सामग्री पर जाएँ

विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/से

विक्षनरी से

सेंजी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की घास जो पंजाब में चौपायों को खिलाई जाती है। यह कपास के साथ बोई जाती है।

सेंट
संज्ञा पुं० [अं० सेन्ट] १. सुगंधियुक्त द्रव्य। २. महक। गंध। खुशबू। उ०—वेणी सेंट से महकाई सी; जरा रेडियो को ऊँचा कर दीजो, दुलहन।—बंदनवार, पृ० ४४। ३. शत। सौ। ४. किसी बड़े सिक्के का सौवाँ भाग।

सेंटर
संज्ञा पुं० [अं० सेन्टर] १. गोलाई या वृत्त के बीच का बिंदु। केंद्र। मध्यबिंदु। २. प्रधान स्थान। जैसे,—परीक्षा का सेंटर।

सेंटेंस
संज्ञा पुं० [अं० सेन्टेन्स] वाक्य। उ०—अंग्रेजी का एक सेंटेंस भी ठीक से नहीं बोल सकते।—संन्यासी, पृ० १७५।

सेंट्रल
वि० [अं० सेन्ट्रल] जो केंद्र या मध्य में हो। केंद्रीय। प्रधान। मुख्य। जैसे,—सेंट्रल गवर्नमेंट, सेंट्रल कमेटी, सेंट्रल जेल।

सेंद्रिय
वि० [सं० सेन्द्रिय] [वि० स्त्री० सेन्द्रिया] १. इंद्रियसंपन्न। जिसमें इंद्रियाँ हों। सजोव। जैसे,—सेंद्रिय द्रव्य। उ०—सेंद्रिया मैं, अगुणता से नित्य उकता ही रही थी; सजन मैं आ ही रही थी।—क्वासि, पृ० ८५। २. पुरुषत्वयुक्त। जिसमें मरदानगी हो। पुंसत्वयुक्त।

सेंद्रियता
संज्ञा स्त्री० [सं० सेन्द्रिय + ता (प्रत्य०)] इंद्रियसंपन्न होने का भाव, स्थिति या क्रिया। सजीवता। साकारता। उ०—नभ विहारिणी, अलख प्राण, निज जन की सुधि करिए। हे अतींद्रिये सेंद्रियता से क्यों इतना डरिए।—अपलक, पृ० २२।

सेंसर
संज्ञा पुं० [अ० सेन्सर] वह सरकारी अफसर जिसे पुस्तक, पुस्तिकाएँ विशेषकर समाचारपत्र छपने या प्रकाशित होने, नाटक खेले जाने, फिल्म दिखाए जाने, या तार कहीं भेजे जाने के पूर्व देखने या जाँचने का अधिकार होता है। यह जाँच इसलियेहोती है कि कहीं उनमें कोई आपत्तिजनक या भड़कानेवाली बात तो नहीं है। विशेष—बायस्कोप के फिल्मों या नाटकों की जाँच और काट छाँट करने के लिये तो सेंसर बराबर रहता है, पर समाचारपत्रों और तारघरों में उसी समय सेंसर बैठाए जाते हैं जब देश में विद्रोह या किसी प्रकार की उत्तेजना फैली होती है अथवा किसी देश से युद्ध छिड़ा होता है। सेंसर ऐसी बातों को प्रकाशित नहीं होने देता जिनसे देश में और भी उत्तेजना फैल सकती हो अथवा शत्रु या विरोधी को किसी प्रकार का लाभ पहुँचता हो। यौ०—सेंसर बोर्ड = सेंसर करनेवाले अनेक अधिकारियों का समूह या समिति।

सेंसस
संज्ञा पुं० [अं० सेन्सस] दे० 'मर्दुमशुमारी'।

सेँ पु
अव्य० [सं० स्वयम्, प्रा० सयं, सइँ = से] स्वयं। खुद। उ०—सें बुझ्झै सुरतान दूत पच्छिम सुबिहानं।—पृ०, रा०, १०।८।

सेँक (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सेंकना] १. आँच के पास या दहकते अंगारे पर रखकर भूनने की क्रिया। २. आँच के द्वारा गरमी पहुँचाने की क्रिया। जैसे,—दर्द में सेँक से बहुत लाभ होगा। क्रि० प्र०—करना।—देना।—होना। यौ०—सेँकसाँक।

सेँक (२)
संज्ञा स्त्री० लोहे की कमाची जिसका व्यवहार छीपी कपड़े छापने में करते हैं।

सेँकना
क्रि० स० [सं० श्रेषण (= जलाना, तपाना)] १. आँच के पास या आग पर रखकर भूनना। जैसे,—रोटी सेँकना। २. आँच के द्वारा गरमी पहुँचाना। आँच दिखाना। आग के पास ले जाकर गरम करना। जैसे,—हाथ पैर सेँकना। संयो० क्रि०—डालना।—देना।—लेना। मुहा०—आँख सेँकना = सुंदर रूप देखना। नजारा करना। धूप सेँकना = धूप में रहकर शरीर में गरमी पहुँचाना। धूप खाना।

सेँकी †
संज्ञा स्त्री० [फा़० सीनी, हिं० सीनिकी, सनहकी] तश्तरी। रकाबी।

सेँगर (१)
संज्ञा पुं० [सं० श्रृङ्गार] १. एक पौधा जिसकी फलियों की तरकारी बनती है। २. इस पौधे की फली। ३. बबूल की फली या छीमी। विशेष—ओषधिकार्य में भी इसका प्रयोग विहित है। अधिकतर यह भैंस, बकरी, ऊँट आदि को खाने को दी जाती है। ४. एक प्रकार का अगहनी धान जिसका चावल बहुत दिनों तक रहता है।

सेँगर (२)
संज्ञा पुं० [सं० श्रृङ्गीवर] क्षत्रियों की एक जाति या शाखा। उ०—कूरम, राठौर, गौड़, हाड़ा, चहुवान, मौर, तोमर, चँदेल, जादौ जंग जितवार हैं। पौरच, पुँडीर, परिहार और पँवार बैस, सेँगर, सिसोदिया, सुलंकी दितवार हैं।—सूदन (शब्द०)। (ख) सेँगर सपूती सों भरे। जे सुद्ध जुद्धन में लरे।—पद्माकर ग्रं०, पृ० ८।

सेँगरा †
संज्ञा पुं० [देश०] पोख्ते बाँस का वह डंडा जिसमें लटकाकर भारी पत्थर या धरन एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते हैं।

सेँटा †
संज्ञा स्त्री० [सं० स्रोत] धार। स्रोत। उ०—कुछ इधर उधर से अकस्मात्, जल की सेँटों के भी फुहार। हे खनक किए जा कूपखनन तू यहाँ बीच में ही न हार।—दैनिकी, पृ० ३१। २. गाय की छीमी से निकली हुई दूध की धार।

सेँठा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] १. मूँज या सरकंडे के सींके का निचला मोटा मजबूत हिस्सा जो मोढ़े आदि बनाने के काम में आता है। कन्ना। २. एक प्रकार की घास जो छप्पर छाने के काम में आती है। ३. जुलाहों की वह पोली लकड़ी जिसमें ऊरी फँसाई जाती है। डौंड़।

सेँठा (२)
वि० [सं० सुष्ठु या स्व + इष्ट] [स्त्री० सेंठी] १. दृढ़तापूर्वक। ठीक। मजबूत। श्रेष्ठ। उ०—सब सुख छाँड़ भज्यो इक साँई राम नाम लिव लागी। सूरवीर सेँठा पग रोप्या जरा मरण भव भागी।—राम० धर्म०, पृ० ४५। (ख) परगहग ले बाँधी पगाँ, सेँठी गूधर साथ। हंजारो सारो हुकम, हुओ रँगीली हाथ।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० ११। २. इच्छित। इष्ट। अभि- लषित। उ०—खोजी खोज पकड़िया सेँठा। सब संता माहीं मिलि बेठा।—राम० धर्म०, पृ० २०८।

सेँड़, सेँढ़
संज्ञा पुं० [सं० सेत्र(= बंधन, निगड) अथवा देश०] एक प्रकार का खनिज पदार्थ जिसका व्यवहार सुनार करते हैं। उ०—राज्य के विभिन्न भागों में कोयला, मैंगनीज, सिलिका, सेँड़ आदि अनेक खनिज पदार्थ विपुल मात्रा में पाए जाते हैं।— शुक्ल अभि० ग्रं०, पृ० १९।

सेँत
संज्ञा स्त्री० [सं० संहति (= किफायत; समूह, राशि) या देश०] १. कुछ व्यय का न होना। पास का कुछ न लगना। कुछ खर्च न होना। २. पु †समूह। राशि। ढेर। उ०—अपनो गाँव लेहु नँदरानी। बड़े बाप की बेटी तातें पूतहि भले पढ़ावति बानी। सुनु मैया याके गुन मोसों, इन मोंहि लियो बुलाई। दधि में परी सेँति की चींटी, मोतै सबै कढाई।—सूर (शब्द०)। मुहा०—सेंत का = (१) जिसमें कुछ दाम न लगा हो। जो बिना मूल्य दिए मिले। जिसके मिलने में कुछ खर्च न हो। मुफ्त का। जैसे—(क) सेँत का सौदा नहीं है। (ख) सेँत की चीज की कोई परवाह नहीं करता। २. बहुत सा। ढेर का ढेर। बहुत ज्यादा। उ०—चलहु जु मिलि उनही पै जैए, जिन्ह तुम टोकन पंथ पठाए। सखा संग लीने जु सेँति की फिरत रैनि दिन बन में पाए। नाहिंन राज कंस को जान्यौ बाट रोकते फिरत पराये।—सूर (शब्द०)। विशेष—यह मुहावरा पूरबी अवधी का है और बस्ती, गोंड़ा, फैजाबाद आदि जिलों में बोला जाता है। सेँत में = (१) बिना कुछ दाम दिए। बिना कुछ खर्च किए। बिना मूल्य के। मुफ्त में। जैसे—यह घड़ी मुझे सेँत में मिल गई। (२) व्यर्थ। निष्प्रयोजन। फजूल। जैसे—क्यों सेँत में झगड़ा लेते हो।

सेँतना पु
क्रि० स० [हिं० सेँचना] दे० 'सैँतना'।

सेँतमेँत
क्रि० वि० [हिं० सेत + मेँत (अनु०) १. विना दाम दिए। मुफ्त में। फोकट में। सेंत में। उ०—(क) कलकी और मलीन बहुत मैं सेंतैमेंत बिकाऊँ।—सूर (शब्द०)। (ख) नाम रतन धन मुज्झ में, खान खुली घट माहिं। सेँतमेँ त ही देत हौं, गाहक कोई नाहिं।—संतबानी०, पृ० ५। (ग) सेँतमेँत के यश का भागी प्रिये, तुम्हारा है भर्ता।—साकेत, पृ० ३७६। २ बृथा। फजूल। निष्प्रयोजन। बेमतलब। जैसे—क्यों से सेँतमेँत झगड़ा मोल लेते हो ?

सेँति, सेंती (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सेंत] दे० 'सेंत'। उ० साईं सेँति न पाइए, बातन मिलै न कोय। कबीर सोदा नाम का, सिर बिन कबहुँ न होय। (ख) एक तुम्हैं प्रभु चाहौ राज। भूपति रंक सेंति नहिं पूँछौ चरन तुम्हार सवाँरयौ काज।—मलूक०, पृ० ६।

सेँति, सेँती (२)
प्रत्य० [प्रा० सुंतो, पंचमी विभक्ति] पुरानी हिंदी की करण और अपादान की विभक्ति। से। उ०—(क) तोहि पीर जो प्रेम की पाका सेँती खेल।—कबीर (शब्द०)। (ख) हिंदू व्रत एकादसि साधै दूध सिंघाड़ा सेँती। कबीर (शब्द०)। (ग) राजा सेँति कुँवर सब कहहीं। अस अस मच्छ समुद मँह अहहीं।—जायसी (शब्द०) । (घ) संजीवन तब कचहिं पढ़ाई। ता सेँती यों कह्यो समुझाई।—सूर (शब्द०)।

सेँथा †
संज्ञा पुं० [हिं० सेंठा] दे० 'सेंठा'।

सेँथी †
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्ति] बरछी। भाला। शक्ति शर्वला। उ०—इंद्रजीत लीनी जब सेँथी देवन हहा करयो। छूटी बिज्जु राशि वह मानो भूतल बंधु परयो।—सूर (शब्द०)।

सेँद ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० सेंध] दे० 'सेँध'।

सेँदुर पु् ‡
संज्ञा पुं० [सं० सिंदूर] ईगुर की बुकनी। सिंदूर। उ०— (क) माँग मैं सेँदुर सोहि रह्यो गिरधारन है उपमा न तिहूँ पुर। मानो मनोज की लागी कृपान, परयो कटि बीच ते राहु बहादुर।—सुंदरीसर्वस्व (शब्द०)। (ख) बिन सेँदुर जानउँ मैं दिआ। उँजियर पंथ रइनि मँह किआ।—जायसी (शब्द०)। विशेष—सौभाग्यवती हिंदू स्त्रियों इसे माँग में भरती हैं। यह सौभाग्य का चिह्न माना जाता है। विवाह के समय में वर कन्या की माँग में सिंदूर डालता है और उसी घड़ी से वह उसकी स्त्री हो जाती है। क्रि० प्र०—पहनना।—देना।—भरना।—लगाना। मुहा०—सेंदुर चढ़ना = स्त्री का विवाह होना। सेँदुर देना = विवाह के समय पति का पत्नी की माँग भरना। उ०—राम सीय सिर सेँदुर दिहीं। सोभा कहि न जाय विधि केहीं।—तुलसी (शब्द०)।

सेँदुरदानी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सेंदुर + फा़० दानी] सिंदूर रखने की डिबिया। सिंदूरा।

सेँदुरबहोरा †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सेंदुर + बहोरना (= पलटना या ठीक करना)] विवाह के अवसर पर वर द्वारा कन्या के शीश पर सिंदूर दान के बाद कन्या की कोई भी बड़ी बहन या किसी सौभाग्यवती स्त्री द्वारा सिंदूर को एक ढंग से सज्जित करने की क्रिया।

सेँदुरा (१)
वि० [हिं० सेंदुर] [वि० स्त्री० सेंदुरी] सिंदूर के रंग का। लाल। जैसे,—सेँदुरी गाय। सेँदुरा आम।

सेँदुरा (२)
संज्ञा पुं० [हिं० सिंदूर, सिंधोरा] सिंदूर रखने का डिब्बा सिंदूरा।

सेँदूरिया (१)
संज्ञा पुं० [सं० सिन्दूरिका, सिन्दूरी] एक सदाबहार पौधा जिसमें सिंदूर के रंग के लाल फूल लगते हैं। विशेष—इसके पत्ते ६-७ अंगुल लंबे और ४-५ अंगुल चौड़े, नुकीले और अरवी के पत्ते से मिलते जुलते हैं। फूल दो ढाई अंगुल के घेरे में पाँच दलों के और सिंदूर के रंग के लाल होते हैं। इस पौधे की गुलाबी, बैंगनी और सफेद फूलवाली जातियाँ भी होती हैं। गरमी के दिनों में यह फूलता है और बरसात के अंत में इसमें फल लगने लगते हैं। फल लंबोतरे, गोल, ललाई लिए भूरे तथा कोमल महीन महीन काँटों से युक्त होते हैं। गूदे का रंग लाल होता है। गूदों के भीतर जो बीज होते हैं, उन्हें पानी में डालने से पानी लाल हो जाता है। बहुत स्थानों पर रंग के लिये ही इस पौधे की खेती होती है। शोभा के लिये यह बगीचों में भी लगाया जाता हैं। आयुर्वेद में यह कड़वा, चरपरा, कसैला, हलका, शीतल तथा विषदोष, वातपित्त, वमन, माथे की पीड़ा, आदि को दूर करनेवाला माना गया है। पर्या०—सिंदूरपुष्पी। सिंदूर। तृणपुष्पी। रक्तबीजा। रक्तपुष्पी। वीरपुष्पा। करच्छदा। शोणपुष्पी।

सेँदुरिया (२)
वि० सिंदूर के रंग का। खूब लाल। यौ०—सेँदुरिया आम = वह आम का फल जिसका छिलका लाल सिंदूर के रंग का हो।

सेँदुरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सेंदुर + ई (प्रत्य०)] सिंदूर के रंग की लाल गाय। उ०—कजरी धुमरी सेँदुरी धौरी मेरी गैया। दुहि ल्याऊँ मैं तुरत ही तू करि दै छैया।—सूर (शब्द०)।

सेँध (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० सान्धि] चोरी करने के लिये दीवार में किया हुआ बड़ा छेद जिसमें से होकर चोर किसी कमरे या कोठरी में घुसता है। संधि। सुरंग। सेन। नकब। विशेष—संस्कृत के नाटक 'मृच्छकटिक' में इसके अनेक प्रकार वर्णित हैं। क्रि० प्र०—देना।—मारना।—लगना।

सेँध (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. गोरखककड़ी। फूट। मृगेर्वारु। २. पेंहँटा। कचरी।

सेँधना (१)
क्रि० स० [हिं० सेंध + ना (प्रत्य०)] सेंध या सुरंग लगाना।

सेँधना (२)
क्रि० स० [सं० सन्धान] संबंधित करना। स्थापित करना। संधान करना। उ०—पंज सों पंज सनेह मिल कर सेँधिय दारि सुधारि सुधं भिर।—पृ० रा०, १२।३६६।

सेँधा (१)
संज्ञा पुं० [सं० सैन्धव] एक प्रकार का नमक जो खान से निकलता है। सैंधव। लाहौरी नमक।विशेष—इसकी खानें खेवड़ा, शाहपुर, कालानाग और कोहाट में हैं। यह सब नमकों में श्रेष्ठ है। वैद्यक में यह स्बादु, दीपक, पाचक, हल्का स्निग्ध, रुचिकारक, शीतल, वीर्यवर्धक, सूक्ष्म, नेत्रों के लिये हितकारी तथा त्रिदोषनाशक माना गया है। इसे 'लाहौरी नमक' भी कहते हैं।

सेँधा (२)
वि० [सं० सन्ध] १. संधान या संबंधवाला। जानकार। उ०—(क) दे नँह सेँधा नूँ दगो, ग्रहे कुतो ही ज्ञान।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० ६८। २. मुलाकाती। मिलनेवाला। (ख) देवे सेँधा नू दगो साह करे सनमान।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० ६८।

सेंधानी
संज्ञा स्त्री० [सं० सज्जन, सज्ञान या सन्धान] दे० 'सहिदानी'। उ०—यह श्रीनाथ जी ने वा पटेल को हार की सेँधानी दीनी।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० २२१।

सेँधि पु
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'सेंध'। उ०—चोर पैठि जस सेँधि सवारी। जुआ पैंत जेउँ लाख जुआरी।—जायसी ग्रं० (गुप्ता०), पृ० २६५। २. सेँधा नमक।

सेँधिया
वि० [हिं० सेंध] सेंध लगानेवाला। दीवार में छेद करके चोरी करनेवाला। जैसे—सेँधिया चोर।

सेँधिया (२)
संज्ञा पुं० [सं० सेटु] १. ककड़ी की जाति की एक बेल जिसमें तीन चार अंगुल के छोटे छोटे फल लगते हैं। कचरी। सेंध। पेहँटा। २. एक प्रकार की ककड़ी। फूट। विशेष—यह खेतों में प्रायः आपसे आप उपजता है। ३. एक प्रकार का विष।

सेँधिया (३)
संज्ञा पुं० [मरा० शिंदे] ग्वालियर का प्रसिद्ध मराठा राज- वंश जिसके संस्थापक रणजी शिंदे थे।

सेँधी (१)
संज्ञा स्त्री० [सिंध (देश, जहाँ खजूर बहुत होता है; मरा० शिंदी] १. खजूर। २. खजूर की शराब। मीठी शराब।

सेँधी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० सेटु] १. खेत की ककड़ी। फूट। २. कचरी। पेहँटा।

सेँधु
संज्ञा पुं० [सं० सिन्धु] समुद्र। सिंधु। उ०—साधु के महिमा कहि नहि जाई। जैसे सेँधु जल थाह न पाई।—संत० दरिया, पृ० १२।

सेँधुर पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० सिन्धु, हिं० सेंधु + र (प्रत्य०)] दे० 'समुद्र'। उ०—एह भव सेँ धुर कत सभ खाई। भँवर तरंग धार कठिनाई।—संत० दरिया, पृ० २०।

सेँधुर पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० सिन्धुर] दे० सिंधुर।

सेँधुर ‡ (३)
संज्ञा पुं० [सं० सिन्दूर] दे० 'सेंदुर'।

सेँबल पु
संज्ञा पुं० [सं० शाल्मली, हिं० सेँवर] दे० सेमल। उ०—यहु संसार सेँबल कै सुख ज्यूँ तापर तूँ जिनि फूलै।—संतबानी०, भा० २, पृ० ९२।

सेँभा
संज्ञा पुं० [देश०] घोड़ों का एक वात रोग।

सेँभु
संज्ञा पुं० [सं० स्वयम्भू] दे० 'स्वयंभू'। उ०—बर सिरदार बिभार सेँभु चहुआन नाह वर।—पृ० रा० २५-३०७।

सेँमरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० सेँवई] दे० 'सेँवई'। उ०—घर घर ढूढ़ें अम्मा मेरी सेँमरी जी, राजा आयौ तीजँन कौ त्यौहार।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ९४४।

सेँमुष
वि० [सं० सम्मुख] अनुकूल। अभिमुख। उपयुक्त। उ०— सेँमुष धनि धनि उच्चरै भल छोरयो चहुआन।—पृ० रा०, ६६।४०९।

सेँलोटना
क्रि० अ० [सं० सं + लुठन] धराशायी होना। ढहना। लोट जाना। उ०—गढन कोट सेँलोट धममि, धम धम्म अरिनि पुर।—पृ० रा०, १।७१६।

सेँवई
संज्ञा स्त्री० [सं० सेविका] मैदे के सुखाए हुए सूत के लच्छे जो घी में तलकर और दूध में पकाकर खाए जाते हैं। मुहा०—सेँवई पूरना या बटना = गुँधे हुए मैदे को हथेलियों से से रगड़ रगड़कर सूत के आकार में बढ़ाते जाना।

सेँवर पु
संज्ञा पुं० [हिं० सेंवल] दे० 'सेमल'। उ०—(क) बार बार निशि दिन अति आतुर फिरत दशो दिशि धाए। ज्यों शुक सेँवर फूल बिलोकत जात नहीं बिन खाए।—सूर (शब्द०)। (ख) राजै कहा सत्य कहु सूआ। बिनु सत जस सेँवर कर भूआ।—जायसी (शब्द०)।

सेँह †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सेंध] दे० 'सेँध'।

सेँहा (१)
संज्ञा पुं० [हिं० सेंध] कूआँ खोदनेवाला। कुइहाँ।

सेँहा (२)
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'सेँधि'।

सेँही
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'सेँध'।

सेँहुआ
संज्ञा पुं० [हिं० सेहुआँ] दे० 'सेहुआँ'।

सेँहु़ड़
संज्ञा पुं० [सं० सेहुण्ड] थूहर। वि० दे० 'थूहर'। उ०—छतै नेह कागद हिये भई लखाइ न टाँक। बिरह तचे उघरचो सु अब सेँहुड़ को सो आँक।—बिहारी (शब्द०)।

से (१)
प्रत्य० [प्रा० सुंतो, पु० हिं० सेंति] करण और अपादान कारक का चिह्न। तृतीया और पंचमी की विभक्ति। जैसे—(क) मैंने अपनी आँखों से देखा। (ख) पेड़ से फल गिरा। (ग) वह तुमसे बढ़ जायगा।

से (२)
वि० [हिं० 'सा' का बहुवचन] समान। सदृश। सम। जैसे,— इसमें अनार से फल लगते हैं। उ०—नासिका सरोज गंधवाह से सुगंधवाह, दारयो से दसन, कैसे बीजुरो सो हास है।— केशव (शब्द०)।

से पु (३)
सर्व० [हिं० 'सो' का बहुवचन] वे। उ०—अवलोकिहौं सोच विमोचन को ठगि सी रही, जो न ठगे धिक से।—तुलसी (शब्द०)।

से (४)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सेवा। खिदमत। चाकरी। २. कामदेव की पत्नी का नाम।

से ‡ (५)
वि० [फा़० सेह] तीन। उ०—उन्हें से चहार दिन हो जजबे बहोश। आपस के जात कूँकर कर फरामोश।—दक्खिनी०, पृ० १९६।

सेई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सेर] अनाज नापने का काठ का एक गहरा बरतन।

सेउ पु †
संज्ञा पुं० [हिं० सेव] दे० 'सेब'। उ०—किसिमिसि सेउ फरे नउ पाता। दारिउँ दाख देखि मन राता।—जायसी (शब्द०)।

सेकंड (१)
संज्ञा पुं० [अं० सेकन्ड] एक मिनट का ६० वाँ भाग।

सेकंड (२)
वि० दूसरा। जैसे,—सेकंड पार्ट। सेकंड हैंड।

सेक
संज्ञा पुं० [सं०] १. जलसिंचन। सिंचाव। २. जलप्रक्षेप। सेचन। छिड़काव। छींटा। मार्जन। तर करना। उ०— और जु अनुसयना कही, तिनके बिमल बिबेक। बरनत कवि मतिराम यह रस सिंगार को सेक।—मतिराम ग्रं०, पृ० २८६। ३. अभिषेक। उ०—बोली ना नवेली कछू बोल सतराय वह, मनसिज ओज को सुहानौं कछु सेक है।—मतिराम ग्रं०, पृ० ३३७। ४. तैल सेचन या मर्दन। तेल लगाना या मलना। (वैद्यक)। ५. एक प्राचीन जाति का नाम। ६. (वीर्य का) पतन या स्त्राव (को०)। ७. स्नान करने का फुहारा (को०)। ८. किसी भी द्रव पदार्थ की बूँद (को०)।

सेकट्टर ‡
संज्ञा पुं० [अं० सेक्रेटरी] दे० 'सेक्रटरी'। उ०—सेकट्टर साहब बोलटा है।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ४५५।

सेकड़ा
संज्ञा पुं० [देश०] वह चाबुक या छड़ी जिससे हलवाहे बल हाँकते हैं। पैना।

सेकतव्य पु
वि० [सं० सेक्तव्य] १. सींचने योग्य। २. जिसे सींचना या तर करना हो।

सेकपात्र
संज्ञा पुं० [सं०] सींचने का बरतन। डोल। डोलची।

सेकभाजन
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सेकपात्र'।

सेकमिश्रान्न
संज्ञा पुं० [सं०] वह खाद्य पदार्थ जिसमें दही पड़ा हो।

सेकिम (१)
वि० [सं०] १. सींचा हुआ। तर किया हुआ। २. ढाला हुआ (लोहा)।

सेकिम (२)
संज्ञा पुं० [सं०] मूली। मूलक। गाजर।

सेकुवा
संज्ञा पुं० [देश०] काठ के दस्ते का लंबा करछा या डौवा जिससे हलवाई दूध औटाते हैं।

सेकूरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] धान। (सुनार)।

सेक्तव्य
वि० [सं०] १. सींचने योग्य। २. जिसे सींचना या तर करना हो।

सेक्ता (१)
वि० [सं० सेक्तृ] [वि० स्त्री० सेक्त्री] १. सींचनेवाला। २. बर- दानेवाला। जो गाय, घोड़ी आदि को बरदाता है। ३. जल लानेवाला (को०)।

सेक्ता (२)
संज्ञा पुं० १. पति। शौहर। २. जलवाहक व्यक्ति (को०)। ३. वह जो सेक करता हो (को०)।

सेक्त्र
संज्ञा पुं० [सं०] सींचने का बरतन। जल उलीचने का बरतन। डोल। डोलची।

सेक्रेटरी
संज्ञा पुं० [अं०] १. वह उच्च कर्मचारी या अफसर जिसके अधीन सरकार या शासन का कोई विभाग हो। मंत्री। सचिव। जैसे,—फारेन सेक्रेटरी। स्टेट सेक्रेटरी। २. वह पदा- धिकारी जिसपर किसी संस्था के कार्यसंपादन का भर हो। जैसे,—कांग्रेस सेक्रेटरी। ३. वह व्यक्ति जो दूसरे की ओर से उसके आदेशानुसार पत्रव्यवहार आदि करे। मुंशी। जैसे,— महाराज के सेक्रेटरी।

सेक्रेटेरियट
संज्ञा पुं० [अं०] किसी सरकार के सेक्रेटरियों का कार्यालय या दफ्तर। शासक या गवर्नर का दफ्तर। उ०—तरक्की करते करते सेक्रेटेरियट की अँगनई में दाखिल हो बैठे थे।—नई०, पृ० ८।

सेक्शन
संज्ञा पुं० [अं०] विभाग। जैसे,—इस दर्जे में दो सेक्शन हैं।

सेख पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० शेष] १. शेषनाग। विशेष दे० 'शेष'—८। उ०—महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेख।— तुलसी (शब्द०)। २. समाप्ति। अंत। खातमा। उ०—पियत बात तन सेख कियो द्विज रात बिहरि बन। मिटै वासना नाहिं बिना हरिपद रज के तन।—सुधाकर (शब्द०)।

सेख (२)
संज्ञा पुं० [अं० शैख] दे० 'शेख'। उ०—इनमें इते बलवान हैं। उत सेख मुगल पठान हैं।—सूदन (शब्द०)।

सेखर पु
संज्ञा पुं० [सं० शेखर] दे० 'शेखर'। उ०—मोर मुकुट की चंद्रिकन यौं राजत नँदनंद। मनु ससिसेखर को अकस किय सेखर सतचंद।—बिहारी (शब्द०)।

सेखवा †
संज्ञा पुं० [अ० शैख, हिं० सेख + वा (प्रत्य०)] दे० 'शेख'। उ०—ना हुवाँ ब्राह्मन सूद्र न सेखवा।—कबीर श०, पृ० ४७।

सेखावत
संज्ञा पुं० [फा़० शैख + हिं० सेख + आवत (प्रत्य०); अथवा 'शेखावाटी' नाम का एक स्थान] राजपूतों की एक जाति या शाखा। शेखावत। विशेष—इनका स्थान राजपूताने का शेखावाटी नाम का कसबा है। राजस्थान में स्थान, जाति, वंश और विशिष्ट व्यक्ति आदि के आगे यह संबंधवाचक प्रत्यय लगाते हैं। जैसे,—ऊदावत, कूपावत आदि।

सेखी ‡
संज्ञा स्त्री० [फा़० शेखी] दे० 'शेखी'।

सेगव
संज्ञा पुं० [सं०] केकड़े का बच्चा।

सेगा
संज्ञा पुं० [अ० सीगह्] १. विभाग। महकमा। २. विषय। पढ़ाई या विद्या का कोई क्षेत्र। जैसे,—वह इम्तहान में दो सेगो में फेल हो गया।

सेगुन †
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'सागोन'।

सेगौन; सेगौन
संज्ञा पुं० [देश०] मटमैले रंग की लाल मिट्टी जो नालों के पास पाई जाती है।

सेच
संज्ञा पुं० [सं०] सेक। सिंचाई। छिड़काव [को०]।

सेचक (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सेचिका] सींचनेवाला। छिड़कनेवाला। तर करनेवाला।

सेचक (२)
संज्ञा पुं० मेघ। बादल।

सेचन
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० सेचनीय, सेचित, सेच्य] १. जलसिंचन। सिंचाई। २. मार्जन। छिड़काव। छींटे देना। ३. अभिषेक।४. ढलाई (धातु की)। ५. (नाव से) जल उलीचने का बरतन। लोहँदी। ६. दे० 'सेक' (को०)।

सेचनक
संज्ञा पुं० [सं०] १. अभिषेक। २. स्नान का फुहारा [को०]।

सेचनघ्रट
संज्ञा पुं० [सं०] वह बरतन जिससे जल सींचा जाता है।

सेचनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सींचने की छोटी बालटी [को०]।

सेचनीय
वि० [सं०] सींचने योग्य। छिड़कने योग्य।

सेचिका
वि० स्त्री० [सं०] दे० 'सेचक'।

सेचित
वि० [सं०] १. जो सींचा गया हो। तर किया हुआ। २. जिसपर छींटे दिए गए हों।

सेच्य
वि० [सं०] १. सींचने योग्य। जल छिड़कने योग्य। २. जिसे सींचना हो। जिसे तर करना हो।

सेछागुन
संज्ञा पुं० [?] एक प्रकार का पक्षी।

सेज
संज्ञा [सं० शय्या, प्रा० सज्जा, सिज्जा, सेज्ज, सेज्जा] शैया। पलंग और बिछौना। उ०—(क) सेज रुचिर रुचि राम उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए।—तुलसी (शब्द०)। (ख) चाँदनी महल फैल्यो चाँदनी फरस सेज, चाँदनी बिछाय छबि चाँदनी रितै रही।—प्रतापसाहि (शब्द०)।

सेजदह
वि० [फा़० सेजदह] त्रयोदश। तेरह [को०]।

सेजदहुम
वि० [फा़० सेज्रदहुम] तेरहवाँ [को०]।

सेजपाल
संज्ञा पुं० [सं० शय्यापाल, हिं० सेज + पाल] राजा की शैया या सेज पर पहरा देनेवाला। शयनगृह पर पहरा देनेवाला। शयनागार का रक्षक। शेयापाल। उ०—राजा उस समय शैया पर पौढ़े थे और सेजपाल लोग अस्त्र बाँधे पहरा दे रहे थे।— गदाधरसिंह (शब्द०)।

सेजबंद पु
वि० [हिं० सेज + फा़० बंद] दे० 'सेजबंध'। उ०—खासा पलँग सेजबंद तकिया, तोसक फूल बिछाया।—कबीर० श०, भा०, पृ० २३।

सेजबंध पु
संज्ञा पुं० [हिं० सेज + बंध] वह रस्सी जिससे बिछौने की चादर को पायों से बाँधते हैं। उ०—सेजबंध बाँधि कै पान को चाभते।—पलटू०, भा० २, पृ० ११।

सेजरिया पु ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० सेज] दे० 'सेज'। उ०—रस रँग पगी है देखो लाल की सेजरिया।—कबीर (शब्द०)।

सेजरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० सेज + री (प्रत्य०)] शय्या। दे० 'सेज'।

सेजवार †
संज्ञा पुं० [सं० शय्यापाल, हिं० सेजपाल] दे० 'सेजपाल'।—धर्ण०, पृ० ९।

सेजा (१)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पेड़ जो आसाम और बंगाल में होता है और जिस्पर टसर के कीड़े पाले जाते हैं।

सेजा (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० शय्या] दे० 'शय्या'। उ०—कुसुमे रचित सेजा दीप रहल तेजा, परिमल अगर चाँदने।—विद्यापति, पृ० २५२।

सेजा † (३)
संज्ञा पुं० [सं० सह्य, प्रा० सेज्झ, सेझ (= सह्याद्रि पर्वत)] १. पर्वत। अद्रि। पहाड़। २. सोता। प्रवाह। झरना। उ०— बाँसुरी समान मेरी पाँसुरी हरेक डोलै, उठत असाध पीर मनो घाव नेजा ज्यों। हाय नटनागर जू आह तौ कढै है नीठि, लोयन बहै हैं दोऊ भरे जल सेजा ज्यों।—नट० वि०, पृ० ७७।

सेजिया ‡
संज्ञा स्त्री० [हिं० सेज + इया] दे० 'सेज'।

सेज्या पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शय्या] दे० 'शय्या'। उ०—सूर श्याम सुख जानि मुदित मन सेज्या पर सँग लै पौढ़ावति।—सूर (शब्द०)।

सेझ पु ‡
संज्ञा स्त्री० [सं० शय्या, हिं० सेज, राज० सेझ] शय्या। सेज। उ०—सुरति शब्द मिल एक एकठा ता बिच रही न काण। जन हरिया सुन सेझ का सहजाँई सुख माण।—राम० धर्म०, पृ०, ६३।

सेझड़ी †
संज्ञा स्त्री० [सं० शय्या, प्रा० सेज्ज, राज० सेझ + ड़ी (प्रत्य०)] शय्या। सेजरी। सेज। उ०—मुख नीसाँसाँ मूँकती, नयणे नीर प्रवाह। सूली सिरखी सेझड़ी तो विण जाणो नाह।—ढोला०, दू० १६६।

सेझदादि पु
संज्ञा पुं० [सं० सह्याद्रि] दे० 'सह्याद्रि'। उ०—सेझदादि तै गिरि बहु रहईं। गंगादिक सरिता बहुबहईं।—रघुनाथ- दास (शब्द०)।

सेझना
क्रि० अ० [सं० √ सिध्, सेधन (= दूर करना, हटाना)] दूर होना। हटना। उ०—सो दारू किस काम की जाने दरद न जाइ। दादू काटइ रोग को सो दारू ले लाइ। अनुभव काटइ रोग को अनहद उपजइ आइ। सेझे काजर निर्मला पीवइ रुचि लव लाइ।—दादू (शब्द०)।

सेझा
संज्ञा पुं० [सं० √ सिध्, सेधन, प्रा० सेझण] प्रवाह। झरना। दे० 'सेजा' (३)। उ०—जहँ तन मन का मूल है, उपजै ओंकार। अनहद सेझा सबद का, आतम करै बिचार।—दादू० बानी, पृ० ८९।

सेत्रोंफ †
संज्ञा पुं० [देश० तुल० सं० शतपुष्पी] दे० 'सौंफ'।—वर्ण०, पृ० २।

सेट (१)
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन तौल या मान।

सेट (२)
संज्ञा सं० [देश०] काँख, नाक, उपस्थ आदि के बाल या रोएँ।

सेट (३)
संज्ञा पुं० [अं०] एक ही प्रकार मेल की कई चोजों का समूह। जैसे,—किताबों का सेट, खाने के बरतनों का सेट।

सेटना पु
क्रि० अ० [सं० श्रुत (= विश्वास करना)] १. समझना। मानना। उ०—जो कलिकाल भूजँगभय मेटत। शरणागत भवरुज लघु सेटत।—रघुराज (शब्द०) २. कुछ समझना। महत्व स्वीकार करना। जैसे—अपने आगे वह किसी को नहीं सेटता।

सेटिल
वि० [अं० सेटिल्ड] जो निपट गया हो। जो तै हो गया हो। जैसे,—उन दोनों का मामला आपस में सेटिल हो गया।

सेटिलमेंट
संज्ञा पुं० [अं० सेटिलमेन्ट] १. खेती के लिये भूमि को नापकर उसका राजकर निर्धारित करते का काम। जमीन नापकर उसका लगान नियत करने का काम। बंदोबस्त। २. एक देश के लोगों की दूसरे देश में बसी हुई बस्ती। उपनिवेश।

सेटु
संज्ञा पुं० [सं०] १. खेत की ककड़ी। फूट। २. कचरी। पेहँटा।

सेठ
संज्ञा पुं० [सं० श्रष्ठि, प्रा० सिट्ठि] [सेट्ठि, स्त्री० सेठानी] १. बड़ा साहूकार। महाजन। कोठीवाल। २. बड़ा या थोक व्यापारी। ३. धनी मनुष्य। मालदार आदमी। लखपती। ४. धनी और प्रतिष्ठित वणिकों की उपाधि। ५. खत्रियों की एक जाति। ६. दलाल। (डिं०)। ७. सुनार।

सेठन
संज्ञा पुं० [देश०] झाड़ू। बुहारी।

सेठा
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'सेँठा'।

सेठिया
संज्ञा पुं० [सं० श्रेष्ठिक, प्रा० सेट्ठिय, गुज० सेठिया] दे० 'सेठ'।

सेड़ा †
संज्ञा पुं० [देश०] भादों में होनेवाला एक प्रकार का धान।

सेड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० चेटी, प्रा० चेडि, हिं० चेरी अथवा सं० सखि, प्रा० सहि + हिं० ली (प्रत्य०), हि० सहेली] सहेली। सखी। (डिं०)।

सेढ़
संज्ञा पुं० [अं० सेल] बादबान। पाल। (लश०)। मुहा०—सेढ़ करना = पाल उड़ाना। जहाज खोलना। सेढ़ खोलना = पाल उतारना। सेढ़ बजाना = पाल में से हवा निका- लना जिसमें वह लपेटा जा सके। सेढ़ सपटाना = रस्से को खींचकर पाल तानना। (लश०)।

सेढ़खाना
संज्ञा पुं० [अं० सेल + फा़० खाना] १. जहाज में वह कमरा या कोठरी जिसमें पाल भरे रहते हैं। २. वह कमरा या कोठरी जहाँ पाल काटे और बनाए जाते हैं। (लश०)।

सेढ़मसानी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सिद्ध + श्मशान] श्मशानवासी देवी। काली। उ०—(क) खर का सोर भूँस कूकर की देखादेखी चाली। तैसे कलुआ जाहिर भैरो सेढ़मसानी काली।—चरण० बानी, पृ० ७२। (ख) सेढ़मसानी के दरबान, नौहबति बाजि रही।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ९२२।

सेढ़ा † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० सेड़ा] दे० 'सेड़ा'।

सेढ़ा (२)
संज्ञा पुं० [अं० सेल, हिं० सेढ़] १. दे० 'सेढ़'। उ०—कहीं सुबीते से नाव का सेढ़ा नहीं लगा।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ११८। २. सिरा।

सेढ़ा पु (३)
संज्ञा स्त्री० [देश०] नाक का मैल। उ०—थूक रु लार भरयो मुख दीसत आँखि में गीज रु नाक में सेढ़ौ।—सुदंर ग्रं०, भा० २, पृ० ४३६।

सेण पु †
संज्ञा पुं० [सं० स्वजन, प्रा० सयण] मित्रमंडली। आत्मीय जन। स्वजन। उ०—ज्याँ री जीभ न ऊपड़ै सेणाँ माँही सेत। वाराँ कर किम ऊपरै खलाँ घिरया बिच खेत।—बाँकी० ग्रं०, भा० २, पृ० १७।

सेणि पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० श्रेणि, प्रा० सेणि] श्रेणी। कतार। उ०— कबीर तेज अनंत का मानौं ऊगौं सूरज सेणि। पति सँगि जागी सुंदरी, कौतिग दीठा तेणि।—कबीर ग्रं०, पृ० १२।

सेत † (१)
संज्ञा पुं० [सं० सेतु] दे० 'सेतु'। उ०—(क) सिला तरैं जल बीच सेत में कटक उतारी।—पलटू०, पृ० ८। (ख) काज कियो नहिं समै पर पछतानै फिरि काह। सूखी सरिता सेत ज्यौ जोबन बितै बिवाह।—दीनदयाल (शब्द०)।

सेत पु (२)
वि० [सं० श्वेत, प्रा० सेअ; अप० सेत्त] दे० 'स्वेत'। उ०—पैन्ह सेत सारी बैठी फानुस के पास प्यारी, कहत बिहारी प्राणप्यारी धौं कितै गई।—दूलह (शब्द०)।

सेत पु (३)
वि० [सं० श्वेत, प्रा० सेत] १. स्पष्ट। साफ। उ०—ज्याँरी जीभ न ऊपड़े सेणाँ माँही सेत।—बाँकी ग्रं०, भा० २, पृ० १७। २. कीर्ति। यश। मर्यादा। उ०—सबें सेत- बंधी रहे सेत मुक्के। गयौ हब्बसी रोम साध्रंम चुक्के।— पृ० रा०, २४।२५७। यौ०—सेतबंधी = कीर्तिवाले। यशस्वी।

सेत †
संज्ञा पुं० [सं० स्वेद, प्रा० सेअ, सेद]दे० 'स्वेद'।

सेतकुली
संज्ञा पुं० [सं० श्वेतकुलीय] सर्पों के अष्टकुल में से एक। सफेद जाति के नाग। उ०—मोको तुम अब यज्ञ करावहु। तक्षक कुटुँब समेत जरावहु। बिप्रन सेतकुली जब जारी। तब राजा तिनसों उच्चारी।—सूर (शब्द०)।

सेतज पु †
वि० [सं० स्वेदज, प्रा० सेदज]दे० 'स्वेदज'। उ०— उन्मुनि ध्यान न सेतज कीने।—प्राण०, पृ० ५८।

सेतदीप पु
संज्ञा पुं० [सं० श्वेतदीप] दे० 'श्वेतद्वीप'।

सेतदुति पु
संज्ञा पुं० [सं० श्वेतद्युति] चंद्रमा।

सेतना
क्रि० स० [हिं० सैतना]दे० 'सैंतना'।

सेतबंद पु
संज्ञा पुं० [सं० सेतुबन्ध, प्रा० सेतबंध] उ०—(क) सेतबंद पुन कीन्ह ठिकाना। पुष्कर (क्षेञ आय जम थाना।—कबीर सा०, पृ० ८०४। (ख) सेतबंद पर जाय पूजि रामेस्वर नीकै।—ह० रासो, पृ० १६३।

सेतबंध ‡
संज्ञा पुं० [सं० सेतुबन्ध] दे० 'सेतुबंध'।

सेतवा
संज्ञा पुं० [सं० शुक्ति, हिं० सितुही] पतले लोहे की करछी जिससे अफीम काछते हैं।

सेतवारी †
संज्ञा स्त्री० [सं० सिकता (= बालू) + हिं० वारी (प्रत्य०)] हरापन लिए हुए बलुई चिकनी मिट्टी।

सेतवाल
संज्ञा पुं० [देश०] वैश्यों की एक जाति।

सेतवाह पु
संज्ञा पुं० [सं० श्वेतवाहन] १. अर्जुन। २. चंद्रमा (डिं०)।

सितव्य
वि० [सं०] साथ रखने योग्य। सह बंधन योग्य [को०]।

सेतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] सावेत। अयोध्या।

सेती पु †
प्रत्य० [हिं०] से। साथ। उ०—(क) नारी सेती नेह लगायौ।—रामानंद०, पृ० ६। (ख) कर सेती माला जपे हिरदै बहै डँडूल। पग तौ पाला मैं गिल्या, भाजण लागी सूल।—कबीर ग्रं०, पृ० ४५। (ग) जैसे भूखे प्रीत अनाजा। तृण- वंत जल सेती काजा।—दक्खिनी०, पृ० ४४।

सेतु (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बंधन। बँधाव। २. मिट्टी का ऊँचा पटाव जो कुछ दूर तक चला गया हो। बाँध। धुस्स। ३. मेंड़। डाँड़। ४. किसी नदी, जलाशय, गड्ढे, खाईं आदि के आर पार जाने का रास्ता जो लकड़ी, बाँस, लोहे आदि बिछाकर या पक्की जोड़ाई करके बना हो। पुल। उ०—आवत जानि भानुकुल केतु। सरितन्ह जनक बँधाए सेतू।—तुलसी (शब्द०)।क्रि० प्र०—बनाना।—बाँधना।उ०—सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पारा।—मानस, ७।६७। ५. सीमा। हदबंदी। ६. मर्यादा। नियम या व्यवस्था। प्रतिबंध। उ०—असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुतिसेतु। जग विस्तारहिं विशद जस, रामजनम कर हेतु।—तुलसी (शब्द०)। ७. प्रणव। ओंकार। ८. टीका या व्याख्या। ९. वरुण वृक्ष। बरना। १०. एक प्राचीन स्थान। ११. दुह्यु के एक पुत्र और बभ्रु के भाई का नाम। १२. संकीर्ण पर्वतीय मार्ग। सँकरा पहाड़ी रास्ता (को०)। १३. वह मकान जिसमें धरनें छत के साथ लोहे की कीलों से जड़ी हो। १४. दे० 'सेतुबंध'—४।

सेतु पु (२)
वि० [सं० श्वेत, प्रा० सेअ, अप० सेत्त]दे० 'श्वेत'।

सेतुक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पुल। २. बाँध। धुस्स। ३. वरुण वृक्ष। बरना। ४. दर्रा। तंग पर्वतपथ (को०)।

सेतुक पु (२)
अव्य० [हिं० सौंतुख] संमुख। सामने।

सेतुकर
संज्ञा पुं० [सं०] सेतुनिर्माता। पुल बनानेवाला।

सेतुकर्म
संज्ञा पुं० [सं० सेतुकर्मन्] सेतु या पुल बनाने का काम।

सेतुज
संज्ञा पुं० [सं०] दक्षिणापथ के एक स्थान का नाम।

सेतुपति
संज्ञा पुं० [सं०] रामनद के (जो मद्रास प्रदेश के मदुरा जिले के अंतर्गत है) राजाओं की वंशपरंपरागत उपाधि।

सेतुपथ
संज्ञा पुं० [सं०] दुर्गम स्थानों में जानेवाली सड़क। ऊँची नीची पहाड़ी घाटियों में जानेवाली सड़क।

सेतुप्रद
संज्ञा पुं० [सं०] कृष्ण का एक नाम।

सेतुबंध
संज्ञा पुं० [सं० सेतुबन्ध] १. पुल की बँधाई। २. वह पुल जो लंका पर चढ़ाई के समय रामचंद्र जी ने समुद्र पर बँधवाया था। उ०—सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिँ।— मानस, ६।४। विशेष—नल नील ने बंदरों की सहायता से शिलाएँ पाटकर यह पुल बनाया था। वाल्मीकि ने यहाँ शिव की स्थापना का कोई उल्लेख नहीं किया है। केवल लंका से लौटते समय रामचंद्र ने सीता से कहा है—'यहाँ पर सेतु बाँधने के पहले शिव ने मेरे ऊपर अनुग्रह किया था (युद्धकांड, १२५ वाँ अध्याय)। पर अध्यात्म आदि पिछली रामायणों में शिव की स्थापना का वर्णन है। इस स्थान पर रामेश्वर महादेव का दर्शन करने के लिये लाखों यात्री जाया करते हैं। 'सेतुबंध रामेश्वर' हिंदुओ के चार मुख्य धामों में से एक है। आजकल कन्याकुमारी और सिंहल के बीच के छिछले समुद्र में स्थान स्थान पर जो चट्टानें निकली हैं, वे ही उस प्राचीन सेतु के चिह्व बतलाई जाती हैं। ३. बाँध या पुल (को०)। ४. नहर। विशेष—कौटिल्य में नहरें दो प्रकार की कही हैं—आहार्योदक और सहोदक। आहार्योदक वह है जिसमें पानी नदी, ताल आदि से खींचकर लाया जाता है। सहोदक में झरने से पानी आता रहता है। इनमें से दूसरे प्रकार की नहर अच्छी कही गई है।

सेतुबंधन
संज्ञा पुं० [सं० सेतुबन्धन] १. सेतुनिर्माण। पुल बाँधना। २. पुल। ३. बाँध। सीमा की मेड़।

सेतुबंध रामेश्वर
संज्ञा पुं० [सं० सेतुबन्धरामेश्व] दे० १. 'सेतुबंध' और २. 'रामेश्वर'।

सेतुभेत्ता
संज्ञा पुं० [सं० सेतुमेतृ] वह व्यक्ति जो पुल, बाँध आदि को तोड़ता हो [को०]।

सेतुभेद
संज्ञा पुं० [सं०] सेतु का भंग होना। पुल का टूटना। बाँध का टूटना।

सेतुभेदी (१)
संज्ञा पुं० [सं० सेतुभोदिन्] दंती। उदुंबरपर्णी। तिरीफल।

सेतुभेदी (२)
वि० १. मर्यादा, सीमा आदि का विनाशक। २. निरोधक। बाधक (को०)।

सेतुवा †
संज्ञा पुं० [सं० सक्तु, सक्तुक; हिं० सतुआ]; दे० 'सतुआ' और 'सत्तू'। उ०—सोइ भुजाइ सेतुवा बनवायो। तामें चरिउ भाग लगायो।—रघुनाथदास (शब्द०)।

सेतुवृक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] वरुण वृक्ष। बरना।

सेतुशैल
संज्ञा पुं० [सं०] वह पहाड़ जो दो देशों के बीच में हो। सरहद का पहाड़।

सेतुषाम
संज्ञा पुं० [सं० सेतुषामन्] एक साम का नाम।

सेत्र
वि० पुं० [सं०] बेड़ी। जंजीर। बंधन। शृंखला।

सेथिया
संज्ञा पुं० [तेलगू चेट्टि, चेट्टिया, हिं सेठिया] नेत्रों की चिकित्सा करनेवाला। आँखों का इलाज करनेवाला।

सेथी पु
अव्य० [सं० सहित] दे० 'सहित'। उ०—काँधा सेथी टूट कर जमी पड़ो वा जीह।—बाँकी० ग्रं, भा० २, पृ० ५५।

सेद पु
संज्ञा पुं० [सं० स्वेद, प्रा० सेद] दे० 'स्वेद'। उ०—कान मैं कामिनी के यह आनिकै बोल परयो जनु वज्र सो नायो। सूखि गयो अँग, पीरो भयो रँग, सेद कपोलन में सँग धायो।— रघुनाथ बंदीजन (शब्द०)।

सेदज पु
वि० [सं० स्वेदज] दे० 'स्वेदज'। उ०—बिन सनेह दुख होय न कैसे। शुक्र मूषक सुत सेदज जैसे।—रघुनाथदास (शब्द०)।

सेदरा
संज्ञा पुं० [फ़ा० सेह (= तीन) + दर (= दरवाजा)] वह मकान जो तीन तरफ से खुला हो। तिदरी।

सेदिवस्
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सेदुषी] बैठा हुआ। उपविष्ट [को०]।

सेदुक
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत में वर्णित एक राजा का नाम।

सेद्धव्य
वि० [सं०] १. निवारण योग्य। हटाने या दूर करने योग्य। २. जिसे हटाना या दूर करना हो।

सेध (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. निषेध। निवारण। मनाही। २. जाना। पहुँचना। ३. दुम। पुच्छ। [को०]।

सेध (२)
वि० दूर रखनेवाला। हटानेवाला [को०]।

सेधक
वि० [सं०] प्रतिरोधक। हटाने या रोकनेवाला।

सेधा
संज्ञा स्त्री० [सं०] साही नाम का जानवर जिसकी पीठ पर काँटे होते हैं। खारपुश्त।

सेन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. शरीर। तन। देह। २. जीवन। ३. बंगाल की वैद्य जाती की उपाधि। यौ०—सेनकुल = दे० 'सेनवंश'। ४. एक भक्त नाई। विशेष—इसकी कथा भक्तमाल में इस प्रकार है। यह रीवाँ के महाराज की सेवा में था और बड़ा भारी भक्त था। एक दिन साधुसेवा में लगे रहने के कारण यह समय पर राजसेवा के लिये न पहुँच सका। उस समय भगवान् ने इसका रूप धरकर राजभवन में जाकर इसका काम किया। यह वृतांत ज्ञात होने पर यह विरक्त हो गया और राजा भी परम भक्त हो गए। ५. एक राक्षस का नाम। ६. दिगंबर जैन साधुओं के चार मेदों में से एक।

सेन (२)
वि० [सं०] १. जिसके सिर पर कोई मालिक हो। सनाथ। २. आश्रित। अधीन। ताबे।

सेन पु (३)
संज्ञा पुं० [सं० श्येन, प्रा० सेण] बाज पक्षी। उ०— ज्यों गच काँच बिलोकि सेन जड़, छाँह आपने तन की। टूटत आति आतुर अहारबस, छति बिसारि आनन की।—तुलसी (शब्द०)।

सेन पु (४)
संज्ञा स्त्री० [सं० सैन्य, प्रा० सेण] दे० 'सेना'। उ०— हय गय सेन चलै जग पूरी।—जायसी (शब्द०)।

सेन † (५)
संज्ञा स्त्री० [सं० सन्धि] दे० 'सेंध'।

सेन † (६)
संज्ञा पुं० [हिं० सैन] संकेत। इशारा। उ०—(क) तासों बहू ने सेन ही मों नाहीं करो।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० २६०। (ख) अपने घर इन चारों को सेन दै कै पधराइ लै गई।—दो सौ बावन०, भाग १, पृ० ७२।

सेन † (७)
संज्ञा पुं० [सं० शयन] दे० 'शयन'। उ०—(क) सो श्री गोवर्धननाथ जी को उत्थापन किए। पाछे सेन पर्यत की सब सेवा।—दो सौ बावन०, भा० २, पृ० २३। (ख) श्री नवनीत प्रिय जी को उत्थापन ते सेन पर्यत की सेवा सों पहोंचि........ सुबोधिनी की कथा कहे।—दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ६६। यौ०—सेन आर्ति = शयनकाल की आरती। उ०—श्री ठाकुर जी की सेन आर्ति करि कै अपने घर तें चलतो।—दो सौ बावन०, भा०, पृ० २६। सेनभोग = शयनकालीन भोग। उ०—पाछें सेन भोग धरि श्री ठाकुर जी की रसोई पोति, भोग सराइ, आर्ति करि..........मुरारीदास सोवते।—दो सौ बावन०, भा०, पृ० १०२।

सेनक
संज्ञा पुं० [सं०] १. हरिवंश वर्णित शंबर के एक पुत्र का नाम। २. एक वैयाकरण का नाम।

सेनजित् (१)
वि० [सं०] सेना को जीतनेवाला।

सेनजित् (२)
संज्ञा पुं० १. एक राजा का नाम। २. श्रीकृष्ण के एक पुत्र का नाम। विश्वजित् के एक पुत्र का नाम। ४. बृहत्कर्मा के एक पुत्र का नाम। ५. कृशाश्व के एक पुत्र का नाम। ६. विशद के एक पुत्र का नाम।

सेनजित् (३)
संज्ञा स्त्री० एक अप्सरा का नाम।

सेनप
संज्ञा पुं० [सं० सेना + प (= पति)] सेनापति। उ०—सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे।—तुलसी (शब्द०)।

सेनपति पु
संज्ञा पुं० [सं० सेनापति] दे० 'सेनापति'। उ०—कपि पुनि उपवन बारिहु तोरी। पंच सेनपति सेन मरोरी।— पद्माकर (शब्द०)।

सेनयार
संज्ञा पुं० [हटा०] [स्त्री० सेनयोरा] हटली में नाम के आगे लगाया जानेवाला आदरसूचक शब्द। अँगरेजी 'सर' या 'मिस्टर' शब्द का समानार्थवाची शब्द। महाशय। महोदय।

सेनवंश
संज्ञा पुं० [सं०] बंगाल का एक हिंदू राजवंश जिसने ११ वीं शताब्दी से १४ वीं शताब्दी तक राज्य किया था। इसे 'सेन- कुल' भी कहा जाता है।

सेनस्कंध
वि० पुं० [सं० सेनस्कन्ध] हरिवंश में शंबर का एक नाम।

सेनहा
संज्ञा पुं० [सं० सेनाहन्] शंबर का एक पुत्र [को०]।

सेनांग
संज्ञा पुं० [सं० सेनाड़्ग] १. सेना का कोई एक अंग। जैसे,— पैदल, हाथी, घोड़े, रथ। २. फौज का हिस्सा। सिपाहियों का दल या टुकड़ी। यौ०—सेनांगपति = सिपाहियों की टुकड़ी का अधिकारी।

सेना (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. युद्ध की शिक्षा पाए हुए और अस्त्र- शस्त्र से सजे मनुष्यों का बड़ा समूह। सिपाहियों का गरोह। फौज। पलटन। विशेष—भारतीय युद्धकला में सेना के चार अंग माने जाते थे— पदाति, अश्व, गज और रथ। इन अंगों से पूर्ण समूह सेना कहलाता था। सैनिकों या सिपाहियों को समय पर वेतन देने की व्यवस्था आजकल के समान ही थी। यह वेतन कुछ तो भत्ते या अनाज के रूप में दिया जाता था और कुछ नकज। महाभारत के सभापर्व में नारद ने युधिष्ठिर को उपदेश दिया है कि 'कच्चिद्बल्स्य भक्तं च वेतनं च यथोचितम्। सम्प्रा- प्तकाले दतव्यं ददासि न विकर्षसि'। चतुरंग दल के अतिरिक्त सेना के और विभाग होते थे—विष्टि, नौका, चर और देशिक। सब प्रकार के सामान लादने और पहुँचाने का प्रबंध 'विष्टि' कहलाता था। 'नौका' का भी लड़ाई में काम पड़ता था। 'चरों' के द्वारा प्रतिपक्ष के समाचार मिलते थे। 'देशिक' स्थानीय सहायक हुआ करते थे जो अपने स्थान पर पहुँचने पर सहायता पहुँचाया करते थे। सेना के छोटे छोटे दलों को 'गुल्म' कहते थे। पर्या०—चतुरंग। बल। ध्वजिनी। वाहिनी। पृतना। चमू। अनीकिनी। सैन्य। वरुथिनी। अनीक। चक्र। वाहना। गुल्मिनी। वरचक्षु। २. भाला। बरछी। शक्ति। साँग। ३. इंद्र का वज्र। ४. इंद्राणी। ५. वर्तमान अवसर्पिणी के तीसरे अर्हत् शंभव की माता का नाम (जन)। ६. एक उपाधि जो पहले अधिकतर वेश्याओं के नामों में लगी रहती थी। जैसे,—वसंतसेना। ७. सेना कीछोटी टुकड़ी जिसमें ३ हाथी, ३ रथ, ९ अश्व और। १५ पदाति रहते हैं (को०)।

सेना (२)
क्रि० स० [सं० सेवन] १. सेवा करना। खिदमत करना। किसी को आराम देना या उसका काम करना। नौकरी बजाना। टहल करना। उ०—सेइय ऐसे स्वामि को जो राखै निज मान।—कबीर (शब्द०)। मुहा०—चरण सेना = तुच्छ चाकरी बजाना। २. आराधना करना। पूजना। उपासना करना। उ०—(क) तातें सेइय श्री जदुराई। (ख) सेवत सुलभ उदार कल्पतरु पारबतीपति परम सुजान।—तुलसी (शब्द०)। ३. नियम- पूर्वक व्यवहार करना। काम में लाना। इस्तेमाल करना। नियम के साथ खाना पीना या लगाना। उ०—(क) आसव सेइ सिखाए सखीन के सुंदरि मंदिर में सुख सोवै।—देव (शब्द०)। (ख) निपट लजीली नवल तिय बहँकि बारुनी सेइ। त्योंत्यों अति मीठी लगै ज्यों ज्यों ढीठो देइ।—बिहारी (शब्द०)। ४. किसी स्थान को लगातार न छोड़ना। पड़ा रहना। निरंतर वास करना। जैसे,—चारपाई सेना, कोठरी सेना, तीर्थ सेना। उ०—(क) सोइय सहित सनेह देह भरि कामधेनु कलि कासी।—तुलसी (शब्द०)। (ख) उत्तम थल सेवैं सुजन, नीच नीच के बंस। सेवत गीध मसान की, मानरोवर हंस।—दीनदयाल (शब्द०)। ५. लिए बैठे रहना। दूर न करना। जैसे,—फोड़ा सेना। ६. मादा चिड़िया का गरमी पहुँचाने के लिये अपने अंड़ों पर बैठना।

सेनाकक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] सेना का पार्श्व। फौज का बाजू।

सेनाकर्म
संज्ञा पुं० [सं० सेनाकर्मन्] १ सेना का संचालन या व्यव- स्था। २. सेना का काम।

सेनाकल्प
संज्ञा पुं० [सं०] शिव का एक नाम [को०]।

सेनागोप
संज्ञा पुं० [सं०] सेना का संरक्षक। सेना का एक विशेष अधिकारी।

सेनाग्र
संज्ञा पुं० [सं०] सेना का अग्रभाग। फौज का अगला हिस्सा।

सेनाग्रग
संज्ञा पुं० सेना का प्रधान। सेनापति।

सेनाचर
संज्ञा पुं० [सं०] सेना के साथ जानेवाला सैनिक। योद्धा। सिपाही।

सेनाजीव
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सेनाजीवी'।

सेनाजीवी
संज्ञा पुं० [सं० सेनाजीविन्] वह जो सेना में रहकर अपनी जीविका चलावे। सैनिक। सिपाही। योद्धा।

सेनादार
संज्ञा पुं० [सं० सेना + फ़ा० दार] सेनानायक। फौजदार। उ०—मल्हारराव हुल्कर भाग्य के बल से पेशवा बहादुर की सेना का सेनादार हो गया।—शिवप्रसाद (शब्द्०)।

सेनाधिकारी
संज्ञा पुं० [सं० सेनाधिकारिन्] सेनानायक। फौज का अफसर।

सेनाधिनाथ
संज्ञा पुं० [सं०] सेनापति। फौज का अफसर। सिपहसालार।

सेनाधिप
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सेनाधिपति'।

सेनाधिपति
संज्ञा पुं० [सं०] फौज का अफसर। सेनापति।

सेनाधीश
३ संज्ञा पुं० [सं०] सेनापति।

सेनाध्यक्ष
संमज्ञा पुं० [सं०] फौज का अफसर। सेनापति।

सेनानायक
संज्ञा पुं० [सं०] सेना का अफसर। फौजदार।

सेनानिवेश
संज्ञा पुं० [सं०] सेना का पड़ाव। सैन्याशिबिर [को०]।

सेनानी
संज्ञा पुं० [सं०] १. सेनापति। फौज का अफसर। उ०— आँधी में उड़ते पत्तों से, दलित हुए सब सेनानी।—साकेत, पृ० ३९५। २. कार्तिकेय का एक नाम। ३. एक रुद्र का नाम। ४. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम। ५. शंबर के एक पुत्र का नाम। ६. एक विशेष प्रकार का पासा।

सेनापति
संज्ञा पुं० [सं०] १. सेना का नायक। फौज का अफसर। २. कार्तिकेय का एक नाम। ३. शिव का नाम। ४. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम। ५. हिंदी के एक प्रसिद्ध कवि का नाम। यौ०—सेनापतिपति = सेनापतियों का प्रधान अधिकारी। प्रधान सेनापति।

सेनापत्य
संज्ञा पुं० [सं०] सेनापति का कार्य या पद। सेनापति का अधिकार।

सेनापरिच्छद्
वि० [सं०] सेनाओं से घिरा हुआ या आवृत [को०]।

सेनापाल
संज्ञा पुं० [सं० सेना + पाल] सेनापति। उ०—हरुये बोल्यो भूप तब सेनापाल बुलाय। धाइ सुशर्मा वीर जे सुरभी लेहु छुडा़य।—सबलसिंह (शब्द०)।

सेनापृष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] सेना का पिछला भाग।

सेनाप्रणेता
संज्ञा पुं० [सं० सेनाप्रणेतृ] सेनानायक। सेनापति। फौज का मुखिया।

सेनाबेध †
संज्ञा पुं० [सं० सेना + बेध] सैन्य दल का भेदन करनेवाला। सेना को बेधनेवाला—शूरवीर (डिं०)।

सेनाभंग
संज्ञा पुं० [सं० सेनाभड़्ग] सेना का अस्तव्यस्त, छिन्न भिन्न या तितर बितर होना [को०]।

संनाभवत
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार सेना के लिये रसद और बेगार।

सेनाभिगोप्ता
संज्ञा पुं० [सं० सेनाभिगोप्तृ] सेनारक्षक। सेनापति।

सेनामुख
संज्ञा पुं० [सं०] १. सेना का अग्रभाग। २. सेना का एक खंड जिसमें ३ या ९ हाथी, ३ या ९ रथ, ९ या २७ घोड़े और १५ या ४५ पैदल होते थे। ३. नगरद्वार के सामने का ढका हुआ या गुप्त रास्ता। ४. नगर द्वार के सामने निर्मित सेतु (को०)।

सेनायोग
संज्ञा पुं० [सं०] सैन्यसज्जा। फौज की तैयारी।

सेनारक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] पहरुआ। संतरी। प्रहरी [को०]।

सेनावास
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह स्थान जहाँ सेना रहती हो। छावनी। विशेष—बृहत्संहिता के अनुसार जहाँ राख, कोयला, हड्डी, तुष, केश, गड्ढे न हों; जो स्थान ऊसर न हो; जहाँ हिंसक जंतुओं और चूहों के बिल और बल्मीक न हों तथा जिस स्थान कीभूमि घनी, चिकनी, सुगंधित, मधुर और समतल हो ऐसे स्थान पर राजा को सेनावास या छावनी बनानी चाहिए। २. डेरा। खेमा। शिबिर। कैंप।

सेनावाह
संज्ञा पुं० [सं०] सेनानायक।

सेनाव्यूह
संज्ञा पुं० [सं०] युद्ध के समय भिन्न भिन्न स्थानों पर की हुई सेना के भिन्न भिन्न अंगों की स्थापना या नियुक्ति। सैन्य- विन्यास। विशेष दे० 'व्यूह'।

सेनासमुदय
संज्ञा पुं० [सं०] संमिलित सेना। एकत्र हुई सेना।

सेनास्थ
संज्ञा पुं० [सं०] सिपाही। फौजी आदमी।

सेनास्थान
संज्ञा पुं० [सं०] हरिवंश के अनुसार शंबर के एक पुत्र का नाम।

सेनि पु
संज्ञा स्त्री० [सं० श्रेणि, प्रा० सेणि] दे० 'श्रेणी'। उ०— जनु कलिंदनंदिनि मनि नील सिखर पर सिध सति लसति हंस सेनि संकुल अधिकौ हैं।—तुलसी (शब्द०)।

सेनिका
संज्ञा स्त्री० [सं० श्येनिका] १. बाज पक्षी। उ०—श्यामदेह दुकूल दुति छबि लसत तुलसी माल। तडित धन संयोग मानो सेनिका शुक जाल।—सूर (शब्द०)। २. एक छंद। विशेष दे० 'श्येनिका'। उ०—आठ ओर आठ दीठि दै रह्यो। लोक नाथ आश्चर्य वै रह्यो।—गुमान (शब्द०)।

सेनी (१)
संज्ञा स्त्री० [फा़० सीनी] १. तश्तरी। रकाबी। २. नक्काशीदार छोटी छिछली थाली।

सेनी पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० श्यनी] १. बाज की मादा। मादा बाज पक्षी। २. दक्ष प्रजापति की कन्या और कश्यप की पत्नी ताम्रा से उत्पन्न पाँच कन्याओं में से एक।

सेनी पु (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० श्रेणी] १. पंक्ति। कतार। उ०—जोबन फूल्यो बसंत लसै तेहि अंगलता अलि सेनी।—बेनी (शब्द०)। २. सीढ़ी। जीना।

सेनी पु (४)
संज्ञा पुं० विराट के यहाँ अज्ञातवास करते समय का सहदेव का रखा हुआ नाम। उ०—नाम धनंजय को कह्यो वृहन्नड़ा ऋषि व्यास। सेनी सहदेवहि कह्यो सकल गुनन की रास।— सबल (शब्द०)।

सेनीटोरियम
संज्ञा पुं० [अं०] स्वास्थगृह। चिकित्सालय।

सेनुर †,सेन्हर
संज्ञा पुं० [सं० सिन्दूर] दे० 'सिंदूर'।

सेनेट
संज्ञा स्त्री० [अं०] १. प्रधान व्यवस्थापिका सभा या कानून बनानेवाली सभा। २. विश्वविद्यालय की प्रबंधकारिणी सभा। विश्वविद्यालयों में पुराने कोर्ट का नाम। ३. अमेरिका की व्यवस्थापिका सभा का एक भाग। ४. प्राचीन काल में रोमन साम्राज्य की शासक सभा।

सेनेटर
संज्ञा पुं० [अं०] १. सेनेट या देश की प्रधान व्यवलस्थापिका का सदस्य। २. जज या मजिस्ट्रेट। विशेष—अमेरिका, फ्राँस, इटली आदि देशों की बड़ी व्यवस्थापिका सभाएँ 'सेनेट' कहलाती हैं ओर उनके सदस्य 'सेनेटर' कह- लाते हैं।

सेनेट हाउस
संज्ञा पुं० [अं०] वह मकान जिसमें सेनेट का अधिवेशन होता है।

सेफ (१)
संज्ञा पुं० [सं० शेफ; सेफ, प्रा० सेफ] दे० 'शेफ'।

सेफ (२)
संज्ञा पुं० [अं०] लोहे का बड़ा मजबूत बक्स जिसमें रोकड़ और बहुमूल्य पदार्थ रखे जाते हैं।

सेफालिकी
संज्ञा स्त्री० [सं० शेफालिका; प्रा० सफालिआ, सेहालिया, सेहाली] दे० 'शेफालिका'।

सेब
संज्ञा पुं० [फ़ा०] नाशपाती की जाति का मझोले आकार का एक पेड़ जिसका फल मेवों में गिना जाता है। विशेष—यह पेड़ पश्चिम का है; पर बहुत दिनों से भारतवर्ष में भी हिमालय प्रदेश (काश्मीर, कुमाऊँ, गढ़वाल, काँगड़ा आदि); पंजाब आदि में लगाया जाता है; और अब सिंध, मध्य- भारत और दक्षिण तक फैल गया है। काश्मीर में कहीं कहीं यह जंगली भी देखा जाता है। इसके पत्ते कुछ कुछ गोल और पीछे की ओर कुछ सफेदी लिए और रोई दार होते हैं। फूल सफेद रंग के होते हैं जिन पर लाल लाल छींटे से होते हैं। फल गोल और पकने पर हलके हरे रंग के होते हैं; पर किसी किसी का कुछ भाग बहुत सुंदर लाल रंग का होता है जिससे देखने में बड़ा सुंदर लगता है। गूदा इसका बहुत मुलायम और मीठा होता है। मध्यम श्रेणी के फलों में कुछ खटास भी होती है। सेब फागुन से वैशाख के अंत तक फूलता है और जेठ से फल लगने लगते हैं। भादों में फल अच्छी तरह पक जाते हैं। ये फल बड़े पाचक माने जाते हैं। भावप्रकाश के अनुसार सेब वात-पित्त-नाशक, पुष्टिकारक, कफकारक, भारी, पाक में मधुर, शीतल तथा शुक्रकारक है। भावप्रकाश के अतिरिक्त किसी प्राचीन ग्रंथ में सेब का उल्लेख नहीं मिलता। भावप्रकाश ने सेब, सिंचितिका फल आदि इसके कुछ नाम दिए हैं।

सेबाट पु
वि० [देशी या हिं सपाट] दे० 'सपाट'। उ०—ऊँचे- ऊँचे परबत विषय के घाट। तिहाँ गोरखनाथ कै लिया सेवाट।—गोरख, पृ० १३४।

सेभ्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] शीतलता। शैत्य। ठंढक।

सेभ्य (२)
वि० शीतल। ठंढा।

सेभंतिका
संज्ञा स्त्री० [सं० सेमन्तिका] दे० 'सेमंती।

सेभंती
संज्ञा स्त्री० [सं० सेमन्ती] सफेद गुलाब का फूल। सेवती।

सेम
संज्ञा स्त्री० [सं० शिम्बी] एक प्रकरा की फली जिसकी तरकारी खाई जाती है। विशेष—इसकी लता लिपटती हुई बढ़ती है। पत्ते एक एक सींके पर तीन तीन रहते हैं और वे पान के आकार के होते हैं। सेम सफेद, हरी, मजंटा आदि कई रंगों की होती है।फलियाँ लंबी, चिपटी और कुछ टेढ़ी होती हैं। यह हिंदुस्तान में प्रायः सर्वत्र बोई जाती है। वैद्यक में सेम मधुर, शीतल, भारी, कसैली, बलकारी, वातकारक, दाहजनक, दीपन तथा पित्त और कफ का नाश करनेवाली मानी गई है। यौ०—सेम का गोंद = एक प्रकार के कचनार का गोंद जो देहरादून की ओर से आता है और इंद्रिय जुलाब या रज खोलने के लिये दिया जाता है। विशेष दे० 'कचनार'।

सेमई (१)
संज्ञा पुं० [हिं० सेम + ई (प्रत्य०)] हल्का सब्ज रंग।

सेमई (२)
वि० हलके हरे रंग का।

सेमई पु (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० सेविका, हिं० सेंवई] दे० 'सेँवई'। उ०— मोतीचूर मूर के मोदक ओदक की उजियारी जी। सेमई सेव सैजना सूरन सोवा सरस सोहारी जी।—विश्राम (शब्द०)।

सेमर (१)
संज्ञा पुं० [देश०] दलदली जमीन।

सेमर † (२)
संज्ञा पुं० [सं० शाल्मली, हिं० सेमल] दे० 'सेमल'।

सेमल
संज्ञा पुं० [सं० शिम्बल (= शाल्मलि (सायण)] पत्ते झाड़नेवाला एक बहुत बड़ा पेड़ जिसमें बड़े आकार और मोटे दलों के लाल फूल लगते है, और जिसके फलों या डोडों में केवल रूई होती है गूदा नहीं होता। विशेष—इस पेड़ के धड़ और डालों में दूर दूर पर काँटे होते हैं; पत्ते लंबे और नुकीले होते हैं तथा एक एक डाँड़ी में पंजे की तरह पाँच पाँच छह छह लगे होते हैं। फूल मोटे दल के, बड़े बड़े और गहरे लाल रंग के होते हैं। फूलों में पाँच दल होते हैं और उनका घेरा बहुत बड़ा होता है। फागुन में जब इस पेड़ की पत्तियाँ बिल्कुल झड़ जाती हैं। और यह ठूँठा ही जाता है तब यह इन्हीं लाल फूलों से गुछा हुआ दिखाई पड़ता है। दलों के झड़ जाने पर डोडा या फल रह जाता है जिसमें बहुत मुलायम और चमकीली रूई या घूए के भीतर बिनौले से बीज बंद रहते हैं। सेमल के डोड या फलों की निस्सारता भारतीय कविपरंपरा में बहुत काल से प्रसिद्ध है और यह अनेक अन्योक्तियों का विषय रहा है। 'सेमर सेइ सुवा पछ्ताने' यह एक कहावत सी हो गई है। सेमल की रूई रेशम सी मुलायम और चमकीली होती है और गद्दों तथा तकियों में भरने के काम में आती है, क्योंकि काती नहीं जा सकती। इसकी लकड़ी पानी में खूब ठहरती है और नाव बनाने के काम में आती है। आयुर्वेद में सेमल बहुत उपकारी ओषधि मानी गई है। यह मधुर, कसैला, शीतल, हलका, स्निग्ध, पिच्छिल तथा शुक्र और कफ को बढ़ानेवाला कहा गया है। सेमल की छाल कसैली और कफनाशक; फूल शीतल, कड़वा, भारी, कसैला, वातकारक, मलरोधक, रूखा तथा कफ, पित्त और रक्तविकार को शांत करनेवाला कहा गया है। फल के गुण फूल ही के समान हैं। सेमल के नए पौधे की जड़ को सेमल का मूसला कहते हैं, जो बहुत पुष्टिकारक, कामोद्दीपक और नपुंसकता को दूर करनेवाला माना जाता है। सेमल का गोंद मोचरस कहलाता है। यह अतिसार को दूर करनेवाला और बलकारक कहा गया है। इसके बीज स्निग्धताकारक और मदकारी होते है; और काँटों में फोड़े, फुंसी, घाव, छीप आदि दूर करने का गुण होता है। फलों के रंग के भेद से सेमल तीन प्रकार का माना गया है—एक तो साधारण लाल फूलोंवाला, दूसरा सफेद फूलों का और तीसरा पीले फूलों का। इनमें से पीले फूलों का सेमल कहीं देखने में नहीं आता। सेमल भारतवर्ष के गरम जंगलों में तथा बरमा, सिंहल और मलाया में अधिकता से होता है। पर्या०—शाल्मलि। शाल्मली। पिच्छला। मोचा। स्थिराह। तूलिफला। दुरारोहा। शाल्मलिनी। शाल्मल। अफूरणी। पूरणी। निर्गधपुष्पी। तुलनी। कुक्कुटी। रक्तपुष्पा। कंटकारी। मोचनी। शीमूल। कदला। चिरजीवी। पिच्छल। रक्तपुष्पक। लूलवृक्ष। मोचाख्य। कंटकद्रुम। कुकुटी। रक्तोत्पल। वन्यष्प। बहुवीर्य। यमद्रुम। दीर्घद्रुम। स्थूलफल। दीर्घायु। कंटकाष्ठ। निस्सारा। दीर्घपादपा।

सेमलमूसला
संज्ञा पुं० [सं० शिम्बलमूल] सेमल की जड़ जो वैद्यक में वीर्यवर्धक, कामोद्दीपक और नपुंसकता नष्ट करनेवाली मानी गई है।

सेमलसफेद
संज्ञा पुं० [सं० श्वेतशिम्बल] सेमल का एक भेद जिसके फूल सफेद होते हैं। विशेष—यह सेमल के समान ही विशाल होता है। इसका उत्पत्तिस्थान मलाया है। यह हिंदुस्तान के गरम जंगलों और सिंहल में पाया जाता है। नए वृक्ष की छाल हरे रंग की और पुराने की भूरे रंग की होती है। पत्ते सेमल के समान ही एक साथ पाँच पाँच सात सात रहते हैं। फूल सेमल के फूल से छोटे और मटमैले सफेद रंग के होते हैं। इसके फल कुछ बड़े गोल, धुँधले और पाँच फाँकवाले होते हैं। फलों के अंदर बहुत कोमल रूई होती है और रूई के बीच में चिपटे बीज होते हैं। वैद्यक में सेमल के समान ही इसके भी गुण बताए गए हैं।

सेमा
संज्ञा पुं० [हिं० सेम] बड़ी सेम।

सेमिटिक
संज्ञा पुं० [अं० शाम (= एक देश का नाम तथा इसराईल की संतति में से एक)] १. मनुष्यों के आधुनिक वर्ग विभाग में वह वर्ग जिसके अंतर्गत यहूदी, अरब, सीरियन, मिस्त्री आदि लाल समुद्र के आस पास बसनेवाली, नई पुरानी जातियाँ हैं। विशेष—मूसा, ईसा और मुहम्मद इसी वर्ग के थे जिन्होंने पैगंबरी मत चलाए। यह वर्ग आर्य वर्ग से भिन्न है जिसमें हिंदू, पारसी, युरोपियन आदि हैं। २. उक्त वर्ग के लोगों द्वारा बोली जानेवाली भाषाओं का वर्ग। विशेष—इस भाषावर्ग के इबरानी और अरबी तथा असीरियन, फिनीशियन आदि प्राचीन भाषाएँ हैं। यह वर्ग आर्यवर्ग से सर्वथा भिन्न है जिसके अंतर्गत संस्कृत, पारसी, लैटिन, ग्रीक आदि प्राचीन भाषाएँ और हिंदी, मराठी, बँगाली, पंजाबी, पश्तो, गुजरादी आदि उत्तर भारत की भाषाएँ तथा अँगरेजी, फ्रांसीसी, जर्मन आदि योरप की आधुनिक भाषाएँ हैं।

सेमिनरी
संज्ञा स्त्री० [अं०] शिक्षालय। स्कूल। विद्यालय। मदरसा।

सेमिनार
संज्ञा पुं० [अं०] किसी विषय पर निर्देश ग्रहण करते हुए व्यवस्थित रूप से कलिज या विश्वविद्यालयीय छात्रों का अनुसंधान कार्य। विचारगोष्ठी। शोधगोष्ठी।

सेमीकोलन
संज्ञा पुं. [ अं. ] एक विराम जिसका चिह्न इस प्रकार है — ;।

सेयन
संज्ञा पुं. [ सं. ] विश्वामित्र के एक पुत्र का नाम।

सेर (1)
संज्ञा पुं. [ सं. ('लीलाबती' में प्रयुक्त)] 1.एक मान या तौल जो सोलह छँटाक अस्सी तोले की होती है। मन का चाली— सवाँ भाग। 2. 106 ढोली पान (तमोली)।

सेर (2)
संज्ञा स्त्री. [ देश. ] एख प्रकार की मछली।

सेर (3)
संज्ञा पुं. [ देश. ] एक प्रकार का धान जो अगहन महीने में तैयार ही जाता है और जिसका चावल बहुत दिनों तक रह सकता है।

सेर पुं.4
संज्ञा पुं. [ फ़ा. शेर ] दे. 'शोर'। उ.— (क) गएन राए तौ बधिअ, तीन सेर विहार चायिअ। — कीर्ति., पृ.58। (ख) अरि अजा दूथ पै सेर हौ. — गोपाल (शब्द.)। यौ.— सेर बच्चा = एक प्रकार की बंदूक। भोका। उ.— ठुटे सेर बच्चे। भजे बीर कच्चे। — हिम्मतय, पृ.10।

सेर पुं. (5)
वि. [ फ़ा. ] तुप्त। उ.— रे मन साहसी साहस राखु सुसाहस सों सब जेर फिरेंगे। ज्यों पद्माकर या सुख में दुख त्यों दुख में सुख सेर फिरेंगे। — पद्माकर (शब्द.)।

सेरन
संज्ञा स्त्री. [ देश. ] एक घास जो राजपूताना, बुंदेलखंड और मध्य भारत के पहाड़ी हिस्सों में होती है।

सेरवा † (1)
संज्ञा पुं. [ सं. शणपट ] वह कपड़ा जिससे हवा करके अत्र बरसाते समय भूसा उड़ाया जाता है। झुली। परती।

सेरवा † (2)
संज्ञा पुं. [ हि. सिर ] चारपाई की वे पाटियाँ जो सिरहाने की ओर रहती हैं।

सेरवा (3)
संज्ञा पुं. [ हि. सेराना (=ठंढा करना, शांत करना) दीवाली के प्रातःकाल 'दरिद्दर'(दरिद्रता) भगाने की रस्म जो सूप बजाकर की जाती है।

सेरवाना †
क्रि. सं. [ हि. सेराना ] दे. 'सेराना2'। उ.—उसी कजरहिया पोखरे पर जातीं,नहातीं और जयी (जई) सेरवातीं, अर्थात् पानी में छोड़ देती है। — प्रेमधन., भा. 2, पृ.329।

सेरसाहि
संज्ञा पुं. [ फ़ा. शेरशाह ] दिल्ली का बादशाह शेरशाह। उ.— सेरसाहि देहली सुलतानु। — जायसी (शब्द.)।

सेरही
संज्ञा स्त्री. [ हि. सेर ] एक प्रकार का कर या लगान जो किसान को फसल की उपज के अपने हिस्से पर देना पड़ता है।

सेरा (1)
संज्ञा पुं. [ हिं. सिर ] चारपाई की वे पाटियाँ जो सिरहाने की ओर रहती हैं।

सेरा (2)
संज्ञा पुं. [ फा़. सेराज] आबापाशी की हुई जमीन। सींची हुई जमीन।

सेरा † (3)
संज्ञा पुं. [ अ. सल, लश. सेढ़ ] दे. 'सेढ़'।

सेराना पु (१)
क्रि० अ० [सं० शीतल, प्रा० सीअड़, हिं० सीयर सीरा] १. ठंढा होना। शीतल होना। उ०—नैन सेराने, भूखि गइ, देखे दरस तुम्हार।—जायसी (शब्द०)। २. तृप्त होना। तुष्ट होना। ३. जीवित न रहना। जीवन समाप्त होना। ४. समाप्त होना। खतम होना। उ०—उठयौ अखारा नृत्य सेराना। अपने गृह सुर कियो पयाना।—सबल (शब्द०)। ५. चुकना। तै करना। करने को न रह जाना। उ०—पंथी कहाँ कहाँ सुसताई। पंथ चलै तब पंथ सेराई।—जायसी (शब्द०)।

सेराना (२)
क्रि० सं० १. ठंढ़ा करना। शीतल करना। २. मूर्ति, प्रतीक आदि जल में प्रवाहित करना या भूमि में गाड़ना। जैसे,— ताजिया सेराना।

सेराब
वि० [फ़ा०] १. पानी से भरा हुआ। २. सींचा हुआ। तराबोर। क्रि० प्र०—होना। यौ०—सेराब हासिल = जरखेज। उपजाऊ। लाभकर।

सेराबी
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] १. भराव। सिंचाई। २. तरी।

सेराल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] हलका पीलापन।

सेराल (२)
वि० हल्का पीला। पीताभ।

सेराह
संज्ञा पुं० [सं०] दूध के समान सफेद रंग का घोड़ा। दुग्ध वर्ण का अश्व।

सेरी पु (१)
संज्ञा स्त्री० [देशी] रथ्या। वीथी। तंग गली। उ०—(क) ढोलउ नरवर सेरियाँ धण पूगल गलियाँह।—ढोला०, दू० १८९। (ख) सेरी कबीर साँकड़ी चंचल मनवाँ चोर।—कबीर ग्रे०, पृ० २२७।

सेरी † (२)
संज्ञा स्त्री० [श्रेणी, सेणी, सेढि, सेढी, हि० सीढी़] दे० 'सीढ़ी'। उ०—बाह्म लक्ष्य और बहुतेरी। सो जानै जो पावै सेरी।—सूंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० १०५।

सेरी (३)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] १. तृप्ति। संतोष। २. मन भरना। अघाने का भाव। ३. ऊबने की स्थिति या भाव। ऊब।

सेरीना
संज्ञा स्त्री० [हि० सेर] अनाज या चारे का वह हिस्सा जो असामी जमींदार को देता है।

सेरु
वि० [सं०] बाँधनेवाला। जकड़नेवाला।

सेरुआ (१)
संज्ञा पुं० [सं० सेर (= एक तौल) + हि० उवा (प्रत्य०)] वैश्य। (सुनार)।

सेरुआ (२)
संज्ञा पुं० [देशज] दे० 'सेरवा'।

सेरुराह
संज्ञा पुं० [सं०] वह सफेद घोड़ा जिसके माथे पर दाग हो।

सेरुवा
संज्ञा पुं० [सं० स्वैर, प्रा० सेर (= स्वतंत्र)] १. स्वेच्छाचारी। स्वैराचारी। २. मुजरा सुननेवाला या वेश्यागामी। (वेश्या)।

सेरु †
संज्ञा पुं० [सं० शेलु] लिसोड़े का पेड़ा। लमेड़ा।

सेर्ष्य
वि० [सं०] १. ईर्ष्यायुक्त। ईर्ष्यालु। डाह करनेवाला। २. ईर्ष्या- पूर्वक (को०)।

सेल
संज्ञा पुं० [सं० शल्य, प्रा० सेल अथवा देश० सेल्ल]बरछा। भाला। साँग। उ०—(क) बरसहिं बान सेल घनघोरा। —जायसी। (शब्द०)। (ख) देखि ज्वालाजाल हाहाकार दसकंध सुनि, कह्नो धरो धरो धाए वीर बलवान हैं। लिए सूल सेल पास परिध प्रचंड दंड, भाजन सनीर धीर धरे धनुबान हैं।— तुलसी (शब्द०)। विशेष—यद्यपि यह शब्द कादंबरी में आया है, तथापि प्राकृत ही जान पड़ता है, संस्कृत नहीं।

सेल (२)
संज्ञा स्त्री० [देशी० सेल्लि (=रज्जु)] बद्धी। माला। उ०— साँपों की सेल पहने मुंडमाल गले में डाले ....... कहने लगे।—लल्लू (शब्द०)।

सेल † (३)
संज्ञा पुं० [देश०] नाव से पानी उलीचने का काठ का बरतन।

सेल (४)
संज्ञा पुं० [सं० सिलना (=एक पौधा जिसके रेशों से रस्से बनते थे) अथवा देशी सेल्लि (=रज्जु)] १. एक प्रकार का सन का रस्सा जो पहाड़ों में पुल बनाने के काम में आता है। २. हल में लगी हुई वह नली जिसमें से होकर कूँड में का बीज जमीन पर गिरता है।

सेल (५)
संज्ञा पुं० [अं० शेल] तप का वह गोला जिसमें गोलियाँ आदि भरी रहती हैं। (फौज)। यौ०—सेल का गोला।

सेलखड़ी
संज्ञा स्त्री० [देश० सेटिका] दे० 'सिलखड़ी', 'खडि़या'। उ०—मूर्ति बनाने के लिये सेलखड़ी लाई जाती थी।—हिंदु० सभ्यता, पृ० १९।

सेलग
संज्ञा पुं० [सं०] लुटेरा। डाकू।

सेलना †
क्रि० अ० [सं० शेल, सेल (=जाना)] मर जाना। चल बसना। जैसे,—वह सेल गया। (बाजारु)।

सेला (१)
संज्ञा पुं० [सं० शल्लक, शल्क (=छिलका, मछली का सेहरा)] १. रेशमी चादर या दुपट्टा। २. साफा। रेशमी शिरोबंध। उ०—कौऊ कुंद बेला भूखन नवेला धरै कोऊ पाग सेला कोऊ सजै साज छेला सो।—गोपाल (शब्द०)।

सेला (२)
संज्ञा पुं० [सं० शालि] वह धान जो भूसी छाँटने के पहले कुछ उबाल लिया गया हो। भुँजिया धान।

सेलान पु
वि० [हिं० सैल (=घूमना); अथवा सं० शैल, प्रा० सेल, सेल्ल] १. घुमक्कड़। स्वच्छंदी। मनमौजी। २. ठिकाना। टिकान। उ०—आँखों में दीखै नहीं, शब्द न पावै जान। मन बुध तहाँ पहुँचै नहीं, कौन कहै सेलान।—दरिया० बानी, पृ० २२।

सेलानी पु
वि० [हि० सैलानी] दे० 'सैलानी'। उ०—मन तूँ निपट भयो सेलानी। तै संत सीख नहीं मानी।—राम० धर्म०, पृ० ४३

सेलार पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० सेराल (=हलका पीला)] अश्व की एक उत्तम जाति। उ०—मुलताणी धर मन बसी सुहँगा नई सेला। हिरणाखी हसि नई कहई आँणउ हेडि तुखार।— ढोला०, दू० २२६।

सेलार (२)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का छंदबंध या गीत।—रघु० रु०, पृ० १३४।

सेलिया
संज्ञा पुं० [देश०] घोड़े की एक जाति। उ०—सिरगा समैदा स्याह सेलिया सूर सुरंगा। मुसकी पँचकल्यान कुमेदा केहरि रँगा।—सुजान०, पृ० ८।

सेलिया (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] बिल्ली।

सेलिस
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का सफेद हिरन।

सेलि पु
संज्ञा स्त्री० [हि० सेल] छोटा भाला। दे० 'सेली'। उ०— लहलहे जोबन लुहारिनि लुहारी मैं ही सारसी लहलहाति लोहसार सेलि सी। भृकुटी कमान खरी देव दृगन बान भरी जोबन की सान धरी धार विष मेलि सी।—देव (शब्द०)।

सेली (१)
संज्ञा स्त्री० [हि० सेल + हिं० ई (प्रत्य०)] छोटा भाला। बरछी। उ०—सेलियाँ बाँकियाँ देख अवधूत की जीवत मरै सोइ ठोड़ पावै।—राम० धर्मं०, पृ० ३८३।

सेली (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० शूल, हिं० सूली] दे० 'सूली'। उ०—उठे कबीर करम किया, बरसे फूल अकास। गरीबदास सेली चले, चाँवर करे रेदास।—कबीर ग्रं०, पृ० १२१।

सेली (३)
संज्ञा स्त्री० [हि० सेला] १. छोटा दुपट्टा। उ०—मंगलदास रहे गुरुभाई। टोपी सेली तेहि पहिराई।—घट, पृ० १९२। २. गाँती। ३. सूत, ऊन, रेशम या बालों की बद्धी या माला जिसे योगी यती गले में डालते या सिर में लपेटते हैं। उ०— सीस सेली केस, मुद्रा कनक बीरी वीर। बिरह भस्म चढ़ाइ बैठी, सहज कंथा चीर।—सूर (शब्द०)। ४. स्त्रियों का एक गहना। उ०—मनि इंद्रनील सु पद्मराग कृत सेली भली।—रघुराज (शब्द०)।

सेली (४)
संज्ञा स्त्री० [सं० शाल्क (=मछली का सेहरा)] एक प्रकार की मछली।

सेली (५)
संज्ञा स्त्री० [देश०] दक्षिण भारत का एक छोटा पेड़ जिसकी लकड़ी कड़ी और मजबूत होती है और खेती के औजार बनाने के काम में आती है।

सेलु
संज्ञा पुं० [सं०] १. लिसोड़ा। श्लेष्मांतक। लमेड़ा। सेरु। २. एक संख्या (बौद्ध)।

सेलून
संज्ञा पुं० [अ०] १. जहाज का प्रधान कमरा। २. बढ़िया कमरे के समान सजा हुआ रेल का बड़ा लंबा डब्बा जिसमें अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्ति और बड़े बड़े अफसर सफर करते हैं। ३. सार्वजनिक आमोद प्रमोद का स्थान। ४. अँगरेजी ढंग के बाल बनानेवाले हज्जामों की दुकान। ५. जलपान का स्थान ६. वह स्थान जहाँ अँगरेजी शराब बिकती है। ७. जगह। (लश०)।

सेलो †
संज्ञा पुं० [देश०] सायादार जमीन।

सेल्ल
संज्ञा पुं० [सं० शल्य या शल] दे० 'सेल्ला'; 'सेल्हा'।—वर्ण०, पृ० ३।

सेल्ला
संज्ञा पुं० [सं० शल्य या शल] एक प्रकार का अस्त्र। भाला। सेल।

सेल्ह
संज्ञा पुं० [सं० शल्य या शल] दे० 'सेल'। उ०—गोलिन तीरन की झर लाई। मची सेल्ह समसेरन घाई। त्यौं लच्छे रावत प्रभु आगै। सेल्हन मार करी रिस पागै।—लाल कवि (शब्द०)।

सेल्हना †
क्रि० अ० [हि० सेलना] मर जाना। जीवित न रहना। (बोल०)।

सेल्हर †
संज्ञा पुं० [सं० शल्क, हिं० सरहना, सेहरा] मछलियों के ऊपर की पर्त। सेहरा। चोंई। उ०—सेल्हरों की परों की थीं गड्डियाँ।—कुकुर०, पृ० १५७।

सेल्हा (१)
संज्ञा पुं० [सं० शालि] एक प्रकार का अगहनी धान जिसका चावल बहुत दिनों तक रह सकता है।

सेल्हा (२)
संज्ञा पुं० [ हिं० सेला] दे० 'सेली'।

सेल्ही
संज्ञा स्त्री० [हि० सेला, सेल्हा] १. छोटा दुपट्टा। २. गाँती। ३. रेशम, सूत बाल आदि की बद्धी या माला। उ०—औझरी की झोरी काँधे, आँतनि की सेल्ही बाँधे, मूँड़ के कमंडल, खपर किए कोरि कै। जोगिनी झुटुंग झुंड झुंड बनी तापसी सी तीर तीर बैठीं सो समर सरि खोरि कैं।—तुलसी (शब्द०)। दे० 'सेली' (३)।

सेव
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का ऊँचा पेड़ जिसकी लकड़ी कुछ पीलापन या ललाई लिए सफेद रंग की, नरम, चिकनी, चमकीली और मजबूत होती है। कुमार। विशेष—इसकी आलमारी, मेज, कुरसी और आरायशी चीजें बनती हैं। बरमा में इसपर खुदाई का काम अच्छा होता है। इसकी छाल और जड़ औषध के काम आती है और फल खाया जाता है। इसकी कलम लगती है और बीज भी बोया जाता है। यह वृक्ष पहाड़ों पर तीन हजार फुट की ऊँचाई तक मिलता है। यह बरमा, आसाम, अवध, बरार और मध्य प्रांत में बहुत होता है।

सेवँई (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० सेविका] गुँधे हुए मैदे के सूत के लच्छे जो घी में तलकर और दूध में पकाकर खाए जाते हैं।

सेवँई (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० श्यामक, हिं० सावाँ] एक प्रकार की लंबी घास जिसमें सावें की सी बालें लगती हैं जो चारे के काम में आती हैं।

सेवँढ़ी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का धान जो उत्तर प्रदेश में होता है।

सेवंत
संज्ञा पुं० [सं० सामन्त] एक राग जो हनुमतं के अनुसार मेघ राग का पुत्र है।

सेवँर पु †
संज्ञा पुं० [सं० शिम्बल, हिं० सेमल] दे० 'सेमल'। उ०—राजै कहा सत्य कहु सूआ। बिनु सत जस सेंवँर कर भूआ।—जायसी (शब्द्०)।

सेव (१)
संज्ञा पुं० [सं० सेविका] सूत या डोरी के रुप में बेसन का एक पकवान। विशेष—गुँधे हुए बेसन को छेददार चौकी या झरने में दबाते हैं। जिससे उसके तार से बनकर खौलते घी या तेल की कढ़ाई में गिरते और पकते जाते हैं। यह अधिकतर नमकीन होता है। पर गुड़ में पागकर मीठे सेव भी बनाते हैं।

सेव पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० सेवा] दे० 'सेवा' उ०—करै जो सेव तुम्हारी सो सेइ भो विष्णु, शिव, ब्रह्म मम रुप सारे।—सुर (शब्द०)।

सेव (३)
संज्ञा पुं० [सं० सेव, सेवि, मि० फ़ा० सेब] दे० 'सेब'। उ०— कहुँ दारब दाड़िम सेव कटहल तूत अरु जंभीर हैं।—भूषण ग्रं०, पृ० १५।

सेव (४)
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सेवन' [को०]।

सेवक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० सेविका, सेवकनी, सेवकिन, सेवकिनी] १. सेवा करनेवाला। खिदमत करनेवाला। भृत्य। परिचारक। नौकर। चाकर। उ०—(क) मंत्री, भृत्य, सखा मों सेवक याते कहत सुजान।—सूर (शब्द)। (ख) सिसुपन तें पितु, मातु, बंधु, गुरु, सेवक, सचिव सखाऊ। कहत राम बिधु बदन रिसौहैं सपनेहु लखेउ न काउ।—तुलसी (शब्द०)। (ग) ब्याहि कै आई है जा दिन सों रवि ता दिन सों लखी छाँह न वाकी। हैं गुरु लोग सुखी रघुनाथ, निहालन हैं सेवकनी सुखदा की।— रघुनाथ (शब्द०)। (घ) उन्होंने क्षीरोद नामक एक सेवकिन से कहवा भेजा।—गदाधरसिंह (शब्द०)। (च) अष्टसिद्धि नवनिद्धि देहुँ मथुरा घर घर को। रमा सेवकिनी देहुँ करि कर जोरै दिन जाम।—सुर (शब्द०)। २. भक्त। आराधक। उपासक। पूजा करनेवाला। जैसे,—देवी का सेवक। उ०— मानिए कहै जो वारिधार पर दवारि औ अँगार बरसाइबो बतावै बारि दिन को। मानिए अनेक विपरीत की प्रतीति, पैन भीति आई मानिए भवानी सेवकन को।—चरणचंद्रिका (शब्द०)। ३. व्यवहार करनेवाला। काम में लानेवाला। इस्तेमाल करनेवाला। जैसे,—मद्यसेवक। ४. पड़ा रहनेवाला। छोड़कर कहीं न जानेवाला। वास करनेवाला। जैसे,—तीर्थसेवक। ५. सीनेवाला। दरजी। ६. बोरा।

सेवक (२)
वि० १. सेवा करनेवाला। संमान करनेवाला। २. अभ्यास या अनुगमन करनेवाला। ३. परतंत्र। आश्रित (को०)।

सेवकाई
संज्ञा स्त्री०[सं० सेवक + आई (प्रत्य०)] सेवक का काम। सेवा। टहल। खिदमत। उ०—(क) करि पूजा सब विधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई।—तुलसी (शब्द०)। (ख) नाना भाँति करहु सेवकाई। अस कहि अग्र चले जदुराई।—सबलसिंह (शब्द०)।

सेवकालु
संज्ञा पुं० [सं०] दुग्धपेया नामक पौधा। निशाभंग।

सेवकी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सेवक + ई (प्रत्य०)] १. सेवावृत्ति। सेवकता। सेवक धर्म। उ०—ताके पास तीन तूँबा, काँधे पर तो खासा कौ, पीछे पीठ पर तो मर्यादी सेवकी कौ, आगे कटि पर बाहिर कौ, या भाँति सों रहै आवें।—दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ४३। २. दासी। सेविका। टहलुई। उ०—(क) दायज बसन मनि धेनु धन हय गय सुसेवक सेवकी।—तुलसी (शब्द०)। (ख) सेवकी सदा की वारबधू दस बीस आई ए हो रघुनाथ छकीं बारूनी अमल सों।—रघुनाथ (शब्द०)।

सवेग पु
संज्ञा पुं०[सं० सेवक] दे० 'सेवक'। उ०—यह विचारि सिव कैं मंदिर गए और आप एक सेवग कनै राखि सिव को षोड़स प्रकार पूजन करयौ।—ह० रासो०, पृ० १६१।

सेवड़ा (१)
संज्ञा पुं० [सं० श्वेतपट, प्रा० सेअवड़, सेवड़, अथवा सं० श्वेताम्बर प्रा० सेअंबर, सेँबर, सेवरा, सेवड़ा] १. जैन साधुओं का एक भेद। उ०—श्री शंकराचार्य जी ने उस काम कौतुक बाद को इस ढंग से समझ के कुबादी सेवड़ों को बाद में परास्त किया।—भक्तमाल, पृ० ४६७। २. एक ग्राम देवता।

सेवड़ा (२)
संज्ञा पुं० [हिं सेव + ड़ा (प्रत्य०)] मैदे का एक प्रकार का मोटा सेव या पकावान जो खस्ता और मुलायम होता है।

सेवति पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० स्वाति, सेवाति] दे० 'स्वाति' (नक्षत्र)। उ०—शशिहिं चकोर रविहिं अरविंदा। पपिहा कों सेवति कर विंदा।—गोपाल (शब्द०)।

सेवती
संज्ञा स्त्री० [सं०] गुलाब का एक भेद जिसके फूल सफेद रंग के होते हैं। सफेद गुलाब। चैती गुलाब। विशेष—वैद्यक में यह शीतल, तिक्त, कटु लघु, ग्राहक, पाचक, वर्णप्रसाधक, त्रिदोषनाशक तथा वीर्यवर्धक कही गई है। पर्या०—शतपत्नी। सेमंती। कर्णिका। चारुकेशा। महाकुमारी। गं धाटया। लक्षपुष्पा। अतिमंजुला।

सेवधि
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'शेवधि'।

सेवन (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० सेवनीय, सेवित, सेव्य, सेवितव्य] १. परिचर्या। खिदमत। २. उपासना। आराधना। पूजन। ३. प्रयोग। उपयोग। नियमित व्यवहार। इस्तेमाल। जैसे,— सुरासेवन; औषधसेवन। ४. छोड़कर न जाना। वास करना। लगातार रहना। जैसे,—तीर्थसेवन; गंगा-तट-सेवन। ५. संयोग। उपभोग। जैसे,—स्त्रीसेवन। ६. सीना। गूंथना। ७. बोरा। ८. बाँधने की क्रिया। बाँधना (को०)। ९. दूर दूर पर सीना या टाँके लगाना (को०)।

सेवन † (२)
संज्ञा पुं० [हिं सावाँ] सावाँ की तरह की एक घास जो चारे के काम में आती है और जिसके महीन दाने बाजर में मिलाकर मरूस्थल में खाए भी जाते हैं। सेवँई। सवँई।

सेवना पु † (१)
क्रि० स० [सं० सेव + हिं ना (प्रत्य०)] दे 'सेना'। उ०—हम सेवत वारी वागसर सरिता वापि कूपतट। खोवत हैं यौं ही आपु कौ भए निपट ही निघरघट।—ब्रज० ग्रं०, पृ० १२५।

सेवना (२)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'सेवन' [को०]।

सेवनी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सूई। सूची। सिवनी। २. सीवन। जोड़ा। टाँका। संधिस्थान। ३. शरीर के वे अंग जहाँ सीवन सी दिखाई देती हो। (ऐसे स्थान सात हैं पाँच मस्तक में), एक जीभ में और र्लिग में एक। ४. जुही। जूही।

सेवनी पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० सेविन्, सेविनी] दासी। उ०—निज सेविनी पहिचानी कै वहई अनुग्रह आनिहै। करिहैं पवित्र चरित्र मेरी जीभ अवगुण बानि है।—गुमान (शब्द०)।

सेवनी (३)
संज्ञा पुं० [सं० सेवनिन्] खेत जोतनेवाला। हलवाहा [को०]।

सेवनाय
वि० [सं०] १. सेवा योग्य। २. पूजा के योग्य। ३. व्यवहार करने या रखने योग्य। ४. सीने योग्य।

सेवर (१)
संज्ञा पुं० [सं० शबर] दे० 'शबर'। उ०—हरिजू तिनको दुखित देख। कियो तुरत सेवरि को भेष।—(शब्द०)।

सेवर पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० शिम्बल] दे० 'सेमल'।

सेवर (३)
वि० [देशी] जो कम पका हुआ हो। जो पूरी तौर से पका हुआ न हो (बोल०)।

सेवरा पु †
संज्ञा पुं० [ हिं० सेवड़ा] दे० 'सेवड़ाँ'। उ०—सेवरा, खेवरा, वानपरस्ती, सिध साधक अवधूत। आसन मारे बैठ सब जारि आतमा भूत।—जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३०।

सेवरी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शवरी] दे० 'शवरी'। उ०—बहुरि कबंधहि निरखि प्रभु गीध कीन्ह उद्धार। सेवरी भवन प्रवेश करि पंपासरहि निहार।—रामाश्वमेध (शब्द०)।

सेवल
संज्ञा पुं० [देश०] ब्याह की एक रस्म। विशेष—इसमें वर की कोई सधवा आत्मीया वर के हाथ में पीतल की एक थाली देती है जिसपर एक दिया रहता है; अनंतर उसके दुपट्टे के दोनों छोर पकड़कर पहले उस थाली से वर का माथा और फिर अपना माथा छूती है।

सेवांजलि
संज्ञा स्त्री० [सं० सेवाञ्जलि] १. भक्त या सेवक का दोनों हथेलियों के जुड़े हुए संपुट में स्वामी या उपास्य को कुछ अर्पण। २. सेवाभाव को व्यक्त करने की अंजलि या संपुट।

सेवा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दूसरे को आराम पहुँचाने की क्रिया। खिदमत। टहल। परिचर्या। जैसे—हमारी बीमारी में इसने बड़ी सेवा की। यौ०—सेवा शुश्रुषा। सेवा टहल। २. दूसरे का काम करना। नौकरी। चाकरी। विशेष—राज्य की सेवा के अतिरिक्त और प्रकार की सेवावृत्ति अधम कही गई है। ३. आराधना। उपासना। पूजा । जैसे—ठाकुर जी की सेवा। मुहा०—सेवा में = पास। समीप। सामने। जैसे—(क) मैं कल आपकी सेवा में उपस्थित हूँगा। (ख) मैंने आपकी सेवा में एक पत्र भेजा था। (आदरार्थ प्रायः बड़ों के लिये)। ४. आश्रय। शरण। जैसे,—आप मुझे अपनी सेवा में ले लेते तो बहुत अच्छा था। ५. रक्षा। हिफाजत जैसे,—(क) सेवा बिना ये पौधे सूख गए। (ख) वे अपने शरीर की बड़ी सेवा करते हैं। उ०—वे अपने बालों की बड़ी सेवा करती हैं।—महावीर- प्रसाद द्विवेदी (शब्द०)। ६. संप्रयोग। संभोग। मैथुन। जैसे,—स्त्रीसेवा। ७. प्रयोग। व्यवहार (को०)। ८. लगाव। आसक्ति (को०)। ९. चापलूसी। चाटु (को०)। क्रि० प्र०—करना।—होना।

सेवाकाकु
संज्ञा स्त्री० [सं०] सेवाकाल में स्वरपरिवर्तन या आवाज बदलना, (अर्थात् कभी जोर से बोलना, कभी मुलायमियत से, कभी क्रोध से और कभी दुःख भाव से)।

सेवाजन
संज्ञा पुं० [सं०] नौकर। सेवक। दास।

सेवाटहल
संज्ञा [सं० सेवा + हि० टहल] परिचर्या। खिदमत। सेवा- शुश्रूषा। उ०—इस प्रकार पिता का उपदेश सुन, वह बड़- भागिन सप्रेम सेवाटहल दिन रात करने लगी।—भक्तमाल, पृ० ४७०। क्रि० प्र०—करना। होना।

सेवाती
संज्ञा स्त्री० [सं० स्वाति] दे० 'स्वाति'। उ०—(क) रातुरंग जिमि दीपक बाती। नैन लाउ होइ सीप सेवाती।—जायसी (शब्द०)। (ख) नयन लागु तेहिं मारग पदुमावति जेहि दीप। जइस सेवातिहि सेवई बन चातक जल सीप।—जायसी (शब्द०)।

सेवादक्ष
वि० [सं०] जो परिचर्या के काम में कुशल हो [को०]।

सेवाधर्म
संज्ञा पुं० [सं०] सेवक का धर्म या कर्तव्य।

सेवाधारी
संज्ञा पुं० [सं० सेवा + धारिन्] वह जो किसी मंदिर में ठाकुर जी या मूर्ति की पूजा सेवा करता हो। पुजारी। (साधुओं की परि०)।

सेवापन
संज्ञा पुं० [सं० सेवा + हिं० पन (प्रत्य०)] दासत्व। सेवावृत्ति। नौकरी। टहल।

सेवाबंदगी
संज्ञा स्त्री० [सं० सेवा, फा़० बंदगी] । आराधना। पूजा। उ०—यह मसीति यह देवहरा सतगुरु दिया दिखाइ। भीतर सेवाबंदगी बाहर काहे जाइ।—दादू (शब्द०)।

सेवाभिरत
वि० [सं०] १. सेवाकार्य में रत या लीन। २. सेवा में आनंद प्राप्त करने या माननेवाला [को०]।

सेवाभृत्
वि० [सं०] सेवा करता हुआ। सेवाकार्य में संलग्न [को०]।

सेवाय (१)
वि० [ अ० सिवा] अधिक। ज्यादा।

सेवाय (२)
अव्य० दे० 'सिवा'; 'सिवाय'।

सेवार
संज्ञा स्त्री० [सं० शैवाल] १. बालों के लच्छों की तरह पानी में फैलनेवाली एक घास। उ०—(क) संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न विषय कथा रस नाना।—तुलसी (शब्द०)। (ख) राम और जादवन सुभट ताके हते रुधिर की नहर सरिता बहाई। सुभट मनो मकर अरु केस सेवार ज्यों, धनुष त्वच चर्म कूरम बनाई।—सूर (शब्द०)। विशेष—यह अत्यंत निम्न कोटि का उद्भिद् है, जिसमें जड़ आदि अलग नहीं होती। यह तृण नदियों और तालों में होता है और चीनी साफ करने तथा औषध के काम में आता है। वैद्यक में सेवार कसैली, कड़वी, मधुर, शीतल, हलकी, स्निग्ध, दस्तावर, नमकीन, घाव भरनेवाली तथा त्रिदोषनाशक बताई गई है। २. मिट्टी की तहें जो किसी नदी के आसपास जमी हों।

सेवार (२)
संज्ञा पुं० [फ़ा० सेह (=तीन)] पान। (सुनार)।

सेवारा
संज्ञा पुं० [ हि० सेवरा] दे० 'सेवड़ा (१)'।

सेवाल
संज्ञा स्त्री० [सं० शैवाल] दे० 'सेवार'। उ०—दूब वंश कुव- लय नलिन अनिल व्योम तृणवाल। मरकत मणि हय सूर के नील वर्ण सेवाल।—केशव (शब्द०)।

सेवावलंब
वि० [सं० सेवावलम्ब] सेवा या परिचर्या निर्भर रहनेवाला [को०]।

सेवाविलासिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सेवा करनेवाली। सेवकिनी। दासी। टहलुई [को०]।

सेवावृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] नौकरी। दासत्व। चाकरी की जीविका।

सेवाव्यवहार
संज्ञा पुं० [सं०] सेवा या परिचर्या का काम [को०]।

सेविंग बैंक
संज्ञा पुं० [अं० सेविंग्स बैंक] वह बैंक जो छोटी छोटी रकमें ब्याज पर ले। विशेष—ऐसे बैंक डाकखानों में भी होते हैं जहाँ गरीब और मध्य़ वित्त के लोग अपनी बचत के लिये रुपए जमा करते हैं।

सेवि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बदर फल। बेर। २. सेब (इस अर्थ में पीछे प्रयुक्त हुआ है)।

सेवि (२)
संज्ञा पुं० 'सेवी' का वह रुप जो समास में होता है।

सेवि पु (३)
वि० [सं० सेव्य] दे० 'सेव्य'; 'सेवित'। उ०—जय जय जगजननि देवि, सुरनर मुनि असुर सेवि, भुक्ति मुक्तिदायिनि दुःखहरन कालिका।—तुलसी (शब्द०)।

सेविका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सेवा करनेवाली। दासी। परिचारिका। नौकरानी। २. सेवँई नामक पकवान।

सेवित (१)
वि० [सं०] १. जिसकी सेवा टहल की गई हो। वरिवस्थित। उपचरित। २. जिसकी पूजा की गई हो। पूजित। उपासित। आराधित। उ०—जटाजूट रवि कोटि समाना। मुनिगन सेवित ज्ञान निधाना।—गिरिधरदास (शब्द०)। ३. जिसका प्रयोग या व्यवहार किया गया हो। व्यबह्रत। ४. आश्रित। ५. युक्त या संपन्न (को०)। ६. उपभोग किया हुआ। उपभुक्त।

सेवित (२)
संज्ञा पुं० १. बदर फल। बेर। २. सेब।

सेवितमन्मथ
वि० [सं०] प्रेमासक्त। कामुक [को०]।

सेवितव्य
वि० [सं०] १. सेवा के योग्य। उपासना के योग्य। सेवनीय। उपत्सनीय। २. आश्रय के योग्य। आश्रयणीय। ३. सीने के योग्य। ४. प्रयोग या व्यवहार के योग्य।

सेविता (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सेवक का कर्म। सेवा। दासवृत्ति। चाकरी। २. उपासना। ३. —आश्रय। सहारा। शरण।

सेविता (२)
संज्ञा पुं० [सं० सेवितृ] सेवा करनेवाला। सेवक।

सेविता (३)
वि० १. अनुगमन अथवा अनुसरण करनेवाला। २. पूजा या आराधना करनेवाला (को०)।

सेवी
वि० [सं० सेविन्] १. सेवा करनेवाला। सेवारत। २. पूजा करनेवाला। आराधना करनेवाला। पूजक। आराधक। ३. संभोग करनेवाला। मैथुन करनेवाला। ३. आदी। व्यसनी (को०)। विशेष—इस शब्द का प्रयोग प्रायः यौगिक शब्द के अंत में हुआ करता है। जैसे,—साहित्यसेवी, स्वदेशसेवी, चरणसेवी, स्त्रीसेवी।

सेवुम (१)
वि० [फ़ा०] तीसरा, तृतीय [को०]।

सेवम (२)
संज्ञा पुं० मृतक का तीसरा दिन। तीजा [को०]।

सेव्य
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सेव्या] १. सेवा के योग्य। जिसकी सेवा करनाउचित हो। खिदमत के लायक। जैसे,—गुरु, स्वामी, पिता। उ०—नाते सबै राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं।— तुलसी (शब्द०)। २. जिसकी सेवा करनी हो या जिनकी सेवा की जाय। जैसे,—वे तो हर प्रकार से हमारे सेव्य हैं। ३. पूजा के योग्य। आराधना योग्य। जिसकी पूजा या उपा- सना कर्तव्य हो। जैसे,—ईश्वर। ४. व्यवहार योग्य। काम में लाने लायक। इस्तेमाल करने लायक। ५. रक्षण करने के योग्य। जिसकी हिफाजत मुनासिब हो। ६. संभोग के योग्य। ७. अध्ययन मनन के योग्य (को०)। ८. संचय करने या रखने के योग्य (को०)।

सेव्य (२)
संज्ञा पुं० १. स्वामी। मालिक। यौ०—सेव्यसेवक। २. खस। उशीर। ३. अश्वत्थ। पीपल का पेड़। ४. हिज्जल वृक्ष। ५. लामज्जक तृण। लामज घास। ६. गौरैया नामक पक्षी। चटक पक्षी। ७. एक प्रकार का मद्य। ८. सुगंधवाला। ९. लाल चंदन। १०. समुद्री नमक। ११. दही का थक्का। १२. जल। पानी।

सेव्यसेवक
संज्ञा पुं० [सं०] स्वामी और सेवक। यौ०—सेव्य-सेवक-भाव = स्वामी और सेवक के बीच जो भाव होना चाहिए, वह भाव। उपास्य को स्वामी या मालिक के रुप में समझना। विशेष—भक्ति मार्ग में उपासना जिन जिन भावों से की जाती है, यह उनमें से एक है। इसे सेवक-सेव्य-भाव के रुप में भी प्रयुक्त किया गया है। जैसे, —सेवक-सेव्य-भाव बिनु भव न तरिय उरगारि।—मानस।

सेव्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बंदा या बाँदा नामक पौधा जो दूसरे पेड़ों के ऊपर उगता है। बंदाक। २. आँवला। आमलकी। ३. एक प्रकार का जंगली अनाज या धान।

सेशन
संज्ञा पुं० [अं०] १. न्यायालय, पार्लमेंट, व्यवस्थापिका सभा आदि संस्थाओं का एक बार निरंतर कुछ दिनों तक होनेवाला अधिवेशन। लगातार कुछ दिन चलनेवाली बैठक। जैसे,— (क) हाईकोर्ट का सेशन शुरु हो गया। (ख) पार्लमेंट का सेशन अक्टूबर में शुरु होगा। मुहा०—सेशन सुपुर्द करना = दौरा सुपुर्द करना। (आसामी या मुकदमे को) विचार या फैसले के लिये सेशन जज के पास भेजना, (डाकेजनी, खून आदि के मामले सेशन जज के पास भेजे जाते हैं)। सेशन सुपुर्द होना = दौरा सुपुर्द होना। सेशन जज के पास विचारार्थ भेजा जाना। २. स्कूल या कालेज की एक साथ निरंतर कुछ दिनों तक होनेवाली पढ़ाई। जैसे,—कालेज का सेशन जुलाई से शुरु होगा। ३. दौरा अदालत।

सेशन कोर्ट
संज्ञा पुं० [अं०] जिले की वह बड़ी अदालत जहाँ जूरी या अफसरों की सहायता से डाकेजनी, खून आदि फौजदारी के बड़े मामलों पर विचार होता है। दौरा अदालत।

सेशन जज
संज्ञा पुं० [अं०] वह जज जो खून आदि के बड़े बड़े मामलों का फैसला करता है। दौर जज।

सेशुम
वि० [फ़ा०] छठा। उ०—सेशुम रात को शहर देखा अजब। मकानदार वहाँ के है बीमार सब।—दक्खिनी०, पृ० ३०१।

सेश्वर
वि० [सं०] १. ईश्वरयुक्त। २. जिसमें ईश्वर की सत्ता मानी गई हो। जैसे,—न्याय और योग सेश्वर दर्शन हैं।

सेष पुं० (१)
संज्ञा पुं० [सं० शेष] दे० 'शेष'—८। उ०—तपबल संभु करहिं संहारा। तपबल शेष धरइ महि भारा।—तुलसी (शब्द०)।

सेष (२)
संज्ञा पुं० [अ० शैख़] दे० 'शोख'। उ०—भूला जोगी और सेष औलिया मुनि जन कोटि अठासी।—रामानंद०, पृ० ३५।

सेषु
वि० [सं०] इषुयुक्त। वाणायुक्त [को०]।

सेषुक
वि० [सं०] इषु सहित। वाणयुक्त [को०]।

सेस पुं (१)
संज्ञा पुं० वि० [सं० शेष, प्रा० सेस] दे० 'शेष'। उ०— (क) सेस छबीहि न कहि सकै अगम कवीहि सुधीर। स्याम सबीहि बिलोकि कै बाम भई तसबीर।—शृंगार सतसई (शब्द०)। (ख) तबहिं सेस रहि जात पार रनहि कोऊ पावत। या सों जग मैं सेस नाम सुर नर मुनि गावत।—गोपाल (शब्द०)।

सेस † (२)
संज्ञा पुं० [सं० शेष (=बचा हुआ)] सीरणी। प्रसाद। उ०— सूझ हमेस बाँटणी सेस।—बाँकी ग्रं०, भा० ३, पृ० ११०।

सेस (३)
संज्ञा पुं० [अं०] कर। टैक्स। जैसे, रोड सेस।

सेसनाग पुं० ‡
संज्ञा पुं० [सं० शेषनाग] दे० 'शेषनाग'।

सेसरँग पुं०
संज्ञा पुं० [सं० शेष + रंग] सफेद रंग। (शेष नाग का रंग श्वेत माना गया है)। उ०—गहि कर केस हमेस परहि दायक कलेस को। वेस सेसरँग वसन तेज मोहत दिनेस को।— गोपाल (शब्द०)।

सेसर
संज्ञा पुं० [फ़ा० सेह (=तीन) + सर (=बाजी)] १. ताश का एक खेल जिसमें तीन ताश हर एक आदमी को बाँटे जाते हैं और बिंदियों को जोड़कर हारजीत होती है। नौ बिंदी आने पर 'सेसर' होता है। आठवाले को दांब का दूना और नौवाले को तिगुना मिलता है। २. जालसाजी। ३. जाल। उ०—मदमाती मनोज के आसव सों, अँग जासु मनो रँग केसरि को। सहजै नथ नाक तें खोलि धरि, करयो कौन धों फंद या सेसरि की।—सूंदरीसर्वस्व (शब्द०)।

सेसरिया
वि० [हि० सेसर = इया (प्रत्य०)] छल कपट करके दूसरों का माल मारनेवाला। जालिया।

सेसी
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बहुत ऊँचा पेड़ जिसकी लकड़ी के सामान बनते हैं। पगूर। विशेष—इसकी लकड़ी भीतर से काली निकलती है। यह आसाम ओर सिलहट की पूर्वी और दक्षिणपूर्वी पहाड़ियों में बहुत होता है। लकड़ी से कई तरह की सजावट की और कीमती चीजें तैयार की जाती हैं। इसे आग में जलाने से बहुत अच्छी गंध निकलती है।

सेह (१)
संज्ञा पुं० [सं० सन्धि, हि० सेंध] दे० 'सेहा'।

सेह (२)
वि० [फ़ा०] तीन। (हिंदी में यह शब्द फारसी के कुछ यौगिक शब्दों के साथ ही मिलता है।

सेहखाना
संज्ञा पुं० [फा़० सेह (—तीन) + खाना (—घर)] तीन मंजिल का मकान। तिमंजीला मकान।

सेहत
संज्ञा स्त्री० [अ० सेह्हत] १. सुख। चैन। राहत। २. रोग से छुटकारा। रोगमुक्ति। बीमारी से आराम। क्रि० प्र०—पाना।—मिलना।—होना। यौ०—सेहतनामा (१) शुद्धिपत्र। (२) स्वास्थ्य का प्रमाणपत्र। सेहतबखश—स्वास्थ्यप्रद।

सेहतखाना
संज्ञा पुं० [अ० सेहत + फ़ा० खानह्] पेशाब आदि करने और नहाने धोने के लिये जहाज पर बनी एक छोटी सी कोठरी। (लश०)।

सेहथना †
क्रि० स० [सं० सह + हस्त = सहस्थ + हि० ना (प्रत्य०)] १. हाथ से लीपकर साफ करना। सैंतना। २. झाड़ना। बुहारना।

सेहर पु
संज्ञा पुं० [सं० शेखर, शिखर; प्रा० सेहर, सिहर] १. दे० 'शिखर'। उ०—पंथी एक सँदेसड़इ, लग ढोलइ पैंहच्वाइ। विरह बाघ बनि तनि बसइ, सेहर माजइ आइ।—ढोला०, दू० १२८। २. सेहरा। विजयमुकुट। युद्ध में जाने के पूर्व सिर में बँधी हुई पगड़ी। उ०—लरैं सिर सेहर बाँधि सजोर।—ह० रासो, पृ० ९२।

सेहरा
संज्ञा पुं० [सं० शीर्षहार, हिं० सिरहार, सिरहरा] १. फूल की या तार और गोटों की बनी मालाओं की पंक्ति या जाल जो दूल्हे के मौर के नीचे लटकता रहता हैं। उ०—तीन गुनन के सेहरा दुलह पहिरावहि हो।—धरम० श०, पृ० ४८। २. विवाह का मुकुट। मौर। उ०—(क) लटकत सिर सेहरो मनो शिखी शिखंड सुभाव।—सूर (शब्द०)। (ख) मानिक सुपन्ना पदिक मोतिन जाल सोहत सेहरा।—रघुराज (शब्द०)। क्रि० प्र०—पहिराना।—बँधना।—बाँधना। मुहा०—किसी के सिर सेहरा बँधना = किसी का कृतकार्य होना। औरों से अधिक यश या कीर्ति होना। श्रेय मिलना। सेहरा बँधाई = वह नेग जो दूल्हे को सेहरा बाँधने पर दिया जाता है। सेहरे के फूल खिलना = विवाह की अवस्था को प्राप्त होना। विवाह योग्य होना। सेहरे जलवे की = जो विधिपूर्वक ब्याह कर आई हो। (मुसल०)। ३. वे मांगलिक गीत जो विवाह के अवसर पर वर के यहाँ गाए जाते हैं।

सेहरी
संज्ञा स्त्री० [सं० शफरी] छोटी मछली। सहरी।

सेहवन
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का रोग जो गेहूँ के छोटे छोटे पौधे को होता है।

सेहहजारी
संज्ञा पुं० [फा़०] एक उपाधि जो मुसलमान बादशाहों के समय में सरदारों और दरबारियों को मिलती थी। विशेष—ऐसे लोग या तो तीन हजार सवार या सैनिक रख सकते थे या तीन हजार सैनिकों के नायक बनाए जाते थे।

सेहा
संज्ञा पुं० [सं० सन्धि, हि० सेंध] कूआँ खोदनेवाला।

सेहिथान †
संज्ञा पुं० [हि० सेहथना] वह बुहारी या कूचा जिससे खलिहान साफ किया जाता है।

सेही
संज्ञा स्त्री० [सं० सेधा, सेधी, प्रा० सेह] लोमड़ी के आकार का एक जंतु जिसकी पीठ पर कड़े और नूकीले काँटे होते हैं। साही। खारपुश्त। उ०—सेही सियाल लंगूर बहु कुड कदंम भरि तर रहिय। पिप्षे सु जीव कवि चंद नें तुच्छ नाम चौपद कहिय।—पृ० रा०, ६।९४। विशेष—क्रुद्ध होने पर यह जंतु काँटों को खड़े कर लेता है और इनसे चोट करता है। लंबाई में ये काँटे एक बालिश्य तक होते हैं।

सेहुंड, सेहुंडा
संज्ञा स्त्री०, [सं० सेहुण्ड, सेहुण्डा] थूहर। सेहुंड।

सेहुँड पुं †
संज्ञा पुं० [सं० सेहुण्ड] थूहर का पेड़। उ०—छतौ नेह कागद हिए भई लखाय न टाँक। बिरह तचे उधरयो सु अब सेहुँड़ को सो आँक।—बिहारी (शब्द०)।

सेहुआँ
संज्ञा पुं० [?] एक प्रकार का चर्मरोग जिसमें शरीर पर भूरी भूरी महीन चित्तियाँ सी पड़ जाती हैं।

सेहआन
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का करमकल्ला जिसके बीज से तेल निकलता है।

सेह्न
संज्ञा पुं० [अ०] १. इंद्रजाल। कीमियागरी। २. यंत्र मंत्र। जादू टोना। यौ०—सेह्नबयान = ललित एवं मुग्ध करनेवाली भाषा का व्यवहार करनेवाला। सेह्नसाज = कीमियागर। जादूगर। सेह्नसाजी = इंद्रजाज। जादूगरी।

सेंदूर
वि० [सं०] सिंदूर से रँगा हुआ। २. सिंदूर के रंग का। सिंदूरी।

सैदेही पु०
वि० [सं० सह + देहिन्] सदेह। सशरीर। प्रत्यक्ष। उ०— करसी तप्ति मगहर गया कबीर भरोसै राम। सैंदेही साँई मिल्या दादू पूरे काम।—दादू० पृ० ३४६।

सैंध पु
संज्ञा स्त्री० [सं० सन्धि] दे० 'संधि'। उ०—ता पच्छै सामंत नाथ मिलि एक सुबत्तिय। भोरा राइ दिसान सैंध सगपन की कथ्थिय।—पृ० रा०, १२। पृ० ४५५।

सँधव (१)
संज्ञा पुं० [सं० सैन्धव] १. सेंधा नमक। विशेष दे० 'सेँधा'। २. सिंध देश का घोड़ा। सिंधी घोड़ा। ३. सिंध के राजा जयद्रथ का नाम। ४. एक प्रदेश का नाम। सिंधु देश (को०)। ५. प्राकृत भाषा में निबद्ध एक प्रकार की गीत संरचना (को०)। ६. सिंध देश का निवासी। यौ०—सैधवखिल्य, सैधवधन = नमक का डला। सैधवचूर्ण = नमक का बूरा। सैधर शिला = एक प्रकार का पत्थर जो मुलायम होता है।

सैंधव (१)
वि०१. सिंध देश में उत्पन्न। २. सिंध देश का। सिंधुदेशीय। ३. समुद्र संबंधी। समुद्रीय। ४. समुद्र में उत्पन्न।

सैंधवक
वि० [सं० सैन्धवक] [वि० स्त्री० सैंधविकी] सैंधव संबंधी।

सैंधवपति
संज्ञा पुं० [सं० सैन्धव (=सिंध नावासी) + पति (=राजा)] सिंधवासियों के राजा, जयद्रथ। उ०—सोमदत्त शशिविंदु सुवेशा। सैंधवपति अरु शल्य नरेशा।—सबलसिंह (शब्द०)।

सैंधवादिचूर्ण
संज्ञा पुं० [सं० सैन्धवादि चूर्ण] एक अग्निदीपक चूर्ण जिसमें सेँधा नमक, हरें, पीपल और चीतामूल बराबर पड़ता है।

सैंधावायन
संज्ञा पुं० [सं० सैंन्धवायन] १. एक ऋषि का नाम। २. उनके वंशज।

सैंधवारण्य
संज्ञा पुं० [सं० सैन्धवारण्य] महाभारत में वर्णित एक वन का नाम।

सैंधवी
संज्ञा स्त्री० [सं० सैन्धवी] संपूर्ण जाति की एक रागिनी। विशेष—यह भैरव राग की पुत्रवधू मानी गई है। यह दिन के दूसरे पहर की दूसरी घड़ी में गाई जाती है। इसकी स्वर— लिपि इस प्रकार है—धा सा रे म म प प ध ध। सा नि ध ध प प म ग ग ग ग रे सा। धा सा रे म म ग रे म म ग रे ग रे म प ग रे। नि नि ध म प म ग रे। प प म रे ग ग ग रे सा। किसी किसी के मत से यह षाडव है और इसमें रि वर्जित है।

सैंधी
संज्ञा स्त्री० [सं० सैन्धी] एक प्रकार की मदिरा जो खजूर या ताड़ के रस से बनती है। ताड़ी। विशेष—वैद्यक में यह शीतल, कषाय, अम्ल, पित्तदाहनाशक तथा वातवर्धक मानी गई है।

सैंधुक्षित
संज्ञा पुं० [सं० सैन्धुक्षित] एक साम भेद का नाम।

सैंधू
संज्ञा स्त्री० [सं० सिन्धू, सैन्धवी] दे० 'सैधवी'। उ०—करि लावदार दीरध दवान। गहि सेल साँग हुव सावधान। केतेक धीर संधी कमान। केतेन तेग राखी भुजान। गुन गाइक किय वीरनु वखान। सैंधू सुर पूरिय तिहीं थान।—सूदन (शब्द०)।

सैंपुल
संज्ञा पुं० [अं० सेम्पुल] नमूना। जैसे,—कपड़े का सैपुल।

सैंह (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सैंही] १. सिंह संबंधी। सिंह का। २. सिंह के समान।

सैंह पु † (२)
क्रि० वि० [हि० सौंह] दे० 'सौंह'१।

सैंहल
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सैहली] १. सिंहल द्वीप संबंधी। सिंहल द्वीप का। २. सिंहली। सिंहल में उत्पन्न।

सैंहलक
संज्ञा पुं० [सं०] पीतल [को०]।

सैंहली
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक प्रकार की पीपल। सिंहली पीपल। विशेष—वैद्यक के अनुसार यह कटु, उष्ण, दीपन, कोष्ठशोधक। कफ, श्वास और वायुनाशक है। पर्या०—सर्पदंड़ा। सर्पाक्षी। उत्कटा। पार्वती। शैलजा। ब्रह्मा— भूमिजा। लंबबीजा। ताम्रा। अद्रिजा। सिंहलस्था। जीवला। लंबदंडा। जीवनेत्री। जीवाला। कुरुंबी।

सैंहाद्रिक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्राचीन जाति का नाम।

सैंहिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] सिंहिका से उत्पन्न, राहु। सिंहिका का पुत्र। सैंहिकेय।

सैंहिक (२)
वि० सिंह के समान। सिंह तुल्य। सिंह जैसा।

सैंहिकेय
संज्ञा पुं० [सं०] १. सिंहिका का पुत्र राहु। २. दानवों का एक वर्ग [को०]।

सैँगर
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'सेँगर'३।

सैजल पु ‡
वि० [सं० सम + जल] जल के समान। जलयुक्त। जल या पानी के साथ। उ०—झिरिमिरि झिरिमिरि बरषिया पाँहण ऊपरि मेह। माँटी गलि सैँजल भई पाहण वोही तेह।—कबीर ग्रं०, पृ० ५५।

सैँणर
संज्ञा पुं० [सं० स्वामी + नर, हि० साईनर; या सं० स्वजन, प्रा० सजण, सयण, पु० हि० सैँण + अर (प्रत्य०)] पति। खाविंद (डिं०)।

सैँतना
क्रि० स० [सं० सञ्चयन या हिं० सँचय + ना (प्रत्य०)] १. संचित करना। एकत्र करना। बटोरना। इकट्ठा करना। उ०—(क) सोई पुरुष दरब जेइ सैँती। दरबहि तें सुनु बातें एती।—जायसी (शब्द०)। (ख) कहा होत जल महा प्रलय को राख्यो सैँति सैँति है जेह। भुव पर एक बूँद नहिं पहुँची निझरि गए सब मेह।—सूर (शब्द०)। २. हाथों से समेटना। इधर उधर से सरकाकर एक जगह करना। बटोरना। उ०—सखि वचन सुनि कौसिला लखि सुढर पासे ढरनि। लेति भरि भरि अंक, सैँतति पैँत जनु दुहुँ करनि।—तुलसी (शब्द०)। ३. सहेजना। संभालकर रखना। सावधानी से अपनी रक्षा में करना। सवाचना। जैसे,—जो रुपया मैंने दिया है, उसे सैँतकर रखना। ४. मार डालना। ठिकाने लगाना। (बाजारु)। ५. घन मारना। चोट लगाना।

सैँतालिस
वि०, संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'सैँतालीस'।

सैँतालीस(१)
वि० [सं० सप्तचत्वारिंशत्, पा० सत्तचत्तालीसति, प्रा० सत्तालिस] जो गिनती में चालीस से सात अधिक हो। चालिस और सात।

सैँतालीस (२)
संज्ञा पुं० चालिस से सात अधिक की संख्या या अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है—४७।

सैँतालीसवाँ
वि० [हि० सैँतालीस + वाँ (प्रत्य०)] जो क्रम में छिया- लिस और वस्तुओं के उपरांत हो। क्रम में जिसका स्थान सैंतालिस पर हो।

सैँतिस
वि० [सं० सप्तत्रिंशत्] दे० 'सैँतीस'।

सैँतीस (२)
वि० [सं० सप्तत्रिंशत्, पा० सप्ततिंसति, प्रा० सप्तिंसइ] जो गिनती में तीस से सात अधिक हो। तीस और सात।

सैँतीस (२)
संज्ञा पुं० तीस से सात अधिक का अंक जो इस प्रकार लिखा जाता है—३७।

सैतीसवाँ
वि० [हि० सैँतीस + वाँ (प्रत्य०)] जो क्रम में छत्तीस और वस्तुओं के उपरांत हो। क्रम में जिसका स्थान सैंतीस पर हो।

सैँथी पु †
संज्ञा पुं० [सं० शक्ति] एक प्रकार का शस्त्र। उ०— इंद्रजीत लीनी जब सैंथी देवन हहा करयौ।—सूर०, ९।१४४।

सैँपना †
क्रि० स० [सं० समर्पण पुं० हिं० सउँपना, सौंपना] दे० 'सौंपना'। उ०—भारी कठोर हियो करि के तिय सैपि बिदा भी बिदेस के ईछे।—पजंनेस०, पृ० ३२।

सैँबल पु †
संज्ञा पुं० [सं० शिम्बल] दे० 'सेंमर'। उ०—विष ताकों अमृत करि जानै सो संग आवै साथ। सैँबल के फूलन पर फूल्यौं चूकौ अबकी घात।—दादू०, पृ० ६२९।

सैँयाँ
संज्ञा पुं० [हिं० सैयाँ] दे० 'सैयाँ'।

सौंवर †
संज्ञा पुं० [हि०] दे० 'साँभर'। उ०—सज्जी सौंचर सैँवर सोरा। साँखाहूली सीप सिकोरा।—सूदन (शब्द०)।

सैँवार †
संज्ञा पुं० [सं० शौवाल या पुं० शत + वाट्] १. दे० 'सेवार'। २. शतधा। टुकड़े टुकड़े। उ०—कबीर देवल ढहि पड़या इँट भई सैँवार।—कबीर ग्रं०, १२, पद्य १८।

सैँहथी
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्ति] दे० 'सैँथी'।

सैँहुड़
संज्ञा पुं० [सं० सैहुण्ड] दे० 'सेहुँड़'।

सैँहूँ
संज्ञा पुं० [हिं० गेहूँ का अनु०] गेहूँ के वे दाने जो छोटे काले और बेकार होते हैं।

सै † (१)
वि० संज्ञा पुं० [सं० शत, प्रा० सय, सइ] सौ। उ०—संवत सौरह सै इकतीसा। करउँ कथा हरिपद धरि सीसा।—तुलसी (शब्द०)। विशेष—इसका प्रयोग अधिकतर किसी संख्या के आगे होता है।

सै (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० शत्व, प्रा० सत्त] १. तत्व। सार। माद्दा। २. वीर्य। शक्ति। ओज। उ०—बिनती सों परसन्न सद ती सों प्रसन्न मन। विनसै देखत सत्रु अहै यह सै जाके तन।—गोपाल (शब्द०)। ३. बढ़ती। बरकत। लाभ।

सै पु ‡ (३)
वि० [सं० सदृश, प्रा० सदिस, सइस] समान। तुल्य। उ०— लखण बतीसे मारुवी निधि चंद्रमा निलाट। काया कूँ कूँ जेहवी कटि केहरि सै घाट।—ढोला०, दू० ४६९।

सैकंट
संज्ञा पुं० [सं० शतकण्टक] बबूल की जाति का एक पेड़ जिसकी छाल सफेद होती है। धौला खैर। कुमतिया। विशेष—यह बंगाल, बिहार, आसाम तथा दक्षिण और मध्यप्रदेश आदि में विध्य की पहाड़ियों पर होता है।

सैकड़ा
संज्ञा पुं० [सं० शतकण्ड, प्रा० सयकंड] १. सौ का समूह। शत की समष्टि। जैसे,—२ सैकड़े आम। २.१०६ ढोली पान। (तंबोली)।

सैकड़े
क्रि० वि० [हिं० सैकड़ा] प्रति सौ के हिसाब से। प्रतिशत। फीसदी। जैसे,—५) सैकड़े ब्याज।

सौकड़ों
वि० [हिं० सैकड़ा] १. कई सौ। २. बहुसंख्यक। गिनती में बहुत। जैसे,—सैकड़ों आदमी।

सैकत (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सैकती] १. रेतीला। बलुआ। बालुका- मय। २. बालू का बना।

सैकत (२)
संज्ञा पुं० १. बलुआ किनारा। रेतीला तट। २. तट। किनारा (को०)। ३. रेतीली मिट्टी। बलुई जमीन। ४. बालू का ढेर। सिकतापुंज (को०)। ५. एक ऋषिवंश या संप्रदाय जिन्हें वान- प्रस्थियों का भेद भी माना गया है।

सैकतिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. साधु। संन्यासी। क्षपणक। २. वह सूत्र या सूत जो मंगल के लिये कलाई या गले में धारण किया जाता है। मंगलसूत्र। गंडा या रक्षा।

सैकतिक (२)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सैकतिकी] १. सैकत संबंधी। २. भ्रम या संदेह में रहनेवाला। सेदेबजीवी। भ्रातिजीवी।

सैकतिनी
वि० स्त्री० [सं०] दे० 'सैकती' [को०]।

सौकती
वि० [सं० सैकतिन्] [वि० स्त्री० सैकतिनी] सिकतायुक्त। रेतीला। बलुआ (तट या किनारा)।

सैकतेष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] आर्दक। अदरक (जो बलुई जमीन में अधिक होता है)।

सैकयत
संज्ञा पुं० [सं०] पाणिनि के अनुसार एक प्राचीन जनपद या जाति का नाम।

सैकल
संज्ञा पुं० [अ० सैक़ल] १. हथियारों को साफ करने और उनपर सान चढ़ाने का काम। २. सफाई। स्वच्छता। जिला (को०)।

सैकलगर
संज्ञा पुं० [अ०सैकल + गर] तलवार, छुरी आदि पर बाढ़ रखनेवाला। सान धरनेवाला। चमक देनेवाला। सिकलीगर।

सैका ‡ (१)
संज्ञा पुं० [सं० सेक (= पात्र)] १. घड़े की तरह का मिट्टी का एक बरतन जिससे कोल्हू से गन्ने का रस निकालकर कड़ाहे में डाल देते हैं। २. मिट्टी का छोटा बरतन जिससे रेशम रँगने का रंग ढाला जाता है। ३. खेत से कटकर आई हुई रबी की फसल का अटाला। राशि।

सैका (२)
संज्ञा पुं० [सं० शतक, प्रा० सय, हिं० सै (=सौ)] दस ढोंके। २. एक सौ पूले।

सैकी पु ‡
संज्ञा स्त्री० [हि० सैका] छोटा सैका।

सैक्य (१)
वि० [सं०] १. एकतायुक्त। २. सिंचाई पर निर्भर। ३. सिंचन संबंधी। सिंचन के लायक।

सैक्य (२)
संज्ञा पुं० सोनपीतल। शोणपित्तल।

सैक्षव
वि० [सं०] जिसमें चीनी हो। मीठा।

सैक्सन
संज्ञा पुं० [अं०] योरप की एक जाति जो पहले जर्मनी के उत्तरी भाग में रहती थी। फिर पाँचवीं और छठी शताब्दी में इसने इंगलैड पर धावा किया और वहाँ बस गई।

सैजन
संज्ञा पुं० [हि० सहिंजन] दे० 'सहिंजन।

सैढ़ †
संज्ञा पुं० [देश०] गेहूँ की कटी हुई फसल जो दाँई गई हो, पर ओसाई न गई हो।

सैए †
संज्ञा पुं० [सं० स्वजन, प्रा० सयण] १. मित्र। साजन। प्रिय। उ०—ढोला खिल्यौरी कहइ, सुणे कुढंगा वैण। म्हारु म्हाँजी गोठणी, सैं मारुदा सैण।—ढोला०, दू० ४३८। २. स्वजन। इष्टमित्र। बंधुबाँधव। उ०—(क) बाताँ वैर विसावणा, सैणाँ तोड़े नेह।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० ६६। (ख) ज्यारै थोड़ी सैंण जग, वैरी घणा वसंत।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० ६६।

सैणाचार †
संज्ञा पुं० [सं० सजन + आचार] मैत्री व्यवहार। स्वजना- चरण। मित्रता। उ०—किण सूँ राखै केहरी, सैणाचार सनेह।—बाँकी० ग्रं०, भा० १, पृ० २१।

सैतव
वि० [सं०] सेतु संबंधी।

सैतवाहिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] बाहुदा नदी का नाम।

सैत्य
संज्ञा पुं० [सं०] धवलिमा। श्वेतता। सुफेदी [को०]।

सैथी
संज्ञा स्त्री० [सं०शक्ति, प्रा० सत्ति अथवा सहस्त, प्रा० सहत्थ, पुं हिं० सैथी, सैहथी] बरछी। साँग। छोटा भाला। उ— पहर रात भर भई लराई। गोलिन सर सैथिन झर लाई। खाइ घाइ सब खान अधानै। लोह मानि तजि कोह परानै।—लाल कवि (शब्द०)।

सैद पु ‡ (१)
संज्ञा पुं० [अ० सैयद] दे० 'सैयद'। उ०—सृज्यो बहुरि सुरभी बलवाना। शेख सैद अरु मुगल पठाना।—रघुराजसिंह (शब्द०)।

सैद (२)
संज्ञा पुं० [अ०] १. शिकार। आखेट। उ—जुल्फ के हलके में देखा जब से दाना खाल का। मुर्ग दिन आशिक का तब से सैद है इस जालि का।—कविता कौ०, भा० ४, पृ० २३। २. शिकार का पशु। वह जानवर जिसका शिकार किया जाय (को०)। यौ०—सैदगाह = शिकार करने का स्थान। सैदे हरम = जनान- खाने का जानवर जिसका शिकार करना वर्जित है।

सैदपुरी
संज्ञा स्त्री० [सैदपुर स्थान] एक प्रकार की नाव जिसके आगे पीछे दोनों ओर के सिक्के लंबे होते हैं।

सैदानी
संज्ञा स्त्री० [अ०] दे० 'सैयदा'।

सैद्धांतिक (१)
संज्ञा पुं० [सं० सौद्धान्तिक] १. सिद्धांत को जाननेवाला। सिद्धांतज्ञ। विद्वान्। तत्वज्ञ। २. तांत्रिक।

सैद्धांतिक (२)
वि० [सं०] [वि०, स्त्री० सैद्धान्तिकी] सिद्धांत संबंधी। तत्व संबंधी।

सैध्रक
वि० [सं०] सिध्रक वृक्ष की लकड़ी का बना हुआ।

सैध्रिक
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का वृक्ष।

सैन (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० संज्ञपन, प्रा० सण्णवन] १. अपना भाव प्रकट करने के लिये आँख या उँगली आदि से किया हुआ इंगित या इशारा। उ०—(क) जदीप चवायनि चीकनी, चलति चहुँ दिस सैन। तदपि न छाँड़त दुहुनि के हँसी रसीले नैन।—बिहारी (शब्द०)। (ख) सुनि श्रवण दशबदन दशन अभिमान कर नैन की सैन अंगद बुलायो। देखि लंकेश कपि भेश दर दर हँस्यो सुन्यो भट कटक को पार पायो।—सीर (शब्द०)। (ग) सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सैन बुझाई।—तुलसी (शब्द०)। क्रि० प्र०—करना।—देना।— मारना। २. चिह्न। निशान। सूचक वस्तु। परिचायक लक्षण। उ—यह श्रमकन नख खतन की सैन जुदी अँग मैन। नील निचोल चितै भए तरुनि चोल रँग नैन।—शृंगार सतसई (शब्द०)।

सैन पु ‡ (२)
संज्ञा पुं० [सं० शयन, प्रा० सयण] दे० 'शयन'। उ०— भटन विदा करि रैन मुख जाइ कीन्ह गृह सैन।—गोपाल (शब्द०)। (ख) साजि सैन भूषण बसन सबकी नजर बचाय। रही पौढि मिस नींद के दुग दुवार से लाय।—पदुमाकर (शब्द०)। (ग) जानि परैगी जात हो रात कहूँ करि सैन। लाल ललौहे नैन लखि सुनि अनखौहें बैन।—शृंगार सतसई (शब्द०)।

सैन पु ‡ (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० सेना या सैन्य] दे० 'सेना'। उ०—(क) सप्त दीप के कपि दल आए जुरी सैन अति भारी। सीता की सुधि लेन चले ढूँढंत विपिन मँझारी।—सीर (शब्द०)। (ख) सजी सैन छवि बरनि न जाई। मनु विधि करामाति सब आई।—गोपाल (शब्द०)।

सैन पु ‡ (४)
संज्ञा पुं० [सं०श्येन] दे०। 'श्येन'। बाज पक्षी। उ०—चल्यो प्रसैन ससैन सैन जिमि अपर खगन पर।—गोपाल (शब्द०)।

सैन (५)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बगला।

सैनक
संज्ञा पुं० [फ़ा० सनी, सहनक] थाली। रिकाबी। तश्तरी।

सैनपति पु
संज्ञा पुं० [सं० सेनापति] दे० 'सेनापति'। उ०—चहुँ सैनण्तीनु बुलाइ लिए। तिन सौं यह आइसु आपु दिए।— सूदन (शब्द०)।

सैनभोग पु
संज्ञा पुं० [सं० शयन + भोग] शयन के समय का भोग। रात्रि का नैवेद्य जो मंदिरों में चढ़ता है। उ०—भए दिन तीनि ये तौ भूख के अधीन नहिं, रहे हरि लीन प्रभु शोच परे उभारिए। दियो सैनभोग आप लक्ष्मी जू लै पधारी, हाटक की थारी झनझन पाँव धारिए।—भक्तमाल (शब्द०)।

सैना पु ‡ (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० सैन्य] दे० 'सैना'। उ०—मीत की चाल ये चल जानतहू रैन। छवि सैना सजि धावहीं अबलन पै तुव नैन।—रसनिधि (शब्द०)।

सैना पु (२)
संज्ञा स्त्री० [हि०सैन] संकेत। इशारा।

सैना (३)
संज्ञा पुं० [अं०] एक पर्वत जो शाम में है। कहते हैं, इसी पर हजरत मूसा को ईश्वरदर्शन हुआ था [को०]।

सैनानिक
वि० [सं०] सेना के अग्रभाग का।

सैनानीक
वि० [सं०] दे० 'सैनानिक'।

सैनान्य
संज्ञा पुं० [सं०] सेनानी या सेनापति का कार्य। सैनापत्य। सेनापतित्व।

सैनापति पु ‡
संज्ञा पुं० [सं० सैन्यपति] दे० 'सैनापति'।

सैनापत्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] सेनापति का पद या कार्य। सेनापतित्व।

सैनापत्य (२)
वि० सेनापति संबंधी।

सैनिक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सेना या फौज का आदमी। सिपाही। लश्करी। तिलंगा। २. सैन्यरक्षक। प्रहरी। संतरी। ३. समवेत सेना का बाग। व्यूहबद्ध दल। ४. वह जो किसी प्राणी का वध करने के लिये नियुक्त किया गया है। ५. शंबर के एक पुत्र का नाम।

सैनिक (२)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० सैनिकी] सेना संबंधी। सेना का। यौ०—सैनिकवाद। सैनिकवादी। सैनिकीरकण = किसी राष्ट्र की पुरी आबादी को युद्ध करनेवाली सेना के रुप में संयोजित करना या सबल बनाना। समर्थ जनसाधारण को सैनिक प्रशिक्षण देने का कार्य। उ०—मार्च, १९३४ में हिटलर ने सैनिकीकरण का कार्य कर दिया ।—आ० अ० रा०, पृ० १९।

सैनिकता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सेना या सैनिक का कार्य। सैनिकों का जीवन। २. युद्ध। लड़ाई भिड़ाई।

सैनिकवाद
संज्ञा पुं० [सं० सैनिक + वाद] दे० 'सामरिकवाद'।

सैनिका
संज्ञा स्त्री० [सं० श्येनिका] एक छंद का नाम। यथा—सो सुजाननंद सोचि वा घरी। आइयौ ब्रजेस पास ता धरी। सीख माँगि श्रि ब्रजेस सौं तबै। दै निसान कूँच कै चमू सबै।— सूदन (शब्द०)।

सैनिटरी
वि० [अं०] सावर्जनिक स्वास्थ्य, शुद्धता, रक्षा ओर ऊन्नति से संबंध रखनेवाला। जैसे—सैनिटरी डिपार्टमेंट, सैनिटरी कमिश्नर।

सैनिटेरियम
संज्ञा पुं० [अं०] दे० 'सैनेटोरियम'।

सैनिटेशन
संज्ञा पुं० [अं०] स्वास्थ्यरक्षा संबंधी विज्ञान [को०]।

सैनी पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० ?/? ष्ण शौचे? अथवा हिं० सेना भगत (जो जाति के नाई थे)] नाई। हजाम। उ०—दरशन हूँ नाशे यम सैनिक जिमि नह बालक सैनी। एकै नाम लेत सब भाजै पीर सुभूमि रसैनी।—सूर (शब्द०)।

सैनी पु ‡ (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० सेना] दे० 'सेना'। उ०—जानि कठिन कलिकाल कुटिल नृप संग सजी अध सैनी। जनु ता लगि तरवार त्रिविक्रम धरि करि कोप उपैनी।—सूर (शब्द०)।

सैनी पु (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० शयनीया (= शय्या)] शय्या। सेज। उ०— नंददास प्रभु को नेह देखि हाँसी आवै, वे बैठे री रचि रचि सैनी।—नंद० ग्रं०, पृ० २६८।

सैनी पु (४)
संज्ञा स्त्री० [सं० श्रेणी] श्रेणी। पंक्ति। कतार। उ— आगे चलिपुनि अवलोकी नवपल्लव सैनी। जहँ पिय सुसुम कुसुम लै सुकर गुही है बैनी।—नंद० ग्रं०, पृ० १६।

सैनी † (५)
संज्ञा पुं० [सं० सेना ?] एक सैनिक जाति। एक युद्धक जाति जो अपने को शूरसेन से संबंधित बतलाती है।

सैनू
संज्ञा पुं० [देश०] वह स्थान जहाँ लोग स्वास्थ्यसुधार के लिये जाकर रहते हैं। स्वास्थनिवास।

सैनेय पु
वि० [सं० सेना + इय (प्रत्य०)] सेना के योग्य। लड़ने के योग्य। उ०—कैतवेय नृप चल्यो श्रेय गुनि बल अमेय तन। सँग अजेय सैनेय सैन पर प्रान तेय रन।—गोपाल (शब्द०)।

सैनेश
संज्ञा पुं० [सं० सैन्य + ईशः/?सैन्येश] सेनापति। उ—हँसि बोले सैनेशकुमारा। कहिए नाथ सहित बिस्तारा।—सबलसिंह (शब्द०)।

सैनेस पु
संज्ञा पुं० [सं० सैन्येश, प्रा० सैनेस] दे० 'सैनेश'।

सैन्य (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. सैनिक। सिपाही। २. सेना। फौज। ३. सेनादल। पलटन। ४. प्रहरी। संतरी। ५. शिविर। छावनी।

सैन्य (२)
वि० सेना संबंधी। फौज का। फौजी।

सैन्यकक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] सैना का पार्श्व भाग। दे० 'सेनाकक्ष'।

सैन्यक्षोभ
संज्ञा पुं० [सं०] सेना का विद्रोह। फौज की बगावत।

सैन्यघातक
वि० [सं०] सेना का विनाश करनेवाला [को०]।

सैन्यघातकर
वि० [सं०] दे० 'सैन्यघातक'।

सैन्यनायक
संज्ञा सं० [सं०] सेना का अध्यक्ष। सेनापति।

सैन्यनिंवेशभूमि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह स्थान जहाँ सेना पड़ाव डाले। शिविर। पड़ाव। छावनी।

सैन्यपति
संज्ञा पुं० [सं०] सेनापति।

सैन्यपाल
संज्ञा पुं० [सं०] सेनापति।

सैन्यपृष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] फौज का पिछला हिस्सा। सेना का पश्चात् भाग। प्रतिग्रह। परिग्रह। चंदावल।

सैन्यमुख
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सेनामुख'।

सैन्यवास
संज्ञा पुं० [सं०] पड़ाव। छावनी।

सैन्यशिर
संज्ञा पुं० [सं० सैन्यशिरस्] सेना का अग्रभाग।

सैन्यसज्जा
संज्ञा पुं० [सं० सैन्यहन्त] शंबर के एक पुत्र का नाम [को०]।

सैन्याधिपति
संज्ञा पुं० [सं०] सेनापति।

सैन्याध्यक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] सेनापति।

सैन्योपवेशन
संज्ञा पुं० [सं०] सेना का पड़ाव।

सैफ
संज्ञा स्त्री० [अ० सैफ़] तलवार। उ०—(क) यों छबि पावत हैं लखौ अंजन आँजे नैन। सरस बाढ़ सैफन धरी जनु सिकलीगर मैन।—रसनिधि (शब्द०)। (ख) कोउ कहीत भामिनि भ्रुकुटि विकट बिलोकि श्रवण समीप लौं। ये साफ सैफ करैं कतल नहिं छमै जानि तिय सजनी पलौ।—रघुराज (शब्द०)। यौ०—सैफ जबान = वह जिसकी जबान सत्य हो। जिसकी वाणी या कथन पुर असर हो। सैफबान = तलवार लटकानेवाला परतला।

सैफग
संज्ञा पुं० [सं० शतफल?] लाल देवदार। विशेष—इसका सुंदर पेड़ चटगाँव से सिक्किम तक और कोंकण तथा दक्षिण से मैसूर, मालबार और लंका तक के जंगलों में पाया जाता है। इसकी लकड़ी पीलापन लिए भूरे रंग की होती है और मेज, कुरसी, बाजों के संदूक आदि बनाने के काम आती है।

सैफा
संज्ञा पुं० [अ० सैफ़ह्] जिल्दसाजों का वह औजार जिससे वे किताबों का हाशिया काटते हैं।

सैफी (१)
वि० [अ० सैफ़ (=तलवार)] तिरछा। तिर्यक्। उ०— नेहनि उर आवत लखौ जबहीं धीरज सैन। सैफी हेरन मैं पटे कैफी तेरे नैन।—रसनिधि (शब्द०)।

सैफी (२)
संज्ञा स्त्री० [अ० सैफी़] १. माला। सबीह। २. एक अभिचार। मारण का एक प्रयोग [को०]।

सैमंतिक
संज्ञा पुं० [सं० सैमन्तिक] सिंदूर। सेंदुर।विशेष—सधवा स्त्रियों के सीमंत अर्थात् माँग में लगाने के कारण सिंदूर का यह नाम पड़ा।

सैम
संज्ञा पुं० [देश०] धीवरों के एक देवता या भूत।

सैयद
संज्ञा पुं० [अ०] [स्त्री० सैयदा, सैयदानी, सैदानी] १. मुहम्मद साहब के नाती हुसैन के वंश का आदमी। २. मुसलमानों के चार वगों या जातियों में दूसरी जाति। उ०—सैयद अशरफ पीर पियारा। जेइ मोहि दीन्ह पंथ उजियारा।—जायसी (शब्द०)।

सैयदा, सैयदानी
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. सैयद वर्ग या जाति की स्त्री। २. सैयद की पत्नी। सैदानी [को०]।

सैयाँ पु ‡
संज्ञा पुं० [सं० स्वामी, हिं० साई, या सं० स्वजन, प्रा० सयण] स्वामी। पति। उ०—(क) सैयाँ भये तिलँगवा बहुअरि चली नहाय।—गिरिधर (शब्द०)। (ख) अपने सैयाँ बाँधी पाट। लै रे बेचौं हाटै हाट। कबीर (शब्द०)।

सैया पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शय्या] दे० 'शय्या'। उ०—सैया असन वसन सुख होई। कल्पवृक्ष नामक तरु सोई।—गोपाल (शब्द०)।

सैयाद
संज्ञा पुं० [अ०] १. व्याध। बहेलिया। शिकारी। २. मछुआ। मल्लाह। उ०—यक लोक यक वेद दो दरिया के किनारे। सैयाद के काबू में हैं सब जीव बेचारे।—कबीर मं०; पृ० १५०।

सैयार (१)
वि० [अ०] घूमनेवाला। भ्रमण करनेवाला [को०]।

सैयार (२)
संज्ञा पुं० ग्रह। नक्षत्र। तारक [को०]।

सैयारा
संज्ञा पुं० [अ० सैयारह्] वह ग्रह जो सूर्य की परिक्रमा करे। नक्षत्र। तारक [को०]।

सैयाल
वि० [अ०] जो ठोस न हो। द्रव। तरल। जैसे—जल, तैल आदि पदार्थ [को०]।

सैयाह
संज्ञा पुं० [अ०] पर्यटक या धुमंतू व्यक्ति।

सैयाही
संज्ञा स्त्री० [अ०] घूमना। फिरना। सैरसपाटा करना। पर्यटन [को०]।

सैरंध्र
संज्ञा पुं० [सं० सैरन्ध्र] [स्त्री० सैरन्ध्री] १. गृहदास। घर का नौकर। २. एक संकर जाति जो स्मृतियों में दस्यु और अयोगवी से उत्पन्न कही गई है।

सैरंध्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं० सैरन्धिका] परिचारिका। दासी।

सैरंध्री
संज्ञा स्त्री० [सं० सैरन्ध्री] १. सैरंध्र नामक संकर जाति की स्त्री। २. अंतःपुर या जनाने में रहनेवाली दासी। अंतःपुर की परिचारिका। महल्लिका। ३. वह कारीगर स्त्री जो दूसरों के घरों में काम करे। स्वतंत्रा शिल्पजीवनी। ४. द्रौपदी का एक नाम। विशेष—जब पाँचों पांडवों ने छावेश में मत्स्य देश के राजा विराट् के यहाँ सेवावृत्ति स्वीकार कर ली थी, तब द्रौपदी ने भी उनके साथ एक वर्ष तक 'सैरंध्री' का काम किया था। इसी से द्रौपदी का नाम सैरंध्री पड़ा।

सैर (१)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा०] १. मन बहलाव के लिये घूमना फिरना। मनोरंजन या वायुसेवन के लिये भ्रमण। उ०—शहर की सैर करते हुए राजा के महलों के लीचे आए।—लल्लू (शब्द०)। क्रि० प्र०—करना।—होना। २. बहार। मौज। आनंद। ३. मित्रमंडली का कहीं बगीचे में खानपान और नाचरंग। ४. किसी पुस्तक का मनोरंजन की दृष्टि से अध्ययन वा अवलोकन (लाक्ष०)। ५. घूमना फिरना। पर्यटन। चंक्रमण। भ्रमण (को०)। ६. मनोरंजन दृश्य, कौतुक। तमाशा। उ०—मम बंधु को तै हने शक्ति, विशेष लेहौं बैर। तव पुत्र, पौत्र सँहारि मैं दिखराय हौं रन सेर।—रघुराज (शब्द०)। यो०—सैरसपाटा = मन बहलाव के लिये घूमना, फिरना।

सैर (२)
वि० [सं०] सीर या हल संबंधी।

सैर (३)
संज्ञा पुं० कार्तिक का महीना [को०]।

सैरगाह
संज्ञा पुं० [फ़ा०] १. सैर करने की जगह या स्थान। २. एक प्रकार का कंदील जिसमें कागजी चित्रों की चलती फिरती छाया दिखाई पड़ती है।

सैरबीन
संज्ञा पुं० [अ० सेर (=तमाशा) + फ़ा० बीन (=जिससे देखने में मदद मिले)] १. देखना भालना। निरीक्षण। २. एक प्रकार का दो तालों से युक्त यंत्र जिसे आँखों से लगाकर चित्र देखे जाते हैं। उ०—जिस तरह आप और अनेक कौतुक देखते हैं, कृपापूर्वक इस प्रजा के चित्तरुपी आतशी शीशे से (क्योंकि वह आपके वियोग और अपनी दुर्दशा से संतप्त हो रहा है), बनी हुई सैरबीन की भी सैर कीजिए।—भारतेंदु ग्रं०, भा० ३, पृ० ७२२।

सैरिंध्र (१)
संज्ञा पुं० [सं० सैरिन्ध्र] बृहत्संहिता में वर्णित एक प्राचीन जनपद का नाम।

सैरिध्र (२)
संज्ञा पुं० दे० 'सैरंध्र'।

सैरिंध्री
संज्ञा स्त्री० [सं० सैरिन्ध्री] दे० 'सैरन्ध्री'।

सैरि
संज्ञा पुं० [सं०] १. कार्तिक महीना। २. बृहत्संहिता के अनुसार एक प्राचीन जनपद का नाम।

सैरिक (२)
संज्ञा पुं० [सं०] १. हलवाहा। हलधर। किसान। कृषक। २. हल में जुतनेवाला बैल। ३. आकाश।

सैरिक (२)
वि० सीर संबंधी। हल संबंधी।

सैरिभ
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० सेरिभी] १. भैंसा। महिष। २. स्वर्ग। ३. आकाश। व्योम।

सैरिभी
संज्ञा स्त्री० [सं०] भैंस। महिषी।

सैरिष्ठ
संज्ञा पुं० [सं०] मार्कंडेय पुराण में वर्णित एक प्राचीन जनपद का नाम।

सैरीय
संज्ञा पुं० [सं०] १. सफेद कटसरैया। श्वेत झिंटी। २. नीली कटसरैया। नील झिंटी।

सैरीयक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सैरीय'।

सैरेय
संज्ञा पुं० [सं०] १. सफेद फूलवाली कटसरैया। श्वेत झिटी। २. दे०, 'सैरीय'।

सैरेयक
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सैरेय'।

सैर्य
संज्ञा पुं० [सं०] अश्ववाल नामक तृण।

सैल पु ‡ (१)
संज्ञा स्त्री० [फ़ा० सैर] दे० 'सैर'। उ०—(क) गोप अथाइन तें उठे गोरज छाई गैल। चलि बलि अलि अभिसार को भली सँझोखी सैल।—बिहारी (शब्द०)। (ख) मोहि मधुर मुसकान सों सबै गाँव के छैल। सकल शैल बनकुंज में तरुनि सुरति की सैल।—मतिराम (शब्द०)।

सैल (२)
संज्ञा पुं० [सं० शैल, प्रा० सैल] पर्वत। दे० 'शैल'।

सैल (३)
संज्ञा स्त्री० [सं०शल्य] दे० 'सेल'।

सैल (४)
संज्ञा स्त्री० [अ० सैल, फा़० सैलाब] १. बाढ़। जलप्लावन। २. स्त्रोत। बहाव।

सैलकुमारी
संज्ञा स्त्री० [सं० सैलकुमारी] पार्वती। दे० 'शैल कुमारी'।

सैलग
संज्ञा पुं० [सं०] लुटेरा। डाकू।

सैलजा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शैलजा] दे० 'शैलजा'। उ०—जाइ बियाहहु सैलजहि यहि मोहि मागें देहु।—मानस, १।७६।

सैलतनया पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शैलतनया] पार्वती। शैलजा।

सैलवेशन आर्मी
संज्ञा स्त्री० [अं०] यूरोपियन समाजसेवकों का एक संधटन जिसका उद्देश्य जनता की धार्मिक और सामाजिक उन्नति करना है। मुक्ति फौज। विशेष—इस संघटन के कार्यकर्ता फौज के ढंग पर जेनरल, मेजर, कप्तान आदि कहलाते हैं। ये लोग गेरुआ साफा, गेरुआ धोती और लाल रंग का कीन पहनते हैं। ईसाई होने के कारण ये लोग ईसाई मजहब का ही प्रचार करते हैं। इनका प्रधान कार्यालय इंगलैड में है और शाखाएँ प्रायः समस्त संसार में फैली हुई हैं।

सैलसुता पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शैलसुता] दे० 'शैलसुता'।

सैला (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० शल्य] [स्त्री० अल्पा० सैली] १. लकड़ी की गुल्ली या पच्चड़ जो किसी छेद या संधि में ठोंका जाय। किसी छेद में डालने या फँसाने का टुकड़ा। मेख। २. लकड़ी का छोटा डंडा या मेख। ३. लकड़ी का छोटा डंडा या मेख जो हल के जूए के दोनों सिरों के छेदों में इसलिये डालते हैं जिसमें जूआ बैलों के गले में फँसा रहे। ४. नाव की पतवार की मुठिया। ५. वह मुँगरी जिससे कटी हुई फसल के डंठल दाना झाड़ने के लिये पीटते हैं।

सैला (२)
संज्ञा पुं० [सं० शाकल, प्रा० साअल] [स्त्री० अल्पा० सैली] चीरा हुआ टुकड़ा। चैला। जैसे,—लकड़ी का सैला।

सैलात्मजा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शैलात्मजा] पार्वती।

सैलानी
वि० [फ़ा० सैर, हिं० सैल] १. जिसे सैर करने में आनंद आवे। सैर करनेवाला। मनमाना घूमनेवाला। २. आनंदी। मनमौजी।

सैलाब
संज्ञा पुं० [फ़ा०] बाढ़। जलप्लावन।

सैलाबा
संज्ञा पुं० [फ़ा० सैलाब] वह फसल जो पानी में डूब गई है।

सैलाबी (१)
वि० [फ़ा०] जो बाढ़ आने पर डूब जाता हो। बाढ़वाला। जैसे,—सैलाबी जमीन।

सैलाबी
संज्ञा स्त्री० १. तरी। सील। सीड़। २. बाढ़ के समय डूब जानेवाली भूमि।

सैलि
संज्ञा पुं० [सं०] बृहत्संहिता के अनुसार एक प्राचीन जनपद का नाम।

सैली (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० सैला] १. छोटा सैला। २. ढाक की जड़ के रेशों की बनी रस्सी।

सैली (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] वह टोकरी जिसमें किसान तिन्नी का चावल इकट्ठा करते हैं।

सैली पु (३)
संज्ञा स्त्री० [सं० शैली] परिपाटी। ढंग। चाल। परंपरा। दे० 'शैली'। उ०—यों कवि भूषन भाखत हैं यक तो पहिले कलिकाल की सैली।—भूषण ग्रं०, पृ० ६६।

सैली पु † (४)
संज्ञा स्त्री० [हि० सहेली] दे० 'सहेली'। उ०—सैली मेरी गोंद ममोला। दिल मेरा वाँई लिया माँ।—दक्खिनी०, पृ० ३९०।

सैलूख पु
संज्ञा पुं० [सं० शैलूष] १. बेल का वृक्ष। २. बिल्वफल। दे० 'शैलूष'।

सैलूष पु
संज्ञा पुं० [सं० शैलूष] १. नट। अभिनेता। २. धूर्त। ३. बेल का वृक्ष या फल। उ०—नहिं दाडिम सैलूष यह सुक न भुलि भ्रम लागि।—दीन० ग्रं०, पृ० १०२। दे० 'शैलूष'।

सैव पु †
संज्ञा पुं० [सं० शैव] दे० 'शैव'। उ०—माधौदास के माता पिता सैव बहिमुर्ख हते।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० १९५।

सैवल पु
संज्ञा पुं० [सं० शैवल] दे० 'शैवाल'। उ०—नाभि सरसि त्रिवली निसेनिका रोमराजि सैवल छबि पावति।—तुलसी (शब्द०)।

सैवलिनी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० शैवलिनी] दे० 'शैवलिनी'।

सैवाल पु
संज्ञा पुं० [सं० शैवाल] दे० 'शैवाल'। उ०—कहुँ सैवालन मध्य कुमुदिनी लगि रहि पाँतिन।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ४५५।

सैवी पु †
वि० [सं० शैविन् > शैवी] शैव मतानुयायी। उ०—घर में मा बाप सैवी हैं।—दो सौ बावन०, भा० १, पृ० १९४।

सैवुम
वि० [फ़ा०] तीसरा। तृतीय [को०]।

सैव्य पु
संज्ञा पुं० [सं० शैव्य] दे० 'शैव्य'।

सैसंगी पु
वि० [सं० शत्सढ़िगन्] सत्संग करनेवाला। साथी। सत- संगी। उ०—प्रेम के साथ लगै सैसंगी।—इंद्रा०, पृ० १६८।

सैस
वि० [सं०] १. सीसे का बना हुआ। २. सीसा संबंधी।

सैसक
वि० [सं०] [स्त्री० सैसकी] दे० 'सैस'।

सैसव पु
संज्ञा पुं० [सं० शैशव] दे० 'शैशव'। उ०—पत्त पुरातन झरिग पत्त अंकुरिय उट्ठ तुछ। ज्यौ सैसव उत्तरिय चढिय वैसव किसोर कुछ।—पृ० रा०, २५।९६।

सैसवता पु
संज्ञा स्त्री० [हि० सैसव + ता (प्रत्य०)] दे० 'शैशव'। उ०—सैसवता में हे सखी जोबन कियो प्रवेस। कहौं कहाँ छबि रुप की नखशिख अंग सुदंस।—(शब्द०)।

सैसाजल पु ‡
संज्ञा पुं० [सं० शेष] लक्ष्मण। उ०—सैसाजल हणमंत जिमि ही सरसाई। वीराँ अवरोधी कीधी बड़ाई।—रघु० रु०, पृ० २४४।

सैसिकत
संज्ञा पुं० [सं०] महाभारत में वर्णित एक प्राचीन जनपद।

सैसिरध्र
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'सैसिकत'

सैह
वि० [फ़ा०] तीन।

सैहचरी पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० सहचरी] दे० 'सहचरी'। उ०—कहि उपदेस सैहचरी मोसों, कहाँ जाऊँ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० २३६।

सैहज पु †
वि० [सं० सहज] दे० 'सहज'। उ०—सैहज सिंघासन बैठे स्वामी, आगै सैव करै गुलामी।—रामानंद०, पृ० ५३।

सैहजानंद पु †
संज्ञा पुं० [सं० सहज + आनन्द] दे० 'सहजानंद'। उ०—ब्रह्मानंद ममता टरी सदगुरु सैहजानंद सों।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ४२९।

सैहत पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० सहित] दे० 'सहित'। उ०—तील भाव छम्या उर धारै। धीरज सैहत दया व्रत पारै।—रामानंद०, पृ० ५३।

सैहथी
संज्ञा स्त्री० [सं० शक्ति, प्रा० सत्ति अथवा सं० सहस्त्र, प्रा० सहत्य़] शक्ति। बरछी। साँग। उ०—(क) ब्रह्मामंत्र पढ़ि सैहथी रावण कर चमकाय। काल जलद में बीजुरी जनु प्रगटी है आय।—हनुमन्नाटक (शब्द०)। (ख) कह्मो लंकपति मारों तोहीं। दीन्हीं कपट सैहथी मोहीं।—हनुमन्नाटक (शब्द०)। (ग) आपुस माँझ इसारत कीनी। कर उलछारि सैहथी लीनी।—लाल कवि (शब्द०)।

सैहा †
संज्ञा पुं० [सं० सेक या सेचन (=सिचाई) + हिं० हा (प्रत्य०)] [स्त्री० अल्पा० सैही] पानी, रस आदि ढालने का मिट्टी का बरतन।

सैही †
संज्ञा स्त्री० [हि० सैहा] छोटा सैहा।

सैहैर ‡
संज्ञा पुं० [फ़ा० शहर] दे० शहर। उ०—दिसि पस्चम गुरजर सुधर, सैहैर अहमदाबाद।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ४२१।