विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/ख

विक्षनरी से
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हिंदी वर्णमाला में स्पर्श व्यंजन के अंतर्गत कवर्ग का दूसरा अक्षर । यह महाप्राण है और इसका उच्चारण कंठ से होता है । क, ग, घ, और ङ इसके सवर्ण हैं ।

खं
संज्ञा पुं० [सं० खम्] १. शून्य स्थान । खाली जगह । २. बिल । छिद्र । ३. आकाश । ४. निकलने का मार्ग । ५. इंद्रिय । ६. बिंदु । शून्य । सिफर । ७. स्वर्ग । देवलोक । ८. सुख । ९. कर्म । १०. कुंडली में जन्मलग्न से दसवाँ स्थान । ११. अभ्रक । १२. ब्रह्मा । १३. मोक्ष । निर्वाण ।

खंक †
वि० [सं० कङ्काल] १. दुर्बल । बलहीन । २. खंख । छूछा ।

खकर
संज्ञा पुं० [सं० खङकर] घूँघर । बालों की लट । अलक [को०] ।

खंख
वि० [सं० कङ्क] १. छूछा । खाली । २. उजाड़ । वीरान । ३. धनहीन ।

खंखड़
वि० [सं० खक्खठ या० अनु] (पदार्थ) सूखने के कारण कड़ा । मुरझाया हुआ । दुर्बल । क्षीण । उ०—पचास बरस का खंखड़ भोला भीतर से कितना स्निग्ध है, यह वह न जानता था ।—गोदान, पृ० ६ ।

खंखणा
संज्ञा स्त्री० [सं० खङ्कणा] घूँघरू, घंटी, नूपुर आदि की ध्वनि ।

खंखर (१)
संज्ञा पुं० [सं० कङ्कर] दे० 'खंकर' [को०] ।

खंखर (२)
संज्ञा पुं० [देश०] पलास का वृक्ष [को०] ।

खंखर (३) †
वि० [हिं० खंख] दे० 'खंख' ।

खंग
संज्ञा पुं० [सं० खङ्ग] १. तलवार । उ०—भट चातक दादुर मोरन बोले । चपला चमकै न फिरै खँग खोले ।—केशव (शब्द०) । २. गैंडा । ३. घाव । चीरा ।

खंगड़ (१)
संज्ञा पुं० [सं० खक्खट] शष्क । निष्क्रिय । उ०—बर्फिस्तान में टिठरोगे । जम के खंगड़ हो जाओगे ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० १९३ ।

खंगड़ (२)
संज्ञा पुं० [अनु०] दे० 'अंगड़खंगड़' ।

खंगड़ (३) †
वि० उद्दंड । उग्र । उजड्ड ।

खंगनखार
संज्ञा पुं० [देश०] पंजाब के पश्चिमी जिलों में होनेवाला एक प्रकार का पौधा जिसे जलाकर सज्जीखार तैयार करते हैं । इसकी सज्जी सबसे अच्छी समझी जाती है ।

खंगर (१)
संज्ञा पुं० [देश०] अधिक पकने के कारण परस्पर सटी हुई कई ईंटों का चक ।

खंगर (२)
वि० बहुत सूखा । शुष्क । क्षीण । मुहा०—खंगर लगना = सुखंडी रोग होना । दुर्बलता का रोग होना ।

खंगलीला
संज्ञा स्त्री० [सं० खङ्ग+लीला] असियुद्ध । तलवार की लड़ाई । उ०—खंगलीला खड़ी देखती रही मैं वहीं ।—लहर, पृ० ७३ ।

खंचना पु
क्रि० स० [सं० √ कृष् प्रा० √ खंच] १. तृत्प होना । संतुष्ट होना । उ०—करहा पाणी खंच पिउ त्रासा घणा सहेसि ।—ढोला०, दु० ४२६ । २. दे० 'खींचना' । उ०— (क) घायल ज्यूँ घन खचइ अंग ।—वी० रासो, पृ० १०० । (ख) द्विप दोय लक्ख धरि धातु खंचि ।—ह०, रासो, पृ० ६० ।

खंज (१) †
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का रोग जिसमें मनुष्य का पैर जकड़ जाता है और वह चल फिर नहीं सकता । वैद्यक के अनुसार इस रोग में कमर की वायु जाँघ की नसों को पकड़ लेती है, जिससे पैर स्तंभित हो जाता है । उ०—गूँगे कुबजे बावरे बहिरे बामन वृद्ध । याम लये जनि आइगे खोर खंज प्रसिद्ध ।—केशव (शब्द०) । २. लँगड़ा । पंगु । उ०—तारन की तरलाई सु तौ तरुनी खग खंजन खज किए हैं । गंग कुरंग लजात जुदे जलजातन के गुन छईन लिये है ।—गंग ग्रं०, पृ० ११ ।

खंज (१)
संज्ञा पुं० [सं खञ्जन] खंजन पक्षी । उ०—आलिंगन दै अधर पान करि खंजन खंज लरे ।—सूर (शब्द०) ।

खंजक (१)
वि० [सं० खञ्जक] लँगड़ा । पँगु ।

खंजक (२)
संज्ञा पुं० [देश०] पिस्ते की जाति का एक पेड़ । विशेष—यह बलूचिस्तान में होता है और इसमें रूमी मस्तगी के समान ही एक प्रकार का गोंद निकलता है । यह गोंद उतने काम का नहीं समझा जाता । इसकी पत्तियों के किनारे घोड़े की नाल के आकार में लाही लगती है । पत्तियाँ रँगने और चमड़ा सिझाने के काम में आती हैं ।

खंजकारि
संज्ञा पुं० [सं० खञ्जकारि] खसोरी ।

खंजखेट
संज्ञा पुं० [सं० खञ्जखेट] खंजन पक्षी । खंड़रिच [को०] ।

खंजखेल
संज्ञा पुं० [सं० खञ्जखेल] दे० 'खंजखेट' [को०] ।

खंजड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खँजरी' ।

खंजन
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रसिद्ध पक्षी । खँड़रिच । विशेष—इसकी अनेक जातियाँ एशिया, युरोप, और अफ्रिका में अधिकता से पाई जाती हैं । इनमें से भारतवर्ष का खंजन मुख्य और असली माना जाता है । यह कई रग तथा आकार का होता है तथा भारत में यह हिमालय की तराई, आशाम और बरमा में अधिकता से होता है । इसका रंग बीच बीच में कहीं सफेद और कहीं काला होता है । यह प्रायः एक बालिश्त लंबा होता है और इसकी चोंच लाल और दुम हलकी काली झाई लिए सफेद और बहुत सुंदर होती है । यह प्रायः निर्जन स्थानों में और अकेला ही रहता है तथा जाड़े के आरंभ में पहाड़ों से नीचे उतर आता है । लोगों का विश्वास है कि यह पाला नहीं जा सकता, और जब इसके सिर पर चोटी निकलती है, तब यह छिप जाता है और किसी को दिखाई नहीं देता । यह पक्षी बहुत चंचल होता है इसलिये कवि लोग इससे नेत्रों की उपमा देते हैं । ऐसा प्रसिद्ध है कि यह बहुत कम और छिपकर रति करता है । कहीं कहीं लोग इसे 'खँडरिच' या 'ममोला' कहते हैं ।पर्या०—खंजखल । मुनिपुत्रक । भद्रनामा । रत्ननिधि । चर । काकछड़ । नीलकंठ । कणाटीर २. खंडरिच के रंग का घोड़ा । ३. 'गंगाधर' या 'गंगोदक' नामक छद का एक नाम । ४. लँगड़ाते हुए चलना ।

खंजनक
संज्ञा पुं० [सं० खञ्जनक] दे० 'खंजन' [को०] ।

खंजनरत
संज्ञा पुं० [सं० खञ्जनरत] संत मैथुन । क्वादाचित्क मैथुन [को०] ।

खंजनरति
संज्ञा पुं० [सं०] (खंजन की तरह का) बहुत ही गुप्त विहार ।

खंजना
संज्ञा स्त्री० [सं० खञ्जना] १. खंजन के सदृश एक पक्षी । २. सर्षप । सरसो [को०] ।

खंजनाकृति
संज्ञा स्त्री० [सं० खञ्जानाकृति] खंजन के आकार से मिलता जुलता एक पक्षी ।

खजनासन
संज्ञा पुं० [सं० खञ्जनासन] तंत्र के अनुसार एक प्रकार का आसन । इन आसन से उपासना करने पर विजयलाभ होता है ।

खंजनिका
संज्ञा स्त्री० [सं० खञ्जनिका] खंजन के आकार की एक चिड़िया जो प्रायः दलदलों में रहती है । इसे 'सर्षपी' भी कहते हैं ।

खंजर (१)
संज्ञा पुं० [फा० खंजर] कटार । पेशकब्ज । मुहा०—खंजर तेज करना = मार डालने के लिये उद्यत होना । क्रि० प्र०—उठना ।—खींचना ।—चलाना ।—फेरना ।— बाँधना ।

खजर (२)
संज्ञा पुं० [देश० अथवा सं० खञ्ज या खञ्जक+ हिं० र (प्रत्य०)] सूखा हुआ पेड़ [को०] ।

खंजर (३) †
संज्ञा पुं० [सं० खञ्जन, प्रा० खंजण] दे० 'खंजन' । उ०—मुख सिसहर खंजर नयण कुच श्रीफल कँठ वीण ।— ढोला०, दु० १३ ।

खंजरीटक
संज्ञा पुं० [सं० खञ्जरीटक] खंजरीट । खंजन [को०] ।

खंजलेख
संज्ञा पुं० [सं० खञ्जलेख] खंजनपक्षी [को०] ।

खंजा † (१)
वि० [सं० खञ्जक] खंज । लँगड़ा ।

खंजा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० खञ्जा] वर्णार्ध सम वृत्तों में से एक वृत्त जिसके विषम पादों में ३० लघु और अँत में एक गुरु तथा सम पादों में २८ लघु और अंत में एक गुरु होता है । जैसे—नरधन जग मँह नित उठ गनपति कर जस बरनत अतिहित सों । तन मन धन सन जपत रहत तिहिं भजत करत भल अति चित सों । किमि अरसत मन भजत न किमि तिहिं भज भज भज भज शिव धरि चित हीं । हर हरहर हर हर हर हर हर हर हर हर हर कह नितहीं ।—छंद?०, पृ० २७२ ।

खंड
संज्ञा पुं० [सं० खण्ड] १. भाग । टुकड़ा । हिस्सा । उ०— प्रभु दोउ चाप खंड महि डारे ।—मानस, १ । २६२ । मुहा०—खंड खंड करना = चकनाचुर करना । चुकड़े टुकड़े करना । २. ग्रंथ का विभाग या अश । ३. देश । वर्ष । जैसे—भरतखंड (पौराणिक भूगोल में एक एक द्विप के अंतर्गत नौ नौ या सात सात खंड माने गए हैं) । नौ की संख्या । ५. गणित में समीकरण की एक क्रिया । ६. रत्नों का एक दोष जों प्रायः मानिक में होता है । ७. खाँड । चीनी । ८. काला नमक । ९. दिशा । दिक् । उ०—चारहु खंड भानु अस तपा । जेहि की दृष्टि रैन ससि छिपा ।—जायसी (शब्द०) । १०. समूह । उ०—तहँ सज्ञत उदभट भट विकट सटसट परत खल खंड में ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २८५ । ११. परशुराम । उ०—संग्राम पंड कैरवै कि खंड बाँण सेणियं ।—राज रू०, पृ० ६० । १२. मंजिल । मरातिब । उ०—नव नव खंड के महल बानए । सोना केरा कलस चढ़ाए ।—कबीर० सा०, पृ० ५४३ ।

खंड (२)
वि० १. खंडित । अपूर्ण । उ०—अखंड साहब का नाम और सब खंड है ।—कबीर श०, पृ० १२१ । २. छोटा । लघु । ३. विकलांग । दोषयुक्त [को०] ।

खंड (३)
संज्ञा पुं० [सं० खङ्ग] खाँड़ा । उ०—करै शंभु खंड बरिवंड चड दै कै जलधि उमंड को घमंड ब्रह्मंड मंड ।—गोपाल (शब्द०) ।

खंडकंद
संज्ञा पुं० [सं० खण्डकन्द] शकरकंद । खंडकर्ण [को०] ।

खंडक (१)
वि० [सं० खण्डक] १. खंडक करनेवाला । किसी मत या विचार को काटनेवाला । २. खंड करनेवाला । विभाग करने— वाला । टुकड़ों में विभक्त करनेवाला । ३. दूर करने या हटाने वाला । [को०] ।

खंडक (२)
संज्ञा पुं० १. खंड । भाग । टुकड़ा । २. शर्करा । ईख की चीनी । ३. नखहीन प्राणी । वह प्राणी जिसे नाखुन न हो [को०] ।

खंडकथा
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्डकथा] कथा का एक भेद । लघु कथा । छोटी कथा । विशेष—इसमें मंत्री अथवा ब्राह्मण नायक होता है और चार प्रकार का विरह रहता है । इसमें करुण रस प्रधान होता है । कथा समाप्त होने के पहले ही इसका ग्रंथ समाप्त हो जाता है । २. उपन्यास का एक भेद । विशेष—इसके प्रत्येक खंड में एक एक पुरी कहानी होती है और इसकी किसी एक कहानी का दूसरी कहानी के साथ कोई संबंध नहीं होता । इसके दो भेद हैं, सजात्य और वैजात्य । जिसमें सब कथाओं का आरंभ और अंत एक समान होता है, वह सजात्य कहलाती है । और जिसकी कथाएँ कई ढंग की होती है, उसे बैजात्य कहते हैं ।

खंडकर्ण
संज्ञा पुं० [सं० खण्डकर्ण] १. शकरकंद । २. एक प्रकार का गाँठदार पौधा ।

खंडकालु
संज्ञा पुं० [सं० खण्डकालु] शकरकंद [को०] ।

खंडकाव्य
संज्ञा पुं० [सं० खण्डकाव्य] वह काव्य जिसमें 'काव्य' के संपूर्ण अलंकार या लक्षण न हों, बल्कि कुछ ही हों । जैसे, मेघदुत आदि ।

खंडज
संज्ञा पुं० [सं० खण्डज] १. एक प्रकार की शर्करा । २. गुड़ । भेली [को०] ।

खंडत पु †
वि० [सं० खण्डित] दे० 'खंडित' ।

खंडतरि पु †
संज्ञा स्त्री० [देश०] फटी चटाई । उ०—ओछाओन खंडतरि पालिआ चाह । आओर कहब कत अहिरिनी नाह ।— विद्यापति, पृ० ५६ ।

खंडताल
संज्ञा पुं० [सं० खण्डताल] संगीत में एकताला नामक ताल जिसमें केवल एक द्रुत होता है ।

खंडधारा
संज्ञा स्त्री० [खण्डधारा] कतरनी । कैंची [को०] ।

खंडन
संज्ञा पुं० [सं० खण्डन] [वि० खंडनीय खंडित, खंड़ी] १. तोड़ने फोड़ने की क्रिया । २. भजंन छेदन । ३. किसी बात को अयथार्थ प्रमाणित करने की क्रिया । किसी सिद्धांत को प्रमाणों द्वारा असंगत ठहराने का कार्य । निराकरण । मंडन का उलटा । जैसे—उसने इस सिद्धांत का खुब खंडन किया है । ४. नृत्य में मुँह या ओठ इस प्रकार चलाना जिसमें पढ़ने, बड़बड़ाने या खाने आदि का भाव झलके । ५. निराश करना । हताश करना (को०) । ६. धोखा देना । वंचना (को०) । ७. बाधा देना । रुकावट करना (को०) । ८. डिसमिस करना । बर्खास्त करना (को०) । ९. विद्रोह । विरोध (को०) । १०. हटाना । दूर करना (को०) । ११. विनष्ट करना (को०) ।

खंडन (२)
वि० १. तोड़ने, काटने या हिस्सा करनेवाला । २. विनाश करनेवाला । विध्वंस करनेवाला [को०] ।

खंडनकार
संज्ञा पुं० [सं० खण्डनकार] २. खंडनखंडखाद्य के लेखक श्रीहर्ष । २. खंडन करनेवाला व्यक्ति या प्राणी (को०) ।

खडनखंडखाद्य
संज्ञा पुं० [सं० खम्डनखण्डखाद्य] श्रीहर्ष कृत अद्वैत वेदांत का खंडन प्रधान ग्रंथ ।

खंडनमंडन
संज्ञा पुं० [सं० खण्डमण्डन] वादविवाद । खंडन और मंडन । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

खंडनरत
संज्ञा पुं० [सं० खण्डनरत] ध्वंसकार्य में निपुण ।

खंडना पु
क्रि० स० [सं० खण्डन] १. खंडन करना । तोड़ना । टुकड़े टुकड़े करना । उ०—कोदंड खंड़ेउ राम तुलसी जयति वचन उचारहीं ।—मानस, १ ।२६१ । २. निराकरण करना । किसी बात को अयुक्त ठहराना । ३. उल्लंघन करना । न मानना । उ०—पिता बचन खंडै सों पापी, सोइ प्रह्लादहिं कीन्हौ ।—सूर०, १ ।१०४ ।

खंडनी (१)
स्त्री० स्त्री० [सं० खण्डन] मालगुजारी की किस्त । कर ।

खंडनी (२)
वि० [सं०] दे० 'खंडी', 'खंडिनी' ।

खंडनीय
वि० [सं० खण्डनीया] १. तोड़ने फोड़ने लायक । २. खंडन करने योग्य । निराकरण के योग्य । ३. जिसका खंडन हो सके । जो अयुक्त ठहराया जा सके । ।

खंडपति
संज्ञा पुं० [सं० खण्डपति] राजा ।

खंडपरशु
संज्ञा पुं० [सं० खण्डपरशु] १. महादेव । शिव । उ०— खंडपरशु को शोभिजै सभा मध्य कोदंड । मानहु शेष अशेषधर धरनहार बरिवंड ।—केशव (शब्द०) । २. विष्णु । ३. परशुराम । ४. राहु । ५. वह हाथी जिसके दाँत टुटे हों ।

खंडपर्शु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'खंडपरशु' [को०] ।

खंडपाल
संज्ञा पुं० [सं० खण्डपाल] मिठाई बनाने और बेचनेवाला । हलवाई ।

खंडप्रलय
संज्ञा पुं० [सं० खण्डप्रलय] वह प्रलय जो चतुर्युगी या ब्रह्मा का एक दिन बीत जाने पर होता है । विशेष—इसमें समस्त भूतों का लय हो जाता है, केवल ब्रह्मा रह जाते हैं । पुराणानुसार इस प्रलय में सूर्य का तेज सहस्त्रगुना बढ़ जाता है । और रुद्र समस्त प्राणियों का संहार कर डालते हैं ।२. संघर्ष । झगड़ा । लड़ाई [को०] ।

खंडप्रस्तार
संज्ञा पुं० [सं० खण्डप्रस्तार] संगीत में एक प्रकार का ताल ।

खंडफण
संज्ञा पुं० [सं० खण्डफण] एक प्रकार का साँप ।

खँडफुल्ल
संज्ञा पुं० [सं० खण्डफुल्ल] कूड़ा कर्कट ।

खंडमंडल
वि० [सं० खण्डमण्डल] अर्ध या अपूर्ण घेरेवाला ।

खंडमंडल (२)
संज्ञा पुं० अर्ध या अपूर्ण वृत्त [को०] ।

खंडमेरु
संज्ञा पुं० [सं० खण्डमेरु] पिंगल की वह रीति जिसके द्वारा मेरु या एकावली मेरु के बनाए बिना ही मेरु का नाम निकल जाता है ।

खंडमोदक
संज्ञा पुं० [सं० खण्डमोदक] गुड । एक प्रकार की शक्कर [को०] ।

खंडर (१)
संज्ञा पुं० [सं० खण्डल = खंड, टकडा] दे० 'खँडहर' ।

खंडर (२)
संज्ञा पुं० [सं० खण्डर] खाँड़ से बनी वस्तु । मिठाई [को०] ।

खंडरिच
संज्ञा पुं० [हिं०] खंजन पक्षी । वि० दे० 'खंजन' ।

खंडल (१)
संज्ञा पुं० [सं० खण्डल] खंड । टुकड़ा । भाग ।

खंडल (२)
वि० [सं० कड्ग + ल (प्रत्य०)] १. पु खड्ग धारण करनेवाला । २. विभाग या खंडवाला (डिं०) ।

खंडलवण
संज्ञा पुं० [सं० खण्डलवण] काला नमक ।

खंडवर्षा
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्डवर्षा] वह वर्षा जो सर्वत्र समान न हो । वह वृष्टि जिसमें कहीं पानी बरसे, कहीं पानी न बरसे [को०] ।

खंडविकार
संज्ञा पुं० [सं० खण्डविकार] चीनी । शक्कर [को०] ।

खंडविकृति
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्डविकृति] मिसरी [को०] ।

खंडवृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्डवृष्टि] दे० 'खंडवर्षा' [को०] ।

खंडव्यायाम
संज्ञा पुं० [सं० खण्डव्यायाम] एक प्रकार का नृत्य जिसमें केवल कमर और पैरों को गति देते हैं ।

खंडशः
क्रि० वि० [सं० खण्डशस्] खंड खड करके । कई घंटों या भागों में बाँटकर । टुकड़े टुकड़े ।

खंडशर्करा
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्डशर्करा] मिसरी [को०] ।

खंडशीला
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्डशीला] १. नष्ट चरित्रवाली स्त्री । व्यभिचारिणी । २. वेश्या ।

खंडसर
संज्ञा पुं० [सं० खण्डसर] साफ की हुई खाँड़ । चीनी ।

खडा (१) †
संज्ञा पुं० [सं० खण्ड] १. चावल का टुकड़ा । खूद । २. पंजाब में खेला जानेवाला 'लुकन मीची' नामक खेल । उ०—एहु मन मारि गोइ लए पिडा । एक पंच सिउँ खेलै खंडा ।— प्राण०, पृ० ३१ ।

खंडा (२) †
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'खाँडा' ।

खडाभ्र
संज्ञा पुं० [सं० खण्डाभ्र] १. दाँत का एक रोग । २. बिखरे हुए बादल (को०) । ३. दंतक्षत (रति) ।

खंडाली
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्डाली] १. तेल नापने का एक परिमाण । २. काम की इच्छा रखनेवाली स्त्री । ३. वह स्त्री, जिसका पति दुश्चरित्रता का दोषी हो (को०) ।४. तालाब । झील (को०) ।

खडिक
संज्ञा पुं० [सं० खण्डिक] १. काँख । कँखरी । २. वह विद्यार्थी जो किसी ग्रंथ को खंड खंड करके पढ़े । ३. एक ऋषि का नाम । ४. वह व्यक्ति जो चीनी बनाता हो [को०] । ५. केराव या मटर (को०) ।

खंडिका
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्डिका] १. काँख । कँखरी । २. संगीत में लय का एक प्रकार । ३. केराव की बनी एक भोज्य वस्तु [को०] ।

खंडिकोपाध्याय
संज्ञा पुं० [सं० खण्डिकोपाध्याय] १. खड़ी से पटिया पर लिखाने और पढ़ानेवाला आरंभिक सोपान का अध्यापक । क्रोधी शिक्षक । गुस्सैल मास्टर (को०) ।

खंडित
वि० [सं० खण्डित] १. टूटा हुआ । टुकड़े टुकड़े । भग्न । २. जो पूरा न हो । अपूर्ण । ३. ध्वस्त । नष्ट (को०) । ४. लुप्त (को०) । ५. त्यक्त (को०) । ६. जिसका खडन या विरोध किया गया हो । निराकृत (को०) । ७. प्रवंचित उपेक्षित (को०) ।

खंडितविग्रह
वि० [सं० खण्डितविग्रह] विकृतांग । विकलांग । विकृत अंगोंवाला [को०] ।

खंडितवृत्त
वि० [सं० खण्डितवृत्त] नष्ट चरित्रवाला । दुश्चरित्र । २. छोडा़ हुआ । त्यक्त [को०] ।

खंडितव्रत
वि० [सं० खण्डितव्रत] जिसका व्रत या नियम टूट गया हो । जिसने प्रतिज्ञा भंग की हो (को०) ।

खंडिता
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्डिता] वह नायिका जिसका नायक रात को किसी अन्य नायिका के पास रहकर सबेरे उसके पास आए वह नायिका उस नायक में संभोग के चिह्न देखकर कुपित हो ।

खंडिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्डिनी] पृथिवी । धरती ।

खंडी (१)
वि० [सं० खण्डिन्] १. विभक्त । २. टुकड़े या हिस्सेवाला ।

खंडी (२)
संज्ञा पुं० दाल की एक किस्म । वलमुदग [को०] ।

खड़ी (३) †
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्ड] १. गाँव के आस पास के वृक्षों का समूह । २. लगान या किराए की किस्त । मुहा०—खंडी करना = किस्त बाँधना । ३. चौथ । राजकर । उ०—दतिया सु प्रथम दबा दई । खंडी सु मनमानी लई ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० ६ । पु ४. खंड । भाग । हिस्सा । उ०—किल किलकत चंडी लहि निज खंडी उमडि उमडी हरषित ह्वै ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २० ।

खंडी (४) †
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्डिका] एक तौल या माप जो २० मन की होती है । उ०—मनाँ सुँ था रूपा खंडियाँ सूँ सोना । थे लाख्याँ करोड़ अशरफियाँ करोडड़ सूँ होन्ना ।—दक्खिनी०, पृ० २७७ ।

खंडीवन पु †
संज्ञा पुं० [सं० खाण्डववन] दे० 'खांडववन' । उ०— खंडीवन जालवा अजन जेही तन ओपे ।—रा०, रू०, पृ० १६२ ।

खंडीर
संज्ञा पुं० [सं० खंडीर] पीले रंग का मुदग । पीली मूँग [को०] ।

खंडेंदु
संज्ञा पुं० [सं० खंडेन्दु] १. अपूर्ण चंद्र । २. अर्ध चंद्र [को०] ।

खंडेश्वर
संज्ञा पुं० [सं० खंडेश्वर] एक खंड का राजा ।

खंडोदभव, खंडोदभूत
संज्ञा पुं० [सं० खंडोदभ्व, खंडोदभूत] खंड से उत्पन्न शक्कर या गुड़ आदि [को०] ।

खंडोष्ठ
संज्ञा पुं० [सं० खंडोष्ठ] ओठ का एक रोग [को०] ।

खंडौति पु †
संज्ञा पुं० [सं० खण्डवत्] निराकरण ।दे०'खंडन'—३ । उ०—चारिउ बेद किया खंडौति । जन रैदास करै डंडौति ।— रै० बानी, पृ० ५७ ।

खंडय
वि० [सं० खण्डय] दे० 'खंडनीय' [को०] ।

खंतरा
संज्ञा पुं० [सं० कान्तर या हिं० अंतरा] १. दरार । खोडरा । २. कोना । अँतरा । उ०—गुप्तचरों ने एक एक कोना खंतरा छान डाला, पर किसी को अविलाइनो का चिह्न भी हस्तगत न हुआ ।—वेनिस०, (शब्द०) । विशेष—इस शब्द का व्यवहार प्रायः 'कोना' के साथ यौगिक शब्दों के अंत में होता है । जैसे—कोना खंतरा ।

खंता †
संज्ञा पुं० [सं०खनित्र या हिं० खनना] [स्त्री० अल्पा० खाती] १. वह औजार जिससे जमीन आदि खोदी जाती हो । २. वह गड्ढा जिसमें से कुम्हार मिट्टी लाते हैं ।

खंति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० ख्याति, राज० ख्याँत, खांत] १. लगन । प्रीति । उ०—मो मारू मिलिवातणी, खरी विलग्गी खंति ।— ढोला०, दू० २३८ । २. आकांक्षा । इच्छा । उ०—जब दैहौं तब पुज्जिहै मो मझझह खंति ।—पृ० रा०, १७ ।२७ ।

खंति (२) †
संज्ञा स्त्री० [देश०] तलवार का बीडन । कसा । उ०— (क) खंति खाग खोलि विहत्थं ।—पृ० रा०, १० ।१८ । (ख) खंति खग खुल्लि विहत्थं ।—पृ० रा०, (उदय०), पृ० २७९ ।

खंदक
संज्ञा स्त्री० [अ०खंदक] १. शहर या किले के चारों ओर खोदी हुई खाँई । २. बड़ा गड्ढा ।

खंदाँ
वि० [फा० खंदाँ] १. हँसता हुआ । मुसकुराता हुआ । हँसनेवाला । उ०—दिल सूँ खुर्रम, मुक सो खदाँ शाद माँ ।— दक्खिनी०, पृ० १८१ ।

खंदा पु (१) †
संज्ञा पुं० [हिं० खनना] खोदनेवाला । उ०—दैत्य दलन गजदंत उपारन केस केशधरि फंदा । सूरदास बलि जाइ यशोमति सुख के सागर दुख के खंदा ।—सूर (शब्द०) ।

खंदा (२)
संज्ञा पुं० [फा० खंद] हँसी । खिलखिलाहट । यौ०—खंदापेशानी = हँसमुख । हँसौहाँ ।

खंदा (३)
वि० दे० 'खंदाँ' ।

खंधक पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० खंदक] दे० 'खंदक' । उ०—खंधक तीन ओर निर्मल जल भरी सुहाती ।—प्रेमघन०, भा१, पृ० ९ ।

खंधा
संज्ञा पुं० [सं० स्कन्धक प्रा० खन्धा] आर्या गीति नामक छंद का एक भेद ।

खंधार †
संज्ञा पुं० [सं० खण्ड + धार] खंडाधीश । राजा । उ०— फिरइ वीनउला राजकुमार । षंड षंड का मील्या खंधार ।— बी० रासो, पृ० १० ।

खंधार † (२)
संज्ञा पुं० [सं० स्कन्धावार] दे० 'खँधार' ।

खंधार (३)
संज्ञा पुं० [सं० गान्धार] गांधार या कंदहार देशवासी जन । उ०—फिरंगान खंधार बलक्किय जुरे सु सब्बह ।— प० रासो, पृ० १०० ।२. गांधार देश ।

खंधारी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'कधांरी' ।

खंधासाहिनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० खंधा] खंधा या आर्या गाति नामक छंद का एक प्रकार ।

खंबायची †
संज्ञा स्त्री० [हिं०]दे० 'खाँबायची ।

खंभ
संज्ञा पुं० [सं० स्कम्भ या स्तम्भ, प्रा० खंभ] १. स्तंभ । खंभा । २. सहारा । आसरा । उ०—बिन जोबन भइ आस पराई । कहाँ सो पूत खंभ होई आई ।—जायसी (शब्द०) ।

खंभा
संज्ञा पुं० [सं० स्कम्भ, या स्तम्भ, प्रा० खम्भ] पत्थर या काठ का लंबा खाड़ा टुकड़ा अथवा ईंट आदि की थोड़े घेरे की ऊँची खाड़ी जोड़ाई जिसके आधार पर छत या छाजन रहती है । स्तंभ । विशेष—जहाँ छत या छाजन के नीचे का स्थान कुछ खुला रखना होता है, वहाँ खंभों का व्यवहार किया जाता है । जैसे, ओसारे बरामदे, बारहदरी, पुल आदि में खंभे का व्यवहार भारतीय स्थापत्य में बहुत प्राचीन काल से है; तथा उसके भिन्न भिन्न विभाग भी किए गए हैं । जैसे, नीचे के आधार को कुंभी (कुँभिया) और ऊपर के सिरे की भरणी कहते हैं ।

खंभाइच
संज्ञा पुं० [सं० स्कम्भावती] दे० 'खंभात' । उ०—तातें श्री गुसाई जी खंभाइच पधारे ।—दो सौ बावन० पृ० २०९ ।

खंभात
संज्ञा पुं० [सं० स्कम्भावती] १. गुजरात के पश्चिम प्रांत का एक राज्य जो इसी नाम के एक उपसागर के किनारे है । २. इस राज्य की राजधानी । ३. अरब सागर की एक खाड़ी [को०] ।

खंभार
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'खँभार' ।

खंभारा पु †
संज्ञा पुं० [सं० स्कम्भ] हाथी के रहने का स्थान । उ०—षूटा मदझर जुग जां खंभारा ।—रघु० रू०, पृ० १५४ ।

खंभावती
संज्ञा स्त्री० [सं० स्कम्भावती] दे० 'खंभात' ।

खंभिया
संज्ञा स्त्री० [सं० स्कम्भ या ग्तंम, प्रा, खंभ] छोटा खंभा । खंभे का अल्पार्थ सूचक ।

खंभेली
संज्ञा स्त्री० [हिं० खंभ+ एली (प्रत्य०)] दे० 'खभिया' । उ०—कुटिया के ओसारे पर खंभेली के सहारे बैठते हुए जयनाथ ने कहा 'तो क्या होगा?'—रति०, पृ० ४३ ।

खँखरा (१) †
संज्ञा पुं० [देश०] १. ताँबे का बड़ा देग जिसमें चावल आदि पकाया जाता है । २. बाँस का टोकरा ।

खँखरा (२) †
वि० दे० 'खाँखर' ।

खँखार
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'खखार' ।

खँखारना
क्रि० अ० [हि०] दे० 'खखार' ।

खँगना
क्रि० अ० [सं० क्षपण या हिं० छीजना] कम होना । घट जाना । उ०—ऊखल में पुनि बाँधन लागी । खँगी युगा— गुलि रजु पुनि माँगी ।—विश्राम०, पृ० ३११ ।

खँगवा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'खाँग' ।

खंगहा (१)
वि० [हिं० खाँग + हा (प्रत्य०)] १. खाँगवाला । जिसे खाँग या निकले हुए दाँत हों । २. खँगैल ।

खँगहा (२)
संज्ञा पुं० १. गैड़ा । २. वाराह । शूकर ।

खँगार †
संज्ञा पुं० [देश०] क्षत्रियों की एक गुजरातवासी शाखा तथा उसका राजा ।

खँगारना †
क्रि० स० [सं० क्षालन से] सं० 'खँगालना' ।

खँगालना
क्रि० स० [सं० क्षालन] १. हलका धोना । थोड़ा धोना । जैसे, लोटा खँगालना, गहना खँगालना । २. सब कुछ उड़ा ले जाना । खाली कर देना । जैसे,—रात को उनके घर चोर आए थे; सब खँगाल ले गए ३. मँझाना । २. थहाना । उ०—अब जाओ उलझनों में न पड़, जंगलों को खँगाल कर देखो ।—चोखे०, पृ० १९ ।

खँगी
संज्ञा स्त्री० [हिं० खँगना] कमी । घटी । छीज । उ०— हिय हरषि शिशु मुख चूमि सुंदर सकल दुलरावै लगीं ।— अनपार भै ज्यौनार निज रुचि सरस तहँ रहै का खँगी ।— विश्राम०, पृ० ४०३ ।

खगुवा
संज्ञा पुं० [हिं० खाँग] गैड़े का सींग । दे० 'खाँग' ।

खँगैल
वि० [हिं० खाँग + ऐल (प्रत्य०)] १ खाँग रोग से पीड़ित । जिसके खुर पके हों । खँगहा । २. दँतैला । लेबं दाँतवाला (हाथी) ।

खँगोरिया, खँगोरिया †
संज्ञा स्त्री० [देश०] हँसुली नाम का गहना ।

खँघारना †
क्रि० स० [हिं० खँगालना] दे० 'खँगालना' ।

खँचना † (१)
क्रि० अ० [हिं० खाँचना] चिह्निनत होना । निशान पड़ना । उ०—लाजमयी सुर बाम भई पछितान्यो स्वयंभू महा मन सेखैं । दुसरी ओर बबाइबो को त्रिबली खंची तीन तलाक की रेखैं ।—शंभु कवि (शब्द०) ।

खँचना (२) †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'खिंचना' ।

खँचवाना
क्रि० स० [हिं० खाँचना] दे० 'खाँचाना१' ।

खचाना (१) †
क्रि० स० [हिं० खाँचना] १. अकित करना । चिह्न बनाना । उ०—(क) राधिका की त्रीबली को बनाय विचारि बिचारि यहै हम लेखे । ऐसी न और न और न और है तीन खँचाय दई बिधि रेख ।—कोई कवि (शब्द०) । (ख) रामानुज लघु रेखेखँचाई । सो नहिं लाँघेउ अस मनुसाई ।—तुलसी (शब्द०) । २. जल्दी जल्दी लिखना ।

खँचाना (२) †
क्रि० स० दे० 'खींचना' ।

खँचाना (३)
क्रि० स० [हिं० खाँचना का प्रे० रूप] अकित करवाना खँचवाना ।

खँचिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० खाँची + इया (प्रत्य०)] दे० 'खाँची' ।

खँचुला †
संज्ञा पुं० [हिं० खाँचा + उला (प्रत्य०)] १. छोटी खाँची । २. खाँचा ।

खँचुली †
संज्ञा स्त्री० [हिं० खाँची] छोटी खाँची । खँचिया ।

खँचया †
वि० [हिं० खाँच + ऐया (प्रत्य०)] खींचनेवाला ।

खंचोला †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'खँचुला' ।

खंचोली †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खँचुली' ।

खँजड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० खँजरी] दे० 'खँजरी१' ।

खँजरी (७)
संज्ञा स्त्री० [सं० खंजरीट = एक ताल] डफली की तरह का एक छोटा बाजा । विशेष—इसकी मेंडरा (गोलाकार काठ) चार या पाँच अँगुल चौ़ड़ा और एक ओर चमड़े से मढ़ा तथा दूसरी ओर खुला रहता है । यह एक हाथ से पकड़कर दूसरे हाथ की थाप से बजाई जाती है । साधु लोग प्रायः अपनी खँजरी के मेंडरे में एक प्रकार की हलकी झाँझ भी बाँध लेते हैं जो खँजरी बजाते समय आपसे आप आप बजती हैं ।

खँजरी (२)
संज्ञा स्त्री० [ फा० खंजर] १. खंजर का स्त्रीलिंग ओर अल्पार्थक रूप । २. एक प्रकार की लहरिएदार धारी जो रंगीन कपड़ों में होती है । ३. वह कपड़ा, विशेषतथा रेशमी कपड़ा, जिसमें इस प्रकार की धारी हो ।

खँड †
संज्ञा पुं० [सं० खण्ड] खंड का हिंदी में प्रयुक्त समासगत रूप, जैसे—खंडपूरी, खंडवनी आदि ।

खँडपूरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० खाँड + पुरी] एक प्रकार की भरी हुई पूरी जिसके अंदर मेवे और मसाले के साथ चीनी भरी जाती है ।

खँडबरा †
संज्ञा पुं० [हिं० खाँड + वरा या औरा (प्रत्य०)] दे० खंड़ौरा' । उ०—खंडै कीन्ह आमचुर परा । लौंग इलाची सों खँडबरा ।—जायसी (शब्द०) ।

खँडरा
संज्ञा पुं० [सं० खण्ड + हिं० वरा] एक प्रकार का चौकोर बड़ा जो सूखा और गीला दोनों प्रकार होता है । उ०— खँडरा खाँड़ जो खंडे खंडे । बरी अकोतर से कहं हंडे ।— जायसी (शब्द०) । विशेष—इसके बनाने के लिये पहले बेसन घोलकर उसे कड़ाही में पकाते हैं जिसे पाक उठाना कहते हैं । पाक तैयार ही चुकने पर उसे थाली में डालकर जमा देते हैं । ठंडा होकर जम जाने पर उसे चौकोर टुकड़ों में काटकर तेल में तल लेते हैं । इसी को सूखा खँडरा कहते हैं । पीछे इसे मसालों के साथ किसी काँजी या रसे में भिगो देते हैं ।

खँडला †
संज्ञा पुं० [सं० खण्ड + हिं० ला (स्वा० प्रत्य०)] टुकड़ा । कतरा ।

खँडवानी
संज्ञा स्त्री० [हिं० खाँड + पानी] १. वह पानी जिसमें खाँड़ या चीनी घोली हुई हो । शरबत । उ०—कढ़ी सँवारी और फुलौरी । औ खँडवानी लाल बरौरी ।—जायसी (शब्द०) । २. कन्या पक्षवालों की ओर से बरातियों को जलपान भोजन भेजने की क्रिया । उ०—बोली सबहि नारि कुँभिलानी । करहु सिंगार देहु खाँडवानी ।—जायसी (शब्द०) ।

खँडावला
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का धान । उ०—कोरहन, बड़हर, जड़हन मिला । औ संसारतिलक खँडविला ।— जायसी (शब्द०) ।

खँडसार
संज्ञा स्त्री० [सं० खँण्ड + शाला] खाँड या शक्कर बनाने का कारखाना । वह स्थान जहाँ खाँड़ बनती हो ।

खँडसारी
संज्ञा स्त्री० [देश० सं० 'खण्ड' से] एक प्रकार की चीनी । देशी चीनी । शक्कर ।

खँडसाल
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खँडसार' ।

खँडहर
संज्ञा पुं० [सं० खंड + हिं० घर] किसी टूटे फूटे या गिरे हुए मक न का बचा हुआ भाग । खंडर ।

खँड़हुला †
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'खँड़बिला' ।

खँड़िया (१)
संज्ञा पुं० [सं० खण्ड + हिं० इया (प्रत्य०)] ईख को काटकर उसकी छोटी छोटी गंड़ेरियाँ या टुकड़े बनानेवाला व्यक्ति ।

खँड़िया (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्ड] टुकड़ा । खंड । जैसे—मछली की खँड़िया ।

खँड़ुआ †
संज्ञा पुं० [हिं० खंड] १. वह कुआँ जिसकी जगत पत्थर के ढोकों से बनाई गई हो । २. दे० 'कँदुआ' ।

खँड़ौरा †
संज्ञा पुं० [हिं० खाँड + औरा (प्रत्य०)] मिसरी का लड्डू । औला । उ०—पहुप सुरंग रस अंमिरित सांधे । कै कै सुरग खँड़ौरा बाँधे ।—जायसी (शब्द०) ।

खँड़ौरी †
संज्ञा स्त्री० [सं० खण्ड हिं० औरी (प्रत्य०)] चावल के बड़े बड़े टुकड़े जो कूटने पर टूट जाते हैं ।

खँदना
वि० [सं० खनन] खोदना ।

खँदवाना
क्रि० स० [हिं० खाँदना का प्रे० रूप] खोदवाना । खोदने के काम में लगाना ।

खँधवाना
क्रि० स० [खाँधियाना का प्रे, रूप] खाली कराना । उ०—कंचन के घैला अतर भरैला सुमन खँधवाये ।—विश्राम (शब्द०) ।

खँधार †
संज्ञा पुं० [सं० स्कन्धावार] सेना का निवासस्थान । स्कंधावारा । छावनी । उ०—कहाँ मोर सब दरब भँडारा । कहाँ मोर सब दरब खँधारा ।—जायसी (शब्द०) ।

खँधियाना †
क्रि० स० [हिं० खाली] (पदार्थ को पात्र में से बाहर) निकालना । खाली करना । रिक्त करना ।

खँबायची, खँबायती
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खाम्माच' ।

खँबार †
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'खँभार' ।

खँभायची
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खाभावती' । उ०—बग्गौ राग खाँभायची लग्गै केसर बोह ।—रा० रू०, पृ० ३४७ ।

खँभायची कान्हड़ा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'खाम्माच कान्हड़ा' ।

खँभार पु †
संज्ञा पुं० [सं० क्षोभ, प्रा० खोभ] १. अंदेशा । चिंता । २. घबराहट । व्याकुलता ।३. डर । भय । उ०—हरबर हरत खँभारु, निज शरणागत जनन को । भाषत अहौ तुम्हार करत अभय संसार ते ।—रघुराज (शब्द०) । ४. शोक । उ०— कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर विधि, लोचननि चकाचौंधि चित्तन खँभारु सो ।—तुलसी (शब्द०) ।

खँभार (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खँभारि' खँभारी' ।

खँभारि, खँभारी
संज्ञा स्त्री० [सं० काश्मरी, प्रा, काम्हरी] गभारी नामक वृक्ष । वि० दे० 'गंभारी' ।

खँभावती
संज्ञा स्त्री० [सं० स्कम्भावती] षाड़व जाति की एक रागिनी जो मालकोश राग की दूसरी स्त्री मानी जाती है । इसके गाने का समय आधी रात है ।

खंभिया
संज्ञा स्त्री० [सं० खंभा + इया [स्क० प्रत्य०] खंभा का अल्पार्थक रूप । छोटा पतला (विशेषतः काठ का) खंभा ।

खँभेली †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खंभेली' ।

खँवँ †
संज्ञा स्त्री० [सं० खम्] वह गड्ढ़ा जिसमें अनाज भरकर रखते हैं । खत्ता ।

खँवँडा †
संज्ञा पुं० [हिं० खाँवँ + डा (प्रत्य०)] अनाज रखने का बड़ा गड्ढ़ा । बड़ा खात्ता । बड़ी खाँवँ ।

खँसना †
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'खसना' ।


संज्ञा पुं० [सं०] १. गड्ढा । गर्त । २. खाली स्थान । ३. निर्गम । निकास । ४. छेद । बिल । ५. इंद्रिय । ६. गले की वह नाली जिसमें प्राणवायु आती जाती है । ७. कुआँ । ८. तीर का घाव । ९. गाड़ी के पहिए की नाभि का छेद जिसमें धुरा रहता है । आख्या । १०. आकाश । स्वर्ग । देवलोक । १३. कर्म । क्रिया । १४. जन्मकपंडली में दसवाँ स्थान । १५. शून्य । १६. बिंदु । सिफर । १७. ब्रह्म । १८. शब्द । १९. अभ्रक । २०. मोक्ष । निर्वाण । २१. नगर । शहर (को०) । २१. समझ । बोध (को०) । २२. झरना (को०) । २३. कूप । कुआँ (को०) २४. सूर्य (को०) । २५. क्षेत्र (को०) ।

खई पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० क्षयी] १.क्षणकारिणी क्रिया २. लड़ाई । युद्ध । ३. तकरार । झगड़ा । उ०—अंश परायो देत न नीके माँगत ही सब करत खाई ।—सूर (शब्द०) ।

खाए पु †
संज्ञा पुं० [सं० खः = आकाश] ऊपर । व्योम । उ०— खए लगि बाँह उसारि उसारि भए इत उत्त जवै रिसि धारि ।—सुजान०, पृ० ३४ ।

खकक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] आकाश का घेरा । आकाशीय परिधि [को०] ।

खकामिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा का एक नाम [को०] ।

खकुंतल
संज्ञा पुं० [सं० खकुन्तल] शिव का एक नाम । व्योमकेश । कपर्दी [को०] ।

खक्खट (१)
वि० [सं०] १. ठोस । कड़ा । २. कठोर । कर्कश ।

खक्खट (२)
संज्ञा पुं० दे० 'खँड़िया' ।

खक्खर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. भिखारी की छ़ड़ी । २. दे० 'खंकर' [को०] ।

खक्खर पु (२)
संज्ञा पुं० [?] पंजाब का एक पुराना प्रदेश तथा वहाँ के निवासी । उ०—खक्खर को देस, बारयो भक्खर भगाना जू ।—गंग ग्रं०, पृ० ९२ ।

खक्खा (१)
संज्ञा पुं० [अ० कहकहा] जोर की हँसी । अट्टहास । कहकहा । उ०—पाइ कै खबर खुबी खुशी मानि खक्खा मारि, खलक के खाली करबे कों खैर भरै सों ।—रघुराज (शब्द०) ।

खक्खा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० खत्री का, ख, या 'खक्खर'] १. पंजाबी सिपाही । विशेष—पंजाब के खत्री प्रायः अपने आप के 'रक्खा' कहा करते है; इसी से यह शब्द अनेक अर्थों में व्यवहृत होने लगा । २. अनुभवी पुरुष । तजुर्वेदार आदमी । ३. बड़ा और उँचा हाथी ।

खक्खासाहु
संज्ञा पुं० [हिं० खक्खा + साहु] १. वह मनुष्य जो व्यापार में बहुत चतुर हो २. खत्री जाति का व्यापारी ।

खखड़ा †
वि० [देश० खक्खड़] १. शुष्क । नीरस । २. छूछा । खोखला ।

खखरा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० खंखड] १. खँखरा । २. बाँस का बना हुआ बड़ा टोकरा ।

खखरा (२) †
वि० [हिं० खाँखर] झीमा । अत्यंत महीन ।

खखरिया †
संज्ञा स्त्री० [देश०] मैदे और बेसन की बनी हुई पापड़ की तरह की हलकी पतली पूरी जो अलोनी होती है ।

खखसा
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'खेकसा' या 'खेखसा' ।

खखार
संज्ञा पुं० [अनु०] गाढ़ा थूक या कफ जो खखारने से निकले । कफ ।

खखारना
क्रि० अ० [सं० कफ क्षारण] १. पेट की वायु को फेफड़े से इस प्रकार निकालना जिससे खरखराहट का शब्द हो तथा कभी कभी कफ या थूक भी निकले । २. दूसरे को सावधान करने के लिये गले से खरखराहट का शब्द निकालना ।

खखेटना (१)पु
क्रि० स० [देश०] १. दबाना । २. पीछा करना । ३. घायल करना । छेदना । उ०—वेई पठनेटे सेल साँगन खखेटे धूरि, धूरि सो लपेटे लेटे भेटे महाकाल के ।—सूदन (शब्द०) ।

खखेटना (२)पु
क्रि० अ० [हिं० खखेटा] खटका होना । आशंका होना । उ०—सोच भयो सुरनायक के कलपद्रुम के हिय माँझ खखेटयो ।—कविता कौ०, भा०१, पृ० १५० ।

खखेटा पु
संज्ञा पुं० [हिं० खखेटना] १. भगदड़ । दौड़धूप । २. दाब । दबाव । २. छिद्र । ४. आशंका । खटका ।

खखेना पु
क्रि० स० [देश०] दे० 'खखेटना' ।

खखेरा
संज्ञा पुं० [देश०] उपहास । कलंक । लांछन ।

खखोंडर †
संज्ञा पुं० [सं० ख + कोटर] १. पेड़ के कोटर में बना हुआ किसी पक्षी का घोंसला । २. उल्लू पक्षी का घोंसला ।

खखोरना †
क्रि० स० [देश०] अच्छी तरह ढूढ़ंना । सब जगह खोज डालना । छानबीन करना ।

खखोल्क
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य का नाम [को०] । विशेष—इनकी मूर्ति काशी में स्थिति कही गई है । काशीखंड के ५० वें अध्याय में इनका विवरण है ।

खगंगा
संज्ञा स्त्री० [सं० खगङ्गा] आकाशगंगा । मंदाकिनी ।

खग (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. आकाश में चलनेवाली वस्तु या व्यक्ति । २. पक्षी । चिड़िया । ३. गंधर्व । ४. बाण । तीर । ५. ग्रह । तारा । सितारा । ६. बादल । ७. देवता । ८. सूर्य । ९. चंद्रमा । १०. बायु । हवा । उ०—खग रवि खग शशि खगपवन खग अंबुद खग देव । खग विहंग हरि सुतरु तजि खग उर सेंबल सेव ।—अनेकार्थ० (शब्द०) ११. महादेव (को०) । १२. शलभ (को०) ।

खग (२)
वि० आकाशचारी । नभगाभी [को०] ।

खग (३)पु
संज्ञा पुं० [सं० खङ्ग, हिं० खंग] दे० 'खंग', 'खङ्ग' । (क) हाजी गख्खर खान खांति खग खोलि बिहत्थं ।—पृ० रा०, १० १८ । (ख) नव ग्रहन मद्धि जनु सूर तोष । खग ध्रंम क्रंम संमर अदोष ।—पृ० रा०, ६ ।६ ।

खगकेतु
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़ । उ०—बरणि न जाय समर खगकेतु—तुलसी (शब्द०) ।

खगखान
संज्ञा पुं० [सं०] वृक्षकोटर । पेड़ का खोंढ़र [को०] ।

खगति
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक छंद का नाम [को०] ।

खगना
क्रि० स० [हिं० खाँग = काँटा] १. गड़ना । पैठना । चुभना । धँसना । उ०—कह ठाकुर नेह के नेजन कौ उर में अनी आदि खगी सो खागी ।—ठाकुर (शब्द०) । २. चित्त में बैठना । मन में धँसना । असर करना । उ०—जाहीं सों लागत नैन ताही के खगत बैन नख शिख लौं सब गात ग्रसति ।—सूर (शब्द०) । ३. लग जाना । लिप्त होना । अनुरक्त होना । उ०—प्रफुलित बदन सरोज सुँदरी अतिरस नैन रँगे । पुहुकर पुंडरीक पूरन मनो खंजन केलि खगे ।—सूर (शब्द०) । ४. चिह्नित हो जाना । छप जाना । उपट आना । उभर आना । उ०—यह सुनि धावत धरनि चर की प्रतिमा खगी पंथ में पाई ।—सूर (शब्द०) । ५. अटक रहना । अचल होकर रह जाना । अड़जाना । उ०—करि कै महा घमसान । खागि रहे खेत पठान ।—सूदन (शब्द०) ।

खगनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़ [को०] ।

खगपति
संज्ञा पुं० [सं०] १. सूर्य । २. गरुड़ । विशेष—पक्षीवाची शब्दों के बाद स्वामीवाची या ध्वजावाची शब्द लगा देने से वह समस्त शब्द 'गरुड़' वाची हो जायगा । जैसे,—खगपति, खगराज, खागकेतु, खागनाथ, खागनायक ।

खगवक्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] लकुच का फल [को०] ।

खगवती
संज्ञा स्त्री० [सं०] पृथिवी । धरती [को०] ।

खगवार
संज्ञा स्त्री० [देश०] गले का हँसुली नामक आभूषण । खँगौरिया ।

खगशत्रु
संज्ञा पुं० [सं०] पृश्निपर्णी लता [को०] ।

खगस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] १. पेड़ का कोटर । खगखान । २. चिड़ियो का घोंसला [को०] ।

खगहा
संज्ञा पुं० [हिं० खाँग = निकला हुआ पैना दाँत] गैंडा । उ०—खगहा करि हरि बाध बराहा । देखि महिष वृष साजु सराहा ।—तुलसी (शब्द०) ।

खगांतक
संज्ञा पुं० [सं० खगान्तक] खागों का अंत करनेवाला पक्षी । बाज । श्येन ।

खगासन
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु । २. उदयगिरि । उदयाचल नाम का पर्वत [को०] ।

सगुण
वि० [सं०] जिस राशि का गुणक शून्य हो (गणित) ।

खगेंद्र
संज्ञा पुं० [सं० खगेन्द्र] गरुड़ [को०] ।

खगेश
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़ ।

खगोल
संज्ञा पुं० [सं०] १. आकाशमंडल । विशेष—यद्यपि आकाश की कोई आकृति नहीं है, तथा पिपरिमित दृग्रशिम के कारण वह गोलाकर देख पड़ता है । जिस प्रकार विद्धानों ने पृथ्वी ती गोलाई में विषुवत्रेखा, अक्षांश ओर देशांतर रेखाओं तथा ध्रुव की कल्पना की है, ठीक उसी प्रकार खगोल में भी रेखाओं और ध्रुवौ की कल्पना की गई है । ज्योतिषियों ने ताराओं के प्रधान तीन भेद किए हैं—नक्षत्र, ग्रह और उपग्रह । नक्षत्र वह है जो सदा अपने स्थान पर अटल रहे । ग्रह तारा है जो अपने सौर जगत् के नक्षत्र की परिक्रमा करे । और उपग्रह वह है अपने ग्रह की परिक्रमा करता हुआ उसके साथ गमन करे । जिस तरह हमारे सौर जगत् का नक्षत्र हमारा सुर्य है, उसी तरह प्रत्येक अन्य सौर जगत् का नक्षत्र उसका सुर्य है । पृथिवी की दैनिक और वृत्ताकार गतियौं के कारण इन नक्षत्रों के उदय में विभेद पड़ता रहता है । यद्यपि गगनमंडल सदा पुर्व से पशिचम को घुमता हुआ दिखाई पड़ता बै, पर फिर भी वह धीरे धीरे पुर्व की और खसकता जाता है । इसलिये ग्रहों की स्थिति में भेद पड़ा करता है । प्राचीन आर्य ज्योतिषियों ने कुछ ऐस तारों का पता लगाया था जो अन्यों की अपेक्षा अत्यत दुर होने के कारण अपने स्थान पर अछल दिखाइ पड़ते थे । उन लोगों ने ऐसे कई तारों के योग से अनेक आकृतियों की कल्पना की थी । इनमें वे आकृतियाँ जो सुर्य के मार्ग के आस पास पड़ती थीं, अट्ठाईस थीं । इन्हें वे नक्षत्र कहते थे । इन तारों से जड़ा हुआ गगनमंडल अपने ध्रुवों पर घुमता हुआ माना गया है । समस्त खगोल को आधुनिक ज्योतिर्विदो ने बारह वीथियों में विभक्त किया है, जिनमें प्रत्येक वीथी के अंतर्गत अनेक मंडल हैं । प्रथम वीथी में पर्शु, त्रिकोण, मेष, नमि, यज्ञकुंड और यमी ये छह मंडल है । द्धितीय में चित्रक्रमेल, ब्रह्यम, वृष, घटिका, सुवर्णश्रम और आढ़क ये छह मंडल हैं । तृतीय में मिथुन, कालपुरुष, शश, कपोत, मृगप्याध, अर्णवयान, चित्रपटु अभ्र और चत्वाल नाम के ना मंडल है । चतुर्थ में वन मार्जार, कर्कट, शुनी एकशृंगि, कृकलास और पतत्रिमीन मंडल नाम के छह मडल है । पचम वीथी में सिंहशावक, सिंह, ह्यदसर्प, षष्ठीष और वायुयंत्र नाम के पाँच मंडल है । षष्ठ में सप्रर्षि, सारमेय, करिमुंड कन्या, करतल, कास्य, त्रिशंकु और मक्षिका आठ मंडल है । सप्तक में शिशुमार, भुतेश, तुला, शार्दुल, महिषासुर, वृत्त और धुम्राट नामक सात मंडल है । अष्टम में हरिकुल, किरीट, सर्प, वृश्चिक और दक्षिण त्रिकोण पांच मंडल है । नवम वीश्री में तक्षक, वीणा, सर्पधारि, धनुष, दक्षिण किरीट, दुरवीक्षण औऱ वेदि सात मडल हैं । दशन में वक, श्रृगाल वाण, गरुड़, श्रविष्ठा, मकर, अणुवीक्षण, सिंधु, मयुर और अष्टांश नाम के दस मंडस हैं । एकादश में शेफालि, गोधा, पक्षिराज, अशवतर, कृंभ, दक्षिण मीन, सारस और चंचुभुत आठ मंडल है । और द्धादशवीथी में काश्यपीय, ध्रुवमाना, मीन, भास्कर, संपाति, हरृद और ग्राव सात मंडल हैं । इनम सब को लेकर बारह वीथियाँ और ८४ मंडल हैं । इनमें से प्राचीन भारतीय विद्धानों को शिशुमार (विष्णुपुराण), त्रिशंकु, (वाल्मीकि), सप्तर्षि इत्यादि मंडलों का पता था । इन वीथीयों को क्रमशः मेष, वृष, मिथुन, आदि वीथियाँ भी कहते हैं । सुर्य के मार्ग में अट्ठाईस नक्षत्र पड़ते हैं, जिनके नाम अशिवनी आदि हैं । सूर्य मेष आदि बारह विथियों में क्रमशः होकर जाता हुआ दिखाई पड़ता है, जिसे राशि या लग्न कहते हैं । २. खगोल विद्या ।

खगोलक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'खगोल' [को०] ।

खगोलमिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] गणित ज्योतिष का वह अंग जिसमें तारों, नक्षत्रों की नाप जोख और गति, स्थिति आदि का विचार किया जाया है [को० ।

खगोलविद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह विद्या जिससे खगोल अर्थात् ग्रह आदि की गति का ज्ञान प्राप्त हो ।ज्योतिष ।

खग्ग पु
संज्ञा स्त्री० [सं० खङ्ग, प्रा० खग्ग] तलवार । उ०— हयं खग्ग लग्गं कटिं तुटिट् थानं ।—प० रा०, ६६ ।१३७८ ।

खग्गड
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वेतस् । नरकुल या सरकंडा [को०] ।

खग्रास
संज्ञा पुं० [सं०] ऐसा ग्रहण जिसमें सुर्य या चंद्र का सारा मंडल ढँक जाय । पुरा ग्रहण ।

खचन
संज्ञा पुं० [सं०] वि० खचित ] १. बाँधने या जड़ने की क्रीया । उ०—सर्वसाधारण के मनोरंजनार्थ रत्न को जैसे कुंदन में खचित करना पड़ता है, वैसे ही काव्य को उक्त गुणों से अलंकृत करना चाहिए ।—(शब्द०) । २. अंकित करने या होने की क्रिया । चित्रित होने की क्रिया । उ०—ध्यान रुपी चित्रालय में कौन कौन चित्र खचित हो गए ।—(शब्द०) ।

खचना (१)पु
क्रि० अ० [सं० खचन = बाँधना, जड़ना] १. जड़ा जाना । उ०—मनि दीप राजाहिं भवन भ्राजहिं देहरी विद्रुम रची । मनिखंभ भीति विरंचि बिरची कनकमनि मरकत खची । सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर अस्फटिकन रचे । प्रति द्धार द्धार कपाट पुरट बनाई बहु बज्रन खचे ।—तुलसी (शब्द०) । २. अंकित होना । चित्रित होना । उ०—देत भाँवरि कुंज मंडप पुलिन में बेदी रची । बैठे जो श्यामा श्याम बर त्रौलोक की शोभा खची ।—सुर (शब्द०) । ३. रम जाना । अड़ जाना । उ०—आजु हरि ऐसो रास रच्यो ।— गतगुन मद अभिमान अधिक रुचि लै लोचन मन तहुहँ खच्यौ ।—सुरक०, १० ।११३९ । ४. अटक रहना । फँसना । उ०—नैना पंकज पंज खचे । मोहन मदन श्याम मुख निरखत भ्रुवन विलास रचे ।—सुर (शब्द०) ।

खचना (२) पु
क्रि० स० १. अंकित करना । २. जड़ना ।

खचमस
संज्ञा पुं० [सं०] चंद्रमा [को०] ।

खचर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुर्य । २. मेघ । ३. ग्रह । ४. नक्षत्र । ५. वायु । ६. पक्षी । ७. वाण । तीर । ८. राक्षस । ९. संगीत दामोदर के अनुसार एक ताल का नाम जिसे रूपक भी कहते हैं । १०. कसीस ।

खचर (२)
वि० आकाश में चलनेवाला । खेचर ।

खचरा
वि० [हिं० खच्चर] १. वर्ण संकर । दोगला । २. दुष्ट । पाजी ।

खचाखच
क्रि० वि० [अनु०] बहुत भरा हुआ । ठसाठस । जैसे,— देखते ही देखते सारा कमरा खचाखच भर गया ।

खचाना पु
क्रि० स० [सं० √ कृष; प्रा० √ खंच] दे० 'खँचना' । मुहा०—अपनी खचाना = अपनी ही कही हुई बात को बार बार पुष्ट करते जाना, दूरे के तर्क को कुछ न सुनना । उ०— सुनौ धौं दै कान अपनी लोक लोकन कीति । सूर प्रभु अपनी खचाई रही निगमन जीति ।—सूर (शब्द०) ।

खचारी (१)
संज्ञा पुं० [सं० खचारिन्] १. स्कंद का नाम । २. दे० 'खचर (१)' [को०] ।

खचारी (२)
वि० दे० 'खचर' ।

खचावट
संज्ञा स्त्री० [सं० खाँचना] १. खचन । २. गठन †३. लिखावट ।

खचित
वि० [सं०] १. खींचा हुआ । चित्रित या लिखित । २. आबद्ध । जटित । ३. युक्त । संयुक्त । ४. परिपूर्ण । भरा हुआ (को०) । ५. विभिन्न प्रकार के तागों से तैयार या सिला हुआ (वस्त्र), (को०) ।

खचित्र
संज्ञा पुं० [सं०] अनहोनी और असंभव वार्ता अथवा वस्तु [को०] ।

खचिया †
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'खँचिया' ।

खचीना †
संज्ञा पुं० [हिं० खचाना] १. रेखा । लकीर । २. चिह्न ।

खचेरना †
क्रि० स० [हिं० खींचना] घसीटना । बलपूर्वक खींचना ।

खच्चर
संज्ञा पुं० [देश०] १. गधे और घोड़ी के संयोग से उत्पन्न एक पशु । विशेष—यह पशु घोड़े से बहुत मिलता जुलता होता है । इसके कान आदि अवयव गधे के समान होते हैं, पर शक्ति इसकी घोड़े से भी कुछ अधिक होती है । यह दीर्घजीवी होता है, बहुत कम बीमार पड़ता है और अधिक परिश्रम कर सकता है, इसीलिये कई अवसरों पर यह घोड़े की अपेक्षा अधिक उपयोगी होता है । यह घोड़े की तरह समझदार होता है, और ऊँची नीची भुमि पर इसका पैर बहुत मजबूत बैठता है । फौंजों में और पहाड़ों पर इससे बहुत काम निकलता है । ३. दे० 'खचरा' ।

खज (१)पु
वि० [सं० खाद्य, प्रा० खाज्ज] खाने योग्य । जो खाया जा सके । भक्ष्य । उ०—चाली हंसन की चलै चरन चोंच करि लाल । लखि परिहै बक तव कला, झखा मारत ततकाल । झखा मारत ततकाल ध्यान मुनिवर सों धारत । बिहरत पंख फुलाय नहीं खज अखज बिचारत । बरनै दीनदयाल बैठि हंसन की आली । मंद मंद पग देत अहो यह छल की चाली ।— दीनदयालु (शब्द०) । यौ०—खज अखाज = भक्ष्याभक्ष्य ।

खज (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. मथानी । मंथनचक्र । २. मंथन की क्रिया । ३. कलछुल । दर्वी । ४. संघर्ष । युद्ध [को०] ।

खजक
संज्ञा पुं० [सं०] मथानी [को०] ।

खजप
संज्ञा पुं० [सं०] तपाया हुआ मक्खान । घी [को०] ।

खजमज
वि० [अनु०] खाराब, भारी या गिरि हुई (तबीयत) ।

खजमजाना
क्रि० अ० [अनु०] तबीयत का खाराब या भारी होना ।

खजल
संज्ञा पुं० [सं०] १. ओस । २. वर्षा । ३. कोहरा [को०] ।

खजला
संज्ञा पुं० [हिं० खाजा] एक प्रकार का पकवान जिसे खाजा भी कहते है । उ०—गुपचुप्प गुना गुल पापरियाँ । खाजल सुखजूरि पडा़खरियाँ ।—सूदन (शब्द०) ।

खजलिया
संज्ञा पुं० [देश०] अंगूर के पौधों का एक रोग जिसमें उसके पत्तों और डंठलों पर काली काली धूल सी जम जाती है और पत्ता धीरे धीरे सूखता जाता है ।

खजहजा
संज्ञा पुं० [सं० खाद्याद्य, प्रा, खज्जाज्ज] खाने योग्य उत्तम फल या मेवा । उ०—(क) और खजहजा उनकर नाऊँ । देखा सब राजन अँबराऊँ ।—जायसी (शब्द०) । (ख) फरे खाजहजा दाड़िम दाखा । जो वह पंथ जाइ सो चाखा ।—जायसी (शब्द०) ।

खजांची
संज्ञा पुं० [फा० खजानची] कोषाध्यक्ष ।

खजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मथानी । २. मथने का कार्य । मंथन । ३. दर्वी । ४. विनाश । विध्वंस । ५. संघर्ष । युद्ध [को०] ।

खजाक
संज्ञा पुं० [सं०] एक पक्षी [को०] ।

खजाका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दर्वी । कलछुल [को०] ।

खजाजिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'खाजाका' [को०] ।

खजानची
संज्ञा पुं० [फा खजानची] खजाने का अफसर । कोषाध्यक्ष ।

खजाना
संज्ञा पुं० [अ० खजानह्] १. वह स्थान जहाँ धन संग्रह करके रख जाय ।—धनागारा । २. वह स्थान जहाँ कोई चीज संग्रह करके रखी जाय । कोश । ३. राजस्व । कर । ४. आधिक्य । बाहुल्य । ५. बंदूक में बारूद रखने की जगह । क्रि० प्र०—देना ।—माँगना ।—जमा करना ।—पहुँचना । यौ०—खजाना अफसर = वह अधिकारी जिसके यहाँ जिले की सरकारी आय जमा होती है ।

खजार
संज्ञा पुं० [अ० खजार] १. बहुत अधिक पानी मिला हुआ दूध [को०] ।

खजिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] कलछी । दर्वी (को०) ।

खजित
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार के शून्यवादी बौद्ध ।

खजिल †
वि० [फा०] लज्जित । शरमिंदा ।

खजीना
संज्ञा पुं० [फा० खजीनह] खजाना । उ०—कायर भागा पीठ दै, सूर रहा रन माहिं । पट लिखाया गुरू पै खरा खाजीना खाहि ।—कबीर सा० सं०, पृ० २९ ।

खजुआ (१) †
संज्ञा पुं० [हिं० खाजा] खाजा नाम की मिठाई । खजला । उ०—दोना मेलि धरे हैं खजुआ । हौंस होय तो ल्याऊँ पूवा ।—सूर (शब्द०) ।

खजुआ (२)
संज्ञा पुं० [सं० खाद्य, पा० खाज्ज] भटवाँस नामक अन्न । भटनास ।

खजुवा †
संज्ञा पुं०, वि० [हिं०] दे० 'खजुआ' ।

खजुरहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० खजूर] नैपाल की तराइयों में उत्पन्न होनेवाला एक प्रकार का खजूर । विशेष—इसके पेड़ हाथ डेढ़ हाथ ऊँचे होते हैं । इसकी पत्तियाँ साधारण खजूर से कुछ छोटी होती है और चटाई आदि बनाने के काम में आती हैं । इसके फल में प्रायः बीज ही बीज होता है जिसके कारण यह खाने योग्य नहीं होता ।

खजुरहटी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० खजुर] दे० 'खजुरहट' ।

खजुरा †
संज्ञा पुं० [हिं० खर्जूर] दो या तीन लर का बटा हुआ एक प्रकार का डोरा जिसके एक सिरे पर फुँदना होता है और जिसके साथ स्त्रियाँ सिर की चोटी गूँथती हैं ।

खजुराहा
संज्ञा पुं० [सं० खर्जूर वाहक] दे० 'खजुराहो' । उ०— यशोवर्मन् ने खजुराहे में एक मंदिर बनवाया ।—हिंदु० सभ्यता, पृ० ४९४ ।

खजुराही †
संज्ञा स्त्री० [हिं० खजूर] वह स्थान जहाँ खजूर के बहुत से पेड़ हों ।

खजुराहो
संज्ञा पुं० [सं० खर्जूरवाहक] मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले का एक गाँव जो चंदेलों की प्रारंभिक एवं धार्मिक राजधानी रहा है । विशेष—यहाँ के मंदिर अपनी स्थापत्य कला की दृष्टि से दर्शनीय हैं । इनका निर्माण नवीं शती से ११ वीं तक माना जाता है । स्थानीय परंपरा के आधार पर यहाँ पहले ८५ मंदिर थे किंतु अब उनमें से २५ रह गए हैं जो अपनी विभिन्न दशाओं में सुरक्षित हैं ।

खजुरिया †
संज्ञा स्त्री० [सं० खर्जूरिका] १. एक प्रकार की खजूर जिसके फल कुछ छोटे होते हैं । २. खजूर नाम की मिठाई । ३. एक प्रकार की ईख जो सूरत के आस पास होती है ।

खजुरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० खजुली] दे० 'खजुली' ।

खजुलाना
क्रि० स० [हिं० खुजलाना] दे० 'खुजलाना' ।

खुजली (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० खर्ज्ज] १. दे० 'खुजली' । २. एक प्रकार की काई जिसके छू जाने से खुजली उत्पन्न हो जाती है ।

खजुली (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० खाजा] खाजे की तरह की एक मिठाई जो चीनी में पगी होती है ।

खजूर
संज्ञा पुं० [सं० खर्जूर] १. एक प्रकार का पेड़ जो गरम देशों, समुद्र के किनारे या रेतीले मैदानों में होता है । विशेष—इस जाति के पेड़ सीधे खंभे की तरह ऊपर चले जाते हैं औऱ उनके सिरे पर पत्तियाँ बहुत कड़ी, चार अंगुल से छह सात अंगुल तक लंबी, पतली और नुकीली होती हैं और एक सींके या छड़ी के दोनों ओर लगती हैं । पत्ते की यह छड़ी दो तीन हाथ तक लंबी होती है । खजूर कई प्रकार के होते हैं, जिनमें मुख्य दो हैं—एक जंगली, दूसरा देशी । जंगली खजूर को सेंधी, खरक आदि कहते हैं । यह बहुत ऊँचा नहींहोता और हिंदुस्तान में बंगाल, बिहार, गुजरात, करमंडल आदि प्रदेशों में होता है । लगाए हुए खजूर में जड़ के पास अंकुर निकलते हैं, जंगली में नहीं । जंगली के फल भी किसी काम के नहीं होते । ताड़ की तरह इसमें से भी पाछकर एक प्रकार का सफेद रस या दूध निकालते हैं और उसे भी ताड़ी कहते हैं । खजूर की ताजी ताड़ी मीठी होती है और उससे गुड तथा सिरका भी बनाया जाता है । लगाए जानेवाले खजूर को पिंड खजूर कहते हैं । इसका पेड़साठ सत्तर हाथ ऊँचा होता है और जब छह वर्ष के ऊपर का हो जाता है, तब उसके नीचे जड़ के पास बहुत से छोटे छोटे अंकुर निकलते है । इस प्रकार के खजूर सिंध, पंजाब गुजरात और दक्षिण में अधिक होते हैं । वहाँ इनकी खेती की जाती हैं । पौधें बीज से और जड़ के पास के अंकुरों से उत्पन्न किए जाते हैं । पेड़ लगाने के लिये बलुई, दोमट और मटियार सब प्रकार की भूमि काम में लाई जा सकती है? पर पृथिवी में खार का कुछ अंश अवश्य होना चाहिए । तीन तीन से छह वर्ष तक के अंकुर मुख्य पेड़ के पास से खोद लिए जाते हैं और उनकी बड़ी पत्तियाँ काटकर फेंक दी जाती हैं । फिर इन पौधों को तीन फुट गहरे और चौड़े गड्डों में दो ढाई सेर खली मिली हुई खाद के साथ बैठाते हैं । जब पौधा आठ वर्ष से अधिक पुराना होता है, तब वह फलने लगता है । माघ फागुन में बालियाँ निकलती हैं । ये बालियाँ पत्ते के आवरण में लिपटी रहती हैं और पीछे बढ़कर फूल की घौद हो जाती हैं । फल बड़े बड़े घौद में लगते है । जबतक फल पक नहीं जाते, बराबर अधिक पानी देने की आवश्यकता पड़ती है । फल पकने के समय पीले होते हैं । फिर फूल आते है और अंत में लाल हो जाते हैं । इन फलों को छुहारा कहते हैं । सिंधु में पेड़ के पके को खुरमा औऱ पकने के पहले तोड़े हुए फल को छुहारा कहते हैं । इनकी अनेक जातियाँ है, पर नूर आदि अच्छी मानी जाती है । खजुर की लकड़ी बँडेर के काम आती है और इससे पुल भी बनाया जाती है । इसकी पत्तियों के डंठल से घर छाए जाते है और उनकी छड़ी भी बनाई जाती है । इसकी छाल से एक प्रकार की लाल बुकनी निकलती है, जिससे 'चमड़ा रँगा जाता है इसकी छाल चमड़ा सिझाने के भी काम आती है । इससे एक प्रकार का गोंद भी निकलता है, जिसे 'हुकुमचिल' कहते हैं और जो दवा के लिये काम आता है । इसकी नरम पत्तियाँ, जिन्हे गाछी कहते है, सुखाकर रखी जाती है और उनकी तरकारी बनाई जाती है । इसकी छाल के रेशे से रस्सी बटी जाती है । अरब में इसके फूल की बाली आवरण से, जिसे 'तर' कहते हैं, एक प्रकार का गुलाब या केवड़े की तरह का अर्क निकाला जाता है । वैद्यक में इसका फल पुष्टिकारक, वृक्ष वातपित्तनाशक, कफघ्न रूचिकर और अग्निवर्धक माना गया है । २. एक प्रकार की मिठाई जो आटे घी और शक्कर मिलाकर गूँथकर बनाई जाती है । यह खाने में खसखसी और स्वादिष्ट होती है ।

खजूर छड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० खजूर + छड़ी] एक प्रकार का रेशमी कपड़ा जिसपर खजूर की पत्तियों की तरह छाड़ियाँ या धारियाँ होती हैं ।

खजूरा †
संज्ञा पुं० [हिं० खजूर] १. फूस से छाई हुई छत की बँडेर जो प्रायः खजूर की होती है । मँगरा । २. दे० 'कनखजुरा' ।

खजूरी (१)
वि० [हिं० खजूर + ई] (प्रत्य०)] १. खजूर संबंधी । खजूर का । २. खजूर के आकार का । खजूर की तरह का । ३. तीन लर का गूँथा हुआ । जैसे,—खजूरी चोटी, खजूरी डोरा ।

खजूरी पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० खजूर] खजूर का फल । खजूर । उ०—कोइ बिजौर करौंदा जूरी । कोइ अमिली कोई महुअ खजूरी ।—जायसी (शब्द०) । ३. दे० 'खजूर' उ०—कीन्हेसि तरिवर तार खजूरी ।—जायसी ग्रं०, पृ० १ ।

खजोहरा
संज्ञा पुं० [सं० खर्जु + घर, प्रा० खज्जु + हर] एक तरह का रोएँदार कीड़ा जिसके शरीर पर रेंगने या छू जाने से खुजली होने लगती है । उ०—डाल पर बड़ा सा था खजोहरा ।—कुकुर०, पृ० ४३ ।

खज्योति
संज्ञा पुं० [सं०] खद्योत । जुगनू [को०] ।

खट (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. कफ । बलगम । २. अंधा कूआँ । ३. घूसा । मुक्का । ४. एक प्रकार की सुगंधित घास । ५. कुल्हाड़ी । ६. हल ।

खट (२)
संज्ञा पुं० [सं० षट्] १. षाडव जाति का एक राग । विशेष—यह दीपक राग का पुत्र माना जाता है । इसके गाने का समय प्रातः काल एक दंड से पाँच दंड तक है । इसमें मध्य स्वर वादी होता है । कोई कोई इसे आसावरी, ललित टोडी, भैरवी आदि रागिनियों से उत्पन्न संकर राग मानते हैं । २. षट् । छह की संख्या । उ०—(क) येक बार रहस्युँ खट मास ।—बी० रासो, पृ० ३९ । (ख) खट सरदार नमीठ खडग्गे ।—रा० रू०, पृ० २७६ ।

खट (३)
संज्ञा पुं० [अनु०] दो चीजों के परस्पर टकराने या किसी कड़ी चीज के टूटने से उत्पन्न शब्द । यौ०—खटखट । खटपट । खटाखट । मुहा०—खट से = तुरंत । तत्काल । जैसे—जरा याद दिलाते ही उसने खट से रुपए गिन दिए । उ०—दोनों छम्मीजान के साथ साथ पाटेनाले पर किसी हाफिज जी के बइतुल लुत्फ में खट से जा पहुँचे ।—फिसाना०, भा०१, पृ० ८ ।

खट (४)
संज्ञा पुं० [हिं०] खाट शब्द का समास में व्यवहृत रूप । जैसे—खटमल, खटवारी, छपरखट आदि ।

खटक (१)
संज्ञा स्त्री० १. खटकना का भाव । २. खटका ।

खटक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शादी विवाह करनेवाला । घटक । २. आधी खुली मुट्ठी । ३. घूसा । मुष्टि [को०] ।

खटकना
क्रि० अ० [अनु०] २. 'खट' 'खट' शब्द होना । खचख— टाहट होना । जैसे, किवाड़ खटकना । २. शरीर में किसीकाँटे आदि के गड़ने या कंकरी, तिनका आदि बाहरी चीजों के आ पड़ने के कारण रह रहकर पीड़ा होना । जैसे,—पैर में काँटा खटकना या आँखों में सुरमा खटकना । ३. बुरा मालूम होना । खलना । जैसे—तुम्हारा यहाँ रहना सब को खटकना है । दे० 'आँख' में खटकना । ४. विरक्त होना । उचटना । हटना । जैसे,—अब तो हमारा जी यहाँ से खटक गया । ५. डरना । भय करना । जैसे, —वह यहाँ आते हुए खटकते हैं । ६. परस्पर झगड़ा होना । आपस में लड़ाई होना । जैसे,—आजकल दोनों भाइयों में खटक गई है । ७. किसी प्रकार के अनिष्ट या अपकार का अनुमान होना । अनिष्ट की भावना या आशंका होना । जैसे,—हमें यह बात उसी समय खटकी थी; पर कुछ सोचकर हम चुप रह गए । ८. अनुपयुक्त जान पड़ना । ठीक न जान पड़ना । जैसे,—यह शब्द कुछ खटकता है, बदल दो । संयो० क्रि०—जाना ।

खटकनि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० खटकना] खट खट । खट खट करती हुई आवाज । उ०—खटकनि ढालन की अरु झनकन तरवा— रन ।—प्रेमघन०, भा०१, पृ० १३ ।

खटकरम पु
संज्ञा पुं० [सं० षट्कर्म] दे० 'षट्कर्म' । उ०—ज्ञानहीन के सुन खटकरमा । धर्मदास उनके ये धर्मा ।—कबीर सा०, पृ० ८१९ ।

खटकरमा †पु
वि० षट्कर्म करनेवाला । षटराग फैलानेवाला ।

खटकर्म
संज्ञा पुं० [सं० षट्कर्म] दे० 'षट्कर्म' । उ०—हमके तुमके सबके छूई एह खटकर्म बनाई ।—सं० दरिया, पृ० ९३ ।

खटका
संज्ञा पुं० [हिं० खटकना] १. 'खट खट' शब्द । जैसे, जरा सा खटका होते ही पक्षी उड़ गए २. डर । भय । आशंका । उ०—अब कोई खटका नहीं है; बासमती कुछ कर नहीं सकती ।—अयोध्या (शब्द०) । क्रि० प्र०—लगना ।—मिरना ।—होना ।—पड़ना ।—होना । ३. चिंता । फिक्र । जैसे,—तुम्हारे न आने के कारण रात भर सबको खटका लगा रहा । क्रि० प्र०—लगना ।—मिटना ।—होना ।—पड़ना । ४. किसी प्रकार का पेंच, कील या कमानी, जिसको सहायता किसी प्रकार का आवरण खुलता या बंद होता हो अथवा इसी प्रकार का और कोई कार्य होता हो । जैसे,—(क) खटका दबाते ही दरवाजा खुल गया । (ख) खटका दबाते ही सारे कमरे में बिजली का प्रकाश हो गया । क्रि० प्र०—दबाना । मुहा०—खटके पर होना = खटके के सहारे रहना । जैसे— 'कमर' के बीच खटके पर एक चौकोर पत्थर था, जो ऊपर से दबाते ही नीचे की ओर झुलने लगा ।' ५. किवाड़े की सिटकिनी । बिल्ली । क्रि० प्र०—गिराना ।—लगाना । ६. बाँस का वह टुकड़ा जो फलदार वृक्षो में पक्षियों को डराकर उड़ाने के लिये बाँधा जाता है । इसके नीचे जमीन तक लटकती हुई एक लंबी रस्सी बंधी रहती है, जिसे हिलाने या झटका देने से वह टुकड़ा किसी डाल या तने से टकराकर 'खट' 'खट' शब्द करता है । खटखटा । खड़खड़ा । क्रि० प्र०—लगाना । बाँधना ।

खटकाना
क्रि० स० [हिं० खटकना] १. 'खट' 'खट' शब्द करना । किसी वस्तु पर इस प्रकार आघात करना जिसमें खट खट शब्द हो । जैसे,—किवाड़ खटकाना, जंजीर खटकाना । २. शंका उत्पन्न करना । भड़काना (क्व०) । ३. बिगाड़ करा देना । झगड़ा करा देना ।

खटकामुख
संज्ञा पुं० [सं०] १. नृत्य में एक प्रकार की चेष्टा । २. तीर चलाने का एक आसन । ३. बाण चलाने के समय हाथों की मुद्रा (को०) ।

खटकीड़ा, खटकीरा
संज्ञा पुं० [हिं० खाट + कीरा] दे० 'खटमल' ।

खटकना पु
क्रि० सं० [हिं० खटकना] दे० 'खटकना' । उ०— खटक्कै खटं सो विहू सूर वारे ।—प०, रासो, पृ० ८२ ।

खटक्किका
संज्ञा स्त्री० [सं०] गवाक्ष । खिड़की [को०] ।

खटक्रम पु †
संज्ञा पुं० [सं० षट् कर्म; प्रा० खटक्रम्म] दे० 'षट्' कर्म । उ०—खटक्रम सहित जे विप्र होते हरि भगति चित दृढ़ नाहीं रे ।—रै० बानी, पृ० ४१ ।

खटखट
संज्ञा पुं० [अनु०] १. 'खट' 'खट' शब्द । २. झंझट । झमेला । जैसे—इस काम में बड़ी खटखट है; यह हमसे न होगा । ३. लड़ाई । झगड़ा । जैसे,—रात दिन की खटखट बुरी होती है ।

खटखटा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'खटका—६' ।

खटखटाना
क्रि० स० [अनु०] १. खट खट शब्द करना । किसी वस्तु को ठोंकना या पीटना । खड़खड़ाना । जैसे—दरवाजा या कुंडी खटखटाना । स्मरण करना । याद दिलाना । जैसे—बीच बीच में उसे खटखाटाए चलो, रुपया मिल ही जायगा ।

खटखटिया †
संज्ञा पुं० [अनु०] खट खट शब्द करनेवाली काठ की चट्टी । कठनहीं । (बोल०) ।

खटखटिया †
वि० [अनु०] दे० 'खटपटिया' (बोल०) ।

खटखादक
संज्ञा पुं० [सं०] १. श्रृगाल । सियार । २. कौआ । ३. पशु । जानवर । ४. शीशे का पात्र या बर्तन । ५. खानेवाला प्राणी [को०] ।

खटना
क्रि० स० [देश० खट्टण] धन उपार्जन करना । कमाना । (पश्चिम) २. अधिक परिश्रम करना । कड़ी मेहनत करना । जैसे—दिन रात खट खट कर तो हमने मकान बनवाया और आप मालिक हनकर आ बैठे । ३. कठिन समय में ठहरे रहना । विपत्ति में पीछे न हटना । १. प्राप्त करना । पाना । उ०—धन वे पुरुष बड़ा पणाधारी, खालक सिरोमण सुजस खटै ।—रघु० रू०, पृ० २४ । ५. ढूढ़ना । खोजना । उ०—खित हुर अपच्छन वीद खटै । किरमाल वहै वरमाल कटै ।—रा०, रू०, पृ० ३६ ।

खटपट
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. अनबन । लड़ाई । झगड़ा । जैसे—(क) उन दोनों में न जाने क्यों खटपट हो गई है । (ख) रोज रोज की खटपट अच्छी नहीं । दो कठोर वस्तुओ के टकराने का शब्द । 'खट खट' का शब्द । उ०—अंग बचाय उछरि पग धरैं । झपटहिं गदा गदा सों लरैं । खटपट चोट गदा फट— कारी । लागन शब्द कोलाहल भारी ।—लल्लु (शब्द०) । ३. झमेला । आल जाल । झझट । बखेड़ा । उ०—ठाकुर कहत कोऊ हरि हरिदास जे वे तिनकौं न व्यापैं जे दुनी के खटपट हैं । ठाकुर श०, पृ० १३ । ४. ऊहापोइ । संशय । उ०— जो मन की खटपट मिटै, चटपट दरसन होय ।—संतबानी भा०१, पृ० ५६ ।

खटखटिया
वि० [हिं० खटपट] लड़ाई करनेवाला । झगडा़लू ।

खटपटी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खटपट—१' । उ०—भीख मागि बरु खाय खटपटी नीक न लागै । भरी गोन गुड़ तजै तहाँ से साँझै भागै ।—पलटू० पृ० ७ ।

खटपद
संज्ञा पुं० [सं० षटपद] दे० 'षट्पद' ।

खटपदी
संज्ञा स्त्री० [सं० षट्पदी] दे० 'षट्पदी' ।

खटपाटी
संज्ञा स्त्री० [हिं० खाट + पाटी] खाट की पाटी । उ०— लचि लाय रही खटपाटी करौट लै मानो महोदधि को तट ज्यों । कटु बोल सुनो पटुता मुख की पदु दै पलटी पलटी पर ज्यों ।—देव (शब्द०) । मुहा०—खटपाटी लेना या लगना = हठ या क्रोध के कारण स्त्रियों का काम धधा छोड़ देना ।

खटपापड़ी
संज्ञा स्त्री० [देश०] करमई नाम का पेड़ जिसे अमली भी कहते हैं ।

खटपूरा
संज्ञा स्त्री० [हिं० खड्ड + पूरा] मिट्टी तोड़कर बराबर करने की मुँगरी ।

खटबुना
संज्ञा पुं० [हिं० खाट + बुनना] खाट या चारपाई आदि बुननेवाला ।

खटभिलावाँ
संज्ञा पुं० [देश०] पियाल नामक वृक्ष जिसमें चिरौंजो होती है ।

खटभेमल
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का छोटा पेड़ । विशेष—यह हिमालय की तराई, आसाम, बंगाल और दक्षिण भारत में होता है । इसकी पत्तियाँ बहुत छोटी छोटी होती हैं और चारे के काम में आति हैं । जेठ से कुआर तक इसमें एक प्रकार के पिले छोटे फूल और तदुपरांत मटर के समान छोटे फल लगते हैं, जो पकने पर काले हो जाते हैं ।

खटमल
संज्ञा पुं० [हिं० खाट + मल = मैल] मटमैले उन्नबी रग का एक प्रसिद्ध कीड़ा जो गरमी में मैली खाटों, कुरसियों और विस्तरों आदि में उत्पन्न होता है । खटकीड़ा । उड़स । विशेष—यह अपने डंक द्वारा मनु्ष्य के शरीर से रक्त चूसता है । यह आकार में प्रायः उरद के दाने के बराबर होता है; और इसके अंडे बहुत छोटे छोटे और सफेद होते हैं । अंडे से निकलने के प्रायः तीन मास बाद यह पूरे आकार का होता है । इसे छूने से बहुत बुरी दुगँध निकलती है । बहुत अधिक गरमी या सरदी में यह मर जाता है ।

खटमली
विव० [हिं० खटमल] खटमल के रंग का । गहरा उन्नाबी या खैरा (रंग) ।

खटमिट्ठा
वि० [हिं० खट्टा + मीठा] कुछ खट्टा और कुछ मीठा । जिसमें खट्टा और मीठा दोनों स्वाद हों ।

खटमीठा
वि० [हिं०] दे० 'खटमिट्ठा ।

खटमुख
संज्ञा पुं० [सं० षट्मुख] दे० 'षट्मुख' ।

खटमुत्ता †
वि० [हिं० खाट + मूतना] खाट पर मूतनेवाला (बालक) ।

खटरस
वि० [सं० षटरस] दे० 'षटरस' ।

खटराग (१)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'षटराग' ।

खटराग (२)
[सं० खटराग = कई चीजों का मेल] १. झंझट । बखेड़ा । उ०—प्यारी की गिलहरी क्या कम खटराग है न कि बच्चों का पालना ।—फिसाना०, भा०, ३, पृ० २९० । क्रि० प्र०—करना ।—फैलाना ।—मचाना । २. अंगड़ खंगड़ । काठ कबाड़ । व्यर्थ और अनावश्यक चीजें । क्रि० प्र०—फैलाना ।

खटरिया
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का कीड़ा ।

खटलर
संज्ञा पुं० [देश०] सान धरनेवालों का एक औजार जो लकड़ी का होता है ।

खटला (१)
संज्ञा पुं० [देश०] स्त्रियों के कानों का छेद जिसमें वे बालियाँ बहनती हैं ।

खटला (२)
संज्ञा पुं० [सं० कलत्र] स्त्री और बाल बच्चे । परिवार । कुटुंब (दक्षिण) ।

खटवाँस †
संज्ञा पुं० [सं० खट्वा + वास] रूसकर खाट पर पड़ जाने की स्थिति । दे० 'खटवाट' । उ०—यहाँ वह खटवाँस लेकर पड़ी अब पकवान कौन बनाये ।—काया०, पृ० १२२ ।

खटवाट पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खटपाटी (२)' । उ०—मैं तोहिं लागि लेति खटवाटू । खोजति पतिहि जहाँ लगि घाटू ।— जायसी (शब्द०) ।

खटवाटी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खटपाटी' ।

खटाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० खट्टा] १. खट्टापन । अम्लता । तुरशी । २. वह वस्तु जिसका स्वाद खट्ठा हो । जैसे, आम, इमली आदि । मुहा०—खटाई देना या खटाई में देना = गहने आदि को साफ करने के लिये खटाई में रखना । खटाई में डालना = बहुत दिनों तक व्यर्थ किसी चीज या काम को लेकर लटकाए रखना । झमेले में डालना । दुविधा में डालना । कुछ निर्णय न करना । खटाई में पड़ना = दुबिधा में पड़ना । अनिशिचत दशा में होना । विशेष—सोनारों को जब चीज बनाने को दी जाती है, तब तकाजा करने पर वे कभी कभी कह देते हैं कि वह अभी खटाई में पड़ी है ।

खटाक
संज्ञा पुं० [अनु०] दे० 'खटाका' । मुहा०—खटाक से = दे० 'खट से' । उ०—लगे किवाड़ों को खटाक से खोल जोर से टकराता ।—आर्द्रा, पृ० १२१ ।

खटाका
संज्ञा पुं० [अनु०] 'खट' का शब्द ।

खटाखट (१)
संज्ञा पुं० [अनु०] 'खट खट' का शब्द ।

खटाखट (२)
क्रि० वि० १. खटखट शब्द के साथ । २. चटपट । जैसे,—तकाजा नहीं करना पड़ा; सूरत देखते ही उसने खटाखट रुपए गिन दिए । ३. जल्दी । शीघ्र ।

खटाना (१)
क्रि० अ० [हिं० खट्टा] किसी वस्तु में खट्टापन आ जाना । खट्टा होना । जैसे,—सिरके का खटाना ।

खटाना (२)
क्रि० अ० [सं० स्कभ,> स्कब्ध, प्रा० खड्ड = ठहरा हुआ] १. निर्वाह होना । गुजारा होना । टिकना । निभना । उ०—(क) सहज एकाकिन के भवन, कबहुँ न नारि खटाहिं । —तुलसी (शब्द०) । (ख) ज्यों जल मीन कमल मधुपन को छिन नहिं प्रीति खटाति ।—सूर (शब्द०) । २. परीक्षा में ठहरना । उ०—जो मन लागै रामचरन अस । ....... द्वद्वरहित गतमान ज्ञानरत विषयाविरत खटाय नाना कस ।—तुलसी (शब्द०) ।

खटाना (३) †
क्रि० स० [हिं० खटना] श्रम में प्रवृत्त करना । मेहनत कराना ।

खटापट
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खटपट' ।

खटापटी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खटपट' ।

खटमिठा
वि० [हिं०] दे० खट्टा मिठ्ठा । उ०—खावते जुग सब चलि जावे । खटामिठा फिर पछतावे ।—दक्खिनी०, पृ० १०५ ।

खटारना पु
क्रि० स० [सं० क्षालन या देश०] पखारना । धोना । उ०—इतना करि तब चरण खटारो । होय अधीन तब मन को मारो ।—कबीर सा०, पृ० ५५८ ।

खटाल † (१)
संज्ञा पुं० [बँ० कटाल] समुद्र की ऊँची लहर जो पूर्णिमा के दिन उठती हैं ।

खटाल † (२)
संज्ञा पुं० [देश०] वह स्थान या घेरा जहाँ गाय भैंस आदि रखी जाती है ।

खटाव (१)
संज्ञा पुं० [हिं० खटाना] निर्वाह । गुजर । जैसे,—तुम्हारी ऐसी बुरी आदत है कि किसी के साथ तुम्हारा खटाव नहीं हो सकता । २. खटने या श्रम करने की स्थिति । ३. खट्टापन । खटास ।

खटाव (२)
संज्ञा पुं० [देश०] वह खूँटा जिसे गाड़कर नाव बाँधते हैं ।

खटास (१)
संज्ञा पुं० [सं० खट्वाश] मुशकबिलाई । गंधाबिलाव ।

खटास (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० खट्टा] खट्टापन । खटाई । तुरशी ।

खटिक (१)
संज्ञा पुं० [सं० खटिटक] [स्त्री० खटकिन] हिंदुओं के अंतर्गत एक छोटी जाति जिसका काम फल तरकारी आदि बोना और बेचना है । बुदेलखंड में इस जाति के लोग भंग औग बिहार में ताड़ी भी बेचते हैं ।

खटिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] अर्धविकसित हस्ताग्र । आधी खुली मुठ्ठी [को०] ।

खटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दे० 'खड़िया' । उ०—सेष सुकृति, सुचि, सत्वगुन, संतनि के मन हास । सीपि चून, भोड़र फटिक, खटिका फेन प्रकाश ।—केशव ग्रं०, भा०१, पृ० ११२ । २. कान का बाहरी छिद्र । कान का छेद (को०) ।

खटिकायुग
संज्ञा पुं० [सं० खटिका + युग] खटिका नामक एक धातु— विशेष का काल या युग । उ० —द्वितीय कल्प के अंतिम भाग खटिका युग से एक भारी भूकंपों का सिलसिला शुरू हुआ ।— भारत० नि०, पृ० १९ ।

खटिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] खड़िया [को०] ।

खटिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० खाट + इया (प्रत्य०)] छोटी चारपाई या खाट । खटोली । मुहा०—खटिया मचमचातो निकलना = मृत्यु प्राप्त करना । मृत्यु की स्थिती को प्राप्त करना (स्त्रियां) । उ०—अल्ला करे अठवारे ही खटिया मचनचाती निकले ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० २२८ । विशेष—इस शब्द के मुहावरों के लिये 'खाट' शब्द देखें ।

खटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] खड़िया [को०] ।

खटीक पु
संज्ञा पुं० [हिं० खटिक] १. दे० 'खटिक (१)' । २. कसाई । बकरकसाई । उ०—कबीर गाफिल क्या करै आया काल नजीक । कान पकरि के लै चला, ज्यों अजयाहिं खटिक ।— कबीर सा०, सं०, पृ० ७९ ।

खटुली
संज्ञा स्त्री० [हिं० खटोला का अल्पा०] खटोली । खटिया । (बोल०) ।

खटेटी †
वि० [हिं० खाट + एटी(प्रत्य०)] जिसपर बिछौना न हो । जैसे—खटेटी खटिया ।

खटोलना
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'खटोला' । उ०—चंदन खाट को बनल खटोलना तापर दुलहिन सूतल हो ।—कबीर श०, पृ० २ ।

खटोला (१)
संज्ञा पुं० [हिं० खाट + ओला (प्रत्य०)] [स्त्री० अल्पा० खटोली] छोटी खाट या चारपाई । यौ०—उड़न खटोला ।

खटोला (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्राचीन देश का नाम जो बुँदेलखंड़ के अंतर्गत था । यहाँ भीलों की वस्ती अधिक थी । वर्तमान सागर, दमोह आदि जिले उसी के अंतर्गत हैं । उ०—पूछो जहाँ कुंड़ औ गोला । तजि बायें अँधियार खटोला ।—जायसी (शब्द) ।

खटोली
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खटोला (१)' ।

खट्ट
वि० [सं०] खट्टा [को०] ।

खट्टक
संज्ञा पुं० [सं०] खट्वा । चारपाई ।

खट्टन (१)
वि० [सं०] नाटा । खर्व । ठिंगना ।

खट्टन (२)
संज्ञा पुं० बौना व्यक्ति । ठिंगना आदमी [को०] ।

खट्टना पु †
क्रि० स० [देश०] उपार्जन करना । जीतना ।—रा० रू०, पृ० १९९ ।

खट्टा (१)
वि० [सं० कटु] कच्चे आम, इमली आदि के स्वाद का । तुर्श । अम्ल । मुहा०—खट्टा होना = अप्रसन्न् होना । नाराज होता । खट्टा खाना = अप्रन्न रहना । मुँह फुलाना । जी खट्टा होना = चित्त अप्रसन्न होना । दिल फिर जाना । यौ०—खट्टाचूक । खट्टामीठा । खट्टामिठा ।

खट्टा (२)
संज्ञा पुं० [ हिं० खट्टा] नीबू की जाति का ए क बहुत छोटा फल जिसे गलगल भी कहते हैं ।

खट्टा (३)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पलंग । चारपाई । २. एक प्रकार का तृण (को०) ।

खट्टाचूक
वि० [हिं० खट्टा + चूक] बहुत अधिक खट्टा ।

खट्टामीठा
वि० [हिं० खट्टा + मीठा] कुछ खट्टा और कुछ मीठा खाटमिठ्ठा । मुहा०—जी खट्टामीठा होना = मुँह में पानी भर आना । जी ललचना ।

खट्टाश
संज्ञा पुं० [सं०] गंधविलाव । खटास [को०] ।

खट्वाशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मादा गंधबिलाव [को०] ।

खटि्ट
संज्ञा स्त्री० [सं०] अरथी, जिसपर शव ले जाते हैं [को०] ।

खट्टिक
संज्ञा पुं० [सं०] १. कसाई । पशुधातक । २. शिकारी । बहेलिया । ३. भैंस के दूध का मक्खन (को०) ।

खटि्टका
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटी चारपाई । खटिया । २. अरथी । ३. कसाइन । कसाई की स्त्री [को०] ।

खट्टी
संज्ञा स्त्री० [हिं० खट्टा] १. खट्टी नारंगी । २. एक प्रकार का बड़ा नीबू जिसका अचार पड़ता है और जो बहुत अधिक खट्टा होता है ।

खटटीमिट्ठी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'खट्टीमीठी' ।

खट्टीमीठी
संज्ञा स्त्री० [हिं० खट्टी + मीठी] एक प्रकार का लता ।

खट्टू (१)
संज्ञा पुं० [देश०] जैसलमेर में होनेवाला एक प्रकार का संग मरमर, जिसका रंग पीला होता है ।

खटटू (२)
संज्ञा पुं० [पं० खटना = रुपया पैदा करना] कमानेवाला । निखटटु का उलटा ।

खट्टेरक
[सं०] खर्व । ठिंगना [को०] ।

खट्वर
वि० [सं०] खट्टा । तुर्श [को०] ।

खट्वांग
संज्ञा पुं० [सं० खट्वाङ्ग] १. एक सुर्यवंशीय पौराणिक राजा का नाम, जिसका वर्णन भागवत में आया है । २. चारपाई का पाया या पाटी । ३. शिव के एक अस्त्र का नाम । यौ०—खट्वांगधर । खट्वांगभृत = दे० 'खट्वांगी' । ४. एक प्रकार का पात्र जिसमें प्रायश्चित्त करते समय भिक्षा माँगी जाती है । ५. तंत्र के अनुसार एक प्रकार की मुद्रा जिससे देवता बहुत प्रसन्न होते है ।

खट्वांगी
संज्ञा पुं० [सं० खट्वाङ्गिन] शिव [को०] ।

खट्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. खटिया । चारपाई । सुश्रुत के अनुसार फोड़ा आदि बाँधने की १४ प्रकार की पट्टियों में से एक, जिसका व्यवहार माथे या गले आदि को बाँधाने के लिये किया जाता है । ३. दोला । झूला (को०) ।

खट्वाका
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटी खटिया [को०] ।

खट्वाप्लुत
वि० [सं०] दे० 'खट्वारूढ़' [को०] ।

खट्वारूढ़
वि० [सं०] १. खाट पर पड़ा हुआ । पथभ्रष्ट । २. नौच कुत्सित । ३. पामर । दुर्जन । ४. मंदबुद्धि । जड़मति [को०] ।

खटविका
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटी खाट [को०] ।

खड़ंजा
संज्ञा पुं० [हिं० खड़ा + अंग] ईटों की खड़ी चुनाई । खड़ी ईटों का जोड़ना । (ऐसी जोड़ाई फर्श पर होती है ।) क्रि० प्र०—जोड़ना ।

खड़
संज्ञा पुं० [सं० खड] १. धान की पेड़ी । पयाल । तृण । घास । उ०—आप लोग बाँस, खड़, सुतली और दूसरा दरकारी चीज का इंतजाम कर देगा ' ।—मैला० पृ० ५ । ३. श्योनाक । ४. एक ऋषि का नाम । ५. चाँदी, सोने आदि की बुकनी, जिसकी सहायता से गिलट की हुई चीजों पर जिला करते हैं ।

खड़क
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'खटक' ।

खड़कना
क्रि० अ० [अनु०] [संज्ञा खड़खड़ाहट] 'खड़खड़' शब्द होना । वि० दे० 'खटकना' ।

खड़का
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'खटका' ।

खड़काना
क्रि स० [हिं०] दे० 'खटकाना' ।

खड़क्किका
संज्ञा स्त्री० [सं०] गवाक्ष । खिड़की [को०] ।

खड़क्की
संज्ञा स्त्री० [सं०] झरोखा । खिड़की [को०] ।

खड़खड़
संज्ञा स्त्री० [अनु०] दे० 'खटखट' ।

खड़खड़ा
संज्ञा पुं० [अनु०] १. दे० 'खटखटा' या 'खटका'—६ । २. काठ का एक प्रकार का ठाँचा जिसमें जोतकर गाड़ी के लिये घोड़े सधाए या निकाल जाते है ।

खड़खड़ाना (१)
क्रि० अ० [हिं० खड़खड़] खड़खड़ शब्द करना । जैसे,—बाग में सूखी पत्तियाँ खड़ाखड़ा रही हैं ।

खड़खड़ाना (२)
क्रि स० किसी वस्तु में खड़खड़ शब्द उत्पन्न करना । जैसे,—वह कुंड़ी खड़खड़ा रहा है ।

खड़खड़ाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० खड़खड़ाना] १. 'खड़खड़' शब्द । २. खड़खड़ाना भाव या क्रिया ।

खड़खड़िया
संज्ञा स्त्री० [हिं० खड़खड़ाना] १. पालकी जिसे चार कहार उठाते है । पीनस । २. काठ का गाड़ीनुमा वह ढाँचा जिसमें जोतकर नए घोड़ों को गाड़ी खींचने योग्य बनाया जाता है ।

खड़ग पु
संज्ञा पुं० [सं० खड्ग] दे० 'खड्ग' ।

खड़गी पु (१)
वि० [सं० खडगिन्] तलवार लिए हुए । तलवारवाला ।

खड़गी पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० खड्गी] गैंडा नामक जंतु ।

खड़नी
संज्ञा पुं० [सं० खड्गी] दे० 'खड़गी' । उ०—खड़जी खजाने, खरगोस खिलवतखाने, खोले खसखाने खाँसत खबीस हैं ।— भूषण (शब्द०) ।

खड़ना (१)पु †
क्रि० अ० [सं० खेटन, प्रा० खेटणउ] चलना । गमन करना । उ०—(क) ढोलउ पूगल पंथसिरि आणँद अधिक खड़ंति ।—ढ़ोला०, दू० ४२३ । (ख) पहला दल पेशोर थी, खड़ आया लाहौर ।—रा० रू०, पृ० २६ ।

खड़ना (२)पु †
क्रि० स० चलाना । चलने के लिये प्रेरित करना । हाँकना । उ०—(क) इसवर सीय सेस चढ़े रथ ऊपर । तहक सारथी खड़े तुरंग ।—रघु० रू०, पृ १०९ । (ख) खेतासर फिर राव खिसांणौ । वल खड़िया देखवा सिवाँणो ।—रा० रू०, पृ० ६२ ।

खड़बड़
संज्ञा स्त्री० [अनु०] १. खड़खड़ । खटखट । २. व्यतिक्रम । गड़बड़ । उलटफेर । ३. हलचल । ४. दे० 'खटपट' ।

खड़बड़ाना (१)
क्रि० अ० [अनु०] १. विचलित होना । घबराना । उ०—छत्री खेत बोहारिया, चढ़ा दई की गोद । कायर कापैं खड़बड़ै, सूरा के मन मोद ।— दरिया० बानी, पृ० ११ । २. क्रमहीन होना । बेतरतीब होना ।

खड़बड़ाना (२)
क्रि० स० १. किसी वस्तु को उलट पलटकर 'खड़बड़' शब्द उत्पन्न करना । २. क्रमविहीन करना । उलट फेर करना । ३. विचलित करना । घबरा देना ।

खड़बड़ाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० खड़बड़ाना] 'खड़बड़ाना' का भाव । खड़बड़ी ।

खड़बड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० खड़बड़ाना] १. व्यतिक्रम । उलटफेर । २. हलचल । घबराहट ।

खड़बिड़ा
वि० [हिं० खड्ड + सं० विघट, प्रा बिहड़] ऊँचा नीचा । असमतल ।

खड़बोहड़ †
वि० [हिं०] दे० 'खड़बिड़ा' ।

खड़भड़
क्रि० वि० [अनु०] अस्तव्यस्त । इतस्ततः । उ०—हरि पाखैं नहिं कहूँ ठाँम । पीव बिन खड़भड़ गाँव गाँव ।—दादू०, पृ० ६५१ ।

खड़मंडल
संज्ञा पुं० [सं० खण्ड + मण्डल] १. गड़बड़ । घोटाला । २. अस्तव्यस्त । इतस्ततः ।

खड़सान
संज्ञा पुं० [हिं० खरसान] दे० 'खरसान' ।

खड़हड़
क्रि० वि० [अनु०] आवाज करती हुई । धडा़मसे । धमाके के साथ । उ०— ऊभी थी खड़हड़ पडी़, जाणे उसी भुयंगि ।— ढोला० दू० २३९ ।

खड़हड़ता पु †
वि० [प्रा० खड़हड़ ] व्यग्र । हिलता डुलता । कंपित । उ०— सो थांभै भुजडंड सूँ,खड़हड़तो ब्रहमंड । —बांकी ग्रं०, भा० १, पृ० ६ ।

खड़हड़ना पु †
क्रि० अ० [अनु०] खटकना । गड़ना । चुभना । उ०— गया गलंती राति परजलती पाया नहीं । सं० सज्जण परभाति, खड़हड़िया खुरसाँण ज्यूँ । — ढोला०, दू० ३८० ।

खडा़
वि० [सं० खडक = खम्भा, थूनी ] [वि० स्त्री० खडी़] १. धरा— तल से समकोण पर स्थिति । सीधा ऊपर को गया हुआ । ऊपर को उठआ हुआ । जैसे, — खडी़ लकीर, खडा़ बाँस, झंडा खडा़ करना । क्रि० प्र०—करना ।—रखना ।—रहना ।—होना । २. जो (प्राणी) पृथ्वी पर पैर रखकर टाँगों को सीधा करके अपने शरीर को ऊँचा किए हो । दडायमान जैसे, — इतना सुनते ही वह खडा़ हो गया और चलने लगा । क्रि० प्र० —करना ।—रहना ।—होना । मुह० —खडा़ जवाब = तुरंत अस्वीकार । वह इनकार जो चटपट किया जाय । खडा़ दाँव = जूए का वह दाँव जो जुआरी उठते उठाते समय लगाते हैं । खडा़ होना = (१) सहायता देना । मदद करना । जैसे,—कोई किसी की विपति में नहीं खडा़ होता । (२) किसी चुनाव में उम्मीदवार होना । खडी़ पछाड़े खाना = क्रोध या शोक से पृथ्वी पर गिर पड़ना । खड़ी लगाना = सिर्फ पाँव के सहारे खड़े तैरना । उ०—पानी ने बीस कदम पीछे हटा दिया । कभी मल्लाही चीरते थे, कभी खड़ी लगाते थे ।—फिसाना०, भा०, ३, पृ० १३० । खड़ी सवारी = (किसी के आवागमन के सबंध में व्यंग्यार्थ प्रयुक्त) तुरंत । झटपट । शीघ्र । खड़े खड़े = (१) खड़े रहने की दशा में । जैसे,—खड़े खड़े पानी मत पीओ । (२) तुरंत । झटपट । जैसे,—यों खड़े खड़े कोई काम नहीं होता । खड़े घाट = (१) एक दिन के भीतर ही कराई जाने— वाली कपडों की धुलाई । (२) झटपट । तुरंत । ढके पाँव = (१) बीच में बिना रूके या बैठे । (२) झटपट । तुरंत । खड़े बाल निगलना = अत्यंत हानि कर काम करना । अनुचित काम करना । उ०—खड़े बाल निगलनेवाले हैं ।—चुभते०, पृ० ४ । ३. ठहरा हुआ । टिका हुआ । रूका हुआ । स्थिर । जैसे,—इस तरह यहाँ दीवार सब तक खड़ी रहेगी । ४. प्रस्तुत । उप— स्थित । उत्पन्न । तैयार । पैदा । जैसे,—दाम खड़ा करना झगडा़ खड़ा करना, मामला खड़ा करना । जैसे,—(क) उसने अपना दाम खड़ा कर लिया । (ख) उसने बीच में एक नई बात खड़ी कर दी । ५. संनद्ध । उद्यत । तैयार । जैसे,— (क) जिस काम के लिये आप खड़े होंगे, वह कयों न होगा । (ख) बात समझते नहीं, लड़ने की खड़े हो जातो हो । मुहा०—खड़ा दोना = मिठाई आदि जो किसी पीर को चढा़ई जाय । ६. आरंभ । जारी । जैसे,—काम खड़ा करना । ७. (घर, दीवार आदि ऊँची वस्तुओं के विषय में) स्थपित निर्मित । उठा हुआ । जैसे,—इमारत खड़ी करना, तंबू खड़ा करना । मुहा०—खड़ा करना = ठाँचा खड़ा करना । स्थूल रूप से आकार आदु बनाना । जैसे,—तुम्हारा कुरता खडा़ कर चुके हैं, सीना बाकी है । ८. जो उखाडा़ न गया हो । जो काटा न गया हो । जैसे,—खड़ी फसल, खडा़ खेत । ९. बिना पका । असिद्ध । कच्चा । जैसे,— खडा़ चावल । १०. समूचा । पूरा । जैसे,—खडा़ चना चबाना । ११. जिसमें गति न हो । ठहरा हुआ । स्थिर । जैसे,—खडा़ पानी । क्रि० प्र०—करना ।—रहना ।—होना ।

खडा़ऊँ
संज्ञा स्त्री० [हिं० काठ + पाँव या 'खटखट' अनु०] पैर में पहनने के लिये तलुए के आकार की, काठ की पटरी । इसमें आग की ओर एक खूँटी लगी होती है, जिसे पहनने के समय पैर के अँगूठे ओर उसके पास की उँगली में अटका लेते हैं । पादुका ।

खडा़का (१)
संज्ञा पुं० [अनु०] १. खड़ खड़ शब्द । खटका । २. आघात । रव । प्रतिध्वनि । दकराहट । उ०—जीरन के ऊपर खडा़के खड़गन के ।—भूषण ग्रं०, पृ० ३३० ।

खडा़का (२)
क्रि० वि० चटपट । शीघ्रता से ।

खडादसरंग
संज्ञा पुं० [देश०] कुश्ती का एक पेंच ।विशेष—इसमें प्रतिद्वंद्वी की जाँघ में अपना हाथ अडा़कर उसी के बल के उसके उस हाथ को, जो अपने पेट पर हो, दबाकर उसकी पीठ पर जाना और उसे मरोड़ा दोकर गिराना पड़ता है । इसे हनुमंत बंध भी कहते हैं ।

खडा़नन पु
संज्ञा पुं० [सं० षडानन] दे० 'षडानन' ।

खडा़ पठान
संज्ञा पुं० [देश०] जहाज के पिछले भाग का मस्तूल ।— (लश०) ।

खड़िका
संज्ञा स्त्री० [सं० खडिका] खड़िया [को०] ।

खड़िया (१) †
संज्ञा स्त्री० [हिं० खरिया] रुपया पैसा रखने की थैली । उ०—ता पाछे जब वैषेणवन जाइबे की कहे तब कृष्ण भट रात्रि कों उनकी गाँठ खड़िया खौलि खरची बाँधि देतै ।—दो सौ० बावन०, भा० १, पृ० २७ ।

खड़िया (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० खटिका, खड़िका] एक प्रकार की सफेद मिट्टी या पत्थर की जाति का एक बहुत मुलायम सफेद पदार्थ । विशेष—यह जमीन के अंदर शंख, घोंघे आदि जानवरों की हडिडयों के चूने से आप ही आप जमकर बनता है । खड़िया इंगलैड में लंडन के आसपास और फ्रांस के उत्तरी भाग में बहुत होती है । इससे दीवारों पर चूने की भाँति सफेदी की जाती है और अनेक प्रकार की धातुएँ साफ की जाती हैं । प्रायः काले तख्तों पर इससे लिखा बी जाता है । यह कई प्रकार की होती है । २. एक प्रकार की खड़िया जो बहुत कडी़ होती है । खरिया । खड़ी । छुही । उ०—मोरियों पर ढकने के लिये सक्खर का सफेद खड़िया पत्थर काम में आता था ।—हिंदु० सभ्यता, पृ० १९ । विशेष—यह इमारतों में पत्थर के स्थान पर काम आती है । एक और प्रकार की खड़िया काली होती है जो स्लेट के अंतर्गत है । मुहा०—खड़िया में कोयला = बेमेल बात । अच्छे के साथ बुरे का संयोग ।

खड़िया (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० काण्ड या हिं० खडा़] अरहर का वह पेड़ या बडा़ डंठल जिसमें पत्तियाँ या फलियाँ बिलकुल न हों । खाडी़ । रहठा ।

खड़ी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० खडी] खड़िया । खड़िया मिट्टी । छुही ।

खड़ी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० खडा़ = सीधा] १. पहाड़ । पर्वत । २. दे० 'बारहखडी़' ।

खड़ी चढा़ई
संज्ञा स्त्री० [हिं० खड़ी + चढा़ई] बहुत थोडी़ ढाल— वाली सीधी चढा़न की भूमि ।

खड़ी डंकी
संज्ञा स्त्री० [देश०] मालखँभ की एक कसरत ।

खड़ीण †
संज्ञा स्त्री० [देश०] खडुड की सूखी हुई वह जमीन जो जल से जोती बोई जाती है । उ०—जेहल ताल खड़ीण ह्नै, तरवर लाकड़ होय ।—बाँकी० ग्रं०, भा० ३, पृ० १० ।

खड़ी तैराकी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] खडे़ होकर जल में तैरने की क्रिया । खडी़ लगाना ।

खड़ी नियाज
संज्ञा स्त्री० [हिं० खड़ी + फा० नियाज] मनोरथ सिद्ध होने पर की जानेवाली मनौती, प्रार्थना या चढा़वा ।

खड़ी पाई
संज्ञा स्त्री० [हिं०] खड़ी सीधी रेखा (।) जो वाक्य समाप्त होने पर लगाई जाती है । पूर्ण विराम ।

खड़ी बोली
संज्ञा स्त्री० [हिं० खड़ी (या खरी?) + बोली (भाषा)] वर्तमान हिंदी का एक रूप जिसमें संस्कृत के शब्दों की बहुलता करके वर्तमान हिंदी भाषा की और फारसी तथा अरबी के शब्दों की अधिकता करके वर्तमान उर्दू भाषा की सृष्टि की गई है । वह बोली जिसपर ब्रज या अवधी आदि की छाप न हो । ठेंठ हिंदीं । आज की राष्ट्रभाषा हिंदी का पूर्व रूप । इसका इतिहास शताब्दियों से चला आ रहा है । परिनिष्ठित पश्चिमी हिंदी का एक रूप । वि० दे० 'हिंदी' । विशेष—जिस समय मुसलमान इस देश में आकर बस गए, उस समय उनेहें यहाँ की कोई एक भाषा ग्रहण करने की आव— श्यकता हुई । वे प्रायः दिल्ली और उसके पूरबी प्रांतों में ही अधिकता से बसे थे, और ब्रजभाष तथा अवधी भाषाएँ, क्लिष्ट होने के कारण अपना नहीं सकते थे, इसलिये उन्होंने मेरठ और उसके आसपास की बोली ग्रहण की, और उसका नाम खड़ी (खरी?) बोली रखा । इसी खड़ी बोली में वे धीरे धीरे फारसी और अरबी शब्द मिलाते गए जिससे अंत में वर्तमान उर्दू भाषा की सृष्टि हुई । विक्रमी १४वीं शताब्दी मे पहले पहल अमीर खुसरो ने इस प्रांतीय बोली का प्रयोग करना आरंभ किया और उसमें बहुत कुछ कविता की, जो सरल तता सरस होने के कारण शीघ्र ही प्रचलित हो गई । बहुत दिनों तक मुसलमान ही इस बोली का बोलचाल और साहित्य में व्यवहार करते रहे, पर पीछे हिंदुओं में भी इसका प्रचार होने लगा । १५वीं और १६ वीं शताब्दी में कोई कोई हिंदी के कवि भी अपनी कविता में कहीं कहीं इसका प्रयोग करने लगे थे, पर उनकी संख्या प्रायः नहीं के समान थी । अधिकांश कविता बराबर अवधी और व्रजभाषा में ही होती रही । १८वीं शताव्धी में हिंदू भी साहित्य में इसका व्यवहार करने लगे, पर पद्य में नहीं, केवल गद्य में; और तभी से मानों वर्तमान हिंदी गद्य का जन्म हुआ, जिसके आचार्य मु० सदासुख, लल्लू जी लाल और सदल मिश्र माने जाते हैं । जिस प्रकार मुसलमानों ने इसमें फारसी तथा अरबी आदि के शब्द भरकर वर्तमान उर्दू भाषा बनाई, उसी प्रकार हिंदुओं ने भी उसमें संस्कुत के शब्दों की अधिकता करके वर्तमान हिंदी प्रस्तुत की । इधर थोड़े दिनों से कुछ लोग संस्कृतप्रचुर वर्तमान हिंदी में भी कविता करने लग गए हैं और कविता के काम के लिये उसी को खड़ी बोली कहतो हैं ।

खड़ी मसकली
संज्ञा स्त्री० [हिं० खड़ा + अ० मसकला = रेती] रुखानी की तरह का कुंद धार का एक औजार जिससे सिकली करनेवाले बरतन को खुरचकर जिला करते हैं ।

खड़ी सकी
संज्ञा स्त्री० [हिं० खड़ा + देश० सकी] कुश्ती का एक पेंच । विशेष—इसमें बाएँ हाथ से प्रतिद्वंद्वी की दाहिनी कलाई पकड़— कर और दाहिने हाथ से उसकी कुहनी पकड़कर अपनी ओर खींचना, और अपने दाहिने पैर को उसके पैरों में डालकर उसकी पिंडली और एँडी को अपनी ओर खींचते हुए उसकी छाती पर धक्का देकर उसे चित गिरा देना पड़ता है ।

खड़ी हुंडी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] वह हुंडी जिसका रुपया चुकाया न गया हो ।

खडु
संज्ञा पुं० [सं०] अरथी । टिकठी [को०] ।

कडुआ †
संज्ञा पुं० [हिं० कडा़ + उआ (स्वा० प्रत्य०)] हाथ या पाँव में पहनने का कडा़ । चूडा़ ।

खड
संज्ञा स्त्री० [सं०] खडु । अरथी [को०] ।

खडूला †
संज्ञा पुं० [हिं० कडा़ + ऊला (स्वा० प्रत्य०)] दे० 'खडुआ' । उ०—कोई कहे मैं इसका मामा । लाया खा़ड खडूले जामा ।—सहजो०, पृ० २७ ।

खड्ग
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राचीन काल का एक प्रसिद्ध अस्त्र जिसका व्यवहार आजकल केवल पशुओं को बलि देने के लिये होता है । तलवार इसी का एक भेद है । खाँड़ा । २. गैड़ा । ३. एक बुद्ध का नाम । ४. चोर । भटेऊर । एक गंध द्रव्य । ५. तंत्र के अनुसार शक्तिपूजा की एक मुद्रा । ६. लौह । लोहा (को०) । ७. गैडे की सींग (को०) ।

खड्गकोश
संज्ञा पुं० [सं०] खड्ग रखने का म्यान [को०] ।

खड्गट
संज्ञा पुं० [सं०] काँप का एक भेद [को०] ।

खड्गधर
संज्ञा पुं० [सं०] खड्ग धारण करनेवाला व्यक्ति [को०] ।

खड्गधार
संज्ञा पुं० [सं०] बदरिकाश्रम के एक पर्वत का नाम ।

खड्गधारा
संज्ञा पुं० [सं०] तलवार की धार [को०] ।

खड्गधारा व्रत
संज्ञा पुं० [सं०] अत्यंत दुष्कर कार्य [को०] ।

खड्गधारी
संज्ञा स्त्री० [सं० खड्गधारिन्] [स्त्री० खड्गधारिणी] हाथ में खड्ग लिए हुए । खड्गपाणि ।

खड्गधेनु
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. छोटी असि । छुरिका । २. माँदा । गैंडा [को०] ।

खड्गधेनुका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'खड्गधेनु' [को०] ।

खड्गपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्रकार का कल्पित वृक्ष । विशेष—कहते हैं यह वृक्ष यमराज के यहाँ है और इसकी डालियों में पत्तों की जगह तलवारें और कटार आदि लगी हुई हैं । पापियों को यातना देने के लिये इस वृक्ष पर चढा़या जता है । गरबड़ पुराण में इसे असिपत्र भी कहा गया है । २. तलवार की धार (को०) ।

खड्गपाणि
वि० [सं०] खड्गधारी [को०] ।

खड्गपिधान
संज्ञा पुं० [सं०] तलवार का कोश । म्यान [को०] ।

खडगपिधानक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'खड्गपिधान' ।

खड्गपुत्र
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल की एक प्रकार की कटारी जो प्रायः एक हाथ लंबी और दो अंगुल चौडी़ होती थी और जिसका व्यवहार बहुत निकट आए हुए शत्रु पर प्रहार करने के लिये होता था ।

खड्गपुत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'खड्गपुत्र' ।

खड्गप्रहार
संज्ञा पुं० [सं०] तलवार की काट । खड्गाघात [को०] ।

खड्गफल
संज्ञा पुं० [सं०] खड्ग की धार । खड्गधारा [को०] ।

खड्गबंध
संज्ञा पुं० [सं० खड्गबन्ध] खड्ग की आकृति में लिखा गया का