विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/पुर

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पुरंगपु
वि० [सं० पुर] आगे।

पुरंजन
संज्ञा पुं० [सं० पुरञ्जन] १. जीवात्मा। विशेष—भागवत में विस्तृत रूपकाख्यान के रूप में शरीररूपी पूर, उसके नवद्वार, त्वक्ख्पी प्राचीर और उसमें 'पुरंजन' नाम से जीवात्मा के निवास आदि का वणंन किया गया है। २. हरि। विष्णु (को०)।

पुरंजनी
संज्ञा स्त्री० [सं० पुरञ्जनी] बुदिध। मनीषा [को०]।

पुरंजय (१)
वि० [सं० पुरञ्जय] पुर को जीतनेवाला।

पुरंजय (२)
संज्ञा पुं० एक सूर्यवंशी राजा। काकुत्स्थ। विशेष—विष्णु पुराण में लिखा है कि एक बार दैत्यों से हारकर जब देवता विष्णु भगवान् के पास गए तब उन्होंने उनसे राजा पुरंजय के पास जाने के लिये कहा। भगवान् ने अपना कुछ अंश पुरंजय में डाल दिया। पुरंजय ने इंद्र से बैल बनने के लिये कहा। बैल के ककुद (डीले) पर बैठकर पुरंजय ने युदुध किया और दैत्यों को परास्त कर दिया। इसी से उनका नाम काकुत्स्थ पड़ा।

पुरंजर
संज्ञा पुं० [सं० पुरञ्जर] काँख। कुक्षि। बगल [को०]।

पुरंद पु
संज्ञा पुं० [सं० पुरन्दर] इंद्र। पुरंदर। उ०—अनघन प्रवाह बहु पुहवि परि बरष्यो जेम पुरंद गति।—पृ० रा०, १।४७२।

पुरंदर
संज्ञा पुं० [सं० पुरन्दर] १. पुर, नगर या घर को तोड़ने वाला। २. इंद्र (जिन्होंने शत्रु का नगर तोड़ा था)। ३. (घर को फोड़नेवाला) चोर। ४. चविका। चव्य। चई। ५. मिर्च। ६. ज्येष्ठा नक्षत्र। ७. शिव का एक नाम (को०)। ८. अग्नि (को०)। ९. विष्णु। यौ०—पुरंदरक्ष्माधर = महेंद्र पर्वत का नाम।

पुरंदरा
संज्ञा स्त्री० [सं० पुरन्दरा] गंगा।

पुरंद्र पु
संज्ञा पुं० [सं० पुरन्दर] पुरंदर। इंद्र। उ०—इहिं काम पुरंद्र निपाता। भग सहस किए जिहिं गाता।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० १२४।

पुरंध्रि, पुरंध्री
संज्ञा स्त्री० [सं० पुरन्ध्रि] १. पति, पुत्र, कन्या आदि से भरी पूरी स्त्री। २. स्त्री। औरत।

पुरः
अव्य० [सं० पुरस्] १. आगे। २. पहले। यौ०—पुरःपाक = जिसकी सिदिध या पाक सन्निकट हो। पुरः प्रहर्ता = (१) वह जो अग्रिम पंक्ति में लड़े। (२) पहले प्रहार करनेवाला। पुरःफल = जिसका फल या सिदिध समक्ष हो। पुरःसर। पुरःस्थ = सामने। समक्ष। पुरःस्थायी = सामने रहनेवाला। आगे रहनेवाला।

पुरःसर (१)
वि० [सं०] १. अग्रगंता। अगुआ। २. संगी। साथी। ३. समन्वित। सहित। युक्त।

पुरःसर (२)
संज्ञा पुं० १. अग्रगमन। २. साथ।

पुर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० पुरी] १. वह बड़ी बस्ती जहाँ कई ग्रामों या बस्तियों के लोगों को व्यवहार आदि के लिये आना पड़ता हो। नगर। शहर। कसबा। २.आगार। घर। यौ०—अंतःपुर। नारीपुर। ३. गृहोपरि गृह। घर के ऊपर का घर। कोठा। अटारी। ४. लोक। भुवन। ५. नक्षत्र। पुज। राशि। ६. देह। शरीर। ७. मोथा। ८. चर्म। चमड़ा। ९. पीली कटसरैया। १०. गुग्गुल नामक गंधद्रव्य। ११. दुर्ग। किला। गढ़। १२. चोंगा। १३. पाटलिपुत्र का एक नाम (को०)। १४. स्त्रियोंका निवास। अंतःपुर। जनानखाना (को०)। १५. कोषागार। भंडारघर (को०)। १६. गणिकागृह। वेश्यालय (को०)। १७. पुष्पगर्भ। पुष्प कोश (को०)।

पुर (२)
वि० [सं० तुल० फा० पुर] पूर्ण। भरा हुआ।

पुर (३)
संज्ञा पुं० [सं० पुर (= चमड़ा), या देश०] कुएँ से पानी निकालने का चमड़े का डोल। चरसा।

पुर पु (४)
अव्य० [सं० पुरस्] आगे। समक्ष। सामने। उ०—राम कह्यो जो कछू दुख तेरे। श्वान निशंक कहो पुर मेरे।—राम चं०, पृ० २६६।

पुरअमन
वि० [फा़० पुर + अ० अम्न] शांतिपूर्ण। शांति- मय (को०)।

पुरअसर
वि० [फा़० पुर + अ० असर] असरदार। प्रभावशील। उ०—कोई पंद्रह कहानियाँ उन्होंने लिखीं, किंतु जो लिखा पुरअसर।—शुक्ल अभि० ग्रं०, पृ० ९३।

पुरइन पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० पुटकिनी, प्रा० पुड़इनी (कमलिनी), पु० हिं० पुरइनि] १. कमल का पता। उ०—(क) पुरइन सधन ओट जल बेगि न पाइय मर्म। मायाछन्न न देखिए जैसे निर्गुण ब्रह्म।—तुलसी (शब्द०)। (ख) देखो भाई रूप सरोवर साज्यो। ब्रज बनिता वर वारि वृंद में श्री ब्रजराज बिराज्यो। पुरइन कपिश निचोल विविध रँग विहसत सचु उपजावै। सूर श्याम आनंदकंद की सोभ कहत न आवै।—सूर (शब्द०)। २. कमल। उ०—(क) सरवर चहुँ दिसि पुरइनि फूली। देखा वारि रहा मन भूली।—जायसी (शब्द०)। (ख) ऊधो तुम हौ अति बड़ भागी। अपरस रहत सनेह तगा तें नाहिन मन अनुरागी। पुरइन पात रहत जल भीतर ता रस देह न दागी। ज्यों जल माँह तेल की गागरि बुँद न ताको लगी।—सूर (शब्द०)।

पुरइया
संज्ञा स्त्री० [देश०] तकुआ। उ०—मन मेरौ रहठा रसना पुरइया। हरि कौ नाउ लै लै काति बहुरिया।—कबीर ग्रं०, पृ० १६५।

पुरकोट्ट
संज्ञा पुं० [सं०] नगर की रक्षा के लिये बना दुर्ग [को०]।

पुरख †
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष] व्यक्ति। पुरुष।

पुरखव पु
संज्ञा पुं० [हिं०] पौरुष। पुरुषार्थ। उ०—इक्क कहै सौव्रन्न इंद्र को पुरखव नंखिय।—पृ० रा०, ४।३।

पुरखा
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष] [स्त्री० पुरखिन] १. पूर्वज। पूर्वपुरुष। उत्पत्ति परंपरा में पहले पड़नेवाले पुरुष। जैसे, बाप, दादा, परदादा इत्यादि। जैसे,—ऐसी चीज उसके पुरखों ने भी न देखी होगी। उ०—चलत लीक पुरखान की करत तिनहिं के काज।—लक्ष्मण (शब्द०)। मुहा०—पुरखे तर जाना = पूर्वपुरुषों को (पुत्र आदि के कृत्य से) परलोक में उत्तम गति प्राप्त होना। बड़ा भारी पुण्य या फल होना। कृतकृत्य होना। जैसे,—एक दिन वे तुम्हारे घर आ गए, बस पुरखे तर गए। २. घर का बड़ा बूढ़ा।

पुरखार
वि० [फा़० पुरखार] काँटों से परिपूर्ण। काँटों से भरा हुआ। कंटकमय। जहाँ काँटे अधिक हों। उ०—पुरखार चार सूँ है गुलजार कहाँ है।—कबीर मं०, पृ० ३२३।

पुरखून
वि० [फा़० पुरखूँ] खून से तरबतर। रक्ताक्त। उ०—लगे गुलशन पे अजबस गम के होल्याँ, हुए पुरखून कुल मेंहदी के फूलाँ।—दक्खिनी०, पृ० १९१।

पुरग
वि० [सं०] १. शहर को जानेवाला। २. जिसकी मनोवृत्ति अनुकूल हो [को०]।

पुरगुर
संज्ञा पुं० [देश०] बंगाल के उत्तरपूर्व होनेवाला एक पेड़ जो धौली से मिलता जुलता होता है। इसकी लकड़ी खेती के सामान और खिलौने आदि बनाने के काम आती है।

पुरचक
संज्ञा स्त्री० [हिं० पुचकार] १. चुमकार। पुचकार। २. बढ़ावा। उत्साहदान। जैसे,—तुम्हीं ने तो पुरचक दे देकर लड़के को गाली बकना सिखाया है। क्रि० प्र०—देना। ३. प्रेरणा। उसकावा। उभारने का काम। जैसे,—उसने पुरचक देकर उसे लड़ा दिया। ४. पुष्ठपोषण। वादवाही। समर्थन। पक्षमंडन। हिमायत। तरफदारी। जैसे,—पुरचक पाकर ही पुलिसवालों ने यह सब उपद्रव किया। क्रि० प्र०—देना।—पाना।—लेना।

पुरगो
वि० [फा़०] बहुत अधिक कविता करनेवाला। २. अधिक बोलनेवाला। बातूनी [को०]।

पुरगोई
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. अत्यधिक कविता करना। २. वकवादपन। वाचालता [को०]।

पुरजन
संज्ञा पुं० [सं०] नगरवासी लोग। उ०—बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्हके भाग सराहन लागे।—मानस, २।२५०।

पुरजा
संज्ञा पुं० [फा़०पुर्जह्] १. टुकड़ा। खंड। उ०—सूरा सोइ सराहिए लड़े धनी के खेत। पुरजा पुरजा ह्वै परे तऊ न छाँडै़ खेत।—कबीर (शब्द०)। मुहा०—पुरजे पुरजे उड़ना = टुकड़े टुकड़े हो जाना। पुरी तरह नष्ट हो जाना। उ०—पुरजे पुरजे उड़ै अन्न बिनु बस्तर पानी। ऐसे पर ठहराय सोई महबूब बखानी।—पलटू०, भा० १, पृ० ३३। पुरजे पुरजे करना या उड़ाना = खंड खंड करना। टूक टूक करना। धज्जियाँ उड़ाना। पुरजा पुरजा हो पड़ना = दे० 'पुरजे पुरजे होना'। उ०—सूर न जानै कापरी सूरा तन से हेत। पुरजा पुरजा हो पड़ै, तहूँ न छाड़ै खेत।—दरिया बा०, पृ० १२। पुरजा पुरजा हो रहना = दे० 'पुरजे पुरजे होना'। उ०—सूरा सोई सराहिये, लड़ै धनी के हेत। पुरजा पुरजा होई रहै, तऊ न छाँड़ै खेत।—कबीर सा० सं०, भा० १, पृ० २३। पुरजे पुरजे होना = खंड खंड होना। टूट फूटकर टुकड़े टुकड़े होना। २. कतरन। धज्जी। कटा टुकड़ा। कत्तल। ३. अवयव। अंग। अंश। भाग। जैसे, कल के पुरजे, घड़ी के पुरजे।मुहा०—चलता पुरजा = चालाक आदमी। तेज आदमी। उद्योगी पुरुष। ४. चिड़ियों के महीन पर। रोईं।

पुरजित्
संज्ञा पुं० [सं०] १. शिव। २. एक राजा। ३. कृष्ण का एक पुत्र जो जांबवती से उत्पन्न हुआ था।

पुरजोर
वि० [फा़० पुरजोर] पुरअसर। ओजपूर्ण।

पुरजोश
वि० [फा़० पुरजोश] जोश से भरा हुआ। जोशीला।

पुरट
संज्ञा पुं० [सं०] सुवर्ण। सोना। उ०—(क) छुहे पुरट धट सहज सुहाए। मदन सकुच जनु नीड बनाए।—मानस, १।३४/?/। (ख) पुरट मनि मरकतनि की तति तहाँ मंजन ठाट।—घनानंद, पृ० ३००।

पुरण
संज्ञा पुं० [सं०] समुद्र।

पुरतः
अव्य० [सं० पुरतस्] आगे।

पुरतटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटा कसबा या गाँव जिसमें बाजार लगता हो।

पुरतोरण
संज्ञा पुं० [सं०] शहर का बाहरी दरवाजा। पुरद्वार [को०]।

पुरत्राण
संज्ञा पुं० [सं०] शहरपनाह। प्राकार। कोट। परकोटा। उ०—कनक रचित मणि खचित दिवाला। अष्ट द्वार पुरत्राण विशाला।

पुरदर्द
वि० [फा़०] दर्द से भार हुआ। दुःखपूर्ण। पीड़ायुक्त। उ०—इसका अर्थ बड़ा विकट है, बड़ा पुरदर्द है।—कुंकुम (भू०), पृ० १३।

पुरद्वार
संज्ञा पुं० [सं०] नगरद्वार। शहर पनाह का फाटक।

पुरन पु
वि० [सं० पूर्ण, हिं० पूरन] दे० 'पूरन'। उ०—सुतन दुख्ख अति बाल ससि भयौ पुरन बिन मंत।—पृ० रा०, २।३४०।

पुरनवासी
संज्ञा स्त्री० [सं० पूर्णमासी] दे० 'पूर्णमासी'। उ०— अगहन पूनवासी बार सुक दसखत दलदास कानगोऐ।—सं० दरिया, पृ० ३।

पुरना पु (१)
क्रि० अ० क्रि० स० [हिं०] दे० 'पूरना'।

पुरना † (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] गदहपूर्ना। पुनर्नवा।

पुरनारी
संज्ञा स्त्री० [सं०] वारांगना। वेश्या [को०]।

पुरनियाँ †
वि० [हिं० पुराना + इयाँ (प्रत्य०)] वृद्ध। व्योवृद्ध। बुड्ढा।

पुरनी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूरना (= भरना)] १. छल्ला। अँगूठे में पहनने का गहना। २. तुरही। सिंहा। ३. बंदूक का गज।

पुरनूर
वि० [फा़०] ज्योतिर्मय। सौंदर्ययुक्त। प्रकाशमान। सुंदरता से परिपूर्ण। उ०—जाहिरा जहान जाका जहूर पुरनूर।—मलूक०, पृ० २०।

पुरनोट †
संज्ञा पुं० [अं० प्रोनोट] ऋणपत्र। रुक्का। सरखत। उ०—मुझसे अपने रुपयों के लिये पुरनोट लिखा लो, स्टांप लिखा लो, और क्या करोगे ?—गबन, पृ० ११७।

पुरपाटण
संज्ञा पुं० [सं० पुर + हिं० पाटन< सं० पत्तन] नगर। उ०—पुर पाटण सूबस बसै।—कबीर ग्रं०, पृ० ५२।

पुरपाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. नगर का रक्षक। कोतवाल। २. जीव।

पुरपेंच
वि० [फा़०] चक्करदार। घुमावदार। घुँघराला। उ०— इसकी पुरेंपच जुल्फें दिल को बेताब किए डालती हैं।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० ४५।

पुरफन
वि० [फा़० पुर + अ० फन] मक्कार। धूर्त। प्रवंचक। उ०—ऐ इस्कवाज पुरफन बलिहार तुज मकर पर।— दक्खिनी०, पृ० ३२०।

पुरबला
वि० [सं० पूर्व + हिं० ला प्रत्य०] [वि० स्त्री० पुरबली] १. पूर्व का। पहले का। २. पूर्व जन्म का। पूर्वजन्म संबंधी। जैसे, पुरबले पाप।

पुरबा (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० पूर्व] दे० 'पुरवा'।

पुरबा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० पूर्वा] दे० 'पूर्वा '(नक्षत्र)। उ०—पुरबा लाग भूमि जलपूरी।—जायसी ग्रं०, पृ० १५३।

पुरबिया
वि० [हिं० पूरब + इया (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० पुरबिनी] पूर्व देश में उत्पन्न या रहनेवाला। पूरब का। जैसे, पुरबिये लोग।

पुरबिया (२)
संज्ञा पुं० पूरब का रहनेवाला व्यक्ति। पूरब के निवासी जन। जैसे, पुरबियों की फौज।

पुरबिला
वि० [हिं० पूरब] दे० 'पुरबला'।

पुरबिहा †
संज्ञा पुं० [हिं० पूरब + इहा (प्रत्य०)] दे० 'पुरबिया'।

पुरबी †
वि० [हिं० पूरब + ई] दे० 'पूरबी'।

पुरबुज पु †
वि० [सं० पूर्वज] पूर्व का। पहिले का। उ०—जो पुरबुज अपने कर्मन तें, डारयौ सर्ब मिटा री।—जग० बानी, पृ० २८।

पुरबुला †
वि० [सं० पूर्व + हिं० ला (प्रत्य०)] दे० 'पुरबुला'। उ०—रही न रानी कैकेई अमर भई यह बात। ववन पुरबुले पाप ते बन पठयो जगतात।—(शब्द०)।

पुरभिदु
संज्ञा पुं० [सं०] (असुरों के त्रिपुर का नाश करनेवाले) शिव। पुरमथन।

पुरमजाक
वि० [फा़० पुर + अ = मजाक] दिल्लगी से भरा हुआ। व्यंग्यपूर्ण। उ०—वे जहाँ एक और करुण चित्रों के आकलन में सिद्धहस्त हैं वहाँ पुरमजाक, फबती भरे, गुदगुदा देनेवाले फिसाने लिखने में भी।—शुक्ल० अभि० ग्रं० (सा०) पृ० ९२।

पुरमथन
संज्ञा पुं० [सं०] शिव।

पुरमान पु
संज्ञा पुं० [फा़० फर्मान] दे० 'फरमान'। उ०—आखेटक बन तक्कि इतै गज्जने सपत्ते। साह जोर साहाब दिए पुरमान निरत्ते।—पृ रा० १०।६।

पुररोध
संज्ञा पुं० [सं०] नगर को चारों ओर से घेरना [को०]।

पुररौनक
वि० [फा़० पुररौनक़] चहल पहल से भरा हुआ। जहाँ खूब रौनक हो [को०]।

पुरला
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा।

पुरवइया
संज्ञा स्त्री० [सं० पूर्वा] दे० 'पुरवाई'। उ०—नान्हीं नान्हीं बूँद पवन पुरवइया बरसत थोरे थोरे।—संतवाणी०, भा० २, पृ० ७९।

पुरवट †
संज्ञा पुं० [सं० पूर + वर्त्म ?] चमड़े का बहुत बड़ा ढोल जिसे कुएँ में डालकर बैलों की सहायता से खेत की सिंचाई आदि के लिये पानी खींचते हैं। चरसा। मोट। पुर। क्रि० प्र०—चलना। खींचना। मुहा०—पुरवट नाधना = पुरवट की रस्सी में बैल जोतना। पुरवट हाँकना = पुरवट के बैलों को चलाना।

पुरवधू
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'पुरनारी' [को०]।

पुरवना पु (१)
क्रि० स० [हिं० पूरना] १. पूरना। भरना। पुजाना। जैसे, घाव पुरवाना। २. पूरा करना। पूर्ण करना। उ०—(क) जौं विधि पुरब मनोरथ काली। करउँ तोहि चष पूतरि आली।—तुलसी (शब्द०)। (ख) मो सो कहा दुरावति राधा। कहा मिली नँदनंदन को निज पुरयो मन की साधा।—सूर (शब्द०)। मुहा०—साय पुरवना = साथ देना। साथी होना। उ०—पुरवहु साथ तुम्हार बड़ाई।—जायसी (शब्द०)।

पुरवना (२)
क्रि० अ० १. पूरा होना। २. यथेष्ट होना। ३. उपयोग के योग्य होना। मुहा०—बल पुरवना = पूरी शक्ति या सामर्थ्य होना। बलवीर्य का काम करना।

पुरवय्या
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पुरवइया'। उ०—हिल रही नीम की डाल मंदगति, कहती रे। वह रही लंजीली सीरी धीरी पुरवइया।—मिट्टी०, पृ० ५७।

पुरवा (१)
संज्ञा पुं० [सं० पुर + हिं० वा (प्रत्य०)] छोटा गाँव। पुरा। खेड़ा। उ०—नदी नद सागर डगरि मिलि गए देव, डंगर न सूझत नगर पुरवान को।—देव (शब्द०)।

पुरवा (२)
संज्ञा पुं० [सं० पूर्व + वात, हिं० पूरब + बाव] पूरब की हवा। पूर्व दिशा से चलनेवाली वायु। २. एक रोग जो वायु चलने से उत्पन्न होता है। विशेष—यह पशुओं को होता है। इसमें पशु का गला फूल जाता है और उसके पेट में पीड़ा होती है।

पुरवा (३)
संज्ञा पुं० [सं० पुटक] मिट्टी का कुल्हड़। कुल्हिया। उ०—बूट के केदार सम लूटिहै त्रिलोक काल पुरवा के फूट सम ब्रह्म अंड फूटिहै।—हनुमान (शब्द०)।

पुरवा पु (४)
वि० [हिं० पूरना] पूर्ण करनेवाला। पुरानेवाला। उ०—चलि राधे बृंदावन विहरन औसर बन्यौ है मनोरथ पुरवा।—घनानंद, पृ० ४९०।

पुरवाई
संज्ञा स्त्री० [सं० पूर्व + वायु, हिं० पूरब + वाई] पूर्व की वायु। वह वायु जो पूर्व से चलती है। उ०—आग सी धधात ताती लपट सिराय गई पौन पुरवाई लागी सीतल सुहान री।—ठाकुर०, पृ० २०।

पुरवाना
क्रि० स० [हिं० पुरवना का प्रे० रूप] पूरा कराना।

पुरवासी
संज्ञा पुं० [सं० पुरवासिन्] नगर में रहनेवाला। नगर- निवासी।

पुरवास्तु
संज्ञा पुं० [सं०] नगर बसाने योग्य भूमि [को०]।

पुरवैया ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पुरवाई'।

पुरशासन
संज्ञा पुं० [सं०] (दैत्यों के त्रिपुर का ध्वंस करनेवाले) शिव।

पुरश्चरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी कार्य की सिदि्ध के लिये पहले से ही उपाय सोचना और अनुष्ठान करना। २. हवन आदि के समय किसी विशिष्ट देवता का नाम जप (को०)। ३. किसी मंत्र स्तोत्र आदि को किसी अभीष्ट कार्य की सिदि्ध के लिये किसी नियत समय और परिमाण तक नियमपूर्वक जपना या पाठ करना। प्रयोग। उ— मैं अब पुरश्चरण करने जाता हूँ, आप विघ्नों का निषेध कर दीजिए।— भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ३०३।

पुरश्चर्या
संज्ञा पुं० [सं०] पुरश्चरण [को०]।

पुरश्छंद
संज्ञा पुं० [सं०] खुश या डाभ की तरह की एक घास।

पुरष †
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष] दे० 'पुरुष'। उ०— पुरष जनम कद तू पामेला, गुण कद हरिरा गासी।—रघु० रू०, पृ० १६।

पुरषा †
संज्ञा पुं० [हिं० पुरखा] दे० 'पुरखा'।

पुरषातन पु †
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषत्व] १. पुरुषत्व। पौरुष। साहस। हिम्मत। उ०— इह नष्ट ज्ञान सुनियै न कान। पुरषातन भज्जै कित्ति हान।—पृ० रा०, १। ३५१। २. पुरुषत्व। स्त्रीसमागम की शक्ति। उ०— बढिय काम कामना भी पुरुषातन की सिधि। —पृ० रा०, १। ४००।

पुरुष्ष पु
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष] दे० 'पुरुष'। उ०— किय सोक कोपं कहाँ वछ्छ गोपं। हरे ब्रह्म ग्यानं, पुरष्षं पुरानं।— पृ० रा०, २। ६३।

पुरस (१) †
संज्ञा पुं० [पुरीष] खाद। पाँस।

पुरस पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष] दे० 'पुरुष'। उ०—पुरण पुरस पुराण प्रमेसर। सुकवि सधार वार अग्रेस्वर।—रा० रू०, पृ० ४।

पुरसाँह पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पौरुष'। उ०—नमस्कार सूराँ नराँ, पूरा सत पुरसाँह।—बाँकी० ग्रं०, भा० १।

पुरसाँहाल †
वि० [फा० पुर्सां + हाल] हालचाल पूछनेवाला। खोज खबर लेनेवाला। उ०— चमार पहर रात रहे घास छीलने जाते, मेहतर पहर रात से सफाई करने लगते, कहार पहर रात से पानी खींचना शुरू करते, मगर कोई उनका पुरसाँहाल न था।—काया०, पृ० १७२।

पुरसा
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष] ऊँचाई या गहराई की एक माप जिसका विस्तार हाथ ऊपर उठाकर खडे़ हुए मनुष्य के बराबर होता है। साढे़ चार या पाँच हाथ की एक माप। जैसे, चार चार पुरसा गहरा, छह पुरसा ऊँचा।

पुरसी
संज्ञा स्त्री० [फा०] जानने या पूछने की क्रिया या भाव। जैसे, मिजाजपुरसी।

पुरस्करण
संज्ञा पुं० [सं०] १. समक्ष उपस्थित करना। आगे रखना। २. पूरा करना। दे० 'परस्कार' [को०]।

पुरस्करणीय
वि० [सं०] जिसका पुरस्करण किया जाय। पुर- स्करण योग्य। पूरा करने योग्य [को०]।

पुरस्कर्ता
वि० [सं०] १. पुरस्कृत करनेवाले। पुरस्कार देनेवाले। २. समर्थक। हिमायती। ३. समक्ष या आगे करनेवाला। उ०—जाहिर है कि नए रूपविधान के पुरस्कर्ता प्रगतिशील हैं।—इति०, पृ० ५७।

पुरस्कार
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० पुरस्कृत] १. आगे करने की क्रिया। २. आदर। पूजा। ३. प्रधानता। ४. स्वीकार। ५. पारितोषिक। उपहार। इनाम। क्रि० प्र०—देना।—पाना। ६. आक्रमण। हमला (को०)। ७. अभिषेचन (को०)। ८. अभिशाप (को०)।

पुरस्कृत
वि० [सं०] १. आगे किया हुआ। २. आदृत। पूजित। ३. स्वीकृत। ४. जिसने इनाम पाया हो। जिसे पुरस्कार मिला हो। ५. अभिशप्त (को०)। ६. शत्रु द्वारा आक्रमित। अरिग्रस्त (को०)। ७. सिक्त। सेचित (को०)। ८ तैयार। जो पूरा हो गया हो (को०)।

पुरस्क्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'पुरस्करण', 'पुरस्कार'।

पुरस्तात्
अव्य [सं० पुरस्तात्] १. आगे। सामने। २. पूर्व दिशा में। ३. पहले। पूर्वकाल में। ४. अतीत में (को०)। ५. अंत में। बाद में (को०)।

पुरस्ताल्लाभ
[सं०] कौटिल्य के अनुसार वह लाभ जो चढ़ाई करने पर प्राप्त हो।

पुरस्सर
वि० [सं०] दे० 'पुरःसर—३'। उ०— समदुःखिनी मिले तो दुःख बँटे, जा, प्रणय पुरस्सर ले आ।— साकेत, पृ० २५६।

पुरहत
संज्ञा पुं० [पुरः + अक्षत] वह अन्न और द्रव्यादि जो विवाह आदि मंगल कार्यों में पुरोहित या प्रजा को किसी कृत्य के करने के प्रारंभ में दिया जाता है। आखत।

पुरहन्
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु। २. शिव।

पुरहर पु †
संज्ञा पुं० [सं० पूर्ण?] उ०—अभिनव पल्लव बइसक देल, धवल कयल फुल पुरहर मेल।—विद्यापति, पृ० १०६।

पुरहा † (१)
संज्ञा पुं० [सं० हिं० पुर] वह पुरुष जो पुर चलते समय कुएँ पर के पानी को गिराने के लिय नियत रहता है।

परहा (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार की लता जिसकी पत्तियाँ गोलाकार और ५-६ इंच चौड़ी होती हैं। यह हिमालय में सब जगह ७००० फुट तक की ऊँचाई पर पाई जाती है। कहीं कहीं इसकी जड़ का व्यवहार ओषधि रूप में भी होता है।

पुरही
संज्ञा स्त्री० [देश०] हरजेवड़ी नाम की झाड़ी जिसकी पत्तियाँ और जड़ औषध रीप में काम में आती हैं। दाख। निरबिसी।

पुरहूत पु
संज्ञा पुं० [सं० पुरुहूत] दे० 'पुरुहूत'। उ०—भय नगर देव परहूत सम, कुसुम बरन सागर सुभय।—प० रासो, पृ० १८३।

पुरहौल
वि० [फा०] भयंकर। डरावना [को०]।

पुरांतक
संज्ञा पुं० [सं० पुर + अन्तक] शिव।

पुरा (१)
अव्य० [सं०] १. पुराने समय में। पहले। पूर्वकाल में। प्राचीन काल में। उ०— रहे चक्रवर्ती नृपति विश्वामित्र महान। कियो राज शासन पुरा जाहिर भयो जहान।—रघुराज (शब्द०)। २. प्राचीन। अतीत। पुराना। जैसे, पुरावृत्त, पुराकल्प, पुराविद्, पुराकथा। ३. वर्तमान काल तक। अब तक (को०)। ४. अल्प काल में। शीघ्र। थोडे़ समय में (को०)।

पुरा (२)
संज्ञा स्त्री० १. पूर्व दिशा। २. एक सुगंध द्रव्य। विशेष— वैद्यक में यह कसैली, शीतल तथा कफ, श्वास, मूर्छा और विष को दूर करनेवाली मानी जाती है। ३. गंगा नदी (को०)।

पुरा (३)
संज्ञा पुं० [सं० पुर] गाँव। बस्ती। दे० 'पुर'।

पुराकथा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पौराणिक आख्यान। प्राचीन कथा। इतिहास [को०]।

पुराकल्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. पूर्वकल्प। पहले का कल्प। २. प्राचीन काल। ३. प्राचीन इतिहास। ४. एक प्रकार का अर्थवाद जिसमें प्राचीन काल का इतिहास कहकर किसी विधि के करने की ओर प्रवृत्त किया जाय। जैसे, ब्राह्मणों ने इससे हविःपवमान सामस्तोम की स्तुति की थी।

पुराकालीन
वि० [सं० पुरा + कालीन] प्राचीन काल का।

पुराकृत (१)
वि० [सं०] १. पूर्वकाल में किया हुआ। २. पूर्वजन्म में किया हुआ।

पुराकृत (२)
संज्ञा पुं० पूर्वजन्म में किया हुआ पाप या पुण्यकर्म।

पुराचीन
वि० [सं० प्राचीन] प्राचीन। पुराना। उ०— छिन्न करो पुराचीन संस्कृतियों के जड़ बंधन। जाति वर्ण श्रेणि वर्ग से विमुक्त जन नूतन।—ग्राम्या, पृ० ९९।

पुराट्ट
संज्ञा पुं० [सं० पुर + अट्ट] नगर की चहारदीवारी पर बने हुए बुर्ज [को०]।

पुराण (१)
वि० [सं०] १. पुरातन। प्राचीन। जैसे पुराण पुरुष। २. अधिक आयु का। अधिक उम्र का (को०)। ३. जीर्णा (को०)।

पुराण (२)
संज्ञा पुं० १. प्राचीन आख्यान। पुरानी कथा। सृष्टि, मनुष्य, देवों, दानवों, राजाओं, महात्माओं आदि के ऐसे वृत्तांत जो पुरुषपरंपरा से चले आते हों। २. हिंदुओं के धर्मसंबंधी आख्यानग्रंथ जिनमें सृष्टि, लय, प्राचीन ऋषियों, मुनियों और राजाओं के वृत्तात आदि रहते हैं। पुरानी कथाओं की पोथी। विशेष— पुराण अठारह हैं। विष्णु पुराण के अनुसार उनके नाम ये हैं—विष्णु, पद्य, ब्रह्म, शिव, भागवत, नारद, मार्कंडेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वाराह, स्कंद, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड, ब्रह्मांड और भविष्य। पुराणों में एक विचित्रता यह है कि प्रत्येक पुराण में अठारहो पुराणों के नाम और उनकीश्लोकसंख्या है। नाम और श्लोकसंख्या प्रायः सबकी मिलती है, कहीं कहीं भेद है। जैसे कूर्म पुराण में अग्नि के स्थान में वायुपुराण; मार्कंडेय पुराण में लिंगपुराण के स्थान में नृसिंहपुराण; देवीभागवत में शिव पुराण के स्थान में नारद पुराण और मत्स्य में वायुपुराण है। भागवत के नाम से आजकल दो पुराण मिलते हैं—एक श्रीमदभागवत, दूसरा देवीभागवत। कौन वास्तव में पुराण है इसपर झगड़ा रहा है। रामाश्रम स्वामी ने 'दुर्जनमुखचपेटिका' में सिद्ध किया है कि श्रीमदभागवत ही पुराण है। इसपर काशीनाथ भट्ट ने 'दुर्जनमुखमहाचपेटिका' तथा एक और पंडित ने 'दुर्जनमुखपद्यपादुका' देवीभागवत के पक्ष में लिखी थी। पुराण के पाँच लक्षण कहे गए हैं— सर्ग, प्रतिसर्ग (अर्थात् सृष्टि और फिर सृष्टि), वंश, मन्वंतर और वंशानुचरित्—'सर्गश्च, प्रतिसर्गश्च, वंशो, मन्वंतराणि च। वंशानुचरितं चैव पुराणं पंचलक्षणम्।' पुराणों में विष्णु, वायु, मत्स्य और भागवत में ऐतिहासिक वृत्त— राजाओं की वंशावली आदि के रूप में बहुत कुछ मिलते हैं। ये वंशावलियाँ यद्यपि बहुत संक्षिप्त हैं और इनमें परस्पर कहीं कहीं विरोध भी हैं पर हैं बडे़ काम की। पुराणों की ओर ऐतिहासिकों ने इधर विशेष रूप से ध्यान दिया है और वे इन वंशावलियों की छानबीन में लगे हैं। पुराणों में सबसे पुराना विष्णुपुराण ही प्रतीत होता है। उसमें सांप्रदायिक खींचतान और रागद्वेष नहीं है। पुराण के पाँचो लक्षण भी उसपर ठीक ठीक घटते हैं। उसमें सृष्टि की उत्पत्ति और लय, मन्वंतरों, भरतादि खंडों और सूर्यादि लोकों, वेदों की शाखाओं तथा वेदव्यास द्वारा उनके विभाग, सूर्य वंश, चंद्र वंश आदि का वर्णन है। कलि के राजाओं में मगध के मौर्य राजाओं तथा गुप्तवंश के राजाओं तक का उल्लेख है। श्रीकृष्ण की लीलाओं का भी वर्णन है पर बिलकुल उस रूप में नहीं जिस रूप में भागवत में है। कुछ लोगों का कहना है कि वायुपुराण ही शिवपुराण है क्योंकि आजकल जो शिवपुराण नामक पुराण या उपपुराण है उसकी श्लोक संख्या २४,००० नहीं है, केवल ७,००० ही है। वायुपुराण के चार पाद है जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, कल्पों ओर मन्वंतरों, वैदिक ऋषियों की गाथाओं, दक्ष प्रजापति की कन्याओं से भिन्न भिन्न जीवोत्पति, सूर्यवंशी और चंद्रवंशी राजाओं की वंशावली तथा कलि के राजाओं का प्रायः विष्णुपुराण के अनुसार वर्णन है। मत्स्यपुराण में मन्वंतरों और राजवंशावलियों के अतिरिक्त वर्णश्रम धर्म का बडे़ विस्तार के साथ वर्णन है और मत्सायवतार की पूरी कथा है। इसमें मय आदिक असुरों के संहार, मातृलोक, पितृलोक, मूर्ति और मंदिर बनाने की विधि का वर्णन विशेष ढंग का है। श्रीमदभागवत का प्रचार सबसे अधिक है क्योंकि उसमें भक्ति के माहात्म्य और श्रीकृष्ण की लीलाओं का विस्तृत वर्णन है। नौ स्कंधों के भीतर तो जीवब्रह्म की एकता, भक्ति का महत्व, सृष्टिलीला, कपिलदेव का जन्म और अपनी माता के प्रति वैष्णव भावानुसार सांख्यशास्त्र का उपदेश, मन्वंतर और ऋषिवंशावली, अवतार जिसमें ऋषभदेव का भी प्रसंग है, ध्रुव, वेणु, पृथु, प्रह्लाद इत्यादि की कथा, समुद्रमथन आदि अनेक विषय हैं। पर सबसे बड़ा दशम स्कंध है जिसमें कृष्ण की लीला का विस्तार से वर्णन है। इसी स्कंध के आधार पर शृंगार और भक्तिरस से पूर्ण कृष्णचरित् संबंधी संस्कृत और भाषा के अनेक ग्रंथ बने हैं। एकादश स्कंध में यादवों के नाश और बारहवें में कलियुग के राचाओं के राजत्व का वर्णन है। भागवत की लेखनशैली और पुराणों से भिन्न है। इसकी भाषा पांडित्यपूर्ण और साहित्य संबंधी चमत्कारों से भरी हुई है, इससे इसकी रचना कुछ पीछे की मानी जाती है। अग्निपुराण एक विलक्षण पुराण है जिसमें राजवंशावलियों तथा संक्षिप्त कथाओं के अतिरिक्त धर्मशास्त्र, राजनीति, राज- धर्म, प्रजाधर्म, आयुर्वेद, व्याकरण, रस, अलंकार, शस्त्र- विद्या आदि अनेक विषय हैं। इसमें तंत्रदीक्षा का भी विस्तृत प्रकरण है। कलि के राजाओं की वंशावली विक्रम तक आई है, अवतार प्रसंग भी है। इसी प्रकार और पुराणों में भी कथाएँ हैं। विष्णुपुराण के अतिरिक्त और पुराण जो आजकल मिलते हैं उनके विषय में संदेह होता है कि वे असल पुराणों के न मिलने पर पीछे से न बनाए गए हों। कई एक पुराण तो मत मतांतरों और संप्रदायों के राग द्वेष से भरे हैं। कोई किसी देवता की प्रधानता स्थापित करता है, कोई किसी देवता की प्रधानता स्थापित करता है, कोई किसी की। ब्रह्मवैवर्त पुराण का जो परिचय मत्स्यपुराण में दिया गया है उसके अनुसार उसमें रथंतर कल्प और वराह अवतार की कथा होनी चाहिए पर जो ब्रह्मवैवर्त आजकल मिलता है उसमें यह कथा नहीं है। कृष्ण के वृंदावन के रास से जिन भक्तों की तृप्ति नहीं हुई थी उनके लिये गोलोक में सदा होनेवाले रास का उसमें वर्णन है। आजकल का यह ब्रह्मवैवर्त मुसलमानों के आने के कई सौ वर्ष पीछे का है क्योंकि इसमें 'जुलाहा' जाति की उत्पत्ति का भी उल्लेख है—'म्लेच्छात् कुविंदकन्यायां' जोला जातिर्बभूव ह' (१०, १२१)। ब्रह्मपुराण में तीर्थों और उनके माहात्म्य का वर्णन बहुत अदिक हैं, अनंत वासुदेव और पुरुषोत्तम (जगन्नाथ) माहात्म्य तथा और बहुत से ऐसे तीर्थों के माहात्म्य लिखे गए हैं जो प्राचीन नहीं कहे जा सकते। 'पुरुषोत्तमप्रासाद' से अवश्य जगन्नाथ जी के विशाल मंदिर की ओर ही इशारा है जिसे गांगेय वंश के रिजा चोड़गंगा (सन् १०७७ ई०) ने बनवाया था। मत्स्यपुराण में दिए हुए लक्षण आजकल के पद्मपुराण में भी पूरे नहीं मिलते हैं। वैष्णव सांप्रदायिकों के द्वेष की इसमें बहुत सी बातें हैं। जैसे, पाषडिलक्षण, मायावादनिंदा, तामसशास्त्र, पुराणवर्णनइत्यादि। वैशेषिक, न्याय, सांख्य और चार्वाक तामस शास्त्र कहे गए हैं और यह भी बताया गया है कि दैत्यों के विनाश के लिये बुद्ध रूपी विष्णु ने असत् बौद्ध शास्त्र कहा। इसी प्रकार मत्स्य, कूर्म, लिंग, शिव, स्कंद और अग्नि तामस पुराण कहे गए हैं। सारंश यह कि अधिकांश पुराणों का वर्तमान रूप हजार वर्ष के भीतर का है। सबके सब पुराण सांप्रदायिक है, इसमें भी कोई संदेह नहीं है। कई पुराण (जैसे, विष्णु) बहुत कुछ अपने प्राचीन रूप में मिलते हैं पर उनमें भी सांप्रदायिकों ने बहुत सी बातें बढ़ा दी हैं। यद्यपि आजकल जो पुराण मिलते हैं उनमें से अधिकतर पीछे से बने हुए या प्रक्षिप्त विषयों से भरे हुए हैं तथापि पुराण बहुत प्राचीन काल से प्रचलित थे। बृहदारण्यक और शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि गीली लकड़ी से जैसे धुआँ अलग अलग निकलता है बैसे ही महान् भूत के निःश्वास से ऋग्वेद, यजुर्वेद सामवेद, अथर्वांगिरस, इतिहास, पुराणविद्या, उपनिषद, श्लोक, सूत्र, व्याख्यान और अनुव्याख्यान हुए। छांदोग्य उपनिषद् में भी लिखा है कि इतिहास पुराण वेदों में पाँचवाँ वेद है। अत्यंत प्राचीन काल में वेदों के साथ पुराण भी प्रचलित थे जो यज्ञ आदि के अवसरों पर कहे जाते थे। कई बातें जो पुराण केलक्षणों में हैं, वेदों में भी हैं। जैसे, पहले असत् था और कुछ नहीं था यह सर्ग या सृष्टितत्व है; देवासुर संग्राम, उर्वशी पुरूरवा संवाद इतिहास है। महाभारत के आदि पर्व में (१। २३३) भी अनेक राजाओं के नाम और कुछ विषय गिनाकर कहा गया है कि इनके वृत्तांत विद्वान सत्कवियों द्वारा पुराण में कहे गए हैं। इससे कहा जा सकता है कि महाभारत के रचनाकाल में भी पुराण थे। मनुस्मृति में भी लिखा है कि पितृकार्यों में वेद, धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण आदि सुनाने चाहिए। अब प्रश्न यह होता है कि पुराण हैं किसके बनाए। शिवपुराण के अंतर्गत रेवा माहात्म्य में लिखा है कि अठारहों पुराणों के वक्ता मत्यवतीसुत व्यास हैं। यही बात जन साधारण में प्रचलित है। पर मत्स्यपुराण में स्पष्ट लिखा है कि पहले पुराण एक ही था, उसी से १८ पुराण हुए (५३। ४)। ब्राह्मांड पुराण में लिखा है कि वेदव्यास ने एक पुराणसंहिता का संकलन किया था। इसके आगे की बात का पता वपिष्णु पुराण से लगता है। उसमें लिखा है कि व्यास का एक लोमहर्षण नाम का शिष्य था जो सूति जाति का था। व्यास जी ने अपनी पुराण संहिता उसी के हाथ में दी। लोमहर्षण के छह शिष्य थे— सुमति, अग्निवर्चा, मित्रयु, शांशपायन, अकृतव्रण और सावर्णी। इनमें से अकृत- व्रण, सावर्णी और शांशपायन ने लोमहर्षण से पढ़ी हुई पुराणसंहिता के आधार पर और एक एक संहिता बनाई। वेदव्यास ने जिस प्रकार मंत्रों का संग्रहकर उन का संहिताओं में विभाग किया उसी प्रकार पुराण के नाम से चले आते हुए वृत्तों का संग्रह कर पुराणसंहिता का संकलन किया। उसी एक संहिता को लेकर सुत के चेलों के तीन और संहीताएँ बनाई। इन्हीं संहिताओं के आधार पर अठारह पुराण बने होंगे। मत्स्य, विष्णु, ब्रह्मांड आदि सब पुराणों में ब्रह्मपुराण पहला कहा गया है। पर जो ब्रह्मपुराण आजकल प्रचलित है वह कैसा है यह पहले कहा जा चुका है। जो कुछ हो, यह तो ऊपर लिखे प्रमाण से सिद्ध है कि अठारह पुराण वेदव्यास के बनाए नहीं हैं। जो पुराण आजकल मिलते हैं उनमें विष्णुपुराण और ब्रह्मांडपुराण की रचना औरों से प्राचीन जान पड़ती है। विष्णुपुराण में 'भविष्य राजवंश' के अंतर्गत गुप्तवंश के राजाओं तक का उल्लेख है इससे वह प्रकरण ईसा की छठी शताब्दी के पहले का नहीं हो सकता। जावा के आगे जो बाली टापू है वहाँ के हिंदुओं के पास ब्रह्मांडपुराण मिला है। इन हिंदुओं के पूर्वज ईसा की पाँचवी शताब्दी में भारतवर्ष में पूर्व के द्वीपों में जाकर बसे थे। बालीवाले ब्रह्मा़डपुराण में 'भविष्य राजवंश प्रकरण' नहीं है उसमें जनमेजय के प्रपौत्र अधिसीमकृष्ण तक का नाम पाया जाता है। यह बात ध्यान देने की है। इससे प्रकट होता है कि पुराणों में जो भविष्य राजवंश है वह पीछे से जोड़ा हुआ है। यहाँ पर ब्रह्मांडपुराण की जो प्राचीन प्रतियाँ मिलती हैं देखना चाहिए कि उनमें भूत और वर्तमानकालिक क्रिया का प्रयोग कहाँ तक है। 'भविष्यराजवंश वर्णन' के पूर्व उनमें ये श्लोक मिलते हैं— तस्य पुत्रः शतानीको बलबान् सत्यविक्रमः। ततः सुर्त शतानीकं विप्रास्तमभ्यषेचयन्।। पुत्रोश्वमेधदत्तो/?/भूत् शतानीकस्य वीर्यवान्। पुत्रो/?/श्वमेधदत्ताद्वै जातः परपुरजयः।। अधिसीमकृष्णो धर्मात्मा साम्पतोयं महायशाः। यस्मिन् प्रशासति महीं युष्माभिरिदमाहृतम्।। दुरापं दीर्घसत्रं वै त्रीणि दर्षाणि पुष्करम् वर्षद्वयं कुरुक्षेत्रे दृषद्वत्यां द्विजोत्तमाः।। अर्थात्— उनके पुत्र बलवान् और सत्यविक्रम शतानीक हुए। पीछे शतानीक के पुत्र को ब्राह्मणों ने अभिषिक्त किया। शतानीक के अश्वमेधदत्त नाम का एक वीर्यवान् पुत्र उत्पन्न हुआ। अश्वमेधदत्त के पुत्र परपुरंजय धर्मात्मा अधिसीमकृष्ण हैं। ये ही महायशा आजकल पृथ्वी का शासन करते हैं। इन्हीं के समय में आप लोगों ने पुष्कर में तीन वर्ष का और दृषद्वती के किनारे कुरुक्षेत्र में दो वर्ष तक का यज्ञ किया है। उक्त अंश से प्रकट है कि आदि ब्रह्मांडपुराण अधिसीमकृष्ण के समय में बना। इसी प्रकार विष्णुपुराण, मत्स्यपुराण आदि की परीक्षा करने से पता चलता है कि आदि विष्णुपुराण परीक्षित के समय में और आदि मत्स्यपुराण जनमेजय के प्रपौत्र अधिसीमकृष्ण के समय में संकलित हुआ। पुराण संहिताओं से अठारह पुराण बहुत प्राचीन काल में ही बन गए थे इसका पता लगता है। आपस्तंबधर्मसूत्र(२। २४। ५) में भविष्यपुराण का प्रमाण इस प्रकार उदधृत है— आभूत संप्लवात्ते स्वर्गजितः। पुनः सर्गे बीजीर्था भवतीति भविष्यत्पुराणे। यह अवश्य है कि आजकल पुराण अपने आदिम रूप में नहीं मिलते हैं। बहुत से पुराण तो असल पुराणों के न मिलने पर फिर से नए रचे गए हैं, कुछ में बहुत सी बातें जोड़ दी गई हैं। प्रायः सब पुराण शैव, वैष्णव और सौर संप्रदायों में से किसी न किसी के पोषक हैं, इसमें भी कोई संदेह नहीं। विष्णु, रुद्र, सूर्य आदि की उपासना वैदिक काल से ही चली आती थी, फिर धीरे धीरे कुछ लोग किसी एक देवता को प्रधानता देने लगे, कुछ लोग दूसरे को। इस प्रकार महाभारत के पीछे ही संप्रदायों का सूत्रपात हो चला। पुराणसंहिताएँ उसी समय में बनीं। फिर आगे चलकर आदिपुराण बने जिनका बहुत कुछ अंश आजकल पाए जानेवाले कुछ पुराणों के भीतर है। पुराणों का उद्देश्य पुराने वृत्तों का संग्रह करना, कुछ प्राचीन और कुछ कल्पित कथाओं द्वारा उपदेश देना, देवमहिमा तथा तीर्थमहिमा के वर्णन द्वारा जनसाधारण में धर्मबुदिध स्थिर रखना दी था। इसी से व्यास ने सूत (भाट या कथक्केड़) जाति के एक पुरुष को अपनी संकलित आदिपुराणसंहिता प्रचार करने के लिये दी। पुराणों में वैदिक काल से चले आते हुए सृष्टि आदि संबंधी विचारों, प्राचीन राजाओं और ऋषियों के परंपरागत वृत्तांतों तथा कहानियों आदि के संग्रह के साथ साथ कल्पित कथाओं की विचित्रता और रोचक वर्णनों द्वारा सांप्रदायिक या साधारण उपदेश भी मिलते हैं। पुराण उस प्रकार प्रमाण ग्रंत नहीं हैं जिस प्रकार श्रुति, स्मृति आदि हैं। हिंदुओं के अनुकरण पर जैन लोगों में भी बहुत से पुराण बने हैं। इनमें से २४ पुराण तो तीर्थकरों के नाम पर हैं; और भी बहुत से हैं जिनमें तीर्थकरों के अलौकिक चरित्र, सब देवताओं से उनकी श्रेष्ठता, जैनधर्म संबंधी तत्वों का विस्तार से वर्णन, फलस्तुति, माहात्म्य आदि हैं। अलग पद्मपुराण और हरिवंश (अरिष्टनेमि पुराण) भी हैं। इन जैन पुराणों में राम, कृष्ण आदि के चरित्र लेकर खूब विकृत किए गए हैं। बौद्ध ग्रंथों में कहीं पुराणों का उल्लेख नहीं है पर तिब्बत और नैपाल के बौद्ध ९ पुराण मानते हैं जिन्हें वे नवधर्म कहते हैं —(१) प्रज्ञापारमिता (न्याय का ग्रंथ कहना चाहिए), (२) गंडव्यूह, (३) समाधिराज, (४) लंकावतार (रावण का मलयागिरि पर जाना, और शाक्यसिंह के उपदेश से बोधिज्ञान लाभ करना वर्णित है), (५) तथागतगुह्यक, (६) सद्धर्मपुंडरीक, (७) ललितविस्तर (बुद्ध का चरित्र), (८) सुवर्णप्रभा (लक्ष्मी, सरस्वती, पृथ्वी आदि की कथा और उनका शाक्यसिंह का पूजन) (९) दशभूमीश्वर। ३. अठारह की संख्या। ४. शिव। ५. कार्षापण। एक पुराना सिक्का।

पुराणकल्प
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पुराकल्प'।

पुराणग
संज्ञा पुं० [सं०] १. ब्रह्मा। २. पुराण कहनेवाला। पुराणवक्ता।

पुराणचौर व्यंजन
संज्ञा पुं० [सं० पुराणचौर व्यञ्जन] वे गुप्तचर जो पुराने चोर डाकुओं के वेश में रहते थे। विशेष— कौटिल्य ने लिखा है कि ये लोग चोरों बदमाशों के अड्डों और शत्रु के पक्षवालों की मंडली आदि का पता रखते थे और समाहर्ता के अधीन काम करते थे।

पुराणपण्य
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार पुराना माल।

पुराणपुरुष
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्णु। २. जरठ या वृद्ध व्यक्ति [को०]।

पुराणभांड
संज्ञा पुं० [सं० पुराणभाण्ड] कौटिल्य अर्थशास्त्र के अनुसार अंगड़ खंगड़ या पुराना माल असबाब।

पुरणांत
संज्ञा पुं० [सं० पुराणान्त] यम [को०]।

पुरातत्व
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल संबंधी विद्या। प्रत्न शास्त्र।

पुरातत्ववेत्ता
संज्ञा पुं० [सं० पुरातत्व + वेत्ता] पुराविद्। प्राचीन इतिहास और संस्कृति का विद्वान। उ०—अब पुरातत्वेवेत्ताओं ने तदनुरूप स्थानों की खोजें एवं परिकल्पनाएँ कर ली हैं।— आ० भा०, पृ० ५।

पुरातन (१)
वि० [सं०] १. प्राचीन। पुराना। २. सर्वप्राचीन। सबसे पूर्व का (को०)।

पुरातन (२)
संज्ञा पुं० १. विष्णु। २. प्राचीन आख्यान (को०)। यौ०— पुरातनपुरुष = बिष्णु। उ०— पुरुष पुरातन की वधू क्यों न चंचला होइ।

पुरातनता
संज्ञा स्त्री० [सं० पुरातन + ता प्रत्य०] पुरानापन। पुरातन होने का भाव। उ०— पुरातनता का यह निर्भीक सहन करती न प्रकृति पल एक।— कामायनी, पृ० ५५।

पुरातनवाद
संज्ञा पुं० [सं० पुरातन + वाद] १. पुरातनता का सिद्धांत। पुरातनता का दृष्टिकोण। उ०— पर पुरातनवाद के तुम अंध पोषक।—भूमि०, पृ० ५। २. पुरातन के प्रति अनुराग। पुरातनता का प्रेम।

पुरातम
वि० सं० [पुरा + तम] पुरातन। पुराना। प्राचीन। उ०—गई गोपि ह्वै भक्ति आगिली काढे़ प्रगट पुरातम खास।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० १५३।

पुरातल
संज्ञा पुं० [सं०] तलातल।

पुराधिप
संज्ञा पुं० [सं०] नगर का अधिकारी। नगर का शासन और रक्षा करनेवाला अधिकारी [को०]।

पुराध्यक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पुराधिप' [को०]।

पुरान † (१)
वि० [सं० पुराण] दे० 'पुराना'।

पुरान (२)
संज्ञा पुं० दे० 'पुराण'। उ०— पूरन ब्रह्म पुरान बखाने।चतुरानन सिव अंत न जाने।—पौद्दार अभि० ग्रं०, पृ० २५१।

पुराना (१)
वि० [सं० पुण्ण] [वि० स्त्री० पुरानी] १. जो किसी समय के बहुत पहले से रहा हो। जो किसी विशेष समय में भी हो और उसके बहुत पूर्व तक लगातार रहा हो। जिसे उत्पन्न हुए, बने या अस्तित्व में आए बहुत काल हो गया हो। जो बहुत दिनों से चला आता हो। बहुत दिनों का। जो नया न हो। प्राचीन। पुरातन। बहुपूर्वकालव्यापी। जैसे, पुराना पेड़, पुराना घर, पुराना जूता, पुराना चावल, पुराना ज्वर, पुराना बैर, पुरानी रीति। २. जो बहुत दिनों का होने के कारण अच्छी दशा में न हो। जीर्ण। जैसे,— तुम्हारी टोपी अब बहुत पुरानी हो गई बदल दो। उ०— छुवतहि टूट पिनाक पुराना।— तुलसी (शब्द०)। क्रि० प्र०—पड़ना।—होना। यौ०—फटा पुराना। पुराना धुराना। ३. जिसने बहुत जमाना देखा हो। जिसका अनुभव बहुत दिनों का हो। परिपक्व। जिसका अनुभव पक्का हो गया हो। जिसमें कचाई न हो। जैसे,— (क) रहते रहते जब पुराने हो जाओगे तब सब काम सहज हो जायगा। (ख) पुराना काइयाँ, पुराना चोर। मुहा०— पुराना खुर्राट = (१) बूढ़ा। (२) बहुत दिनों कर अनुभवी। किसी बात में पक्का। पुरानी खोपड़ी = दे० 'पुराना खुर्राट'। पुराना घाघ = किसी बात में पक्का। बहुत दिनों तक अनुभव करते करते जो गहरा चालाक हो गया हो। गहरा काइयाँ। पुरानी लीक पीटना = पुराना बुनना। नई सभ्यता, नए संस्कार, विचार आदि का विरेधी होना। पुरानपंथी बनना। उ०— कोई पुरानी लीक पीटै है कोई कहता है नया।— भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ५७१। पुराने मुर्दे उखेड़ना = भूली बिसरी बात की याद दिलाना। गई बीती बात की चर्चा छेड़ना। अतीत की अप्रिय बातों की सुधि दिलाना। उ०— अः तुम तो पुराने मुर्दे उखेड़ती हो ! बेकार।—सैर कु०, पृ० २६। ४. जो बहुत पहले रहा हो, पर अब न हो। बहुत पहले का। अगले समय का। प्राचीन। अतीत। जैसे, (क) पुराना समय, पुराना जमाना। (ख) पुराने राजाओं की बात ही और थी। (ग) पुराने लोग जो कह गए हैं ठीक कह गए हैं। (घ) पुरानी बात उठाने से अब क्या लाभ ? ५. काल का। समय का। जैसे यह चावल कितना पुराना है ? ६. जिसका चलन अब न हो। जैसे, पुराना पहनावा।

पुराना (२)
क्रि० स० [हिं० पूरना का प्रे० रूप] १. पूरा करना। पुजवाना। भराना। २. पालन करना। अनुकूल बात कराना। जैसे, शर्त पुराना। उ०— मारि मारि सब शत्रु तुर्त निज सर्त पुरावत।—गोपाल (शब्द०)। ३. पूरा करना। भरना। पुजाना। किसी धाव, गड्ढे या खाली जगह को किसी वस्तु से छेक देना। जैसे, धाव पुराना। ४. पूरा करना। पालन करना। अनुकूल बात करना। अनुसरण करना। उ०— सूरदास प्रभु ब्रज गोपिन के मन अभिलाख पुराए।—सूर (शब्द०)। ५. इस प्रकार बाँटना कि सबको मिल जाय। अँटाना। पूरा डालना। †६. आटे आदि से चौक बनवाना। जैसे, चौक पुराना। उ०— गजमुकुता हीरामनि चौक पुराइय हो।—तुलसी ग्रं०, पृ० ३। संयो० क्रि०—देना।—लेना।

पुरानि पु
वि० [हिं०] पुरानी। उ०— चादर भई पुरानि दिनों दिन बार न कीजै। सत संगत में सौंद ज्ञान का साबुन दीजै।—पलटू०, भा० १, पृ० ४।

पुरायठ पु †
वि० [हिं० पुराना] अत्यधिक पुराना। पुष्ट। बलिष्ठ। उ०— मनहुँ पुरायठ अजगर द्वै सनमुख औंचक मिलि।— प्रेमघन०, भा० १, पृ० २२।

पुरायोनि
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०]।

पुराराति, पुरारि
संज्ञा पुं० [सं०] शिव। उ०— अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवाँरि के।—मानस, १। ३२।

पुरारी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पुरारि] दे० 'पुरारि'। उ०— मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जमत पुरारी।— मानस, १। १०।

पुराल पु †
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'पयाल'।

पुरावती
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक नदी (महाभारत)।

पुरावना पु
क्रि० स० [हिं० पुराना] दे० 'पूरना'। उ०— बहु विधि आरति साजि तो चौक पुरावहीं।—कबीर श०, भा० ४, पृ० ३।

पुरावसु
संज्ञा पुं० [सं०] भीष्म।

पुराविद्
वि० [सं०] पुरानी बातों या पुराने इतिहास का ज्ञाता [को०]।

पुरावृत्त
संज्ञा पुं० [सं०] पुराना वृत्तांत। पुराना हाल। इतिहास।

पुराषाट्
वि० [सं०] अनेकों का जेता। बहुतों को पराभूत करनेवाला [को०]।

पुरासाह्
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र।

पुरासिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सहदेवी। सहदेइया नाम की बूटी।

पुरासुहृद्
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०]।

पुरिंद्र पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पुरंदर'। उ०— भजै प्रभु ब्रह्म पुरिंद्र महेस भजै सनकादिक नारद सेस।— सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० २२।

पुरि (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पुरी। २. शरीर। ३. नदी।

पुरि (२)
संज्ञा पुं० १. राजा। २. दशनामी संन्यासियों में एक।

पुरिखा †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पुरखा'।

पुरिया (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूरना] वह नरी जिसपर जुलाहे बाने को बुनने के पहले फैलाते हैं। मुहा०—पुरिया करना = ताने को पुरिया पर फैलाना।

पुरिया † (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पुड़िया'।

पुरिशय
वि० [सं०] शरीर में रहनेवाला [को०]।

पुरिष पु
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष] दे० 'पुरुष'। उ०— पुरिष उपजै बिक्रमी, समर समर सम सोय।—प० रासो, पृ० ३४।

पुरिषा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० पुरखा। उ०— (क) लक्ष्मण के पुरिषान कियो पुरुषारथ सो न कह्यो परी।—केशव (शब्द०)। (ख) जिनके पुरिषा भुव गंगहि लाए। नगरी सुभ स्वर्ग सदेह सिधाए।—केशव (शब्द०)।

पुरिषातन पु
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष + तन (प्रत्य०)] दे० 'पुरुषत्व' उ०— पहुर रात पाछिली राज आए डेरा मधि। बढ़िय काम कामना भई पुरिषातन की सिधि।—पृ० रा०, १। ४०७।

पुरिसा पु
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष] दे० 'पुरसा'। उ०— पहिरण ओढन कंबला साठे पुरिसे नीर।—ढोला०, दू० ६६२।

पुरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नगरी। शहर। उ०— सोभा नहीं कहि जाय कछू विधिनै, रची मानो पुरीन की नामिका।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० २१। २. जगन्नाथपुरी। पुरुषोत्तम धाम। ३. शरीर (को०)। ४. दुर्ग (को०)।

पुरीतत
संज्ञा स्त्री० [सं० पुरीतत्] हृदय के पास की एक विशेष नाड़ी। आँत [को०]।

पुरीमोह
संज्ञा पुं० [सं०] धतूरा।

पुरीष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. विष्टा। मल। गू। २. कूड़ा कचड़ा (को०)। ३. जल।

पुरीष † (२)
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पुरुष' उ०— नल राजा मेल्हे गयो, पुरीष समौ नहीं निगुण संसार।—बी० रासो, पृ० ६४।

पुरीषण
संज्ञा पुं० [सं०] १. मल। गू। २. मलत्याग [को०]।

पुरीषनिग्रहण
संज्ञा पुं० [सं०] कोष्ठवद्धता [को०]।

पुरीषम
संज्ञा पुं० [सं०] माष। उरद।

पुरीषोत्सर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] मलत्याग [को०]।

पुरु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. देवलोक। स्वर्ग। २. एक दैत्य जिसे इंद्र ने मारा था। ३. पराग। ४. एक पर्वत। ५. शरीर। ६. बृहत्संहिता के अनुसार एक देश। ७. एक प्राचीन राजा जो नहुष के पुत्र ययाति के पुत्र थे। विशेष— पुराणों में ययाति चंद्रवंश के मूल पुरुषों में थे। ययाति की दो रानियाँ थीं। एक शुक्राचार्य की कन्या देवयानी, दूसरी शर्मिष्ठा। देवयानी के गर्भ से यदु और तुर्वसु तथा शर्मिष्ठा के गर्भ से द्रुह्यु, अनु और पुरु हुए। इन नामों का उल्लेख ऋग्वेद में है। पुरु के बडे़ भारी विजयी और पराक्रमी होने की चर्चा भी ऋग्वेद में है। एक स्थान पर लिखा है— 'हे वैश्वानर ! जब तुम पुरु के समीप पुरियों का विध्वंस करके प्रज्वलित हुए तब तुम्हारे भय से असिक्नी (असिक्नीर- सितवर्णाः—सायण; अर्थात् असिक्नी या चेनाब के किनारे के काले अनार्य दस्यु) भोजन छोड़ छोड़कर आए'। एक स्थान पर और भी है—'हे इंद्र ! तुम युद्ध में भूमिलाभ के लिये पुरुकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु और पुरु की रक्षा करो।' इसका समर्थन एक और मंत्र इस प्रकार करता है—'हे इंद्र ! तुमने पुरु और दिवोदास राजा के लिये नब्बे पुरों का नाश किया है।' महाभारत और पुराणों में पुरु के संबंध में यह कथा मिलती हैं— शुक्राचार्य के शाप से सब ययाति जराग्रस्त हुए तब उन्होंने सब पुत्रों को बुलाकर अपना बुढ़ापा देना चाहा। पर पुरु को छोड़ और कोई बुढ़ापा लेकर अपनी जवानी देने पर सम्मत न हुआ। पुरु से यौवन प्राप्त कर ययाति ने बहुत दिनों तक सुखभोग किया, अंत में अपने पुत्र पुरु को राज्य दे वे वन में चले गए। पुरु के वंश में ही दुष्यंत के पुत्र भरत हुए। भरत के कई पीढिय़ों पीछे कुरु हुए जिनके नाम से कौरव वंश कहलाया। ८. पंजाब का एक राजा जो ईसा से ३२७ वर्ष पहले सिकंदर से लड़ा था। पोरस।

पुरु (२)
क्रि० वि० १. अधिक। बहुत से। कई। २. अकसर। बारबार। पुनः पुनः [को०]।

पुरुकुत्स
संज्ञा पुं० [सं०] एक राजा जो मांधाता का पुत्र और मुचुकुंद का भाई था और नर्मदा नदी के आसपास के प्रदेश पर राज्य करता था। विशेष— हरिवंश पुराण में लिखा गया है कि नागों की भगिनी नर्मदा के साथ इसने विवाह किया था। नागों और नर्मदा के कहने से पुरुकुत्स ने रसातल में जाकर मौनेय गंधर्वों का नाश किया था। ऋग्वेद में भी पुरुकुत्स का नाम आया है। उसमें लिखा है कि दस्युनगर का ध्वंस करने में इंद्र ने राजा पुरुकुत्स की सहायता की थी। (१। ६३। ७; १। ११२। १७)।

पुरुकुत्सव
संज्ञा पुं० [सं०] गरुड़पुराण के अनुसार इंद्र के एक शत्रु का नाम।

पुरुख पु ‡
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष] दे० 'पुरुष'।

पुरुखा
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष हिं०] १ दे० 'पुरखा'। २. †ईश्वर। ब्रह्म। उ०—की धौं जलहीं रहै तब पुरखा। पढे़उ वेद यह लखेउ न मूर्खा।—कबीर सा०, पृ० ४२८।

पुरुजित्
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुंतिभोज का पुत्र। यह अर्जुन का मामा था और महाभारत के युदध में आया था। २. विष्णु। ३. भागवत के अनुसार शशबिंदु वंशीय रुचक के पुत्र का नाम।

पुरुदंशक
संज्ञा पुं० [सं०] हंस।

पुरुदंशा
संज्ञा पुं० [सं० पुरुदंशस्] इंद्र।

पुरुद
संज्ञा पुं० [सं०] सोना। स्वर्ण [को०]।

पुरुदत्र
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र का एक नाम [को०]।

पुरुदस्म
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु।

पुरुद्रुह
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र का एक नाम [को०]।

पुरब †
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्व दिशा। उ०— पछिवँ क वार पुरुब की वारी। लिखी जो जोरी होइ न न्यारी।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३०६।

पुरुभोजा
संज्ञा पुं० [सं० पुरुभोजस्] मेघ। बादल।

पुरुमित्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्राचीन राजा जिसका नाम ऋग्वेद में आया है। २. धृतराष्ट्र का एक पुत्र।

पुरुलंपट
वि० [सं० पुरुलम्पट] अत्यधिक लंपट। बहुत कामी [को०]।

पुरुष
संज्ञा पुं० [सं०] १. मनुष्य। आदमी। २. नर। ३. सांख्य के अनुसार प्रकृति से भिन्न भिन्न अपरिणामी, अकर्ता और असंग चेतन पदार्थ। आत्मा। इसी के सान्निध्य में प्रकृति संसार की सृष्टि करती है। दे० 'सांख्य'। ४. विष्णु। ५. सूर्य। ६. जीव। ७. शिव। ८. पुन्नाग का वृक्ष। ९. पारा। पारद। १०. गुग्गुल। ११. घोडे़ की एक स्थिति जिसमें वह अपने दोनों अगले पैरों को उठाकर पिछले पैरों के बल खड़ा होता है। जमना। सीखपाँव। १२. व्याकरण में सर्वनाम और तदनुसारिणी क्रिया के रूपों का वह भेद जिससे यह निश्चय होता है कि सर्वनाम या क्रियापद वाचक (कहनेवाले) के लिये प्रयुक्त हुआ है अथवा संबोध्य (जिससे कहा जाय) के लिये अथवा अन्य के लिये। जैसे 'मैं' उत्तम पुरुष हुआ, 'वह' प्रथम पुरुष और 'तुम' मध्यम पुरुष। १३. मनुष्य का शरीर या आत्मा। १४. पूर्वज। उ०— (क) सो सठ कोटिक पुरुष समेता। बसहिं कलप सत नरक निकेता।—तुलसी (शब्द०)। (ख) जा कुल माहिं भक्ति मम होई। सप्त पुरुष ले उधरै।—सूर (शब्द०)। १५. पति। स्वामी। १६. ज्योतिष में विषम राशियाँ (को०)। १७. ऊँचाई या गहराई की एक माप। पुरसा (को०)। १८. आँख की पुतली। नेत्र की तारिका (को०)। १९. मेरु पर्वत (को०)।

पुरुषक
संज्ञा पुं० [सं०] घोडे़ का जमना। सीखपाँव। अलफ।

पुरुषकार
संज्ञा पुं० [सं०] पुरुषार्थ। उद्योग। पौरुष।

पुरुषकेशरी
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषकेशरिन्] १. पुरुषों में श्रेष्ठ पुरुष। २. नरसिंह भगवान्।

पुरुषकेसरी
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषकेसरिन्] दे० 'पुरुषकेशरी' [को०]।

पुरुषगति
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार का साम।

पुरुषग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष के अनुसार मंगल, सूर्य और बृहस्पति।

पुरुषघ्नी
वि० स्त्री० [सं०] पति की हत्या करनेवाली [को०]।

पुरुषत्व
संज्ञा पुं० [सं०] पुरुष होने का भाव। पुंस्त्व।

पुरषदंतिका
संज्ञा स्त्री० [सं० पुरुषदन्तिका] मेदा नाम की ओषधि।

पुरुषदघ्न
वि० [सं०] एक मनुष्य की ऊँचाई के बराबर। पुरुष- प्रमाण [को०]।

पुरुद्विट्
संज्ञा पुं० [सं०] वह जो पुरुष अर्थात् विष्णुद्रोही हो [को०]।

पुरुषद्वेषिणी
संज्ञा पुं० [सं०] पति से द्वेष या घृणा करनेवाली (स्त्री०)।

पुरुषद्वेषी
वि० [सं० पुरुषद्वेषिन्] [वि० स्त्री० पुरुषद्वेषिणी] मनुष्य से द्वेष रखनेवाला।

पुरुषधौरेयक
संज्ञा पुं० [सं०] वरिष्ठ व्यक्ति। श्रेष्ठ या महान् व्यक्ति [को०]।

पुरुषनक्षत्र
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष शास्त्रानुसार हस्त, मूल, श्रवण, पुनर्वसु, मृगशिरा और पुष्य नक्षत्र।

पुरुषनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] सेनापति। २. नरनाथ। राजा।

पुरुषपशु
संज्ञा पुं० [सं०] पशुवत् मनुष्य। नरपशु। क्रूर व्यक्ति [को०]।

पुरुषपुंगव
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषपुङ्गव] श्रेष्ठ पुरुष। सुप्रसिद्ध व्यक्ति [को०]।

पुरुषपुंडरीक
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषपुणडरीक] जैनियों ने मतानुसार नव वासुदेवों में सप्तम वासुदेव।

पुरुषपुर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन नगर जो गांधार की राजधानी था। आजकल का पेशावर।

पुरुषप्रेक्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] मरदाना मेला तमाशा। वह खेल तमाशा जिसमें पुरुष ही जा सकते हों।

पुरुषभोग
वि० [सं०] (वह राष्ट्र या राजा) जिसके पास सेना या आदमी बहुत हों।

पुरुषमात्र
वि० [सं०] पुरुषप्रमाण। मनुष्य के बराबर [को०]।

पुरुषमानी
वि० [सं०] अपने को वीर समझनेवाला [को०]।

पुरुषमेध
संज्ञा पुं० [सं०] एक वैदिक यज्ञ जिसमें नरबलि की जाती थी। विशेष— इस यज्ञ के करने का अधिकार केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय को था। यह यज्ञ चैत्र मास की शुक्ला दशमी से प्रारंभ होता था और चालीस दिनों में होता था। इस बीच में २३ दीक्षा, १२ उपसत् और ५ सूत्या होती थी। इस प्रकार यह ४० दिनों में समाप्त होता था। यज्ञ के समाप्त हो जाने पर यज्ञकर्ता वानप्रस्थाश्रम ग्रहण करता था। इसका विधान शुक्ल यजुर्वेद के तेईसवें अध्याय तथा शतपध ब्राह्मण में है।

पुरुषराव पु
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष + हिं० राव] पुरुषराज। पुरुष- श्रेष्ठ।

पुरुषराशि
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्योतिष शास्त्रानुसार मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु, और कुंभ राशि।

पुरुषलिंग
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष + लिङ्ग] दे० 'पुलिंग'।

पुरुषवर
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु [को०]।

पुरुषवर्जित
वि० [सं०] सुनसान। वीरान [को०]।

पुरुषवार
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष शास्त्रानुसार रवि, मंगल, बृहस्पति और शनिवार।

पुरुषवाह
संज्ञा पुं० [सं०] १. गरुड़। तार्क्ष्य। २. यक्षराज। कुबेर [को०]।

पुरुषव्रत
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का साम।

पुरुषशीर्पक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का मनुष्य का बनावटी सिर जिसको सेंघ लगानेवाले सेंध में प्रविष्ट कराते थे [को०]।

पुरुषसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० पुरुषसन्धि] वह संधि जो शत्रु कुछ योग्य पुरुषों को अपनी सेवा के लिये लेकर करे। विशेष— कौटिल्य ने लिखा है कि यदि ऐसी अवस्था आ पडे़ तो राजा शत्रु को इस प्रकार के लोग दे— राजद्रोही, जंगली, अपने यहाँ के अपमानित सामंत आदि। इससे राजा का इनसे पीछा भी छूट जायगा और ये शत्रु के यहाँ जाकर मौका पाकर उसकी हानि भी करेंगे।

पुरुषसिंघ
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषसिंह] दे० 'पुरुषसिंह'। उ०— अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुषसिंघ बन खेलन आए।— मानस, ३। १६।

पुरुषसिंह
संज्ञा पुं० [सं०] श्रेष्ठ पुरुष। मनुष्यों में सिंह की भाँति वीर व्यक्ति [को०]।

पुरुषसूक्त
संज्ञा पुं० [सं०] ऋग्वेद के दशम मंडल के एक सूक्त का नाम जो 'सहस्रशीर्षा' से आरंभ होता है। यह सूक्त बहुत प्रसिद्ध है और इसका पाठ अनेक अवसरों पर किया जाता है।

पुरुषांग
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषाङ्ग] पुरुष की जननेंद्रिय। लिंग [को०]।

पुरुषांतर
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषान्तर] अन्य व्यक्ति। दूसरा व्यक्ति।

पुरुषांतरसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० पुरुषान्तरसन्धि] इस शर्त पर की हुई संधि कि आपका सेनापति मेरा अमुक काम करे और मेरा सेनापति आपका अमुक काम कर देगा।

पुरुषाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. (मनुष्य खानेवाला) राक्षस। २. बृहत्संहिता के अनुसार एक देश का नाम जो आर्द्रा, पुनर्वसु और पुष्य के अधिकार में है।

पुरुषादक
संज्ञा पुं० [सं०] १. नरभक्षी राक्षस। २. कल्माषपाद का नाम।

पुरुषाद्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. जिनों में प्रथम, आदिनाथ (जैन)। २. विष्णु। ३. राक्षस।

पुरुषाधम
संज्ञा पुं० [सं०] अधम व्यक्ति। नीच पुरुष।

पुरुषापाश्रया
संज्ञा स्त्री० [सं०] घनी आबादीवाली भूमि। वि० दे० 'दुर्गापाश्रया भूमि'।

पुरुषायण
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्राणादि षोडश कला (प्रश्नोप- निषद्)। २. दे० 'पुरुषार्थ'।

पुरुषायित
संज्ञा वि० [सं०] पुरुष के सदृश आचरण या व्यवहार।

पुरुषायितबँध
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषायितबन्ध] कामशास्त्र के अनुसार एक प्रकार का बंध या स्त्रीसंभोग का एक प्रकार जिसमें पुरुष नीचे चित्त लेटता है और स्त्री उसके ऊपर लेटकर संभोग करती है। इसके कई भेद कहे गए हैं। साहित्य में इसी को 'विपरीत रति' कहा गया है।

पुरुषायुष
संज्ञा पुं० [सं०] सौ वर्ष का काल (जो मनुष्य की पूर्णायु का काल माना गया है)।

पुरुषारथ पु
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषार्थ] दे० 'पुरुषार्थ'।

पुरुषार्थ
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुरुष का अर्थ या प्रयोजन जिसके लिये उसे प्रयत्न करना चाहिए। पुरुष के उद्योग का विषय। पुरुष का लक्ष्य। विशेष— सांख्य के मत से त्रिविध दुख की अत्यंत निवृत्ति (मोक्ष) ही परम पुरुषार्थ है। प्रकृति पुरुषार्थ के लिये अर्थात् पुरुष को दुःखों से निवृत्त करने के लिये निरंतर यत्न करती है, पर पुरुष प्रकृति के धर्म को अपना धर्म समझ अपने स्वरूप को भूल जाता है। जबतक पुरुष को स्वरूप का ज्ञान नहीं हो जाता तबतक प्रकृति साथ नहीं छोड़ती। पुराणों के अनुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पुरुषार्थ हैं। चार्वाक मतानुसार कामिनी-संग-जनित सुख ही पुरुषार्थ है। २. पुरुषकार। पौरुष। उद्यम। पराक्रम। ३. पुंस्त्व। शक्ति। सामर्थ्य। बल।

पुरुषार्थी
वि० [सं० पुरुषार्थिन्] १. पुरुषार्थ करनेवाला। २. उद्योगी। ३. परिश्रमी। ४. बली। सामर्थ्यवान्।

पुरुषाशी
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषाशिन्] [स्त्री० पुरुषाशिनी] (मनुष्य खानेवाला) राक्षस।

पुरुषास्थि
संज्ञा पुं० [सं०] मनुष्य की हड्डी।

पुरुषास्थिमाली
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषास्थिमालिन्] शिव [को०]।

पुरुषी
संज्ञा स्त्री० [सं०] नारी। स्त्री [को०]।

पुरुषेंद्र
संज्ञा पुं० [सं० पुरुषेन्द्र] १. राजा। २. श्रेष्ठ पुरुष।

पुरुषोत्तम
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुरुषश्रेष्ठ। श्रेष्ठ पुरुष। २. विष्णु। ३. जगन्नाथ जिनका मंदिर उड़ीसा में है। ४. धर्म- शास्त्रानुसार वह निष्पाप पुरुष जो शत्रु मित्र आदि से सर्वदा उदासीन रहे। ५. जैनियों के एक वासुदेव का नाम। ६. कृष्णचंद्र। ७. ईश्वर। नारायण। ८. अच्छा व्यक्ति या सहयोगी (को०) । ९. मलमास का महीना। अधिक मास।

पुरुषोत्तम क्षेत्र
संज्ञा पुं० [सं०] जगन्नाथपुरी।

पुरुषोत्तम मास
संज्ञा पुं० [सं०] मलमास। अधिक मास।

पुरुषोपस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] अपने स्थान पर किसी दूसरे व्यक्ति को काम करने के लिये देना। एवज देना।

पुरुहूत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र। यौ०— पुरुहूतद्विष = इंद्रजीत।

पुरुहूत (२)
वि० जिसका आवाहन बहुतों ने किया हो।

पुरुहूति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दाक्षायणी।

पुरुहूति (२)
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु।

पुरुरवा
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक प्राचीन राजा जिसका नाम और कुछ वृत्तांत ऋग्वेद में है।विशेष— ऋग्वेद को पुरुरवा को इला का पुत्र कहा है। पुरुरवा और उर्वशी का संवाद भी ऋग्वेद में मिलता है। पर एक मंत्र में पुरुरवा सूर्य और ऊषा के साथ स्थित भी कहा गया है जिससे कुछ लोग सारी कथा को एक रूपक भी कह दिया करते हैं। हरिवंश तथा पुराणों के अमुसार बृहस्पति की स्त्री तारा और चंद्रमा के संयोग से बुध उत्पन्न हुए जो चंद्रवंश के आदि पुरुष थे। बुध का इला के साथ विवाह हुआ। इसी इला के गर्भ से पुरुरवा उत्पन्न हुए जो बडे़ रुपवान्, बुद्धिमान् और पराक्रमी थे। उर्वशी शापवश भूलोक में आ पड़ी थी। पुरुरवा ने उसके रूप पर मोहित हो उसके साथ विवाह के लिये कहा। उर्वशी ने कहा— 'मैं अप्सरा हूँ। जबतक आप मेरी तीन बातों का पालन करेंगे तभी तक मैं आपके पास रहूँगी— (१) मैं आपको कभी नंगा न देखूँ, (२) अकामा रहूँ तो आप संयोग न करें और (३) मेरे पलँग के पास दो मेढे़ बँधे रहें।' राजा ने इन बातों को मानकर विवाह किया और वे बहुत दिनों तक सुखपूर्वक रहे। एक दिन गंधर्व उर्वशी के शापमोचन के लिये दोनों मेढे़ छोड़कर ले चले। राजा नंगे उनकी और दौडे़। उर्वशी का शाप छूट गया और वह स्वर्ग को चली गई। पुरुरवा बहुत दिनों तक विलाप करते घूमते रहे। एक बार कुरुक्षेत्र के अंतर्गत प्लक्ष तीर्थ में हेमवती पुष्करिणी के किनारे उन्हें उर्वशी फिर दिखाई पड़ी। राजा उसे देखकर बहुत विलाप करने लगे। उर्वशी ने कहा — 'मुझे आपसे गर्भ है, मैं शीघ्र आपके पुत्रों को लेकर आपके पास आऊँगी और एक रात रहूँगी।' स्वर्ग में उर्वशी के गर्भ से आयु, अमावसु, विश्वायु, श्रुतायु, दृढायु, बनायु, और शतायु उत्पन्न हुए जिन्हें लेकर वह राजा के पास आई और एक रात रही। गंधर्वों ने पुरुरवा को एक अग्निपूर्ण स्थाली दी। उस अग्नि से राजा ने बहुत से यज्ञ किए। पुरुरवा की राजधानी प्रयाग में गंगा के किनारे थी। उसका नाम प्रतिष्ठानपुर था। २. विश्वदेव। ३. पार्वण श्राद्ध में एक देवता।

पुरेँन †
संज्ञा स्त्री० [सं० पुटकिनी, हिं० पुरइन] दे० 'पुरइन'। उ०— ज्यों पुरेंन पर फुल्ल पद्मिनी तर चली, चले सहारा दिए हंस सम युग बली।—साकेत, पृ० १३४।

पुरेथा
संज्ञा पुं० [हिं० पूरा + हाथ] हल की मूठ। परिहथा।

पुरेभा
संज्ञा स्त्री० [सं० करभ, हिं० कुरेभा] एक प्रकार की गाय। दे० 'कुरेभा'।

पुरैन
संज्ञा स्त्री० [सं० पुटकिनी] दे० 'पुरइन'।

पुरैनि पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पुरइन'।

पुरोगंता
वि०, संज्ञा पुं० [सं० पुरोगन्तृ] दे० पुरोगामी [को०]।

पुरोग
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार वह (राष्ट्र या राजा) जो बिना किसी प्रकार की बाधा या शर्त का अपने पक्ष में आकर मिले।

पुरोगति
संज्ञा पुं० [सं०] श्वान [को०]।

पुरोगामिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] अग्रगामी होने का भाव। आगे बढ़ने का भाव। उ०— इस प्रकार हम पुरोगामिता और न्याय को पूर्णतया स्वीकार करते हैं।—आ० अ० रा०, पृ० २२।

पुरोगामी (१)
वि० [सं० पुरोगामिन्] [वि० स्त्री० पुरोगामिनी] अग्रगामी।

पुरोगामी
संज्ञा पुं० १. श्वान। २. अग्रगामी व्यक्ति। २. प्रधान व्यक्ति। नायक [को०]।

पुरोचन
संज्ञा पुं० [सं०] दुर्योधन के एक मित्र का नाम। विशेष— इसे दुर्योधन ने पांडवों को लाक्षागृह में जलाने के लिये नियुक्त किया था। भीमसेन लाक्षागृह से निकल पुरोचन के घर आग लगाकर माता और भाइयों समेत चले गए थे। वह अपने घर में जलकर मर गया।

पुरोजन्मा (१)
वि० [सं० पुरोजन्मन्] पहले जनमनेवाला। जिसने पहले जन्म लिया हो [को०]।

पुरोजन्मा (२)
संज्ञा पुं० [सं०] बड़ा भाई। ज्येष्ठ भ्राता [को०]।

पुरोजव (१)
संज्ञा पुं० [सं०] पुष्कर द्वीप के सात खंडों में से एक खंड।

पुरोजव (२)
वि० १. जिसके अग्रभाग में वेग हो। २. आगे बढ़नेवाला।

पुरोटि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नदी की धारा या प्रवाह। २. पत्र- मर्मर। पत्रशब्द। पत्तियों की खरखराहट (को०)।

पुरोडाश्, पुरोडाश
संज्ञा पुं० [सं०] १. यव आदि के आटे की बनी हुई टिकिया जो कपाल में पकाई जाती थी। पिशेष— यह आकार में लंबाई लिए गोल और बीच में कुछ मोटी होती थी। यज्ञों में इसमें से टुकड़ा काटकर देवताओं के लिये मंत्र पढ़कर आहुति दी जाती थी। यह यज्ञ का अंग है। २. हवि। ३. वह हवि या पुरोडाश जो यज्ञ से बच रहे। ४. वह वस्तु जो यज्ञ में होम की जाय। यज्ञभाग। ५. सोमरस। ६. आटे की चौंसी (चमसी ?)। ७. वे मंत्र जिनका पाठ पुरोडाश बनाते समय किया जाता है।

पुरोत्सव
संज्ञा पुं० [सं०] पूरे नगर में मनाया जानेवाला उस्तव [को०]।

पुरोदभवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] महामेदा।

पुरोद्यान
संज्ञा पुं० [सं०] नगर के अंदर का उपवन [को०]।

पुरोध
संज्ञा पुं० [सं०] पुरोहित।

पुरोधा
संज्ञा पुं० [सं० पुरोधस्] पुरोहित।

पुरोधानीय
संज्ञा पुं० [सं०] पुरोहित।

पुरोधिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रियतमा भार्या। प्यारी स्त्री।

पुरोनुवाक्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. यज्ञों की तीन प्रकार की आहुतियों में एक। २. वह ऋचा जिसे पढ़कर पुरोनुवाक्या नाम की आहुति दी जाती है।

पुरोभागी
वि० [सं० पुरोभागिन्] [वि० स्त्री० पुरोभागिनी]१. अग्रभागवाला। २. दोषदर्शी। गुणों को छोड़ केवल दोषों की ओर ध्यान देनेवाला। छिद्रान्वेषी।

पुरोमारुत
संज्ञा पुं० [सं०] पुरोवात। पुरुवा हवा [को०]।

पुरोरवस
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पुरुरवा'।

पुरोवात
संज्ञा पुं० [सं०] पूर्व दिशा से चलनेवाली हवा। पुरुवा [को०]।

पुरोवाद
संज्ञा पुं० [सं०] पहले का कथन। पूर्वकथन [को०]।

पुरोहित
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० पुरोहितानी] वह प्रधान याजक जो राजा या और किसी यजमान के यहाँ अगुआ बनकर यज्ञादि श्रौतकर्म, गृहकर्म और संस्कार तथा शांति आदि अनुष्ठान करे कराए। कर्मकांड करनेवाला। कृत्य करनेवाला ब्राह्मण। विशेष— वैदिक काल में पुरोहित का बड़ा अधिकार था और वह मंत्रियों में गिना जाता था। पहले पुरोहित यज्ञादि के लिये नियुक्त किए जाते थे। आजकल वे कर्मकांड करने के अतिरिक्त, यजमान की और से देवपूजन आदि भी करते हैं, यद्यपि स्मृतियों में किसी की ओर से देवपूजन करनेवाले ब्राह्मण का स्थान बहुत नीचा कहा गया है। पुरोहित का पद कुलपरंपरागत चलता है। अतः विशेष कुलों के पुरोहित भी नियत रहते हैं। उस कुल में जो होगा वह अपना भाग लेगा, चाहे कृत्य कोई दूसरा ब्राह्मण ही क्यों न कराए। उच्च ब्राह्मणों में पुरोहित कुल अलग होते हैं जो यजमानों के यहाँ दान आदि लिया करते हैं।

पुरोहिताई
संज्ञा स्त्री० [सं० पुरोहित + आई (प्रत्य०)] पुरोहित का काम।

पुरोहितानी
संज्ञा स्त्री० [सं० पुरोहित + हिं० आनी (प्रत्य०)] पुरोहित की स्त्री।

पुरोहितिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुरोहितानी [को०]।

पुरोहितिन †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पुरोहित + इन (प्रत्य०)] पुरोहित की स्त्री। पुरोहितानी।

पुरोहिती
संज्ञा स्त्री० [सं० पुरोहित + ई (प्रत्य०)] दे० 'पुरोहिताई'। उ०—फँसा आसुरी माया में, हिंसा जगी अथवा अपने पुरोहिती के मान की।—करुणा०, पृ० २७।

पुरौ †
संज्ञा पुं० [हिं०] पुरवट। पुर।

पुरौका
संज्ञा पुं० [सं० पुरोकस्] नगर में रहनेवाला व्यक्ति।

पुरौती †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूरना या सं० पूर्ति] पूति करना।

पुरौनी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूरना] १. समाप्त करना। पूर्ण करना २. समाप्ति। पूर्ति।

पुर्ख पु †
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष] दे० 'पुरुष'। उ०— पुर्ख अडोल वो सत्त सामर्थ मही, क्रुंहन के कीन्ह सभ जक्त जानी।—सं० दरिया, पृ० ७७।

पुर्जल
संज्ञा पुं० [हिं० पूरना] एक यंत्र जिसपर कलाबत्तू लपेट जाता है।

पुर्जा
संज्ञा पुं० [फा० पुर्जह] दे० 'पुरजा'।

पुर्तगाल
संज्ञा पुं० [अं०] योरप के दक्षिण पश्चिन कोने पर पड़नेवाला एक छोटा प्रदेश जो स्पेन से लगा हुआ है।

पुर्तगाली (१)
वि० [हिं० पुर्तगाल + ई (प्रत्य०)] १. पूर्तगाल संबंधी। २. पुर्तगाल का रहनेवाला। विशेष—योरप की नई जातियों में हिन्दुस्तान में सबसे पहले पुर्तगाली लोग ही आए। पुर्तगाली व्यारियों के द्वारा अकबर के समय से ही युरोपीय शब्द यहाँ की भाषा में मिलने लगे। जैसे, गिरजा, पादरी, आलू, तंबाकू आदि का प्रचार तभी से होने लगा।

पुर्तगाली (२)
संज्ञा स्त्री० पुर्तगाल की भाषा।

पुर्तगीज
वि० [अं०] पूर्तगाली। पुर्तगाल का रहनेवाला।

पुर्वला †
वि० [हिं०] दे० 'पूरबला'।

पुर्ष पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पुरुष'। उ०— अवल्ला इकल्ली। वियौ पूर्ष भिल्ली।— पृ० रा० १। ५९।

पुसाँहाल
वि० [फा० पुर्सा + अं० हाल] हाल पूछनेवाला। समाचार लेनेवाला। उ०— अभी पारसाल तक उसका कोई पुर्सांहल नहीं था।—शराबी, पृ० ६।

पुर्सा
संज्ञा पुं० [सं० पुरुष] दे० 'पुरसा'।

पुलंधर पु †
संज्ञा पुं० [सं० पुरन्दर] दे० 'पुरंदर'।

पुल (१)
संज्ञा पुं० [फा०] किसी नदी, जलाशय, गड्ढे या खाई के आर पार जाने का रास्ता जो नाव पाटकर या खंभों पर पटरियाँ आदि बिछाकर बनाया जाय। सेतु। मुहा०— पुल बँधना = पुल तैयार होना। पुल बाँधना = पुल तैयार करना। (किसी बात) का पुल बँधना = ढेर लगना। झड़ी बँधना। बहुत अधिकता होना। लगातार बहुत सा होना । (किसी बात का) पुल बाँधना = ढेर लगाना। झड़ी बाँधना। बहुत अधिकता कर देना। अतिशय करना। जैसे, बातों का पुल बाँधना, तारीफ का पुल बाँधना। पुल टूटना = (१) पुल गिर पड़ना। (२) बहुतायत होना। अधिकता होना। अटाला या जमघट लगना। जैसे,— देखने के लिये आदमियों का पुल टूट पड़ा।

पुल (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुलक। रोमांच। २. शिव का एक अनुचर।

पुल (३)
वि० विपुल। बहुत सा।

पुल (४)
संज्ञा पुं० [तु०] पैसा। पण [को०]।

पुलक
संज्ञा पुं० [सं०] १. रोमांच। प्रेम, हर्ष आदि के उद्वेग से रोमकूपों (छिदों) का प्रफुल्ल होना। त्वक्कंप। २. एक तुच्छ धान्य। एक प्रकार का मोटा अन्न। ३. एक प्रकार का रत्न। एक नग या बहुमुल्य पत्थर। याकूत। चुनरी। महताब। विशेष— यह भारत में कई स्थानों पर होता है पर राजपूताने का सबसे अच्छा होता है। दक्षिण में यह पत्थर निशाखपटम, गोदावरी, त्रिचिनापली और तिनावली जिलों में निकलता है। यह अनेक रंगों का होता है— सफेद, हरा, पीला, लाल, काला, चितकबरा। जितने भेद इस पत्थर के होते हैं उतने और किसी पत्थर के नहीं होते। यह देखने में कुछ दानेदार होता है। इसके द्वारा मानिक और नीलम कट सकते हैं।४. शरीर में पड़नेवाला एक कीड़ा। ५. रत्नों का एक दोष। ६. हाथी का रातिब। ७. हरताल। ८. एक प्रकार का मद्यपात्र। ९. एक प्रकार की राई। १०. एक गंधर्व का नाम। ११. एकप्रकार का गेरू। गिरिमारी। १२. एक प्रकार का कंद।

पुलकना पु
क्रि० अ० [सं० पुलक + ना (प्रत्य०)] पुलकित होना। प्रेम, हर्ष आदि के कारण प्रफुल्ल होना। गदगद होना।

पुलकस्पद
संज्ञा पुं० [सं० पुलक + स्पन्द] पुलकजनित स्पंदन। पुलकित होने की स्थिति। उ०— जग के दूषित बीज नष्ट कर, पुलकस्पंर भर लिखा स्पष्टतर।—अपरा, पृ० ५९।

पुलकांग
संज्ञा पुं० [सं० पुलकाङ्क] वरुण का पाश [को०]।

पुलकाई पु
संज्ञा स्त्री० [हि० पुलक + आई (प्रत्य०)] पुलकित होने का भाव। गदगद होना।

पुलकाना
क्रि० सं० [सं० पुलक + हिं० आना (प्रत्य०)] पुलकित करना। प्रफुल्लित करना। उ०—कुसुमों ने हँसना सिखलाया मृदु लहरों ने पुलकाया।—वीण, पृ० १२।

पुलकालय
संज्ञा पुं० [सं०] कुबेर का एक नाम।

पुलकालि
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुलकावलि। हर्ष से प्रफुल्ल रोमराजि। उ०— बीज राम गुनगन नयन जल अंकुर पुलकालि। सुकृती सुतन सुषेतवर बिलसत तुलसी सालि।—तुलसी (शब्द०)।

पुलकावलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] हर्ष से प्रफुल्ल रोम। रोमहर्ष।

पुलकित
वि० [सं०] रोमांचित। प्रेम या हर्ष के वेग से जिसके रोएँ उभर आए हों। गदगद।

पुलकी (१)
[वि० सं० पुलकिन्] [वि० स्त्री० पुलकिनी] रोमांचमुक्त। हर्ष या प्रेम से गदगद होनेवाला।

पुलकी (२)
संज्ञा पुं० [सं० पुलकिन्] १. धारा कदंब। २. कदंब।

पुलकोत्कंप
संज्ञा पुं० [सं० पुलकोत्कम्प] हर्षादि से रोमांचित हो काँपना [को०]।

पुलकोदगम, पुलकोदभेद
संज्ञा पुं० [सं०] पुलक होना। रोमांच या रोमहर्ष होना [को०]।

पुलग †
संज्ञा पुं० [सं० प्लवग?] अश्व। घोड़ा। उ०— पुलग साज तिणनिजरू गुजराय।—रघु० रू०, पृ० २४१।

पुलट †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पलटना] दे० 'पलट'।

पुलटिस
संज्ञा स्त्री० [अं० पोल्टिस] फोड़े, घाव, आदि को पकाने या बहाने के लिये उसपर चढ़ाया हुआ अलसी, रेंड़ी आदि का मोटा लेप। क्रि० प्र०—चढ़ाना।—बाँधना।

पुलना
क्रि० अ० [सं० √ पुल्] १. चलना। उ०— (क) जेती जउ मन माँहि, पंजर जइ तेती पुलइ।—ढोला०, दू० १७१। (ख) नाम निर्गुरण की गम्म कैसे लहै ताप तिर्गुराण के र्पथ पुलिया।— राम०, धर्म, पृ० १६९। २. काँपना। कंपित होना। उ०— छननंकि बान बजि गोम धंक। कायर पुलंत सूरा निसंक।—पृ० रा० १। ६५८।

पुलपुल †
वि० [नु०] दे० 'पुलपुला'।

पुलपुला
वि० [अनु०] जिसके भीतर का भाग ठोस न हो। जो भीतर इतना ढीला और मुलायम हो कि दबाने से धँस जाय। जो छूने में कड़ा न हो (विशेषतः फलों के लिये)। जैसे,—ये आम पककर पुलपुले हो गए हैं।

पुलपुलाना
क्रि० सं० [हिं० पुलपुला] १. किसी मुलायम चीज को दबाना। जैसे, आम पुलपुलाना। २. मुँह में लेकर दबाना। चूसाना। बिना चबाए खाना। जैसे, आम को मुँह में लेकर पुलपुलाना।

पुलपुलाहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० पुलपुला + हट (प्रत्य०)] पुलपुला होने का भाव। मुलायमियत।

पुलसरात
पुं० [फा० पुल + सरात] मुसलमानों के अनुसार (हिंदुओं की वैतरणी की भाँति) एक नदी का पुल जिसे मरने के उपरांत जीवों को पार करना पड़ता है। कहते हैं कि पापियों के लिये यह पुल बाल के समान पतला और पुण्या- त्माओं के लिये खासी सड़क के समान चौड़ा हो जाता है। उ०— नासिक पुलसरात पथ चला। तेहि कर मौहें हैं दुइ पला।—जायसी (शब्द०)।

पुलस्त पु
संज्ञा पुं० [सं० पुलस्त्य] दे० 'पुलस्त्य'।

पुलस्ति
संज्ञा पुं० [सं०] पुलस्त्य मृनि। उ०— सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा।—मानस, ६। २४।

पुलस्त्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक ऋषि जिनकी गनिती सप्तर्षियों और प्रजापतियों में है। विशेष— ये ब्रह्मा के मानसपुत्रों में थे। ये विश्रवा के पिता और कुबेर और रावण के पितामह थे। विष्णुपुराण के अनुसार ब्रह्मा के कहे हुए आदिपुराण का मनुष्यों के बीच इन्होंने प्रचार किया था। २. शिव का एक नाम।

पुलह
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक ऋषि जो ब्रह्मा के मानसपुत्रों ओर प्रजापतियों में से हैं। ये सप्तर्प्षियों में है। २. एक गंधर्व। ३. शिव का एक नाम।

पुलहना पु
क्रि० अ० [सं० पल्लवन] दे० 'पलुहना'। उ०— तोहि देखे, पिउ ! पुलहै कया। उमरा चित्त, बहुरी करु मया।—जायसी (शव्द०)।

पुलांग
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का वृक्ष जिसके पत्ते फरेंदे के पत्तें की तरह और फल गोल होते हैं जिनमें से गिरी निकलती है। इससे तेल निकलता है। यह वृक्ष उड़ीसा में होता है।

पुला
संज्ञा स्त्री० [सं०] उपजिह्विका [को०]।

पुलाक
संज्ञा पुं० [सं०] १. एक कदन्न। अँकरा। २. उबाला हुआ चावल। भात। ३. भात का माड़।। पीच। ४. मांसोदन। पुलाव। ५. अल्पता। संक्षेप। ६. क्षिप्रता जल्दी।

पुलाकी
संज्ञा पुं० [सं० पुलाकिन्] वृक्ष।

पुलायित
संज्ञा पुं० [सं०] घोड़े की एक चाल [को०]।

पुलाव
संज्ञा पुं० [सं० पुलाक, मि० फा० पलाव] एक व्यंजन याखाना जो मांस और चावल को एक साथ पकाने से बनता है। मांसोदन।

पुलिंग
संज्ञा पुं० [सं० पुल्लिङ्ग] दे० 'पुंलिग'। उ०— औरै रूप पुलिंग सों जानहुँ उर निरघार।— पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ५३०।

पुलिंद
संज्ञा पुं० [सं०] १. भारतवर्ष की एक प्राचीन असभ्य जाति। विशेष— ऐतरेय ब्राह्मण में लिखा है कि विश्वामित्र के जिन पुत्रों ने शुनःशेप को ज्येष्ठ नहीं माना था वे ऋषि के शाप से पतित हो गए। उन्हीं से पुलिंद, शबर आदि बर्बर जातियों की उत्पात्ति हुई। रामायण, महाभारत, पुराण, काव्य सबमें इस जाति का उल्लेख है। महाभारत सभापर्व में महादेव के दिग्विजय के संबंध में लिखा है कि उन्होंने अर्बुक राजाओं को जीतकर वाताधिप को वश में किया और उसके पीछे पुलिंदों को जातकर वे दक्षिण की ओर बढे़। कुछ लोगों के अनुमान के अनुसार यदि अर्बुक को आबू पहाड़ और वात को वातापिपुरी (बादामी) मानें तो गुजरात और राजपुताने के बीच पुलिंद जाति का स्थान ठहरता है। महाभारत (भीष्मपर्व) में एक स्थान पर 'सिंधुपुलिंदका; ' भी है इससे उनका स्थान सिंधु देश के आसपास भी सूचित होता है। वामनपुराण में पुलिंदों की उत्पत्ति की एक कथा है कि भ्रुणहत्या के प्रायश्चित्त के लिये इंद्र ने कालंजर के पास तपस्या की थी और उनके साथ उनके सहचर भी भूलोक में आए थे। उन्हीं सहचरों की संताति से पुलिंद हुए जो कालंजर और हिमाद्रि ते बीच बसते थे। अशोक के शहबाजगढ़ी के लेख में भी पुलिंद जाति का नाम आया है। २. वह देश जहाँ पुलिंद जाति बसती थी। ३. जहाज का मस्तूल (को०)।

पुलिंदा (१)
संज्ञा पुं० [सं० पुल (=ढेर) हिं० पूला] लपेटे हुए कंपड़े कागज आदि का छोटा मुट्ठा। गड़डी। पूला। गट्ठा। बंड़ल। जैसे, कागज का पुलिंदा।

पुलिंदा (२)
संज्ञा स्त्री० [?] एक छोटी नदी जो ताप्ती में मिलती है। महाभारत मे इसका उल्लेख है।

पुलिकेशि
संज्ञा पुं० [सं०] १. चालुक्यवंशीय एक राजा जिन्होंने ईसा की छठी शताब्दी में पल्लवी को राजधानी वातपिपुरी (बादामी) को जीतकर दक्षिण में चालुक्य राज्य स्थापित किया था। २. चालुक्यवंशीय एक सबसे प्रतापी राजा जो सन् ६१० के लगभग वातापितुरी के सिंहासन पर बैठा और जिसने सार दक्षिण और महाराष्ट्र प्रदेश अपने अधिकार में किया। विशेष— यह द्वितीय पुलिकेशि के नाम से प्रसिद्ध है। परम प्रतापी हर्षवर्धन, जिसकी राजसभा मे बाणभट्ट थे ओर जिसके समय में प्रसिद्ध चीनी यात्री हुएन्साँग भारतवर्ष आया था, इसका समकालीन था। हर्षवर्धन सारे उत्तरीय भारत को अपने अधिकार में लाया पर जब दक्षिण की ओर उसने चढ़ाई की तब पुलिकेशि के हाथ से गहरी हार खाकर भाग आया।

पुलिन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह सीड़ या कीचड़ की जमीन जिसपर से पानी हटे थोड़े ही दिन हुए हों। पानी के भीतर से हाल की निकली हुई जमीन। चर। २. नदी आदि का तट। तीर। किनारा। उ०—आवत धीर समीर तें, चल्या पुलिन को जात।—घनानंद, पृ० १७८। ३. नदी के बीच पड़ी हुई रेत। ४. एक यक्ष का नाम।

पुलिनवती
संज्ञा स्त्री० [सं०] नदी [को०]।

पुलिया †
संज्ञा स्त्री० [फा० पुल] छोटा पुल।

पुलिरिक
संज्ञा पुं० [सं०] सर्प। साँप।

पुलिश
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष के एक प्राचीन आचार्य जिनके नाम से पौलिश सिद्धांत प्रिसिद्ध है जो वराहमिहिरोक्त पंच सिद्धांतों में है। विशेष— अलबरूनी ने पुलिश या पलस को यूनानी (यवन) लिखा है। कुछ इतिहासज्ञों ने पुलिश को मिस्र देश का बताया है। आजकल मूल पौलिश सिद्धांत नहीं मिलता। भटोत्पल और बलभद्र ने थोड़े से वचन उदधृत किए हैं। उन उदधृत वचनों से निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि पुलिश कोई विदेशी ही था।

पुलिस
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. नगर, ग्राम आदि की शांतिरक्षा के लिये नियुक्त सिपाहियों और कर्मचारियों का वर्ग। प्रजा की जान और माल की हिफाजत के लिये मुकर्रर सिपाहियों और अफसरों का दल। २. अपराधों को रोकने और अप- राधियों का पता लगाकर उन्हों पकड़ने के लिये नियुक्त सिपाही या अफसर। पुलिस का सिपाही या अफसर। यौ०—पुलिस काररवाई, पुलिस राज = आंतक। दबदबा।

पुलिसमैन
संज्ञा पुं० [अं०] पुलिस का प्यादा। पुलिस का सिपाही। कांस्टेबल।

पुलिहोरा †
संज्ञा पुं० [देश०] एक पकवान। उ०— विविध पंच पकवान अपारे। सक्कर पुंगल और पुलिहोरा।—रघुराज (शब्द०)।

पुली
संज्ञा स्त्री० [देश०] काले और भूरे रंग की एक चिड़िया जो सारे उत्तर भारत में पंजाब से लेकर बंगाल तक होती है।

पुलोस †
संज्ञा स्त्री० [अं० पुलिस] दे० 'पुलिस'। उ०— पुलीस और अदालत के अमलों ने लूट मारा।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० १९१।

पुलेबैठ
संज्ञा पुं० [फा० पील (हाथी =) +हिं० बैठना; या हिं० पुलना (=चलना) + बैठना] पीछे के दोनो पैर झुका दे। पीलवानों की एक बोली जिसको सुनकर हाथी पीछे के दोनों पैर झुका देता है। हाथीवानों की बोली।

पुलोम
संज्ञा पुं० [सं० पुलोमन्] १. एक दैत्य जिसकी कन्या शची थी। इंद्र ने युद्ध में पुलीम को मारकर उसकी कन्या शचीसे ब्याह किया था। २. एक राक्षस। ३. आंध्र वंश का एक राजा। यौ०— पुलौमजित, पुलोमद्विट, पुलोमभिद् = इंद्र। पुलोसपुत्री = दे० 'पुलोमजा'।

पुलोमजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुलोम की कन्या इंद्राणी। शची।

पुलोमपुत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुलोम असुर की कन्या। इंद्रपत्नी शची [को०]।

पुलोमही
संज्ञा स्त्री० [सं०] अहिफेन। अफीम।

पुलोमा
संज्ञा स्त्री० [सं०] भृगु की पत्नी का नाम जो वैश्वानर नामक दैत्य की कन्या थी। च्यवन ऋषि उन्हीं के पुत्र थे।

पुलोमारि
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र [को०]।

पुल्कस
संज्ञा पुं० [सं०] एक संकर जाति जिसकी उत्पत्ति ब्राह्मण पुरुष और श्रत्रिय स्त्री से कही जाती है। शतपथ ब्राह्मण और बृहदारण्यक उपनिषद् मे इस जाति का उल्लेख है।

पुल्ल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक पूल।

पुल्ल (२)
वि० विकासित। फूल्ल [को०]।

पुल्ला †
संज्ञा पुं० [हिं० फूल] नाक में पहनने का एक गहना।

पुल्ली †
संज्ञा स्त्री० [देश०] घोड़े के सुम के ऊपर का हिस्सा।

पुवा †
संज्ञा पुं० [सं० अपूप] दे० 'पूवा', 'मालपूवा'। उ०— पुवा, सुहारी, मोदक भारी। गूझा, रसगूँझा, दधि न्यारी।—नंद ग्रं०, पृ० ३०६।

पुवार
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'पयाल'।

पुश्क
संज्ञा स्त्री० [तु०] बिल्ली। मार्जार [को०]।

पुश्त
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. पृष्ठ। पीठ। पीछा। २. वंशपरपरा में कोई एक स्थान। पिता, पितामह, प्रपितामह आदि या पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदि का पूर्वापर स्थान। पीढ़ी। यौ०— पुश्तखम = वह जिसकी पीठ खम हो। कुबड़ा। पुश्तखार। पुश्त दर पुश्त = वंशपरंपरा में। बाप के पीछे बेटा, बेटे के पीछे पोता इस क्रम से लगातार। पुश्तपनाह= पक्षपाती। मददगार। सहायक। पुश्तहा पुश्त = कई पीढियों तक।

पुश्तक
संज्ञा स्त्री० [फा० पुश्त] घोड़े, गदहे आदि का पीछे के दोनों पैरों से लात मारना। दोलत्ती। क्रि० प्र०—झाड़ना।—मारना।

पुश्तखार
संज्ञा पुं० [फा० पुश्तखार] पीठ खुजलाने का सींग या हाथीदाँत आदि का एक पंजा [को०]।

पुश्तनामा
संज्ञा पुं० [फा० पुश्तनामह्] वह कागज जिसपर पूर्वापर क्रम से किसी कुल मे उत्पन्न लोगों के नाम लिखे हों। वंशावली। पीढ़ीनामा। कुरसीनामा।

पुश्तवानी
संज्ञा पुं० [फा० पुश्त + हिं० वान (प्रत्य०)] वह आड़ी लकड़ी जो किवाड़ के पीछे पल्ले की मजबूती के लिये लगी रहती है।

पुश्ता
संज्ञा पुं० [ फा० पुश्तह्] १. पानी की रोक के लिये। या मजबूती के लिये किसी दीवार से लगातार कुछ ऊपर तक जमाया हुआ मिट्टी, ईट पत्थर आदि का ढेर या ढालुवाँ टीला। २. पानी की रोक के लिये कुछ दूर तक उठाया हुआ टीला। बाँध। ऊची मेंड़। ३. किताब की जिल्द के पीछे का चमड़ा। क्रि० प्र०—उठाना।—देना।—बाँधना। ४. पौने चार मात्राओं का एक ताल जिसमें तीन अघात और एक खाली रहता है।

पुश्तापुश्त
क्रि० वि० [फा०] पीछे के क्रम में। पश्चादवर्ता [को०]।

पुश्ताबंदी
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. पुश्ते की बँधाई। पुश्ता उठाने की क्रिया या भावं। २. पुश्ते का काम।

पुश्तारा
संज्ञा पुं० [फा० पुश्तारह्] पीठ पर उठाया जा सकनेवाला बोझ। गट्ठर। भार [को०]।

पुश्ती
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. टेक। सहारा। आश्रय। थाम। २. सहायता। पृष्ठरक्षा। मदद। क्रि० प्र०—करना।—होना। ३. पक्ष। तरफदारी। क्रि० प्र०—लेना। ४. बड़ा तकिया जिसपर पीठ टिकाकर बैठते हैं। पीठ टेकने का तकिया। गावतकिया। ५. बाँध। मेंड़।

पुश्तैन
वि० [फ० पुश्त] पुरुषपरंपरा। वंशपरंपरा। पीढ़ी दर पीढ़ी।

पुश्तैनी
संज्ञा स्त्री० [फा० पुश्त] जो कई पुश्तों। से चला आता हो। कई पीढ़ियों से चला आता हुआ। दादा परदादा के समय का पुराना। जैसे, पुश्तैनी बीमारी, पुश्तैनी नौकर। २. जो कई पुश्तों तक चला चले। आगे की पीढ़ियों तक चलनेवाला। बेटे, पोते, परपोते आदि तक लगातार चला चलनेवाला। जैसे,—उसे पुश्तैनी खिताब मिला है।

पुष (१)
वि० [सं०] पोषक [को०]।

पुष † (२)
संज्ञा पुं० [सं० पुष्य] एक नक्षत्र। दे० 'पुष्य'। उ०—काल जोगण भद्रा नहीं पुष नक्षत्र नई कातिक मास।—बी० रासो०, पृ० ४०।

पुषा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कलिहारी का पौधा। कलियारी।

पुषित
वि० [सं०] १. पोषण किया हुआ। पाला पोसा हुआ। २. वर्धित।

पुष्क
संज्ञा पुं० [सं०] पोषण। पुष्टि [को०]।

पुष्कर
संज्ञा पुं० [सं०] १. जल। २. जलाशय। ताल। पोखरा। ३. कमल। ४. करछी का कटोरा। ५. ढोल, मृदंग आदि का मुँह जिसपर चमड़ा मढ़ा जाता है। ६. हाथी की सूँड़ का अगला भाग। ७. आकाश। ८. बाण। तीर। ९. तलवार की म्यान या फल। १०. पिंजड़ा। ११. पद्मकंद। १२. नृत्यकला। १३. सर्प। १४. युद्ध। १५. भाग। अंश। १६. मद। नशा। १७. भग्नपाद नक्षत्र का एक अशुभ योग जिसकी शांति की जाती है। १८. पुष्करमूल। १९. कूठ।कुष्ठोषधि। कुष्ठभेद। २०. एक प्रकार का ढोल।२१. सूर्य। २२. एक रोग। २३. एक दिग्गज। १४. सारस पक्षी। २५. विष्णु का एक नाम। २६. शिव का एक नाम। २७. पुष्कर द्विपस्थ वरुण के एक पुत्र। २८. एक असुर। २९. कुष्ण के एक पुत्र का नाम। ३०. बुद्ध का एक नाम। ३१. एक राजा जो नल के भाई थे। विशेष— इन्होंने नल को जूए में हराकर निषध देश का राज्य ले लिया था। पीछे नल ने जूए में ही फिर राज्य को जीत लिया। ३२. भरत के एक पुत्र का नाम। ३३. पुराणों में कहे गए सात द्विपों में से एक। विशेष— दधि समुद्र के आगे यह द्विप बताया गया है। इसका विस्तार शाकद्विप से दूना कहा गया है। ३४. मेघों का एक नायक। विशेष— जिस वर्ष मेघों के ये अधिपति होते हैं उस वर्ष पानी नहीं बरसाता और न खेती होती है। ३५. एक तीर्थ जो अजमेर के पास है। विशेष— ऐसा प्रसिद्ध है कि ब्रह्मा ने इस स्थान पर यज्ञ किया था। यहाँ ब्रह्मा का एक मंदिर है। पद्म और नारदपुराण में इस तीर्थ का बहुत कुछ माहात्म्य मिलता है। पद्मपुराण में लिखा है कि एक बार पितामह ब्रह्मा हाथ में कमल लिए यज्ञ करने की इच्छा से इस सुंदर पर्वत प्रदेश में आए। कमल उनके हाथ से गिर पड़ा। उसके गिरने का ऐसा शब्द हुआ कि सब देवता काँप उठे। जब देवता ब्रह्मा से पुछने लगे तब ब्रह्मा ने कहा—'बालकों' का घातक वज्रनाभ असुर रसातल में तप करता था वह तुम लोगों का संहार करने के लिये यहाँ आना ही चाहता था कि मैने कमल गिराकर उसे मार डाला। तुम लोगों की बड़ी भारी विपत्ति दूर हुई। इस पद्म के गिरने के कारण इस स्थान का नाम पुष्कर होगा। यह परम पुण्यप्रद महातीर्थ होगा। पुष्कर तीर्थ का उल्लेख महाभारत में भी है। साँची में मिले हुए एक शिलालेख से पता लगता है कि ईसा से तीन सौ वर्ष से भी और पहले से यह तीर्थस्थान प्रसिद्ध था। आजकल पुष्कर में जो ताल है उसके किनारे सुंदर घाट और राजाओं के बहुत से भवन बने हुए है। यहाँ ब्रह्मा, सावित्री, बदरीनारायण और वराह जो के मंदीर प्रसिद्ध हैं। ३६. विष्णु भगवान का एक रूप। विशेष— विष्णु की नाभि से जो कमल उत्पन्न हुआ था वह उन्हीं का एक अंग था। इसकी कथा हरिवंश में बड़े विस्तार के साथ आई है। पृथ्वी पर के पर्वत आदि नाना भाग इस पद्म के अंग कहे गए हैं।

पुष्करकर्णिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] स्थलपद्मिनी।

पुष्करनाडी
संज्ञा पुं० [सं०] स्थलपद्मिनी।

पुष्करनाभ
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु [को०]।

पुष्करपक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] कमलपत्र।

पुष्करपर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] १. कमल का पत्ता। २. एक प्रकार की ईट जो यज्ञ की वेदी बनाने के काम में आती थी।

पुष्करपलाश
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पुष्करपत्र' [को०]।

पुष्करप्रिय
संज्ञा पुं० [सं०] १. मधुमक्षिका। २. मोम (को०)।

पुष्करबीज
संज्ञा पुं० [सं०] कमल का बीज [को०]।

पुष्करमूल
संज्ञा पुं० [सं०] एक औषधि का मूल या जड़ जो कश्मीर देश के सरोवरों में उत्पन्न कही जाती है। विशेष— यह ओषधि आजकल नहीं मिलती; वैद्य लोग इसके स्थान पर कुष्ठ या कूठ का व्यवहार करते हैं।

पुष्करव्याघ्र
संज्ञा पुं० [सं०] घड़ियाल। मगर। [को०]।

पुष्करशिफा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुष्करमूल।

पुष्करसागर
संज्ञा पुं० [सं०] पुष्करमूल।

पुष्करसारी
संज्ञा स्त्री० [सं०] ललितविस्तर में गिनाई हुई लिपियों में से एक।

पुष्करस्थपति
संज्ञा पुं० [सं०] शिव [को०]।

पुष्करस्रज्
संज्ञा पुं० [सं०] १. अश्विनीकुमार। २. कमल के फूलों की माला (को०)।

पुष्कराक्ष (१)
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु [को०]।

पुष्कराक्ष (२)
वि० कमल जैसी आँखोंवाला। कमलनेत्र।

पुष्कराख्य
संज्ञा पुं० [सं०] सारस।

पुष्कराग्र
संज्ञा पुं० [सं०] हाथी की सूँड़ का छोर [को०]।

पुष्करावर्तक
संज्ञा पुं० [सं०] मेघों के एक विशेष अधिपति।

पुष्कराह्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. सारस। २. पुष्करमूल [को०]।

पुष्करिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक रोग जिसमें लिंग के अग्रभाग पर फुंसियाँ ही जाती हैं।

पुष्करिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. हथिनी। २. कमलों से भरा हुआ तालाब। ३. कमल का पौधा। ४. कमलिनी। ५. पुष्करमूल। ६. कमल का समूह। ७. स्थलपद्मिनी। ८. सौ धनुष की नाप का एक प्रकार का चौकार तालाब [को०]।

पुष्करो (१)
संज्ञा पुं० [सं० पुष्करिन्] हाथी।

पुष्करी (२)
वि० पुष्करयुक्त। कलमयुक्त [को०]।

पुष्कल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. चार ग्रास की भिक्षा। २. अनाज नापने का एक प्राचीन मान जो ६४ मुटिठयों के बराबर होता था। ३. राम के भाई भरत के दो पुत्रों में से एक। ४. एक असुर। ५. एक प्रकार का ढोल। ६. एक प्रकार की वीणा। ७. शिव। ८. वरुण के एक पुत्र। ९. एक बुद्ध का नाम। १०. मेरु पर्वत का एक नाम (को०)।

पुष्कल (२)
वि० १. बहुत। अधिक। ढेर सा। प्रचुर। २. भरापूरा। परिपूर्ण। ३. श्रेष्ठ। ४. समीपस्थ। उपस्थित। ५. पवित्र। ६. शब्द या कोलाहल से पूर्ण (को०)।

पुष्कलक
संज्ञा पुं० [सं०] १. कस्तूरीमृग। २. कील। खूँटी। ३. अर्गला। ४. बौद्धभिक्षु [को०]।

पुष्कलावती
संज्ञा स्त्री० [सं०] गांधार देश की प्राचीन राजधानी। विशेष— विष्णुपुराण में लिखा है कि भरत के पुत्र पुष्कल ने इस नगरी को बसाया था। सिकंदर की चढ़ाई के समय में यह नगरी थी क्योंकि एरियन आदि यूनानी लेखकों ने पेकु- केले, प्युकोलौतिस आदि नामों से इसका उल्लेख किया है। परियन ने लिखा है कि यह नगरी बहुत बड़ी थी और सिंधु- नद से थोड़ी ही दूर पर थी। ईसा की सातवीं शताब्दि में आए हुए चीनी यात्री हुएसांग ने भी इस नगरी में हिंदू देव- मदिरों और बौदध स्तूपों का होना लिखा है। पेशावर से नौ कोस उत्तर स्वात और काबुल नदी के संगम पर जहाँ हस्तनगर नाम का गाँव है वहीं प्राचीन पुष्कलावती थी।

पुष्ट (१)
वि० [सं०] १. पोषण किया हुआ। पाला हुआ। २. तैयार। मोटा ताजा। बलिष्ठ। ३. मोटा ताजा करनेवाला। बलवर्घक। जैसे— गाजर का हलुआ बड़ा पुष्ट है। ४. दृढ़। मजवूत। पक्का। ५. पूर्ण। पूरा (को०)। ६. गंभीर। पूर्ण ध्वनियुक्त (को०)।

पुष्ट (३)
संज्ञा पुं० १. विष्णु। २. पोषण (को०)।

पुष्टई
संज्ञा स्त्री० [सं० पुष्ट + हिं० ई (प्रत्य०)] पुष्ट करनेवाली औषध। बल-वीर्य-बर्धक औषध। ताकत की दवा।

पुष्टता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. मोटा ताजपन। मजबुती। बलिष्ठता। २. पोढ़ापन। दृढ़ता।

पुष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पोषण। २. मोटाताजापन। बलिष्ठता। ३. बुद्धि संतति की बढ़ती। ४. दृढ़ता। मजबूती। ५. बात का समर्थन। पक्कापन। जैसे,—इस बात से तुम्हारे कथन की पुष्टि होती है। ६. सोलह मातृकाओं में से एक। ७. मंगला, विजया आदि आठ प्रकार की चारपाइयों में से एक। ८. धर्म की पत्नियों में से एक। ९. एक योगिनी। १०. अश्व- गंधा। असगंध। ११. संपन्नता। धनाढ्याता। वैभव (को०)। १२. रक्षण। सहायता (को०)। १३. अभ्युदय के लिये किया जानेवाला एक धार्मिक कृत्य (को०)।

पुष्टिकर
वि० [सं०] पुष्ट करनेवाला। बल-वीर्य-वर्धक। ताकत देनेवाला। जैसे, पुष्टिकर पदार्थों का भोजन।

पुष्टिकरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] गंगा (काशीखंड़)।

पुष्टिकम
संज्ञा पुं० [सं०] एक धर्मिक कृत्य जो वैभव और संपन्नता प्राप्त करने के लिये किया जाता है [को०]।

पुष्टिकांत
संज्ञा पुं० [सं० पुष्टिकान्त] गणेश [को०]।

पुष्टिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] जल की सीप। सुतही। सीपी।

पुष्टिकाम
वि० [सं०] अभ्युदय का इच्छुक। पुष्टि की कामना करनेवाला [को०]।

पुष्टिकारक
वि० [सं०] पुष्टि करनेवाला। बल-बीर्य-कारक।

पुष्टिद
वि० [सं०] पुष्टि देनेवाला। पुष्टिकारक [को०]।

पुष्टिदग्धयत्न
संज्ञा पुं० [सं०] आग के जले को आग से ही सेंककर या किसी प्रकार का गरम गरम लेप करके अच्छा करने की युक्ति।

पुष्टिदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अश्वगंधा। असगंध। २. वृद्धि नाम का ओषधि।

पुष्टिपति
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि का एक भेद।

पुष्टिप्रद
वि० [सं०] पुष्टिकारक [को०]।

पुष्टिमति
संज्ञा पुं० [सं०] अग्नि का एक भेद।

पुष्टिमार्ग
संज्ञा पुं० [सं०] वल्लभ संप्रदाय। वल्लभाचार्य के मतानुकूल वैष्णव भक्तिमार्ग।

पुष्टिलीला
संज्ञा स्त्री० [सं० पुष्टि (= पुष्टिमार्ग) + लीला] रासलीला। कृष्ण लीला। उ०— सो इन पुष्टिलीला को अनुभव कियो।—दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ७।

पुष्टिवर्धक
वि० [सं०] दे० 'पुष्टिकारक'।

पुष्टवर्धन (१)
वि० [सं०] पुष्टि को बढ़ानेवाला। सुख संपन्नता को बढ़ानेवाला। अभ्युदय की सिद्धि करनेवाला [को०]।

पुष्टिवर्धन (२)
संज्ञा पुं० मुर्गा [को०]।

पुष्पंधय
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पन्धय] १. भ्रमर। भौंरा। २. मधु- मक्खी [को०]।

पुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] १. फूल। पौधों का वह अवयव जो ऋतु- काल में उत्पन्न होता है। विशेष— दे० 'फूल'। २. ऋतुमती स्त्री का रज। ३. आँख का एक रोग। फूला। फूली। ४. घोड़ों का एक लक्षण। चित्ती। विशेष— जिस रंग का घोड़ा हो उससे भिन्न रंग की चित्ती को पुष्प कहते हैं। कनपटी, ललाट, सिर, कंधे, छाती, नाभि और कंठ में ऐसे चिह्न हों तो शुभ और ओठ, कान की जड़, भौं और चूतड़ पर हों तो अशुभ माने जाते हैं। ५. विकास। विकसित होना। ६. कुबेर का विमान। पुष्पक। ७. एक प्रकार का अंजन या सुरमा। ८. रसौत। ९. पुष्करमूल। १०. लवंग। ११. मांस (वाममार्गी)। १२. पुखराज। पुष्पराग (को०)। १३. नाटक में कोई ऐसी बात कहना जो विशेष रूप से प्रेम या अनुराग उत्पन्न करनेवाली हो। जैसे,— यह साक्षात् लक्ष्मी है। इसकी हथेली परिजात के नवदल हैं, नहीं तो पसीने के बहाने इसमें से अमृत कहाँ से टपकता।

पुष्पक
संज्ञा पुं० [सं०] १. फूल। २. कुबेर का विमान। विशेष—यह विमान आकाशमार्ग से चलता था। कुबेर को हराकर रावण ने यह विमान छीन लिया था। रावण के वध के उपरांत राम ने इसे फिर कुबेर को दे दिया। ३. आँख का एक रोग। फूला। फूली। ४. जड़ाऊ कंगन। ५. रसांजन। रसौत। ६. हीरा कसीस। ७. पीतल। ८. लोहे या पीतल का मैल। ९. मिट्टी की अँगीठी। १०. एक प्रकार का निर्विष सर्प। बिना विष का एक साँप। ११. एक पर्वत का नाम। १२. लोहे का बर्तन। लौहपात्र (को०)। १३. प्रासाद बनाने का एक प्रकार का मंडप।विशेष— यह मंडप चौंसठ खंभों का होना चाहिए। १४. वह खंभा जिसके कोने आठ भागों में बँटे हों।

पुष्पकरंड
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पकरण्ड] दे० 'पुष्पकरंडक'।

पुष्पकरंडक
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पकरण्डक] १. उज्जयिनी का एक पुराना उद्यान या बगीचा जो महाकाल के मंदिर के पास था। २. फूलों की डलिया (को०)।

पुष्पकरंडिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० पुष्पकरण्डिनी] उज्जयिनी।

पुष्पकाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. वसंत ऋतु। २. स्त्रियों का ऋतु- काल [को०]।

पुष्पकासीस
संज्ञा पुं० [सं०] हीरा कसीस।

पुष्पकीट
संज्ञा पुं० [सं०] १. फूल का कीड़ा। २. भोँरा। भ्रमर।

पुष्पकच्छ्र
संज्ञा पुं० [सं०] एक व्रत जिसमें केवल फूलों का क्वाथ पीकर महीना भर रहना पड़ता है।

पुष्पकेतन
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव। पुष्पकेतु [को०]।

पुष्पगंडिका
संज्ञा स्त्री० [सं० पुष्पगण्डिका] लास्य के दस अंगों में से एक। बाजे के साथ अनेक छंदों में स्त्रियों द्वारा पुरुषों का और पुरुषों द्वारा स्त्रियों का अभिनय और गान। (नाट्यशास्त्र)।

पुष्पगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० पुष्पगन्धा] जूही।

पुष्पगवेधुका
संज्ञा स्त्री० [सं०] नागबला।

पुष्पघातक
संज्ञा पुं० [सं०] बाँस [को०]।

पुष्पचय, पुष्पचयन
संज्ञा पुं० [सं०] फूल तोड़ना। फूल चुनना [को०]।

पुष्पचाप
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव। पुष्पधन्वा।

पुष्पचामर
संज्ञा पुं० [सं०] १. दौना। २. केवड़ा।

पुष्पज
संज्ञा पुं० [सं०] पुष्प से उत्पन्न पुष्परज। मकरंद [को०]।

पुष्पजीवी
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पजीविन्] मालाकार। माली [को०]।

पुष्पदत
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पदन्त] १. वायुकोण का दिग्गज। २. एक प्रकार का नगरद्वार। ३. शिव का अनुचर एक गंधर्व जिसका रचा हुआ महिम्न स्तोत्र कहा जाता है। विशेष— इस गंधर्व के विषय में कहा जाता है कि यह एक बार शिव का निर्माल्य लाँघ गया था। इससे शिव ने शाप द्वारा इसका आकाशगमन रोक दिया था। पीछे महिम्न स्तोत्र बनाकर पाठ करने से इस खेचरत्व प्राप्त हो गया। ४. एक विद्याघर। ५. कार्तिकेय का एक अनुचर। ६. चंद्र और सूर्य (को०)।

पुष्पदंष्ट्र
संज्ञा पुं० [सं०] एक नाग।

पुष्पद
संज्ञा पुं० [सं०] वृक्ष। पेड़ [को०]।

पुष्पदाम
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पदामन्] १. पुष्पों की माला। २. एक छंद का नाम [को०]।

पुष्पद्रव
संज्ञा पुं० [सं०] पुष्प का रस। मकरंद [को०]।

पुष्पद्रुम
संज्ञा पुं० [सं०] फूलवाला वृक्ष। केवल पुष्प का वृक्ष [को०]।

पुष्पध
संज्ञा पुं० [सं०] व्रात्य ब्राह्मण से उत्पन्न एक जाति। विशेष—व्रात्य ब्राह्मण की सवर्णा पत्नी से उत्पन्न संतति पुष्पध कहलाती है।

पुष्पधनुस्
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पधनुष्] कामदेव।

पुष्पधन्वा
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पधन्वन्] १. कामदेव। मीनकेतु। २. एक रसौषध। विशेष—यह रससिंदूर, सीसे, लोहे, अभ्रक और वंग में धतूरा, भाँग, जेठी मधु, सेमरामूल मिलाकर पान के रस की भावना देने से बनती है और कामोद्दीपक तथा शक्तिवर्धक मानी जाती है।

पुष्पधारण
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु [को०]।

पुष्पध्वज
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

पुष्पनिक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] भ्रमर। भौंरा।

पुष्पनिर्यास, पुष्पनिर्यासन
संज्ञा पुं० [सं०] पुष्परस। मकरंद।

पुष्पनेत्र
संज्ञा पुं० [सं०] वस्ति की पिचकारी की सलाई।

पुष्पपत्री
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पपत्रिन्] कामदेव।

पुष्पपथ
संज्ञा पुं० [सं०] स्त्रियों के रज निकलने का मार्ग। योनि। भग।

पुष्पपदवो
संज्ञा स्त्री० [सं०] योनि। भग [को०]।

पुष्पपांडु
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पपाण्डु] एक प्रकार का साँप।

पुष्पपिंड
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पपिण्ड] अशोक का पेड़।

पुष्पपुट
संज्ञा पुं० [सं०] १. फूल की पँखड़ियों का आधार जो कटोरी के आकार का होता है। २. उक्त आकार का हाथ का चंगुल।

पुष्पपुर
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन पाटलिपुत्र (पटना) का एक नाम।

पुष्पपेशल
वि० [सं०] पुष्प की तरह कोमल। फूल सा मृदु।

पुष्पप्रचय, पुष्पप्रचाय
संज्ञा पुं० [सं०] फूल चुनना [को०]।

पुष्पप्रस्तार
संज्ञा पुं० [सं०] पुष्पशय्या। फूलों का बिछौना [को०]।

पुष्पप्रियक
संज्ञा पुं० [सं०] विजयसाल।

पुष्पफल
संज्ञा पुं० [सं०] १. कुम्हड़ा। २. कैथ। कपित्थ। ३. अर्जुन वृक्ष।

पुष्पवाण
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

पुष्पभद्र
संज्ञा पुं० [सं०] वास्तु शिल्प में एक प्रकार का मंडप जिसमें ६२ खंभे हों।

पुष्पभद्रक
संज्ञा पुं० [सं०] देवताओं का एक उपवन।

पुष्पभद्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] मलयगिरि के पश्चिम की एक नदी। (ब्रह्मवैवर्त)।

पुष्पभव
संज्ञा पुं० [सं०] पुष्परस। मकरंद [को०]।

पुष्पभूति
संज्ञा पुं० [सं०] १. सम्राट् हर्षवर्धन के पूर्व पुरुष जो शैव थे। २. कांबोज या काबुल के एक हिंदू राजा जो ईसा की सातवीं शताब्दी में राज्य करते थे।

पुष्पमंजरिका
संज्ञा स्त्री० [सं० पुष्पमञ्जरिका] नील कमलिनी।

पुष्पमंजरी
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पमञ्जरी] १. फूल की मंजरी २. वृतकरंज। धीकरंज।

पुष्पमाल
संज्ञा स्त्री० [सं० पुष्प + हिं० माल] फूलों का एक माला। उ०— आवत देखे श्याम मनोहर पुष्पमाल लै दौरी।—नंद० ग्रं०, पृ० ३५४।

पुष्पमास
संज्ञा पुं० [सं०] १. वसंत ऋतु के दो महीने। वसंत ऋतु। २. चैत्र (को०)।

पुष्पमित्र
संज्ञा पुं० [सं०] एक राजा। विशेष—दे० 'पुष्यमित्र'।

पुष्पमृत्यु
संज्ञा पुं० [सं०] देवनल। एक प्रकार का नरकट। बड़ा नरसल।

पुष्परक्त
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्यमणि नाम के फूल का पौधा।

पुष्परज
संज्ञा पुं० [सं० पुष्परजस्] पराग। फूलों की धूल।

पुष्परथ
संज्ञा पुं० [सं०] टहलने घूमने आदि का एक रथ [को०]।

पुष्परस
संज्ञा पुं० [सं०] मधु। मकरंद।

पुष्परसाह्वय
संज्ञा पुं० [सं०] मधु।

पुष्पराग
संज्ञा पुं० [सं०] एक मणि। पुखराज।

पुष्पराज
संज्ञा पुं० [सं०] पुष्पराग। पुखराज।

पुष्परेणु
संज्ञा पुं० [सं०] फूल की धूल। पराग।

पुष्परोचन
संज्ञा पुं० [सं०] नागकेसर।

पुष्पलक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पुष्कलक'।

पुष्पलाव
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० पुष्पलावी] फूल चुननेवाला। माली।

पुष्पलावन
स्त्री० पुं० [सं०] बृहतसंहिता के अनुसार उत्तर दिशा का एक देश।

पुष्पलावी
संज्ञा स्त्री० [सं० पुष्पलाविन्] फूल चुननेवाली। मालिन।

पुष्पलिक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] भ्रंमर। भौंरा।

पुष्पलिपि
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक पुरानी लिपि या लिखावट (ललितविस्तर)।

पुष्पलिह्
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पलिह्] भ्रमर। भौंरा।

पुष्पवती
वि० [सं०] १. फूलवाली। फूली हुई। २. रजोवती। रजस्वला। ऋतुमती। उ०— उस प्रकृतिलता के यौवन में, उस पुष्पवती के माधव का; मधुहास्र हुआ था वह पहला, दो रूप मधुर जो ढाल सका।—कामायनी, पृ० ७२। ३. महाभारत में वर्णित एक तीर्थ। ४. उठी हुई गाय (को०)।

पुष्पवर्ग
संज्ञा पुं० [सं०] अगस्त, कचनार, सेमल आदि का आयु- र्वेदोक्त वर्ग [को०]।

पुष्पवर्त्मा
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पवर्त्मान्] द्रुपद नरेश। दौपदी के पिता का नाम [को०]।

पुष्पवर्ष
संज्ञा पुं० [सं०] एक वर्षपर्वत का नाम।

पुष्पवाटिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] फूलवारी। फूलों का बगीचा। उपवन। उद्यान।

पुष्पवाटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] फूलवारी। फूलों का बगीचा।

पुष्पवाण
संज्ञा पुं० [सं०] १. फूलों का बाण। २. कामदेव। ३. कुशद्वीप के एक राजा। ४. एक दैत्य।

पुष्पवाहिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] हरिवंश पुराणोक्त एक नदी।

पुष्पविचित्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक वृत्त का नाम। एक इंद्र का नाम [को०]।

पुष्पविमान
संज्ञा पुं० [सं० पुष्प+ विमान] दे० 'पुष्पक'। उ०— पुष्पविमान सदा उजियारा।—कबीर सा०, पृ० २।

पुष्पविशिष
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पुष्पवाण'।

पुष्पवृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] फूलों की वर्षा। ऊपर से फूल गिरना। (मंगल उत्सव या प्रसन्नता सूचित करने के लिये फूल गिराए जाते थे)।

पुष्पवेणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] फूलों की बनी हुई वेणी। फूलों से गुथी हुई वेणी [को०]।

पुष्पशकटी
संज्ञा स्त्री० [सं०] आकाशवाणी।

पुष्पशकली
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार का विषहीन साँप।

पुष्पशर
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

पुष्पशरासन
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

पुष्पशाक
संज्ञा पुं० [सं०] ऐसे फूल जिनकी भाजी बनाई जाती है; जैसे, कचनाल, रासना, खैर, सेमल, सहजन, अगस्त, नीम।

पुष्पशून्य (१)
वि० [सं०] बिना फूल का। पुष्परहित।

पुष्पशून्य (२)
संज्ञा पुं० गूलर।

पुष्पशेखर
संज्ञा पुं० [सं०] फूलों की माला [को०]।

पुष्पश्रेणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मूसाकानी।

पुष्पसमय
संज्ञा पुं० [सं०] वसंत [को०]।

पुष्पसाधारण
संज्ञा पुं० [सं०] वसंतकाल।

पुष्पसार
संज्ञा पुं० [सं०] १. फूल का मधु या रस। २. फूलों का इत्र।

पुष्पसारा
संज्ञा स्त्री० [सं०] तुलसी।

पुष्पसूत्र
संज्ञा पुं० [सं०] दक्षिण में प्रसिद्ध सामवेद का एक सुत्रग्रंथ जो गोभिलरचित कहा जाता है।

पुष्पसौरभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कलिहारी का पौधा। करियारी।

पुष्पस्नान
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पुष्पस्नान'।

पुष्पस्नेह
संज्ञा पुं० [सं०] मकरंद। पुष्परस [को०]।

पुष्पस्वेद
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पुष्पस्नेह'।

पुष्पहास
संज्ञा पुं० [सं०] १. फूलों का खिलना। २. विष्णु।

पुष्पहासा
संज्ञा स्त्री० [सं०] रजस्वला स्त्री।

पुष्पहीन (१)
वि० [सं०] बिना फूल का।

पुष्पहीन (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] गूलर का पेड़।

पुष्पहीना
संज्ञा स्त्री० [सं०] (स्त्री) जिसे रजोदर्शन न हो। बाँझ। वंध्या।

पुष्पांक
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पाङ्क] माधवी। अनेकार्थ। (शब्द०)।

पुष्पांजन
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पाञ्जन] एक प्रकार का अंजन जो पीतल के कसाव के साथ कुछ ओषधियों को पीसकर बनाया जाता है। वैद्यक में सब प्रकार के नेत्ररोगों पर यह चलता है। पर्या०—पुष्पकेतु। कौसुंभ। रीतिक। रीतिपुष्प।

पुष्पांजलि
संज्ञा स्त्री० [सं० पुष्पाञ्जलि] फूलों से भरी अंजली या अंजली भर फूल जो किसी देवता या पूज्य पुरुष को चढ़ाए जायँ।

पुष्पांड
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पाण्ड] एक प्रकार का धान [को०]।

पुष्पांबुज
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पाम्बुज] मकरंद।

पुष्पांभस
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पाम्भस] एक तीर्थ।

पुष्पा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कर्ण की राजधानी जो अंगदेश में थी। चंपा (आजकल के भागलपुर के पास)।

पुष्पाकर
संज्ञा पुं० [सं०] वसंत ऋतु।

पुष्पागम
संज्ञा पुं० [सं०] वसंत काल।

पुष्पाग्र
संज्ञा पुं० [सं०] बीजकोश। गर्भकेसर [को०]।

पुष्पजीव
संज्ञा पुं० [सं०] फूलों से जिसकी जीविका ही—माली [को०]।

पुष्पाधर
संज्ञा पुं० [सं० पुष्प + अधर] फूलों के ओठ। पँखुड़ियाँ उ०— झुक कर पुष्पाधर मुसकाए।—अर्चना, पृ० ८६।

पुष्पानन
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का मद्य।

पुष्पापण
संज्ञा पुं० [सं०] फूलों का बाजार [को०]।

पुष्पापीड
संज्ञा पुं० [सं०] सिर पर रखी हुई या पहनी जानेवाली माला [को०]।

पुष्पायुध
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

पुष्पाराम
संज्ञा पुं० [सं०] फूलों का बगीचा [को०]।

पुष्पावचायी
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पावचायिन्] माली [को०]।

पुष्पासव
संज्ञा पुं० [सं०] फूलों से बनाया हुआ मद्य। मद्य।

पुष्पास्तरण
संज्ञा पुं० [सं०] १. शय्या पर फूल सजाने की कला। २. फूलों की सजी हुई शय्या [को०]।

पुष्पास्र
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव [को०]।

पुष्पाह्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सौंफ।

पुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दाँत का मैल। २. लिंग की मैल ३. अध्याय के अंत में वह वाक्य जिसमें कहे हुए प्रसंग की समाप्ति सूचित की जाती है। यह वाक्य 'इति श्री ' करके प्रायः आरंभ होता है जैसे, 'इति श्री स्कंदपुराणे रेवाखंडे' इत्यादि।

पुष्पिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] रसस्वला [को०]।

पुष्पित (१)
वि० [सं०] १. पुष्पसंयुक्त। फूला हुआ। २. रंगबिरंगा। ३. विकसित (को०)।

पुष्पित (२)
संज्ञा पुं० १. कुशद्वीप का एक पर्वत। २. एक बुद्ध का नाम।

पुष्पिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] रसस्वला स्त्री।

पुष्पिताग्रा
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक अर्धसम वृत्त जिसके पहले और तीसरे चरण में दो नगण, एक रगण और एक यगण होता है तथा दूसरे और चौथे चरण में एक नगण दो जगण, एक रगण और गुरु होता है। जैसे,— प्रभु सम नहिं अन्य कोइ दाता। सुधन जु ध्यावत तीन लोक त्राता। सकल असत कामना बिहाई। हरि नित सेवहु मित्त चित्त लाई ।

पुष्पी
वि० [सं० पुष्पिन्] पुष्पयुक्त। जिसमें फूल लगे हों [को०]।

पुष्पेषु
संज्ञा पुं० [सं०] कामदेव।

पुष्पोत्कटा
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुमाली राक्षस की केतुमती भार्या से उत्पन्न चार कन्याओं में से एक जो रावण और कुंभकर्ण का माता थी।

पुष्पोदगम
संज्ञा पुं० [सं०] पुष्प लगना। फूल आना [को०]।

पुष्पोद्यान
संज्ञा पुं० [सं०] फुलवारी। पुष्पवाटिका।

पुष्पोपजीवी
संज्ञा पुं० [सं० पुष्पोपजीविन्] माली [को०]।

पुष्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुष्टि। पोषण। २. फूल या सार वस्तु। ३. अश्विनी, भरणी आदि २७ नक्षत्रों में से आठवाँ नक्षत्र जिसकी आकृति बाण की सी है। सिध्य। तिष्य। ४. पूस का महीना। ५. सूर्यवंश का एक राजा। ६. कलिकाल। कलि का युग (को०)।

पुष्यनेता
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह रात्रि जिसमें बराबर पुष्य नक्षत्र रहे।

पुष्यमित्र
संज्ञा पुं० [सं०] मौर्यों के पीछे मगध में शुंग वंश का राज्य प्रतिष्ठित करनेवाला एक प्रतापी राजा। विशेष—अशोक से कई पीढ़ियों पीछे अंतिम मोर्य राजा बृहद्रथ को लड़ाई में मार पुष्यमित्र मगध के सिंहासन पर बैठा। अपने पुत्र अग्निमित्र को उसने विदिशा का राज्य दिया था। अग्निमित्र का वृतांत कालिदास के मालविकाग्निमित्र नाटक में आया है। पुष्यमित्र हिंदू धर्म का अनन्य अनुयायी था। इससे बोद्धों की प्रधानता से चिढ़ी हुई प्रजा उसके सिंहासन पर बैठने से बहुत प्रसन्न हुई। वैदिक धर्म और अपने प्रताप की घोषणा के लिये पुष्यमित्र ने पाटलिपुत्र में बड़ा भारी अश्वमेध यज्ञ किया। लोगों का अनुमान है कि इस यज्ञ में भाष्यकार पतंजलि भी आए थे। इर्सा से प्रायः दो सौ वर्ष पूर्व पुष्यमित्र मगध में राज्य करते थे। उसके पीछे उसका पुत्र अग्निमित्र सिंहासन पर बैठा। वि० दे० 'शुंग' ६।

पुष्ययोग
संज्ञा पुं० [सं०] पुष्य नक्षत्र में चंद्रमा के रहने का समय [को०]।

पुष्यरथ
संज्ञा पुं० [सं०] क्रीड़ा रथ। घूमने, फिरने या उत्सव आदि में निकलने का रथ। (यह रथ युद्ध के काम का नहीं होता)।

पुष्यलक
संज्ञा पुं० [सं०] १. कस्तूरी मृग। २. क्षपणक। चँवर लिए रहने वाला जैन साधु। ३. खूँटा। कील।

पुष्यस्नान
संज्ञा पुं० [सं०] विघ्नशांति के लिये एक स्नान जोपूस के महीने में चंद्रमा के पुष्य नक्षत्र में होने पर होता है। विशेष— यह स्नान राजाओं के लिये है। कालिकापुराण और बृहतसंहिता में इस स्नान का पूरा विधान मिलता है। बृहतसंहिता के अनुसार उद्यान, देवमंदिर, नदीतट आदि किसी रमणीय और स्वच्छ स्थान पर मंडप बनवाना चाहिए और उसमें राजा को पुरोहितों और अमात्यों के सहित पूजन के लिये जाना चाहिए। पितरों और देवताओं का यथाविधि पूजन करके तब राजा पुष्यस्नान करे। जिस कलश के जल से राजा स्नान करनेवाले हों उसमें अनेक प्रकार के रत्न और मंगल द्रव्य पहले से डालकर रखे। पश्चिम ओर की वेदी पर बाघ या सिंह का चमड़ा बिछाकर उसपर सोने, चाँदी, ताँबे या गूलर की लकड़ी का पाटा रखा जाय। उसी पर राजा स्नान करे।

पुष्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुष्य नक्षत्र [को०]।

पुष्यार्क
संज्ञा पुं० [सं०] १. ज्योतिष में एक योग जो कर्क की संक्रांति में सूर्य के पुष्प नक्षत्र में होने पर होता है। यह प्रायः श्रावण में दस दिन के लगभग रहता है। २. रविवार के दिन पड़ा हुआ पुष्य नक्षत्र।

पुस
संज्ञा पुं० [अं० पुसी] प्यार से बिल्ली को पुकारने का शब्द। जैसे, आ पुस पुस !

पुसकर पु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पुष्कर'।

पुसकरन
संज्ञा पुं० [सं० पुष्कर] मारवाड़ी ब्राह्मणों की एक शाखा। उ०— भारद्वाज गोत्र पुसकरनाँ सेवक कहावै।—पोद्दार अभि ग्रं०, पृ० ४२७।

पुसतक †
संज्ञा स्त्री० [सं० पुस्तक] पुस्तक। उ०—पारेवी ज्यूँ पुसतकाँ, कुकव बाज बस थाप।—बाँकी ग्रं०, भा० २, पृ० ७९।

पुसपराग पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पुष्पराग'। उ०— पुसपराग सम कर लसैँ नारी रत्नप्रकाश।—ब्रजनिधि ग्रं०, पृ० ९९।

पुसाक †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पोशाक'। उ०—खाइ खुराका पहिन पुसाका।—कबीर० श०, पृ० १७।

पुसाना
क्रि० अ० [हिं० पोसना] १. पूरा पड़ना। बन पड़ना। पटना। २. अच्छा लगना। शोभा देना। उचित जान पड़ना। उ०—पथिक आपने पथ लगौ इहाँ रहौ न पुसाय। रसनिधि नैन सराय में बस्यो भावतो आय।—रसनिधि (शब्द०)।

पुस्टि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पुस्टि] दे० 'पुप्टि' (पुष्टिमार्ग)। उ०— पुष्टि म्रजाद भजन, रस, सेवा, निज जन पोषन भरन।—नंद० ग्र०, पृ० ३२६।

पुस्त (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. गीली मिट्टी, लकड़ी, कपडे़, चमडे़, लोहे, या रत्नों आदि से गढ़, काट या छील छालकर बनाई जानेवाली वस्तु। सामान। २. बनावट। कारी- गरी। ३. [स्त्री० पुस्ती] पोथी। पुस्तक। किताब। हस्तलेख।

पुस्त (२)पु †
संज्ञा स्त्री० [फा० पुश्त] दे० 'पुश्त'।

पुस्तक
संज्ञा स्त्री० [सं०] पोथी। किताब। हस्तलेख।

पुस्तकर्म
संज्ञा पुं० [सं० पुस्तकर्मन] १. पलस्तर करने का काम। २. रेँगने का काम [को०]।

पुस्तकाकार
वि० [सं०] पोथी के रूप का। पुस्तक के आकार का।

पुस्तकागार
संज्ञा पुं० [सं० पुस्तक + आगार] पुस्तकों का स्थान। पुस्तकालय।

पुस्तकालय
संज्ञा पुं० [सं०] वह भवन या घर जिसमें पुस्तकों का संग्रह हो। वर घर जहाँ अनेक विषयों की पोथियाँ इकट्ठी करके रखी गई हों।

पुस्तकालायाध्यक्ष
संज्ञा पुं० [सं० पुस्तकालय + अध्यक्ष] पुस्तकालय का प्रधान अधिकारी।

पुस्तकास्तरण
संज्ञा पुं० [सं०] हस्तलेख का वेष्ठन। पुस्तक का बेठन [को०]।

पुस्तकी
संज्ञा स्त्री० [सं०] पोथी। पुस्तक।

पुस्तकीय
वि० [सं० पुस्तक + ईय (प्रत्य०)] पुस्तक संबंधी। पुस्तक का। जैसे, पुस्तकीय ज्ञान।

पुस्तवार्त
संज्ञा पुं० [सं०] जिसकी जीविका पुस्तकों पर निर्भर हो। पुस्तकें बनाकर जीविका कमानेवाला [को०]।

पुस्तशिंवी
संज्ञा स्त्री० [सं० पुश्तशिम्बी] एक प्रकार की सेम।

पुस्तिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटी पुस्तक।

पुस्ती (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] पोथी। पुस्तक। किताब।

पुस्ती (२)
संज्ञा स्त्री० [फा० पुश्तह् का स्त्री० या फा० पुश्ती (= टेक, आश्रय)] दे० 'पुश्ती'। उ०— उनकी जिंदगी की रेलगाड़ी पूरी रफ्तार से दौड़कर समाज के विश्वास और निश्चय की मजबूत पुस्तियों से टकराकर चूर चूर हो जाती है।—अभि- शप्त, पृ० ७९।

पुहंकर पु
संज्ञा पुं० [सं० पुष्कर, प्रा० पुहकर] दे० 'पुष्कर'।

पुहकरमूल
संज्ञा पुं० [सं० पुष्करमूल] दे० 'पुष्करमूल'।

पुहचावना †
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पहुँचाना'। उ०—चल्यौ ब्याहि संभरिधनी मंगन भए निहाल। पुहचावन घन सँग भए, नृप गुन चर्वे रसाल।—पृ० रा०, १४। १२८।

पुहत्तना पु
क्रि० अ० [सं० प्र० + भू, प्रा० पहुच्च (वि० पहुत्त)] दे० 'पहुँचना'। उ०—ढोलइ दाँतण फाड़ता, आई पुहत्तउ कीर।—ढोला०, दू० ४००।

पुहना
क्रि० अ० [हिं० पोहना] गुँथना। उ०— झालरों में मंजु मुक्ता है चुहे, माँग में जिस भाँति जाते हैं गुहे।—साकेत, पृ० १९।

पुहप पु
संज्ञा पुं० [सं० पुष्प] पुष्प। फूल। उ०— सुरपुर सब हरषे, पुहपनी बरषे दुंदभि दीह बजाए।—केशव (शब्द०)।

पुहप्प पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पुष्प'। उ०— सुदेव जयं जय नंषि पुहप्प।—पृ० रा०, १२। ३३४।

पुहमि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पुहुमी'। उ०—दल न समात पुहमि सब हेरिव।—ह० रासो, पृ० ७४।

पुहर पु †
संज्ञा पुं० [सं० प्रहर, हिं० पहर] दे० 'पहर'। उ०— (क) पुहर पुहर प्रति जागसु इण हर सेवस्युं आपणउ नाह।— बी० रासो, पृ० ४२। (ख) त्रीजइ पुहरि उलाँधियउ आडवला- रउ घट्ट।—ढोला०, दू० ४२४।

पुहरा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पहरा'। उ०—दुख सहणा, पुहरा दियण, कंत दिसाउरी जाइ।—ढोला०, दू० पृ० २३१।

पुहवि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पृथिवी, प्रा० पुहुव्वि] दे० 'पृथ्वी'। उ०—(क) के पति आओब एहु परमान, चंपके कएल पुहवि निरमान।—विद्यापति, पृ० २५। (ख) अन धन प्रवाह बहु पुहवि परि वरष्षौ जेम पुरंद गति।—पृ० रा०, १। ४७२।

पुहवोपति पु
संज्ञा पुं० [सं० पृथ्वीपति] राजा। बादशाह। उ०— पुहवीपति सुरुतान ओ तुम्हें रायकुमार।—कीर्ति०, पृ० ६४।

पुहवै पु
संज्ञा पुं० [सं० पृथ्वीपति, प्रा० पुह + वे] पृथ्वीपति। राजा।

पुहाना †
क्रि० स० [हिं० पोहना का प्रे० रूप] पिरोने का काम कराना। ग्रथित कराना। गुथवाना।

पुहुप पु
संज्ञा पुं० [सं० पुष्प] फूल। उ०—अक्षत पुहुप ले बिप्र भुलाई।—कबीर सा०, पृ० १९१।

पुहुपराग पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पुष्पराग'।

पुहुपित
वि० [सं० पुष्पित; या हिं० पुहुप + इत] दे० 'पुष्पित'। उ०—पुहुपित पेखि पलास बन, तव पलास तन होइ। अब मधुमास पलास भो, सुचि जवास सम सोइ।—स० सप्तक, पृ० २३९।

पुहुमि, पुहुमी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० भूमि या पृथिवी, प्रा० पुहुवी] पृथ्वी। भूमि। उ०—(क) लंक पुहुमि अस आहि न काहूँ।— जायसी ग्रं०, (गुप्त), पृ० १९७। (ख) जोधा आगे उलटि पुलटि यह पुहमी करते।—धरम० श०, पृ० ८४। यौ०—पुहुमीपति = पृथिवीपति। राजा।

पुहुरेनु पु
संज्ञा पुं० [सं० पुष्परेणु] फूल का धूल। पराग।

पुहुवी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पृथिवी] भूमि। पृथ्वी।

पूँगना पु
क्रि० अ० [हिं० पूजना] पूरा होना। पूजना। उ०— नव दिन पूँगा नउरताँ बलि वाकुल पूजा रचौ ठाई।—बी० रासो, पृ० ५०।

पूँगरण
संज्ञा पुं० [सं० पुङ्ग (= राशि या समूह)] सामान्य वस्त्र। कपड़ा। (डिं०)।

पूँगरा पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पोगंड'। उ०—कबीर पूँगरा राम अलह का सब गुरु पीर हमारे।—कबीर ग्रं०, पृ० २६७।

पूँगा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] वह कीड़ा जो सीप के भीतर होता है। सीप का कीड़ा।

पूँगा (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० पोंगी (= छोटा चोंगा)] सँपेरों का बाजा। महुवर।

पूँछ
संज्ञा स्त्री० [सं० पुच्छ] १. मनुष्य से भिन्न प्राणियों के शरीर का वह गावदुमा भाग जो गुदा मार्ग के ऊपर रीढ़ की हड्डी की संधि में या उससे निकलकर नीचे की और कुछ दूर तक लंबा चला जाता है। जंतुओं, पक्षियों, कीड़ों आदि के शरीर में सिर से आरंभ मानकर सबसे अंतिम या पिछला भाग। पुच्छ। लांगूल। दुम। विशेष—भिन्न भिन्न जीवों की पूँछें भिन्न भिन्न आकार की होती हैं। पर सभी की पूँछें उनके गुदमार्ग के ऊपर से ही आरंभ होती हैं। सरीसृप वर्ग के जीवों की पूँछें रीढ़ की हड्डी की सीध में आगे को अधिकाधिक पतली होती हुई चली जाती हैं। मछली की पूँछ उसके उदरभाग के नीचे का पतला भाग हैं। अधिकांश मछलियों की पूँछ के अंत में पर होते हैं। पक्षियों की पूँछ परों का एक गुच्छा होती है जिसका अंतिम भाग अधिक फैला हुआ और आरंभ का संकुचित होता है। कीड़ों की पूँछ उनके मध्य भाग के और पीछे का नुकीला भाग हैं। भिड़ का डंक उसकी पूँछ से ही निकलता है। स्तन- पायी जंतुओं में से कुछ की पूँछ उनके शेष शरीर के बराबर या उससे भी अधिक लंबी होती है, जैसे लंगुर की। इस वर्ग के प्रायः सभी जीवों की पूँछ पर बाल नहीं होते; रोएँ होते हैं। हाँ किसी किसी की पूँछ के अंत में बालों का एक गुच्छा होता है। पर घोड़े की पूँछ पर सर्वत्र बड़े बड़े बाल होते हैं। मुहा०—(किसी की) पूँछ पकड़कर चलना = (१) किसी के पीछे पीछे चलना। किसी का पिछुआ या पिछलग्गू बनना। हर बात में किसी का अनुगमन करना। बेतरह अनुयायी होना (व्यंग्य)। (२) किसी के सहारे से कोई काम करना। सहारा लेना या पकड़ना। किसी विषय में किसी की सहायता पर निर्भर होना (व्यंग्य)। पूँछ दबाना = बहुत ही विनीत या अधीन भाव दिखाना। उ०—दुबरी कानौ हीन सुवन बिन पूँछ दवाए।—ब्रज० ग्रं०, पृ० ११०। पूँछ बिलौअल = चापलूसी। मीठी मीठी बातें कहना। उ०—संपादक महाशय पूछहिलौअज कर सुनी बात अनसुनी करना चाहते थे।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २३। बड़ी पूँछ का आदमी = बहुत अधिक संमानित। इज्जतदार। उ०—एक बोला वह बड़ी पूँछ के आदमी हैं। दूसरे ने कहा अच्छी बे पर की उड़ाई।—फिसाना०, भा० ३, पृ० ५०७। २. किसी पदार्थ केः पीछे का भाग। ३. पिछलग्गू। पुछल्ला। जो किसी के पीछए या साथ रहे। मुहा०—(किसी की) पूँछ होना = पुछल्ला बनना। पिछलग्गू बनना। अंधानुयायी होना।

पूँछगच्छ
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पूछगाछ'।

पूँछड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूँछ + ड़ी (प्रत्य०)] १. पूँछ। २. वह पानी जो नाले में चढ़ाव के आगे आगे चलता है।

पूँछताछ
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूँछना] दे० 'पूछताछ'।

पूँछना
क्रि० अ० [हिं० पूछना] दे० 'पूछना'।

पूँछपाँछ
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूछना] दे० 'पूछपाछ'।

पूँछलतारा
संज्ञा पुं० [हिं० पुच्छल + तारा] दे० 'केतु' या 'पुच्छलतारा'।

पूँछि पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० पुच्छ] दे० 'पूँछ'। उ०—ते पै बूड़े बाउरे भेंड़ पूँछि जिन्ह हाथ।—जायसी ग्रं०, पृ० ८७।

पूँजना (१)
क्रि० स० [देश०] नए बंदर की पकड़ना। (कलंदर)।

पूँजना पु (२)
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'पूजना'। उ०—जिमि सौदागर साहु मिलाहीं। पूँजि जोग बहु लाभ बढ़ाहीं।—कबीर सा०, पृ० ४४४।

पूँजी
संज्ञा स्त्री० [सं० पुञ्ज] १. किसी व्यक्ति या समुदाय का ऐसा समस्त धन जिसे वह किसी व्यवसाय या काम में लगा सके। किसी की अधिकारमुक्त वह संपूर्णँ सामग्री या वस्तुएँ जिनका उपयोग वह अपनी आमदनी बढ़ाने में कर सकता हो। निर्वाह की आवश्यकता से अधिक धन या सामग्री। संचित धन। संपत्ति। जमा। २. वह धन या रुपया जो किसी व्यापार या व्यवसाय में लगाया गया हो। वह धन जिससे कोई कारोबार आरंभ किया गया हो या चलता हो। किसी दूकान, कोठी, कारखाने, बैंक आदि की निज की चर या अचर संपत्ति। मूलधन। उ०—पूँजी पाई साच दिनोदिन होती बढ़ती। सतगुर के परताप भई है दौलत चढ़ती।— पलटू०, प० ३९। क्रि० प्र०—लगाना। मुहा०—पूँजी खोना या गँवाना = व्यापारा या व्यवसाय में इतना घाटा उठाना कि कुछ लाभ के स्थान पर पूँजी में से कुछ या कुल देना पड़े। ऐसा घाटा उठाना कि मूलधन की भी हानि हो। भारी घाटा या क्षति उठाना। पूँजीदार या पूँजीवाला = किसी व्यापार या उद्यम में जिसने धन लगाया हो। जिसने मूलधन या पूँजी लगाई हो। ३. धन। रुपया पैसा। जैसे,—इस समय तुम्हारी जेब में कुछ पूँजी मालूम होती है। ४. किसी विशेष विषय में किसी की योग्यता। किसी विषय में किसी का परिज्ञान या जानकारी। किसी विषय में किसी की सामर्थ्य या बल। (बोलचाल में क्व०)। ५. पु पुंज। समूह। ढेर। उ०—रतनन की पूँजी अति राजे। कनक करधनी अति छवि छाजै।—गोपाल (शब्द०)।

पूँजीदार
संज्ञा पुं० [हिं० पूँजी + फा० दार] दे० 'पूँजीपति'।

पूँजीपति
संज्ञा पुं० [हिं० पूँजी + सं० पति] वह मनुष्य जिस- के पास अधिक धन हो, जिसे उसने किसी काम में लगाया हो अथवा जिसे वह किसी काम में लगावे। पूँजीदार।

पूँजीवाद
संज्ञा पुं० [हिं० पूँजी + सं० वाद] समाज की वह अर्थव्यवस्था जिसमें अधिकाधिक लाभ पर दृष्टि रखनेवाले धनी समुदाय का, उत्पादन और वितरण के साधनों पर, आधिपत्य हो जाता है। सामाजिक क्रमविकास के अनुसार पूँजीवाद समांतवाद के बाद का चरण है।

पूँजीवादी
वि० [हिं० पूँजीवाद] पूँजीवाद को माननेवाला। पूँजीवाद के सिंद्धात का अनुयायी।

पूँठ पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० पृष्ठ, प्रा, पुट्ठ] पीठ। उ०—पंथी उभा पाथ सिर बुगचा बाँधा पूँठ। मरना मुँह आगे खड़ा, जीवन का सब झूँठ।—कबीर (शब्द०)।

पूँतारना †
क्रि० स० [सं० प्रचारण?] प्रोत्साहित करना। बढ़ावा देना। ललकारना। उ०—कियौ विदा जोधाँ सिरै, नूरमली पुंतार।—रा० रू०, पृ० २६९।

पूआ
संज्ञा पुं० [सं० पुप, अपूप] एक प्रकार की पूरी जो आटे को गुड़ या चीनी के रस में घोलकर घी में छानी जाती है। स्वाद के लिये इसमें कतरे हुए मेवे भी छोड़ते हैं। मालपुआ। एक पकवान।

पूकारना पु
क्रि० स० [हिं०] दे० 'पुकारना'। उ०—कहत हौं ज्ञान पूकारि करि सभन से। देत उपदेश दिल दर्द जानी।—कबीर रे०, पृ० २७।

पूखन (१)
संज्ञा पुं० [सं० पोषण] दे० 'पोषण'। उ०—भजे न दुखन कोप छिनहिं दिन पूखन होई।—सुधाकर (शब्द०)।

पूखन पु
संज्ञा पुं० [सं० पूषण] सूर्य।

पूग
संज्ञा पुं० [सं०] १. सुपारी का पेड़ या फल। उ०—घोंटा क्रमुक गुवाक पुनि पूग सुपारी आहि।—अनेकार्थ०, पृ० १०१। २. ढेरा। अंकोल। ३. शहतूत का पेड़। ४. कटहल। ५. एक प्रकार की कटोरी। ६. भाव। ७. छंद। ८. समूह। वृंद। ढेर। ९. किसी विशेष कार्य के लिये बना हुआ संघ। कंपनी। विशेष—काशिका में कहा गया है कि भिन्न जातियों के लोग आर्थिक उद्देश्य से जिस जिस संघ में काम करें, वह 'पूग' कहलाता है। जैसे, शिल्पियों या व्यापारियों का पूग। याज्ञवल्क्य ने इस शब्द को एक स्थान पर बसनेवाले भिन्न बिन्न जाति के लोगों की सभा के अर्थ में लिया है।

पूगकृत
वि० [सं०] १. स्तूप के आकार में स्थापित। स्तूपाकार किया हुआ। जो टीले के आकार का हो। २. संगृहीत। इकट्ठा किया हुआ। ढेर। राशि।

पूगना (१)
क्रि० अ० [हिं० पूजना] पूरा होना। पूजना। जैसे— मिती पूगना। उ०—संकट समाज असमंजस में रामराज काज जुग पूगनि को करतल पल भो।—तुलसी (शब्द०)।

पूगना पु (२)
क्रि० अ० [हिं० पहुँचना] दे० 'पहुँचना'। उ०— आरंभे अति फौज अकारी। दिल्लीपत पूगौ दहवारी।— रा० रू०, पृ० ५६।

पूगपात्र
संज्ञा पुं० [सं०] पीकदान। उगालदान।

पूगपीठ
संज्ञा पुं० [सं०] पीकदान।

पूगपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] विवाह संबंध स्थिर हो जाने पर दिया जानेवाला पुष्प सहित पान। पानफूल।

पूगपोट
संज्ञा पुं० [सं०] सुपारी [को०]।

पूगफल
संज्ञा पुं० [सं०] सुपारी।

पूगमंड
संज्ञा पुं० [सं० पूगमण्ड] पाकड़। प्लक्ष।

पूगरोट
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का ताड़। हिंताल।

पूगवैर
संज्ञा पुं० [सं०] सामूहिक शत्रुता। समूह से शत्रुता। अनेक व्यक्तियों से शत्रुता [को०]।

पूगी (१)
संज्ञा पुं० [सं० पूगिन्] सुपारी का पेड़।

पूगी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० पूग] सुपारी।

पूगोफल
संज्ञा पुं० [सं० पूगफल] सुपारी।

पूग्य
वि० [सं०] सामूहिक [को०]।

पूचलचर
वि० [हिं० पोच?] पोच। निंदित कार्य करनेवाला। उ०—बचा हमारे आगे तुम क्या पूचलचर हो। औरतों का भुगतान सब मैं ही करता हूँ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० ३, पृ० ८१४।

पूछ
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूछना] १. पूछने का भाव। जिज्ञासा। २. खोज। चाह जरूरत। तलब। जैसे,—आप वहाँ अवश्य जाइए, वहाँ आपकी सदा पूछ रहती है। ३. आदर। आवभगत। खातिर। इज्जत। जैसे,—तनिक भी पूछ न होने पर तो तुम्हारे मिजाज का यह हाल है, जो कुछ होती तो न जाने क्या करते। ४. माँग। खपत। जैसे,—आजकल बाजार में इसकी बड़ी पूछ है।

पूछगछ †, सपूछगाछ
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पूछताछ'।

पूछताछ
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूछना] कुछ जानने के लिये प्रश्न करने की क्रिया या भाव। किसी बात का पता लगाने के लिये बार बार पूछना या प्रश्न करना। बातचीत करके किसी विषय में खोज, अनुसंधान या जाँच पड़ताल। जिज्ञासा। जैसे,—घंटों पूछताछ करने के बाद तब इस मामले में इतना चलती है।

पूछना
क्रि० स० [सं० पृच्छण] १. कुछ जानने के लिये किसी से प्रश्न करना। कोई बात जानने की इच्छा से सवाल करना। जिज्ञासा करना। कोई बात दरियाफ्त करना। जैसे,—किसी का नाम पता पूछना, किसी चीज का दाम पूछना। २. सहायता करेन की इच्छा से किसी का हाल जानने की चेष्टा करना। खोज खबर लेना। जैसे,—इतने बड़े शहर में गरीबौं को कौन पूछना है? ३. किसी व्यक्ति के प्रति सत्कार के सामान्य भाव प्रकट करना। किसी का कुशल, स्थान आदि गूछना या उससे बैठने आदि के लिये कहना। संबोधन करना। जैसे,—तुम चाहे जितनी देर यहाँ खड़े रहो, तुम्हें कोई पूछनेवाला नहीं। मुहा०—बात न पूछना = (१) तुच्छ जानकर बातचीत न करना। ध्यान न देना। (२) आदर न करना। ४. आदर करना। गुण या मूल्य जानना। कद्र कारना। किसी लायक समझना। आश्रय देना। जैसे,—इस शहर में तुम्हारे गुण को पूछनेवाले बहुत कम हैं। ५. ध्यान देना। टोकना। जैसे,—तुम बेखटके चले जाओ, कोई नहीं पूछ सकता।

पूछपाछ
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूछना] दे० 'पूछताछ'।

पूछरी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूँछ + री (प्रत्य०)] १. दुम। २. पीछे का भाग।

पूछाताछी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूछना + अनु० पाछना] पूछने की क्रिया या भाव।

पूछापेखी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूछना + अनु० पाछना] पूछने की क्रिया या भाव।

पूछापेखी
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूछना + पेखना] पूछने जाँचने की क्रिया या भाव। पूछताछ। उ०—दिग्विजय बाबू ने समझा पूछापेखी करना खामखाह की बात है।—किन्नर०, पृ० ८२।

पूज ‡ † (१)
वि० [सं० पूज्य] पूजने योग्य। पूजनीय।

पूज (२)
संज्ञा पुं० [सं० पूज्य] देवता। (डिं०)।

पूज पु (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० पूजा] १. पूजा। अचंना। उ०—बिना नीव जहँ देहरो बिना पूज जहँ देव। बिन बाती दीपक जहाँ बिन मूरति तहँ सेव।—राम० धर्म०, पृ० ६१। † २. खत्रियों आदि में वह गणेशपूजन जो विवाह यज्ञोपवीत आदि शुभ कर्मों के पहिले होता है। पूजा।

पूजक
संज्ञा पुं० [सं०] पूजा। करनेवाला। पूजनकर्ता। वह जो पूजन करे।

पूजकारी †
वि० [सं० पूजा + हिं० करना] पूजा करनेवाला। अर्चना करनेवाला। पूजक। उ०—आत्मराम तजि जड़ पूजकारी।—कबीर रे०, पृ० ६।

पूजन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० पूजक, पूजनीय, पूजितव्य, पूज्य] १. पूजा की क्रिया। ईश्वर या किसी देवी देवता के प्रति श्रद्धा संमान, विनय और समर्पण प्रकट करनेवाला कार्य। देवता की सेवा और वंदना। अर्चन। आराधन। २. आदर। समान। खातिरदारी। जैसे, अथितिपूजन। ३. आदर सत्कार की वस्तु।

पूजना (१)
क्रि० स० [सं० पूजन] १. किसी देवी देवता को प्रसन्न करने कि लेयि यथाविधि कोई अनुष्ठान या कर्म करना। ईश्वर या किसी देवी देवता के प्रति श्रद्धा, संमान, विनय और समर्पण का भाव प्रकट करनेवाला कार्य करना। अर्चना करना। आराधन करना। २. किसी को प्रसन्न या परितुष्ट करने के लिये कोई कार्य करना। भक्ति या श्रद्धा के साथ किसी की सेवा करना। आदर सत्कार करना। ३. वंदना करना। सिर झुकाना। बड़ा मानना। संमान करना। ४. घूस देना। रिश्वत देना। ५. नया बंदर पकड़ना। (कलंदर)।

पूजना (२)
क्रि० अ० [सं० पूयते, प्रा० पुज्जति] १. पूरा होना। भरना। बराबर हो जाना। कमी न रह जाना। जैसे,—यह हानि इस जन्म में तो नहीं पूजने की। २. गहराई का भरना या बराबर हो जाना। आसपास के धरातल के समान हो जाना। जैसे, घाव पूजना, गड्डा पूजना। ३. पटना। चुकता होना। जैसे, ऋण पूजना। ४. पूरा होना । बीतना। समाप्त होना। जैसे, वर्ष, अवधि, मिआद आदि पूजना।

पूजनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] मादा गौरैया [को०]।

पूजनीय
वि० [सं०] १. जिसकी पूजा करना कर्तव्य या उचित हो। पूजने योग्य। आराध्य। अर्चनीय। २. आदरणीय। संमान योग्य। उ०—पूजनीय प्रिय परम जहाँ ते। सब मानि- अहिं राम के नाते।—मानस, २। ७४।

पूजमान
वि० [हिं० पूजना + मान या सं० पूज्यमान] पूज्य। आराध्य। आदरणीय। पूजनीय।

पूजयितव्य
वि० [सं०] पूजनीय। पूजा योग्य [को०]।

पूजयिता
संज्ञा पुं० [सं० पूजयितृ] पूजा करनेवाला। पूजक।

पूजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ईश्वर या किसी देवी देवता के प्रति श्रद्धा, संमान, विनय और समर्पण का भाव प्रकट करनेवाला कार्य। अर्चना। आराधन। २. वह धार्मिक कृत्य जो जल, फूल, फल, अक्षत अथवा इसी प्रकार के और पदार्थ किसी देवी देवता पर चढ़ाकर या उसके निमित्त रखकर किया जाता है। आराधन। अर्चा। विशेष—पूजा संसार की प्रायः सभी आस्तिक और धार्मिक जातियों में किसी न किसी रूप में हुआ करती है। हिंदू लोग स्नान और शिखावंदन, आदि करके बहुत पवित्रता से पूजा करते हैं। इसके पंचोपचार, दशोपचार और षोडशोपचार ये तीन भेद माने जाते हैं। गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य से जो पूजा की जाती है उसे पंचोपचार; जिसमें इन पाँचों के अतिरिक्त पाद्य, अर्ध्य, आचमनीय, मधुपर्क और आचमन भी हो वह दशोपचार और जिसमें इन सबके अतिरिक्त आसन, स्वागत, स्नान, वसन, आभरण और वंदना भी हो वह षोडशोपचार कहलाती है। इसके अतिरिक्त कुछ लोग विशे- षतः तांत्रिक आदि १८, ३६ और ६४ उपचारों से भी पूजा करते हैं। पूजा के सात्विक, राजसिक और तामसिक ये तीन भेद भी माने जाते हैं। जो पूजा निष्काम भाव से, बिना किसी आडंबर के और सच्ची भक्ति से की जाती है वह सात्विक; जो सकाम भाव और समारोह से की जाय वह राजसिक; और जो बिना विधि, उपचार और भक्ति के केवल लोगों को दिखाने के लिये की जाय वह तामसिक कहलाती है। पूजा के नित्य, नैमित्तिक और काम्य के तीन और भेद माने जाते हैं। शिव, गणेश, राम, कृष्ण आदि की जो पूजा प्रतिदिन की जाती है वह नित्य, जो पूजा पुत्रजन्म आदि विशिष्ट अवसरों पर विशिष्ट कारणों से की जाती है वह नैमित्तिक और जो पूजा किसी अभीष्ट की सिद्धि के उद्देश्य से की जाती है वह काम कहलाती है। ३. आदर सत्कार। खातिर। आचभगत। यौ०—पूजा प्रतिष्ठा। ४. किसी को प्रसन्न करने के लिये कुछ देना। भेंट। रिश्वत। जैसे, पुलिस की पूजा करना, कचहरी के अमलों की पूजा करना। ५. तिरस्कार। दंड। ताड़ना। प्रहार। कुटाई। जैसे,—जबतक इस लड़के की अच्छी तरह पूजा न होगी तबतक यह नहीं मानेगा।

पूजाकर
वि० पुं० [सं०] पूजा करनेवाला [को०]।

पूजागृह
संज्ञा पुं० [सं०] उपासनागृह। मंदरि। देवालय [को०]।

पूजाधार
संज्ञा पुं० [सं०] पूजा की आधार रूप वस्तुएँ। देवपूजा में विधेय वस्तुएँ। जैसे, जल, विष्णुचक्र, मंत्रस प्रतिमा, शालग्राम शिलादि।

पूजापाठ
संज्ञा पुं० [सं० पूजा + पाठ] भजनपूजन। पूजा। उपासना।

पूजारा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'पूजारी'।

पूजाह
वि० [सं०] पूजा के योग्य। पूजनीय।

पूजासंभार
संज्ञा पुं० [सं० पूजासम्भार] पूजन की सामग्री। पूजा का उपकरण [को०]।

पूजित
वि० [सं०] [वि० स्त्री० पूजिता] १. जिसकी पूजा की गई हो। प्राप्तपूजा। आराधित। अर्चित। संमानित। आदृत। २. मान्य। स्वीकृत (को०)। ३. संस्कृत। संस्तुति किया हुआ (को०)।

पूजितपूजक
वि० [सं०] संमानित का संमान करनेवाला [को०]।

पूजितव्य
वि० [सं०] पूजा करने योग्य। पूजनीय।

पूजिल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] देवता।

पूजिल (२)
वि० पूजनीय। पूजा योग्य।

पूजी †
संज्ञा स्त्री० [?] घोड़े के मुँह पर का साज [को०]।

पूजोपकरण
संज्ञा पुं० [सं०] पूजा की सामग्री।

पूज्य (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० पूज्या] १. पूजा योग्य। पूजनीय। २. आदर योग्य। माननीय।

पूज्य (२)
संज्ञा पुं० १. ससुर। श्वसुर। २. आदरणीय या मान्य व्यक्ति। पूजनीय व्यक्ति।

पूज्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूज्य होने का भाव। पूजा के योग्य होना। पूजनीयता।

पूज्यपाद
वि० [सं०] जिसके पैर पूजनीय हों। अत्यंत पूज्य। परमाराध्य। अत्यंत मान्य।

पूज्यपूजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूजनीय की पूजा करना [को०]।

पूज्यमान (१)
वि० [सं०] जिसकी पूजा की जा रही हो। पूजा जाता हुआ। सेव्यमान।

पूज्यमान (२)
संज्ञा पुं० सफेद जीरा।

पूटरी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] ईख के रस की वह अवस्था जो उसके खाँड़ बनने से पहले होती है।

पूटीन
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पुटीन'।

पूठ ‡
संज्ञा पुं० [सं० पृष्ठ, प्रा० पिट्ठ, पुट्ठ] १. दे० 'पुट्ठा'। २. पीठ। पीछा। उ०—आगै शिष सामा खड़ा दिया जगत कूँ पूठ।—राम० धर्म०, पृ० ५४।

पूठा (१)
संज्ञा पुं० [सं० पृष्ठ] दे० 'पुट्ठा'।

पूठा पु (२)
क्रि० वि० [हिं० पूठ] पीछे। पीछे पीछे। उ०—कायर जन पूठा फिरै, सुन पहुँचै कोई सूर।—दरिया०, पृ० १७।

पूठि पु ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० पृष्ठ] पीठ। उ०—देखादेखी पकरिया गई छिनक के छूटि। कोई बिरला जन ठहरे जाकी ठकोरी पूठि।—कबीर (शब्द०)।

पूड़ा
संज्ञा पुं० [सं० पूप] दे० 'पूआ'।

पूड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० पूलिका, पूरिका, पुटिका, हिं० पूरी] १. तबले या मृदंग पर मढ़ा हुआ गोल चमड़ा। २. दे० 'पूरी'।

पूण् (१)
संज्ञा पुं० [डिं०] पत्थर।

पूण् † (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० पूर्णिमा] पूर्णिमा। पूर्णमासी।

पूत (१)
वि० [सं०] १. पवित्र। शुद्ध। शुचि। २. निस्तुषित। साफ किया हुआ। कूट पछोरकर साफ किया हुआ (को०)। ३. निर्मित। रचित। आविष्कृत (को०)। ४. दुर्गंधयुक्त (को०)। ५. कृत प्रायश्चित। प्रायश्चित्त किया हुआ (को०)।

पूत (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सत्य। २. शंख। ३. सफेद कुश। ४. पलास। ५. तिल का पेड़। ६. वह अन्न जिसकी भूसी निकाल दी गई हो। ७. जलाशय। ८. विककत का वृक्ष (राज- निघंटु)।

पूत (३)
संज्ञा पुं० [सं० पुत्र, प्रा० पुत्त] बेटा। लड़का। पुत्र। उ०— पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के।—मानस, २। ५६।

पूत (४)
संज्ञा पुं० [देश०] चूल्हे के दोनों किनारों और बीच के वे नुकीले उभार जिनके सहारे पर तवा या और बरतन रखते हैं।

पूतक्रता
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक वैदिक ऋषि की स्त्री का नाम।

पूतक्रतायी
संज्ञा स्त्री० [सं०] इंद्रपत्नी। शची। इंद्राणी।

पूतक्रतु
संज्ञा पुं० [सं०] इंद्र।

पूतगंध
संज्ञा पुं० [सं० पूतगन्ध] काली बर्बरी तुलसी। बर्बर।

पूतड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० पूत + ड़ा (प्रत्य०)] वह छोटा बिछौना जो बच्चों के नीचे इसलिये बिछाया जाता है कि बड़ा बिछौना मल मूत्रादि से बचा रहे। मुहा०—पूतड़ों के अमीर = जन्म के अमीर। पैदाइशी धनी या रईस। खानदानी या पुश्तैनी अमीर।

पूततृण
संज्ञा पुं० [सं०] सफेद कुश।

पूतदारु
संज्ञा पुं० [सं०] पलास। ढाक।

पूतद्रु
संज्ञा पुं० [सं०] १. ढाक। पलास। २. खदिर। खैर का पेड़। ३. देवदार।

पूतधान्य
संज्ञा पुं० [सं०] तिल।

पूतन
संज्ञा पुं० [सं०] १. वैद्यक के अनुसार गुदा में होनेवाला एक प्रकार का रोग। २. बेताल।

पूतना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. एक दानवी जो कंस के भेजने से बालक श्रीकृष्ण को मारने के लिये गोकुल आई थी। विशेष—इसने अपने स्तनों पर इसलिये विष लगा लिया था कि श्रीकृष्ण दूध पीकर उसके प्रभाव से मर जाँय। परंतु कथा है कि श्रीकृष्ण पर विष का तो कुछ प्रभाव न पड़ा उलटे उन्होंने इसका सारा रक्त चूसकर इसी को मार डाला। यह भी कथा है कि मरने के समय इतने बहुत लंबा चौड़ा शरीर धारण कर लिया था और जितनी दूर में वह गिरी उतनी दूर की जमीन धँस गई थी। बकासुर, वत्सासुर, और अधासुर नाम के इसे तीन भाई थे। २. सुश्रुत के अनुसार एक बालग्रह या बालरोग। विशेष—यह बालघातक रोग है। इसमें बच्चे को दिन रात में कभी अच्छी नींद नहीं आती। पतले और मैले रँग के दस्त होते रहते हैं। शरीर से कौवे की सी गंध आती है, बहुत प्यास लगती और कै होती है तथा रौंगटे खड़े रहते हैं। ३. कार्तिकेय की एक मातृका का नाम। ४. एक योगी का नाम। ५. पीली हड़। ६. गंधमासी। सुंगंध जटामीस।

पूतनारि
संज्ञा पुं० [सं०] पूतना को मारनेवाला, श्रीकृष्ण।

पूतनासूदन
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण।

पूतनाहड़
संज्ञा स्त्री० [सं० पूतना + हिं० हड़] छोटी हड़।

पूतनाहन्
संज्ञा पुं० [सं०] श्रीकृष्ण [को०]।

पूतनिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'पूतना'—१।

पूतपत्री
संज्ञा स्त्री० [सं०] तुलसी [को०]।

पूतपाप
वि० [सं०] पाप से मुक्त [को०]।

पूतफल
संज्ञा पुं० [सं०] कटहल। पनस।

पूनभृत
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन काल का एक बरतन जिसमें सोमरस रखा जाता था।

पूतमति (१)
वि० [सं०] जिसकी बुद्धि पवित्र हो। शुद्धचित्त। पवित्र अंतःकरणवाला।

पूतमति (२)
संज्ञा पुं० शिव का एक नाम।

पूतर
संज्ञा पुं० [सं०] १. जलीय प्राणी। जलचर। जलजीव। २. साधारण व्यक्ति [को०]।

पूतरा † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० पुतला] दे० 'पुतला'। उ०—और देह कागद कौ पूतरा पवन बस उडयो चल्यौ आत होई।—दो सौ बानवन०, भा० १, पृ० २६४।

पूतरा (२)
संज्ञा पुं० [सं० पुत्र] पुत्र। लड़का। बाल बच्चा। उ०— हम पहले ते भी मुआ, हम भी चलनेहार। हमरे पाछे पूतरा तिन भी बाँधा भार।—कबीर (शब्द०)।

पूतरी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'पुतली'। उ०—जैसे सूतर पूतरी चित्रकार चित्राम। मैं अनाथ ऐसे सदा तुम इच्छा सोइ राम।—राम० धर्म०, पृ० २७५।

पूता (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दूब। २. दुर्गा (को०)।

पूता (२)
वि० स्त्री० पवित्र। शुद्ध।

पूतात्मा (१)
वि० [सं० पूतात्मन्] जिसकी आत्मा पवित्र हो। पवित्र- चित्त। शुद्ध अंत करण का।

पूतात्मा (२)
संज्ञा पुं० १. विष्णु। २. संत महात्मा (को०)।

पूति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पवित्रता। शुचिता। २. दुर्गंध। बदबूदार। उ०—जनम जनम तेँ अपावन असाधु महा, अपरस पूति सों न छाड़ै अजोँ छूति कौँ।—घनानंद, पृ० १९८। ३. गंधमार्जार। मुश्क बिलाव। ४. रोहिष सौधिया। रोहिष तृण। ५. गंदा पानी (को०)। ६. पीव। पूय (को०)।

पूति (२)
वि० दुर्गंधयुक्त। बदबूदार [को०]।

पूतिकंटक
संज्ञा पुं० [सं० पूतिकण्टक] हिंगोट।

पूतिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुर्गंध करंज। काँटा करंज। पूति करंज। २. विष्ठा। पाखाना। गू।

पूतिक (२)
वि० दुर्गंधयुक्त। बदबूदार।

पूतिकन्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुदीना।

पूतिकर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] कान का एक रोग जिसमें भीतर फुंसी या क्षत होने के कारण बदबूदार पीप निकलने लगती है।

पूतिकर्णक
संज्ञा पुं० [सं०] पूतिकर्ण रोग।

पूतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. पोय या पोई का साग। २. एक प्रकार की शहद की मक्खी। ३. बिल्ली।

पूतिकामुख
संज्ञा पुं० [सं०] घोंघा। शबूक।

पूतिकाष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] १. देवदार। २. धूप सरल। सरल वृक्ष।

पूतिकाष्ठक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पूतिकाष्ठ'।

पूतिकाह्व
संज्ञा पुं० [सं०] दुर्गंध करंज। पूति करंज।

पूतिकीट
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार की शहद की मक्खी। पूतिका।

पूतिकेशर
संज्ञा पुं० [सं०] १. नागकेशर। २. मुश्क बिलाव। गंध मार्जार।

पूतिकेश्वरतीर्थ
संज्ञा पुं० [सं०] शिवपुराण में वर्णित एक तीर्थस्थान।

पूतिगंध
संज्ञा पुं० [सं० पूतिगन्ध] १. राँगा। २. हिंगोट या गोंदी। इंगुदी। ३. गंधक। ४. दुर्गंध। बदबू।

पुतिगंधा
संज्ञा स्त्री० [सं० पूतिगन्धा] बकुची। बावची। सोमराजी।

पूतिगाधि
संज्ञा स्त्री० [सं० पूतिगन्धि] दुर्गंध। बदबू।

पूतिगंधिका
संज्ञा स्त्री० [सं० पूतिगन्धिका] १. बावची। बकुची। २. पोय। पूतिका शाक।

पूतिघास
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत में वर्णित मृग की जाति का एक जतु।

पूतितैला
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्योतिष्मती। मालकंगनी [को०]।

पूतिदला
संज्ञा स्त्री० [सं०] तेजपत्ता।

पूतिनस्य
संज्ञा पुं० [सं०] वह रोग जिसमें श्वास अथवा नाक और मुँह से दुर्गंध निकलती है। विशेष—सुश्रुत के मत से इस रोग का कारण गले और तालु- मेल में दोषों का संचय होकर वायु को पूतिभावयुक्त या दूर्गंधित कर देता है।

पूतिनासिक
वि० [सं०] जिसे पूतिनस्य रोग हुआ हआ हो। जिसके नाक या श्वास से दुर्गंधि निकलती हो। पूतिनस्य रोगी।

पूतिपत्र
संज्ञा पुं० [सं०] १. सोनापाठा। २. पीला लोध। पीतलोध्र।

पूतिपत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पसरन। प्रसारिणी लता।

पूतिपर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] दुर्गंध करज। पूति करज।

पूतिपर्णक
संज्ञा पुं० [सं०] पूतिपर्ण।

पूतिपल्लवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बड़ा करेला।

पूतिपुष्प
संज्ञा पुं० [सं०] गोंदी। इंगुदी वृक्ष।

पूतिपुष्पिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] चकोतरा नीबू।

पूतिफल
संज्ञा पुं० [सं०] बावची। सोमराजी।

पूतिफला
संज्ञा स्त्री० [सं०] बावची।

पूतिफली
संज्ञा स्त्री० [सं०] बावची [को०]।

पूतिभाव
संज्ञा पुं० [सं०] सड़ने की स्थिति या दशा। सड़ने का भाव या क्रिया [को०]।

पूतिमज्जा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गोंदी। इंगुदी वृक्ष।

पूतिमयूरिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बर्वरी। २. बनतुलसी।

पूतिमारुत
संज्ञा पुं० [सं०] १. छोटी बेर का पेड़। २. बेल का पेड़।

पूतिमाष
संज्ञा पुं० [सं०] एक गोत्रप्रवर्तक ऋषि।

पूतिमुदगला
संज्ञा स्त्री० [सं०] रोहिष सोधिया। रोहिष तृण।

पूतिमूषिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] छछूँदर।

पूतिमृत्तिक
संज्ञा स्त्री० [सं०] पुराणनुसार इक्कीस नरकों में से एक नरक का नाम।

पूतिमेद
संज्ञा पुं० [सं०] दुर्गंध खैर। अरिमेद।

पूतियोनि
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का योनि रोग।

पूतिरक्त
संज्ञा पुं० [सं०] एक रोग जिसमें नाम में से दुर्गँधियुक्त रक्त निकलता है।

पूतिरज्जु
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक लता।

पूतिवक्त्र
वि० [सं०] जिसके मुँह से दुर्गँध आती हो [को०]।

पूतिवर्वरी
संज्ञा स्त्री० [सं०] बनतुलसी। जंगली तुलसी। काली बर्बरी।

पूतिवात
संज्ञा पुं० [सं०] १. बेल का पेड़। बिल्व वृक्ष। २. गंदी वायु। दुर्गंधयुक्त वायु [को०]।

पूतिवाह
संज्ञा पुं० [सं०] बिल्व वृक्ष। बेल का पेड़।

पूतिवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] सोना पाठा। श्योनाक वृक्ष।

पूतिव्रण
संज्ञा पुं० [सं०] वह फोड़ा जिसमें मवाद हो। मवाद देनेवाला फोड़ा [को०]।

पूतिशाक
संज्ञा पुं० [सं०] अगस्त। वकवृक्ष।

पूतिशारिजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बनबिलाव।

पूतिसृंजय
संज्ञा पुं० [सं० पूतिसृञ्जय] १. एक प्राचीन जनपद या देश। २. उक्त देश के नीवासी।

पूती
संज्ञा स्त्री० [सं० पोत (= गट्ठा)] १. जड़ जो गाँठ के रूप में हो। २. लहसुन की गाँठ।

पूतीक
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुर्गंध या काँटा करंज। २. गंधमार्जार। मुश्क बिलाव।

पूतीकरंज
संज्ञा पुं० [सं० पुनीकरञ्ज] काँटा करंज।

पूतीका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पोय। पोई। पूतिका शाक।

पुत्कारो
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सरस्वती देश का एक नाम। २. नागों की राजधानी।

पूत्यंड
संज्ञा पुं० [सं० पूत्यण्ड] १. वह हिरन जिसकी नाभि से कस्तूरी निकलती है। २. एक बदबूदार कीड़ा। गंधकीट।

पूत्रित
वि० [सं०] पूजन किया हुआ। पूजित।

पूथ
संज्ञा पुं० [देश०] बालू का ऊँचा टीला या ढूह।

पूथा
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'पूथ'।

पूथिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूतिका शाक। पोई का साग।

पूदना (१)
संज्ञा पुं० [हिं० फुदकना] एक पक्षी जो उत्तरी भारत में पाया जाता है। विशेष—इसका रंग प्रायः भूरा होता है, परंतु ऋतुभेद के अनुसार कुछ कुछ बदलता रहता है। इसका शरीर प्रायः सात इंच लंबा होता है। यह जमीन पर चला करता है और घास का घोंसला बनाकर रहता है।

पूदना (२)
संज्ञा पुं० [फा० पोदनह् हिं० पुदीना] दे० 'पुदोना'।

पुन (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १. जंगली बादाम का पेड़ जो भारत के पश्चिमी किनारों पर होता है। विशेष—इसके फूल और पत्तियाँ दवा के काम आती हैं और फल में से तेल निकाला जाता है। इस वृक्ष में एक प्रकार का गोंद निकलता है। २. कलपुन नामक वृक्ष जिसकी लकड़ी इमारत बनाने के काम में आती हैं। इसके बीजों से एक प्रकार का तेल भी निकलता है। ३. तलवार की मुठिया का नीचेवाला सिरा।

पून (२)
संज्ञा पुं० [पुण्य, प्रा० पुन्न] दे० 'पुण्य'।

पून पु (३)
संज्ञा पुं० [सं० पूर्ण] दे० 'पूर्ण'। उ०—तौसोइ लहँगा बन्यो सिलसिलो पूर्णमासी की पून री।—नंददास (शब्द०)।

पूनव
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूनो] दे० 'पूनो' या 'पूर्णिमा'।

पूनसलाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० पूनी + सलाई] वह पतली लकड़ी जिसपर रूई की पूनियाँ कातने के लिये बनाते हैं।

पूना
संज्ञा पुं० [देश०] १. कनपून या पून नाम का सदाबाहर पेड़। २. एक प्रकार की ईख।

पूनाक †
संज्ञा स्त्री० [देश०] तेलहन में की बचो हुई सीठी। खली।

पूनिउँ, पूनिवँ पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पूर्णिमा] दे० 'पूनो'। उ०— पदमावति भय पूनिवँ कला। चौरह चाँद उआ सिंघला।—जायसी ग्रं०, पृ० ३५०।

पूनी
संज्ञा स्त्री० [सं० पिञ्जिका] धुनी हुई रूई की वह बत्ती जो चरखे पर सूत कातने के लिये तैयार की जाती है।

पूनो पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० पूर्णिमा] पूर्णिमा। पूर्णमासी। शुक्ल पक्ष की पंद्रहवीं या चांद्रमास की अंतिम तिथि।

पून्यो †
संज्ञा स्त्री० [सं० पूर्णिमा] दे० 'पूनो'। उ०—पून्यो प्रगट नभ भा उज्यारा बुधि पिंड सरीर।—रामानंद०, पृ० १६।

पूप
संज्ञा पुं० [सं० पूप, अनूप] पूआ या मालफुआ नाम का मीठा पकवान।

पूपला
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्राचीन काल का एक प्रकार का मीठा पकवान। पर्या०—पूपालिका। पूपाली। पूपिका। पूलिका।

पूपली (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'पूपला'।

पूपली
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. पोली नली। २. बच्चों के खेलने का काठ का बहुत छोटा खिलौना जो छोटी डंठी के आकार का होता है और जिसके दोनों सिरे कुछ मोटे होते हैं। ३. बाँस आदि में से काटी हुई वह छोटी खोखली नली जिसमें देसी पंखों की डंठी का अंतिम भाग फँसाया रहता है और जिसके सहारे पंखा सहज में चारों ओर घूमा करता है।

पूपशाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्थान जहाँ पूप आदि पकवान रखा जाता हो।

पूपालिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'पूपला' [को०]।

पूपाली
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूप। मालपुआ।

पूपाष्टका
संज्ञा स्त्री० [सं०] पूस के कृष्णपक्ष की अष्टमी। विशेष—तिथितत्व के अनुसार इस दिन मालपूए से श्राद्ध किया जाना चाहिए।

पूपिक, पूपिका
संज्ञा पुं० [सं०] पूआ, पूरी आदि पकवान।

पूब पु
वि० [सं० पूर्व] पुराना। प्राचीन। पूर्व। उ०—कहैं बीर कवि चंद तुअ पूब कथा कहुँ मंडि।—पृ० रा०, २४। ४१३।

पूय
संज्ञा पुं० [सं०] पीप। मवाद।

पूयउडश
संज्ञा पुं० [देश०] भोजपत्र की जाति का एक वृक्ष। विशेष—यह वृक्ष खसिया पहाड़ी और बरमा में होता है। इसकी छाल मनीपुर आदि के जंगली लोग खाते है और पानी के घड़े पर उसकी मजबूती के लिये लपेटते हैं।

पूयका
संज्ञा पुं० [सं०] पुराणनुसार एक प्रेतयोनि। विशेष—इन प्रेतयोनि में मरने के उपरांत वे वैश्य जाते हैं जो अपने धर्म से च्युत होते हैं। कहते हैं, ऐसे प्रतों का आहार पीप है।

पूयकुंड
संज्ञा पुं० [सं० पूयकुण्ड] पुराणानुसार एक नरक का नाम।

पूयन
संज्ञा पुं० [सं०] मवाद। पूय [को०]।

पूयप्रमेह
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का रोग जिसमें पीप के समान मूत्र होता है, अथवा जिसमें मूत्र में से पीप के समान दुर्गंध आती है।

पूयरक्त
संज्ञा पुं० [सं०] नाक का एक रोग जिसमें रक्तपित्त की अधिकता अथवा माथे पर चोट आने के कारण नाक में से पीप मिला हुआ लहू निकलता है।

पूयवह
संज्ञा पुं० [सं०] एक नरक का नाम।

पूयशोणित
संज्ञा पुं० [सं०] नाक का एक रोग। दे० 'पूयरक्त' [को०]।

पूयस्त्राव
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार आँखओं का वह रोग जिसमें उसका संधिस्थान पक जाता है और उससे पीप बहने लगती है।

पूयारि
संज्ञा पुं० [सं०] नीम। निंब।

पूयालस
संज्ञा पुं० [सं०] आँखों का एक रोग जिसमें उसकी पुतली की संधि में शोथ होने के कारण वह स्थान पक जाता है औऱ उसमें से दुर्गँधयुक्त पीप निकलती है।

पूयालसक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'पूसालस'।

पूयोद
संज्ञा पुं० [सं०] एक नरक का नाम।

पूर (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दारु अगर। दाहगुरु। २. बाढ़। ३. धाव पूरा होना या भरना। व्रणसंशुद्धि। ४. प्राणायाम में पूरक की क्रिया। विशेष—दे० 'पूरक'। ५. प्रवाह। धारा। उ०— जमुना पूर परम सुखदायक। दरस परस सरसत ब्रजनायक।—घनानंद, पृ० १८७। ६. खाद्यविशेष। एक प्रकार का पक्वान्न (को०)। ७. जलाशय । तालाब (को०)। ८. नीबू। बिजौरा नींबू (को०)।

पूर (२)
वि० [सं० पूर्णा] १. दे० 'पूर्ण'। २. वे मसाले या दूसरे पदार्थ जो किसी पकवान के भीतर भरे जाते हैं। जैसे, समोसे का पूर।

पूर (३)
संज्ञा पुं० [हिं० पूला] १. घास आदि का बँधा हुआ मुट्ठा। पूला। पूलक। २. फसल की उपज की तीन बराबर बराबर राशियाँ जिनमें से एक जमींदार और दो तिहार्ह काश्तकार लेता है। तीकुर। तिकुर। ३. बैलगाड़ी के अगल बगल का रस्सा।

पूरक (१)
वि० [सं०] पूरा करनेवाला। जिससे किसी की पूर्ति हो।

पूरक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] प्राणायाम विधि के तीन भागों में से पहला भाग जिसमें श्वास को नाक से खींचते हुए भीतर की ओर ले जाते हैं। योगविधि से नाक के दाहिने नधने को बंद करके बाएँ नथने से श्वास को भीतर की ओर खींचना। २. बिजौरा नीबू। ३. वे दस पिंड जो हिंदुओं में, किसी के मरने पर उसके मरने की तिथि से दसवें दिन तक नित्य दिए जाते हैं। विशेष—कहते हैं, जब शरीर जल जाता है तब इन्हीं पिंड़ों से मृत व्यक्ति के शरीर की पूर्ति होती है और इसी लिये इन्हें पूरक कहते हैं। पहले पिंड से मस्तक, दूसरे से आँखें, नाक और कान, तीसरे से गला, चौथे से बाँहें और छाती इसी प्रकार अलग अलग पिंडों से अलग अलग अंगों का बनना माना जाता है। ४. वह अंक जिसके द्वारा गुणा किया जाता है। गुणक अंक। ५. वह अंश जो किसी चीज की कमी को पूरा करने के लिये रखा जाय। जैसे, पूरक (सप्लिमेंटरी) परीक्षा।

पूरण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. भरने की क्रिया। परिपूर्ण करने की क्रिया। २. पूरा करने की क्रिया। समाप्त या तमाम करना। ३. कान आदि में तेल आदि भरने की क्रिया। ४. अंकों का गुणा करना। अंकगुणन। ५. पूरक पिंड। दशाह पिंड। ६. मेह। वृष्टि। ७. केवटी। मोथा। ८. सेतु। पुल। ९. एक प्रकार का व्रण या फोड़ा जो वात के प्रकोप से होता है। १०. समुद्र। ११. पुनर्नवा। गदहपूरना। १२. शाल्मली वृक्ष (को०)। १३. आयुर्वेदोक्त एक तैल। विष्णु तैल (को०)। १४. एक पक्वान्न। खाद्यविशेष (को०)। १५. खींचना। आकृष्ट करना। जैसे, धनुष। १६. सज्जित करना। सजाना (को०)।

पूरण (२)
वि० [सं०] १. पूरक। पूरा करनेवाला। २. संख्या- क्रम बतानेवाला (को०)। ३. प्रभावकारी। ४. संतुष्टि देनेवाला (को०)।

पूरण पु
वि० [सं० पूर्ण] पूरा। पूर्ण।

पूरणहारा पु
वि० [सं० पूर्ण + हिं० हारा (प्रत्य०)] पूरा करनेवाला (ईश्वर)। उ०—दादू पूरणहार पूरसी, जो चित रहसी ठाँम।—दादू०, पृ० ३३९।

पूरणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सेमर। शाल्मली वृक्ष। २. भगवती दुर्गा का एक नाम (को०)।

पूरणीय
वि० [सं०] भरने योग्य। परिपूर्ण करने योग्य।

पूरन पु
वि० [सं० पूर्ण, हिं० पूरण] दे० 'पूर्ण'। उ०—(क) जनु चकोर पूरन ससि लोभा।—मानस, १। २०७। (ख) हो सु भले हौ कहा कहियौ हम आपने पूरन भाग लहे हो। घनानंद, पृ० १३९।

पूरनकाम पु
वि० [सं० पूर्णकाम] दे० 'पूर्णकाम'। उ०—(क) देउ काह तुम पूरनकामा।—मानस, ३। २५। (ख) श्री बसुदेव धाम अभिराम। प्रगटहिंगे प्रभु पूरनकाम।—नंद० ग्रं०, पृ० २२०।

पूरनचंद पु
संज्ञा पुं० [सं० पूर्णचन्द्र] दे० 'पूर्णचंद्र'। उ०—मनु घन पूरनचंद, दूर निकट पुनि आवहिं।—नंद० ग्रं०, पृ० ३९५।

पूरनपरख पु †
संज्ञा पुं० [सं० पूर्ण+ पर्व] पूर्णमासी। उ०— दशरथ पूरनपरब बिधु उदित समय संजोग। जनकनगर सर, कुमुदगण तुलसी प्रमुदित लोग।—तुलसी (शब्द०)।

पूरनपूरी
संज्ञा स्त्री० [सं० पूर्ण + हिं० पूड़ी] एक प्रकार की मीठी कचौड़ी।

पूरनमासी
संज्ञा स्त्री० [सं० पूर्णमासी] दे० 'पूर्णमासी'। उ०— पूरनमासी आदि जो मंगल गाइए।—कबीर श०, भा० ४, पृ० ३।

पूरना † (१)
क्रि० स० [सं० पूरण] १. कमी या त्रुटि को पूरा करना। किसी खाली जगह को भरना। पूर्ति करना। उ०—दादू पूरणहारा पूरसी, जो चित रहसी ठाँम। अंतर थे हरि उमगसी सकल निरतंर राम।—दादू०, पृ० ३३९। २. ढाँकना। किसी वस्तु को किसी वस्तु से आच्छादित कर छारन पूरत।—शंभु (शब्द०)। ३. (मनोरथ) सफल करना। सिद्ध करना। (मनोरथ) पूर्ण करना। उ०—सिद्ध गणेश मनावहिं विधि पूरे मन काज।—जायसी (शब्द०)। ४. मंगल अवसरों पर आटे, अबीर आदि से देवताओं के पूजन आदि के लिये चौखूँटे क्षेत्र आदि बनाना। चौक बनाना। जैसे, चौक पूरना। उ०—साजा पाट छत्र के छाँहाँ। रतन चौक पूरी तेहि माहाँ।—जायसी (शब्द०)। ५. बटना। जैसे, सेवई पूरना, तागा पूरना। ६. फूँकना। बजाना। उ०—(क) तेहिं वियोग सिंगी नित पूरी। बार बार किंगरी भई झूरी।—जायसी (शब्द०)।(ख) किंगरी गहे बजावै झूरी। भोर साँझ सिंगी नित पूरी।—जायसी (शब्द०)।

पूरना
क्रि० अ० पूर्ण होना। भर जाना। व्याप्त हो जाना। उ०—परगट गुपुत सकल महँ पूरि रहा सो नाउँ। जहँ देखों वह देखों दूसर नहिं कर जाउँ।—जायसी (शब्द०)।

पूरनानंद पु
संज्ञा पुं० [सं० पूर्णानन्द] दे० 'पूर्णानंद'। उ०— अक्षय अखंड एक रस परिपूरन है ताही तें परनानंद अनुभौ तै पायौ है।—सुंदर० ग्रं०, भा० २, पृ० ६२२।

पूरनिमा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० पूर्णिमा] पूर्णिमासी तिथि।

पूरब (१)
संज्ञा पुं० [सं० पूर्व] वह दिशा जिसमें सूर्य का उदय होता है। मध्याह्न से पहले सूर्य की ओर मुँह करने पर सामने पड़नेवाली दिशा। पश्चिम के विरुद्ध दिशा। पूर्व। प्राची।

पूरब पु † (२)
वि० दे० 'पूर्व'।

पूरब पु † (३)
क्रि० वि० दे० 'पूर्व'।

पूरबल पु †
संज्ञा पुं० [हिं० पूरबल] १. प्राचीन समय। पुराना जमाना। २. पूर्वजन्म। इस जन्म से पहलेवाला जन्म।

पूरबला पु
वि० पुं० [सं० पूर्व + हिं० ला (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० पूरबली] १. प्राचीन काल का। पुराना। २. पूर्व जन्म का। पहले जन्म का। उ०—(क) कछु करनी कछु करम गति कछु पूरबला लेख। देखो भाग कंबीर का दोसत किया अलेख।—कबीर (शब्द०)। (ख) भौरे भूली खसम को कबहु न किया विचार। सतगुर साहेब बताइया पूरबला भरतार।—कबीर (शब्द०)। (ग) मेरो सरूप नहीं यह व्याधि है पूरबली अँग के सँग जागै। का मैं कहौं घर बाहर होत ही लागत दीठी बिलंब न लागै।—रघुनाथ (शब्द०)।

पूरबवत पु
क्रि० वि० [हिं० सं० पूर्ववत्] दे० 'पूर्ववत्'। उ०— हम सब सो बहु बतसर लौं पूरबवत हो जो।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० ५६०।

पूरबिया †
संज्ञा पुं० [हिं० पूरब + इया (प्रत्य०)] दे० 'पूरबी'।

पूरबी (१)
वि० [हिं० पूरब + ई (प्रत्य०)] पूरब का। पूरब संबंधी। जैसे, पूरबी दादरा, पूरबी हिंदी, पूरबी चावल आदि।

पूरबी (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार का दादरा। दे० 'पूर्वी२'।

पूरबी (३)
संज्ञा पुं० पूरब के रहनेवाले लोग।

पूरबी (४)
संज्ञा स्त्री० पूर्वी नाम की रागनी। विशेष—दे० 'पूर्वी'।

पूरियितव्य
वि० [सं०] पूरा करने के योग्य। पूरणीय।

पूरयिता (१)
संज्ञा पुं० [सं० पूरायितृ] १. पूर्णकर्ता। पूरक। पूर्ण करनेवाला। २. विष्णु का एक नाम।

पूरयिता (२)
वि० १. पूर्ण करनेवाला। पूरक। २. संतुष्टिकर। संतोष देनेवाला [को०]।