ० १४७ । आधी बात = जरा सी भी अपमानसूचक बात । जैसे,— हमने किसी की आधी बात भी नहीं सुनी । आधे पेट खाना = भरपेट न खाना । पूरा भोजन न करना । आधे पेट रहना = तृप्त होकर न खाना । आधी बात कहना या मुहँ से निकलना = जरा सी अपमानसूचक बात कहना । जैसे, — मेरे रहते तुम्हें कोई आधी बात नहीं कह सकता । आधी बात न पूछना = कुछ ध्यान न देना । कदर न करना । जैसे, — अब वे जहाँ जाते हैं, कोई आधी बात भी नहीं पूछता ।

आधाझारा
संज्ञा पुं० [सं० आधाट] अपमार्ग । ओंगा । चिचडी । चिचडी ।

आधाता
संज्ञा पुं० [सं० आधातृ] गिरवी रखनेवाला । बंधक रखनेवाला ।

आधान
संज्ञा पुं० [सं०] १. स्थापन । रखना । यौ०— अग्न्याधन । गर्भाधान । २. गर्भ । ३. गिरवी या बंधक रकना । (कौ०) ४. अग्नाधान (को०) । ५. प्रयत्न । चेष्टा (को०) । ६. वह स्थान जहाँ कोई वस्तु रखी जाय (को०) । ७. निश्चयात्मकता । ८. द्रवित करना (को०) । ९. सामीप्य । संनिधि (को०) । १०. मैथुन (को०) ।

आधानवती
वि० स्त्री [सं०] गर्भवती ।

आधार
संज्ञा पुं० [सं०] १. आश्रय । कहारा । अवलंब । जैसे,— (क) यह छत चार खंभों के आधार पर है । (ख) वह चार दिन पलों के ही आधार पर रह गया । २. व्याकरण में अधिकरण कारक । ३. थाला । आबबाल । ४. पात्र (नाटक) ५. नींव । बुनियाद । मूल । ६. योगशास्त्र में एक चक्र का नाम । विशेष— इसे मूलधार भी कहते हैं । इसमें चार दल हैं । रंग लाल हैं । स्थान इसका गुदा है और गणेश इसके देवता हैं । ७. बंधा । बाँध (को०) । ८. नहर । प्रणाली (को०) । ९. संबंध । लगाव (को०) । १०. किरण (को०) । ११. बरतन । पात्र (को०) । १२. आश्रय देनेवाला । पालन करनेवाला । जैसे,— इस दशा में ही वे हमारे आदार हो रहे हैं । यौ०— आधाराधेय = आधार और आधेय का संबंध; जैसे, — पात्र और उसमें रखे हुए घी या टेबुल और उसपर रखी हुई किताब का संबंध । प्राणाधार जिसके आधार पर प्राण हों । पर मप्रिय । मुहा०—आदार होना = कुछ पेट भर जाना । कुछ भूख मिट जाना । जैसे,— इचनी मिठाई से कया होता है; पर कुछ आधार हो जायगा ।

आधारित
वि० [सं० आधार] दे० 'आधृत' ।

आधारी
वि० [सं० आधारिन्] [स्त्री० आधारिणी] १. सहारा रखनेवाला । कहारे पर रहनेवाला । जैसे,— दुग्धाधारी । २. साधुओं की टेवकी या अड्डे के आकार की लकडी जिसका सहारा लेकर वे बैठते हैं । उ०—(क) मपद्रा श्रवण नहीं थिर जीऊ । तन त्रिसूल आधारी पीऊ ।— जायसी (सब्द०) । (ख) परम तत आधारी मेरे० सिव नगरी घर मेरा ।— कबीर ग्रं०, पृ० १५४ ।

आधासीसी
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्द्ध + शीर्ष] अधकपालौ । आधे सिर की पीड़ा ।

आधि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मानसिक व्यथा । चिंता । फित्र्र । शोच । सोच । उ०— आधि अगाधा व्याधि परि, परि राधा जप सोइ ।- स० सप्तक, पृ० ३४३ । २. गिरों । गिरवी । बंधक । रेहन । ३. स्थान । आवास [को०] । ४. पास पडोस (को०) । ५. विपत्ति । दुर्भाग्य [को०] । ६. धर्म या कर्तव्य की चिंता (को०) । ७. परिभाषा । लक्षण [को०] । ८. आशा [को०] । ९. दंड (को०) । १०. परिवार या कुटुबं की चिंता [को०] ।

आधिक (१) पु
वि० [हिं० आधा + एक] आधा । आधे के लगभग । उ०— (क) आधिक दूर सौं जाय चितै पुनि आय गरें लपटाय कै रोई ।- मुबारक (शब्द०) । (ख) आधिक रात उठे रघुबीर कहयो सुनु बीर प्रजा सब सोई ।- हनुमान० (शब्द०) ।

आधिक (२)
क्रि० वि० आधे के समीप । आधे के लगभग । थोडा । उ०— लखि लखि अँखियनु अधखुलिनु, आँगु मेरि अँगराइ । आधिक उठि, लेटति लटकि, आलस भरी जैभाइ ।— बिहारी र०, दो० ६३० ।

आधिकरणिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. न्यायाधीश । २. सरकारी अधिकारी [को०] ।

अधिकारिक (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दूश्यकाव्य की वस्तु के दो भेदों में एक । मूल कथावस्तु । वि० दे०'वस्तु' ।

अधिकारिक (२)
वि० १. मुख्य या प्रधान । उ०— एक दल.... मनुष्य मनुष्य के बीच भ्रातृप्रेम को ही काव्यभूमि का एकमात्र आधिकारिक बाव मानता है ।- रस०, पृ० ७७ । २. अधिकार या अधिकारी से संबद्ध । अधिकारयुक्त । साधिकार

आधिक्य
संज्ञा पुं० [सं०] बहुतायत । ्दिकता । ज्यादती ।

आधिदैविक
लि० [सं०] देवताओं द्वारा प्रेरित । यक्ष, देवता, भूत० प्रेत आदि द्वारा होनेवाला । देवताकृत । विशेष— सुश्रुत में सात प्रकार के दु?ख गिनए गए हैं, उनमें से तीन अर्थात् कालबलकृत (बर्फ इत्यादि पडना, व्रषा अधिक होना इत्यादि), देवबलकृत (बिजली पडना, पिशाचादि लगना), स्वभावबलकृत (भूख प्यास का लगना) आधिदैविक कहलाते हैं ।

आधिधर्ता
संज्ञा पुं० [सं०] जिसके पास कोई लस्तु गिरवी या रेहन रखी जाय [को०] ।

आधिपत्य
संज्ञा पुं० [सं०] प्रभुत्व । स्वामित्व । अधिकार ।

आधिपाल
संज्ञा पुं० [सं०] वह राजकर्मतारी जो जमा की हुई धरोहर की रक्षा का प्रबंध करता हो ।

आधिभोग
संज्ञा पुं० [सं०] धरोहर की वस्तु का उपयोग या उपभोग [को०] ।

आधिभौतिक
वि० [सं०] व्याघ्र, सर्पादि जीवों द्वारा कृत । जीव या शरीरधारियों द्वारा प्राप्त । विशेष— सुश्रृत में और शुत्र्रदोष तथा मिथ्या आहार विहार से उत्पन्न व्याधियों को आधिभौतिक के अतर्गत ही मान है ।

आधिमन्यु
संज्ञा पुं० [सं०] ज्वर की जलन । बुखार की गर्मी [को०] ।

आधिमोचन
संज्ञा पुं० [सं०] गिरवी या बंधक छुडाना ।

आधिवेदनिक
संज्ञा पुं० [सं०] वह धन जो पुरूष दूसरा विवाह करने के पूर्व अपनी पहली स्त्री को उसके संतोष के लिये दे । यह स्त्रीधन समझा जाता है ।

आधिस्तेन
संज्ञा पुं० [सं०] वह व्यकित जो धनाधिकारी की आज्ञा बिना जमा किए हुए धन का उपभोग करता है [को०] ।

आधी
वि० स्त्री० [सं० अर्द्ध, प्रा० अद्ध] आधा का स्त्रीलिंग रूप । उ०— प्राधो छोड सारी को धावै । आधी रहै न सारी पावै ।— लोक० ।

आधीन पु
वि० [सं० अधीन] दे० 'अधीन' । उ०— करौं घरी आधीम मैं करौं हरी आधीन ।- भिकारी ग्रं०, भा०, १, पृ० १८ ।

आधीनता पु
संज्ञा स्त्री० [सं० अधीनता] दे० 'अधीनता' ।

आधीरात
संज्ञा स्त्री० [सं० अर्धरात्रि] वह समय जब रात का आधा भाग बीत चुका हो ।

आधुनिक
वि० [सं०] वर्तमान समय का हाल का । आजकल का । वर्तमान काल का । सांप्रतिक । नवीन ।

आधुनिकतम
वि० [सं०] आधतन । नवीनतम ।

आधूत
वु० [सं०] १. कंपित । काँपता हुआ । २. पागल । ३. व्याकुल ।

आधूपन
संज्ञा पुं० [सं०] धुँए या कहरे सो आवृत [को०] ।

आधूम्र
वि० [सं०] धुँए की तरह काले रेगवाला [को०] ।

आधृत०
वि० [सं०] किसी आधार पर टिका हिआ । आधार पाया हिआ [को०] ।

आधेक
वि०, क्रि० वि० [हिं०] दे० 'आधिक' । उ०— राधिका आधेक नैननि मूँदि हिए ही हिए हरि की छबि हेरति ।— भिखारी० ग्रं०, बा० १, पृ० १५८ ।

आधेय
संज्ञा पुं० [सं०] १. आधार पर स्थित वस्तु ० जो वस्तु किसी के आधार पर रहे । किसी सहारे पर टिकी हुई चीज । २. स्थापनीय ० ठहराने योग्य । रखने योग्य । ३. गिरो रखने योग्य ।

आधोरण
संज्ञा पुं० [सं०] हाथीवान । महावत । पीलवान ।

आध्मात (१)
वि० [सं०] १. फुला हुआ । २. गर्व से भरा हुआ । ३. जला हुआ । ४. शब्दयुक्त । ध्वनिवाला । ज्वर वायु से ग्रस्त [को०] ।

आध्मात (२)
संज्ञा पुं० उदर में होनेवाला वायु रोग । २. युद्ध [को०] ।

आध्मान
संज्ञा पुं० [सं०] एक वाताव्याधि । पेट का फूलना । अफरा

आध्मानी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मलिका नामक गंधद्रव्य । २. फुँकनी । वह धातु या बाँस की नली जिससे हवा फूँकी जाय [को०] ।

आध्यात्मिक
वि० [सं०] [स्त्री० आध्यात्मिकी] १. आत्म संबंधी । २. मन संबंधी । ३. अध्यात्म से संबंध रखनेवाला [को०] । यौ०— आध्यात्मिक ताप = वह दुःख जो मन आत्मा और देश इत्यादि को पीडा दे; जैसे,— शोक, मोह, ज्वर आदि ।

आध्यापक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'अध्यापक' [को०] ।

आध्यायिक
वि० [सं०] [स्त्री० आध्यायिकी] वेदों के अध्ययन में संलग्न रहनेवाला [को०] ।

आध्यासिक
वि० [सं०] वेदांतदर्शन में भ्रमात्मक (ज्ञान) [को०] ।