सामग्री पर जाएँ

विक्षनरी:हिन्दी-हिन्दी/दु

विक्षनरी से

दुंका
संज्ञा पुं० [सं० स्तोक] (अनाज का) छोटा कण । कन । दाना । किनकी ।

दुंडुक
वि० [सं० दुण्ड़ुक] छली । धूर्त । बेईमान । झुठा [को०] ।

दुंड़ुभ
संज्ञा पुं० [सं० दुण्ड़ुभ] एक प्रकार का विषहीन साँप ।

दुंद (१)
संज्ञा पुं० [सं०द्वन्द्व] १. दो मनुष्यों के बीच होनेवाला युद्ध या झगड़ा । २. ऊधम । उत्पात । उपद्रव । हलचल । उ०— तब ही सुरज के सुभट निकट मचायों दुंद । निकसि सकै नहिं एकहू करयो कटक मसमुंद ।— सूदन (शब्द०) । क्रि० प्र०—मचना ।—मचाना ।३. जोड़ा । युग्म । उ०— बरनैं दीनदयाल दरसि परदुंद अनंदो ।—दीनदयाल (शब्द०) ।

दुंद (२)
संज्ञा पुं० [सं० दुन्दुभि] नगाड़ा । उ०—(क) चढ़ा असाढ़ गगन घन गाजा । साजा बिरह दुंद दल बाजा ।—जायसी (शब्द०) ।(ख) बाजत ढोल दुंद औ भेरी । माँदर तूर झाँझ चहुँ फेरी ।—जायसी (शब्द०) ।

दुंदुम
संज्ञा पुं० [सं० दुन्दम] एक प्रकार का धौंसा या नगाड़ा [को०] ।

दुंदु (१)
संज्ञा पुं० [सं० दुन्दु] १. श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव का नाम । २. एक प्रकार का नगाड़ा [को०] ।

दुंदु पु (२)
संज्ञा पुं० [हिं० दुंद] जन्म और मरण का झंझट ।

दुंदभ
संज्ञा पुं० [सं० दुन्दुभ] १. नगाड़ा । धौसा । २. जल का सर्प । डोडहा (को०) । ३. शिव का एक नाम (को०) । ४. एक प्रकार की लंबी माला [को०] ।

दुंदुभि (१)
संज्ञा पुं० [सं० दुन्दुभि] १. वरुण । २. विष ।३. क्रोच द्वीप का एक विभाग । ४. एक पर्वत का नाम । ५. पासे का एक दाँव । ६. एक राक्षस का नाम जिसे बालि ने मारकर ऋष्य- मूक पर्वत पर फैका था । इसपर मतंह ऋषि ने शाप दिया था, जिसके कारण बालि उस पर्वत के पास नहीं जा सकता था । ७. विष्णु का नाम (को०) ।८. कृष्ण (को०) ।९. संव- त्सरों के क्रम में ५६ वें संवत्सर का नाम (को०) ।

दुंदुभि (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० दुन्दुभि] नगाड़ा । धौंसा । उ०— सुर सुमन बरसगि हरख संकुल बाज दुंदुभि गहगही । संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लाही ।—मानस, ६ । १०२ ।

दुंदुभिक
संज्ञा पुं० [सं० दुन्दुभिक] एक प्रकार का जहरीला कीड़ा ।

दुंदुभित्वन
संज्ञा पुं० [सं० दुन्दुभिस्वन] सुश्रुत में लिखी हुई एक प्रकार की विषचिकित्सा । विशेष— बच, आम, गूलर, आँवला, अंकोल इत्यादि बहुत सी लकड़ियों का गोमुत्र में क्षार बनाकर और उसमें और बहुत सी ओषधियाँ मिलाकर लेप बनावे । इस लेप को दुंदुभि तोरण पताका इत्यादि में पोते । ऐसे तोरण, दुदुभि आदि के दर्शन, श्रवण से बिष का प्रभाव दूर हो जाता है ।

दुंदुभी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दुन्दुभि] दे० 'दुंदुभ' । उ०— (क) तब देवन दुंदुभी बजाई ।—तुलसी (शब्द०) (क) मानह मदन दुंदुभी दीन्ही ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुंदुभी (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० दुन्दुभी] १. पासे का एक दाँव । २. एक गंधर्वी का नाम [को०] ।

दुंदुभ्याघात
संज्ञा पुं० [सं० दुन्दुभ्याघात] दुंदुभी बजानेवाला [को०] ।

दुंदुमा
संज्ञा स्त्री० [सं० दु्न्दुमा] धौंसे की आवाज । नगाड़े की ध्वनि [को०] ।

दुंदुमार
संज्ञा पुं० [सं० दुन्दुमार] १. दे० 'धुधुमार' । २. बिड़ाल । बिलार (को०) । ३. गृह से उदगत धूम । घर से निकलनेवाला धआँ (को०) ।४. लाल रंग का एक कीट (को०) ।

दुंदुह पु
संज्ञा पुं० [सं० डुण्डभ] पानी का साँप । डेड़हा ।

दुंदुर पु
संज्ञा पुं० [सं० इन्दुर] मूसा । मूस ।

दुंबक
संज्ञा पुं० [सं० दुम्बक] दे० 'दुंबा' [को०] ।

दुंबा
संज्ञा पुं० [फा० दुम्बालह्] एक प्रकार का मेंढ़ा, जिसकी दुम चक्की के पाट की तरह गोल और भारी होती है । विशेष— इसका ऊन बहुत अच्छा होता है । इस प्रकार के मेढ़ पंजाब और काश्मीर से लेकर अफगानिस्तान और फारस तक होते हैं । भारतबर्ष में कई स्थानों पर ऐसे मेढ़ों की दोगली जाति उत्पन्न की गई है पर इसमें विशेष सफलता नहीं हुई है । बात यह है कि सीड़वाले प्रदेशों में प्रायः दुम में कई प्रकार की बीमारियाँ पैदा हो जाती है ।

दुंबाल
संज्ञा पुं० [फा० दुंबालहू] १. चौड़ी पूँछ । २. नाव की पतवार । ३. जहाज का पिछला हिस्सा ।

दुंबुर
संज्ञा पुं० [सं० उदुम्बर] गूलर की जाति का एक पेड़, जो हिमालय के किनारे चेनाब से लेकर पूरव की और बराबर मिलता है । विशेष— यह वृक्ष बंगला, उड़ीसा ओर बरमा में भी नदियों या नालों के किनारे पर होता है । इसपर लाख पाई जाती है । इसकी छाल के रेशों से छप्पर की काँड़ी धान आदि बांधी जाती हैं । बरसात में इसके फल पकते हैं और खाए जाते हैँ । पर इन फलों का स्वाद फीका होता है । इसकी पत्तियाँ कुछ खरदरी होती हैं और लकड़ी माजने के काम में आती हैं ।

दुँगरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का मोटा कपड़ा ।

दुँदका
संज्ञा पुं० [देश०] गन्ना पेरने का कोल्हू ।

दुःकुंत
संज्ञा पुं० [सं० दुष्यन्त] दे० 'दुष्यंत' ।

दुःख
संज्ञा पुं० [सं०] १. ऐसा अवस्था जिससे छुटकारा पाने की इच्छा प्राणियों में स्वाभाविक हो । कष्ट । क्लेश । सुख का विपरीत भाव । तकलीफ । विशेष— सांख्याशास्त्र के अनुसार दुःख तीन प्रकार के माने गए हैं— आध्यात्मिक, आधिभौतिक और अघिदैविक । अध्यात्मिक दुःख के अंतर्गत रोग, व्याधि आदि शारीरिक दुःख और क्रोध, लोभ आदि मानसिक दुःख हैं । आधिभौतिक दुःख वह है जो स्थावर, जंगम (पशु पक्षी साँप, मच्छड़ आदि) भूतों के द्वार पहुँचता है । आधिदैविक जो देवताओं अर्थात् प्राकृतिक शक्तियों के द्वार पहुँचता है, जेसे,—आँधी, वर्षा, बज्रपात, शीत, ताप इत्यादि । साँख्य दुःख को रजोगुण का कार्य और चित्त का एक धर्म मानता है, आत्मा को उससे अलग रखता है । पर न्याय और वैशेषिक दुःख को आत्मा का धर्म मानते हैं । त्रिविध दुःखों की निवृत्ति को साख्य ने अत्यंत पुरुषार्थ कहा है और शास्त्रजिज्ञासा का उद्देश्य बतलाया है । प्रधान दुःख जरा और मरण है जिनसे लिंगशरीर की निवृत्ति के बिना चेतन या पुरुष छुटकारा नहीं पा सकता है । इस प्रकार की मुक्ति या अत्यंत दुःखनिवृत्ति तत्वज्ञान द्वारा— प्रकृति और पुरुष के भेदज्ञान द्वारा—ही संभव है । वेदांतने सुखदुःख ज्ञान को अविद्या कहा है । इसकी निवृत्ति ब्रह्माज्ञान द्वारा हो जाती है । योग की परिभाषा में दुःख एक प्रकार का चित्तविक्षेप या अंतराय है जिससे समाधि में विध्न पड़ता है । व्याधि इत्यादि चित्तविक्षेपों के अतिरिक्त योग ने चित्त के राजस कार्य को दुःख कहा हे । किसी विषय से चित्त में जो खेद या कष्ट होता है वही दुःख हे । इसी दुःख सें द्वेष उत्पन्न होता है । जब किसी विषय से चित्त को दुःख होगा होगा तब उससे द्वेष उत्पन्न होगा । योग परिणाम, ताप और संस्कार तीन प्रकार के दुःख मानकर सब वस्तुओं को दुःखमय कहना है । परिणाम दुःख वह है जिसका अन्यथाभाव हो अर्थात् जो भविष्य में अवश्य पहुँचे, ताप दुःख वह है जो वर्तमान काल में कोई भोग रहा हो और जिसका प्रभाव या स्मरण बना हो । क्रि० प्र०—होना । मुहा०—दुःख उठाना = कष्ट सहना । तकलीफ सहना । ऐसी स्थिति में पड़ना जिससे सुख या शांति न हो । दुःख देना = कष्ट पहुँचाना । दुःख पहुँचना = दुःख होना । दुःख पहुँचाना = दे० 'दुःख देना' । दुःख पाना = दे० 'दुःख उठाना' । दुःख बटाना = सहानुभूति करना । कष्ट या संकट के समय साथ देना । दुःख भरना = कष्ट या संकट के दिन काटना । दुःख भुगतना या भोगना = दे० 'दुःख उठाना' । २. संकट । आपति । विपत्ति । मुहा०— (किसी पर) दुःख पड़ना = आपत्ति आना । संकट उपस्थित होना । ३. मानसिक कष्ट । खेद । रंद । जैसे,—उसकी बात से मुझे बहुत दुःख हुआ । मुहा०—दुःख मानना = खिन्न होना । संतप्त । होना । रंजीदा होना । दुःख बिसराना = (१) चित्त से खेद निकालना । शोक या रंज की बात भूलना । (२) जी बहलाना । दुःख लगना = मन मे खेद होना । रंज होना । ४. पीड़ा । व्यथा । दर्द । ५. व्याधि । रोग । बीमारी । जैसे,— इन्हें बुरा दुःख लगा है । मुहा०— दुःख लगाना = रोग घेरना । व्याधि होना ।

दुःखकर
वि० [सं०] जो दुःख उत्पन्न करे । क्लेश पहुँचानेवाला ।

दुःखग्राम
संज्ञा पुं० [सं०] संसार ।

दुःखछिन्न
वि० [सं०] १. कठोर । कठिन । सख्त । २. कष्टग्रस्त । पीड़ित [को०] ।

दुःखछेद्य
वि० [सं०] कठिनाई से काटा जाने योग्य । २. कठिन [को०] ।

दुःखजीवी
वि० [सं० दुःखजीविन्] कष्ट से जीवन बितानेवाला ।

दुःखता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुःख होने का भाव । बेचैनी । कष्ट [को०] ।

दुःखत्रय
संज्ञा पुं० [सं०] तीन प्रकार के दुःखों का समूह ।

दुःखद
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दुःखदा] दुःखदायी । कष्ट पहुँचानेवाला । कष्टकर ।

दुःखदग्ध
वि० [सं०] कष्ट में पड़ा हुआ । संतप्त । क्लेशित ।

दुःखदाता
संज्ञा पुं० [सं० दुःखदातृ] [स्त्री० दुखदात्री] दुःख पहुँचानेवाला । मनुष्य । कष्ट देनेवाला व्यक्ति ।

दुःखदायक
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दुःखदायिका] दुःख या कष्ट पहुँचानेवाला । जिससें दुःख हो ।

दुःखदायी
वि० [सं० दुःखदायिन्] [वि० स्त्री० दुःखदायिनी] दुःख देनेवाला । जिससे कष्ट पहुँचे ।

दुःखदोह्या
वि० स्त्री० [सं०] (गाय) जो कठिनता ते दुही जा सके । जो जल्दी दुहने न दे ।

दुःखनिवह
वि० [सं०] दुःसह ।

दुःखप्रद
संज्ञा पुं० [सं०] कष्ट देनेवाला । दुःखद ।

दुःखप्राय
वि० [सं०] दे० 'दुःखवहुल' ।

दुःखबहुल
संज्ञा पुं० [सं०] दुःखपूर्ण । क्लेश से भरा हुआ ।

दुःखमय
वि० [सं०] दुःखपूर्ण । क्लेश से भरा हुआ ।

दुःखलभ्य
वि० [सं०] जो दुःख या कष्ट से प्राप्त हो सके । जो कठिनता से मिल सके ।

दुःखलोक
संज्ञा पुं० [सं०] संसार ।

दुःखशील
वि० [सं०] कष्टसहिष्णु । दुःख सहने की क्षमता रखनेवाला [को०] ।

दुःखसाध्य
वि० [सं०] दुःख से होने योग्य । मुश्किल से होने योग्य । मुश्किल से होनेवाला (काम) । जिसका करना कठिन हो ।

दुःखांत (१)
वि० [सं० दुःखान्त] १. जिसके अंत में दुःख हो । जिसके परिणाम में कष्ट हो । २. जिसके अंत में दुःख का वर्णन हो । जैसे, दुःखांत नाटक । विशेष— प्राचीन यूनान के साहित्य ग्रंथों में नाटक दो प्रकार के कहे गए हैं— सुखांत और दुःखांत, दुःखावसानी या त्रासदी अतः योरप के साहित्य में नाटक या उपन्यास के हो भेद माने जाते हैँ । पर भारतीय आचार्यों ने इस प्रकार का भेद नहीं किया है ।

दुःखांत (२)
संज्ञा पुं० १. दुःख का अंत । क्लेश की समाप्ति । २. दुःख की पराकाष्ठा । अत्यंत अधिक कष्ट । तकलीफ की हद ।

दुःखातीत
वि० [सं०] दुःख से परे । कष्ट से मुक्त [को०] ।

दुःखान्वित
वि० [सं०] दुःखी । दुःख में पड़ा हुआ [को०] ।

दुःखायतन
संज्ञा पुं० [सं०] संसार । जगत् ।

दुःखार्त
वि० [सं०] कष्ट से व्याकुल ।

दुःखित
वि० [सं०] पीड़ित । क्लेशित । जिसे कष्ट या तक- लीफ हो ।

दुःखिनी
वि० स्त्री० [सं०] जिसपर दुःख पड़ा हो । दुखिया ।

दुःखी
वि० [सं० दुःखिन्] [वि० स्त्री० दुःखिनी] जो कष्ट या या तकलीफ में हो ।

दुःशकुन
संज्ञा पुं० [सं०] बुरा शकुन । यात्रा आदि में दिखाई पड़नेवाला कोई ऐसा लक्षण जिसका बुरा फल समझा जाता है । जैसे, यात्रा में तेली का मिलना ।

दुःशाला
संज्ञा स्त्री० [सं०] गांधारी के गर्भ से उत्पन्न धृतराष्ट्र की कन्या जो सिंधु देश के राजा जयद्रथ को ब्याही थी । विशेष— जब महाभारत के युद्ध में जयद्रथ मारा गया तब इसने अपने छोटे से बालक सुरथ को राजसिंहासन पर बैठाकर बहुत दिनों तर राजकाज चलाया था । पाँड़वो के अश्वमेध के समय जब अर्जुज्ञ घोड़े को लेकर सिंधु देश में पहुँचे । तब सुरथ ने अपने पिता को मारनेवाले का युद्धार्थ आगमन सुनकर भय ये प्राणत्याग कर दिया । अर्जुन ने इस बात को सुनकर सुरथ के बालक पुत्र को सिहासन पर बैठाया ।

दुःशासन (१)
वि० [सं०] जिसपर शासन करना कठिन हो । जो किसी का दबाव न माने ।

दुःशासन (२)
संज्ञा पुं० धृतराष्ट्र के १०० लड़कों में से एक जो दुर्यो- धन का अत्यंत प्रेमपात्र और मंत्री था । विशेष— यह अत्यंत क्रूरस्वाभव था । पांड़व लोद जब जूए में हार गए थे तब यही द्रौपदी की पकड़कर सभास्थल में लाया था और उसका वस्त्र खींचना चाहता था । इसपर भीम सेन ने प्रतिज्ञा की थी कि मैं इसका रक्तापन करूँगा और जबतक इसके रक्त से द्रौपदी के बाल न रँगूगा तबतक वह बाल न बाँधेगी । महाभारत के युद्ध में भीमसेन ने अपनी यह भयंकर प्रतिज्ञा पूरी की थी ।

दुःशील
वि० [सं०] बुरे स्वभाव का । दुर्विनीत ।

दुःशीलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुष्टता । दुःस्वभाव ।

दुःशोध
वि० [सं०] १. जिसका सुधार कठिन हो । २. (धातु आदि) जिसका शोधना कठिन ठो ।

दुःश्रव
संज्ञा पुं० [सं०] काव्य़ में वह दोष जो कानों को कर्कश लगनेवाले वर्णो के आने से होता है । श्रुतिकटु दोष ।

दुःषम
वि० [सं०] निंदनीय । निंद्य ।

दुःषेध
वि० [सं०] जिसका निवारण कठिन हो ।

दुःसंकल्प (१)
संज्ञा पुं० [सं० दुःसङ्कल्प] बुरा इरादा । खोटा विचार ।

दुःसंकल्प (२)
वि० बुरा संकल्प करनेवाला । बुरा इरादा रखनेवाला । खोटी नीयत का ।

दुःसंग
संज्ञा पुं० [सं० दुःसङ्ग] बुरा साथ । कुसंग । बुरी सोहबत ।

दुःसंधान
संज्ञा पुं० [सं० दुःसन्धान] केशवदास में अनुसार काव्य में एक रस जो उस स्थल पर होता है जहाँ एक तो अनुकूल होता है और दूसरा प्रतिकूल, एक तो मेल की बात करता है और दुसरा बिगाड़ की । यथा, एक होय अनुकूल जहाँ दूजो है प्रतिकूल । केशव दुःसंधान रस सोभित तहाँ समूल । यह पाँच प्रकार के अनरसों में से माना गाया है ।

दुःसह
वि० [सं०] जिसका सहन करना कठिना कठिन हो । जो कष्ट से सहा जाय । अत्यंत कष्टदायक । जैसे, दुःसह पीड़ा ।

दुःसहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] नागदमनी ।

दुःसाध
वि० [सं०] दे० 'दुःसाध्य' [को०] ।

दुःसाधी
संज्ञा पुं० [सं० दुःसाधिन्] द्वारपाल ।

दुःसाध्य
वि० [सं०] १. जिसका साधन कठिन हो । जिसका करना मुश्किल हो । जैसे, दुःसाध्य कार्य । २. जिसका उपाय कठिन हो । जैसे, दुःसाध्य रोग ।

दुःसार †
वि० [सं० दुःशल्य] बुरे शल्यवाला (घाव) । वह (घाल या चोट) जो बराबर पीड़ा देती ही । उ०—लालन लोटहि पोट चोट जब्बर उर लागी । कियो हियो दुःसार पीर प्राननि मैं पागी ।— ब्रज० ग्रं०, पृ० १५ ।

दुःसाहस
संज्ञा पुं० [सं०] १. व्यर्थ का साहस । ऐसा साहस जिसका परिणाम कुछ न हो, या बुरा हो । ऐसी बात करने की हिम्मत जिसका होना असंभव हो या जिसका फल बुरा हो । जैसे,—उसे इस काम से रोकने जाना तु्म्हारा दुःसाहस मात्र है । (ख) चलती गाड़ी से कूदने का दुःसाहस कभी मत करना । २. अनुचित साहस । ऐसी बात करने की हि्म्मत जो अच्छी न समझी जाती हो । ढिठाई । धृष्टता । जैसे,— बड़ो की बात का उत्तर देना तुम्हारा दुःसाहस है ।

दुःसाहसिक
वि० [सं०] जिसे करने का साहस करना अनुचित या निष्फल हो । जिसके लिये हिम्मत करना बुरा हो । जैसे, दुःसाहसिक कार्य ।

दुःसाहसी
वि० [दुःसाहसिन्] बुरा साहस करनेवाला ।

दुःस्थ
वि० [सं०] १. जिसकी स्थिति बुरी हो । दुर्दशाग्रस्त्त । २. निर्धन । दरिद्र । ३. मूर्ख ।

दुःस्थिति
संज्ञा स्त्री० [सं०] बुरी अवस्था । दुरवस्था । दुर्दशा ।

दुःस्पर्श (१)
वि० [सं०] १. न छूने योग्य । जिसका छूना कठिन हो । २. जिसे पाना कठिन हो ।

दुःस्पर्श (२)
संज्ञा पुं० १. कपिकच्छु । केंवाच । २. लता करंज । ३. कंटकारी । ४. आकाशगंगा ।

दुःस्पर्शा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. काँटेदार मकोय । दे० 'दुःस्पर्श' ।

दुःस्फोट
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का शस्त्र [को०] ।

दुःस्वंप्न
संज्ञा पुं० [सं०] बुरा स्वप्न । ऐसा सपना जिसका फल बुरा माना जाता है । उ०— हुआ एक दुःस्वुप्न सा सखि कैसा उत्पात । जगने पर भी वह वैसा ही दिन रात ।— साकेत, पृ० २५१ । विशेष—क्या क्या स्वप्न देखने से क्या क्या फल होता है इसका वर्णान विस्तार के साथ ब्रह्मवैवर्तपुराण में है । स्वप्न में यदि कोई हँसे, नाचना गाना देखे तो समझे कि विपत्ति आनेवाली है । यदि अपने को तेल मलते, गदहे, भैंसे या ऊँट पर सवार होकर दक्षिण दिशा को जाते देखे तो समझना चाहिए कि मृत्यु निकत है । इसी प्रकार और बहुत से फल कहे गए हैं ।

दुःस्वभाव (१)
संज्ञा पुं० [सं०] बुरा स्वाभाव । दुःशीलता । बदमिजाजी ।

दुःस्वाभाव (२)
वि० दुःशील । दुष्ट स्वभाव का ।

दुःस्वरनाम
संज्ञा पुं० [सं०] वह पापकर्म जिसके उदय से प्राणियों के कठोर और हीन स्वर होते हैं (जैन) ।

दु
वि० [सं० द्वि प्रा०, दु या हिं० दो] 'दो' शब्द का संक्षिप्त रूप जो समास बनाने के काम में आता है । जैसे, दुविधा दुचित्ता ।

दुअ पु
वि० [सं० द्विक, प्रा० दुम] दोनों । युगल । उ०— दामिनि चमक चाह अधिकाई । दुअऊ चितै रहै चित लाई ।—इंद्रा० पृ०, ६० ।

दुअन
संज्ञा पुं० [सं० दुर्मनस् या दुर्जन] दे० 'दुवन' ।

दुअन्नी
संज्ञा स्त्री० [सं० द्वि + आणक; प्रा० दु + आणक; हिं० आना] रुपए का अष्टमांश सिक्का जिसकी चलन अब बंद हो गई है ।

दुअरवा †
संज्ञा पुं० [सं० द्वार] दे० 'दुआर', 'दुवार' । उ०— पियवा आय दुअरवा, उठि किन देख । दुरलभ पाय बिदेसिया, मुद अवरेख ।—रहीम (शब्द०) ।

दुअरिया †
संज्ञा स्त्री० [सं० द्वार (=दुआर) + इया (प्रत्य०)] दे० 'दुआरी 'दुवारी' । छोटा दरवाजा । उ०—छाकहु बइठ दुआरिया, मीजहु पाय । पिय पेखि गरमिया, विजन डोलाया ।—रहीम (शब्द०) ।

दुआ (१)
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. प्रार्थना । दरखास्त । बिनती । याचना । क्रि० प्र०—करना । मुहा०—दुआ माँगना = प्रार्थना करना । २. आशीर्वाद । असिस । क्रि० प्र०—देना । मुहा०—दुआ लगना = आशीर्वाद का फलीभूत होना ।

दुआ (२)
संज्ञा पुं० [हिं० दो] गले में पहनने का एक गहना ।

दुआगीर
वि० [अ० दुआ + फा० गीर] दे० 'दुआगो' । उ०— दुआगीर इक्क सुलक्खं सु चल्ले ।—ह० रासी०, पृ० ६७ ।

दुआगो
वि० [अ० दुआ + फा० गो] दुआ करनेवाला । शुभ- चिंतक । उ०— और कोई दुआगो बनकर पीछा नहीं छोड़ते ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ८६ ।

दुआगोई
संज्ञा स्त्री० [अ० दुआ + फा० गोई] दुआ देने की क्रिया या भाव [को०] ।

दुआदस पु †
संज्ञा पुं० [सं० द्वादश] दे० 'द्वादश' । उ०— ससिमुख अंग मलैगरि रानी । कनक सुगंध दुआदस बानी ।—जाय़सी ग्रं० (गुप्त), पृ० १८१ ।

दुआब
संज्ञा पुं० [फा० दुआबह्] दे० 'दुआबा' ।

दुआबा
संज्ञा पुं० [फा० दुआबह्] दो नदियों के बीच का प्रदेश ।

दुआय †
संज्ञा स्त्री० [अं० दुआ] दे० 'दुआ' । उ०—दुआय सलाम निवाज न कोई ।—प्राण०, पृ० १६० ।

दुआर †
संज्ञा पुं० [सं० द्वार] [स्त्री० दुआरी] द्वार । उ०— घरी पहर हो तो बचाए रहौं मेरी बीर देहरी दुआर दुख आठहू पहर को ।—ठाकुर०, पृ० ३ ।

दुआरा †
संज्ञा पुं० दे० 'दुआर' । उ०— (क) लंका बाँके चारि दुआरा ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) थोड़ी बेर में उस दुखी तिरिया ने कहा, मेरा जो ठिकाने नहीं है, झूठे ही मैं इधर उधर सिर मार रही हूँ, देखी दुआरा यही है, इसकी खोली ।—ठेठ०, पृ० ३८ ।

दुआरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुआर] छोटा दरवाजा । उ०— यह तो संत अविकस अधिकारी । केहि कारण आवै केहु दुआरी ।—कबीर सा०, पृ० ४८५ ।

दुआल
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. चमड़ा । चमड़े का तसमा । २. रिकाब का तसमा ।

दुआत्मा
संज्ञा पुं० [देश०] लकड़ी का एक बेलन जिसे सुनहरी छपी हुई छोटों के छापों को बैठाने के लिये फेरते हैं ।

दुआली
संज्ञा स्त्री० [फा०द्वाल (=तसमा)] खराद का तसमा । खराद की बद्धी । सान की बढ़ी । चमड़े का बह तमसा जिससे कसेर कून, सिकलीगर सान और बढ़ई खराद घुमाते हैं ।

दुइ †
वि० [सं० द्वि] दे० 'दो' । उ०— (क) तमारु एक पउआ दुइ उपस्थित सेव (कें) करु ।—वर्ण०, पृ० १२ । (ख) दुइ अंक अजपा जपहु अंतर तजहु सबै तेवान ।—जग० बानी, पृ० ८९ । (ग) साधो मन महँ करहुँ विचार । दुइ अच्छर भजि उतरह पार ।—जग० बानी, पृ० ६७ ।

दुइज पु † (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० द्वितीय, प्रा० दुईज] पाख की दूसरी तिर्थि । द्वितीया । दूज ।

दुइज
संज्ञा पुं० [सं० द्विज] दूज का चाँद । द्वितीया का चंद्रमा । उ०— कहों ललाट दुइज कइ जोती । दुइजाहि जोति कहाँ जग ओती ।—जायसी (शब्द०) ।

दुई
संज्ञा स्त्री० [हिं० दी + ई] दो की भावना । द्वैत भाव । भेद- भाव । उ०— कबीर इश्क का माता दुई को दूर कर दिल से । जो चलना राह नाजुक हैं हमन सर बोझ भारी क्या ।— कबीर० श०, भा० १, पृ० ७० ।

दुऊ
वि० [सं० द्वौ] 'दोनों' । उ०— देखि दुऊ भर पायन लीने ।—केशव (शब्द०) ।

दुऔ
वि० [सं० द्वौ] दे० 'दोनों' ।

दुकठिया पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो + काठी (= शरीर)] दो होने की भावना । द्वैत भाव । अपने परायेपन भी भावना । दुई । उ०— अबकी बार दुकठिया छूटे तुम लायक यहि थोरी ।— भीखा श०, पृ० ७२ ।

दुकड़हा
वि० [हिं० टुकड़ा + हा (प्रत्य०)] [वि० स्त्री दुकड़ही] १. जिसका मूल्य एक दुकड़ा हो । २. तुच्छ । नाचीज । ३. नीच । कमीन । अनादृत ।

दुकड़ा
संज्ञा पुं० [सं० द्विक+हिं० डा (प्रत्य०)][स्त्री दुकडी] १. वह वस्तु जो एक साथ या एक में लगी हुई दो दो हो । जोड़ा । जैसे, धोतियों का दुकड़ा, अँगौछों का दुकड़ा । २. वह जिसमें कोई वस्तु दो दो हो । वह जिसमें किसी वस्तु का जोड़ा हो । जैसे, चारपाई की टुकड़ी बुनावट, टुकड़ी गाड़ी । ३. दो दमड़ी । छदाम । एक पैसे का चौथाई भाग । विशेष— इसका हिसाब कौड़ियो से होता है । कहीं कहीं पाई को दुकड़ा मान लेते हैं यद्यपि उसका मूल्य एक पैसे का तिहाई होता है ।

दुकड़ी (१)
वि० स्त्री० [हिं० दुकड़ा] जिसमें कोई वस्तु दो दो हो ।

दुकड़ी (२)
संज्ञा स्त्री० १. चारपाई की वह बुनावट जिसमें दो दो वाध एक साथ बुने जाते हैं । २. दो बूटियोंवाला ताश का पत्ता । ३. दो घोड़ों की बग्धी । उ०— बेगम साहब इस ठस्से से दुकड़ी पर सवार हैं अभी कल तक सराय में अलारखी के नाम से मशहूर थी ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० ३४४ । ४. घोड़ों का सामान जो दोहरा हो ।

दुकड़ी (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो + कड़ी] १. वह लगाम जिसमें दो कड़ियाँ होती हैं । २. दो कड़ियों का बर्तन, कड़ाही कंड़ाल आदि ।

दुकना †
क्रि० अ० [देश०] लुकना । छिपना ।

दुकान
संज्ञा स्त्री० [फा०] वह स्थान जहाँ बेचने के लिये चीजें रखी हों ओर जहाँ ग्राहक जाकर उन्हें खरीदते हों । सौदा बिकने का स्थान । माल बिकने की जगह । हट्ट । हट्टी । जैसे, कपड़े की दुकान, हलवाई की दुकान, बिसाती की दुकान । क्रि० प्र०—खोलना ।—बंद करना । मुहा०—दुकान उठाना = (१) कारबार बंद करके दुकान छोड़ देना । (२) दुकान बंद करना । दुकान करना = दुकान लेकर किसी चीज की बिक्री प्रारंभ करना । दुकान जारी करना । दुकान खोलना । जैसे,—एक महीने से उन्होंने चौक में गोटे की दुकान की है । दुकान खोलना = दे० 'दुकान करना' । दुकान चलना = दुकान में होनेवाले व्यवसाय की वृद्धि होना । जैसे,—आजकल शहर में उनकी दुकान खूब चलती है । दुकान बढ़ाना = दुकान बंद करना । दुकान में बाहर रखा हुआ माल उठाकर किवाड़े बंद करना । जैसे— (क) उनकी दुकान रात को नौ बजे बढ़ती है । (ख) आज न्योते में जाना था इसीलिये दुकान जल्दी बढ़ा दी । दुकान लगाना = (१) दुकान का असबाब फैलाकर यथास्थान बिक्री के लिये रखना । वस्तुओं को बेचने के लिये फैलाकर रखना । जैसे,— जरा ठहरो दुकान लगा लें तो दें । (२) बहुत सी चीजों को इधर उधर फैलाकर रख देना । जैसे— वह लड़का जहाँ बैठता है वहाँ दुकान लगा देता है ।

दुकानदार
संज्ञा पुं० [फा०] १. दुकान का मालिक । दुकान पर बैठकर सौदा बेचनेवाला । वह जिसकी दुकान हो । दुकानवाला । २. वह जिसने आपनी आय के लिये कोई ढोंग रच रखा हो । जैसे,— उन्हें साधु या त्यागी कौन कहता है, वे तो पूरे दुकानदार हैं ।

दुकानदारी
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. दुकान या बिक्री बट्ट का काम । दुकान पर माल बेचने का काम । २. ढोंग रचकर रुपया पैदा करने का काम । जैसे,—,यह सब बाबा जो की दुकानदारी है ।

दुकाना †पु
क्रि० सं० [हिं० ढुकाना] छिपाना । दुराना । उ०— बाल के बालक जिये कहुँ लहैं । कब लग बाल दुकाए रहै ।—नंद ग्रं०, पृ० १४० ।

दुकाल
संज्ञा पुं० [सं० दुष्काल] अन्नकष्ट का समय । अकाल । दुर्भिक्ष । उ०—(क) कलिनाम । कामतरु राम को । दलन- हार दारिद दुकाल दुख दोष धोर धनधाम को ।—तुलसी (शब्द०) (ख) कलि बारहि बार दुकाल परै । बिन अन्न दुःखी सब लोग मरै ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुकुल्ली
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार का पुराना बाजा जिसपर चमड़ा मढ़ा होता है ।

दुकूल
संज्ञा पुं० [सं०] १. क्षौम वस्त्र । सन या तीसो के रेशे का बना कपड़ा । २. महीन कपड़ा । बारीक कपड़ा । ३. वस्त्र । कपड़ा । उ०— खग मृग परिजन, नगर वन, बल कल विमल दुकूल । नाथ साथ सुरसदन सम, परनसाल सुख- मूल ।—तुलसी (शब्द०) । ४. बौद्धों के शाम जातक के अनुसार शाम के पिता का नाम जो एक मुनि थे । विशेष— शाम जातक में लिखा है कि एक दिन दुकूल अपनी पत्नी परिखा के सहित फलमूल की खोज में बन में गए । वहाँ किसी दुर्घटना से दोनों अंधे हो गए । शाम दोनों को ढूँढ़कर बन से लाए और अनन्य भाव से दोनों की सेवा करने लगे । एक दिन संध्या की वे अंधे मातापिता को छोड़ नदी से जल लाने गए वहाँ किसी राजा ने मृग समझकर उनपर तीर चलाया । तीर लगने से शाम की मृत्यु हो गई । राजा शाम से अंधे मातापिता के पास आए और अन्होंने उनसे सब समाचार कह सुनाया । सबके सब मृत शाम के पास शोक करते पहुँचे । परिखा ने कहा यदि मेरा पुत्र सच्चा ब्रह्माचारी रहा हो ओर बुद्धदेव में उसकी सच्ची भक्ति रही हो तो मेरा पु्त्र जी जाय । इस प्रकार की सत्य क्रिया करने पर शाम जी उठे और एक देवी ने प्रकट होकट उनके माता पिता का अंधापन भी दूर किया । बौद्धों का यह आख्यान रामायण में दिए हुए अँधक मुनि के आख्यान का अनुकरण है जिसमें उनके पुत्र सिंधु को महाराज दशरथ ने मारा था । अंतर इतना था कि रामायण में दोनों अंधों का पुत्रशोक में प्राणत्याग करना लिखा है और शाम जातक मे शाम का जी उठना और अंधों ता दृष्टि पाना लिखा गया है ।

दुकूलिनी
संज्ञा स्त्री० [सं०] सरिता । नदी ।

दुकृत पु
संज्ञा पुं० [सं० दुष्कृत] दे० 'दुष्कृत' । उ०— तुम हित कौन दुकृत नहि किए । पन्नग फन परि मैं पग दिए ।— नंद० ग्रं०, पृ० १५९ ।

दुकेला
क्रि० वि० [हिं० दुक्का + एला (प्रत्य०)] [स्त्री० दुकेली] जिसके साथ कोई दूसरा भी हो । जो अकेला न हो । यौ०—अकेला दुकेला = जिसके साथ कोई न हो या एक ही दो आदमी होँ । जैसे,— (क) जहाँ कोई अकेला दुकेला निकला कि डाकुओं ने आ घेरा । (ख) कोई अकेली दुकेली सवारी मिले तो बैठा लेना ।

दुकेले
क्रि० वि० [हिं० दुकेला] किसी के साथ । दूसरे आदमी को साथ लिए हुए । थौ०— अकेले दुकेले = बिना किसी को साथ लिए या एक ही दो आदमियों के साथ । जैसे,— (क) वह तुम्हें अकेले दुकेले पावेगा तो जरूर मारेगा । (ख) अकेले दुकेले मत निकलना ।

दुक्कड़
संज्ञा पुं० [हिं० दो + कूँड़] १. तबले की तरह का एक बाजा । यह बाजा शाहनाई के साथ बजाया जाता है । इसमें एक कूँड़ बहुत ब़ड़ी और दूसरी छोटी होती है । २. एक में जुड़ी हुई या साथ पटी हुई दो नावों का जोड़ा ।

दुक्का (१)
वि० [सं० द्विक] [वि० स्त्री० दुक्की] १. जो एक साथ दो हों । जिसके साथ कोई दूसरा भी हो । जो अकेला न हो (व्यक्ति) । यौ०— इक्का दुक्का = अकेला दुकेला । २. जो जोड़ में हो । जो एक साथ दो हो (वस्तु) । ३. जिसमें कोई वस्तु एक साथ दो हों ।

दुक्का (२)
संज्ञा पुं० ताश का वह पत्ता जिसपर दो बूटियाँ बनी हों ।

दुक्की
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुक्का] ताशा का वह पत्ता जिसपर दो बुटियाँ बनी हों ।

दुक्ख पु †
संज्ञा पुं० [सं० दुःख, प्रा० दुक्ख] दे० 'दुःख' । उ०— तेहि क उतर पदुमावति कहा । बिछुरन दुक्ख हिएँ भरि रहा ।— पदमावत, पृ०, २३९ ।

दुक्रित पु †
वि० [हिं० दु + क्रित] विशाल । भंयकर । आगध । दे० 'दुष्कृत' । उ०— चिंते रिष्षि देखि बिल दुक्रित । उर लग्गी अति चिंत मभिझ हित ।—पृ०, रा०, १ । १७३ ।

दुखंड
वि० पुं० [सं० द्वि+खण्ड] दो टुकड़े । छिन्न भिन्न । उ०— गुरुमुख्य बासा पिंड में मनमुख्य ह्वै ब्रह्मंड । रज्जब भीतर में नहीं बाहर खंड दुखंड ।— रज्जब०, पृ० ७ ।

दुखंडा
वि० [हिं० दो + खंड] दोतल्ला । जिसमें दो खंड हों । दो मरातिब का । जैसे, दुखंडा मकान । दो खंड या टुकडोंवाली वस्तु ।

दुखंत † (१)
संज्ञा पुं० [सं० दुष्यंत] दे० 'दुष्यंत' । उ०— जस दुखंत कहै साकुतला । माधोनालहि कामकंदला । —जायसी ग्रं०, (गुप्त) पृ० २५५ ।

दुखंत † (२)
वि० [सं० दुःखान्त] जिसकी समाप्ति दुःखपूर्ण हो । वियोगांत । दुःखांत ।

दुख
संज्ञा पुं० [सं० दुःख] दे० 'दुःख' । मुहा०—दुख का मारा = विपात्ति में पड़ा । दुःखी । उ०— कोई आवे दुख का मारा, हम पर किरपा कीजै जी ।—कबीर श०, भा० २, पृ० १०३ । दूःख का दूर भागना = दुःख मिट जाना । विशोक हो जाना । उ०— जानति नहीं कहूँ नहिं देखे मिलि, गई ऐसैं मनहु सगे । सूर स्याम ऐसे तुम देखे मैं जानति दुख दुरि भगे ।—सूर, १० । १७८१ ।

दुखड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० दुख + ड़ा (प्रत्य०)] १. दुःख का वृत्तांत । दुःख की कथा जिसमें किसी के कष्ट या शोक का वर्णन हो । तकलीफ का हाल । क्रि० प्र०—कहना ।—सुनाना । मुहा०—दुखड़ा रोना = अपने दुःख का वृत्तांत कहना । अपने कष्ट का हाल सुनाना । २. कष्ट । तकलीफ । मुसीबत । विपत्ति । क्रि० प्र०— पड़ाना । मुहा०—किसी स्त्री पर दुखड़ा पड़ना = (किसी स्त्री का) राँड़ हो जाना । विधवा हो जाना । (स्त्रि०) । दुखड़ा पीटना = कष्ट भोगना । बहुत परिश्रम और कष्ट से जीवन बिताना । (स्त्रि०) । दुखड़ा भरना = दे० 'दुखड़ा पीटना' ।

दुखतर
संज्ञा स्त्री० [फा० दुखतर] पुत्री । लड़की । धी । उ०— शाहजहाँ के खानदान की बची बचाई सब कुछ मुगलानी उर्दू की दुखतर नेक अख्तर बीबी चंद्रिका जौहर कि जिसका इस बृद्धावस्था में विद्यार्थी शौहर हुआ है ।— प्रेमघन० भा० २, पृ० २४ ।

दुखदंद
संज्ञा पुं० [सं० दुःखद्वन्द्व] दुःख और कष्ट । दे० 'दुखदुंद' उ०— कहत रविराम तोहिं सुझत न कछु काँम धाँम धँन धरा धनि माँन दुखदंद में ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ४३२ ।

दुखद
वि० [सं० दुःखद] दे० 'दुःखद' ।

दुखदाइक
वि० [सं० दुःख + दायक] दे० 'दुःखद' । उ०— सब मद तैं धनमद दुखदाइक ।—नंद० ग्रं०, पृ० २१४ ।

दुखदाई पु
वि० [सं० दुःखदायी] दे० 'दुःखदायी' । उ०— खल कर संग सदा दुखदाई ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुखदानि पु
वि० [सं० दुःख + दान] दुःख देनेवाली । तकलीप पहुँचानेवाली । उ०— यह सुनि गुरुबानी धनु गुन तानी जाने द्विज दुखदानि ।— केशव (शब्द०) ।

दुखदुंद पु
संज्ञा पुं० [सं० दुःखद्वैद्व] दुःख का उपद्रव । दुःख और आपत्ति । उ०— छन महे सकल निशाचर मारे । हरे सकल दुखदुंद हमारे ।—सूर (शब्द०) ।

दुखदैना पु
वि० [सं०] दे० 'दुःखदायी' । उ०—खंजन प्रकट किए दुखदैना । संजोगिनि तिय के से नैना ।—नंद० ग्रं० पृ० १६८ ।

दुखना
क्रि० अ० [सं० दुःख से नामिक धातु] (किसी अंग का) पीड़ित होना । दर्द करना । पीड़ायुक्त होना । जैसे, आँख दुखना, पैर दुखना ।

दुखरा पु
संज्ञा पुं० [हिं० दुख + रा (प्रत्य०)] दे० 'दुखड़ा' उ०— सुख दुख की साझनि साखिनियाँ मिलि पूछति हैं दुखर तिय कौ ।— शकुंतला, पृ० ४९ ।

दुखवना †
क्रि० सं० [हिं० दुखाना] दे० 'दुखाना' । उ०— नाहि है केशव साख जिन्हें बकि कै तिनसों दुखवै मुख को, री ?— केशव (शब्द०) ।

दुखहाया †
वि० [हिं० दुख + हाया (प्रत्य०)] [वि० स्त्री० दुखहाई] दुःख से भरा हुआ । दुःखित । उ०— दुःखहाइनु चरचा नही आनन आनन आन । लगी फिरै ढूका दिए कानन कानन कान ।—बिहारी (शब्द०) ।

दुखाना
क्रि० सं० [सं० दुःख] १. पीड़ा देना । । कष्ट पहुँचाना व्यथित करना । मुहा०— जो दुखाना = मानसिक कष्ट पहुँचाना । मन में दुःख उत्पन्न करना । जैसे,—कड़ी बात कहकर क्यों किसी का जी दुखाते हो ? २. किसी के मर्मस्थान या पके घाव इत्यादि के छू देना जिससे उसमें पीड़ा हो । जैसे, फोड़ा दुखाना ।

दुखारा
वि० [हिं० दुख + आर (प्रत्य०)] दुःखी । पीड़ित । उ०— एक कल्प सुर देखि दुखारे ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुखारी
वि० [हिं० दुख + आर (प्रत्य०)] दुःखी । व्यथित । खिन्न । उ०— जे न मित्र दुख होहिं दुखारी । तिनहि बिलोकत पातक भारी ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुखारो पु
वि० [हिं०] दे० 'दुखारा' ।

दुखित पु
वि० [सं० दुखित] दे० 'दुःखित' । उ०— गहि गिरि तरु अकास कपि घावहिं । देखहि न दुखित फिरि आवहिं ।— मानस, ६ । ७२ ।

दुखिया
वि० [हिं० दुःख + इया (प्रत्य०)] दुःखी । जो दुःख में पड़ा हो । जिसे किसी प्रकार का कष्ट हो । उ०— तुम ऐसे कठिन समय में दुखिया माँ को छोड़कर कहाँ गए? —भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ३११ । यौ०—दीन दुखिया ।

दुखियारा
वि० [हिं० दुखिया] [वि० स्त्री० दुखियारी] १. दुखिया । जिसे किसी बात का दुःख हो । २. जिसे कोई शारीरिक पीड़ा हो । रोगी ।

दुखी
वि० [सं० दुःखित, दुःखी] १. जिसे दुःख हो । जो कष्ट या दुःख में हो । उ०— धन हीन दुःखी ममता बहुधा ।—तुलसी (शब्द०) । २. जिसे मानसिक कष्ट पहँचा हो । जिसके चित्त में खेद उत्पन्न हुआ हो । जिसके दिल में रंज हो । जैसे,— उसकी बात सुनकर में बड़ा दुखी हुआ । ३. रोगी । बीमार ।

दुखीला †
वि० [सं० दुख + ईला (प्रत्य०)] दुःखपूर्ण । दुःख अनुभव करनेवाला । उ०— गर्भवती की चाह से दुखीले स्वभाव को पहुँचकर उसने जो कहा सोई लाया हुआ देखा ।—लक्ष्मणसिंह (शब्द०) ।

दुखोहाँ पु
वि० [हिं० दुख + ओहीं] [स्त्री० दुखोहीं] दुःखदायी । दुःख देनेवाला । उ०—तोहि पैड़ै कहाँ चलिये कबहूँ जेहि काँटो लगै पग पीर दुखोहीं ।—केशव (शब्द०) ।

दुख्त
संज्ञा स्त्री० [फा० दुख्तर का संक्षिप्त रूप] दे० 'दुख्तर' । यौ०—दुख्ते रज = अंगूरी शराब । उ०— जो बहके दुख्तेरज से हैं वह कब इनसे बहकते हैं ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ८४७ ।

दुख्तर
संज्ञा स्त्री० [फा० दुख्तर] पुत्री । कन्या [को०] । यौ०—दुख्तरे खाना = कुमारी कन्या । दुख्तरे खीबा = सौत की लड़की । सौतेली । कन्या । दुख्तरे रज = अंगुर की बेटी । अंगूर की शराब ।

दुग
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'धुक' ।

दुगई
संज्ञा स्त्री० [देश०] औसारा । बरामदा । उ०— अति अदभुत थंभन की दुगई । गज दंत सुचंदन चित्रमई ।—केशव (शब्द०) ।

दुगण
वि० [सं० द्विगुण] दे० 'द्विगुण' ।

दुगदुगी
संज्ञा स्त्री० [अनु० धुक धुक] १. बह गड्ढा जो गरदन के नीचे और छाती के ऊपर बीचीबीच होता है । धुकधुकी । मुहा०— दुगदुगी में दम होना = प्राण का कँठगत होना । २. गले में पहनने का एक गहना जो छाती के ऊपर तक लटका रहता है ।

दुगध
संज्ञा पुं० [सं० दुग्ध] दे० 'दुग्ध' । उ०—इहै तिथ सी महिमा गाए । धेनु दुगध तैं आनि न्हवाए । जैसे ध्याए तैसे पाए । इतनी कहि सिध ऊठि सिधाए ।—पृ०, रा०, १ । ४०० । यौ०—दुगधनदीस = क्षीरसागर । दूध का समुद्र । उ०— इंद्र को अनुज हेरे दुगधनदीस की ।—भूषण ग्रं०, पृ० ६७ ।

दुगधा †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दुबधा' ।

दुगन (१)
वि० [सं० द्विगुण] दे० 'दुगना' ।

दुगन (२)
संज्ञा स्त्री० बाजे की दुनी तेज आवाज । दुन ।

दुगाना (१)
वि० [सं० द्विगुण] [वि० स्त्री० दुगनी] किसी वस्तु से उतना और अधिक जितनी कि वह हो । द्विगुण । दुना । जैसे,—(क) चार का दुगना आठ ।(ख) यह चादर उसकी दुगनी है ।

दुगना † (२)
क्रि० अ० [देश०] दे० 'दुकना' ।

दुगनित
वि० [सं० द्विगुणित ] दुगुना । दुना । उ०— आजु ब्रज छबि की छूट परै । इत नँदलाल लाडिली उत इत दीपक ज्योति बरै । इत जरतार तास बागो उत भूषण झलक परै । इत नवखंड सीसमहला उत दुगनित बिंब परै ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० २, पृ० ८३ ।

दुगर्दनिया बैठक
संज्ञा स्त्री० [हिं०] कुश्ती का एक पेंच जो उस समय किया जाता है जब पहलवान का एक हाथ जो़ड़ की गरदन पर होता है और जो़ड़ का वही हाथ पहलवान की गरदन पर होता है । इसमें पहलवान दूसरा खाली हाथ बढ़ाकर जोड़ के जंघों में देता है और बैठक करके गरदन दबाते हुए उसे फेंक देता है ।

दुगाँम †
वि० [सं० दुर्गम, प्रा०, दुग्गम] दुर्गम । उ०— ऐ बरियाम निहस्सिया, दोय घड़ी इक जाम । अजबी वीठलदास रौ, पड़ियौ खेत दुगँम—रा०, रू० पृ०, २०७ ।

दुगाड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० दो + गाड़(= गड्ढा)] १. दुनाली बंदूक । दोनली बंदूक । २. दोहरी गोली ।

दुगाना (१)
संज्ञा पुं० [फा० दुगानह्] वह फल जिसमें दो फल जुड़े हो । जैसे, दुगाना आम ।

दुगाना † (२)
क्रि० सं० [देश० दुकना] ढुकाना । छिपाना ।

दुगासरा
संज्ञा पुं० [सं० दुर्ग + आश्रय] वह गाँव जो किसी दुर्ग के किनारे हो । किसी दुर्ग के नीचे या चारों ओर बसा हुआ गाँव । उ०— गह्यौ धँधेरन दुरग आसरो । गाँउँ गढ़ी को दृढ़ दुगासरो ।—लाल (शब्द०) ।

दुगुण पु
वि० [सं० द्विगुण] दे० 'द्विगुण' ।

दुगुन पु †
वि० [सं० द्विगुण] दे० 'दुगना' । उ०— जस जस सुरसा बदन बढ़ावा । तासु दुगुन कपि रूप देखावा ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुगूण पु
वि० [सं० द्विगुण] दे० 'द्विगुण' ।

दुगुन पु †
वि० [सं० द्विगुण] दे० 'दुगाना' । उ०— जस जस सुरसा बदन बढ़ावा । तासु दुगुन कपि रूप देखावा ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुगून
वि० [हिं० दुगुन] दे० 'दुगुन' ।

दुगूल पु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दुकूल' [को०] ।

दुग्ग पु
संज्ञा पुं० [सं० दुर्ग प्रा० दुग्ग] दे० 'दुर्ग' । उ०— सदा दान किरवान मैं, जाके आनन अंभु । साहि निजाम सखा भयो दुग्ग देवगिरि खंभु ।—भूषण ग्रं० पृ० ६ ।

दुग्गम पु
वि० [सं० दुर्गम, प्रा० दुग्गम] दे० 'दुर्गम' । उ०— दूर दुग्गम दमसि भञ्जोओ । गाढ गढ़ गूढ़ीअ गञ्जोओ ।—विद्या- पति, पृ० १० ।

दुग्ध (१)
वि० [सं०] १. दुहा हुआ । २. भरा हुआ । परिपूर्ण । ३. खींचा हुआ । चूसा हुआ । बाहर निकाला हुआ (को०) ।

दुग्ध (२)
संज्ञा पुं० १. दूध । २. पौधों का श्वेत रस जो दूध सा होता है (को०) । ३. दोहना । दूहना (को०) ।

दुग्धकूपिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] भावप्रकाश मे लिखा हुआ एक प्रकार का पकवान जो पिसे हुए चावल और दूध के छेने से बनता है । विशेष— छेने के साथ चावल की गोल लोई बनावे और उसमें गड्ढ़ा करे । फिर इस लोई को थोड़ा घी में तलकर उसके गड़ढे में खूब गाढ़ा दूध भर दे और गड्ढे का मुँह मैदे से बंद कर दे । फिर इस दूध भरे हुए बडे़ को घी में तलकर चाशनी में डाल दे । यह पकवान वायु, पित्त का नाशक, बलकारक, शुक्रवर्धक और दृष्टिवर्धक होता है ।

दुग्धतालीय
संज्ञा पुं० [सं०] १. दूध का फेन । २. मलाई ।

दुग्धदा
संज्ञा स्त्री० [सं०] गाय । दूध देनेवाली गाय [को०] ।

दुग्धपाचन
संज्ञा पुं० [सं०] १. दूध गरम करने या औटाने का पात्र । २. एक प्रकार का नमक [को०] ।

दुग्धपाषाशा
संज्ञा पुं० [सं०] एक पेड़ जिसे बंगाल की और शिर- गोला कहते हैं ।

दुग्धपुच्छी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक पेड़ का नाम । पर्या०—सेवाकाल । नसंकरी । निशाभँगा । दुग्धपेया ।

दुग्धपुष्पी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दुग्धपुच्छी' [को०] ।

दुग्धपोष्य
वि० [सं०] (बालक) जो माता का दूध पीकर रहता- हो । दुधमुहाँ । (बच्चा) ।

दुग्धफेन
संज्ञा पुं० [सं०] १. दूध का फेन । २. एक पौधा । क्षीर हिडीर ।

दुग्धफेनी
संज्ञा पुं० [सं०] एक छोटा पौधा । पयस्विनी । लूतारि । गोजापर्णी ।

दुग्धबंध
संज्ञा पुं० [सं० दुग्धवन्ध] खूँटा जिसमें दूध दुहने के समय गायें बाँधते हैं । दुग्धबंधक [को०] ।

दुग्धबंधक
संज्ञा पुं० [सं० दुग्धवंधक] दे० 'दुग्धवंध' [को०] ।

दुग्धबीजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्वार । जुन्हरी जिसके दानों में से सफेद रस या दूध निकलता है ।

दुग्धशाला
संज्ञा स्त्री० [सं० दुग्ध + शाला] वह स्थान जहाँ गाएँ रखी जाती हैं और दूध का व्यापार होता है ।

दुग्धसमुद्र
संज्ञा पुं० [सं०] क्षीरसमुद्र । पुराणानुसार सात समुद्रों में से एक । क्षीरसागर । यौ०— दुग्धसमुद्रतनया = लक्ष्मी ।

दुग्धांक
संज्ञा पुं० [सं० दुग्धाङ्ग] एक प्रकार का पत्थर । दे० 'दुग्धाक्ष' [को०] ।

दुग्धाक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का नग या पत्थर जिसपर सफेद सफेद छींटे होते हैं ।

दुग्धाग्र
संज्ञा पुं० [सं०] मलाई [को०] ।

दुग्धाब्धि
संज्ञा पुं० [सं०] क्षीरसमुद्र ।

दुग्धाब्धितनया
संज्ञा स्त्री० [सं०] लक्ष्मी ।

दुग्धाश्मा
संज्ञा पुं० [सं० दुग्धाश्मन्] दुग्धपाषाण ।

दुग्धिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दुद्धी नाम की घास या बूटी । २. गंधिका नाम की घास ।

दुग्धिनिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] लाल चिचड़ा । रक्तापामार्ग ।

दुग्धी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुधिया नाम की घास । दुद्धी ।

दुग्धी (२)
वि० [सं० दुग्धिन्] दूधवाला । जिसमें दूध हो ।

दुग्धी (३)
संज्ञा पुं० [सं० दुग्धिन्] क्षीरवृक्ष ।

दुध
वि० [सं०] (समासांत में प्रयुक्त) देनेवाला । प्रदाता । जैसे, कामदुध = कामनाओं को देने या पूरा करनेवाला ।

दुघड़िया
वि० [हिं० दो घड़ी] दो घड़ी का । जैसे,—दुघड़िया सायत, दुघडिया मुहूर्त । उ०—लगन दुघड़ियो शुभ अशुभ रामवान ब्रजनाम ।—राम० धर्म०, पृ० ३२१ ।

दुघड़िया मुहूर्त
संज्ञा पुं० [हिं० दो घड़ी + मुहूर्त] दो दो घड़ियों के अनुसार निकाला हुआ मुहूर्त । द्विघटिका मुहूर्त । विशेष ।—यह मुहूर्त होरा के अनुसार निकाला जाता है । रात दिन की साठ घड़ियों को दो दो घड़ियों में विभक्त करते हैं और फिर राशि के अनुसार शुभाशुभ समय का विचार करते हैं । इसमें दिन का विचार नहीं किया जाता है । सब दिन सब ओर की यात्रा का विधान है । इस प्रकार का मुहूर्त उस समय देखा जाता है जब यात्रा किसी दूसरे दिन पर टाली नहीं जा सकती ।

दुधरी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो + घड़ी] दुघड़िया मुहूर्त । उ०— दुघरी साध चले ततकाला । किय विश्राम न मगु महिपाला ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुधा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुध देनेवाली गाय । गो जो दुध देती हो [को०] ।

दुचंद
वि० [फा० दाचंद] दूना । द्विगुण । दुगना । उ०— (क) पापन का पाँति महामंद मुख मैली भई, दीपति दुचंद फैली धरम समाज की ।—पद्माकर (शब्द०) । (ख) आज नँदनंद जू आनँद भरे खेलैं फाग, कोटि चंद ते दुचंद भालदुति लाल की ।—दीनदयाल (शब्द०) ।

दुचल्ला
संज्ञा पुं० [हिं० दो + चाल] वह छत जिसके दोनों ओर ढाल हो ।

दुचित
वि० [हिं० दो + चित्त] १. जिसका चित्त एक बात पर स्थिर न हो । जो दुबिधे में हो । जो कभी एक बात की ओर प्रवृत्त हो, कभी दूसरी । अस्थिरचित्त । उ०—दुचित कतहुँ परितोष न लहहीं ।—तुलसी (शब्द०) । २.चिंतित । फिक्रमंद । उ०—बीत सगए तिहुँ काल कछु भयो न ताके बाल । जऊ सुचित सब दुखनि सो दुचित भयो भूपाल ।—गुमान (शब्द०) ।

दुचितई †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुचित] १. एक बात पर चित्त के न जमने की क्रिया या भाव । चित्त की अस्थिरता । दुबिधा । उ०—सोचत जनक पोच पेंच परि गई है । जोरि करकमल निहोरि कहैं कौसिक सों, आयसु भो राम को सो मेरे दुचितई है ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ३१३ । २. खटका । आशंका । चिंता । उ०—शाह सुवन हरि रति बाढ़ी । तासु विछोह दुचितई गाढ़ी ।—रघुराज (शब्द०) ।

दुचिताई †पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुचित] १. चित्त की अस्थिरता । दुबिधा । संदेह । उ०—(क) साँचो कहुहु देखि सुनि कै सुख छाँड़हु छिया कुटिल दुचिताई ।—केशव (शब्द०) । २. खटका । चिंता । आशंका । उ०—जब आनि भई सबको दुचिताई । कहि केशव काहुपै मेटि न जाई ।—केशव (शब्द०) ।

दुचित्ता
वि० [हिं० दो + चित्त] [वि० स्त्री० दुचिती] १. जिसका चित्त एक बात पर स्थिर न हो । जो कभी एक बात की ओर प्रवृत्त हो और कभी दूसरो । जो दुबिधे में हो । अस्थिरचित्त । अव्यवस्थितचित्त । २. संदेह मैं पड़ा हुआ । जिसके चित्त में खटका हो । चिंतित ।

दुचित्ती
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुचित्ता] दुचित्तत्ता की स्थिति ।

दुच्छक
संज्ञा पुं० [सं०] कपूर कचरी । मुरा नामक गंधद्रव्य । गंधकुटी ।

दुछण पु
संज्ञा पुं० [सं० द्वेषण (=शत्रु)] सिंह (डिं०) ।

दुछताना †
क्रि० अ० [हिं० दुचित या देश०] पछताना । उ०— मेघनाद संगर परिव, गयव सुर्ग चितु लाय । कहिय खबर भग्गुलन तन, मन जू मनि दुछताय ।—प० रासो, पृ० १५४ ।

दुछोल पु
वि० [हिं० द्रु (=दो) छोर] छोर । दोनों ओर मिला हुआ । दोरंगा । दो तरह का । दो प्रकार का उ०—पठयो मदन बसीठ ही ढीठ महामद लोल । छिन औरे छिन और सों छाक्यो छैल दुछौल ।—छीत०, पृ० २५ ।

दुज पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विज] १. दे० 'द्विज' । २. पक्षी । उ०— दुज वर कोकिल साखिता देल ।—विद्यापति, पृ० १०६ । ३. दाँत । दशन । उ०—अरुन अधर, दुज कोटि वज्र दुति ससि घन रूूप समाने । कुंचित अलक सिलीमुख मिलि मनु लै मकरंद उड़ाने ।—सूर०, १० । १७९४ । यौ०—दुजगन = दाँतों की पंक्ति । उ०—संजम राखत केस नयन हू काननचारी । मुखहू माहिं पवित्र रहत दुजगन सुखकारी ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० १०२ ।

दुजड़ पु
संज्ञा स्त्री० [देश०] तलवा्र । उ०—बंस मद्धकर ऊधरा, दुजड़ उजोगर देस ।—रा० रू०, पृ० ४४ ।

दुजड़ो
संज्ञा स्त्री० [देश०] कटारी । (ड़िं०) ।

दुजन
संज्ञा पुं० [सं० दुर्जन] दे० 'दुर्जन' । उ०—तापितं दुजन कों है देत सुमनै सुखाय लगैं अति कानन मैं बात ताप मैं बली ।—दीन ग्रं०, पृ० ४५ ।

दुजनता पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दुर्जनता] दुष्टता । उ०— देखहु नाथ दुजनता मेरी । महिमा कह्यौ प्रभु केरी ।—नंद० ग्रं०, पृ० २७० ।

दुजन्मा पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विजन्मा] दे० 'द्विजन्मा' ।

दुजपति
संज्ञा पुं० [सं० द्विजपति] १. दे० 'द्विजपति' । २. चंद्रमा । उ०—दुजपति अंकह हिरन इक्क निभ्भय सुभाय अति ।— पृ० रा०, ६ । ९९ ।

दुजबर पु
वि० [सं० द्विजवर] ब्राह्मण । उ०—दुजबर एकु सुदामा नामा ।—नंद० ग्रं०, पृ० २१२ ।

दुजराइ पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विजराज] २. ब्राह्मण । द्विजरज । उ०—देखि राज बिसमित भयौ ब्यासहि लीन बुलाइ । भेड़ लरे क्यों व्याघ्र सौं कहौ बैन दुजराई ।—प० रासो०, पृ० २ । २. चंद्रमा ।

दुजराज पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विजराज] दे० 'द्विजराज' ।

दुजाई †पु
संज्ञा स्त्री० [सं० द्विज, हिं० दुज + आई (प्रत्य०)] द्विजत्व । ब्राह्माणत्व । उ०—तपस्या ठकुराई छीन थाई मिट दुहाई देश ए । चाकर दुजाई पाप माई सुद्ध आई वेश ए ।— राम० धर्म०, पृ० २८७ ।

दुजाति पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विजाति] दे० 'द्विजाति' ।

दुजानू
क्रि० वि० [फा० दोजानूँ] दोनों घुटने के बल । जैसे, दुजानू बैठाना ।

दुजीह पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विजिह्व] दे० 'द्विजिह्व' ।

दुजेश
संज्ञा पुं० [सं० द्विजेश] दे० 'द्विजेश' ।

दुज्जन पु
संज्ञा पुं० [सं० दुर्जन, प्रा० दुज्जण] दे० 'दुर्जन' । उ०— (क) सुअण पसंसइ कब्ब मझ, दुज्जन बोलई मंद ।—कीर्ति०, पृ० ४ । (ख) दुज्जन को दाह कर दसहू दिसान में ।— मतिराम (शब्द०) ।

दुज्द
संज्ञा पुं० [फा० दुज्द] चोर । उ०—बुजुरगी किया अज मुबारक जबाँ । बनाया उन्हें दुज्द के पासबाँ ।—कबीर मं०, पृ १३१ ।

दुझाल पु †
वि० [देश०] १. असह्य । २. दोनों हाथों से शस्त्र धारण करनेवाला । उ०—निहसे खलाँ नवल्ल रौ, अग्गे दलाँ दुझाल । हिच पड़ियौ रज रज हुवे, साँदू सूरजमाल ।— रा० रू०, पृ० ४० ।

दुटूक
वि० [हिं० दो + टूक] दो टुकड़ों में किया हुआ । खंडित । उ०—कियो दुटूक चाप देखत ही रहे चकित सब ठाढ़े ।— सूर (शब्द०) । मुहा०—दुटूक बात = थोड़े में कही हुई साफ बात । बिना घुमाव फिराव की स्फष्ट बात । ऐसी बात जो लगी लिपटी न हो । खरी बात । जैसे,—हम तो दुटूक बात कहते हैं, चाहे बुरी लगे या भली ।

दुड़ना †
क्रि० अ० [हिं० दुरना] छिपना । लुकना । ओट होना ।उ०—सोहै अँगिया ओट हरी रंग साज मैं । दुड़िया चकवा दोय सिवाँल समाज मैं ।—बाँकी० ग्रं०, भा० ३, पृ० ३७ ।

दुड़ि
संज्ञा स्त्री० [सं० दुडि] दुलि । कच्छपी ।

दुड़ियंद
संज्ञा पुं० [? या सं० द्युति + अप० यंद] सूर्य (डिं०) ।

दुड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो + ड़ी (प्रत्य०)] ताश का वह पत्ता जिसमें दो बूटियाँ होती हैं । दुक्की ।

दुत (१)
अव्य० [अनु०] १. एक शब्द जो तिरस्कारपूर्वक हटाने के समय बोला जाता है । दूर हो । २. एक शब्द जो उस मनुष्य के प्रति बोला जाता है जो कोई मूर्खता की या अनुचित बात कहता अथवा करता है । घृणा या तिरस्कारसूचक शब्द । विशेष—कभी कभी लोग बच्चों को प्यार से भी दुत कह देते हैं ।

दुत पु † (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० द्युति] द्युति । ज्योति । प्रकाश । उ०— पै संज्ञा कीरत मुख पीताँ वारज अथध मूल दुत वीस ।— रघु० रू०, पृ० २४९ ।

दुतकार
संज्ञा स्त्री० [अनु० दुत + कार] वचन द्वीरा किया हुआ अपमान । तिरस्कार । धिक्कार । फटकार । क्रि० प्र०—देना ।—बतलाना ।—मिलना ।

दुतकारना
क्रि० स० [हिं० दुतकार + ना (प्रत्य०)] १. दुत् दुत् शब्द करके किसी को अपने पास से हटाना । २. तिरस्कृत करना । धिक्कारना ।

दुतर पु †
वि० [सं० दुस्तर, प्रा० दुत्तर] दे० 'दुस्तर' । उ०—ममता अहं विषय मदमातौ यह सुख कबहुँ न दुतर तिरौं ।—रै० बानी, पृ० ९ ।

दुतरफा
वि० [हिं० दो + अ० तरफ़] दे० 'दुतर्फा' ।

दुतर्फा
वि० [फा० दुतर्फह्] [वि० स्त्री० दुतर्फी] दोनों ओर का । जो दोनों ओर हो । जैसे, दुतर्फी चाल, दुतर्फी रंग ।

दुतल्ला
वि० [हिं० दो + तल्ला] दो तल्ले का । दो मरातिब का । जैसे, दुतल्ला मकान ।

दुतार †
वि० [सं० दुस्तार, प्रा० दुत्तार] कठिन । दुस्तर । उ०— रनंकहि पंचरु त्रह हजार । जद्दव कमोर दल करि दुतार ।— प० रासो, पृ० ३९ ।

दुताबी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] एक प्रकार की तलवार (संभवतः दोहरे ताव की) । उ०—चरबी जिन चाबी दबहिं न दाबी दिपति दुताबी देखि परैं ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० २८ ।

दुतारा
संज्ञा पुं० [हिं० दो + तार] एक बाजा जिसमें दो तार लगे होते हैं और जो उँगली से सितार की तरह बजाया जाता है ।

दुति पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० द्युति] १. दे० 'द्युति' । उ०—चौंसठि कला बिलासजुत बदन कलानिधि पेखि । दुतिया की देख कला को दुति याकी देखि ।—मति० ग्रं०, पृ० ४४७ । २. कागद । कागज (लश०) । उ०—दुति बिन मसि बिन अंक सो पुस्तक बाँचिए । विन कर ताल बजाय चरन बिन नाचिए ।—कबीर०, श०, भा० २, पृ० १२३ । ३. दावात ।

दुतिई पु
वि० [सं० द्वितीया] दूसरी । दुजी । पहली के बादवाली । उ०—दुतिई उपमा कवि यौं मनई । किय भ्रंगन चंद निसा जगई ।—पृ० रा०, ८ । ६२ ।

दुतिमान पु
वि० [सं० द्युतिमान्] दे० 'द्युतिमान्' ।

दुतिय पु
वि० [सं० द्वितीय] [वि० स्त्री० दुतिया] दे० 'द्वितीय' । उ०—दुतिय समुच्चय ताहि को कह भूषन कवि मौर ।— भुषण ग्रं०, पृ० ५६ ।

दुतिया (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० द्वितीया] दूज । पक्ष की दूसरी तिथि । उ०—दुतिया की देखें कला को दुति याकी देखि ।—मति० ग्रं०, पृ० ४४७ ।

दुतिया पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० द्वित्व] दो का भाव । द्वेषभाव । उ०— ज्ञान होय परगास कुमति जूआ में हारै । दुतिया खंडन करै एक को बैठि बिचारै ।—पलटू०, पृ० ३७ ।

दुतिवंत पु
वि० [हिं० दुति + वंत (प्रत्य०)] १. आभायुक्त । चमकीला । २. सुंदर ।

दुतिवान पु
संज्ञा पुं० [सं० द्युतिमत्, द्युतिमान् या हिं० दुति + वान (प्रत्य०)] सूर्य । द्युतिमान् । उ०—चित्रभानु बृहभान रबि बिवस्वान दुतिवान ।—अनेक०, पृ० १०२ ।

दुती पु
वि० [सं० द्वितीय] दे० 'द्वितीय' । उ०—(क) दुतो उपमा बरनै कवि चंद । चलै घट रूप दिखावत इंद ।—पृ० रा०, २१ । १९ । (ख) दुती उपमा कवि यो मन लग्गि । कि भ्रगन चंद निसा महि जग्गि ।—पृ० रा०, ८ । ६३ । यौ०—दुतीभाव = द्वितीय की भावना । द्वैत भाव । उ०—दादू पूरण ब्रह्मा विचारि ले, दुतीभाव करि दूर । सब घटि साहिब देखिये रहाम रह्या भरपूर ।—दादू०, पृ० ४२२ ।

दुतीय पु
वि० [सं० द्वितीय] दे० 'द्वितीय' ।

दुतीया पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० द्वितीया] दे० 'द्वितीया' ।

दुत्त पु
संज्ञा पुं० [सं० दूत] दे० 'दूत' । उ०—मति माधव कोविद सुवर, कही वत्त गुन जुत्त । तऊ साहि गोरी नृपति, फेरि मुक्कले दुत्त ।—पृ० रा०, १९ । १० ।

दुत्तर, दुत्तरु
वि० [सं० दुस्तर, प्रा० दुत्तर] दे० 'दुस्तर' । उ०— (क) पूछै गोरख देहु वीचारु । क्यौ करि दुत्तर उतरहुँ पारु ।—प्राण०, पृ० ७८ । (ख) क्योंकरि दुमधा दुत्तरु तरिआ ।—प्राण०, पृ० १०० ।

दुत्ता
अव्य० [हिं० दुत] घृणा या तिरस्कारसूचरक शब्द । दे० 'दुत (१)' । उ०—मोहि करै दुत्ता लोग, महल में कोन चलै ।— जग० श०, पृ० १० ।

दुत्ति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० द्युति] दे० 'द्युति' । उ०—मानों कि दुत्ति द्रप्पनह व्योम । निच्चोल स्याम मधि हसिय सोम ।—पृ० रा०, २ । ३७१ ।

दुत्ती पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दूत्ती] दूत कार्य करनेवाली स्त्री । दूती । उ०—यौं करंत दुत्तिय बियौ कथा श्रवन सुनि मंत । जाकौ तें पतिवृत्त लिय सो आयौ अलि कंत ।—पृ० रा०, पृ० २५ । २८८ ।

दुत्थोत्थदवीय
संज्ञा पुं० [सं०] ताजिक नीलकंठ के अनुसार वर्ष- प्रवेश में एक याग ।

दुथन †
संज्ञा पुं० [देश०] पुत्नी । जोरू । (कुमाऊँ) ।

दुथरी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक प्रकार की मछली ।

दुदकार
संज्ञा स्त्री० [अनु० दुत + कार] धिक्कार । फटंकार । दुत्तकार । उ०—दूर दुदकार देते अभिमानी पशुओं को ।— प्रेमघन०, भा० १, पृ० २०२ ।

दुदल (१)
वि० [सं० द्विदल] फूटने या टूटने पर जिसके दो बराबर खंड या दल हो जायँ । द्विदल ।

दुदल (२)
संज्ञा पुं० १. दाल । उ०—दुदल प्रकार अनेकन आने । बरन बरन के स्वाद महाने ।—रघुराज (शब्द०) ।२. एक पौधा जो हिमालय के कम ठंढे स्थानों में तथा नीलागिरि पर्वत पर बहुत होता है । विशेष—इसकी जड़ ओषधि के काम में आती है और यकृत को पुष्ट करनेवाली, पसीना और पेशाब लानेवाली होती है । जिगर की बीमारी, आँव, चर्मरोग आदि में यह उपकारी होती है । इसे कानफूल और बरन भी कहते हैं ।

दुदलाना †
क्रि० स० [अनु०] दुत्तकारना । उ०—आवै कोइ आसरा लगाई । लागै दोष देइ दुदलाई ।—विश्राम (शब्द०) ।

दुदहँड़ी
संज्ञा स्त्री० [सं० दुग्ध + भाण्डिक, हिं० दूध + हाड़ी] दे० 'दुधहँड़ी' ।

दुदामी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो + दाम] एक प्रकार का सुती कपड़ा जो मालवे में बहुत बनता था । उ०—दुदामी के थान मालवा में पहले भी बनते थे, मगर शाहजहाँ बादशाह की कदरदानी से बहुत बढ़िया बनने लगे थे ।—शाहजहाँनामा (शब्द०) ।

दुदिला
वि० [हिं० दो + फा़० दिल] १. दुचिता । दुबधे में पड़ा हुआ । २. खटके में पड़ा हुआ । चिंतित । व्यग्र । घबराया हुआ । उ०—त्यों रँग मच्यो दिली में औरे । दुदिलो भयो साह कित दौरे ।—लाल (शब्द०) ।

दुदुकारना †
क्रि० स० [अनु० दुदकार] दे० 'दुतकारना' ।

दुदुह
संज्ञा पुं० [सं०] अनुवंशीय एक राजा का नाम । (हरिवंश) ।

दुद्धी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दुग्धी] १. जमीन पर फैलनेवाली एक घास । विशेष—इस घास के डंठलों में थोड़ी थोड़ी दूर पर गाँठें होती हैं जिनके दोनों ओर एक एक पत्नी होती है । इन्हीं गाँठों पर से पतले डंठल निकलते हैं जिनमें फूलों के गोल गोल गुच्छे लगते हैं । दुद्धी दो प्रकार की होती है—एक बड़ी दूसरी छोटी । बड़ी वृद्धी की सुत्ती दो ढाई अंगुल लंबी, एक अंगुल चौड़ी तथा किनारे पर कुछ कुछ कटावदार होती है । अगले सिरे की ओर यह नुकीली और पीछे डंठल की ओर गोल और चौड़ी होती है । छोटे दुद्धी के डंठल बहुत पतले और लाल होते हैं । प्रतियाँ भी बहुत महीन और दोनों सिरों पर गोल होती हैं । वैद्यक में दुद्धी गरम, भारी रूखी, बादी, कड़ुई, मलमूत्र को निकालनेवाली तथा कोढ़, और कृमि को दूर करनेवाली मानी जाती है । बड़ी दुद्धी से लड़के गोदना गोदने का खेल भी खेलते हैं । वे इसके दूध से कुछ लिखकर उसपर कोयला घिसते हैं जिससे काले चिह्न बन जाते हैं । पर्या०—क्षीरी । मरुदभवा । ग्राहिणी । कच्छरा । ताम्रमूला । २ थूहर की जाति का एक छोटा पौधा, जो भारतवर्ष के सब गरम प्रदेशों में, विशेषकर पंजाब और राजपूताने में होता है । इसका दूध दमें में दिया जाता है ।

दुद्धी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूध] १. एक प्रकार की सफेद मिट्टी । खड़िया मिट्टी । २. सारिवा लता । ३. जंगली नील । ४. एक पेड़ जो मद्रास, मध्य प्रदेश और राजपूताने में होता है । इसकी लकड़ी सफेद और बहुत अच्छी होती है और बहुत से कामों में आती है ।

दुद्धी (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूध] एक प्रकार का सफेद धान, जिसका नाम सुश्रुत ने कुक्कुटांडक लिखा है । विशेष—दे० 'दुधिया' ।

दुद्रुम
संज्ञा पुं० [सं०] प्याज का हरा पौधा ।

दुध
संज्ञा पुं० [सं० दुग्ध, प्रा० दुध्ध] दूध का समस्त रूप । जैसे, दुधमुहाँ, दुधहँड़ी ।

दुधपिट्ठी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूध + पीठी] दे० 'दुधपिठवा' ।

दुधपिठवा
संज्ञा पुं० [सं० दुग्व, हिं० दूध + सं० पिष्टक, हिं० पीठा] एक प्रकार का पकवान जो गुँधे हुए मैदे की लंबी लंबी बत्तियों को दूध में पकाने से बनता है ।

दुधमुख पु †
वि० [हिं० दूध + मुख] दूधपीता । दूधमुहाँ ।

दुधमुँहाँ
वि० [हिं० दूधमुँह] दे० 'दूधमुहाँ' ।

दुधहँड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूध + हाँड़ी] मिट्टी का वह छोटा बरतन जिसमें दूध रखा या गरम किया जाता है । दूध की मटकी ।

दुधाँड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूध + हाँड़ी] दे० 'दुधहँड़ी' ।

दुधा
संज्ञा स्त्री० [सं० द्विधा, द्विविधा] दुबिधा । संदेह । भ्रम । उ०—कही भान सौं मन की दुधा । तिनि जब कही बात यह सुधा ।—अर्ध०, पृ० २१ ।

दुधार (१)
वि० [हिं० दूध + आर (प्रत्य०)] १. दूध देनेवाली । जो दूध देती हो । जैसे, दुधार गैया । २. जिसमें दूध हो ।

दुधार (२)
वि० संज्ञा पुं० [हिं० दो + धार] दे० 'दुधारा' ।

दुधारा (१)
वि० [हिं० दो + धार] दो धाराओं का । जिसमें दोनों ओर धार हो (तलवार, छुरी आदि) । जैसे, दुधारा खाँड़ा ।

दुधारा (२)
संज्ञा पुं० एक प्रकार का चौंड़ा खाँड़ा या तलवार जिसके दोनों और तेज धार होती है ।

दुधारी (१)
वि० स्त्री० [हिं० दो + धार (प्रत्य०)] दूध देनेवाली । जो दूध देती हो । जैसे, दुधारी गाय ।

दुधारी (२)
वि० स्त्री० [हिं० दो + धार] जिसमें दोनों ओर धार हो । जैसे, दुधारी तलवार ।

दुधारी (३)
संज्ञा स्त्री० वह कटारी जिसके दोनों ओर तेज धार हो ।

दुधारू
वि० [हिं०] दे० 'दुधार', 'दुधारी' ।

दुधित
वि० [सं०] भयभीत । व्याकुल । घबराया हुआ । दुःखी । पीड़ित [को०] ।

दुधिया
वि० [हिं० दूध + इया (प्रत्य०)] १. दूध मिला हुआ । जिसमें दूध पड़ा हो । जैसे,—दुधिया भाँग । २. जिसमें दूध होता हो । ३. दूध की तरह सफेद । सफेद जाति का । जैसे दुधिया गेहूँ, दुधिया धान । दुधिया पत्थर, दुधिया कंकड़ ।

दुधिया (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० दुग्धिका] १. दुद्धी नाम की घास । २. एक प्रकार की ज्वार या चरी जो बड़ौदे की ओर बहुत होती है और चौपायों को खिलाई जाती है । ३. खड़िया मिट्टी । ४. कलियारी जाति का एक विष । ५. एक चिड़िया जिसे लटोरा भी कहते हैं ।

दुधियाकंजई (१)
वि० [हिं० दुधिया+ कंजा] सफेदी लिए हुए कंजे रंग का । नीलापन लिए भूरा ।

दुधिया कंजई (२)
संज्ञा पुं० एक रंग जो नीलापन लिए भूरा अर्थात् कंजे के रंग से कुछ खुलता होता है । विशेष—इस रंग रँगने के लिये कपड़े को पहले हर्रे के काढ़े में डुबाकर धूप में सुखाते हैं फिर कसीस में रँगते हैं ।

दुधिया पत्थर
संज्ञा पुं० [हिं० दुधिया + पत्थर] १. एक प्रकार का मुलायम सफेद पत्थर जिससे प्याले आदि बनते हैं । २. एक नग या रत्न । विशेष—दे० 'दूधिया' ।

दुधियाविष
संज्ञा पुं० [हिं० दुधिया + विष] कलियारी की जाति का एक विष जिसके सुंदर पौधे काश्मीर, चित्राल, हजारा के पहाड़ों तथा हिमालय के पश्चिमी भाग में मिलते हैं । विशेष—इसका पौधा कलियारी की ही तरह का सुंदर फूलों से सुशोभित होता है । इसकी जड़ में विष होता है । कलियारी की जड से इसकी जड छोटी और मोटी होती है । रँग भी काला— पन लिए होता है । हजारा में इसे 'मोहरी' और काश्मीर में 'बनबल नाग' कहते हैं । इस विष को 'तेलिया विष और' 'मीठा जहर' भी कहतै हैं ।

दूधेली
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूध + एली (प्रत्य०)] दे० 'दुद्धी (१)' ।

दूधैल
वि० [हिं० दूध + एल (प्रत्य०)] बहुत दूध देनेवाली । दुधार । जैसे, दुधैल गाय ।

दूध्र
वि० [सं०] १. चोट पहुँचानेवाला । हिंसक । २. दुर्धर्ष । शक्तिशाली । भयानक [को०] ।

दुनया
संज्ञा पुं० [सं० द्वि, हिं० दो + सं० नदी, प्रा० णई] वह स्थान जहाँ दो नदियाँ एक दूसरे से मिलती हों । दो नदियों का संगम स्थान ।

दुनरना †
क्रि० अ० क्रि० स० [हिं० दुनवना] दे० 'दुनवना' ।

दुनवना पु † (१)
क्रि० अ० [हिं० दो + नवना (=झुकना)] किसी नरम या लचीली वस्तु का इस प्रकार झुकना कि उसके दोनों छोर एक दूसरे से मिल जायँ या पास पास हो जायँ । लचकर दोहरा हो जाना । इस प्रकार नमित होना कि दोनों अधंभाग प्रायः एक दूसरे के समानांतर हो जायँ । उ०—कटि न सोचिबे लायक, रपमत सन भीति । दुनए केस न टूटत यह परतीति ।— रहीम (शब्द०) ।

दुनवना (२)
क्रि० स० लचाकर दोहरा कर देना । इस प्रकार झुकाना कि दोनों छोर एक दूसरे से मिल जायँ या पास पास हो जाँय ।

दुनाली (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो + नाल] दो मालवाली । जैसे, दुनाली बंदूक ।

दुनाली (२)
संज्ञा स्त्री० दुनाली बंदूक । वह बंदूक जिसमें दो दो गोलियाँ एक साथ भरी जायँ ।

दुनिअ †
संज्ञा स्त्री० [अ० दुनियह्] दे० 'दुनिया' । उ०—अल्हदाद भल तिन्हकर गुरू । दीन दुनिअ रोसन सुरखुरू ।—जायसी ग्रं० (गुप्त०), पृ० १३३ ।

दुनियाँ
संज्ञा स्त्री० [अ०] १. संसार । जगत् । यौ०—दीन दुनियाँ = लोक परलोक । मुहा०—दुनियाँ के परदे पर = सारे संसार में । दुनिया की हवा लगना = सांसारिक अनुभव होना । संसारी विषयों का अनुभव होना । दुनियाँ भर का = बहुत या बहुत अधिक । जैसे,— (क) दुनियाँ भर का सामान साथ ले जाकर क्या करोगे? (ख) दुनियाँ भर का बखेड़ा । दुनियाँ से उठ जाना = पर जाना । दुनियाँ से चल बसना = मर जाना । २. संसार के लोग । लोक । जनता । जैसे,—सारी दुनियाँ इस बात को जानती है । उ०—ये तपसी द्वै गरूर भरे दुनियाँ ते दयानिधि बोलत ना ।—दयानिधि (शब्द०) । ३. संसार का जंजाल । जगत् का प्रपंच ।

दुनियाई (१)
वि० [अ० दुनिया + हिं० ई (प्रत्य०)] सांसारिक । उ०—जावत खेह रेह दुनियाई । मेघ बूँद औ गगन तराई ।—जायसी (शब्द०) ।

दुनियाई (२)
संज्ञा स्त्री० [फा० दुनिया + हिं० ई (प्रत्य०)] संसार । उ०—ते विष बान लिखौं कहँ ताई । रकत जो चुआ भीज दुनियाई ।—जायसी (शब्द०) ।

दुनियादार (१)
संज्ञा पुं० [फां०] सांसरिक प्रपंच में फँसा हुआ मनुष्य । संसारी । गृहस्थ ।

दुनियादार (२)
वि० ढंग रचकर अपना काम निकालनेवाला । व्यव- हारकुशल ।

दुनियादारी
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. दुनियाँ का कारबार । गृहस्थी का जंजाल । २. दुनियाँ में अपना काम निकालने का ढंग । वह व्यवहार जिससे अपना प्रयोजन सिद्ध हो । स्वार्थसाधन । ३. दिखाऊ या बनावटी व्यवहार । दुराव । छिपाव । मुहा०—दुनियादारी की बात = बनावटी बात । इधर उधर की बात जो केवल प्रसन्न करने के लिये कही जाय । लल्लो चप्पो । जैसे,—दुनियादारी की बात रहने दो, अपना ठीक ठीक मतलब बतलाओ ।

दुनियापरस्त
वि० [फा०] सांसारिक । कृपण । कंजूस ।

दुनियासाज
वि० [फा० दुनियासाज] १. ढंग । रचकर अपना कामनिकालनेवाला । स्वार्थसाधक । २. अवसर देखकर सुहानेवाली बात करनेवाला । लल्लो चप्पो करनेवाला । चापलूस ।

दुनियासाजी
संज्ञा स्त्री० [फा० दुनियासाजी] १. अपना मतलब निकालने का ढंग । स्वार्थसाधन की वृत्ति । २. चापलूसी । ३. बात बनाने का ढंग ।

दुनी
संज्ञा स्त्री० [अ० दुनियाँ] संसार । जगत । उ०—सातो द्वीप दुनी सब नये ।—जायसी (शब्द०) । (ख) कविवृंद उदार दुनी न सुनी । गुन दूषन बात न कोपि गुनी ।—तुलसी (शब्द०) । (ग) तुमही जग हौ जग हौ तुमही में । तुमही बिरची मरजाद दुनी में ।—केशव (शब्द०) ।

दुनोना, दुनौना
क्रि० अ० क्रि० स० [हिं० दुनवना] दे० 'दुनवना' ।

दुपकना
क्रि० अ० [सं० दीपन] १. चमकना । दीप्त होना । २. छा जाना । छादित होना । छिपना । आवृत होना । ढँक जाना (लश०) । उ०—अनेक दीप से दमक रहा गगन । अनेक दीप से दुपक रही अवनि ।—मिलन०, पृ० २०७ ।

दुपटा पु †
संज्ञा पुं० [हिं० दुपट्टा] दे० 'दुपट्टा' । उ०—पौढ़े हुते पलिंगा पर प्यौ मुख ऊपर ओट किए दुपटा की ।—सुंदर (शब्द०) ।

दुपटी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुपटा] चादर । दुपट्टा । उ०—(क) सब जाति फटी दुख की दुपटी कपटी न रहै जहँ एक घटी ।—केशव (शब्द०) । (ख) घोति फटी सी लटी दुपटी अरु पाँय उपानह की नहि सामा ।—कविता कौ०, भा० १, पृ० १४९ ।

दुपट्टा
संज्ञा पुं० [हिं० दो + पाट] [स्त्री० अल्पा० दुपट्टी] १. ओढ़ने का वह कपड़ा जो दो पाटों को जोड़कर बना हो । दो पाट की चद्दर । चादर । मुहा०—दुपट्टा तानकर सोना = निश्चित होकर सोना । बेखटके सोना । दुपट्टा बदलाना = सहेली बनाना । सखी बनाना । (स्त्री०) । २. कंधे या गले पर डालने का लंबा कपड़ा ।

दुपट्टी पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो + पाट] दे० 'दुपटी' ।

दुपद
संज्ञा पुं० [सं० द्विपद] दे० 'द्विपद' । उ०—चारों बेद पढ़े मुख आगर है वामन वपुधारी । अफद दुपद पशुभाषा बूझै अविगत अल्प अहारी ।—सूर (शब्द०) ।

दुपर्दी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो + फा० पर्दह्] वह मिरजई, फतुही वा नीमस्तीम जिसमें दोनों ओर पदें हों । बगलबंदी ।

दुपलड़ी
वि० [हिं० दो + पलड़ा (=पल्ला)] दो पल्लेवाली । दुपल्ली । उ०—इस दुपलड़ी टोपी को छोड़े ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ०८७ ।

दुपलिया (१)
वि० स्त्री० [हिं० दो + पल्ला] दो पल्लेवाली । जिसमें दो पल्ले हों ।

दुपलिया (२)
संज्ञा स्त्री० एक प्रकार की टोपी जिसके दोनों पल्ले सीए रहते हैं ।

दुपहर
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो + पहर] दे० 'दोपहर' । उ०—जेहिं निदाथ दुपहर रहै भई माह की राति । तेहिं उसीर की रावटी खरी आवटी जाति ।—बिहारी (शब्द०) ।

दुपहरि पु
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुपहरी] दुपहरिया । दोपहर । उ०— दुपहरि तहँ डाइन सी आवै ।—नंद० ग्रं०, पृ० १४० ।

दुपहरिया
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुपहर + इया (प्रत्य०)] †१. मध्याह्न का समय । दोपहर । २. एक छोटा पौधा जो फूलों के लिये लगाया जाता है । उ०—पग पग मग अगमन परति चरन अरुन दुति झूलि । ठौर ठौर लखियत उठे दुपहरिया से फूलि ।—बिहारी (शब्द०) । विशएष—यह पौधा डेढ़ दो हाथ ऊँचा और एक सीधे खड़े डंठल के रूप में होता है । इसमें शाखाएँ या टहनियाँ नहीं फूटती । पत्तियाँ इसकी आठ दस अंगुल लंबी, अँगुल डेढ़, अंगुल चौड़ी और किनारे पर कटावदार तथा गहरे रंग की होती हैं । फूल इसके गोल कटोरे के आकार के और गहरे लाल रंग के होते हैं । इन फूलों में पाँच दल होते हैं । फूलों के झड़ जाने पर जो बीजकोश रह जाता है उसमें रोई के दान से काले काले बीज पड़ते हैं । वैद्यक में दुपहरिया मलरोधक, कुछ गरम, भारी कफकारक, ज्वरनाशक तथा वात पित्त को दूर करनेवाली मानी जाती है । पर्या०—बंधूक । बंधुजीव । रक्त । माध्याह्निक । बंधुर । सूर्य- भक्त । ओष्ठपुष्प । अर्कवल्लभ । हरिप्रिय । शरत्पुष्प । ज्वरध्न । सुपुष्प । ३. वह जिसका गर्भाधान दुपहरिया को हुआ हो । हरामजादा । दुष्ट । पाजी । (बाजारू) ।

दुपहरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दोपहर + ई (प्रत्य०)] दे० 'दुपहरिया' । उ०—अरे मीत या बात कौ देखि हिये कर गौर । रूप दुपहरी छाँह कब ठहरानी इक ठौर ।—स० सप्तक, पृ० १८२ ।

दुपहिया †
वि० [हिं० दो + पहिया] वह (गाड़ी) जिसमें दो पहिए लगे हों । दो चक्कोंवाली (साइकिल आदि) । उ०— सुबह उठकर एक दुपहिया गाड़ी पर चढ़ बैठते ।—प्रेमघन०, भा०२, पृ० १५६ ।

दुपालिया
वि० [हिं० दो० + पाली या पल्ला] दो पल्लेवाली । जिसके दो पल्ल हों । उ०—लाल किनारे की धोती पहने, दुपालिया अद्धी की टोपी लगाए ।—श्यमा०, पृ० १५० ।

दुपी पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विप] हाथी ।

दुफसली (१)
वि० [हिं० दो + फस्ल] दोनों फसलों में उत्पन्न होनेवाला । वह जिंस जो रबी और खरीफ दोनों में हो ।

दुफसली (२)
वि० स्त्री० दुबधे का । अनिश्चित । संदिग्ध । जैसे,— दुफसली बात कहना ठीक नहीं ।

दुबकना
क्रि० अ० [हिं० दबकना] दे० 'दबकना' ।

दुबगली
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो + बगल] मालखंभ की एक कसरत जिसमें बेत को दोनों बगलों में से निकालकर हाथ ऊँचे करके उसे ऐसा लपटते हैं कि एक कुंडल सा बन जाता है । फिरदोनों पैरों को सिर की ओर उड़ाते हुए उसी कुंडल में से निकालकर कलाबाजी के साथ नीचे गिरते हैं ।

दुबज्यौरा †
संज्ञा पुं० [हिं० दूब + जेवरी] गले में पहनने का एक गहना जिसकी बनावट गोप की तरह की होती है ।

दुबड़ा
संज्ञा पुं० [हिं० दूब] एक प्रकार की घास जो चारे के काम में आती है ।

दुबधा
संज्ञा स्त्री० [सं० द्विविधा] १. दो में से किसी एक बात पर चित्त के न जमने की क्रिया या भाव । अनिश्चिचतता । चित्त की अस्थिरता । उ०—दुबधा में दोऊ गए माया मिले न राम ।—(शब्द०) । मुहा०—दुबधे में डालना = अनिश्चित दशा में करना । दुबधे में पड़ना = अनिश्चित अवस्था में पड़ना । २. संशय । संहेद । जैसे,—दुबधे की बात मत कहो, ठीक ठीक बताओ कि आओगे या नहीं । ३. असमंजस । आगा पीछा । उ०—को जाने दुबधा संकोच में तुम डर निकट न आवै ।—सूर (शब्द०) । ४. खटका । चिंता ।

दुबर †
वि० [सं० दुर्बल] दे० 'दुबरा' ।

दुबरा †
वि० [सं० दुर्बल] [वि० स्त्री० दुबरी] दुबला । शरीर से क्षीण । उ०—करी खरी दुबरी सु लगि तेरी चाह चुरैल ।—बिहारी (शब्द०) ।

दुबराई †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुबरा + ई (प्रत्य०)] १. दुर्बलता । कृशता । २. कमजोरी । अशक्तता । उ०—भई यदपि नैसुक दुबराई । बड़े डील नहि देत दिखाई ।—शकुंतला, पृ० ३१ ।

दुबराना †
क्रि० अ० [हिं० दुबरा + ना (प्रत्य०)] दुबला होना । शरीर से क्षीण होना । उ०—(क) लखे न कंत सहेटवा फिरि दुबराय । धनियाँ कमल बदनियाँ, गई कुम्हिलाइ ।—रहीम (शब्द०) । (ख) दुबर लंक अधिक दुबराई । झुके कंध मुख पै पियराई ।—शंकुतला, पृ० ४८ ।

दुबरालगोला
संज्ञा पुं० [हिं० दो + अं० बैरल + हिं० गोला] तोप का लंबोतरा गोला ।

दुबराल पलंग
संज्ञा पुं० [हिं० दुबराइल + अं० पुलिंग] पाल की वह डोरी जिसे खींचकर पाल के पेटे की हवा निकालते हैं ।

दुबला
वि० [सं० दुर्बल] [वि० स्त्री० दुबली] १. क्षीण शरीर का । जिसका बदन हलका और पतला हो । कृश । यौ०—दुबला पतला । २. अशक्त । कमजोर ।

दुबलापन
संज्ञा पुं० [हिं० दुबला + पन] कृशता । क्षीणता ।

दुबाइन
संज्ञा स्त्री० [हिं० डुबे का स्त्री०] दूबे का स्त्री ।

दुबागा
संज्ञा पुं० [हिं० दो + सं० संग्रह, हिं० पगहा, बगई] सन की मोटी रस्सी ।

दुबारा
क्रि० वि० [फा० दुबारह, हिं० दो + बार] दे० 'दोबार' ।

दुबाल
वि० [हिं० दुबला] दे० 'दुबला' । उ०—देखत बालिदेन अपने मकमूर हाल । परेशामन अपने भी फिकर लग दुबाल ।— दक्खिनी०, पृ० २६८ ।

दुबाला
वि० [फा०] दे० 'दोबाला' । उ०—करैं हैं उस परो के बाले जोबन को दुबाला सा ।—नजीर (शब्द०) ।

दुबाहिया
संज्ञा पुं० [सं० द्विवाह] दोनों हाथों से तलवार चलानेवाला योद्धा ।

दुबिद पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विविद] दे० 'द्विविद' ।

दुबिध (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० द्विविधा] दे० 'दुबधा' ।

दुबिध (२)
वि० [सं० द्विविध] दो प्रकार की । द्विविध । उ०— दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी । सरित सिंधु जंगम जनु बारी ।—मानस, २ । ३०१ ।

दुबिधा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० द्विविधा] १. दे० 'दुबधा' । उ०—को जानै दुबिधा संकोच में तुम डर निकट न आवै ।—सूर (शब्द०) । २. दो प्रकार की भावना । भेद भाव । अच्छे बुरे की भावना । उ०—इक लोहा पूजा मैं राखत इक घर बधिक परौ । सो दुबिधा पारस नहिं जानत कंचजन करत खरो ।—सूर०, १ । २२० ।

दुबिधि
संज्ञा स्त्री० [सं० द्विविधा] दे० 'दुबधा' । उ०—जोहि निरखत मन मगन, सों दुभिधि नसावई ।—केशव० अमी०, पृ० १ ।

दुबिध्या पु †
संज्ञा स्त्री० [द्विविधा] दे० 'दुबधा' । उ०—अहं परम आनंदमय अहं ज्योति निज सोइ । ब्रह्मयोग ब्रह्माहि भया दुबिध्या रही न कोइ ।—सुंदर ग्रं० भा० १, पृ० ११३ ।

दुबिला
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुबला] दे० 'दुबला' । उ०—कबि लक्खन अबला कहत सबला जोध कहंत । दुबिला तन मैं प्रगट जिहिं, मोहत संत असंत ।—ह० रासो, पृ० २८ । †२. औरत । नारी (बाजारू) ।

दुबिसी
संज्ञा स्त्री० [सं०दो + बीस] एक प्रकार का कमीशन जो गवर्नमेंट किसानों को देती है । अर्थात् बीस रुपए के लगान पर दो रुपए ।

दुबीचा †
संज्ञा पुं० [हिं० दो + बीच] १. दो बातों के बीच किसी एक बात का निश्चय न होना । दुबिधा । २. संशय । संदेह । ३. असमंजस । आगा पीछा । ४. खटका । चिंता ।

दुबे
संज्ञा पुं० [सं० द्विवेदी] [स्त्री० दुबाइन] ब्राह्मणों का एक भेद ।

दुब्धा
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दुबधा' । उ०—इससे मेरा जी दुब्धे में पड़ा है ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० १५ ।

दुभना †
क्रि० स० [देश०] दे० 'दुहना' । उ०—काहे भूमि इतना भार राखे । दुभन धेनु नहिं दुध चाखे ।—दक्खिनी०, पृ० १०२ ।

दुभाखी
संज्ञा पुं० [सं० द्विभाषी] दे० 'दुभाषी' । उ०—अगुन सगुन बिच नाम सुमाखी । उभय प्रबोधक चतुर दुभाखी ।— मानस, १ । २१ ।

दुभाषिया
संज्ञा पुं० [सं० द्विभाषी] दो भाषाओं का जाननेवाला ऐसा मनुष्य जो उन भाषाओं के बोलनेवाले दो मनुष्यों को एक दूसरे का अभिप्राय समझावे । दो भिन्न भिन्न भाषाएँ बोलनवालों के बीच का अव्यस्थ ।

दुभाषी
संज्ञा पुं० [सं० द्विभाषिन्] दुभाषिया ।

दुभिख †
संज्ञा पुं० [सं० दुर्भिक्ष] दे० 'दुर्भिक्ष' ।

दुभुज
वि० [सं० द्विभुज] दे० 'द्विभुज' ।

दुमंजिला
वि० [फा० दु + मंजिल] [वि० स्त्री० दुमंजिली] दो खंडा । दा मरातिब का । जैसे, दुमंजिला मकान ।

दुम
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. पूंछ । पुच्छ । मुहा०—दुम के पीछे फिरना = साथ साथ लगा फिरना । पीछे पीछे घूमना । साथ न छोड़ना । दुम दबाकर भागना = डरपोक कुत्ते की तरह डरकर भागना । डर के मारे न ठहरना । दबकर भागना । (कुत्ते जब अपने से बलिष्ठ कुत्ते को देखते है तब डर के मारे पूँछ दोनों टाँगों के बीच दबा लेते हैं) । दुम दब जाना = (१) डर के मारे हट जाना । डर से भाग जाना । (२) डर के मारे किसी बात से हट जाना । भयवश किसी काम से पीछे हट जाना । डर के मारे किसी काम से अलग हो जाना । दुम में घुसना = गायब हो जाना । दूर हो जाना । जैसे,—एक चाँटा दूँगा आरी बदमाशी दुम में घुस जायसी । दुम में घुसा रहना = खुशामद के मारे साथ लगा रहना । शुश्रूषा के लिये सदा साथ में रहना । दम में रस्सा बाँधूँ = नटखट चौपाए की तरह बाँधकर रखूँ । (एक विनोदसूचक वाक्य जो प्रायः किसी पर बिगड़कर बोलते हैं । दुम हिलाना = कुत्ते का दुम हिलाकर प्रसन्नता प्रकट करना । २. पूँछ की तरह पीछे लगी या बँधी हुई वस्तु । जैसे, सितारे की दुम, टोपी की दुम । यौ०—दुमदार । ३. पीछे पीछे लगा रहनेवाला आदमी । पिछलग्गू । ४. किसी काम का सबसे अंतिम थोड़ा सा अंश । ५. नाम के अंत में जुड़नेवाली उपाधि । डिग्री । (व्यंग्य) ।

दुमची
संज्ञा स्त्री० [फा०] १. घोड़े के साज में वह तसमा जो पूँछ के नीचे दबा रहता है । २. दोनों नितंबों के बीच की हड्डी । पुट्ठों के बीच हड्डी । उ०—बरजे दुनी हठ चढ़ै ना सकुचै न सकाय । टूटति कटि दुमची मचकि लचकि लचकि बचि जाय ।—बिहारी (शब्द०) ।

दुमदार
वि० [फा०] १. पूँछवाला । २. जिसकें पीछे पूँछ की सी कोई वस्तु लगी या बँधी हो । जैसे, दुमदार सितारा, दुमदार टोपी ।

दुमन
वि० [सं० दुर्मनस्, दुर्मना] अनमना । अप्रसन्न । खिन्न ।

दुमना
संज्ञा स्त्री० [सं० दुर्मनस्] अनमना । उ०—दुमना थया विखायती, मरताँ सामंत सीह ।—रा० रू०, पृ० २६३ ।

दुमात, दुमाता पु
वि० [सं० दुर्मातृ] १. बुरी माता । २. सोनेवाली माँ । उ०—मात को न मोह, न द्रोह दुमात को, कोच न तात के गात गहे को । राज के लोभ न प्रान को क्षोभ न वंधु न ओधि रहे को ।... ता रनभूमि में रान कह्यो मोहि सोच विभीषन भूप कहे को ।—श्रीपति (शब्द०) ।

दुमाल †, दुमाला
संज्ञा पुं० [हिं० दो + माला] पाश । फंदा । उ०—ऐसा मतंग फकीर किया संतन का दुमाल, मेरा तुटा बहु जंजाल ।—दक्खिनी०, पृ० ६३ ।

दुमाही
वि० [हिं० दु + माह] दो महीने पर होनेवाला । दो महीने का ।

दुमुहाँ
वि० [हिं० दो + मुहाँ] दे० 'दोमुहाँ' । उ०—सूर्य का सत- मुहाँ घोड़ा आवै तब तो यह दुमुहाँ द्वार खुलै पर आवै कैसे ।— श्यामा०, पृ० १०९ ।

दुयण † पु
संज्ञा पुं० [सं० दुर्जन, प्रा० दुज्जण, दुयण अथवा फा० दुशमन, तुलनीय सं० दुर्मनस्] दुश्मन । शत्रु । उ०—दुयणा हाथ दिखाय ।—रा, रू०, पृ० ३९ ।

दुरँग पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० दुर्ग] दे० 'दुर्ग' । उ०—सहस फभै खुलिया खग साथे । मुड़िया मेछ दुरँग चै माथे ।—रा० रू०, पृ० २२२ ।

दुरँग (२)
वि० [हिं० दो + रंग] दुरंगा । उ०—सुरँग दुरँग सोहत पाग माल कै, कुरँग कैसे लोचन अति लोने ।—नंद०, ग्रं० पृ० ३४२ ।

दुरंग † (१)
वि० [हिं० दो + रंग] दे० 'दुरंगा' ।

दुरंग (२)
संज्ञा पुं० [सं० दुगँ] दे० 'दुर्गं' । उ०— दुंदभि गरज गान न देखे, दुरंग अढंग आथकर देखै ।—रघु० रू०, पृ० ११२ ।

दुरंगा
वि० [हिं० दो + रंग] [वि० स्त्री० दुरंगी] १. दो रंगों का । जिसमें दो रंग हों । जैसे, दुरंगा कपड़ा । २. दो तरह का । दो प्रकार का । ३. दो तरह की चाल चलनेवाला । दो पक्ष अवलंबन करनेवाला ।

दुरंगी (१)
वि० [हिं०] स्त्री० दे० 'दुरंगा' । जैसे, दुरंगी चाल । दुरंगी छींट ।

दुरंगी (२)
संज्ञा स्त्री० द्विविधा । कुछ इस पक्ष का कुछ उस पक्ष का अवलंबन । जैसे,—दुरंगी छोड़ दे एक रंग हो जा ।

दुरंत
वि० [सं० दुरन्त] १. जिसका अंत या पार पाना कठिन हो । अपार । बड़ा भारी । उ०—काल कोट सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत ।—तुलसी (शब्द०) । २. दुर्गम । दुस्तर । कठिन । जिसे करना या पाना सहज न हो । उ०—वह जो हुती प्रतिमा समीप की सुख संपत्ति दुरंत जई री ।—सूर (शब्द०) ३. घोर । प्रचंड । भीषण । ४. जिसका अंत या परिणाम बुरा हो । अशुभ । बुरा । कुत्सित । उ०—पुत्र हौ विधवा करी तुम कर्म कीन दुरंत ।—केशव (शब्द०) । ५. दुष्ट । खल ।

दुरंतक
संज्ञा पुं० [सं० दुरन्तक] शिव ।

दुरंधा पु
वि० [सं० द्विरन्ध्र] दो छिद्रवाला । आर पार छेदा हुआ । उ०—अंधे कबंधे दुरंधे करे अंग । सौधे सुंगेधेनु कौं पाइ के जंग ।—सूदन (शब्द०) ।

दुर
अव्य० या उप० [सं०] इसका प्रयोग इन अर्थों में होता है । (१) दूषण (बुरा अर्थ) जैसे, दुरात्मा, दुर्दिन, (२) निषेध, जैसे, दुर्बल । (३) दुःख या कष्ट, जैसे, दुर्गम ।

दुर
अव्य० [हिं० बूर] एक शब्द जिसका प्रयोग तिरस्कारपूर्वक हटाने के लिये होता है और जिसका अर्थ है 'दूर हो' । विशेष—इस शब्द का प्रयोग कुत्तों के लिये होता है । कभी कभी यों ही प्यार से भी लोग बच्चों या प्रियजनों आदि को 'दुर' कह देते हैं, जैसे,—दुर ! पगली, क्या बकती है?मुहा०—दुर दुर करना = तिरस्कारपूर्वक हटाना । कुत्ते की तरह भगना । दुर दुर फिट फिट = तिरस्कार ।

दुर (२)
संज्ञा पुं० [फा०] १. मोती । मुक्ता । २. मोती का वह लटकन जो नाक में पहना जाता है । लोलक । ३. छोटी बाली । उ०—काल्ह कुँवर कौ कनछेदन है हाथ सोहारी भेली गुर की । .... कंचन के द्वै दुर मँगाय लिये कहौं कहाँ छेदनि आतुर की ।—सूर०, १० । १८० ।

दुरकना
क्रि० अ० [हिं० दुरना] दे० 'दुरना' । उ०—बदन फेरि हँसि हेरि करि ललचौंहैं नैन । उर उरकी दुरकी लुरक जुर मुरकी कर सैन ।—स० सप्तक, पृ० ३९६ ।

दुरकरम—पु †
संज्ञा पुं० [सं० दुर + हिं० करम] दे० 'दुष्कर्म' । उ०—माँई ! सुराँ धरम सरसावौ । मेछ धरम दुरकरम मिटावौ ।—रा० रूे०, पृ० ३६४ ।

दुरकुच्छी †
संज्ञा स्त्री० [देश०] १. अटपटापन । २. ऊब । विरक्ति । क्रि० प्र०—लगना ।

दुरक्ष (१)
वि० [सं०] १. दुर्बल दृष्टिवाला । २. जिसकी निगाह अच्छी न हो । बुरी निगाहवाला ।

दुरक्ष (२)
संज्ञा १. जाली पासा । २. बेईमानी का जुआ [को०] ।

दुरखा
संज्ञा पुं० [देश०] [स्त्री० दुरखी] एक प्रकार का फतिंगा जो नील, तमाखू सरसों, गेहूँ इत्यादि की फसल को नुकसान पहुँचाता है ।

दुरगंद
संज्ञा स्त्री० [सं० दुर्गन्ध] दे० 'दुर्गंध' । उ०—अरे दुरगंद का माँड़ा । निरख कोई संत ने छाँड़ा ।—तुरसी० श०, पृ० ३१ ।

दुरग
संज्ञा पुं० [सं० दुर्ग] दे० 'दुर्ग' । उ०—ऐसो ऊँचो दुरग महाबली के जामैं नखतावली सों बहस दीपावलि करत हैं ।—भूषण ग्रं०, पृ० ३९ ।

दुरगत
संज्ञा स्त्री० [सं० दुर्गति] दे० 'दुर्गति' । उ०—सांत रहने से तौ और भी हमारी दुरगत होती है । हमें सांत रहना मत सिखाओ ।—काया०, पृ० १९१ ।

दुरगति
संज्ञा स्त्री० [सं० दुर्गति] दे० 'दुर्गति' । उ०—सब कोई नाम गहो रे भाई । छोड़े दुरगति औ चतुराई ।—कबीर सा०, पृ० ८१४ ।

दुरचुम
संज्ञा स्त्री० [देश०] दरी के ताने के दो दो सूतों को इसलिये एक में बाँधना जिसमें वे उलझ न जाँय ।

दुरजन पु
संज्ञा पुं० [सं० दुर्जन] दे० 'दुर्जन' । उ०—दृग उरझत टूटत कुटुम जुरत चतुर प्रीति । परति गाँठ दुरजन हिए दई नई यह राति ।—बिहारी (शब्द०) ।

दुरजोधन पु
संज्ञा पुं० [सं० दुर्योधन] दे० 'दुर्योधन' ।

दुरतिक्रम
वि० [सं०] १. जिसका अतिक्रमण न हो सके । जिसके बाहर या विरुद्ध कोई न हो सके । प्रबल । उ०—अंडकटाह अमित लयकारी । काल सदा 'दुरतिक्रम भारी' ।—तुलसी (शब्द०) । २. पाररहित । जिसका पार पाना कठिन हो । अपार ।

दुरत्यय
वि० [सं०] १. जिसका पार पाना कठिन हो । अपार । २. जिसका अतिक्रमण न हो सके । दुस्तर ।

दुरथल
संज्ञा पुं० [सं० दुःस्थल] बुरा स्थान । खराब जगह ।

दुरद पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विरद, प्रा० दुरद] दे० 'द्विरद' । उ०— दुरद दुरेफन के दरते ढरत स्वच्छ सुमन गुलाब दल छबि जुत छूटि छूटि ।—पजनेस०, पृ० १० ।

दुरदाम पु
वि० [सं० दुर्दम] कठिन । कष्टसाध्य । उ०—हरि राधा राधा रटत जपत मंत्र दुरदाम । बिरह विराग महायोगी ज्यों बीतत हैं सब याम ।—सूर (शब्द०) ।

दुरदाल पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विरद] हाथी ।

दुरदुराना
क्रि० स० [हिं० दुरदुर] तिरस्कारपूर्वक दूर करना । अपमान के साथ भगाना या हटाना । विशेष—इस शब्द का प्रयोग विशेषतः कुत्तों के लिये होता है । संयो० क्रि०—देना ।

दुरधिगम
वि० [सं०] १. जो पहुँच के बाहर हो । दुष्प्राप्य । २. जो समझ के बाहर हो । दुर्बोध ।

दुरधिगम्य
वि० [सं०] दे० 'दुरधिगम' ।

दुरधिष्ठित
वि० [सं०] जो व्यवस्थित न हो । अव्यवस्थित । बेतरतीब [को०] ।

दुरधीत (१)
वि० [सं०] उचित ढंग से न पढ़नेवाला । अशुद्ध अध्ययन करनेवाला [को०] ।

दुरधीत (२)
संज्ञा पुं० वेद का अशुद्ध ढंग से किया गया अध्ययन [को०] ।

दुरध्व
संज्ञा पुं० [सं०] कुपथ । कुमार्ग । बुरा रास्ता ।

दुरनय पु
संज्ञा पुं० [सं० दुर्नय] असदाचार । अनीति । उ०—सास ननद ये कूर हैं मेरी दुरनय जाना । करिहैं भौर अनर्थ जे प्रतिभा संका मान ।—स० सप्तक, पृ० ३७२ ।

दुरना पु †
क्रि० अ० [हिं० दूर] १. आँखों के आगे से दुर होना । ओट में होना । आड़ में जाना । २. न दिखलाई पड़ना । न प्रकट होना । छिपना । उ०—बैर प्रीति नहिं दुरत दुराए ।— तुलसी (शब्द०) । संयो० क्रि०—जाना ।

दुरन्वय (१)
वि० [सं०] १. दुर्ज्ञेय । जिसे समझना कठिन हो । २ जिसका अनुगमन कठिन हो । ३. जो ठीक न हो । ४. दुष्प्राप्य [को०] ।

दुरन्वय (२)
संज्ञा पुं० गलत नतीजा । अशुद्ध निष्कर्ष [को०] ।

दुरपदी पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० द्रोपदी] दे० 'द्रोपदी' ।

दुरपवाद
संज्ञा पुं० [सं०] अपवाद । निंदा । अपयश ।

दुरबचा
संज्ञा पुं० [फा० दुर + हिं० बच्चा] एक मोती । छोटी बाली जिसमें एक मोती हो ।

दुरबरन
संज्ञा पुं० [सं० दुर्वर्ण] रजत । चाँदी । रूपा । उ०—रुक्म रजत दुरबरन पुनि जातरूप खर्जूर ।—अनेकार्थ०, पृ० ८६ ।

दुरबल
वि० [सं० दुर्वल] दे० 'दुर्बल' ।

दुरबास (१)
संज्ञा पुं० [सं० दुर्वास] दुर्गध । बुरी गंध ।

दुरबास पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० दुर्वास] दे० 'दुर्वासा' । उ०—ऋषि भए अपर दुरबास नाँम । सोइ सुनो स्रवण तिहिं बंस जाँम ।—ह० रासो, पृ० ६ ।

दुरबासा
संज्ञा पुं० [सं० दुर्वासिस] दे० 'दुर्वासा ।

दुरबिंद †
संज्ञा पुं० [?] दे० 'दुरबीन' । उ०—नैन तो दुरबिंद करि ले चिन्हहु देवता प्रेत ।—सं० दरिया, पृ० ११० ।

दुरबीन
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दूरबीन' ।

दुरबेश पु †
संज्ञा पुं० [फा़० दरवेश] दे० 'दरवेश' ।

दुरभिग्रह (१)
वि० [सं०] कठिनता से पकड़ में आनेवाला ।

दुरभिग्रह (२)
संज्ञा पुं० अपामार्ग । चिचड़ी ।

दुरभिग्रहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. केवाँच । कपिकच्छु । २. धमासा ।

दुरभिच पु †
संज्ञा पुं० [सं० दुर्भिक्ष] अकाल । कहत । दुर्भिक्ष । उ०—तत्तु अकास चलैं दोई । अन ना उपजै दुरभिक्ष होई ।—सं० दरिया०, पृ० २७ ।

दुरभिसंधि
संज्ञा स्त्री० [सं० दुरभिसन्धि] बुरा षट्चक्र । बुरे अभि- प्राय सरे गुट बाँधकर की हुई सलाह । मिल जुलकर की हुई कुमंत्रणा ।

दुरभेव †
संज्ञा पुं० [सं० दुर्भाव या दुर्भेद] बुरा भाव । मनमोटाव । मनोमालिन्य । उ०—योग दिवस करि ध्यान तहँ नृप चरणा- मृत लेव । दुर्वासा लिय जानि सब मान्यो मन दुरभेव ।— रघुराज (शब्द०) । क्रि० प्र०—मानना ।

दुरभै पु
संज्ञा पुं० [सं० सं० दुर्भय] अपभय । उ०—जन को दीनता जब आवै । रहै अधीन दीनता भावै दुरभै दुर बहावै ।—कबीर श०, भा० १, पृ० १०० ।

दुरमत पु
संज्ञा स्त्री० [प्रा० हिं०] दे० 'दुर्मति' । उ०—पाँचो यार पचीसो भाई सगरि गोहार बोलाओ । तेगा तरकस कस के बाँधो, दुरमत दूर बहाओ ।—कबीर श०, भा० २, पृ० ७ ।

दुरमति पु
वि० [सं० दुर्मति] खल । दुष्ट । दुर्बुद्धि । दुर्मति । उ०— दुरमति दंभ गहे कर में डफ हबड़ हबड़ दै तारी ।—धरम०, पृ० ६१ ।

दुरमिस †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दुरमुस' ।

दुरमुख
वि० [सं० दुर्मुख] धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम । उ०— दुरमुख दुस्सासन विकर्ण निज ब्यूहन बाँधहु ।—भारतेंदु० ग्रं०, भा० १, पृ० १०६ ।

दुरमुट
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दुरमुस' ।

दुरमुस
संज्ञा पुं० [सं० दुर् (प्रत्य०)+ हिं० मुस (=कूटना)] गदा के आकार का डंडा जिसके नीचे पत्थर या लोहे का भारी टुकड़ा लगा रहता है और जिससे कंकड़ या मिट्टी पीटकर बैठाई जाती है, अथवा मिट्टी तोड़कर महीन बनाई जाती है ।

दुररीत पु †
संज्ञा स्त्री० [सं० दुर् हिं० दुर + रीति] कुचाल । अन्याय । उ०—घटे क्रिया बाँभणाँ, मिटे झालर परसादाँ । ईत प्रजा ऊपजे, निरखे दुररीत निसादाँ ।—रा० रू०, पृ० २० ।

दुरलभ
वि० [सं० दुर्लभ] दे० 'दुर्लभ' ।

दुरवग्रह
वि० [सं०] जिसे वश में करना या रोकना कठिन हो । जो कठिनाई से काबू में आ सके [को०] ।

दुरवस्थ
वि० [सं०] जो अच्छी दशा में न हो ।

दुरवस्था
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बुरी दशा । खराब हालत । २. हीन दशा । दुःख, कष्ट या दरिद्रता की दशा ।

दुरवाप
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दुरवापा] जो कठिनता से प्राप्त हो सके । दुष्प्राप्य ।

दुरवेस पु †
संज्ञा पुं० [फा० दरवेश] दरवेश । संत । फकरी । उ०—हमहीं हैं दुरवेसा और ना दूसर कोई ।—पलटू०, भा० १, पृ० १८ ।

दुरवेसवा †
संज्ञा पुं० [हिं० दुरवेस + वा (प्रत्य०)] दे० 'दुरवेस' । उ०—ना हुआ ब्रह्मा न बिस्नु महेसवा । ना जोगी जंगम दुरवेसवा ।—कबीर श०, भा० १, पृ० ४७ ।

दुरस (१)
संज्ञा पुं० [हिं० दो + औरस] सहोदर भाई ।

दरस (२)
वि० [हिं० दो + रस] १. दोरसा । दुहरे रसवाला । उ०— मालिक मलूक मालूम जिसकौं दुरस दिल हुरसाल हैं ।— सुंदर ग्रं०, भा० १, पृ० २९२ । २ † दो प्रकार की मिट्टीवाला । बालू मिली मिट्टीवाला ।

दुरस † (३)
वि० [फा० दुरुस्त] ठीक । उचित । यथास्थान । व्यवस्थित । उ०—गुण गजबंध तणा कब गावै दुरस परायण भी दरसावै ।—रा० रू०, पृ०१६ ।

दुरसा
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रसिद्ध कवि जो राजस्थान के थे ।

दुराउ †पु
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दुराव' ।

दुराक
संज्ञा पुं० [सं०] एक म्लेच्छ जाति का नाम । २. एक देश का नाम ।

दुराकृति
संज्ञा स्त्री० [सं०] भद्दी आकृतिवाला । बदसूरत [को०] ।

दुराक्रंद
वि० [सं० दुराकंद] जोरों से रोता हुआ [को०] ।

दुराक्रम
वि० [सं०] दुर्जेय । जिसे जीता न जा सके [को०] ।

दुराक्रमण
संज्ञा पुं० [सं०] १. छल से किया गया आक्रमण । २. दुर्गम स्थान [को०] ।

दुराक्रांत
वि० [सं० दुराक्रान्त] अपराजेय । अविजित । उ०— अयुतलक्ष में रहा जो दुराक्रांत, कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार बार, असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार हार ।— अनामिका, पृ० १५० ।

दुरागम
संज्ञा पुं० [सं०] अनुचित ढंग से प्राप्ति [को०] ।

दुरागमन
संज्ञा पुं० [सं० द्विरागमन] दे० 'द्विरागमन' ।

दुरागौन
संज्ञा पुं० [सं० द्विरागमन] वधू का दूसरी बार अपनी ससुराल जाना । क्रि० प्र०—कराना । मुहा०—दुरागौन देना = लड़की को दूसरी बार समुराल भेजना । दुरागौन लाना = बहू को दूसरी बार उसके पिता के घर से लाना ।

दुराग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] १. किसी बात पर बुरे ढंग से अड़ना ।हठ । जिद । २. अपने मत के सिद्ध न होने पर भी उसपर स्थिर रहने का काम । क्रि० प्र०—करना ।

दुराग्रही
वि० [सं० दुराग्रहिन्] १. बिना उचित अनुचित के विचार के अपनी बात पर अड़नेवाला । हठी । जिद्दी । २. अपने मत के ठीक न सिद्ध होने पर भी उसपर स्थिर रहनेवाला ।

दुराचरण
संज्ञा पुं० [सं०] बुरी चाल चलन । खोटा व्यवहार ।

दुराचार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] दुष्ट आचरण । बुरी चाल चलन । खोटी चाल । निंदित कर्म ।

दुराचार (२)
वि० बुरे या निंद्य आचरणवाला [को०] ।

दुराचारी
वि० [सं० दुराचारिन्] [वि० स्त्री० दुराचारिणी] दुष्ट आचरए करनेवाला । बुरी चाल चलन का । बुरे काम करनेवाला ।

दुराज (१)
संज्ञा पुं० [सं० दुर + राज्य] बुरा राज्य । बुरा शासन । उ०— दिन दिन दुनो देखि दारिद, दुकाल, दुःख, दुरित, दुराज, सुख सुकृत सकोच है ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुराज (२)
संज्ञा पुं० [हिं० दो + राज्य] १. एक ही स्थान पर दो राजाओं का राज्य या शासन । उ०—(क) जोग बिरह के बीच परम दुख मरियत है यहि दुसह दुराजै ।—सूर (शब्द०) । (ख) दुसह दुराज प्रजानि कों क्यों न करैं अति दंद । अधिक अँधेरी जग करत मिलि मावस रवि चंद ।—बिहारी (शब्द०) । २. वह स्थान जिसपर दो राजाओं का राज्य हो । दो राजाओं की अमलदारी । उ०—लाज बिलोकन देति नहीं रतिराज बिलोकन ही की दई मति ।... लाल निहारिए सौंह कहौं वह बाल भई है दुराज की रैयति ।— तोष (शब्द०) । २. बुरा शासन । दोषपूर्ण शासन ।

दुराजी पु
[सं० दुराज्य] दो राजाओं का । जिसमें दो राजा हों । उ०—नगर चैन तब जानिये जब एकै राजा होय । याहि दुराजी राज में सुखी न देखा कोय ।—कबीर (शब्द०) ।

दुरात्मा
वि० [सं० दुरात्मन्] दुष्टात्मा । नीशाचय । खोटा ।

दुरादुरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुरना (=छिपना)] छिपाव । गोपन । मुहा०—दुरादुरी करेक = छिपे छिपे । गुप्त रूप से । उ०—सिय भ्राता के समय भौम तहँ आसउ । दुरादुरी करि नेग, सु नात जनायउ ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुराधन
संज्ञा पुं० [सं०] धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

दुराधर
संज्ञा पुं० [सं०] धृतराष्ट्र के एक पुत्र नाम ।

दुराधरष
वि० [सं० दुराधर्ष] दे० 'दुराधर्ष' । उ०—रुद्रहिं देखि मदन भयच माना । दुराधरष दुर्गम भगवाना ।—मानस, १ । ८६ ।

दुराधर्ष (१)
वि० [सं०] जिसका दमन करना कठिन हो । जो बड़ी कठिनाई से जीता जा सके । जो वश में ना आ सके । प्रचंड । प्रबल । उ०—(क) धूमकेतु शटकोटि सम दुराधर्ष भगवंत ।—तुलसी (शब्द०) । (ख) दवन दुवन दल दर्प दिल दुराधर्ष दिगदंति । दशरथ के सामंत अस दशदिग कीर्ति करंति ।—रघुराज (शब्द०) ।

दुराधर्ष (२)
संज्ञा पुं० १. पीली सरसों । २. विष्णु ।

दुराधर्षता
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रचंडता । प्रबलता ।

दुराधर्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुटुंबिनी का पौधा ।

दुराधार
संज्ञा पुं० [सं०] महादेव ।

दुरानम
वि० [सं०] जिसे कठिनाई से झुकाया जा सके [को०] ।

दुराना
क्रि० अ० [हिं० दूर] १. दूर होना । हटना । टलना । भागना । उ०—यद्यपि सूर प्रताप श्याम कौ दूरि दुरात ।— सूर (शब्द०) । २. छिपना । आड़ में होना । अलक्षित होना । उ०—श्री वृषभानु नंदिनी ललिता दोऊ वा मग जात । तमहूँ जाय माधुरी कुंजन पहिलेहि क्यों न दुरात ।— हरिश्चंद्र (शब्द०) ।

दुराना
क्रि० स० १. दूर करना । हटाना । उ०—रे भौया, केवट ! ले उतराई । रघुपति महाराज इत ठाढ़े तैं कहँ नाव दुराई ।— सूर (शब्द०) । २. छोड़ना । त्यागना । न रखना । उ०— भजहु कृपानिधि कपट दुराई ।—सूर० (शब्द०) । ३. छिपाना । गुप्त रखना । प्रकट न करना । उ०—(क) तुम तो तीन लोक के ठाकुर तुम तें कहा दुराइए ।—सूर (शब्द०) । (ख) बैरु प्रीति नहि दुरइ दुराएँ ।—मानस, २ ।१ ३ ।

दुराप
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दुरापा] कठिनता से मिलनेवाला । दुष्प्राप्य । दुर्लभ ।

दुराबाध
संज्ञा पुं० [सं०] शिव ।

दुराराध्य (१)
वि० [सं०] कठिनाई से आराधन करने योग्य । जिसको पूजन या संतुष्ट करना कठिन हो । उ०—दुराराध्य पै अहहि महेसू । आसुतोष पुनि किए कलेसू ।—मानस, १ । ७० ।

दुराराध्य (२)
संज्ञा पुं० विष्णु ।

दुरारुह
संज्ञा पुं० [सं०] १. बेल । २. नारियल । ३. तालवृक्ष । खजूर (को०) ।

दुरारुहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] खजूर का पेड़ ।

दुरारोप
वि० [सं०] जिसको चढ़ाना कठिन हो (धनुष) ।

दुरारोह (१)
वि० [सं०] जिसपर चढ़ना कठिन हो ।

दुरारोह (२)
संज्ञा पुं० ताड़ का पेड़ ।

दुरारोहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सेमर का पेड़ । खजूर का पेड़ ।

दुरालंभ
वि० [सं० दुरालम्भ] [वि० स्त्री० दुरालंभा] दे० 'दुरालभ' ।

दुरालंभा
संज्ञा स्त्री० [सं० दुरालम्भा] दे० 'दुरालभा' [को०] ।

दुरालभ
वि० [सं०] जिसका मिलना कठिन हो । दुष्प्राप्य ।

दुरालभा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जवासा । धमासा । हिंगुवा । २. कपास ।

दुरालाप (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुरा वचन । बुरी बाचतीत । २. गाली । अपशब्द ।

दुरालाप (२)
वि० दुर्वचन कहनेवाला । कटुभाषी ।

दुरालोक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] तेज चमक । चकाचौंध करनेवाला आलोक या प्रकाश [को०] ।

दुरालोक (२)
वि० १. जिसे देखना कठिन हो । २. दुर्दशा [को०] ।

दुराव
संज्ञा पुं० [हिं० दुराना] किसी बात को दूसरे से छिपाने का भाव । अविश्वास या भय के कारण किसी से बात गुप्त रखने का भाव । उ०—सती कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊ । देखहु नारि सुभाउ प्रभाऊ ।—तुलसी (शब्द०) । २. कपट । छल । उ०—भरत सपथ तोहिं सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ । हरष समय विसमय करसि कारन मोहि सुनाउ ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुरावना
क्रि० स० [सं० दूर] छिपाना । दुराना । उ०—(क) सुनि सुनि बचन चातुरी ग्वालिनी हँसि हँसि बदन दुरावहि ।—तुलसी ग्रं०, पृ० ४३२ । (ख) ताही सफोच मनो मृगलोचनि लोचन बोल दुरावन लागी ।—मति० ग्रं०, पृ० ३८३ ।

दुरावार
वि० [सं०] १. जिसे ढका न जा सके । २. जिसे रोका या रखा न जा सके [को०] ।

दुराश
वि० [सं०] जिसे दुराशा हो । जिसे उम्मीद न हो ।

दुराशय (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुष्ट आशय । बुरी नीयत । २. दुष्ट स्थान । बुरी जगह (को०) । ३. खोटा या बुरा व्यक्ति (को०) ।

दुराशय (२)
वि० जिसका आशय बुरा हो । बुरी नीयतवाला । खोटा ।

दुराशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. ऐसी आशा जो पूरी न होनेवाली हो । व्यर्थ की आशा । झूठी उम्मीद । उ०—दिन दिन अधिक दुराशा लागी सकल लोक भरमायो ।—सूर (शब्द०) ।२. अनुचित चाहना । बुरी आकांक्षा ।

दुरास
संज्ञा स्त्री० [सं० दुराशा] दुराशा । निष्फल कामना । न मिलनेवाली वस्तु के मिलने की झूठी या मिथ्या आशा । उ०—दौरयौ दुरास में दास भयो पै कहूँ बिसराम को धाम न पायो ।—सुंदर ग्रं० (भु०), भा० १, पृ० ११४ ।

दुरासद
वि० [सं०] १. दुष्प्राप्य । २. दुःसाध्य । कठिन । उ०— तुम ही महा दुरासद काल । धारे दंड प्रचंड कराल ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३१२ । ३. अद्वितीय । असमान (को०) । ४. जिसे जीतना या वश में करना कठिन हो (को०) ।

दुरासा पु
संज्ञा स्त्री० [सं० दुराशा] दे० 'दुराशा' । उ०—सहित दोष दुख दास दुरासा । दलइ नाम जिमि रवि निसि नासा ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुराह
वि० [सं० दुः + फा राह] गलत राह पर चलनेवाला । उ०—हिंदु तुरक दुराह सबै इकासर चलाऊँ ।—ह० रासो०, पृ० ७२ ।

दुराही †
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'दुराही' । उ०—खुदा कुतुबशाह कूँ शहंशाह पर कर सो सारे जगत में दुराही फिराया ।— दक्खिनी०, पृ० ७३ ।

दुरित (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. पाप । पातक । २. उपपातक । छोटा पाप । विशेष—उशना की स्मृति में पातकों को दुरिष्ट और उपपातकों को दुरित कहा गया है ।

दुरित (२)
वि० पापी । पातकी । अघी । उ०—प्रबल दनुज दल दलि पल आध में जीवन दुरित दसावन गहिबो ।—तुलसी (शब्द०) ।

द्रुरितदमनी (१)
वि० स्त्री० [सं०] पाप का नाश करनेवाली ।

दुरितदमनी
संज्ञा स्त्री० शमी वृक्ष ।

दुरियाना †
क्रि० स० [सं० दूर] दूर करना । हटाना । २. दुर- दुराना । तिरस्कार के साथ भगाना । उ०—जम की सही न जाय दुर्बासा की क्या गत कीन्हा । भुवन चतुर्दश फिरे सभै दुरियाय जो दीन्हा ।—पलटू०, भा० १, पृ० १५ ।

दुरिष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] १. पाप । पातक । विशेष—उशना की स्मृति में पातकों को दुरिष्ट और उपपातकों को दुरित कहा गया है । २. वह यज्ञ जो मारण, मोहन, उच्चाटन आदि अभिचारों के लिये किया जाय । विशेष—स्मृति पुराण आदि में ऐसा यज्ञ करना महापाप लिखा है । विष्णुपुराण में लिखा है कि देवता, ब्राह्मण और पितरों से द्वेष करनेवाला, दुरिष्ट यज्ञ करनेवाला, कृमिभक्ष और कृमीश नरक में जाते हैं ।

दुरिष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुरिष्ट यज्ञ । अभिचारार्थ यज्ञ ।

दुरीषणा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. अहित कामना । २. शाप । बददुआ ।

दुरुक्त
संज्ञा पुं० [सं०] अनुचित कथन । बुरी उक्ति [को०] ।

दुरुक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] अनुचित उक्ति । बुरी बात । दुर्वचन [को०] ।

दुरुक्ति पु
संज्ञा स्त्री० [सं० द्विरुक्ति] दे० 'द्विरुक्ति' ।

दुरुखा
वि० [फा० दुरुखा] १. जिसके दोनों ओर मुँह हो । २. जिसको दोनों ओर कोई चिन्ह या विशेष वस्तु हो । जैसे, दुरुखा कागज । ३. जिसके दोनों ओर दो रंग हों । जैसे, दुरुखा किनारा ।

दुरुच्चाय
वि० [सं०] (वह शब्द) जिसका उच्चारण क्लिष्ट हो । कर्णकटु । उ०—दुरुच्चार्य शब्दों की भरमार होने पर अथवा सहसा छंद बदल जाने पर भी भाषाप्रवाह नष्ट हो जाता है ।—आदि०, पृ० २४ ।

दुरुच्छेद
वि० [सं०] जिसका उच्छेद कठिनता से हो । कष्ट से उच्छेद, विनाश या दुरीकरण योग्य [को०] ।

दुरुत्तर (१)
वि० [सं०] जिसका पार पाना कठिन हो । जिसे पार करना कठिन हो । दुस्तर ।

दुरुत्तर (२)
संज्ञा पुं० दुष्ट उत्तर । बुरा जवाब ।

दुरुद्वह
वि० [सं०] १. जिसका निभाना कठिन हो । २. जिसे वहन न किया जा सके [को०] ।

दुरुधरा
संज्ञा स्त्री० [यू० दुरोथोरिया] बृहज्जातक के अनुसार जन्मकुडली का एक योग जिसमें अनफा और सुनफा दोनों योगों का मेल होता है । विशेष—जन्मकुंडली में यदि सूर्य को छोड़कर कोई दूसरा ग्रह चंद्रमा से बारहवें घर में हो तो अनफा योग होता है और चंद्रमा से दूसरे घर में हो तो सुनफा योग होता है । जहाँ येदोनों योग हों वहाँ दुरुधरा योग होता है । इस योग में जिसका जन्म होता है वह बड़ा भारी वक्ता, धनी, वीर और विख्यात पुरुष होता है ।

दुरुपयोग
संज्ञा पुं० [सं०] बुरा उपयोग । अनुपयुक्त, व्यवहार । किसी वस्तु को बुरी तरह काम में लाना । बुरा इस्सेमाल ।

दुरुपयोजन
संज्ञा पुं० [सं० दुर् + उपयोजन] बुरे ढंग से व्यवहार में लाना । उपयोग करने का गलत या अनुचित ढंग ।

दुरुफ
संज्ञा पुं० [?] नीलकंठ ताजिक के अनुसार फलित ज्योतिष का एक योग ।

दुरुम
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का गेहूँ जिसका दाना पतला और लंबा होता है ।

दुरुस्त
वि० [फा०] १. जो अच्छी दशा में हो । जो टूटा फूटा या बिगड़ा न हो । ठीक । जैसे, घड़ी दुरुस्त करना । २. जिसमें दोष या त्रुटि न हो । जिसमें ऐब न हो । ठीक । उ०—दूसरा मत बहुत दुरुस्त और ठीक तो है ।—भारतेंदु० ग्रं०, भा० ३, पृ० ३७७ । क्रि० प्र०—करना ।—होना । मुहा०—किसी को दुरुस्त करना = (१) किसी की चाल सुधा- रना । (२) किसी को दंड देना । ३. उचित । मुनासिब । ४. यथार्थ । वास्तविक । जैसे,—आपका कहना दुरुस्त है ।

दुरुस्ती
संज्ञा स्त्री० [फा०] सुधार । संशोधन ।

दुरुह
वि० [सं०] जो विचार या ऊहा में जल्दी न आ सके । जिसका जान ना कठिन हो । समझ में न आने योग्य । गूढ़ । कठिन ।

दुरेत पु
वि० [देश०] ढका हुआ । भरा हुआ । पूर्ण । उ०—दुरित दुरेत अचेत प्रेम मति हतित पतित उद्धार ।—छीद्र०, पृ० ४ ।

दुरेफ पु
संज्ञा पुं० [सं० द्वि, प्रा० दु + सं० रेफ] दे० 'द्विरेफ' । उ०—मुरल मुख छबि पत्र शाखा दृग दुरेफ चढ़यो ।—सूर (शब्द०) ।

दुरेषण
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दुरीषणा' [को०] ।

दुरैफ पु
संज्ञा पुं० [सं० द्विरेफ] दे० 'द्विरेफ' । उ०—जथा पंकजं वै दुरैफे लभाए । तथा साह बंध्यौ सनेहं सुभाए ।—ह० रासो, पृ० ३४ ।

दुरोदर
संज्ञा पुं० [सं०] १. जुआरी । २. जूआ । ३. धूत क्रीड़ा । पाश क्रीड़ा । पासा खेखना ।

दुरौंधा
संज्ञा पुं० [सं० द्वारोद्धँ] दरवाजे के ऊपर की लकड़ी । भरेठा ।

दुर्कुल पु
संज्ञा पुं० [सं० दुष्कुल] दे० 'दुष्कुल' । उ०—अमी विषहु से मलहु से लेहु सोन करि यत्न । नीचहुँ ते उत्तम गुनन टुर्कुल से तिय रत्न ।—चाणक्य नीति (शब्द०) ।

दुर्गंध
संज्ञा स्त्री० [सं० दुर्गन्ध] बुरी गंध । बुरी महक । कुवास । सुगंध का उलटा ।

दुर्गध (२)
संज्ञा पुं० १. काला नमक । २. प्याज । २. आम का पेड़ ।

दुर्गध (३)
वि० अशुचि गंधवाला । कुवास युक्त । बुरी गंध का [को०] ।

दुर्गंधता
संज्ञा स्त्री० [सं० दुर्गन्धता] दुर्गंध का भाव ।

दुर्गंधि (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दुर्गन्धि] दुर्गध । बुरी गंध ।

दुर्गंधि (२)
वि० [सं०] अशुचि गंध से युक्त [को०] ।

दुर्ग (१)
वि० [सं०] १. जिसमें पहुँचना कठिन हो । जहाँ जाना सहज न हो । २. जिसका समझना कठिन हो । दुर्बोध ।

दुर्ग (२)
संज्ञा पुं० १. पत्थर आदि की चौड़ी दीवालों से घिरा हुआ वह स्थान जिसके भीतर राजा, सरदार और सेना के सिपाही आदि रहते है । गढ़ । कोट । किला । विशेष—ऋग्वेद तक में दुर्ग का उल्लेख है । दस्युओं के ९६ दुर्गों को इंद्र ने ध्वस्त किया था । मनु ने छह प्रकार के दुर्ग लिखे हैं- (१) धनुदुर्ग, जिसके चारों ओर निर्जल प्रदेश हो, (२) मही- दुर्ग, जिसके चारो ओर टेढ़ी मेढ़ी जमीन हो, (३) जलदुर्ग (अब्दुर्ग), जिसके चारों ओर जल हो, (४) वृक्ष दुर्ग, जिसके चारो ओर घने बृक्ष हों, (५) नरदुर्ग जिसके चारों ओर सेना हो और (६) गिरिदुर्ग, जिसके चारों ओर पहाड़ हो या जो पहाड़ पर हो । महाभारत में युधिष्ठिर ने जब भीम से पूछा है कि राजा को कैसे पुर में रहना चाहिए तब भीष्म जी ने ये ही छह प्रकार के दुर्ग गिनाए हैं और कहा है कि पुर ऐसे ही दुर्गों के बीच में होना चाहिए । मनुस्मृति और महाभारत दोनों में कोष, सेना, अस्त्र, शिल्पी, ब्राह्मण, वाहन, तृण, जलाशय अन्न इत्यादि का दुर्ग के भीतर रहना आवश्यक कहा गाय है । अग्निपुराण, कालिकापुराण आदि में भी दुर्गों के उपर्युक्त छह भेद बतलाए गए हैं । २. एक असुर का नाम जिसे मारने के कारण देवी का नाम दुर्गा पड़ा । ३. विष्णु का नाम (को०) । ४. गुग्गुल (को०) । ५. एक पर्वत (को०) । ६. सँकरा मार्ग (को०) । ७. ऊबड़खाबड़ जमीन । ऊँची नीची भूमि (को०) । ८. यमदंड (को०) । ९. शोक । दुःख (को०) । १०. दुष्कर्म (को०) । ११. सांसारिक बंधन (को०) । १२. नरक (को०) । १३. भयंकर विध्न, व्याधि या भयादि (को०) ।

दुर्गकर्म
संज्ञा पुं० [सं० दुर्गकर्मन्] किला बनाने का काम ।

दुर्गकारक
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुर्ग बनानेवाला मनुष्य । २. एक वृक्ष का नाम ।

दुर्गकोपक
संज्ञा पुं० [सं०] किले में बगावत फैलानेवाला विद्रोही । विशेष—चंद्रगुप्त के समय में इसे कपड़े में लपेटकर जीता जला दिया जाता था ।

दुर्गध्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गा ।

दुर्गच्छा
संज्ञा स्त्री० [सं०] जैन दर्शन में एक प्रकार का मोहनीय कर्म जिसके उदय से मलिन पदार्थों से ग्लानि उत्पन्न होती है ।

दुर्गत
वि० [सं०] १. दुर्दशाग्रस्त । जिसकी बुरी गति हो । २. दरिद्र ।

दुर्गतकर्म
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार वह काम जो अकाल पड़ने पर पीड़ितों की सहायता के लिये राज्य की ओर से खोला जाय ।

दुर्गतरणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक देवी का नाम । सावित्री देवी । (महाभारत) ।

दुर्गसेतुकर्म
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार टूटे हुए मकानों की मरम्मत का काम जो दुर्भिक्ष पीड़ितों की सहायता के लिये राज्य की ओर से खोला जाय ।

दुर्गति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बुरी गति । दुर्दशा । बुरा हाल । जिल्लत । जैसे,—(क) मरहटों ने गुलाम कादिर की बड़ी दुर्गति की; उसके नामक कान काटकर उसे पिंजरा में बंद कर दिया ।—(शब्द०) । (ख) पानी बरस जाने से रास्ते में बड़ी दुर्गति हुऐ । २. वह दुर्दशा जो परलोक में हो । नरक ।

दुर्गति पु (२)
संज्ञा स्त्री० [सं० दुः + गति] दुर्गम होने का भाव । दुर्ग- मता । उ०—दुर्गति दुर्गम ही जु कुटिल गति सरितन ही में ।— केशव (शब्द०) ।

दुर्गदानी †
वि० पुं० [सं०] दुर्गति देनेवाला । नरक भोग देनेवाला । उ०—चित्रगुप्त दुर्गदानी, सो येहि विधि जाता हो ।—धरम० पृ० ५३ ।

दुर्गपति
संज्ञा पुं० [सं०] गढ़ का अधीश्वर । दुर्ग का स्वामी या रक्षक [को०] ।

दुर्गपाल
संज्ञा पुं० [सं०] गढ़ का रक्षक । किलेदार ।

दुर्गपुष्पी
संज्ञा पुं० [सं०] एक वृक्ष का नाम । केशपुष्टा ।

दुर्गम (१)
वि० [सं०] १. जहाँ जाना कठिन हो । जहाँ जल्दी पहुँच न सके । औघट । उ०—दुर्गम दुर्ग पहार तें भारे प्रचंड महा भुजदंड बने हैं ।—तुलसी (शब्द०) । २. जिसे जानना कठिन हो । जो जल्दी समझ में न आवे । दुर्ज्ञेय । ३. कठिन । विकट । दुस्तर ।

दुर्गम (२)
संज्ञा पुं० १. गढ़ । किला । २. विष्णु । ३. वन । ४. संकट का स्थान । कठिन स्थिति । ५. एक असुर का नाम ।

दुर्गमता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्गम होने का भाव ।

दुर्गमनीय
वि० [सं०] जहाँ जाना कठिन हो । जिसके यहाँ तक जल्दी पहुँच न हो ।

दुर्गम्य
वि० [सं०] जहाँ जाना कठिन हो । उ०—दशाद्रव्य अइसन दुर्गम्य आँधकार देषु ।—वर्ण०, पृ० १७ ।

दुर्गरक्षक
संज्ञा पुं० [सं०] किलेदार । गढ़पति ।

दुर्गलंघन
संज्ञा पुं० [सं० दुर्गलङ्घन] (रेतीले दुर्गम स्थानों को पार करनेवाला) ऊँट ।

दुर्गल
संज्ञा पुं० [सं०] एक देश का नाम ।

दुर्गँव्यसन
संज्ञा पुं० [सं०] दुर्ग या किले का कमजोर हिस्सा या त्रुटि [को०] ।

दुर्गसंचर
संज्ञा पुं० [सं० दुर्गसञ्चर] दुर्गम स्थानों तक पहुँचने का साधन । जैसे, सीढ़ो, पुल, बेड़ा इत्यादि ।

दुर्गसंचार
संज्ञा पुं० [सं० दुर्गमसञ्चार] दे० 'दुर्गसंचर' ।

दुर्गसंस्कार
संज्ञा पुं० [सं०] प्राचीन दुर्ग की मरम्मत [को०] ।

दुर्गा
संज्ञा स्त्री० [सं०] आदि शक्ति । देवी । विशेष—शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेय संहिता में रुद्र की भगिनी अंबिका का उल्लेख इस प्रकार है—हे रुद्र ! अपनी भगिनी अंबिका के साथ हमारा दिया हुआ भाग ग्रहण करो । इससे जाना जाता हैं कि शत्रुओं के विनाश के लिये जिस प्रकार प्राचीन आर्यगण रुद्र नामक क्रूर देवता का स्मरण करते थे उसी प्रकार उनकी भगिनी अंबिका का भी करते थे । वैदिक काल में अंबिका रुद्र की भगिनी ही मानी जाती थी । तलवकार (केन) उपनिषद् में यह आख्यायिका है—एक बार देवताओं ने समझा कि विजय हमारी ही शक्ति से हुई है । इस भ्रम को मिटाने के लिये ब्रह्म यक्ष के रूप में दिखाई पड़ा, पर देवताओं ने उसे पहचाना नहीं । हाल चाल लेने के लिये पहले अग्नि उसके पास गए । यक्ष ने पूछा 'तुम कौन हो ?' अग्नि ने कहा 'मै' अग्नि हूँ और सब कुछ भस्म कर सकता हूँ' । उसपर उस यक्ष नें एक तिनका रख दिया और कहा 'इसे भस्म करो' । अग्नि ने बहुत जोर मारा पर तिनका ज्यों का त्यों रहा । इसी प्रकार वायु देवता भी गए । वे भी उस तिनके को न उड़ा सके । तब सब देवताओं ने इंद्र से कहा कि इस यक्ष का पता लेना चाहिए कि यह कौन है । जब इंद्र गए तब वह अंतर्धान हो गया । थोड़ी देर पीछे एक स्त्री प्रकट हो गई जो 'उमा हैमवती' देवी थी । इंद्र के पूछने पर उमा हैमवती ने बत- लाया कि यक्ष ब्रह्म था, उसकी विजय से तुम्हें महत्व मिला है । तब इंद्र आदिक देवताओं ने ब्रह्म को जाना । अध्यात्म पक्षवाले 'उमा हैमवती' से ब्रह्म विद्या का ग्रहण करते हैं । तैत्तिरीय आरण्यक के एक मंत्र में 'दुर्गादेवीं' शरणमहं प्रपद्ये वाक्य आया है और एक स्थान पर गायत्री छंद का एक मंत्र है जिसे सायण ने 'दुर्गा गायत्री' कहा है । देवी भागवत में देवी की उत्पत्ति के संबंध में कथा इस प्रकार है—महिषासुर से परास्त होकर सब देवता ब्रह्मा के पास गए । ब्रह्मा शिव तथा देवताओं के साथ विष्णु के पास गए । विष्णु ने कहा के महिषासुर के मारने का उपाय यही है कि सब देवता अपनी स्त्रियों से मिलकर अपना थोड़ा थोड़ा तेज निकाले । सबके तेज समूह से एक स्त्री निकलेगी जो उस असुर का वध करेगी । महिषासुर को वर था कि वह किसी पुरुष के हाथ से न मरेगा । विष्णु के आज्ञानुसार ब्रह्मा ने अपने मुँह से रक्त वर्ण का, शिव ने रौप्य वर्ण का विष्णु ने नील वर्ण का और इंद्र ने विचित्र वर्ण का, इसी प्रकार सब देवताओं ने अपना अपना तेज निकाला और एक तेजस्वरूपा देवी प्रकट हुई, जिसने उस असुर का संहार किया । कालिकापुराण में लिखा है कि परब्रह्म के अंश स्वरूप ब्रह्मा, विष्णु ओर शिव हुए । ब्रह्मा और विष्णु ने तो सृष्टि स्थिति के लिये अपनी अपनी शक्ति को ग्रहण किया पर शिव ने शक्ति से संयोग न किया और वे योग में मग्न हो गए । ब्रह्मा आदि देवता इस बात के पीछे पड़े कि शिव भी किसी स्त्री का पाणिग्रहण करें । पर शिव योग्य कोई स्त्री मिलती ही नहीं थी । बहुत सोच विचार के पीछे ब्रह्माने दक्ष से कहा—'विष्णुमाया के अतिरिक्त और कोई स्त्री नहीं जो शिव को लुभा सके । अतः मै उसकी स्तुति करता हूँ और तुम भी उसकी स्तुति करो कि वह तुम्हारी कन्या के रूप में तुम्हारे यहाँ जन्म ले और शिव की पत्नी हो' । वही विष्णु की माया दक्ष प्रजापति की कन्या सती हुई जिसने अपने रूप और तप के द्वारा शिव को मोहित और प्रसन्न किया । दक्षयज्ञ के विनाश के समय सती ने जब देहत्याग किया तब शिव ने विपाल करते करते उनके शव को अपने कंदे पर लाद लिया । फिर ब्रह्मा, विष्णु और शनि ने सती के मृत शरीर में प्रवेश किया और वे उसे खंड खंड करके गिराने लगे । जहाँ जहाँ सती का अंग गिरा वहाँ वहाँ देवी का स्थान या पीठ हुआ । जब देवताओं ने महामाया की बहुत स्तुति की तब वे शिव के शरीर से निकलीं और शिव का मोह दूर हुआ और वे फिर योगसमाधि में मग्न हुए । इधर हिमालय की भार्या मेनका, संतति की कामना से बहुत दिनों से महामाया का पूजन करती थी । महामाया ने प्रसन्न होकर मेनका की कन्या होकर जन्म लिया और शिव से विवाह किया । मार्केडेय पुराण में चंडी देवी द्वारा शुंभ निशुंभ के वध की कथा लिखी है । जिसका पाठ चंडीपाठ या दुर्गापाठ के नाम से प्रसिद्ध है और सब जगह होता है । काशी खंड में लिखा है कि रुरु के पुत्र दुर्ग नामक महादैत्य ने जब देवताओं को बहुत तंग किया तब वे शिव के पास गए । शिव ने असुर को मारने के लिये देवी को भेजा । पर्या०—आद्याशक्ति । उमा । कात्यायनी । गौरी । काली । हैमवती । ईश्वरी । शिवा । भवानी । रुद्राणी । शर्वाणी । कल्याणी । अपर्णा । पार्वती । मृड़ाणी । चंडिका । अंबिका । शारदा । चंडी । गिरिजा । मंगला । नारायणी । महामाया । वैष्णवी । हिंडी । कोट्टवी । षष्ठी । माधवी । जयंती । भार्गवी । रंभा । सती । भ्रामरी । दक्षकन्या । महिषमर्दिनी । हेरंबजननी । सावित्री । कृष्णपिंगला । शूलघरा । भगवती । ईशानी । सनानती । महाकली । शिवानी । चामुंडा । विधात्री । आनंदा । महामाया । भौमी । कृष्णा । चार्तगी । वाणी । फाल्गुनी । मातृका । तारा । कालिका । कामेश्वरी । भैरवी । भुवनेश्वरी । त्वरिता । महालक्ष्मी । वागीश्वरी । त्रिपुरा । ज्वालामुखी । बगलामुखी । अन्नपूर्णा । अन्नदा । विशालाक्षी । सुभगा । सगुणा । धवला । घोरा । प्रेमा । वटेश्वरी । कीर्तिदा । तुमुला । कामरूपा । जृंमणी । मोहनी । शांता । वेदमाता । त्रिपुरसुंदरी । तापिनी । चित्रा । अजंता इत्यादि, इत्यादि । २. नीली । नील का पौधा । ३. अपराजिता । कौवाठोंठी । ४. श्यामा पक्षी । ५. नौ वर्ष की कन्या । ६. एक रागिनी जो गौरी, मालश्री, सारंग, और लीलावती के योग से बनी है ।

दुर्गाढ, दुर्गाध
वि० [सं०] जिसकी खोज बीन कठिन हो । दुर्गाह्य । जिसे बहाया न जा सके । जो सझाया जाने लायक न हो । दुःखावह्य [को०] ।

दुर्गाधिकारी
संज्ञा पुं० [सं० दुर्गाधिकारिन्] गढ़ का अधिपति । किलेदार ।

दुर्गाध्यक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] गढ़ का प्रधान । किलेदार ।

दुर्गानवमी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कार्तिक शुक्ल नवमी । इस दिन जगद्धात्री का पूजन होता है । २. चैत्र शुक्ल नवमी । ३. आश्विन शुक्ल नवमी ।

दुर्गापाश्रयाभूमि
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह भूमि जिसमें किले हों अर्थात् जो सेना रखने के उपयोगी हो । विशेष—कौटिल्य ने लिखा है कि राज्य के करने लिये यदि एक और अच्छे किलेवाली जमीन हो और दूसरी ओर घनी आबादीवाली जमीन तो घनी आबादीवाली जमीन को ही पसंद करना चाहिए, क्योकि मनुष्यों पर ही राज्य होता है, न कि जमीन पर । जनशून्य भूमि से राज्य को आमदनी नहीं हो सकती । घनी आबादीवाली भूमि को चाणक्य ने पुरुषापाश्रया भूमि लिखा है ।

दुर्गा पूजा
संज्ञा स्त्री० [सं०] आश्विन नवरात्र में होनेवाला दुर्गा जी का पूजनोत्सव । बंगाल की और यह एक प्रधान पर्व के रूप में मनाया जाता है ।

दुर्गाष्टमी
संज्ञा स्त्री० [सं०] आश्विन शुक्ल और चैत्र शुक्ल पक्ष की अष्टमी ।

दुर्गाह्य
वि० [सं०] जिसका अवगाहन करना कठिन हो ।

दुर्गाह्व
संज्ञा पुं० [सं०] भूमि गुगल ।

दुर्गुण
संज्ञा पुं० [सं०] बुरा गुण । दोष । ऐब । बुराई ।

दुर्गेश
संज्ञा पुं० [सं०] दुर्गाध्यक्ष । दुर्गरक्षक । किलेदार ।

दुर्गोत्सव
संज्ञा पुं० [सं०] दुर्गापूजा का उत्सव जो नवरात्र में होता है । दुर्गापूजा ।

दुर्ग्रह (१)
वि० [सं०] १. जिसे कठिनता से पकड़ सके । जो जल्दी से पकड़ में न आवे । २. जो कठिनता से समझ में आवे । दुर्ज्ञेय । ३. जिसे जीतना कठिन हो । दुर्जय (को०) ।

दुर्ग्रेह (२)
संज्ञा पुं० १. अपामार्ग । चिचड़ी । २. बुरा ग्रह । कुग्रह (को०) । ३. अनुचित आग्रह । बुरा आग्रह (को०) ।

दुर्ग्रहा
संज्ञा स्त्री० [सं०] अपामार्ग । चिचड़ा [को०] ।

दुर्ग्राह्य
वि० [सं०] जो आसानी से पकड़ में न आए [को०] ।

दुर्घट
वि० [सं०] १. जिसका होना कठिन हो । कष्टसाध्य । मुश्किल से होने लायक । २. जिसका होना संभव न हो । असंभव (को०) ।

दुर्घटना
संज्ञा स्त्री० [पुं०] १. अशुभ घटना । ऐसा व्यापार जिससे हानि या दुःख पहुँचे । ऐसी बात जिसके होने से बहुत कष्ट, पीड़ा या शोक हो । बुरा संयोग । वारहात । जैसे,—नदी का पुल टूट गया, इस दुर्घटना से बहुत हानि पहुँची । २. विपद । आफत । आपत्ति ।

दुर्घुरुट
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह जो विश्वास करने लायक न हो । २. वह जो शीघ्र किसी पर विश्वास न करे [को०] ।

दुर्घोष (१)
वि० [सं०] जो बुरा स्वर निकाले । जो कटु या कर्कश ध्वनि करे ।

दुर्घोष (२)
संज्ञा पुं० १. भालू । २. जोरों की चिल्लाहट । कर्णकटु शब्द या आवाज (को०) ।

दुर्जन
संज्ञा पुं० [सं०] दुष्ट जन । खल । खोटा आदमी । उ०— दुर्जन वचन सुनत दुख जौसों । बाण लगे दुख होइ न तौंसों ।—सूर (शब्द०) ।

दुर्जनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दृष्टता । खोटापन ।

दुर्जय (१)
वि० [सं०] जिसे जीतना कठिन हो । जो जल्दी जीता न जा सके । उ०—पूर्व पुण्य के क्षय होने तक पापी भी तो दुर्जय है ।—साकेत, पृ० ३८० ।

दुर्जय (२)
१. विष्णु । २. कूर्मपुराण के अनुसार कार्तवीर्य वंश में उत्पन्न अनंत राजा का एक पुत्र । ३. एक राक्षस का नाम ।

दुर्जयता
वि० [सं०] कठिनता से विजय पाने का भाव । अवि- जेयता । उ०—प्राणवघुटी ! अंतर की दुर्जयता तुमने लूटी ।—विश्व०, पृ० ३८ ।

दुर्जयव्यूह
संज्ञा पुं० [सं०] कौटिल्य के अनुसार वह व्यूह जिसमें सेना चार पंक्रियों में खड़ी की जाय ।

दुर्जर
वि० [सं०] जो कठिनता से पचे । जो पकाने से जल्दी न पके । जिसका परिपाक करना कठिन हो ।

दुर्जरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] ज्योतिष्मती लता । मालकँगनी ।

दुर्जात (१)
वि० [सं०] १. जिसका जन्म बुरी रीति से हुआ हो । २. जिसका जन्म व्यर्थ हुआ हो । ३. नीच । कमीना । ४. अभागा । भाग्यहीन ।

दुर्जात (२)
संज्ञा पुं० १. व्यसन । २. असमंजस । कठिनता । संकट ।

दुर्जाति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बुरी जाति । नीच जाति । २. अभाग्य । दुर्भाग्य । बुरी स्थिति (को०) ।

दुर्जाति (२)
वि० १. बुरे कुल का । २. जिसकी जाति बिगड़ गई हो । ३. दुःखभाव । बुरे स्वभाव का । नीच । बुरा (को०) ।

दुर्जीव (१)
वि० [सं०] दूसरे के दिए अन्न पर रहनेवाला । बुरी जीविका करनेवाली ।

दुर्जीव (२)
संज्ञा पुं० बुरा जीवन । निंदित जीवन ।

दुर्जेय
वि० [सं०] जिसे जीतना अत्यंत कठिन हो । दुर्जय ।

दुर्ज्ञान
वि० [सं०] दे० 'दुर्ज्ञेय' [को०] ।

दुर्ज्ञेय (१)
वि० [सं०] कठिनाई से जानने योग्य । जिसे जानना अत्यंत कठिन हो । जो जल्दी समझ में न आ सके । दुर्बोध । उ०— ग्रस लेती दर्शक को वह दुर्ज्ञेय दया की भूखी चितवन । भूल रहा उस छायापट में युग युग का जर्जर जनजीवन—ग्राम्या, पृ० २४ ।

दुर्ज्ञेय (२)
संज्ञा पुं० शिव का एक नाम [को०] ।

दुर्देंड
वि० [सं० दुर्दण्ड] दुष्ट । प्रबल । जिसे कठिनाई से दंड दिया जा सके । सके । उ०—ईर्षी वा दुर्दड दुराचारियों की दृष्टि में- - - ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ०१७४ ।

दुर्दम (१)
वि० [सं०] १. जिसका दमन बड़ी कठिनाई से हो सके । जो जल्दी दबाया या जीता न जा सके । २. प्रडंड । प्रबल ।

दुर्दम (२)
संज्ञा पुं० रोहिणी के गर्भ से उत्पन्न वसुदेव के एक पुत्र का नाम ।

दुर्दमता
संज्ञा स्त्री० [सं०] अदम्यता । प्रचंडता । उ०—उसकी दुर्दमता में तुम भी, अपने स्वर की गूँज मिलना । यह दीपक जो मैंने बाला, तुम भी इसमें अपने स्वर का स्नेह जलाना ।—दी० ज०, पृ० १७८ ।

दुर्दमन (१)
वि० [सं०] जिसका दमन करना बहुत कठिन हो ।

दुर्दमन (२)
संज्ञा पुं० जननेजय के वंश में उत्पन्न शतानीक राजा का पुत्र ।

दुर्दमनीथ
वि० [सं०] १. जिसका दमन करना बहुत कठिन हो । जो जल्दी दबाया या जीता न जा सके । २. प्रचंड । प्रबल । उ०—विश्व यह दूसरा जहाँ भोजन भरा, रूप की प्रतिकरा हुई दुर्दमनीय ।—आराधना, पृ० ७९ ।

दुर्दम्य (१)
वि० [सं०] दे० 'दुर्दम' ।

दुर्दम्य (२)
संज्ञा पुं० गाय का बछड़ा ।

दुर्दर पु †
वि० [सं० दुर्धर] दे० 'दुर्धर' ।

दुर्दर्श
वि० [सं०] १. जिसे देखना अत्यंन कठिन हो । जो जल्दी दिखाई न पड़े । २. जो देखने में भयंकर हो ।

दुर्दर्शन (१)
वि० [सं०] दे० 'दुर्दश' ।

दुर्दर्शन (२)
संज्ञा पुं० कौरवों का एक सेनापति ।

दुर्दशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] बुरी दशा । मंद अवस्था । दुर्गति । खराब हालत । क्रि० प्र०—करना । होना ।

दुर्दांत (१)
वि० [सं० दुर्दान्त] १. दुर्दमनीय । २. प्रचंड । प्रबल ।

दुर्दांत (२)
संज्ञा पुं० १. गाय का बछड़ा । २. झगड़ा । कलह । ३. शिव ।

दुर्दान
संज्ञा पुं० १. [?] रूपा । चाँदी ।—अनेकार्थ (शब्द०) ।

दुर्दिन
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुरा दिन । २. ऐसा दिन जिसमें बादल छाए हों, पानी बरसता हो और घर से निकलना कठिन हो । मेघाच्छन्न दिन । ३. दुर्दशा का समय । दुःख और कष्ट का समय । बुरा वक्त । ४. घना अंधकार । सूचीभेद्य अंधकार (को०) । ५. वृष्टि । वर्षा (को०) । ६. किसी वस्तु की बौछार या झड़ी (को०) ।

दुर्दिवस
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दुर्दिन' । उ०—इहि भाँति बितावत दुर्दिवस वे सुकृती सुख के भवन ।—ब्रज ग्रं०, पृ० १०२ ।

दुर्दरुट, दुर्दरुढ़
संज्ञा पुं० [सं०] नास्तिक ।

दुर्दृश
वि० [सं०] जिसे देखना कष्टकर हो । अप्रियदर्शन [को०] ।

दुर्दृष्ट
वि० [सं०] (व्यवहार) जिसका रोग, लोभ आदि के कारण सम्यक् निर्णय न हुआ हो । (मुकदमा) जिसका घुस, अदा- वत आदि के कारण ठीक फैसला न हुआ हो । विशेष—याज्ञवल्क्य स्मृति में लिखा है कि ऐसे मुकदमे को राजाफिर से देखे और यदि अन्याय हुआ हो तो निर्णय करनेवाले सभ्यों (न्यायाधीश, आदि) और मुकदमा जीतनेवालों को उसका दूना दंड दे जितना हारनेवालों को अन्यास से हुआ हो ।

दुर्दैव
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुर्भाग्य । अभाग्य, बुरी किसमत । २. बुरा संयोग । दिनों का बुरा फेर ।

दुर्द्धर (१)
वि० [सं०] १. जिसे कठिनाई से पकड़ सकें । जो जलदी पकड़ में न आ सके । २. प्रबल । प्रचंड । ३. जो कठिनता से समझ में आवे ।

दुर्द्धर (२)
संज्ञा पुं० १. एक नरक का नाम । २. पारा । ३. भिलावाँ । भल्लातक । ४. महिषासुर का एक सेनापति । ५. शंबरासुर के एक मंत्री का नाम । धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम । ७. रावण का एक सौनिक जिसे उसने अशोकबाटिका उजाड़ने पर हनुमान को पकड़ने के लिये भेजा था । यह राक्षस हनुमान के हाथ से मारा गया । ८. विष्णु ।

दुर्द्धर्ष (१)
वि० [सं०] १. जिसका दमन करना कठिन हो । जिसे जल्दी वश में न ला सकें । जिसे अधीन न कर सकें । २. जिसे परास्त करना कठिन हो । ३. प्रबल । प्रचंड । उग्र ।

दुर्द्धर्ष (२)
संज्ञा पुं० १. धृतराष्ट्र के पुत्र का नाम । २. रावण के दल का एक राक्षस ।

दुर्द्धर्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. नागादौना । २. कंथारी का पेड़ ।

दुर्द्धी
वि० [सं०] बुरी बुद्धि का । मंदबुद्धि ।

दुर्द्धरुढ़
संज्ञा पुं० [सं०] वह शिष्य जो गुरु की बात जल्दी न माने ।

दुर्द्रिता
संज्ञा पुं० [सं०] एक लता का नाम ।

दुर्द्रुम
संज्ञा पुं० [सं०] हरित्पलांडु । हरा प्याज ।

दुर्धर
वि० [सं०] दे० 'दुर्द्धर' । मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकुल बने ।—इत्यलम्, पृ० १३६ ।

दुर्नय
संज्ञा पुं० [सं०] १. दुर्नीति । बुरी चाल । नीतिविरुद्ध आचरण । २. अन्याय ।

दुर्नाद (१)
संज्ञा पुं० [सं०] बुरा शब्द । अप्रिय ध्वनि ।

दुर्नाद (२)
वि० कर्कश ध्वनि करनेवाला ।

दुर्नाद (३)
संज्ञा पुं० राक्षस । उ०—कौंनप अस्रय, पुन्य जन निकषासुत दुर्नाद ।—अनेकार्थ०, पृ० ८४ ।

दुर्नाम
संज्ञा पुं० [सं० दुर्नामन्] १. बुरा नाम । कुख्याति । बदनामी । २. गाली । बुरा वचन । ३. बवासीर । ४. शुक्ति । सौप । सुतही ।

दुर्नामक
संज्ञा पुं० [सं०] अर्श रोग । बवासीर ।

दुर्नामा (३)
संज्ञा पुं० [सं० दुर्नामिन्] दे० 'दुर्नाम' ।

दुर्मामा (२)
वि० कुख्यात । बदनाम [को०] ।

दुर्नामारि
संज्ञा पुं० [सं०] (अर्श रोग को दुर करनेवाला) सुरन ।

दुर्नाम्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] शुक्ति । सीप । सुतुही ।

दुर्निग्रह
वि० [सं०] जिसपर निग्रह न किया जा सके । जिसपर काबू पाना कठिन हो [को०] ।

दुर्निमित्त
संज्ञा पुं० [सं०] होनेवाले अरिष्ट को सूचित करनेवाला अशुकुन । बुरा सगुन ।

दुर्निरीक्ष
वि० [सं०] १. जिसे देखते न बने । २. भयंकर । ३. कुरूप ।

दुर्निरीक्ष्य
वि० [सं०] १. जिसे देखते न बने । २. भयंकर । ३. कुरूप ।

दुर्निवार
वि० [सं०] दे० 'दुर्निवार्य' [को०] ।

दुर्निवार्य
वि० [सं०] १. जिसका निवारण करना कठिन हो । जो जल्द रोका न जा सके । जो जल्दी हटाना ना जा सके । जिसे जल्दी दूर न कर सके । ३. जिसका होना प्रायः निश्चित हो । जो जल्दी टल न सके ।

दुर्नीत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. अनुचित कर्म । बुरा कर्म । २. अभाग्य । दुर्भाग्य [को०] ।

दुर्नीत (२)
वि० १. नीति को न माननेवाला । २. बुरी नीति का । अनैतिक [को०] ।

दुर्नीति
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुनीति । कुचाल । अन्याय । अयुक्त आचरण ।

दुर्न्यस्त
वि० [सं०] ठीक ढंग से न रखा हुआ । अनुपयुक्त क्रम से रखा हुआ [को०] ।

दुर्बल
वि० [सं०] १. जिसे अच्छा बल न हो । कमजोर । अशक्त । २. कृश । दुबला पतला । ३. शिथिल । थका हुआ (को०) । ४. हलका । छोटा । साधारण (को०) ।

दुर्बलता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बल की कमी । कमजोरी । २. कृशता । दुबलापन । शैथिल्य । थकावट । शिथिलता ।

दु्र्बला
संज्ञा स्त्री० [सं०] जलसिरीस का पेड़ ।

दुर्बाध
वि० [सं०] अनिवार । दुर्निवार्य [को०] ।

दुर्बाल
संज्ञा पुं० [सं०] १. जिसके चंमड़े पर रोग हों और बाल झड़ गए हों । गंजा । २. जिसके केश घुँघराले हों (को०) ।

दुर्बुध
वि० [सं०] कमजोर बुद्धिवाला । सिड़ी [को०] ।

दुर्बोध
वि० [सं०] जिसका बोध कठिनता से हो । जो जल्दी न समझ में आवे । गुढ़ । क्लिष्ट । कठिन ।

दुर्बोध्य
वि० [सं०] दे० 'दुर्बोध' ।

दुर्बोध्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] समझ में न आने की क्षमता । दु्र्बोध होने का भाव । उ०—प्रतिपाद्य प्रकरण की दु्र्वोध्यता के कारण साधारण पाठक उसे समझ नहीं पता ।—शैली, पृ० ९० ।

दुर्भक्ष (१)
वि० [सं०] १. जिसे खाना कठिन हो । जो जल्दी न खाया जा सके । २. खाने में बुरा ।

दुर्भक्ष (२)
संज्ञा पुं० वह समय जिसमें भोजन कठिनता से मिले । दुर्भिक्ष । अकाल ।

दुर्भख पु
संज्ञा पुं० [सं० दुर्भक्ष] भोजन की कहत । अकाल । दुर्भिक्ष । उ०—जन हरिया उन देसड़ै बारै मास सुकाल । भूख तृषा नहि व्याफ्ई दुर्भख पड़ै न काल ।—राम० धर्म०, पृ० ६२ ।

दुर्भग
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दुर्भगा] जिसका भाग बुरा हो । खोटे प्रारब्ध का । अभागा ।

दुर्भागा (१)
वि० स्त्री० [सं०] मंद भाग्यवाली । अभागिन ।

दुर्भगा (२)
संज्ञा स्त्री० १. वह स्त्री जो अपने पति के स्नेह के वंचित हो । वह स्त्री जिसे स्वामी न चाहे । विरक्ता । २. बुरे स्वभाव की । कर्कशा । झगड़ालू (को०) । ३. विधवा (को०) ।

दुर्भर
वि० [सं०] १. जिसे उठाना कठिन हो । जो लादा न जा सके । २. भारी । गुरु । वजनी ।

दुर्भाग
संज्ञा पुं० [सं० दुर्भाग्य] दे० 'दुर्भाग्य' ।

दुर्भागी
वि० [सं० दुर्भाग्य] अभागा । मंद भाग्य का ।

दुर्भाग्य
संज्ञा पुं० [सं०] मंद भाग्य । बुरा अदृष्ट । खोटी किसमत ।

दुर्भाव
संज्ञा पुं० [सं०] बुरा भाव । २. द्धेष । मनमोटाव । मनो- मालिन्य ।

दुर्भावना
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बुरी भावना । २. खटका । चिंता । अंदेशा ।

दुर्भाव्य
वि० [सं०] जिसकी भावना सहज में न हो सके । जो जल्दी ध्यान में ना आ सके ।

दुर्भिक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] ऐसा समय जिसमें भिक्षा या भोजन कठिनता से मिले । अकाल । कहत ।

दुर्भिच्छ पु
संज्ञा पुं० [सं० दुर्भिक्ष] दे० 'दुर्भिक्ष' ।

दुर्भिद
वि० [सं०] दे० 'दुर्भेंद' [को०] ।

दुर्भेद
वि० [सं०] १. जो जल्दी भेदा न जा सके । जो कठिनता से छिदे । २. जिसके पार कठिनता से जा सकें । जिसे जल्दी पार न कर सकें ।

दुर्भेद्य
वि० [सं०] दे० 'दुर्भेद' ।

दुर्भृत्य
संज्ञा पुं० [सं०] बुरा नौकर जो आज्ञा का यथावत् पालन न करे । दुष्ट सेवक [को०] ।

दुर्मकु
वि० [सं० दुर्मुङकु] आज्ञा का पालन न करनेवाला [को०] ।

दुर्मंत्र
संज्ञा पुं० [सं० दुर्मन्त्र] बुरी सलाह । कुमंत्र । अहितकर राय या संमति [को०] ।

दुर्मत्रणा
संज्ञा स्त्री० [सं०दुर्मन्त्रणा] दे० 'दुर्मत्र' [को०] ।

दुर्म पु †
संज्ञा पुं० [सं० द्रुम] दे० 'द्रुम' । उ०—दुर्म डार तहँ अति घनि छाया, पंछी बसेरा लेई रे ।—कबीर श०, भा० २, पृ० ६८ । यौ०—दुर्मावलि ।

दुर्माति (३)
संज्ञा स्त्री० [सं०] बुरी बुद्धि । कुमति । नासमझी ।

दुर्मात (२)
वि० १. दुर्बुद्धि । जिसकी समझ ठीक न हो । कम अक्ल । २. खल । दुष्ट ।

दुर्मति (३)
संज्ञा पुं० [सं०] आठ संवत्सरों में से एक जिसमें दुर्भिक्ष होता है । (ज्योतिस्तत्व) ।

दुर्मद
वि० [सं०] १. उन्मत्त । नशे आदि में चूर । उ०—कुंभकरन दुर्मद रनरंगा ।—तुलसी (शब्द०) । २. अभिमान में चूर । गर्व से भरा हुआ ।

दुर्मना
वि० [सं० दुर्मनस्] १. बुरे चित्त का । दुष्ट । २. उदास । खिन्न । अनमना ।

दुर्मनुष्य
वि० [सं०] बुरा व्यक्ति । खोटा व्यक्ति [को०] ।

दुर्मर
वि० [सं०] जिसका मृत्यु बड़े कष्ट से हो ।

दुर्मरण
संज्ञा पुं० [सं०] बुरे प्रकार से होनेवाली मृत्यु ।

दुर्मरा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दुर्वा । दुब ।

दुर्मर्ष
वि० [सं०] जिसे सहन करना कठिन हो । दुःसह ।

दुर्मर्षण (३)
संज्ञा पुं० [सं०] विष्णु का एक नाम [को०] ।

दुर्मर्षण (२)
वि० दे० 'दुर्मर्ष' ।

दुर्मल्लिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] द्दश्य काव्य के अंतर्गत उपरूपकों में से एक, जिसमें हास्यरम प्रधान होता है । विशेष—यह चार अंकों में समाप्त होता है । इसमें गर्भाक नहीं होते । इसके तीन अंकों में क्रमशः विट, विदुषक, पीठमर्द आदि की विविध क्रिड़ाएँ रहती हैं ।

दु्र्म्मली
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दुर्मल्लिका' ।

दुर्मावलि पु
संज्ञा पुं० [सं० द्रुभावलि] बाग । उपवन । उ०— एह कलि दुर्मावलि गुनभली । अनबन भाँति बचन फल फली ।—चित्रा०, पृ० १२ ।

दुर्मित्र
वि० [सं०] १. कृमित्र । दुष्ट मित्र । २. शत्रु । दुश्मन [को०] ।

दुर्मिल
संज्ञा पुं० [सं०] १. भरत के सातवें लड़के का नाम । २. एक छंद जिसके प्रत्येक चरण में १०, ८ आर १४ के विराम से ३२ मात्राएँ होती हैं । अंत में एक सगण और दो गुरु होते हैं । इसमें जगण का निषेध है । जैसे—जय जय रघुनदन असुर- विखंडन, कुलमंडन यश के धारी । जनमन सुखकारी, विपिन- विहारी, नारि अहिल्याहि सी तारी । ३. एक वर्णवृत्त जिसके प्रत्येक चरण में आठ सगण होते हैं । यह एक प्रकार का सवैया है । जैसे,—सबसों करि नेह भजै रघुनंदन राजत हीरन माल हिये ।

दुर्मिल (२)
वि० [सं०] १. जिसे प्राप्त करना कठिन हो । कठिनता से मिलनेवाला दुर्लभ । उ०—दुर्मिल जो कुछ ऊर्मिल मिल मिलकर हुआ आखिल ।—अर्चना, पृ० १० । २. जो मेल का न हो । अनमिल ।

दुर्मुख
संज्ञा पुं० [सं०] १. घोड़ा । २. राम की सेना का एक बंदर । ३. महिषासुर के एक सेनापति का नाम । ४. रामचंद्र जी का एक गुप्तचर जिसके द्वारा वे अपनी प्रजा का वृत्तांत जाना करते थे । इसी के मुँह से उन्होंने सीता का वह वृत्तांत सुना था जिसके कारण सीता का द्वितीय वनवास हुआ था (उत्तर- रामचरित) । ५. एक नाग का नाम । ६. शिव । ७. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम । ८. वह घर जिसका द्वार उत्तर की ओर हो । ९. साठ संवत्सरों में से एक । १०. एक यज्ञ का नाम । ११. गणेश जी का एक नाम । १२. रावण की सेना का एक राक्षस । उ०—दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी ।—मानस, ६ । ६१ ।

दुर्मुख (२)
वि० [वि० स्त्री० दुर्मुखी] १. जिसका मुख बुरा हो । विकृत मुख का । बदसूरत । २. बुरे वचन बोलनेवाला । कटुभाषी । अप्रियवादी ।

दुर्मुखी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक राक्षसी जिसे रावण ने जानकी को समझाने के लिये नियत किया था ।

दुर्मुखी (२)
वि० बुरे मुहँवाली ।

दुर्मुट
वि० [हिं०] दे० 'दुर्मुस' ।

दुर्मुस
संज्ञा पुं० [सं० दुर् (प्रत्य०) + मुस् (कूटना)] गदा के आकार का एक लंबा डंडा जिसके नीचे लोहे या पत्थर का भारी गोल टुकड़ा रहता है और जिससे सड़कों आदि पर कंकड़ या गिट्टी पीटकर बैठाई जाती है । ककड़ या गिट्टी पीटने का मुगदर ।

दुर्मुहूर्त
संज्ञा पुं० [सं०] अशुभ मुहूर्त । बुरी साइत [को०] ।

दुर्मूल्य
वि० [सं०] जिसका दाम अधिक हो । महँगा ।

दुर्मूल्यता
संज्ञा स्त्री० [सं०] बहुमूल्य होने का भाव । महार्घता । दामीपन । उ०—इससे साहित्य का सम्मान होता है या साहित्य की दुर्मूल्यता प्रमाणित होती है ।—स० दर्शन, पृ० ४६ ।

दुर्मेध
वि० [सं० दुर्मेधस्] मंदबुद्धि । नामसझ ।

दुर्मेधा
वि० [सं० दुर्मेधस्] दुर्बुद्धि । मूख [को०] ।

दुर्मोह
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० दु्र्मोहा] १. कौवाठोठी । २. सफेद घुँघची ।

दुर्यश
संज्ञा पुं० [सं० दुर्यशस्] अपयश । अपकीर्ति ।

दुर्योग
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुरा योग । दुर्भाग्यसूचक योग । २. मेल न खाता हुआ । अनमेल स्त्री ।

दुर्योध
वि० [सं०] जो बड़ी बड़ी कठिनाइयों को सहकर भी युद्ध में स्थिर रहे । विकट लड़ाका ।

दुर्योधन
संज्ञा पुं० [सं०] कुरुवंशीय राजा धृतराष्ट्र के १०१ पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र का नाम । विशेष—यह अपने चचेरे भाई पांडवों से बहुत बुरा मानता था । सबसे अधिक द्वेष यह भीम से रखता था । बात यह थी कि भीम के समान दुर्योधन भी गदा चलाने में अत्यंत निपुण था, पर वह भीम की बराबरी नहीं कर सकता था । पहले धृतराष्ट्र युधिष्ठिर को ही सब में बड़ा समझ युवराज बनाना चाहते थे, पर दुर्योधन ने बहुत आपत्ति की और छल से पांडवो को वन में भेज दिया । बनवास से लौटकर पांडवों ने इंद्रप्रस्थ में अपनी राजधानी बसाई और युधिष्ठिर ने धूमधाम से राजसूय यज्ञ किया । उस यज्ञ में पांडवों का भारी वैभव देख दुर्योधन जल उठा और उनके नाश का उपाय सोचने लगा । अंत में उसने युधिष्ठिर को अपने साथ पासा खेलने के लिये बुलाया । उस खेल में दुर्योधन के मामा गांघार के राजकुमार शकुनि के छल और कौशल से युधिष्ठिर अपना सारा राज्य और धन यहाँ तक कि द्रौपदी की भी हार गए । दुःशासन द्रौपदी की बलात् सभा में लाया और दुर्योधन उसे अपने जघे पर बैठने के लिये कहने लगा । इसपर भीम ने अपनी गदा से दुर्योधन के जंघे को तोड़ने की प्रतिज्ञा की । अंत में द्यूत के नियमानुसार धृतराष्ट्र ने यह निर्णय किया कि पांडव बारह वर्ष बनवास और एक वर्ष अज्ञातवास करें । जब अज्ञातवास पुरा हो गया तब कृष्ण दूत होकर कौरवों के पास पांडवों की ओर से गए । पर दुर्योधन ने पांडवों को राज्य का अंश क्या, पाँच गाँव तक देना अस्वीकार कर दिया । अंत में कुरुक्षेत्र का प्रसिद्ध युद्ध हुआ जिसमें कौरव मारे गए और भीम ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की । दुर्योधन को युधिष्ठिर 'सुयोधन' कहा करते थे ।

दुर्योधन (२)
वि० [सं०] दे० 'दुर्योध' ।

दुर्योधनता
संज्ञा स्त्री० [सं०] अपराजेय होने का भाव । दुर्योध होने का भाव [को०] ।

दुर्योनि
वि० [सं०] जिसका जन्म नीच कुल में हो । नीच कुल का ।

दु्र्र
संज्ञा पुं० [अ०] १. मोती । उ०—के दरचक में ज्यूँ अमोलक रतन । सदक में के ज्यूँ है ओ दुरें अदन ।—दक्खिनी०, पृ० १५० । २. एक कर्ण भूषण ।

दुर्रा
संज्ञा पुं० [फा०] कोड़ा । चाबुक । घुर्रा ।

दुर्रानी
संज्ञा पुं० [फा०] अफगानों की एक जाति ।

दुर्लध्य
वि० [सं० दुर्लङ्ध्य] दुःख से उल्लंघन करने योग्य । जिसे जल्दी लाँघ न सकें । उ०—अधिकार के आगे एक दुर्लध्य प्रश्नवाचक लगा हुआ है ।—अपरा भू०, पृ० ३ ।

दुर्लक्ष्य (१)
वि० [सं०] जो कठिनता से दिखलाई पड़े । जो प्रायः अदृश्य हो ।

दुर्लक्ष्य (२)
संज्ञा पुं० बुरा उद्देश्य । बुरी नियत ।

दुर्लक्ष्यी
वि० [सं० दुर्लक्ष्यिन्?] कठिन लक्ष्य का भेदन करनेवाला । उ०—आहत पीछे हटे, स्तंभ से टिककर मनु से श्वास लिया टंकार किया दुर्लक्ष्यी धनु ने ।—कामायनी, पृ० २०० ।

दुर्लभ (१)
वि० [सं०] १. जो कठिनता से मिल सके । जिले पाना सहज न हो । दुष्प्राप्य । २. अनोखा । बहुत बढ़िया । ३. प्रिय ।

दुर्लभ (२)
संज्ञा पुं० १. कचूर । २. विष्णु ।

दुर्ललित
वि० [सं०] दुलार से बिगड़ा हुआ । नटखट । शरारती । उ०—उठती अंतस्तल से सदैव दुर्ललित लालसा जो कि कांत । वह इंद्रचाप सा झिलामिल हो दब जानी अपने आप शांत ।— कामायनी, पृ० १३९ ।

दुर्ललित (२)
संज्ञा पुं० औद्धत्य । शरीरतीपन [को०] ।

दुर्लेख
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुरा लेख । २. दुर्भाग्य का लेख । उ०— विधि के इस दुर्लेख की अपनी आँखों में देखते देखकर जीना भारी हो आता है ।—सुखदा, पृ० ९ ।

दुर्लेख्य (१)
वि० [सं०] जो बुरा लिखा हुआ हो । जो ऐसा लिखा हो कि जल्दी पढ़ा न जा सके । (स्मृति) ।

दुर्लेख्य (२)
संज्ञा पुं० जाली कागज पत्र [को०] ।

दुर्वच (१)
वि० [सं०] १. जो दुःख से कहा जा सके । जिसके कहने में कष्ट हो । २. जो कठिनता से कहा जा सके ।

दुर्वच (२)
संज्ञा पुं० दुर्वचन । गाली ।

दुर्वचन
संज्ञा पुं० [सं०] दुर्वाक्य । कट्ठवचन । गाली । उ०—कहि दुर्वचन क्रुद्ध दसकँधर ।—मानस, ६ । ९० ।

दुर्वचा
संज्ञा पुं० [सं० दुर्वचस्] कटुवचन बोलनेवाला । कटुभाषी । कटुवादी [को०] ।

दुर्वर्ण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुरा अक्षर । २. चाँदी । रजत । ३. भिन्न । मिलावट । ४. कुष्ठ का एक भेद । श्वेत कुष्ठ [को०] ।

दुर्वर्ण (२)
वि० बुरे वर्ण या रंगवाला [को०] ।

दुर्वर्णा
संज्ञा स्त्री० [सं०] चाँवी । एलुवा ।

दुर्वस
वि० [सं०] जहाँ रहना या टिकना कष्टकर हो [को०] ।

दुर्वसति
संज्ञा स्त्री० [सं०] बुरा निवास । रहने का कष्टदायक स्थान या बत्ती [को०] ।

दुर्वह
वि० [सं०] १. जिसका वहन या धारण करना कठिन हो । जैसे, दुर्वह गर्भ । २. जिसे चलना कठिन हो ।

दुर्वाच् (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] बुरा वचन । निंदित वाक्य ।

दुर्वाच़् (२)
अपशब्द बोलनेवाला । बुरी बातें बकनेवाला [को०] ।

दुर्वाच्य
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दुर्वचन' । उ०—उससे भी अधिक दुर्वाच्यों और कटुभाषण के..... ।—प्रेमघन, भा० २, पृ० ३०० ।

दुर्वाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. अपवाद । निंदा । बदनामी । २. स्तुति- पूर्वक कहा हुआ अप्रिय वाक्य । ३. अनुचित, अयुक्त या निंदित विवाद ।

दुर्वादी
वि० [सं० दुर्वादिन्] कुतर्की । हुज्जती । दुर्वाद करनेवाला ।

दुर्वार
वि० [सं०] जिसका निवारण कठिन हो । जो जल्दी रोका न जा सके ।

दुर्वारण
वि० [सं०] दे० 'दुर्वाय' [को०] ।

दुर्वारि
संज्ञा पुं० [सं०] कंबोज देश का एक वीर जो महाभारत की लड़ाई में लड़ा था ।

दुर्वार्य
वि० [सं०] जिसका निवारण कठिन हो । जो जल्दी रोका न जा सके ।

दुर्वासना
संज्ञा स्त्री० [सं०] बुरी इच्छा या खोटी आकांक्षा । दुष्ट कामना । उ०—दुष्टता दमन दमभवन दुःखौघहर दुर्ग दुर्वा- सना नासकर्ता ।—तुलसी, ग्रं, पृ० ४८६ । २. ऐसी कामना जो कभी पूरी न हो सके । उ०—दुर्वासिना कुमद समुदाई ।— मानस, ३ । ३८ ।

दुर्वासा
संज्ञा पुं० [सं० दुर्वासिस्] एक मुनि जो अत्रि के पुत्र थे । विशेष—इनके नाम के विषय में महाभारत में लिखा है कि जिसका धर्म में दृढ़ निश्चय हो उसे दुर्वासा कहते हैं । ये अत्यंत क्रोधी थे । इन्होंनी और्व मुनि की कन्या कंदला से विवाह किया था । विवाह के समय इन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि स्त्री के सौ अपराद क्षमा करेंगे । प्रतिज्ञानुसार इन्होंने सौ अपराध तक क्षमा किए, अनंतर शाप देकर पत्नी को भस्म कर दिया । और्व मुनि ने कन्या के शाप से शोकातुर होकर शाप दिया कि तुम्हारा दर्प चूर्ण होगा । इसी शाप के कारण राजा अंबरीष के मामले में इन्हें नीचा देखना पड़ा । इनका स्वभाव कुछ सनकी था । इनके शाप तथा बरदान की अनेक कथाएँ महाभारत तथा पुराणादि में भरी पड़ी हैं ।

दुर्वाहित
संज्ञा पुं० [सं०] दुर्वह बोझ । भारी बोझा [को०] ।

दुर्विगाह
वि० [सं०] जिसका अवगाहन कठिन हो । जिसकी थाह जल्दी न लगे ।

दुर्विगाह्य
वि० [सं०] दे० 'दुर्विगाह' [को०] ।

दुर्विज्ञेय
वि० [सं०] जिसका कष्ट या कठिनता से ज्ञान हो सके । जो जल्दी जाना न जा सके ।

दुर्विद
वि० [सं०] जिसे जानना कठिन हो । जो जल्दी जाना न जा सके ।

दुर्विदग्ध
वि० [सं०] १. जो अच्छी तरह जला न हो । अधजला । २. जो पूर्ण परिपक्व न हो । साधारण जानकारी से गर्विष्ठ । ३. अहंकारी । घमंडी ।

दुर्विदग्धता
संज्ञा स्त्री० [सं०] अधकचरापन । पूरी निपुणता का अभाव ।

दुर्विध
वि० [सं०] १. दरिद्र । २. खल । मूर्ख ।

दुर्विधि (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] बुरी विधि । कुनियम ।

दुर्विधि (२)
संज्ञा पुं० दुर्भाग्य ।

दुर्विनय
संज्ञा स्त्री० [सं०] अविनय । औद्धत्य । उद्दंडता [को०] ।

दुर्विनात
वि० [सं०] अविनीत । अशिष्ट । उद्धत । अक्खड़ ।

दुर्विपाक
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुरा परिणाम । बुरा फल । २. बुरा संयोग । दर्घटना ।

दुर्विभाव्य
वि० [सं०] जिसकी भावना न हो सके । जो मन में न आवे । जिसका अनुमान न हो सके ।

दुर्बिलसित
संज्ञा पुं० [सं०] दुष्कार्य ।

दुर्विवाह
संज्ञा पुं० [सं०] बुरा ब्याह । निंदित विवाह । विशेष—स्तुतियों में जो आठ प्रकार के विवाह कहे गए हैं उनमें ब्रह्मा आदि चार प्रकार के विवाह सुविवाह और असुर आदि चार प्रकार के विवाह दुर्विवाह कहलाते हैं ।

दुर्विष (२)
संज्ञा पुं० [सं०] महादेव (जिनपर विष का कुछ प्रभाव न हुआ ।)

दुर्विष (२)
वि० [सं०] बुरे स्वभाव का । दुर्वुत्त [को०] ।

दुर्विषह (१)
वि० [सं०] जिसे सहना कठिन हो । दुःसह ।

दुर्विषह (२)
संज्ञा पुं० १. महादेव । शिव । २. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

दुर्वीक्ष्य
वि० [सं०] जो दुःख या कठिनता से दिखाई दे । उ०— नाना काका उलूक आदि रव से हो प्रायशः पूरिता । देती है वन को भयावह बना दुर्वीक्ष्य वृक्षावली ।—पारिजात पृ० ८५ ।

दुर्वृत्त (१)
वि० [सं०] जिसका आचरण बुरा हो ।—दुश्चरित्र । दुराचारी ।

दुर्वृत्त (२)
संज्ञा पुं० बुरा आचरण । बुरा व्यवहार ।

दुर्वृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बुरा वृत्ति । बुरा पेशा । बुरा काम । उ०—सेवा समान अति दुस्तर दुःखदाई । दुर्वृत्ति और अवलोकन में न आई ।—द्विवेदी (शब्द०) २. छल । जाल फरेब । धोखा (को०) । ३. खराब आचरण । अनुचित व्यवहार । दुराचरण (को०) ।

दुर्वृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. यथावश्यक वर्षा का अभाव । २. सूखा । अनावृष्टि [को०] ।

दुर्वेंद
वि० [सं०] १. वेदाध्ययन से विमुख ब्राह्मण । २. जो कठिनाई से समझ में आवे । दुर्वोध्य [को०] ।

दुर्व्यवस्था
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुप्रबंध । बदइंतजामी ।

दुर्व्यवहार
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुरा व्यवहार । बुरा बर्ताव । २. दुष्ट आचरण । ३. वह मुकदमा जिसका फैसला घूस आदि के कारण ठीक न हुआ हो । दे० 'दुदृंष्ट' ।

दुर्व्यसन
संज्ञा पुं० [सं०] बुरी लत । खराब आदतें । किसी ऐसी बात का अभ्यास जिससे कोई लाभ न हो ।

दुर्व्यसनी
वि० [सं० दुर्व्यसनिन्] बुरी लतवाला ।

दुर्व्रत (१)
संज्ञा पुं० [सं०] बुरा मनोरथ । नीच आशय ।

दुर्व्रत (२)
वि० १. जिसने बुरा व्रत लियया हो । बुरे मनोरथोंवाला । नीचाशय । २. आदेश न माननेवाला । आज्ञा पालन न करनेवाला (को०) ।

दुहृद (१)
वि० [सं०] दे० 'दुर्हदय' [को०] ।

दुर्हृद (२)
संज्ञा पुं [सं० दुर्हृद्] सो सुहृद न हो । अमित्र । शत्रु ।

दुर्हृदय
वि० [सं०] कुटिल हृदल का । कुटिल । खोटा [को०] ।

दुर्हृषीक
वि० [सं०] अजितेद्रिय । दुर्बल इंद्रियवाला ।

दुलक्री
संज्ञा स्त्री० [हिं० दलकना] घोड़े की एक चाल जिसमें वह चारों पैर अलग अलग उठाकर कुछ उछलता हुआ चलता है । क्रि० प्र०—चलना ।—जाना ।

दुलखना †
क्रि० स० [हिं० दो+ लक्षण] बार बार बतलाना । बार बार कहना । बार बार दोहराना ।

दुलखी
संज्ञा स्त्री० [देश०] एक फतिंगा जो ज्वार, नील, तमाखु, सरसों और गेहूँ को नुकसान पहुँचाता है ।

दुलड़ा (१)
वि० [हिं० दो + लड़] [वि० स्त्री० दुलड़ी] दो लड़ों का ।

दुलड़ा (२)
संज्ञा पुं० दो लड़ों की माला ।

दुलड़ी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो+ लड़] दो लड़ों की माला ।

दुलत्ती
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो + लात] १. घोड़े आदि चौपायों का पिछले दोनों पैरों को उठाकर लात मारना । क्रि० प्र०—चलाना ।—मारना । मुहा०—दुलत्ती छाँटना या झाड़ना = दोनों लातों का चलाना । दोनों लातों से मारना । दुलत्ती फेंकना = दोनों लात चलाना । २. मालखंभ की एक कसरत जिसमें पैरों को मालखंभ से अलग दिखाकर ताल आदि ठोकते हैं ।

दुलदुल
संज्ञा पुं० [अ०] वह खच्चरी जिसे इसकंदरिया (मिस्त्र) के हाकिम ने मुह्म्मद साहब को नजर में दिया था । विशेष—साधारण लोग इसे घोड़ा समझते हैं और मुहंरस कै दिनों में इसकी नकल निकालते हैं । मुहरंम की आठवीं को अब्बास के नाम का और नवीं को हुसौन के नाम का बिना सवार का घोड़ा भीड़माड़ के साथ निकाला जाता है ।

दुलना †
संज्ञा पुं० [सं० दोलन] दे० 'दोलन' । उ०—सूर स्याम सरोज लोचन दुलन जन जल चार ।—सूर (शब्द०) ।

दुलना
क्रि० अ० [सं० दोलना] दे० 'डुलना' ।

दुलभ पु
वि० [सं० दुर्लभ] दे० 'दुर्लभ' ।

दुलरा
वि० [हिं० दुलार] दे० 'दुलारा' ।

दुलराना पु † (१)
क्री० स० [हिं० दुलारना] लाड़ करना । बच्चों को बहलाकर प्यार करना । उ०—अब लागी मोको दुलरावन प्रेम करति टरि ऐसी हौ । सुनहु सूर तुमरे छित छिन मति बड़ी प्रेम की गैसी हो ।—सूर (शब्द०) ।

दुलराना (२)
क्रि० अ० दुलारे बच्चों की सी चेष्टा करना । लाड़ प्यार का सा व्यवहार करना ।

दुलरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दु + लर] दे० 'दुलड़ी' । उ०—फूलन की दुलरी, हुमेल हार फूलन के, फूलन की चंपमाल, फुलन गजरा री ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३८० ।

दुलरुवा †
वि० संज्ञा पुं० [हिं० दुलारा + उवा (प्रत्य०)] दे० 'दुलारा' ।

दुलह (१)
संज्ञा पुं० [हिं० दुलहा] १. दे० 'दूल्हा' (लाक्ष०) । २. जीव । उ०—दुलह घर में नहीं दुलहिन भाँवरि फिरै ।—कबीर रे०, पृ० २६ ।

दुलह पु (२)
वि० [सं० दुर्लभ] दे० 'दुर्लभ' ।

दुलहन
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुलहा] नवविवाहिता वधू । नई बहू । नई ब्याही हुई स्त्री ।

दुलहा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दूल्हा' ।

दुलहिन
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुलहा] दे० 'दुलहन' । उ०—दुलह घर में नहीं दुलहिन भाँवरि फिरै । अजब अचरज्ज का खेल बूझै ।—कबीर०, रे० पृ० २६ ।

दुलहिनि †, दुलहिनी †
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दूल्हन' । उ०—तिहि छिन दुलहिनि दसा भई जो बरनि न जाई ।—नंद ग्रं०, पृ० २१० ।

दुलहिया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुलही +इया (प्रत्य०)] दे० 'दुलहन' । उ०—देह दुलहिया की बढ़ै ज्यों ज्यों जोवन जोति ।— बिहारी (शब्द०) ।

दुलही †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुलहा] दे० 'दुलहन' ।

दुलहेटा
संज्ञा पुं० [सं० दुर्लभ, प्रा० दुल्लह + हिं० बेटा] दुलारा लड़का । लाड़ला बेटा । उ०—युग युग जियहिं राज दुलहेटा दै असीस द्विजनारी । पाइ भीख लै सीख जाइ घर कोउ आवती सुखारी ।—रघुराज (शब्द०) ।

दुलाई
संज्ञा स्त्री० [सं० तूल (=रुई) हिं० आई (प्रत्य०), हिं० तुलाई, तुराई] ओढ़ने का दोहरा कपड़ा जिसके भीतर रूइ भरी हो । रूई भरा हुआ ओढ़ना ।

दुलाना †
क्रि० स० [सं दोलन] दे० 'डुलाना' । उ०—पदिमिनि कहुँ जब पौन दुलावै । तब लंपट अलि बैठि न पावै ।—नंद० ग्रं०, पृ० ११९ ।

दुलार
संज्ञा पुं० [हिं० दुलारना] प्रसन्न करने की वह चेष्टा जो प्रेम के कारण लोग बच्चों या प्रेमपात्रों के साथ करते हैं । जैसे, कुछ विलक्षण संबोधनों से पुकारना, शरीर पर हाथफेरना, चूमना इत्यादि । लाड़ प्यार । क्रि० प्र०—करना ।— होना ।

दुलारना
क्रि० स० [सं० दुर्लालन, प्रा० दुल्लाड़न] प्रेम के कारण बच्चों या प्रेमपात्रों को प्रसन्न करने के लिऐ उनके साथ अनेक प्रकार की चेष्टा करना । जैसे, विलक्षण संबोधनों से पुकारना, शरीर पर हाथ फेरना, चूमना, इत्यादि । लाड़ करना । लाड़ना ।

दुलारा (१)
वि० [हिं० दुलार] [वि० स्त्री० दुलारी] जिसका बहुत दुलार या लाड़ प्यार हो । लाड़ला । जैसे, दुलारा लड़का ।

दुलारा (२)
संज्ञा पुं० लाड़ला बेटा । प्रिय पुत्र । उ०—रोकत मग आज सखी नंद को दुलारो ।—सूर (शब्द०) ।

दुलारी (१)
वि० स्त्री० [हिं० दुलारा] जिसका अधिक लाड़ प्यार हो । लाड़ली ।

दुलारी (२)
संज्ञा स्त्री० लाड़ली बेटी । प्रिय कन्या । उ०—सखियन संग झूलति वृषभानु की दुलारी ।—सूर (शब्द०) ।

दुलारी (३)
संज्ञा स्त्री० [हिं० तुराई] दे० 'दुलाई' । उ०—इसी बात को समुझि ले तू अपने मन बाल । प्रीति दुलारी खुलत है लहि कै मगजी लाल ।—रसनिधि (शब्द०) ।

दुलाह †
संज्ञा पुं० [देश०] जवास । हिंगुवा ।

दुलि
संज्ञा स्त्री० [सं०] छोटी कच्छपी । कच्छपी [को०] ।

दुलीचा
संज्ञा पुं० [देश०] गलीचा । कालीन । उ०—ज्ञान दुलीचा झारि बिछावो, नाम कै तकिया अरध लगावो ।—धरम०, पृ० ७४ ।

दुलीची
संज्ञा स्त्री० [देश०] दे० 'दुलैचा' । उ०—मेरुदंड पर डार दुलीची जोगिन तारी लाया ।—कबीर श०, भा० १, पृ० २६ ।

दुलेहटा †
संज्ञा पुं० [हिं० दुलहा] दे० 'दुलहेटा' ।

दुलैचा
संज्ञा पुं० [देश०] गलीचा कालीन ।

दुलोही
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो+ लोहा] एक प्रकार की तलवार जो लोहे के दो टुकड़ों को जोड़कर बनाई जाती है ।

दुल्लभ पु
वि० [सं० दूर्लभ, प्रा० दुल्लभ] दे० 'दुर्लभ' ।

दुल्लह पु
संज्ञा पुं० [हिं० दुलहा] दे० 'दूल्हा' । उ०—अब दुल्लह दुल्लह तब कहेऊ । दुलहिनि दिल में मनस, भैऊ ।—सं० दरिया०, पृ० १ ।

दुल्ला †
संज्ञा पुं० [देश०] एक पौधा ।

दुल्ली
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुल्लो] दे० 'दुल्लों' ।

दुल्लीच
संज्ञा पुं० [देश०] दुलीचा । कालीन । गलीचा । उ०— रेसंम गिलम दुल्लीच मंडि । जिन जोति होति दुति चित्र षंडि ।—पृ० रा०, १४ । ३६ ।

दुल्लों
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो+ ला (प्रत्य०)] गोली के खेल में वह गोली जो मीर या अगली गोली के पीछे हो । दूसरे नंबर की गोली ।

दुल्हैया †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूल्हा + ऐया (प्रत्य०)] दे० 'दुलहन' । उ०—नयो नेह मेह, नई भूमि हरियारी । नवल दूलह प्यारो, नवल दुल्हैया ।—नंद ग्रं०, पृ० ३७३ ।

दुप पु
[सं० द्वि] दो ।

दुवन
संज्ञा पुं० [सं० दुर्मनस्] १. दुष्ट चित का मनुष्य ।—खल । दुर्जन । बुरा आदमी । उ०—कै अपनी दुर्नीति कै दुवन क्रूरता मानि । आवे उर में सोच अति सो संका पहिचानि ।—पद्माकर (शब्द०) । २. शत्रु । वैरी । दुश्मन । उ०—मतिराम सुजस दिन दिन बढ़त सुनत दुवन उर कट्टियत ।—मतिराम (शब्द०) । ३. राक्षस । दैत्य । उ०—(क) आरज सुवन को तो दया दुवनहु पर मोहि सोच मोते सब विधि नसानि ।— तुलसी (शब्द०) । (ख) पयज बँधाय सेत उतरे कटक कलि आए देखि देखि टूत दारुन दुवन के ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुवरवा †
संज्ञा पुं० [सं० द्वार] द्वार । दरवाजा । उ०—जाके दुवरवा जमिरिया सो कैसे सोइल हो ।—धरम०, पृ० ६२ ।

दुवा पु †
संज्ञा स्त्री० [अ० दुआ] दे० 'दुआ' । उ०—तूँ लीन्हें मन आछसि दुवा । औ जुग सारि चहसि पुनि छुवा ।— जायसी ग्रं० (गुप्त), पृ० ३३२ ।

दुवाज
संज्ञा पुं० [?] एक प्रकार का घोड़ा । उ०—नुकरा और दुवाज बोरता है छबि दूनी ।—सूदन (शब्द०) ।

दुवादस †पु
वि० [सं० द्वादश] दे० 'द्वादश' ।

दुवादस बानी पु
वि० [सं० द्वादश (= सूर्य) + वर्ण] बारह बानी का । सूर्य के समान दमकता हुआ । आभायुत्क । खरा । (विशेषतः सोने के लिये) । उ०—कनक दुवादस बनि है चह सुहाग वह माँग । सेवा करैं नखत ससि तरइ उवै जस गाँग ।—जायसी (शब्द०) ।

दुवादसी पु
संज्ञा स्त्री० [सं० द्वादशी] दे० 'द्वादशी' ।

दुवार †
संज्ञा पुं० [सं० द्वार] [स्त्री० दुवारी] दे० 'द्वार' । उ०— खोजि लीन्ह सो सरग दुवारी । बज्र जो मूँदे जाइ उघारी ।— पदमावत, पृ० २२८ ।

दुवारिका †
संज्ञा स्त्री० [सं० द्वारिका] दे० 'द्वारका पुरी' ।

दुवाल
संज्ञा स्त्री० [फा़०] १. चमड़े का तसमा । २. रिकाब का तसमा । रिकाब में लगा हुआ चनड़े का चोड़ा फीता ।

दुवालबंद
संज्ञा पुं० [फा़०] चमड़े का चौड़ा तसमा जो कमर आदि में लपेटा जाय । चपरास या पेटी का तसमा ।

दुवाली (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] रँगे या छपे हुए कपड़ों पर चमक लाने के लिये घोंटने का औजार । घोंटा ।

दुवाली (२)
संज्ञा स्त्री० [फा़० दुवाल] चमड़े के चोड़े तसमे का परतला या पेटी जिसमें बंदूक, तलवार आदि लटकाते हैं ।

दुवालीबंद
संज्ञा पुं० [फा़०] परतला आदि लगाए हुए तैयार सिपाही ।

दुवाह
वि० [हिं०] १. दे० 'दुआह' । २. (जमीन) जो दो बार जोती गई हो ।

दुविद पु
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'द्विविद' ।

दुविधा †
संज्ञा पुं० [हिं० दुबधा] दे० 'दुबधा' ।

दुवो, दुवौ पु †
वि० [हिं० दुव (= दो) + उ (= ही)] दोनों । उ०—दुवौ सवति चढ़ि खाट बईठी । औ सिवलोक परा तिन्ह दोठी ।—जायसी ग्रं० पृ० २९९ ।

दुशम्न
संज्ञा पुं० [फा़०] दे० 'दुश्मन' । उ०—याम छबि निरखि नागरि नारि । प्यारी छवि निरखत मनमोहन सकत न नैन पसारि । पिय सकुचत नहिं दिष्टि मिलावत सन्मुख होत लजात । श्रीराधिका निडर अवलोकत अतिहि हृदय हरखात । अरस परस मोहनि मोहन मिलि सँग गोपी गोपाल । सूरदास प्रभु सब गुण लायक दुश्मन के उर साल ।—सूर (शब्द०) ।

दुशवार
वि० [फा़०] [संज्ञा डुशवारी] १. कठिन । दुरूह । मुश्किल २. दुःसह ।

दुशवारी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] कठिनता ।

दुशाला
संज्ञा पुं० [ सं० द्विशाट, फा़० दोशाला] पशमीने की चद्दरों का जोड़ा जिनके किनारे पर पशमीने की रंग बिरंगी बेलें बनी रहती हैं । ये बहुधा कश्मीर और पेशावर से आती हैं । कश्मीरी दुशाले अच्छे और कीमती होते हैं । उ०—तान तुक- ताला हैं विनोद के रसाला हैं, सुवाला हैं दुशाला हैं, विशाला चित्रशाला हैं ।—पद्माकर (शब्द०) । यौ०—दुशालापोश । दुशालाफरोश । मुहा०—दुशाले में लपेटकर मारना या लगाना = आड़े हाथ लेना । छिपे छिपे आक्षेप करना । मीठी चुटकी लेना ।

दुशालापोश
वि० [फा़०] १. जो दुशाला ओढ़े हो । २. जो अच्छा कपड़ा पहने हुए हो । ३. अमीर ।

दुशालाफरोश
संज्ञा पुं० [फा़०] दुशाला बेचनेवाला ।

दुशासन पु
संज्ञा पुं० [सं० दुःशासन] दे० 'दुःशासन' ।

दुश्चर
वि० [सं०] [ संज्ञा दुश्चरण] जिसका करना कठिन हो । कठिन । दुष्कर ।

दुश्चरित (१)
वि० [सं०] १. बुरे आचरण का । बदचलन । २. कठिन ।

दुश्चरित (२)
संज्ञा पुं० १. बुरा आचारण । कृचाल । बदचलनी । २. पाप ।

दुश्चरित्र
वि० [सं०] [ वि० स्त्री० दुश्चरित्रा] बुरे चरित्रवाला । बदचलन ।

दुश्चरित्र (२)
संज्ञा पुं० बुरी चाल । कुचाल । दुराचार ।

दुश्चर्मा
संज्ञा पुं० [सं० दुश्चर्मन्] वह पुरूष जिसकी लिगेंद्रिय के मुख पर ढाकनेवाला चमड़ा न हो । विशेष—इस प्रकार के लोग जन्म से ही बिना चमड़े के होते हैं । धर्मशास्त्रों का मत है कि गुरुतल्पग जन्मांतर में दुश्चर्मा उत्पन्न होते हैं । ऐसे पुरुषों को बिना प्रायश्चित किए कोई काम करने का अधिकार नहीं है, यहाँ तक कि बिना प्रायश्चित्त किए उनका दाह कर्म और मृतक कर्म भी नहीं किया जा सकता ।

दुश्चलन
संज्ञा स्त्री० [सं० दुः + हिं० चलन] दुराचरण । खोटी चाल । उ०—जिस मनुष्य के स्वरूप से दुश्चलन अथवा दुराचरण की आशंका पाई जाय उसका निरीक्षण पूर्णतया हो ।—बेनिस का बाँका (शब्द०) ।

दुश्चिंत्य
वि० [सं० दुश्चिन्त्य] जो कठिनता से समज में आवे । जिसकी भावना मन में जल्दी न हो सके ।

दुश्चिकित्स
वि० [सं०] दुश्चिकित्स्य । जिसकी चिकित्सा कठिन हो ।

दुश्चिकित्सा
संज्ञा स्त्री० [सं०] आयुर्वेद संबंधी चिकित्सा चिकितिसा के नियमों के विरूद्ध चिकित्सा करना । निंदित चिकित्सा । विशेष—स्मृतियों में इस प्रकार के अनाड़ी या दुष्ट चिकित्सकों के दंड का विधाना है ।

दुश्चिकित्सित
वि० [सं०] जिसकी चिकित्सा बड़ी कठिनाई से हो सके । जो चिकित्सनीय न हो । दुःसाध्य (रोग) ।

दुश्चिकित्स्य
वि० [सं०] १. जिसकी चिकित्सा कठिनाई से हो सके । जिसकी दवा जल्दी न हो सके । दुःसाध्य । २. जिसकी चिकित्सा हो न सके । असाध्य ।

दुश्चिक्य
संज्ञा पुं० [सं०] फलित ज्योतिष के अनुसार जन्म से तीसरा स्थान ।

दुश्चित्
संज्ञा पुं० [सं०] १. खटका । चिंता । आशंका । २. घब- राहट । उद्विग्नता ।

दुश्चेष्टा
संज्ञा स्त्री० [सं०] [संज्ञा पुं० दुश्चेष्टित] बुरा काम । कुचेष्टा ।

दुश्चेष्टित
संज्ञा पुं० [ सं०] १. दुष्कर्म । पाप । २. नीच काम । खोटा काम ।

दुश्च्यवन (१)
वि० [सं०] जो जल्दी च्युत न हो सके । जो जल्दी विचलित न हो ।

दुश्च्यवन (२)
संज्ञा पुं० इंद्र ।

दुश्च्याव (१)
वि० [सं०] जो जलदी च्युत न किया जा सके ।

दुश्च्यावा (२)
संज्ञा पुं० शिव । महादेव ।

दुश्मन
संज्ञा पुं० [फा़०] [भाव० दुश्मनी] शत्रु । वैरी । द्वेषी ।

दुश्मनी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] वैर । शत्रुता । विरोध ।

दुश्वार
वि० [फा़०] मुश्किल । कठिन । दुस्तर । उ०—जिसका बहिष्कार अब एक प्रकार से दुश्वार हैं ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० ३८७ ।

दुष्कर
वि० [सं०] जिस करना कठिन हो । दुःसाध्य । जो मुश्किल से हो सके ।

दुष्कर (२)
संज्ञा पुं० आकाश ।

दुष्कर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

दुष्कर्म
संज्ञा पुं० [सं० दुष्कर्मन] बुरा काम करनेवाला । पापी । कुकर्मी ।

दुष्कर्मा
वि० [सं० दुष्कर्मन्] दे० 'दुष्कर्मी (१)' ।

दुष्कर्मी (१)
वि० [सं० दुष्कर्म + ई (प्रत्य०)] बुरा काम करनेवाला । पापी । दुराचारी ।

दुष्कर्मी
संज्ञा पुं० पापी । उ०—तुमने अपने को बहुत से दुष्कर्मियों का अग्रगण्य बना रखा है ।—बेनिस का बाँका (शब्द०) ।

दुष्काल
संज्ञा पुं० [सं०] १. बुरा वक्त । कुसमय । २. दुर्भिक्ष । अकाल । ३. महादेव । ४. प्रलय (को०) ।

दुष्कीर्त्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] कृकीर्ति । अपयश । बदनामी ।

दुष्कुल (१)
संज्ञा पुं० [सं०] नीच कुल । बुरा खानदान । अप्रतिष्ठित घराना ।

दुष्कुल (२)
वि० नीच कुल का । तुच्छ घराने का ।

दुष्कुलीन
वि० [सं०] नीच कुल का । तुच्छ घराने का ।

दुष्कुलेय
वि० [सं०] दे० 'दुष्कुलीन' ।

दुष्कृत
संज्ञा पुं० [सं०] पाप । बुरा कर्म [को०] ।

दुष्कृति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] बुरा कर्म । कुकर्म ।

दुष्कृति (२)
वि० [सं०] कुकर्मी । पापी ।

दुष्कृती
वि० [सं० दुष्कृतिन्] बुरा काम करनेवाला । कुकर्मी । पापी ।

दुष्क्रम
संज्ञा पुं० [सं०] १. भ्रामक क्रम । अनुचित क्रम । २. साहित्य में क्रमभंग नामक दोष [को०] ।

दुष्क्रीत
वि० [सं०] मोल लेने में जिसका दाम उचित से अधिक दिया गया हो । महँगा ।

दुष्ख †
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दुःख' । उ०—हिअ दुष्ख वैराग मेट्टिअ ।—कीर्ति०, ५६ ।

दुष्खदिर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का खैर जिसका पेड़ छोटा होता है । इसका कत्था पीला और खाने में कड़ुआ और कसैला होता है । इसे क्षुद्र खदिर भी कहते हैं । पर्या०—कांबोजी । कालस्कंद । गोरट । अमरज । पत्रतरु । बहुसार । महासार । क्षुद्र खदिर ।

दुष्ट (१)
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दुष्टा] १. दूषित । दोषग्रस्त । जिसमें दोष हो । जिसमें नुक्स या ऐब हो । २. पित्त आदि दोष युक्त । ३. दुर्जन । खल । दुराचारी । पाजी । खोटा । ४. न्याय में हेतु, व्यभिचार आदि दोषों से युक्त (को०) । ५. छिन्न । त्रुटित (को०) । ६. बेकार का । निकम्मा (को०) । ७. अपराधी । दोषी । पापी (को०) ।

दुष्ट (२)
संज्ञा पुं० १ कुष्ट । कोढ़ । २. पाप । अपराध । दोष (को०) ।

दुष्टचारी
वि० [सं० दुष्टचारिन्] [वि० स्त्री० दुष्टचारिणी] १. दुराचारी । बुरा आचरण करनेवाला । २. दुर्जन । खल ।

दुष्टचेता
वि० [सं० दुष्टचेतस्] १. बुरी चिंतना करनेवाल । बूरे विचार का । २. बुरा चाहनेवाला । अहिताकांक्षी । ३. कपटी ।

दुष्टता
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दोष । नुक्स । ऐब । २. बुराई । खराबी । ३. बदमाशी । दुर्जनता ।

दुष्टत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दुर्जनता । खोटाई ।

दुष्टघी
वि० [सं०] छली । कपटाचारी । खोठा [को०] ।

दुष्टपना
संज्ञा पुं० [हिं० दुष्ट + पन (प्रत्य०)] दुष्टता । खोटाई । उ०—रे सठ रहु न राज मेरे में । है अति दुष्टपनो तेरे में ।—गोपाल (शब्द०) ।

दुष्टपार्णिग्राह
वि० [सं०] (सेना) जिसके पीछे की सेना दुष्ट हो ।

दुष्टबुद्धि
वि० [सं०] दे० 'दुष्टधी' [को०] ।

दुष्टलांगल
संज्ञा पुं० [सं० दुष्टलाङ्गल] चंद्रमा की आकृति के एक रूप का नाम [को०] ।

दुष्टवृष
संज्ञा पुं० [सं०] गरियार बैल । परुवा बैल । वह बैल जो स्वस्थ होते हुए भी काम से जी चुराए ।

दुष्टव्रण
संज्ञा पुं० [सं०] वह व्रण अथवा धाव जिसमें से दुर्गंध आवे और जो अच्छा न हो । विशेष—यह रोग वैद्यक में असाध्य मान गया है और धर्मशास्त्र में इस रोग को पूर्वजन्मकृत महापातक का फल माना है । बिना प्रायश्चित किए एस रोग का रोगी अस्पृश्य माना गया है और उसके दाहकर्म और मृतक संस्कार का निषेध है । २. नासूर । नाडीव्रण (को०) ।

दुष्टर
वि० [सं०] दे० 'दुस्तर' ।

दुष्टसाक्षी
संज्ञा पुं० [ सं० दुष्टसाक्षिन्] बुरा साक्षी । ऐसा गवाह जो ठीक ठीक गवाही न दे । अयोग्य साक्षी । विशेष—स्मृतियों में लिखा हैं कि साक्षी सत्यवादी, कर्तव्यपरायण, और निर्लोभ हो । यदि साक्षी ऐसा हो जिसने कभी झूठी गवाही दी हो, जो व्याधिग्रस्त हो, जिसने महापात्तक किए हों अथवा जिसका दो पक्षों में किसी पक्ष के साथ आर्थिक संबंध, शत्रुता या मित्रता हो वह दुष्ट साक्षी है । उसका साक्ष्य ग्रहण न करना चाहिए ।

दुष्टा (१)
वि० स्त्री० [सं०] खोटी । बुरे स्वभाव की ।

दुष्टा (२)
१. बुरे स्वभाव की स्त्री । दुश्चरित्र स्त्री । दोषयुक्त । २. वारनारी । वेश्या [को०] ।

दुष्टाचार (१)
संज्ञा पुं० [सं०] कुचाल । कुकर्म । खोटा काम ।

दुष्टाचार (२)
वि० दुराचारी । बुरा काम करनेवाला ।

दुष्टाचारी
वि० [सं० दुष्टाचारिन्] [वि० स्त्री० दुष्टाचारिणी] कुकर्मी । जिसके आचरण अच्छे न हों । खोटा काम करनेवाला ।

दुष्टात्मा
वि० [सं० दुष्टात्मन्] जिसका अंतःकरण बुरा हो । दुराशय । खोटी प्रकृति का । दुरात्मा ।

दुष्टान्न
संज्ञा पुं० [सं०] १. बिगड़ा हुआ अन्न । बासी या सड़ा अन्न । २. कुत्सित अन्न । ३. वह अन्न जो पाप की कमाई हो । ४. नीच का अन्न ।

दुष्टाशय
वि० [सं०] दे० 'दुष्टात्मा' [को०] ।

दुष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दोष । विकार । ऐब ।

दुष्पच
वि० [सं०] १. जो कठिनता से पके । २. जो जल्दी न पचे ।

दुष्पत्र
संज्ञा पुं० [सं०] चोर नामक गंधद्रव्य ।

दुष्पद
वि० [सं०] दुष्प्राप्य ।

दुष्पराजय (१)
वि० [सं०] जिसका जीतना कठिन हो ।

दुष्पराजय (२)
संज्ञा पुं० धृतराष्ट्र का एक पुत्र ।

दुष्परिग्रह
संज्ञा पुं० [सं०] जो जल्दी पकड़ में न आ सके । जिसे वश में लाना कठिन हो ।

दुष्पर्श
वि० [सं०] १. जिसे स्पर्श करना कठिन हो । जिसे छूते न बने । २. जो जल्दी हाथ न लगे । दुष्प्राप्य ।

दुष्पर्शी
संज्ञा स्त्री० [सं०] जवासा ।

दुष्पार
वि० [सं०] १. जिसे जल्दी पार न कर सके । २. दुःसाध्य । कठिन ।

दुष्पूर
वि० [सं०] १. जिसका भरना कठिन हो । जो दल्दी न पूरा हो सके । कठिनता से पूर्ण होनेवाला । २. अनिवार्य ।

दुष्प्रकृति (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] बुरी प्रकृति । खोटा स्वभाव ।

दुष्प्रकृति (२)
वि० बुरे स्वभाव का । दुःशील ।

दुष्प्रधर्ष (१)
वि० [सं०] जो जल्दी धर पकड़ में न आ सके ।

दुष्प्रधर्ष (२)
संज्ञा पुं० धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

दुष्प्रधर्षण
वि० संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दुष्प्रधर्ष' [को०] ।

दुष्प्रधर्षणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दुष्प्रधर्षिणी' [को०] ।

दुष्प्रधर्षा
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. जवासा । हिंगुवा । २. खजूर ।

दुप्रधर्षिणी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. कंटकारी । भटकटैया । २. बैगन । भंटा ।

दुष्प्रवृत्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. बुरी प्रवृत्ति । २. बुरी खबर । अशुभ समाचार (को०) ।

दुष्प्रवेशा
संज्ञा स्त्री० [पुं०] कंथारी वृक्ष ।

दुष्प्राप, दुष्प्रापण
वि० [सं०] दे० 'दुष्प्राप्य' ।

दुष्प्राप्य
वि० [सं०] जो सहज में न मिल सके । जिसका मिलना कठिन हो ।

दुष्प्रेक्ष
वि० [सं०] दे० 'दुष्प्रेक्षय' ।

दुष्प्रेक्ष्य
वि० [सं०] १. जिसे देखना कठिन हो । २. दुर्दर्शन । भीषण ।

दुष्मंत
संज्ञा पुं० [सं० दुष्मन्त] दे० 'दुष्यंत' ।

दुष्यंत
संज्ञा पुं० [ सं० दुष्यन्त] पुरुवंशी एक राजा जो ऐति नामक राजा के पुत्र थे । विशेष—महाभारत में इनकी कथा इस प्रकार लिखी है— एक दिन राजा दुष्यंत शिकार खेलते खेलते थककर कण्व मुनि के आश्रम के पास जा निकले । उस समय कण्व मुनि की पाली हुई लड़की शकुंतला वहां थी । उसने राजा का उचित सत्कार किया । राज उसके रूप पर मुग्घ हो गए । पूछने पर राजा को मालूम हुआ कि शकुंतला एक अप्सरा के गर्भ से उत्पन्न विश्वामित्र ऋषि की कन्या है । जब राजा ने विवाह का प्रस्ताव किया तब शकुंतला ने कहा 'यदि गांधर्व विवाह में कुछ दोष न हौ और आप मेरे ही पुत्र को युवराज बनाएँ तो मैं सम्मत हूँ' । राजा विवाह करके शकुंतला को कण्व ऋषि के आश्रम पर छोड़ अपनी राजधानी में चले गए । कुछ दिन बीतने पर शकुंतला को एक पुत्र हुआ जिसका नाम आश्रम के ऋषियों ने सर्वदमन रखा । कण्व ऋषि ने शकुंतला को पुत्र के साथ राजा के पास भेजा । शकुंतला ने राजा के पास जाकर कहा 'हे राजन ! यह आपका पुत्र मेरे गर्भ से उत्पन्न हुआ है और आपका औरस पुत्र है, इसे युवराज बनाइए' । राजा को सब बातें यद तो थीं पर लोक- निंदा के भय से उन्होंने उन्हें छिपाने की चेष्टा की और शकुंतला का तिरस्कार करते हुए कहा—'हे डुष्ट ! तपस्वनी ! तू किसकी पत्नी है ? मैंने तुझसे कोई संबंध कभी नहीं किया, चल दूर हो' । शकुंतला ने भई लज्जा छोड़कर जो जो जी में आया खूब कहा । इसपर देववाणी हुई 'हे राजन् ! यह पुत्र आपही का है, ईसे ग्रहण कीजिए । हम लोगों के कहने से आप इसका भरण करें और इस कारण इसका भरत नाम रखे' । देववाणी सुनकर राजा ने शकुंतला का ग्रहण किया । आगे चलकर भरत बड़ा प्रतापी राजा हुआ । इसी कथा को लेकर कालिदास ने 'अभिज्ञान शकुंतल' नाटक लिखा है । पर कवि ने कौशल से राजा दुष्यंत को दुष्ट नायक होने से बचाने के लिये दुर्वासा के शाप की कल्पना की है और यह दिखाया है कि उसी शाप के प्रभाव से राजा सब बातें भूल गए थे । दूसरी बात कवि ने यह की है कि जिस निर्लज्जता और धृष्टता के साथ शकुंतला का बिगड़ना महाभारत में लिखा है उसको वे बचा गए हैं ।

दुष्योदर
संज्ञा पुं० [सं०] एक उदर रोग जो आदि पशुओं के नख और रोएँ अथवा मल, मूत्र, आर्तवमिश्रित अन्न या एक साथ मिला हुआ घी और मधु खाने तथा गंदा पानी पीने से होता है । विशेष—इसमें त्रिदोष के कारण रोगी दिन दिन दुबला और पीला हो जाता है । उसके शरीर में जलन होती है और कभी कभी उसे मूर्छा भी आती है । जब बदली होता है और दिन खराब रहता है तब यह रोग प्रायः उभरता है ।

दुष्ष पु
संज्ञा पुं० [ सं० दुःख] दे० 'दुःख' । उ०—धावो धावो वीर हो, ईहामृग लियै जाय । भगे सबै जन जान लै, महा दुष्ष तन पाय ।—प० रासो, पृ० १२५ ।

दुष्षमुष्षी
वि० [सं० दुःखमुखी] दुःखयुत्क मुखवाली । दुखिनी । उ०—उहाँ सीय दिष्षी, हती दुष्षमुष्षी । दियं मुद्रि ताम, सहिन्नान राम ।—पृ० रा०, २ । २७ ।

दुसंग
संज्ञा पुं० [सं० दुःसङ्ग] कुसंग । बुरा साथ । दुर्जन का साथ । उ०—ता उपरांत जो कोऊ बिनु विचारे गृह छोरे तो दुसंग करि निश्चय करि भ्रष्ट होई ।—दो सौ बावन०, भा० २, पृ० ३२ ।

दुसंत पु
संज्ञा पुं० [सं० दुष्यन्त] दे० ' दुष्यत' । उ०—जैसे दुसं— तहि साकुतला । मधवानलहि कामकंदला ।—जायसी (शब्द०) ।

दुसतर पु
वि० [सं० दुस्तर] दे० 'दुस्तर' । उ०—सरिता कौ पति सिंधु सोउ दुस्तर रह्मो भोई ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० ३०७ ।

दुसरा पु †
वि० [हिं० दूसरा ] [वि० स्त्री० दुसरी] दे० 'दूसरा' । उ०—(क) तब तो यह लरिका दुसरे दिन फेरि गुसाइँ जी के दरसन को आयो ।—दो सो बावन०, भाग १, पृ० ३२८ । (ख) तापर कोमल कनक भूति मनिमय मोहति मन । दिखियत सब प्रतिबिंब मनों घर महँ दुसरो बन ।— नंद० ग्रं०, पृ० ६ । (ग) गोबरधन की मूरति दुसरी । श्री गोबिंदचंद हित कुसरी ।—नंद० ग्रं०, पृ० ३०६ ।

दुसराना पु०
क्रि० स० [हिं० दो या दूसरा] दुहराना । उ०— (क) वह कारज अविचारित कीजे । ताहि न फिर दुसराइ सुनीजे ।—पद्माकर (शब्द०) । (ख) मम भाल मैं हाल लिख्यो विधि यों, कोऊ या ब्रज बोलत सांकै नहीं । नटनागर हा अब कैसी करी, दुसराय कै द्वार पै झांकै नहीं ।—नट०, पृ० ८१ ।

दुसरिहा पु †
वि० [हिं० दूसर + हा (प्रत्य०)] १. साथ रहनेवाला दूसरा आदमी । साथी । संगी । उ०—कह्मो कि मृत्युलोक के माही । तुम्हरा कोई दुसरिहा नाहीं ।—विश्राम (शब्द०) । २. प्रतिद्वंद्वी ।

दुसह
वि० [सं० दुःसह] जो सहा न जाय । असह्म । कठिन । उ०—जनि रिसि रौक दुसह दुःख सहहू ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुसही †
वि० [हिं० दुःसह + ई (प्रत्य०)] १. जो कठिनता से सह सके । २. डाही । ईर्षालु । जैसे, असही दुसही । उ०— असही दुसही मरहु मनहि मन बैरिन बढ़हु विषाद । नृप- सुत चारि चारु चिरजीवहु शंकर गोरि प्रसाद ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुसाखा
संज्ञा पुं० [हिं० दो+ शाखा] एक प्रकार का शमादान जिसमें दो कनखे निकले होते हैं । उ०—झाड़, दुसाखे, झाम, बसूला, बरम हथौरा ।—सूदन (शब्द०) । २. डंडे के आकार की एक छोटी लकड़ी जिसमें छोर पर दो कनखे फूटे होते हैं । इसमें साफी (छानने का कपड़ा) बाँधकर लोग भाँग छानते हैं ।

दुसाध (१)
संज्ञा पुं० [सं० दोषाद या दुःसाध्य] हिदुओं में एक नीच जाति जो सूअर पालती है ।

दुसाध (२)
वि० नीच । अधम । दुष्ट । पाजी । (गाली) ।

दुसार (१)
संज्ञा पुं० [हिं० दो +साल] अरपार छेद । वह छेद जो एक ओर से दूसरी ओर तक हो । उ०—(क) लागत कुटिल कटाछ सर क्यों न होय बेहाल । लगत जु हिये दुसार करि तऊ रहत नटसाल ।—बिहारी (शब्द०) । (ख) रहि न सक्यौ कसु करि रह्मौ बस कर लीनी मार । भेदि दुसार कियौ हियौ तनदुति भेदै सार ।—बिहारी र०, दो० ४४३ । (ग) लागी लागी क्या करै लागत रही लगार । लागी तब ही जानिए निकसी जाय दुसार ।—कबीर (शब्द०) । क्रि० प्र०—करना ।

दुसार (२)
क्रि० वि० आरपार । वारपार । एक पार से दूसरे पार तक ।

दुसाल (१)
संज्ञा पुं० [हिं० दो +शल] आरपार छेद । उ०—हाल ते हवाल एक्क धावते घरन्नि निट्ठि । लाल नैन ज्वाल झाल सी झरी दुसाल दिट्ठि ।—सूदन (शब्द०) ।

दुसाल † (२)
संज्ञा पुं० [ देश०] दो प्रकार का स्वभाव या आचरण । दो बात । उ०—अणभजिया भजिया तणी, दीखै प्रतष दुसाल । त्रिसटा तो वायस भखै, मोती भखै मराल ।—रघु० रू०, पृ० ४१ ।

दुसाला पु †
संज्ञा पुं० [हिं० दुशाला] दे० ' दुशाला' ।

दुसास पु
संज्ञा पुं० [सं० दुस् (= दुर्) + आशा] उच्च आकांक्षा । उँची आशा । दुर्लभ आकंक्षा । उ०—साँवरे पियहिं सुमिरि बर बाला । भरइ उसास दुसास बिहाला ।— नंद० ग्रं०, पृ० १३४ ।

दुसासन पु
संज्ञा पुं० [सं० दुःशासन] दे० 'दुःशासन' ।

दुसाहा
संज्ञा पुं० [देश०] दो फसली खेत । वह खेत जिसमें दो फसले हों ।

दुसील
संज्ञा पुं० [सं० दुःशील] दे० 'दुःशील' । उ०—हिरणी हनत उर डर भयौ भय करि, सीलभाव उपज्यौ दुसीलभाव बीत्यौ हैं ।—सुंदर० ग्रं०, भाग १, पृ० ९० । यौ०—दुसीलभाव = दुःशीलता ।

दुसुमन †
संज्ञा पुं० [फा़० दुश्मन] दे० 'दूश्मन' । उ०—सुमन गई ही लै न आई हौ सु मन खोय दुसुमन मेरी ता पैं बोले हैं चवाई री ।—दीन० ग्रं०, ११ ।

दुसूती
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो+ सूत] एक प्रकार की मोटी चादर जिसमें दो तागों का ताना और बाना होता है । यह पंजाब से आती है और दो या चार तहों की होती है ।

दुसेजा
संज्ञा पुं० [हिं० दो + सेज] बड़ी खाट । पलँग । उ०— बहुत पलंग मचान दुसेजा तखत सरौटी । खरसल स्यंदन बहल बहुत गाड़ी सुनवौटी ।—सूदन (शब्द०) ।

दुसौ पु †
वि० [सं० दुःसह] दे० 'दुःसह' । उ०—लाजपाज सब तोरि के, अब खेलौंगी फाग । छैल छबीले सों, दुसौ, प्रगट करौं अनुराग ।—ब्रज० ग्रं०, पृ० २३ ।

दुस्तर
वि० [सं०] १. जिसे पार करना कठिन हो । २. दुर्घट । विकट । कठिन ।

दुस्तार
वि० [सं० दुस्तार] दे० 'दुस्तर' । उ०—तुम भवसागर दुस्तार ।—अपरा, पृ० ७१ ।

दुस्त्यज
वि० [सं० दुस्त्याज्य] जो कठिनाई से छोड़ा जा सके । जिसका त्यागना कठिन हो । उ०—देव गुरू गिरा गौरव सुदुस्त्यज राज्य त्यक्त श्री सकल सौमित्रि भ्राता ।— तुलसी (शब्द०) ।

दुस्थ
वि० [सं०] १. दुःख में पड़ा हुआ । दुःखी । गरीब । २. पीड़ायुक्त । उद्विग्न । ३. जो उच्छा न हो । जो ठीक न हो । ४. मूर्ख । दुष्ट । ५. लुब्ध । मुग्ध [को०] ।

दुस्थित
वि० [सं०] दे० 'दुस्थ' ।

दुस्पर्श
वि० [सं०] दे० 'दुष्पर्श' [को०] ।

दुस्पर्शा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दुःस्पर्शा' [को०] ।

दुस्पृष्ट
संज्ञा पुं० [सं०] १. हलका स्पर्श । हलकी छुअन । २. जिह्वा का तालु से वह हलका स्पर्श जिससे अंतस्थ वर्ण (य् र् ल् व्) का उच्चारण होता है [को०] ।

दुस्फाट
संज्ञा पुं० [सं० दुस्फाट] एक प्रकार का शस्त्र [को०] ।

दुस्मर
वि० [सं०] जो कठिनाई से याद आए । जिसे स्मरण रखना कठिन हो [को०] ।

दुस्सह
वि० [सं०] दे० 'दुःसह' ।

दुस्साध्य
वि० [सं०] दे० 'दुःसाध्य' ।

दुहकर पु †
वि० [सं० दुष्कर] दे० 'दुष्कर' ।

दुहता
संज्ञा पुं० [सं० दौहित्र] [स्त्री० दुहती] बेटी का बेटा । नाती । उ०—नूरजहाँ के साथ हौदे पर उसकी दुहती भी थी ।—शिवप्रसाद (शब्द०) ।

दुहत्थ पु
संज्ञा [सं० द्वि, प्रा० दु + सं० हस्त] दो पंक्तियों का छंद । दे० 'दोहा' । उ०—छंद प्रबंध कवित जति साटक गाह दुहस्थ । लघु गुरु मंडित खंडियहि पिंगल अमर भरथ्थ ।— पृ० रा०, १ ।८१ ।

दुहत्था
वि० [हिं० दो + हाथ] [वि० स्त्री० दुहत्थी] १. दोनों हाथों से किया हुआ । जैसे, दुहत्थी मार । २. जिसमें दो मृठें या दस्ते हों ।

दुहत्थाशासन
संज्ञा पुं० [हिं० दुहत्था + सं० शासन] दे० 'द्विदल शासन प्रणाली' ।

दुहत्थी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दो + हाथ] मालखंम की एक कसरत जिसमें खिलाड़ी मालखंभ को दोनों हाथों से कुहनी तक लपेटना है ओर फिर जिधर का हाथ ऊपर होता है उधर की टाँग को उड़ाकर मालखंभ पर सवारी बाँधता है और अपना हाथ पेट के नीचे से निकाल लेता है ।

दुहना
क्रि० स० [सं० दोहन] १. स्तन से दूध निचोड़कर निकालना । दूध निकालना । उ०—(क) तिल सी तो गाय है, छौना नौ नौ हाथ । मटकी भर भर दुहिए, पूँछ अठारह हाथ ।—कबीर (शब्द०) । (ख) राजनीति मुनि बहुत पढ़ाई गुरुसेवा करवाये । सुरभी दुहत दोहनी माँगी बाँह पसारि देवाये ।—सूर (शब्द०) । विशेष—'दूध' और 'दूधवाला पशु' दोनों इसके कर्म हो सकते हैं । जैसे, दूध दुहना, गाय दुहना । २. निचोड़ना । तत्व निकालना । सार निकालना । सार खींचना । उ०—(क) पाछे पृथु को रूप हरि लीन्हें नाना रस दुहि काढ़े । तापर रचना रची विधाता बहु विधि पललन बाढ़े ।— सूर (शब्द०) । (ख) दीप दीप के दीप की दिपति दुहिन दुहि लीन । सब ससि दामिनी भा मिले वा भामिनि को कीन ।—शृं० सत० (शब्द०) । मुहा०—दुह लेना = (१) निःसार कर देना । सार खींच लेना । (२) धन हर लेना । जहाँ तक हो किसी से लाभ उठाना । लूटना । उ०—बेचहि बेद धरम दुहिं लेहीं । पिसुन पराय पाप कहि देहीं ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुहनी
संज्ञा स्त्री० [सं० दोहनी] बरतन जिसमें दूध दुहा जाता है । दोहनी ।

दुहरना
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'दोहरना' ।

दुहरा
वि० [हिं०] दे० 'दोहरा' ।

दुहराना (१)
क्रि० स० [हिं०] दे० 'दोहराना' ।

दुहराना (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दोहराने का काम । दोहराने की क्रिया या भाव ।

दुहराहट
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुहरा + हट (प्रत्य०)] पुनरावर्तन । दुहरने का भाव या क्रिया । उ०—गान ? जिसपर हों पड़े दुहराहटों के दाग ? गान जिसकी ललक से बुझ जाँय अमर चिराग ।—हिम कि०, पृ० १३८ ।

दुहाँमना
क्रि० स० [हिं० दुहाना] दे० 'दुहाना' । उ०—खिरक दुहाँमन जाति मोहि, कब आंन मिलैगो धाई ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० २३३ ।

दुहाई (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० द्वि० (=दो) + आह्वय (=पुकारना)] १. घोषणा । पुकार । उच्च स्वर से किसी बात की सूचना जो चारों ओर दी जाय । मुनादी । मुहा०—किसी की दुहाई फिरना = (१) राजा के सिंहासन पर बैठने पर उसके नाम की घोषणा होना । राजा के नाम की सूचना डंके आदि के द्वारा फिरना । उ०—बैठे राम राजसिंहा- सन जग में फिरी दुहाई । निर्भय राज राम को कहियत सुर नर मुनि सुखदाई ।—सूर (शब्द०) । (२) प्रताप का डंका पिटना । प्रभुत्व की डौंडी फिरना । विजय घोषणा होना । जयजयकार । उ०—(क) बिंध, उदयगिरि, धौलागिरी । काँपी सृष्टि दुहाई फिरी ।—जायसी (शब्द०) । (ख) नगर फिरी रघुबीर दुहाई । तब प्रभु सीतहि बोल पठाई ।—तुलसी (शब्द०) । २. सहायता के लिये पुकार । बचाव या रक्षा के लिये किसी का नाम लेकर चिल्लाने की क्रिया । सताए जाने पर किसी ऐसे प्रतापी या बड़े का नाम लेकर पुकारना जो बचा सके । उ०— तब सतगुरू कहे समुझाई । कांहे को तुम देत दुहाई ।—कबीर सा०, पृ० ५५७ । मुहा०—दुहाई देना = (संकट या आपत्ति आने पर) रक्षा के लिये पुकारना । अपने बचाव के लिये किसी का नाम लेकर पुकारना । उ०—(क) हम बचानेवाले कौन हैं, राजा दुष्यंत की दुहाई दे वही बचाएगा क्योंकि तपोवनों की रक्षा राजा के सिर है ।—लक्ष्मणसिंह (शब्द०) । (ख) किसी ने आकर दुहाई दी कि मेरी गाय चोर लिए जाता हैं ।—शिवप्रसाद (शब्द०) । ३. शपथ । कसम । सौगंद । जैसे, रामदुहाई । उ०—(क) मन माला तन सुमिरनी हरि जी तिलक दियाय । दुहाई राजा राम की दूजा दूर कियाय ।—कबीर (शब्द०) । (ख) अब मन मगन हो रामदुहाई । मन, वच, क्रम हरि नाम हृदय धरि जो गुरुवेद बताई ।—सूर (शब्द०) । (ग) नाथ सपथ पितु चरन दुहाई । भयउ न भुवन भरत सम भाई ।—तुलसी (शब्द०) । क्रि० प्र०—खाना । उ०—आजु ते न जैहौ दधि बेचन, दुहाई खाऊँ मैया की, कन्हैया उत ठाढ़ोई रहत है ।

दुहाई (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुहना] १. गाय, भैंस आदि् को दुहने का काम । २. दुहने की मजदूरी ।

दुहाग
संज्ञा पुं० [सं० दुर्भाग्य, प्रा० दुब्भाग दुहाग] १. दुर्भाग्य । २. सोहाग का उलटा । वैधव्य । रँड़ापा ।

दुहागिन †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुहागी] विधवा । सुहागिन का उलटा । उ०—(क) हँसि हँसि के तन पाइया जिन पाया तिनरोय । हाँसी खेजत हरि तो नहीं दुहागिन होय ।—कबीर (शब्द०) । (ख) सेज बिछावै सुंदरी अंतर परदा होय । तन सौंपे मत दे नहीं सदा दुहागिन सोय ।—कबीर (शब्द०) ।

दुहागिल †
वि० [हिं० दुहाग + इल (प्रत्य०)] १. अभागा । अनाथ । बिना मालिक का । २. सूना । खाली । उ०— तजि के दिगीसन दुहाग्लि कै दीनों दिसि मैले ह्वै बदन सहैं सोक की रगर को ।—गुमान (शब्द०) ।

दुहागी †
वि० [सं० दुर्भागिन्] [वि० स्त्री० दुहागिन] दुर्भागी । अभागा । बदकिस्मत । उ०—सब जग दोखौ एकला सेवक स्वामी दोइ । जगत दुहागी राम बिनु साधु सुहागी सोइ ।— दादू (शब्द०) ।

दुहाजू (१)
वि० पुं० [सं० द्विभार्य] जो पहली स्त्री के मर जाने पर दूसरा विवाह करे ।

दुहाजू (२)
वि० स्त्री० जो स्त्री पहले पति के मर जाने पर दूसरा विवाह करे ।

दुहाना
क्रि० स० [ हिं० दुहना का प्रे० रूप] दुहने का काम दूसरे से कराना । दूध निकलवाना । जैसे, दूध दुहाना, गाय दुहाना । उ०—दूध वही जु दुहायो री वाही दही सु सही जो वही ढरकायो ।—रसखानि (शब्द०) ।

दुहाव
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुहाना] १. एक प्रथा जिसके अनुसार प्रति वर्ष जन्माष्टमी आदि त्यौंहारों को किसानों की गाय भैस का दूध दुहाकर जमींदार ले लेता है । २. वह दूध जो इस प्रथा के अनुसार किसान जमींदार को देता हैं ।

दुहावना
क्रि० स० [सं० दोहन] दे० 'दुहाना' । उ०—मनभावती दैहौं दुहावनी पै यह गाय तुही पै दुहावनी है ।—ग्वाल (शब्द०) ।

दुहावनो
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुहाना] १. वह धन जो ग्वाले को गाय दुहने के लिये दिया जाता है । दूध दुहने की मजदूरी । उ०—(क) अरु औरन के घर ते हम सों तुम दूनी दुहावनी लैबो करो ।—पदमाकर (शब्द०) । (ख) मन- भावनी दैहों दुहावनों पै यह गाय तुहीं पै दुहावनी है ।— ग्वाल (शब्द०) ।

दुहिता
संज्ञा स्त्री० [सं० दुहितृ] कन्या । लड़की ।

दुहितृपति
संज्ञा पुं० [सं०] जामाता । दामाद ।

दुहिन पु
संज्ञा पुं० [सं० द्रुहिण] ब्रह्मा । उ०—करहिं सुमंगल गान सुघर सहनाइन्ह । जेइँ चले हरि दुहिन सहित सुर भाइन्ह ।—तुलसी (शब्द०) ।

दुहुँधा
वि० [प्रा० हिं०] दोनों ओर । दोनों तरफ । उ०— प्रेमपगी तृतियाँ बहुँघा की दुहुँ कौ लगी अतिही चितचाहीं ।—रसखान०, पृ० २५ ।

दुहुवनि पु
वि० [हिं०] दोनों ।—शिव शक्ती वर्तत अंत दुहवनि को नाहीं ।—सुंदर ग्रं०, भाग १, पृ० ५८ ।

दुहूँ
वि० [दो + हूँ (प्रत्य०)] दोनों ही । उ०—(क) दुहूँ भाँति असमंजसे बाण चलै सुख पाय ।—केशव (शब्द०) । (ख) वग्गा खड़ग्गे दुहूँ वग्गे, काल रगे वारय ।—रा० रू०, पृ० ४९ ।

दुहुँन पु
वि० [हिं०] दे० 'दुहूँ' । उ०—कबहुंक वे उनके वे उनके हौं दुहूँन के इक सारी ।—पोद्दार अभि० ग्रं०, पृ० १९१ ।

दुहेनू †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुहना] दूध देनेवाली गाय ।

दुहेल †
संज्ञा पुं० [सं० दुर्हेला] दुःख । विपत्ति । मुसीबत । उ०— पदमावति जगरूपमनि कह लगि कहौं दुहेल । तेहि समुद महँ खोएउँ हौं का जिऔं अकेल ।—जायसी (शब्द०) ।

दुहेला (१)
वि० [दुहेला (= कठिन खेल)] [वि० स्त्री० दुहेली] १. दुःखदायी । दुःसाध्य । कठिन । उ०—(क) भक्ति दुहेली राम की नहिं कायर को काम । निस्प्रेही निरधार को आठ पहर संग्राम ।—कबीर (शब्द०) (ख) दादू मारग साधु का खरा दुहेला जान । जीवित मिरतक होइ चलइ रामनाम नीसान ।—कबीर (शब्द०) । (ग) रामची भगती दुहेली रे बापा । सकल निस्तार चोनह ले आपा ।— दक्खिनी०, पृ० ३५ । २. दुःखी । दुखिया । दीन । उ०— (क) पद्मावति निज कंत दुहेली । बिनु जल कमल सूख जनु बेली ।—जायसी (शब्द०) । (ख) भई दुहेली टेक बिहूनी । थाँभ नाईँ उठि सकै न थूनी ।—जायसी (शब्द०) ।

दुहेला (२)
संज्ञा पुं० विकट । दुःखदायक कार्य । उ०—(क) अबहि बारि तैं प्रेम न खेला । का जानसि कस होय दुहेला ।— जायसी (शब्द०) । (ख) पहिल प्रेम है कठिन दुहेला । दोउ जग तरा प्रेम जेइ खेला ।—जायसी (शब्द०) ।

दुहैं †
वि० [हिं०] दोनों उ०—ह्नस्व दीरघ दुहै नेम बिण खीजै ।—रघु० रू०, पृ० ५० ।

दुहोतरा (१)
संज्ञा पुं० [सं० दौहित्र] [स्त्री० दुहोतरी] लड़की का लड़का । कन्या का पुत्र । नाती ।

दुहोतरा पु (२)
वि० [सं० द्वि, हिं० दो, दु + उत्तर] दो अधिक । दो उपर । उ०— ठारै सौ रु दुहोतरा अगहन मास सुजान । बैठि सजल गढ़ नौहि कै किय आखेट विधान ।—सूदन (शब्द०) ।

दुह्म
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दुह्मा] दुहने योग्य ।

दुह्मु
संज्ञा पुं० [सं०] शर्मिष्ठा के गर्भ से उत्पन्न ययाति राजा के एक पुत्र का नाम । विशेष—राजा ययाति जब दिग्विजय कर चुके तब उन्होंने भूमि को अपने पुत्रों बाँटा था । इस बाँट के अनुसार दुह्म को पश्चिम दिशा के देश मिले थे । राजा ययाति ने जब इन्हें अपना बुढ़ापा देकर इनसे जवानी मांगी थी तब इन्होंने अस्वीकार कर दिया था । इसपर ययाति ने शाप दिया था कि तुम्हारी कोइ प्रिय अभिलाषा पूर्ण न होगी । दे० 'द्रुह्म' ।

दूँगड़ा †
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'दौंगरा' ।

दूँगरा †
संज्ञा पुं० [देश०] दे० 'दौंगरा' ।

दूँद †
संज्ञा पुं० [सं० द्वन्द्व] १. ऊधम । उपद्रव । क्रि० प्र०—मचाना । २. दे० 'द्वंद्व' ।

दूँदना †
क्रि० अ० [हिं० दूँद] १. उपद्रव करना । उधम मचाना । २. धोर शब्द करना ।

दूँदि पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूँद] दे० 'दूँद' ।

दू
वि० [सं० द्वि] दे० 'दो' । उ०—उलग कहइ छाइ एकल । दू जण सरिस कहइ घर बास ।—बी० रासो, पृ० ५२ । यौ०—दूजण = दो जन । पति पत्नी ।

दूआ (१)
संज्ञा पुं० [देश०] एक गहना जो कलाई पर और सब गहनों के पीछे की ओर पहना जाता है । पछेली ।

दूआ (२)
संज्ञा पुं० [हिं० दो + आ (प्रत्य०)] १. ताश या गंजीफे में वह पत्ता जिसपर दो बूटियाँ या टिप्पियाँ हों । दुक्की । २. सोरही के खेल में, दो कौड़ियों का चित (और बाकी चौदह कौड़ियों का पट) पड़ना (जुआरी) । जैसे, जिसका दूआ, उसका जुआ (कहावत) । ३. किसी, विशेषतः जुएवाले खेल में, वह दाँव जिसका दो चिह्नों, बूटियों और कौड़ियों आदि से संबंध हो ।

दूआ (३)
संज्ञा स्त्री० [अ० दुआ] दे० 'दुआ' ।

दूइ †
वि० [सं० द्वि] दे० 'दौ' ।

दूइज †
संज्ञा स्त्री० [सं० द्वितीया] किसी पक्ष की दूसरी तिथि । दूध । द्वितीया ।

दूई †
वि० [हिं०] दे० 'दो' । उ०—जाड़ा जाय रूई कि दूई । (लोकोक्ति) ।

दूक पु
वि० [सं० द्वैक] दो एक । कुछ । चंद । उ०—लाभ सनै को पालिबो हानि समय की चूक । सदा विचारहि चारु मति सुदिन कुदिन दिन दूक ।—तुलसी (शब्द०) ।

दूकान
संज्ञा पुं० [फा़० दुकान] दे० 'दुकान' ।

दूकानदार
संज्ञा पुं० [फा़० दूकानदार] दे० 'दुकानदार' ।

दूकानदारी
संज्ञा स्त्री० [फा़० दुकानदारी] दे० 'दुकानदारी' ।

दूख †
संज्ञा पुं० [सं० दुःख] दे० 'दुःख' ।

दूखन
संज्ञा पुं० [सं० दूषण] दे० 'दूषण' ।

दूखना पु † (१)
क्रि० स० [सं० दूष्ण + ना (प्रत्य०)] दोष लगाना । ऐब लगाना ।

दूखना (२)
क्रि० अ० [हिं०] दे० 'दुखना' ।

दूखित (१)
वि० [सं० दूषित] दे० 'दूषित' ।

दूखित (२)
वि० [सं० दुःखित] दे० 'दुःखित' ।

दूगला † (१)
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का बड़ा टोकरा या दोरा ।

दूगला (२)
संज्ञा पुं० [हिं० दो + गला] दे० 'दोगला' ।

दूगुन †
वि० [सं० द्विगुण] दूना । दुगुना ।

दूगू
संज्ञा पुं० [देश०] एक तरह का बकरा जो हिमालय की तराई में होता है ।

दूज
संज्ञा स्त्री० [सं० द्वितीया, प्रा० दुइय, दुइज] किसी पक्ष की दूसरी तिथि । दुइज । द्वितीया । मुहा०—दूज का चाँद होना = बहुत दिनों पर दिखाई पड़ना । कम दिखाई पड़ना । कम दर्शन देना ।

दूजण † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० दू (= दो) + जन] दो प्राणी । पति पत्नी । उ०—उलग कहीय छइ एकलां । दूजण सरिस कहइ घर बास ।—वी० रासो, पृ० ५२ ।

दूजण (२)
संज्ञा पुं० [सं० दुर्ज्जन, प्रा० दुज्जण, दूजण] दे० 'दूर्जन' ।

दूजा
वि० पुं० [सं० द्वितीय, प्रा० दुइय, दुइज] दूसरा । अन्य । द्वितीय ।

दूजी (१)
संज्ञा स्त्री० [देश०] घोड़ों का आभूषण विशेष । उ०—साखत पेसबंद अरु पूजी । हीरन जटित हैकलै दूजो ।—हम्मीर०, पृ० ३ ।

दूजी (२)
वि० स्त्री० [हिं०] दे० 'दूजा' । उ०—(क) बोली मनुर बचन तिय दूजी ।—मानस, २ ।२२१ । (ख) अब जिय चाह करौ जनि दूजी ।—भ्रमहु न जग इच्छा तुव पूजी ।—भारतेंदु ग्रं०, भा० १, पृ० ६०७ ।

दूझ
संज्ञा पुं० [सं० द्वैध या द्विधा] १. दुःख । कष्ट । २. दुबिधा । संदेह । उ०—कबीर सोइ सूरमा, मन से माँड़ै जूझ । पाँचो इंद्री पकरि के, दूरि करे सब दूझ ।—कबीर सा० सं०, पृ० २७ ।

दूझना (१)
क्रि० अ० [सं० द्विधा, प्रा० दुज्झा] दुष्ट चिंतन करना । दुविधा में पड़ना । उ०—बात अवर कछु अवरहि बूझै । अलप ज्ञान गुनि अनमन दूझै ।—नंद० ग्रं०, पृ० १४५ ।

दूझना पु † (२)
क्रि० अ० [सं० दोह्म, प्रा० दुज्झ या हिं० दुहना] दे० 'दूध देना' । उ०—अँसी एकै गाई है दूझे बारह मास । सो सदा हमारे संग है दादू आतम पास ।—दादू०, पृ० १०६ ।

दूडभ, दूडम
वि० [सं०] १. व्यसनप्राप्त । पीड़ायुक्त । पीड़ित । २. जिसे ध्वस्त या दग्ध करना कठिन हो [को०] ।

दूडाश, दूणाश
वि० [सं०] दे० 'दूडभ', 'दूडम' [को०] ।

दूत
संज्ञा पुं० [सं०] [स्त्री० दूती] १. वह मनुष्य जो किसी विशेष कार्य के लिये अथवा कोई समाचार पहुँचाने या लाने के लिये कहीं भेजा जाय । सँदेसा ले जाने या ले आनेवाला मनुष्य । चर । बसीठ । विशेष—प्राचीन काल में राजाओं के यहाँ दूसरे राज्यों में संधि और विग्रह आदि का समाचार पहुँचाने या वहाँ का हालचाल जानने के लिय दूत रखे जाते थे । अनेक ग्रंथों में योग्य दूतों के लक्षण दिए हुए हैं । उनके अनुसार दूत को यथोक्तवादी, देशभाषा का उच्छा जानकार, कार्यकुशल, सहनशील, परिश्रमी, नीतिज्ञ, बुद्धिमान, मंत्रणाकुशल और सर्वगुणसंपन्न होना चाहिए । आजकल एक राष्ट्र के प्रतिनिधि दूसरे राष्ट्र में स्थायी रूप से रहते हैं वे भी दूत या राजदूत ही कहलाते हैं । २. प्रेमी का संदेशा प्रेमिका तक या प्रेमिका का संदेशा प्रेमी तक पहुँचानेवाला मनुष्य ।

दूतक
संज्ञा पुं० [सं०] १. दूत । २. वह कर्मचारी जो राजा की दी हुइ आज्ञा का सर्वसाधरण में प्रचार करता है ।

दूतकत्व
संज्ञा पुं० [सं०] १. दूत का काम । २. दूतक का काम ।

दूतकर्म
संज्ञा पुं० [सं० दूतकर्मन्] सँदेसा या खबर पहुँचाने का काम । दूत का काम । दूतत्व ।

दूतघ्नी
संज्ञा स्त्री० [सं०] गोरखमुंडी । कदंबपुष्पी ।

दूतता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दूतत्व । दूत का काम ।

दूतत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दूत का कम । दूतता ।

दूतपन
संज्ञा पुं० [सं० दूत + हिं० पन (प्रत्य०)] दूत का काम । दूतत्व ।

दूतर पु †
वि० [सं० जुस्तर, प्रा० दुस्तर-दूतर] दे० 'दुस्तर' । उ०— तासौ नंद कहत सब ऊतर । मूरख जन मनमोहित दूतर ।— नंद० ग्रं०, पृ० १४४ ।

दूतावास
संज्ञा पुं० [सं० दूत + आवस] वह स्थान जो किसी दूसरे राज्य या देश में रहनेवाले किसी दूसरे राज्य या देश के राजदूत या वणिज्यदूत के अधिकारांतर्गत हो (अं० एम्बैसी) । राजदूत या वाणिज्य दूत का कार्यालय । राजदूत या वाणिज्य दूत का निवासस्थान । कांस्युलेट । जैसे,—(क) शंघाई में रूसी दूतावास पर स्थानीय पुलिस ने चढ़ाई की और कितने ही आदमियों को गिरिफ्तार किया । (ख) महाराज जार्ज के पधारने पर रोम स्थित ब्रिटिश दूतावास में बड़ा आनंद मनाया गया ।

दूति
संज्ञा स्त्री० [सं० दूती] दे० 'दूतिका' ।

दूतिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दूती ।

दूतिर †
[सं० दुस्तर] जो कठिनाई से पार किया जाय । दुस्तर । उ०—अहुँठ हाथ गल कंथा पाई । चंद सूर दोउ थेगली लाई । अहुंट कोटि दस धागा भरौं । गुरू परसादै दूतिर तिरो ।—गोरख०, पृ० २२० ।

दूती
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रेमी का संदेसा प्रेमिका तक या प्रेमिका का संदेसा प्रेमी तक पहुँचानेवाली स्त्री । स्त्री और पुरुष को मिलानेवाली या एक का संदेसा दूसरे तक पहुँचानेवाली स्त्री । कुटनी । विशेष—साहित्य में दूतियाँ तीन प्रकार की मानी गई हैं—उत्तमा, मध्यमा और अधमा । उत्तमा दूती उसे कतहते हैं जो मीठी मीठी बातें कहकर अच्छी तरह समझाती हो । मध्यमा दूती उसे कहते हैं जो कुछ मधुर और कुछ कटु बातें सुनाकर अपना काम निकालना चाहती हो । केवल कटु बातें कहकर आपना काम निकालनेवाली दूती को अधमा दूती कहते हैं । सखी, नर्तकी, दासी, संन्यासिनी, धोबि, चितेरिन, तँबोलिन, गँधिन आदि स्त्रियाँ दूती के काम के लिये उपयुत्क समझी जाती है । पर्या०—संचारिक । सारिक । दूतिका । कुट्टनी ।

दूत्य
संज्ञा पुं० [सं०] १. दूत का भाव । २. दूत का काम ।

दूद † (१)
संज्ञा पुं० [हिं० दूध] दे० 'दूध' । उ०—ले आए दूद और नान अपने हमराह । कहे मैं खिज्र पैगंबर हूँ वल्लाह ।— दक्खिनी०, पृ० ३१५ ।

दूद (२)
संज्ञा पुं० [फा़०] धुवां । भाप । जैसे, दूद कश ।

दूद पु (३)
संज्ञा पुं० [सं० द्वन्द्व] दे० 'दुंद' । उ०—चात्रक मुख मूँदत नहीं दादुर दूदै देइ । विरहिन हिय खूँदै खरी खूँदै रूँधै लेइ ।—स० सप्तक, पृ० २६५ ।

दूदकश
संज्ञा पुं० [फा़०] १. धुआँ निकलने का मार्ग । वह छिद्र या नल जिससे धुआँ बाहर निकल जाय । धुआँकश । चिमनी । २. एक प्रकार का दमकला जिससे धुआँ देकर पौधों में लगे हुए कीड़े छुड़ाए जाते हैं ।

दूदला
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का पेड़ जिसे डडला कहते हैं ।

दूदुह पु (१)
संज्ञा पुं० [सं० दुण्डुभ] पानी का साँप । डेड़हा । (डिं०) ।

दूदुह पु (२)
संज्ञा पुं० [सं० दुन्दुभ] दे० 'दुंदुभ' ।

दूध
संज्ञा पुं० [सं० दुग्ध, प्रा० दुध्ध] १. सफेद रंग का वह प्रसिद्ध तरल पदार्थ जो स्तनपायी जीवों की मादा के स्तनों में रहता है और जिससे उनके बच्चों का बहुत दिनों तक पोषण होता है । पय । दुग्ध । विशेष—दूध का स्वाद कुछ मीठा होता है और इसमें एक प्रकार की विलक्षण हलकी गंध होती है । भिन्न भिन्न जातियों के प्राणियों के दूध के संयोजक अंश तो समान ही होते हैं, पर उसके भाग में बहुत कुछ अंतर होता है । एक ही जाति के भिन्न भिन्न प्राणियों और कभी कभी एक ही प्राणी में भिन्न भिन्न समयों में भी दूध के भाग में कुछ अंतर होता है । दूध का ४/५ से १/१० तक अंश जल होता है और शेष भाग प्रोटीन, चरबी, शर्करा और नमक आदि का होता है । दूध जब थोड़ी देर तक यों ही छोड़ दिया जाता है तब उसकी चरबी ऊपर आ जाती है और वही पुरिवर्तित होकर मलाई और मक्खन बन जाती है । दूध में जब विशेष प्रकार की और उचित मात्रा में खटाई का अंश मिल जाता है तब वही जमकर दही बन जाता है । कभी कभी ऐसा भी होता है कि दूध में से जल और उसके संयोजक अंश अलग हो जाते हैं । इसे दूध का फटना कहते हैं । (मनुष्य जाति की) स्त्रियों के दूध से बहुत अधिक मिलता जुलता दूध गाय या भैंस का होता है, इसी लिये मनुष्य बहुधा गाय या भैंस का दूध पीते, उसका दही जमाते, मिठाइयों के लिये खोआ या छेना बनाते तथा उसमें से मथकर मक्खन आदि निकालते हैं । कहीं कहीं बकरी और ऊँटनी आदि का दूध भी पीया जाता है । वैद्यक में भिन्न भिन्न प्राणियों के दूध के भिन्न भिन्न गुण बतलाए गए हैं । आजकल पाश्चात्य विद्वानों ने दूध का विश्लेषण करके उसके संयोजक पदार्थों के संबंध में जो कुछ निश्चय किया है उसके अनुसार १०० अंश दूध में ८६.८ अंश पानी, ४.८ अंश चीनी, २.६ अंश मेदा (मक्खन), ४.० अंश केसिन और (अंडे की) सफेदी और ०.७ अंश खनिज पदार्थ (जैसे खड़िया, फास्फरस आदि) होता है । मुहा०—दूध उगलना = बच्चे का दूध पीकर कै कर देना । दूध उछालना = खौलते हुए दूध को ठंढा करने के लिये कड़ाही आदि में उसे बार बार किसी छोटे बरतन में निकालना और उसमें से धार बाँधकर कढ़ाई में दूध गिराना । दूध को ठंढा करने के लिये बार बार उसे धार बाँधकर नीचे गिराना । दूध उतरना = छातियों में दूध भर जाना । दूध और काँजी सा मिलना = विरोध लिए मिलना । उ०—कुछ न फल है दूध काँजी सा मिले । जो मिलें तो दूध जल जैसा मिलें ।— चुभते०, पृ० ६४ । दूध और चीनी सा मिल चलना = दोका मिलकर और उत्तम हो जाना । उ०—नित्य नैमित्तिक व्यवहार में वे दोनों दूध और चीनी की तरह मिल चले थे ।—प्रेमघन०, भा० २, पु० २४४ । दूध और जल सा मिलना = सम भाव से मिलना । अभेद भाव से मिलना । उ०—मिल गए पर चाहिए फटना नहीं । तो परस्पर हों निछावर जो हिलें । कुछ न फल है दूध काँजी सा मिलें । जो मिलें तो दूध जल जैसा मिलें ।—चुभते०, पृ० ६४ । दूध का दूध और पानी का पानी करना = बिलकुल ठीक ठीक न्याय करना । पूरा पूरा न्याय करना । ऐसा न्याय करना जिसमें किसी पक्ष के साथ तनिक भई अन्याय न हो । जैसे,—आपने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया, नहीं तो ये लोग लड़ते लड़ते मर जाते । उ०—हम जातहिं वह उधरि परैगी दूध दूध पानी सो पानी ।—सूर (शब्द०) । दूध का दूध पानी का पानी होना = सच और झूठ का खुल जाना । उ०—मगर खैर, अब तो दूध का दूध और पानी का पानी हो गया ।—सैर कु०, पृ० ४२ । दूध का बच्चा = वह बच्चा जो केवल दूध के ही आधार पर रहता हो । बहुत ही छोटा और केवल दूध पीनेवाला बच्चा । दूध का सा उबाल = शीघ्र शांत होनेवाला क्रोध या मनोवेग आदि । दूध की मक्खी = तुच्छ और तिरस्कृत पदार्थ । दूध की मक्खी की तरह निकालना या निकालकर फेंक देना =किसी मनुष्य को बिलकुल तुच्छ और अनावश्यक समझकर अपने साथ या किसी कार्य आदि से एकदम अलग कर देना । उस तरह अलग कर देना जिस तरह दूध में से मक्खी अलग की जाती है । जैसे,—सब लोगों ने उनको सभा से दूध की मक्खी की तरह निकाल दिया । उ०—मनसा बचन कर्मना अब हम कहत नहीं कछु राखी । सूर काढ़ि डारयो ब्रज तें ज्यों दूध माँझ ते माखी ।—सूर (शब्द०) । मुँह से दूध की बू आना = अभी तक बच्चा और अनुभवहीन होना । विशेष अनुभव और ज्ञान न होना । दूध के दाँत = वे दाँत जो बच्चों को पहले पहल दूध पीने की अवस्था में निकलते हैं और छह सात वर्षो की अवस्था में जिनके गिर जाने पर दूसरे दाँत निकलते हैं । दूध के दाँत न टूटना = अभी तक बच्चा होना । ज्ञान और अनुभव न होना । जैसे,—अभी तक तो उसके दूध के दाँत भी नहीं टूटे हैं, वह क्या मेरे सामने बात करेगा । दूध दुहना = स्तनों को दबाकर दूध की धार निकालना । दूध देना = अपने स्तनों में से दूध छोड़ना । अपनी छातियों में से दूध निकालना । जैसे,—उनकी भैंस ८ सेर दूध देती है । दूध चढ़ना = (१) स्तन से निकलनेवाले दूध की मात्रा का कम होना । जैसे,—इधर कई दिनों से इसकी मा का दूध चढ़ गया है । (२) स्तन से निकलनेवाले दूध की मात्रा बढ़ना । दूध चढ़ाना = दुहते समय गाय का अपने दूध को स्तनों में ऊपर की ओर खींच लेना जिससे दुहनेवाला उसे खींचकर बाहर न निकाल सके । (प्रायः गाय भैंसें आदि अपने बछड़ों के लिये स्तनों में दूध चुरा रखती हैं, इसी को दूध चढ़ाना कहते हैं ।) छठी का दूध याद आना = दे० 'छठी' के मुहा० । दूध छुड़ाना = बच्चे की दूध पीने की आदत छुड़ाना । किसी को दूध छोड़ने में प्रवृत करना । दूध डालना = बच्चों का पीए हुए दूध की कै कर देना । दूध तोड़ना = (१) गाय आदि का दूध देना बंद या कम कर देना । (२) गरम दूध को ठंढा करने के लिये हिलाना या घँघोलना । दूधों नहाओ पूतों फलो = धन और संतान की वृद्धि हो । संपत्ति और संतान खूब बढे़ (आशीर्वाद) । दूध पिलाना = बालक का मुँह स्तन के साथ लगाकर उसे दूध कू धार खींचने देना । दूध पीता बच्चा = गोद का बच्चा । बहुत छोटा बच्चा । दूध पीना = स्तन को मुँह में लगाकर उसमें से दूध की धार खींचना । स्तनपान करना । किसी चीज का दूध पीना = (किसी चीज का) ऐसी दशा में रहना जिसमें उसके नष्ट होने आदि का खटका न रहे । जैसे,—आप घबराइए नहीं, आपके रुपए दूध पीते हैं । दूध फटना = खटाई आदि पड़ने के कारण दूध का जल अलग और सार भाग या छेना अलग हो जाना । दूध बिगड़ना । दूध फाड़ना = किसी क्रिया से दूध का पानी और छेना या सार भाग अलग करना । दूध बढा़ना = दूध छुडाना । बच्चे की दूध पीने की आदत छुडा़ना । उ०— दूध बढ़ाने के पीछे गंगा जी ने दोनों लड़के वालमीक जी को सौंप दिए ।—सीताराम (शब्द०) । (स्तनों में) दूध भर आना = बच्चे की ममता या स्नेह के कारण माता के स्तनों में दूध उतर आना । माता का प्रेम बढ़ना । २. अनाज के हरे बीजों का रस जो पीछे से जमकर सत्त हो जाता है । मुहा०—दूध पड़ना = अनाज में रस पड़ना । अनाज का तैयारी पर आना । ३. दूध की तरह का वह तरल पदार्थ जो अनेक प्रकार के पौधों की पत्तियों और डंठलों में रहता और उनके तोड़ने पर निकलता है । जैसे, मदार का दूध, बरगद का दूध ।

दुधचढो़
वि० स्त्री० [हिं० दूध + चढ़ना] दूध देने में बढी़ हुई । जिसके स्तनों में दूध पूर्व की अपेक्षा बढ़ गया हो । उ०—गैयाँ गनी न जाहिं तरुणि सब बच्छ बढ़ीं । ते चरहिं जमुन के कच्छ दूने दूध चढ़ीं ।—सूर (शब्द०) ।

दुधपिलाई
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूध + पिलाना] १. दूध पिलानेवाली दाई । २. ब्याह की एक रस्म जिसमें बारात के समय बर के घोडा़ या पालकी आदि पर चढ़ने के पूर्व माता वर को दूध पिलाने की सी मुद्रा करती है । ३. वह धन या नेग जो माता को इस क्रिया के बदले में मिलता है ।

दुधपूत
संज्ञा पुं० [हिं० दूध + पूत (= पुत्र)] धन और संतति । उ०—दूधपूत की छाँडी आस । गोधन भरता करे निरास । साँचे हित हरि सों कियो ।—सूर (शब्द०) ।

दुधफेनी (१)
संज्ञा स्त्री० [सं० दुग्धफेनी] एक प्रकार का पौधा जो दवा के काम में आता है ।

दुधफेनी (२)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूध + फेनी] फेनी नाम का पकवान जो मैदे का बना हुआ और सूत के लच्छों के रूप में होता है और जो दूध में पकाकर खाया जाता है ।

दूधबहन
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूध + बहन] ऐसी बालिका जो किसी ऐसी स्त्री का दूध पीकर पनी हो जिसका दूध पीकर और कोई बालिका या बालक भी पला हो । विशेष—जब कोई स्त्री किसी दूसरी स्त्री की बालिका को अपना दूध पिलाकर पालती है तब वह बालिका उस पहली स्त्री के लड़कों या लड़कियों की दूधबहन कहलाती है ।

दूधभाई
संज्ञा पुं० [हिं० दूध + भाई] [स्त्री० दूधवहिन] ऐसे दो बालकों में से एक जो एक ही स्त्री के स्तन का दूध पीकर पले हों पर जिनमें से कोई एक दूसरे माता पिता से उत्पन्न हो । विशेष—जब कोई स्त्री किसी दूसरी स्त्री के बालक को अपना दूध पिलाकर पालती है तब उन दोनों स्त्रियों के बालक परस्पर दूधभाई कहलाते हैं ।

दुधमलाई
स्ज्ञा स्त्री० [हिं० दूध + मलाई] एक प्रकार की बूटीदार मलमल ।

दूधमसहरी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूध + मसहरी] एक प्रकार का रेशमी कपडा़ ।

दूधमुँहा
वि० [हिं० दूध + मुँह] जो अभी तक माता का दूध पीता हो, अथवा जिसके दूध के दाँत अभी न टूटे हों । छोटा बच्चा । बालक ।

दूधमुख
वि० [हिं० दूध + सं० मुख] छोटा बच्चा । बालक । दूधमुँहा । उ०—नाथ करहु बालक पर छोहू । सूध दूधमुख करिय न कोहू ।—तुलसी (शब्द०) ।

दूधराज
संज्ञा पुं० [देश०] १. एक प्रकार की बुलबुल जो भारत, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान में पाई जाती है । भारत में यह स्थिर रूप से रहती है । इसे शाह बुलबुल भी कहते हैं । २. एक प्रकार का साँप जिसका फन बहुत बडा़ होता है ।

दूधवाला
संज्ञा पुं० [हिं० दूध + वाला (प्रत्य०)] [स्त्री० दूध— वाली] दूध बेचनेवाला । ग्वाला ।

दूधसार
संज्ञा पुं० [हिं० दूध + सं० सार] एक प्रकार का केला ।

दूधहंडी
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूध + हंडी] मिट्टी की वह हाँडी़ जिसमें दूध रखकर आग पर पकाते हैं । मेटिया ।

दूधा
संज्ञा पुं० [हिं० दूध] १. एक प्रकार का धान जो अगहन के महीने में तैयार हो जाता है और जिसका चावल वर्षों तक रह सकता है । २. अन्न के कच्चे दानों में का रस जो दूध के रंग का होता है ।

दूधाधारी †
वि० [हिं० दूध + सं० आहारी या आधारी] दुग्धाहारी । दूध मात्र पीकर रहनेवाला ।

दूधाभाती
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूध + भात] विवाह की एक रसम जिसमें वर और कन्या दोनों अपने हाथ से एक दूसरे को दूध और भात खिलाते हैं । यह रसम विवाह से चौथे दिन होती है ।

दूधाहारी
वि० [हिं०] दे० 'दूधाधारी' ।

दूधिया (१)
वि० [हिं० दूध + इया (प्रत्य०)] १. दूध संबंधी । जिसमें दूध मिला हो अथवा जो दूध से बना हो । जैसे, दूधिया भाँग । २. दूध के रंग का । सफेद । श्वेत । ३. कच्चा े होने के कारण जिसके अंदर का दूध अबी तक सूखा न हो । जैसे, दूधिया सिंधाडा़ ।

दूधिया (२)
संज्ञा पुं० १. एक प्रकार का सफेद बढ़िया और चमकीला पत्थर जिसका गिनती रत्नों में होती है । विशेष—कभी कभी इसके रंग में कुछ लाली, भूरापन या हरापन भी रहता है । इसमें रेत का भाग अधिक रहता है और कुछ लोहा भी रहता है । यह कई प्रकार का होता है और इसमें धूपछाँह की सी चमक होती है । अँगूठियों में इसका नग जडा़ जाता है । २. एक प्रकार का सपेद, घटिया मुलायम पत्थर जिसका प्यालियाँ आदि बनती हैं जिन्हें पथरी कहते हैं । ३. एक प्रकार का हलुवा सोहन जो दूध मिलाने के कारण कुछ नरम हो जाता है ।

दूधियाकंजई
संज्ञा पुं० [हिं० दूधिया + कंजई] दे० 'दुधिया कंजई' ।

दूधियाखाकी
संज्ञा पुं० [हिं० दूधिया + खाकी] सफेद राख का सा रंग ।

दूधियापत्थर
संज्ञा पुं० [हिं० दूधिया + पत्थर] दे० 'दूधिया' ।

दूधियाविष
संज्ञा पुं० [हिं० दूधिया + सं० विष] तेलिया विष । मीठा जहर ।

दूधी †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दुद्धी] दे० 'दुद्धी' ।

दून (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूना] १. दूने का भाव । मुहा०—दूने की लेना या हाँकना = बहुत बढ़ चढ़कर बातें करना । अपनी शक्ति के बाहर की या असंभव बातें कहना । डींग मारना । शेखी हाँकना । दून की सूझना = अपनी शक्ति के बाहर की बातें सूझना । बहुत बडी़ या असंभव बात का ध्यान में आना । २. जितना समय लगाकर गाना या बजाना आरंभ किया जाय उसके आधे समय में गाना या बजाना । साधारण से कुछ जल्दी जल्दी गाना ।

दून (२)
वि० [हिं० दूना] दे० 'दूना' ।

दून (३)
संज्ञा पुं० [सं० द्रोणि] दो पाहाड़ों के बीच का मैदान । तराई । घाटी ।

दूनर पु
वि० [सं० द्विनम्र] जो लचककर दोहरा हो गया हो । उ०—दंतनि अधर दाबि दूनर भई सी चापि चौअर पचौअर कै चूनर निचोरे है ।—पद्माकर ग्रं०, पृ० ८२ ।

दूनसिरिस
संज्ञा पुं० [देश०] सफेद सिरिस का पेड़ जो बहुत ऊँचा होता है और जल्दी बढ़ जाता है । विशेष—इसकी छाल हरापन लिए सपेद और हीर की लकडी़ भूरी, चमकदार और मजबूत होती है । तौल इसकी प्रति घनफुट १५ से ३० सेर तक होती है । इसकी लकडी़ से ईख पेरने का कोल्हू, मूसल, पहिए, चाय कै संदूक और खेती के औजार बनाए जाते हैं । इमारत और पुलों के काम में भी यह आती है और इसका कोयला भी बनाया जाता है । इसमें से तेल बहुत निकलता है और इसके फूल बडे़ सुंगधित होते हैं । हिमालय पर्वत पर यह थोडी़ ऊँचाई तक होता है ।

दूना
वि० [सं० द्विगुण] [बि० स्त्री० दूनी] दुगुना । दोचंद । दो बार उतना ही । जैसे,—यह दूनी झंझट का काम है । उ०—अस कस कहहु मानि मन ऊना । सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना ।—मानस, २ ।२१ । मुहा०—दिल दूना होना = मन में खूब उत्साह और उमंग होना । दिन दूना रात चौगुना होना = दे० 'दिन' के मुहा० ।

दूनिया पु †
संज्ञा स्त्री० [अ० दुनिया] दे० 'दुनियाँ' । उ०— दुनिया दुश्मती सुमती ते बीछुडी, धंध धोखा किया कुमति बानी ।—कबीर रे०, पृ० ८ ।

दूनौं
वि० [प्रा० दोण्णि, दोन्नि] दोनों । उ०—बिप्र साप ते दूनौं भाई । तामस असुर देह तिन्ह पाई ।—मानस, १ ।१२२ ।

दूनौ पु (१)
वि० [प्रा० दोणि्ण] दे० 'दोनों' ।

दूनौ (२)
वि० दे० 'दूना' । उ०—जु कुछ जन्म उत्सव में कीनौ । ब्रजपति तातें दूनौ दीनौ ।—नंद० ग्रं०, पृ० २८४ ।

दूप पु
वि० [सं० दूप्र] पुष्ट । बलवान । उ०—उपज्यौ अनल अनूपम रूपं । नहिं आकृत्ति अवर नर दूपं ।—पृ० रा०, १ । २५७ । (ख) सुअ चंद्रगुप्त सम चंद रूप । प्रतारसिंह आरेन दूप ।—पृ० रा०, १ ।२८७ ।

दूप्र
वि० [सं०] शक्तिमान् । बलवान् [को०] ।

दूब
संज्ञा स्त्री० [सं० दूर्वा] एक प्रकार की प्रसिद्ध घास जो पश्चिमी पंजाव के थोडे़ से बलुए भाग को छोडकर समस्त भारत में और पाहाड़ों पर आठ हजार फुट की ऊँचाई तक बहुत अधिकता से होती है । धोबी घास । हरियाली । विशेष—यह सब तरह की जमीनों पर और प्रायः सब ऋतुओं में होती है और बहुत जल्दी तथा सहज में फेल जाती है । इसकी बाहरी गाँठे जहाँ जमीन से छू जाती हैं वहीं जम जाती हैं और उनमें लंबी और बहुत पतली पत्तियाँ निकलने लगती हैं । गाएँ और गोडे़ इसे बडे़ प्रेम से खाते हैं और इससे उनका बल खूब बढ़ता है । गाएँ और भैसें आदि इसे खाकर खूब मोटी हो जाती हैं और अधिक दूध देने लगती हैं । यह सुखा— कर भी बरसों रखी जा सकती है । जिस स्थान पर एक बार यह हो जाती है वहाँ से इसे बिलकुल निकालना बहुत कठिन होता है । यह साधारणतः तीन प्रकार की होती है; —हरी, सफेद और गाँडर [दे० 'गाँडर' २] । वैद्यक में दूब को साधारणतः कसैली, मधुर, शीतल और पित्त, तृषा, अरुचि, दाह, मूर्च्छा, कफ, भूतबाधा और श्रम को दूर करनेवाली कहा है । हिंदू लोग इसका व्यवहार लक्ष्मी और गणेश आदि के पूजन में करते और इसे मंगलद्रव्य मानते हैं ।

दूबदू
क्रि० वि० [फा़०] सामने सामने । मुकाबले में । आमने सामने । मुहाँमुहँ । जैसे,—जबतक उनसे दूबदू बातें न हों, तबतक इस विषय में कुछ नहीं कहा जा सकता । उ०—करे गुफ्तगू उनसे जो दूबदू । मती सारे उनके न कोई अदू ।—कबीर मं०, पृ० १३२ ।

दूबर †
वि० [सं० दुर्बल] [वि० स्त्री० दुबरि] दे० 'दूबरा' । उ०—तुया गुन सुंदरि अति भेल दूबरि गुनि गुनि प्रेम तोहरि ।—विद्यापति, पृ० १३६ ।

दूबरा पु †
वि० [सं० दुर्बल] [वि० स्त्री० दबरी] १. दुबला । पतला । क्षीण । कृश । उ०—बहू दूबरी होत क्यों यौं जब बूझी सास । ऊतर कढयो न बाल मुख उँचे लेत उसास ।— मति० ग्रं०, पृ० २९६ । २. कमजोर । निर्बल । नाजुक । उ०—बहुत दिन के दूबरे ये कहाँ लौं बिललाहिं ।—घनानंद, पृ० ४७५ । ३. दबैल । दीन । उ०—श्री हरिदास के स्वामी श्याम कुंजबिहारी कर जोरि मौन ह्नै, दूबरे की राँधी खीर कहो कौने खाई है ?—हरिदास (शब्द०) ।

दूबला †
वि० [सं० दुर्बल] दे० 'दुबला' ।

दूबा †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूर्वा] दे० 'दूब' ।

दूबिया
वि० [हिं० दूब + इया (प्रत्य०)] एक प्रकार का रंग । हरी घास का सा रंग ।

दूबे
संज्ञा पुं० [सं० द्विवेदी] द्विवेदी ब्राह्मण ।

दूभर
वि० [सं० दुर्भर (= जिसका निर्वाह कठिन हो)] जिसके करने में बहुत कठिनता हो । कठिन । मुश्किल । दुःसाध्य । जैसे,—इस दोपहर को तो उनके यहाँ जाना बहुत दूभर मालूम होता है । उ०—कहीं मुझको स्थान एक तिल, जहाँ भी गया दूभर, झिलमिल । दया दृष्टि ही जो उभरा दिल, छोड़ीं वे जो कड़ियाँ ली थीं ।—आराधना, पृ० ८१ ।

दूमणा †
वि० [सं० दुर + मन प्रा० दुम्मण] [वि० स्त्री० दूमणी] उदास । खिन्नमन । उ—मालवणी मनि दूमणी, आवी वरग विमासि । रइवारी पूछी करी, आई करहा पासि ।— ढोला०, दू० १०२ ।

दूमना पु †
क्रि० अ० [सं० द्रुम] हिलना । डोलना । उ०—दूमैं द्रुम डार डार झूमैं पिक बरजोर घूमैं घनघोर मोर जूमैं चहुँ ओर टोरि टोरि ।—दीन० ग्रं०, पृ० ४१ ।

दूमा
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का चमडे़ का छोटा थैला जिसमें तिब्बत से चाय भरकर आती है । इसमें प्रायः तीन सेर तक चाय आती है ।

दूमुहाँ †
वि० [हिं० दो + मुँह] दे० 'दुमुँहा' ।

दूयन
संज्ञा पुं० [सं०] ज्वर । ताप [को०] ।

दूरंदेश
वि० [फा़०] आगापीछा सोचनेवाला । दूर तक की बात विचारनेवाला । होशियार । अग्रशोची । दूरदर्शी ।

दूरंदेशी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] दूर की बात पहले से ही सोच लेना । दूरदर्शिता ।

दूर
क्रि० वि० [सं०, मि० फा़० दूर] देश, काल या संबंध आदि के विचार से बहुत अंतर पर । बहुत फासले पर । पास या निकट का उलटा । जैसे,—(क) वे टहलते टहलते बहुत दूर चले गए । (ख) आप दूर से ही रास्ता बतलाना खूब जानते हैं । (ग) अभी लड़के की शादी बहुत दूर है । (घ) हमारा इनका बहुत दूर तक का रिश्ता है । (ङ) दिल्लगी करते करते वे बहुत दूर तक पहुँच गए, बाप दादे तक की गालियाँ देने लगे । मुहा०—दूर करना = (१) अलग करना । जुदा करना । अपने पास से हटाना । (२) न रहने देना । मिटाना । जैसे,—(क)कपडे़ का धब्बा दूर कर दो । (ख) दो चार दफे आने जाने से तुम्हारा डर दूर हो जायगा । दूर की कौडी़ लाना = दूर की सूझ । कल्पना की उडा़न । उ०—क्योंकि वह भी बहुत दूर की कौडी़ लाया है ।—प्रेमघन०, भा० २, पृ० २२७ । दूर की सुझाना = अनुपस्थित या भविष्य की झलक दिखाना । उ०—सूझकर सूझता नहीं जिनको वे उन्हें दूर से सुझाते । हैं ।—चोखे०, पृ० ३८ । दूर की सुझना = असंबद्ध बात कहना । उ०—बरफ नहीं एक वह लाओ संखिया इनके लिये बरफ लाओ ! क्या दूर की सूझी है ।—फिसाना०, भा० ३, पृ० ३१ । दूर क्यों जायँ या जाइए = अपरिचित या दूर का दृष्टांत न लेकर परिचित और निकटवाले का ही विचार करें । जैसे,—दूर क्यों जायँ अपने अपने पडो़सी की ही बात लीजिए । दूर दूर करना = पास न आने देना । अत्यंत घृणा और तिरस्कार करना । दूर भागना या रहना = बहुत घृणा या तिरस्कार के कारण बिलकुल अलग रहना । बहुत बचना । पास न जाना । जैसे,—हम तो ऐसे लोगों से सदा दूर भागते (या रहते) हैं । दूर रहना = कोई संबंध न रखना । बहुत बचना । जैसे,—ऐसी बातों से जरा दूर रहा करो । दूर होना = (१) हट जाना । अलग हो जाना । छट जाना । (२) मिट जाना । नष्ट हो जाना । न रहना । दूर पहुँचना = (१) साधन या सामर्थ्य के बाहर । शक्ति आदि के बाहर । (२) दूर की बात सोचना । बहुत बारीक बात सोचना । दूर की बात = (१) बारीक बात । (२) कठिन या दुःसाध्य बात । (३) बहुत आगे चलकर आनेवाली बात । अनुपस्थित बात । दूर की कहना = बहुत समझदारी की बात कहना । दुरदर्शिता की बात कहना ।

दूर (२)
वि० जो दूर हो । जो फासले पर हो । जैसे, दूर देश ।

दूरअंदेशी
संज्ञा स्त्री० [फा़०] दे० 'दूरदेशी' । उ०—मनुष्य के मन में जो वृति प्रबल हेती है वह उसी के अनुसार काम किया चाहता है और दूरअंदेशी की सब बातों को सहसा भूल जाता है ।—श्रीनिवास ग्रं०, पृ० २२६ ।

दूरग † (१)
संज्ञा पुं० [सं० दुर्ग] दे० 'दुर्ग' । उ०—पाई कंकण सिर बंधीयो मोड़ । प्रथम पयाणउँ दूरग चीतोड़ ।—बी० रासो, पृ० १२ ।

दूरग (२)
वि० [सं०] दूर तक जानेवाला । दूर तक गया हुआ ।

दूरगामी
वि० [सं० दूरगामिन्] दूर तक चलनेवाला ।

दूरग्रहण
संज्ञा पुं० [सं०] दूर की (अतीत या भविष्य की) वस्तु देखने की शक्ति [को०] ।

दूरतः
क्रि० वि० [सं० दूरतस्] दूर से ही [को०] ।

दूरता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दूरत्व' ।

दूरत्व
संज्ञा पुं० [सं०] दूर होने का भाव । अंतर । दूरी । फासला ।

दूरदर्शक (१)
वि० [सं०] दूर तक देखनेवाला ।

दूरदर्शक (२)
संज्ञा पुं० पंडित । बुद्धिमान् ।

दूरदर्शकयंत्र
संज्ञा पुं० [सं० दूरदर्शक + यन्त्र] दूरबीन नाम का यंत्र जिससे बहुत दूर की चीजें दिखाई पड़ती हैं ।

दूरदर्शन
संज्ञा पुं० [सं०] १. गिद्ध । २. विद्वान् । पंडित । ३. समझदार । ४. दूरबीन ।

दूरदर्शिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] दूर की बात सोचने का गुण । दूरंदेशी ।

दूरदर्शी (१)
संज्ञा पुं० [सं० दूरदर्शिन्] १. पंडित । २. गृध्र । गीध ।

दूरदर्शी (२)
वि० बहुत दूर की बात सोचने समझनेवाला । जो पहले से ही बुरा भला परिणाम समझ ले । अग्रशोची । दूरंदेशी ।

दूरदृक्
वि०, संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दूरदर्शी' [को०] ।

दूरदृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] भविष्य का विचार । दूरदर्शिता । दूरंदेशी ।

दूरनिरीक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] दूरबीन नाम का यंत्र ।

दूरपात
वि० [सं०] दूर से आने के कारण थकी (सेना) । विशेष दे० 'नवागत' ।

दूरबा पु
संज्ञा पुं० [सं० दूर्वा] दे० 'दूर्वा' ।

दूरबान
संज्ञा पुं० [फा़०] दूरबीन नाम का यंत्र जिससे बहुत दूर तक की चीजें साफ साफ दिखलाई पडती हैं । विशेष—यह यंत्र एक गोल नल के आकार का होता है जिसमें आगे और पीछे दो गोल शीशे लगे होते हैं । आगेवाले शीशे को प्रधान लेंस और पीछेवाले शीशे को उपनेत्र या चक्षुलेंस कहते हैं । प्रधान लेंस अपने सामनेवाले पदार्थ का प्रतिबिंब ग्रहण करके अपने पीछेवाले लेंस पर फेंकता है और पीछे वाला लेंस या उपनेत्र उस प्रतिबिंब को विस्तृत करके आँखों के सामने उपस्थित करता है । आवश्यकतानुसार प्रदान लेंस आगे या पीछे हटाया बढाया भी जा सकता है । दर्शनीय पदार्थों की आकृति की छोटाई या बढाई इन्हीं दोनों लेंसों की दूरी पर निर्भर रहती है । कभी कभी दोनों आँखों से देखन के लिये एक ही तरह के दो नलों को एक साथ जोड़ कर भी दूरबीन बनाई जाती है । दूरबीन का आविष्कार पहले पहल हालैंड देश में सत्रहवीं शताब्दी के प्रारभ में हुआ ता । एक बार एक चश्मेंवाला अपनी दूकान पर बैठा हुआ काम कर राहा था । इतने में उसकी लडकी सहसा चिल्ला उठी कि देखो वह सामने का बुर्ज कितना पास आ गया । चश्मेवाले ने देका कि उसकी लड़की दोनों शीशों को आगे पीछे रखकर देख रही है । जब उसने भी इसी प्रकार इन शीशों को रखकर देखा तब उसे उसका उपयोग जान पडा़ । इसके उपरांत उसने अनेक प्रकार की परीक्षाएँ करके कुछ सिद्धांत स्थिर किए और उन्हीं के अनुसार दूरबीन का आबिष्कार किया । उसके कुछ ही दिनों के उपरांत प्रसिद्ध ज्योतिषी गेलिलियो ने भी स्वतंत्र रूप से एक प्रकार की दूरबीन का आविष्कार किया था । तब से दूरबीन बनाने के काम में बराबर उन्नति होती आई है । आजकल दूरबीन का उपयोग सैर के लिये, दूर के अच्छे अच्छे दृश्य देखने, युद्धक्षेत्र में शत्रुओं की सेना आदि का पता लगाने और आकाशीय तारों आदि को देखने में होता है । आकाश के तारेआदि देखने के लिये आजकल की वेधशालाओं में जो दूरबीनें होती हैं वे बहुत ही भारी होता हैं । उनके नलों की लंबाई सात फुट तक और व्यास तीन फुट तक होता है । २. छोटी दूरबीन के आकार का लड़कों का एक खिलौना जिसमें एक ओर शीशा लगा रहता है और जिसमें आँख लगाकर देखने से रंग बिरंगे फूल आदि दिखाई देते हैं ।

दूरभिन्न
वि० [सं०] अत्यधिक आहत । बहुत घायल [को०] ।

दूरमूल
संज्ञा पुं० [सं०] मूँज ।

दूरयायो
वि० [सं० दूरयायिन्] दूर जानेवाला । दूरगामी [को०] ।

दूरवर्ती
वि० [सं० दूरवर्तिन्] दूर का । दूरस्थ । जो दूर हो ।

दूरवस्त्रक
वि० [सं०] निर्वस्त्र । नग्न [को०] ।

दूरवासी
वि० [सं० दूरवासिन्] दूर का रहनेवाला [को०] ।

दूरवीक्षण
संज्ञा पुं० [सं०] दूरबीन ।

दूरवेधी
वि० [सं० दूरवेधिन्] दूर से मारनेवाला । दूर ही से लक्ष्य पर प्रहार करनेवाला [को०] ।

दूरस्थ
वि० [सं०] जो दूर हो । दूर का । समीपस्थ का उलटा ।

दूरस्थित
वि० [सं०] दे० 'दूरस्थ' ।

दूरांतरित
वि० [सं० दूरान्तरित] दूर रहनेवाला [को०] ।

दूरागत
वि० [सं०] दूर से आया हुआ । उ०—आज किसी के मसले तारों की वह दूरागत झंकार ।—यामा, पृ० १४ ।

दूरात्
क्रि० वि० [सं०] दूर से [को०] ।

दूरान्वय
संज्ञा [सं०] विशेष्य विशेषण, कर्ता क्रिया आदि का इतनी दूर होना जिससे अर्थव्यक्ति में वाधा पडे । काव्य का एक दोष [को०] ।

दूरापात
संज्ञा पुं० [सं०] वह अस्त्र जिससे दूर से फेंककर मारा जाय ।

दूरारूढ
वि० [सं० दूरारूढ] १. गहरा । २. बद्धमूल । ३. तीब्र । ४. दूर पहुँचा या चढा़ हुआ [को०] ।

दूरि पु
वि० [सं० दूर] दे० 'दूर' । उ०—भगति पच्छ हठ नहिं सठताई । दुष्ट तर्क दूरि बहाई ।—मानस, ७ । ४६ ।

दूरिठ्ठ †
वि० [सं० दूरस्थित, प्रा० दूरिट्ठ] दे० 'दूरस्थ' । पूगल पिंगल राउ, नल राजा नरवरे नयरे । अदिठा दूरिट्ठा ये, सगाई दईव संयोगे ।—ढोला०, दू० १ ।

दूरी (१)
संज्ञा स्त्री० [हिं० दूर + ई० (प्रत्य०)] दो वस्तुओं के मध्य का स्थान । दूरत्व । अंतर । फासला । बीच । अवकाश । जैसे,—जरा इन दोनों खंभों के बीच की दूरी तो नापो ।

दूरी (२)
संज्ञा स्त्री० [देश०] खाकी रंग की एक प्रकार की लवा (चिड़िया) ।

दूरीकरण
संज्ञा पुं० [सं०] दूर करना । दूर हटाना [को०] ।

दूरूढा
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक के अनुसार एक प्रकार का क्षुद्र रोग ।

दूरेअमित्र
संज्ञा पुं० [सं०] उनचास मरुतों में से एक मरुत् का नाम ।

दूरेचर
वि० [सं०] १. दूर रहनेवाला । २. दूर दूर घूमनेवाला [को०] ।

दूरेरितेक्षण
वि० [सं०] ऐंचाताना [को०] ।

दूरेश्रवा
वि० [सं० दूरेश्रवस्] जिसका यश दूर तक सुनाई पडे़ । बहुत प्रसिद्ध ।

दूरोह
संज्ञा पुं० [सं०] आदित्यलोक जहाँ चढ़कर जाना असंभव है ।

दूहोहण
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य ।

दूर्य
संज्ञा पुं० [सं० दूर्य्य] १. छोटा कचूर । २. विष्ठा । पुरीष । मल ।

दूर्वा
संज्ञा स्त्री० [सं०] दूब नाम की घास । विशेष—दे० 'दूब' । यौ०—दूवाँकुर = दूब का नवीन, कोमल, आगे का अँखुवा ।

दूर्वाक्षी
संज्ञा स्त्री० [सं०] भागवत के अनुसार वसुदेव के भाई वृक की स्त्री का नाम ।

दूर्वाद्य घृत
संज्ञा पुं० [सं०] वैद्यक में एक विशिष्ट प्रकार से बनाया हुआ बकरी का घी जिसमें दूब, मजीठ, एलुआ, सफेद चंदन आदि मिलाया जाता है और जिसका व्यवहार आँख, मुँह, नाक, कान आदि से रक्त जाने में होता है ।

दूर्वाष्टमी
संज्ञा स्त्री० [सं०] भादों सुदी अष्टमी, जिस दिन व्रत आदि करते हैं ।

दूर्वासोम
संज्ञा पुं० [सं०] सुश्रुत के अनुसार एक प्रकार की सोमलता ।

दूर्वेष्टिका, दूर्वेष्टका
संज्ञा स्त्री० [सं०] यज्ञ की वेदी में काम आने— वाली एक प्रकार की ईंट ।

दूलन पु
संज्ञा पुं० [सं० दोलन] दे० 'दोलन' ।

दूलभ †
वि० [सं० दुर्लभ] दे० 'दूलम' ।

दूलम †
वि० [सं० दुर्लभ] कठिनता से प्राप्त होने योग्य । दुर्लभ ।

दूलह
संज्ञा पुं० [सं० दुर्लभ, प्रा० दुल्लह] १. वह मनुष्य जिसका विवाह अभी हाल में हुआ हो या शीघ्र ही होने को हो । दुलहा । वर । नौशा । २. पति । स्वामी । खाविंद । ३. हिंदी के अलंकार ग्रंथ 'कविकुलकंठाभरण' के रचयिता एक कवि ।

दूलहु पु †
संज्ञा पुं० [हिं० दूलह] दे० 'दूलहा' । उ०—जस दूलहु तस बनी बराता । कौतुक बिविध होहिं मग जाता ।—मानस, १९४ ।

दूलिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दूली' ।

दूली
संज्ञा स्त्री० [सं०] नील । नील का पेड़ । विशेष—दे० 'नील' का विशेष ।

दूल्हा
संज्ञा पुं० [सं० दूर्लभ, प्रा० दूल्लह] दे० 'दूलह' ।

दूवा
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दूआ' ।

दूवार
पु संज्ञा पुं० [सं० द्वार] दे० 'द्वार' । उ०—कइँ पंडव पंथ संचरूँ, कइ जाय सेवसूँ गंग दूवार ।—बी० रासो, पृ० ४४ ।

दूश्य
संज्ञा पुं० [सं०] तंबू । खेमा ।

दूषक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दोष लगानेवाला मनुष्य । वह जोकिसी पर दोषारोपण करे । उ०—ऐसे दरिद्र दूषक भरे तिनहूँ सौं जो कहत धन, धिक्कार जनम वा अधम कौ सदा सर्वदा मलिन मन ।—ब्रज ग्रं०, पृ० ११२ । २. वह जो दोष उत्पन्न करे । दोष उत्पन्न करनेवाला पदार्थ ।

दूषक (२)
वि० १. दोषजनक । बुरा । २. दोष करनेवाला । अपराधी । ३. निंदक । सलंकित करनेवाला [को०] ।

दूषण (१)
संज्ञा पुं० [सं०] १. दोष । ऐब । बुराई । अवगुण । उ०— तब हरि कह्मो हत्यो बिन दूषण हलधर भेद बताओ । वह जादू खोज तुम कीजो द्वारावति धरि आयो ।—सूर (शब्द०) । २. दोष लगाने की क्रिया या भाव । ऐव लगाना । उ०—संदेह के अनंतर स्वपक्ष के स्थापन और प्रतिपक्ष के दूषण करने पर जो अर्थ का अवधारण होता है सो निर्णय कहलाता है ।—सिद्धांतसंग्रह (शब्द०) । ३. रावण के भाई एक राक्षस का नाम जो खर के साथ पंचवटी में शूर्पणखा की रक्षा के लिये नियुक्त किया गया था और जो शूर्पणखा की नाक और कान कट जाने पर पीछे रामचंद्र के हाथ से मारा गया । ४. जैनियों के सामयिक व्रत में ३२ त्याज्य बातें या अवगुण जिनमें १२ कायिक, १० वाचिक और १० मानसिक हैं । ५. दोष । अपराध (को०) । ६. पार— स्परिक समझौता तोड़ना । विरोध या प्रतिवाद करना (को०) ।

दूषण (२)
वि० [सं०] विनाशक । संहारक । मारनेवाला । उ०— लक्ष्मण अरु शत्रुघ्न रीह दानव दल दूषण ।—केशव (शब्द०) ।

दूषणारि
संज्ञा पुं० [सं०] दूषण को मारनेवाले रामचंद्र ।

दूषणीय
वि० [सं०] दोष लगाने योग्य । जिसमें ऐब लगाया जा सके ।

दूषन पु †
संज्ञा पुं० [सं० दूषण] दे० 'दूषण' ।

दूषना पु †
क्रि० स० [सं० दूषण] दोष लगाना । कलंकित करना ।

दूषि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दूषिका' ।

दूषिका
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. आँख की मैल । २. कूँची । कलम । तूलिका (को०) । ३. एक प्रकार का चावल (को०) ।

दूषित (१)
वि० [सं०] जिसमें दोष हो । खराब । बुरा । दोषयुक्त । कलंकित ।

दूषित (२)
धोखा । छल [को०] ।

दूषिता
संज्ञा स्त्री० [सं०] वह कन्या जो विवाह के पूर्व दूषित हो । दूषर्णप्राप्त कन्या [को०] ।

दूषी
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दूषि' [को०] ।

दूषीका
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दूषिका' ।

दूषीविष
संज्ञा स्त्री० [सं०] सुश्रुत के अनुसार शरीर में रहनेवाला एक प्रकार का विष जो धातु को दूषित करता है और जिसे हीन विष भी कहते हैं । विशेष—यदि किसी प्रकार का स्थावर, जंगम या कृत्रिम विष शरीर में प्रविष्ट हो जाने के उपरांत पूरा पूरा बाहर नहीं निकलता, उसका कुछ अंश शरीर में रहकर जार्ण हो जाता है अथवा विषनाशक औषधों से दबाने या नष्ट करने पर भी पूर्ण रूप से नष्ट नहीं होता, तब वह कफ से आच्छादित होकर दूषी विष कहलाता और बरसों तक शरीर में व्याप्त रहता हैं । जिसके शरीर में यह विष रहता है उसका रंग पीला पड़ जाता है, मल का रंग बदल जाता है, मुँह में दुर्गधि और विरसता होती है, प्यास लगती है, मूर्छा और कै होती है और दूष्योदर के से लक्षण दिखाई देने लगते हैं । जब यह विष पक्वाशय में रहता है तब मनुष्य के सिर और शरीर के बाल झड़ जाते हैं । जब इसका कोप होने लगता है तब जँभाई आती है, अंग टूटते हैं, रोएँ खडे हो जाते हैं, शरीर पर चकत्ते पड़ जाते हैं, हाथ पैर सूज जाते हैं तथा इसी प्रकार के और उपद्रव होते हैं ।

दूष्य (१)
वि० [सं०] १. दोष लगाने योग्य । जिसमें दोष लगाया जा सके । २. निंदनीय । निंदा करने योग्य । ३. तुच्छ । ४. राज्य को हानि पहुँचानेवाला (मनुष्य) ।

दूष्य (२)
संज्ञा पुं० १. कपडा़ । वस्त्र । तंबू । खेमा । ३. पीव । पूय (को०) । ४. विष ।

दूष्यमहामात्र
संज्ञा पुं० [सं०] वह न्यायाधीश या महामात्र नामक राजकर्मचारी जो भीतर राज्य का शत्रु हो या शत्रु का साथी हो ।

दूष्ययुक्त
वि० [सं०] राजविद्रोहियों से युक्त (सेना) । विशेष—कौटिल्य ने लिका है कि दूष्ययुक्त तथा दूष्यपाष्णिंग्राह (जिसके पीछे की सेना दूष्य हो) सेना में दूष्ययुक्त सेना उत्तम है, क्योंकि आप्त पुरूषों के आधिपत्य में वह लड़ सकती है, पर पीछे के आक्रमण से घबडा़ई हुई दुष्ट पाष्णिंग्राह सेना नहीं लड़ सकती है ।

दूष्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] हाथी को बाँधने का चमडे़ का तस्मा या बंधन ।

दूष्योदर
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का उदररोग । उ०—परिश्रम करने से शोथ होय तो इसको दूष्योदर औसा कहते है ।—माधव०, पृ० १९५ ।

दूसना
क्रि० स० [सं० दूषण] दे० 'दूषना' । उ०—कहि रेसम के सम दूसत हैं ।—प्रेमघन०, भा० १, पृ० २१० ।

दूसर †
वि० [हिं०] दे० 'दूसरा' ।

दूसरा
वि० [हिं० दो] [वि० स्त्री० दूसरी] १. जो क्रम में दो के स्थान पर हो । पहले के बाद का । द्वितीय । जैसे,— गली में बाएँ हाथ का दूसरा मकान उन्हीं का है । २. जिसका प्रस्तुत विषय या व्यक्ति से संबंध न हो । अन्य । अपर । और गैर । जैसे,—हम लोग आपस में लड़ें और चाहें झगड़ें, दूसरे से मतलब ? मुहा०—दूसरों के सिर ठीकरा फोड़ना = दूसरों पर दोष मढ़ना । उ०—दूसरों को उबार लेते हैं एक दो बीर विपद में गिर । पर बहुत लोग पाक बनते हैं ठीकरा फोड़ दूसरों के सिर ।—चुभते०, पृ० १२ । यौ०—दूसरी माँ = जो अपनी माँ न हो । सौतेली माँ ।

दूहना
क्रि० स० [सं० दोहन] दे० 'दुहना' ।

दूहनी
संज्ञा स्त्री० [हिं०] दे० 'दोहनी' ।

दूहा पु †
संज्ञा पुं० [हिं०] दे० 'दोहा' ।

दूहिया †
संज्ञा पुं० [देश०] एक प्रकार का चूल्हा ।

दृंभू
संज्ञा पुं० [सं० दृम्भू] दे० 'दृन्भू' ।

दृक्
संज्ञा पुं० [सं०] दृश का समासप्राप्त रूप । दे० 'दृग' ।

दृक (१)
संज्ञा पुं० [सं०] छिद्र । छेद ।

दृक (२)
संज्ञा पुं० [?] हीरा । उ०—निःकंपा दृक वज्र पुनि हीरा पदक जु ऐन । निष्क सकुच तिय निरखि तन भूप भवन छबि मैन ।—नंददास (शब्द०) ।

दृकाण
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दृक्काण' ।

दृक्कर्ण
संज्ञा पुं० [सं०] साँप । चक्षुस्रवा । विशेष—ऐसा प्रवाद है कि साँप सुनने का काम भी आंख से ही लेता है ।

दृक्कर्म
संज्ञा पुं० [सं०] ज्योतिष में वह क्रिया या संस्कार जो ग्रहों को अपने क्षितिज पर लाने के लिये किया जाता है और जिससे ग्रहों के योग, चंद्रमा की शृंगोन्नति तथा ग्रहों और नक्षत्रों के उदयास्त का पता चलता है । यह संस्कार दो प्रकार का होता है—आक्षदृक् और आयनदृक् ।

दृक्काण
संज्ञा पुं० [यू० डेकानस, तुल० सं० द्रेक्काण] फलित ज्योतिष में एक राशि का तीसरा भाग जो दश अंशो का होता है । विशेष—प्रत्येक राशि तीस अंशों की होती है । राशि को तीन भागों में विभक्त करके एक एक भाग को दृक्काण कहते हैं । इस प्रकार किसी एक राशि में प्रथम, द्वितीय और तृतिय तीन दृक्काण होते हैं । उस राशि का ही अधिपति प्रथम दृक्काण का स्वामी होता है, उससे पाँचवीं राशि का द्वितिय दृक्काण का, और इससे नवीं राशि का तृतिय दृक्काण का । जैसे, मेष राशि का स्वामी मंगल है । अतः मेष राशि के प्रथम दृक्काण का स्वामी मंगल, द्वितिय दृक्काण का रवि, (जो मेष से पाँचवीं राशि, सिंह का स्वामी है) और तृतीया दृक्काण का बृहस्पति (जो मेष से नवीं राशि, धनु, का स्वामी है) होगा । यह दृक्काण फलित ज्योतिष में काम आता है । शुभ ग्रहों के दृक्काण का नाम 'जल' और अशुभ ग्रहों के के दृक्काण का 'दहन' है । जल दृक्काण में जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु जल में होती है और दहन दृक्काण में जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु अग्नि से होता है । राशियों के अनुसार दृक्काणों के अनेक नाम कल्पित किए गए हैं ।

दृक्क्षय
संज्ञा पुं० [सं०] दृष्टि शक्ति का ह्रास । आँखों का कमजोर होना [को०] ।

दृक्क्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] १. दृष्टिपात । अवलोकन । २. दशम लग्न के नतांश की भुज ज्या । विशेष—इसका काम सूर्यग्रहण के स्पष्टीकरण में पड़ता है । मध्य ज्या को उदय ज्या से गुणित कर गुणनफल को त्रिज्या से भाग देते हैं फिर भागफल को वर्ण करके और उसमें मध्य ज्या के वर्ण को घटाने से जो शेष अंक रहता है उसका वर्गमूल निकासते हैं । यही वर्गमूल का अंक दृक्क्षेप कहलाता है ।

दृक्पथ
संज्ञा पुं० [सं०] दृष्टि का मार्ग । दृष्टि की पंहुँच । मुहा०—दृक्पथ में आना = दिखाई पड़ना ।

दृक्पात
संज्ञा पुं० [सं०] दृष्टिपात । अवलोकन ।

दृक्प्रसाद
संज्ञा स्त्री० [सं०] कुलत्था । कुलत्यांजन ।

दृकप्रिया
संज्ञा स्त्री० [सं०] कांति । शोभा । सुंदरता ।

दृकशक्ति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. प्रकाशरूप चैतन्य । २. आत्मा ।

दृकश्रुति
संज्ञा पुं० [सं०] साँप ।

दृगंचल
संज्ञा पुं० [सं० दृगञ्जल] पलक । उ०—भए विलोचन चारु अचंचल । मनहु सकुच निमि भए दृगंचल ।—तुलसी (शब्द०) ।

दृग्
संज्ञा पुं० [सं०] दृश का समासगत रूप । नेत्र । आँख [को०] ।

दृग पु
संज्ञा पुं० [सं० दृश, समास दृक्] १. आँख । उ०—जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान । कौतुक देखहिं शैल वन भूतल भूरि निधान ।—तुलसी (शब्द०) । मुहा०—दृग डोलना या देना = नजर डालना । देखना । उ०— पाइँ परे हुतै प्रीतम त्यौं कहि केशव क्यों हुँ न मैं दृग दीनी ।—केशव (शब्द०) । दृग फेरना = आँख फेरना । अप्रसन्न रहना । उ०—दुःख और मैं कासों कहौं को सुनै ब्रज की वनिता दृग फेरे रहैं ।—पद्माकर (शब्द०) । २. देखने की शक्ति । दृष्टि । उ०—श्रवण घटहु पुनि दृग घटहु घटो सकल बल देह । इते घटे घटिहै कहा जो न घटै हरि नेह ।—(शब्द०) । ३. दो की संख्या ।

दृगध्यक्ष
संज्ञा पुं० [सं०] सूर्य का एक नाम [को०] ।

दृगनवंत पु
वि० [हिं० दृगन (बहु०) + वंत] आँखवाला । दृष्टि— वाला । उ०—भीजि बसन सुंदर तन लपटनि । दृगनवंत कहुँ अति सुख दपटनि ।—नंद० ग्रं०, पृ० २९० ।

दृगमिचाउ पु
संज्ञा पुं० [हिं० दृग + मीचना] आँख मिचौली का खेल । उ०—मूँदे तहाँ एक अवलोके दृग सु दृगमिचाउ नेक ख्यालन हितै ।—पद्माकर (शब्द०) ।

दृगमिचाव
संज्ञा पुं० [हिं० दृग + मिचाव] दे० 'दृगमिचाउ' ।

दृग्गणित
संज्ञा पुं० [सं०] ग्रहों का वेध करके गणित करना ।

दृग्गणितैक्य
संज्ञा पुं० [सं०] ग्रहों को किसी समय पर गणित से स्पष्ट करके फिर उसे वेध कर मिलाना और न्युनता या अधिकता प्रतीत होने पर उसमें संस्कार करना जिससे ग्रहों के वेध और स्पष्ट में आगे भेद न पडे़ ।

दृग्गति
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दृष्टि की गति या पहुँच । २. दशम— लग्न की नतांश कोटिज्या । विशेष—इसका काम सूर्यग्रहण निकालने में पड़ता है । इसकी रीति यह है कि मध्य ज्या को उदय ज्या से गुणित करे और गुणनफल को त्रिज्या से भाग दे । फिर भागफल का वर्ण करेऔर वर्गफल से त्रिज्या का वर्ग घटावे । इस प्रकार जो शेष अंक बचेगा उसका वर्गमूल दृग्गति कहलावेगा ।

दृग्गोचर
वि० [सं०] जो आँख से दिखाई दे ।

दृग्गोल
संज्ञा पुं० [सं०] वह वृत जिसे ऊर्ध्व स्वस्तिक और अधः— स्वस्तिक में होता हुआ कल्पित करके जिधर ग्रहों का उदय होता है ऊधर घुमाकर उनकी स्थिति का पता चलाया जाता है । इसे दृङमंडल और दृग्वलय भी कहते हैं ।

दृग्ज्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] दृङमंडल या दृग्गोल के खस्वस्तिक से जो ग्रह जितना लटका रहता है उसे नतांश कहते हैं और इसी नतांश की ज्या दृग्ज्या कहलाती है ।

दृग्भू
संज्ञा पुं० [सं०] १. वज्र । २. सूर्य । ३. सर्प ।

दृग्लंवन
संज्ञा पुं० [सं० दृग्लम्बन] ग्रहण स्पष्ट करने में जब सूर्य चंद्र गर्भाभिप्राय से एक सूत्र में आ जाते हैं, पर पृष्ठाभिप्राय से एक सूत्र में नहीं आते तब उन्हें पृष्ठाभिप्राय से एक सूत्र में लाने के लिये जो पूर्वापर संस्कार किया जाता है उसे दृग्लंबन करते हैं ।

दृग्विष
संज्ञा [सं०] वह साँप जिसकी आँखों में विष होता है ।

दृग्वृत्त
संज्ञा पुं० [सं०] क्षितिज ।

दृङ्नति
संज्ञा स्त्री० [सं०] ग्रहण स्पष्ट करने में सूर्य चंद्र का जब अमांतकालीन स्पष्ट करते हैं और वे गर्भाभिप्राय से एक सूत्र में आ जाते हैं पर पृष्ठाभिप्राय से नहीं आते, तब पृष्ठाभिप्राय से उन्हें एक सूत्र में लाने के लिये जो याम्योत्तर संस्कार किया जाता है उसे दृङ्नति कहते हैं ।

दृड्मंङल
संज्ञा पुं० [सं० दृङमण्डल] दृग्गोल ।

दृड्ढ
वि० [सं० दृढ] दे० 'दृढ' । उ०—महा बंक गढ़ दृड्ढ बुरजि कंगुर बर सोहैं ।—हम्मीरसो०, पृ० १७ ।

दृढ़ (१)
वि० [सं० दृढ़] १. जो शिथिल या ढीला न हो । जो खूब कल— कर बँधा या मिला हो । प्रगाढ़ । जैसे,—दृढ़ बंधन या गाँठ, दृढ़ आलिंगन । २. जो जल्दी न टूटे फूटे । पुष्ट । मजबूत । कडा़ । ठोस । जैसे,—इस फल का छिलका बहुत दृढ़ होता है । ३. बलवान् । बलिष्ट । हृष्ट पुष्ट । जैसे, दृढ़ अंग । ४. जो जल्दी दूर, नष्ट या विचलित न हो सके । स्थायी । जैसे, दृढ़ आसन, दृढ़ संकल्प, दृढ़ सिद्धांत । ५. जो अन्यथा न हो सके । निश्चित । ध्रुव । पक्का । जैसे, किसी बात का दृढ़ होना । ६. ढीठ । कडे़ दिल का । जैसे, दृढ़ मनुष्य ।

दृढ़ (२)
संज्ञा पुं० १. लोहा । २. विष्णु । ३. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम । ४. संगीत में सात रूपकों में से एक । ५. तेरहवें मनु रुचि के एक पुत्र का नाम । ६. गणित में वह अंक जो दूसरे अंक से पूरा पूरा विभाजित न हो सके । जैसे,—१, ३, ५, ७, ११, १७, इत्यादि ।

दृढ़कंटक
संज्ञा पुं० [सं० दृढकण्टक] क्षुद्रफलक वृक्ष ।

दृढ़कर्मा
वि० [सं० दृढकर्मन्] जो अपने कर्म में दृढ़ रहे । धैर्य और स्थिरता के साथ काम करनेवाला ।

दृढ़कव्यूह
संज्ञा पुं० [सं० दृढकव्यूह] कौटिल्य कथित वह व्यूह जिसमें पक्ष तथा कक्ष कुछ कुछ पीछे हटे हों ।

दृढ़कांड
संज्ञा पुं० [सं० दृढकाण्ड] १. वह वस्तु जिसके पोर या गाँठें पुष्ट हों । २. बाँस । ३. रोहिस घास ।

दृढ़कांडा
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढकाण्डा] छरेंटा । पातालगारुडी़ लता ।

दृढ़कारी
वि० [सं० दृढकारिन्] १. दृढ़ता से काम करनेवाला । २. मजबूत करनेवाला ।

दृढ़क्षत्र
संज्ञा पुं० [सं० दृढक्षत्र] धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

दृढ़क्षुरा
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढक्षुरा] वल्वजा तृण । सागे बागे ।

दृढ़गात्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढगात्रिका] राब । खाँड़ ।

दृढ़ग्रंथि (१)
वि० [सं० दृढग्रन्थि] जिसकी गाँठें मजबूत हों ।

दृढग्रंथि (२)
संज्ञा पुं० बाँस ।

दृढ़चेता
वि० [सं० दृढचेतस्] दृढ विचारवाला । पक्के इरादे का (आदमी) ।

दृढ़च्छद
संज्ञा पुं० [सं० दृढच्छद] दीर्घ रोहिष तृण । बडी़ रोहिस ।

दृढ़च्युत
संज्ञा पुं० [सं० दृढच्युत] अगस्त्य मुनि के एक पुत्र का नाम जो परपुरंजय नामक राजा की कन्या के गर्भ से उत्पन्न हुआ था । (भागवत) ।

दृढ़तरु
संज्ञा पुं० [सं० दृढतरु] धव का पेड़ ।

दृढ़ता
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढता] १. दृढ़ होने का भाव । दृढत्व । २. मजबूती । ३. स्थिरता । ४. पक्कापन ।

दृढ़तृण
संज्ञा पुं० [सं० दृढतृण] मूँज नाम की घास ।

दृढ़तृणा
संज्ञा स्त्री [सं० दृढतृण] वल्वजा तृण ।

दृढ़त्व
संज्ञा पुं० [सं० दृढत्व] दृढ़ता ।

दृढ़त्वच् (१)
वि० [सं० दृढत्वचे] जिसकी त्वचा या छाल कडी़ हो ।

दृढत्वच् (२)
संज्ञा पुं० १. ज्वार का पेड़ । २. एक प्रकार का सरपत ।

दृढ़दंशक
संज्ञा पुं० [सं० दृढदंशक] एक जलजंतु ।

दृढ़दस्यु
संज्ञा पुं० [सं० दृढदस्यु] एक ऋषि जो दृढच्युत के पुत्र थे ।

दृढ़धन
संज्ञा पुं० [सं० दृढधन] शाक्य मुनि । बुद्ध ।

दृढ़धन्वा
संज्ञा पुं० [सं० दृढधन्वन्] १. जो धनुष, चलाने में दृढ़ हो या जिसका धनुष दृढ़ हो । २. एक पुरुवंशीय राजा का नाम ।

दृढ़धन्वी
वि० [सं० दृढधन्विन्] १. जिसका धनुष दृढ़ हो ।

दृढ़नाभ
संज्ञा पुं० [सं० दृढनाभ] वाल्मीकि के अनुसार शस्त्रों की एक रोक जिसे विश्वामित्र जी ने रामचंद्र जी को बतलाया था ।

दृढ़निश्चय
वि० [सं० दृढनिश्चय] जो अपनी बात पर जमा रहे । जो अपने संकल्प पर दृढ़ रहे । स्थिरप्रतिज्ञ ।

दृढ़नीर
संज्ञा पुं० [सं० दृढतीर] नारियल, जिसके भीतर का जल धीरे धीरे जमकर कडा़ हो जाता हैं ।

दृढ़नेत्र
संज्ञा पुं० [सं० दृढनेत्र] बाल्मीकि रामायण के अनुसार विश्वामित्र जी के चार पुत्रों में से एक । (बाल्मीकि) ।

दृढ़नेमि (१)
वि० [सं० दृढनेमि] जिसकी नेमि दृढ़ हो । जिसकी धुरी मजबूत हो ।

दृढ़नेमि (२)
संज्ञा पुं० अजमीढ़ वंशीय एक राजा का नाम जो सत्यधृत के पुत्र थे ।

दृढ़पत्र (१)
वि० [सं० दृढपत्र] जिसके पत्ते दृढ़ हों ।

दृढ़पत्र (२)
संज्ञा पुं० बाँस ।

दृढ़पत्री
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढपत्री] वल्वजा तृण । सागे बागे ।

दृढ़पद
संज्ञा पुं० [सं० दृढपद] तेईस मात्राओं का एक मात्रिक छंद जिसमें १३ और १० मात्राओं पर विश्राम होता है और अंत में दो गुरु होते हैं । इसे उपमान भी कहते हैं । जैसे,—बाहु बंध करमूल में आछावलि राजै । लपटे फणि श्रीखंड की लतिका जनु राजै । कुंड जु रच्यौ सुहोम को, जनु नाभि सुहाई । रोमावलि मिस धूम की रेखा चलि आई ।

दृढ़पाद (१)
वि० [सं० दृढपाद] दृढ़निश्चयी । विचार का पक्का ।

दृढ़पाद (२)
संज्ञा पुं० ब्रह्मा का एक नाम [को०] ।

दृढ़पादा
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढपादा] यवतिक्ता ।

दृढ़पादी
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढपादी] भूम्यामलकी । भूआँवला ।

दृढ़प्रतिज्ञ
वि० [सं० दृढप्रतिज्ञ] जो अपनी प्रतिज्ञा से न टले ।

दृढ़प्ररोह
संज्ञा पुं० [सं० दृढप्ररोह] वट । बरगद ।

दृढ़फल
संज्ञा पुं० [सं० दृढफल] नारियल ।

दृढ़बंधिनी
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढबन्धिनी] अनंतमूल नाम की लता । श्यामा और सारिवा भी इसी को कहते हैं ।

दृढ़बीज (१)
संज्ञा पुं० [सं० दृढबीज] १. चक्रमर्द । चकवँड़ । २. अमरूद । ३. कीकर । बबूर । ४. बदरीफल । बेर । ५. वट । बरगद [को०] ।

दृढ़बीज (२)
वि० कडे़ बीजवाला [को०] ।

दृढ़भूमि
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढभूमि] योगशास्त्र में मन को एकाग्र और स्थिर करन् का एक अभ्यास, जिसमें मन अविचल हो जाता है, इधर उधर नहीं जाता । इस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर वैराग्य की प्राप्त निकट हो जाती है ।

दृढ़मुष्टि (१)
वि० [सं० दृढमुष्टि] १. जो मुट्ठी में जोर से पकडे़ । कसकर पकड़नेवाला । २. कृपण । कंजूस ।

दृढ़मुष्टि (२)
संज्ञा पुं० (मुट्ठी में पकड़कर चलाए जानेवाले) खङ्गादि अस्त्र ।

दृढ़मूल
संज्ञा पुं० [सं० दृढमूल] १. मूँज । २. मथाना नाम की घास जो तालों में होती है । मंथानक तृण । ३. नारियल ।

दृढ़रंगा
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढरङ्गा] फिटकिरी (जिसमें रंग पक्का होता है) ।

दृढ़रोह
संज्ञा पुं० [सं० दृढरोह] पाकर का पेड़ । पक्कड़ ।

दृढ़लता
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढलता] पातालगारुडी लता । छिरेंटा ।

दृढ़लोम (१)
वि० [सं० दृढलोमन्] [स्त्री० दृढ़लोम्नी, दृढ़लोमा] जिसके रोएँ कडे़ हों ।

दृढ़लोम (२)
संज्ञा पुं० सूअर ।

दृढ़लोमा
वि०, संज्ञा पुं० [सं० दृढलोमन्] दे० 'दृ लोम' [को०] ।

दृढ़वर्मा
संज्ञा पुं० [सं० दृढवर्मन्] धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

दृढ़वल्कल (१)
वि० [सं० दृढवल्कल] जिसकी छाल कडी़ हो ।

दृढ़वल्कल (२)
संज्ञा पुं० १. सुपारी का पेड़ । २. लकुच/?

दृढ़वल्का
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढ़वल्का] अंबष्ठा ।

दृढ़वीज (१)
वि० [सं० दृढवीज] जिसके बीज कडे़ हों ।

दृढ़वीज (२)
संज्ञा पुं० १. चकवड़ । २. बेर । ३. बबूल ।

दृढ़वृक्ष
संज्ञा पुं० [सं० दृढवृक्ष] नारियल ।

दृढ़व्य
संज्ञा पुं० [सं० दृढव्य] एक ऋषि का नाम ।

दृढ़व्रत (१)
वि० [सं० दृढव्रत] स्थिरसंकल्प । अपने संकल्प पर जमा रहनेवाला ।

दृढ़व्रत (२)
संज्ञा पुं० धृतराष्ट्र का एक पुत्र [को०] ।

दृढ़संध (१)
वि० [सं० दृढसन्ध] संकल्प का पक्का । प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहनेवाला ।

दृढसंध (२)
संज्ञा पुं० धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

दृढ़संधि
वि० [सं० दृढसन्धि] १. जो एक में मिलकर सट गया हो । मजबूती से मिला हुआ । २. जिसके अँग के जोड़ पुष्ट हों [को०] ।

दृढ़सूत्रिका
संज्ञा स्त्री० [सं० दृढसूत्रिका] मूर्वा नाम की लता । मुर्रा ।

दृढ़स्कंध
संज्ञा पुं० [सं० दृढस्कन्ध] १. पिंड खजूर । २. खिरनी का पेड़ ।

दृढ़स्यु
संज्ञा पुं० [सं० दृढस्यु] लोपामुद्रा के गर्भ से उत्पन्न अगस्त्य ऋषि के एक पुत्र का नाम ।

दृढ़हस्त (१)
वि० [सं० दृढहस्त] जो हथियार आदि पकड़ने में पक्का हो ।

दृढ़हस्त (२)
संज्ञा पुं० धृतराष्ट्र के अक पुत्र का नाम ।

दृढांग (१)
वि० [सं० दृढाङग] जिसके अंग दृढ़ हों । कडे़ बदन का । हृष्ट पुष्ट ।

दृढ़ांग (२)
संज्ञा पुं० जीरक । जीरा (या हीरा) ।

दृढा़ई पु †
संज्ञा स्त्री० [हिं० दृढ़] दृढ़ता । मजबूती । उ०—तेन्ह के ज्ञान जग रहे समाई । धर धर आए कुल बान दृढाई ।— कबीर सा०, पृ० ९१३ ।

दृढा़ना (१)
क्रि० स० [हिं० दृढ़ + ना (प्रत्य०)] दृढ़ करना । पक्का करना । मजबूत करना । उ०—(क) वहै बात जो जनक दृढा़ई । देहै धरै विदेह कहाई ।—कबीर (शब्द०) । (ख) चलत गगन भइ गिरा सुहाई । जय महेस भलि भक्ति दृढा़ई ।—तुलसी (शब्द०) । (ग) बात दृढा़इ कुमति हँसि बोली । कुमत विहंग कुलह जनु खोली ।—तुलसी (शब्द०) । (घ) पाछे विविध ज्ञान जननी को दीन्हों कपिल दृढा़य । सांख्य योग अरु ज्ञान भक्ति दृढ़ बरनी विविध बनाय ।—सूर (शब्द०) ।

दृढा़ना (२)
क्रि अ० १. कडा़ होना । पुष्ट या मजबूत होना । २. स्थिर या पक्का होना ।

दृढा़यु
संज्ञा पुं० [सं० दृढायुष्] १. तृतीय मनु सावर्णि के एक पुत्र का नाम । २. महाभारत में वर्णित उर्वशी के गर्भ से उत्पन्न ऐल राजा का एक पुत्र ।

दृढा़युध (१)
वि० [सं० दृढायुध] अस्त्र ग्रहण करने में पक्का । युद्ध में तत्पर ।

दृढा़युध (२)
संज्ञा पुं० १. शिव का एक नाम । २. धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम ।

दद्दाश्व
संज्ञा पुं० [सं० दृढाश्व] हरिवंश पुराण के अनुसार धुंधु— मार के एक पुत्र का नाम ।

दृढे़षुधि
वि० [दृढे़षुधि] दृढ़ तरकस या तूणीरवाला [को०] ।

दृत
वि० [सं०] [वि० स्त्री० दृता] १. सम्मानित । आदृत । २. दीर्ण । विदीर्ण (को०) ।

दृता
संज्ञा स्त्री० [सं०] जीरा ।

दृताग्रवेग (१)
वि० [सं०] (सेना) जिसका अग्रभाग नष्ट हो गया हो ।

दृताग्रवेग (२)
वि० दे० 'प्रतिहत' ।

दृति
संज्ञा पुं० [सं०] १. चमडा़ । खाल । २. खाल का बना हुआ पात्र । ३. मशक । ४. मेघ । ५. एक प्रकार की मछली । ६. गलकंबल । गाय, बैल आदि के गलेस के नीचे झूलता हुआ चमडा़ ।

दृतिधारक
संज्ञा पुं० [सं०] एक पौधा जिसे वंग देश में आकन— पाता कहते हैं । पर्या०—आनंदी । वामन ।

दृतिवातवतोरयन
संज्ञा पुं० [सं०] एक अयनसत्र का नाम । एक प्रकार का यज्ञ ।

दृतिहरि (१)
संज्ञा पुं० [सं०] (खाल या चमडा़ चुरानेवाला) कुत्ता ।

दृतिहरि (२)
वि० [सं०] गलकंबलवाला (पशु) । जिसे गलकंबल हो [को०] ।

दृतिहार
संज्ञा पुं० [सं०] मशक ढोनेवाला । मिश्ती ।

दृन्फू (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. सर्प । साँप । २. वज्र । विद्युत् । ३. चक्र । पहिया [को०] ।

दृन्फू
२ संज्ञा पुं० सूर्य [को०] ।

दृन्भू
संज्ञा पुं० [सं०] १. वज्र । २. सूर्य । ३. राजा । ४. साँप । ५. पहिया । ६. यम । अंतक (को०) ।

दृप्त (१)
वि० [सं०] १. गर्वित । इतराया हुआ । २. हर्ष से फूला या चमकता हुआ ।

दृप्त (२)
संज्ञा पुं० विष्णु का एक नाम [को०] ।

दृप्र
वि० [सं०] १. प्रचंड । प्रबल । २. इतराया हुआ । घमंडी ।

दृब्ध (१)
वि० [सं०] १. ग्रंथित । गुँता हुआ । २. भीत । डरा हुआ ।

दृब्ध
संज्ञा पुं० १. भय । खौफ । डर । २. डोरा । धागा । डोरी [को०] ।

दृश (१)
संज्ञा पुं० [सं०] [वि० दृश्य] १. देखना । दर्शन । २. प्रदर्शक । दिखानेवाला । ३. देखनेवाला ।

दृश (२)
संज्ञा स्त्री० १. दृष्टि । २. आँख । ३. दो की संख्या । ४. ज्ञान ।

दृशद्
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दृषद्' ।

दृशद्वती
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दृषद्वती' ।

दृशा
संज्ञा स्त्री० [सं०] आँख ।

दृशाकांक्ष्य
संज्ञा पुं० [सं० दृशाकाङ्क्ष्य] कमल ।

दृशान
संज्ञा पुं० [सं०] १. प्रकाश । आभा । २. विरोचन नाम का दैत्य । ३. आचार्य । गुरु । ४. प्रजा का पालन करनेवाला राजा । लोकपाल । ५. ब्राह्मण ।

दृशालु
संज्ञा पुं० [सं०] सुर्य [को०] ।

दृशि
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दृशी'

दृशी
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. दृष्टि । २ प्रकाश । ३. चेतन पुरुष । ४. शास्त्र ।

दृशोपम
संज्ञा पुं० [सं०] श्वेत कमल । पुंडरीक ।

दृश्य (१)
वि० [सं०] १. जो देखने में आ सके । जिसे देख सकें । दृग्गोचर । जैसे, दृश्य पदार्थ । २. जो देखने योग्य हो । दर्शनीय । ३. मनोरम । ४. जानने योग्य । ज्ञेय ।

दृश्य (२)
संज्ञा पुं० १. देखने की वस्तु । वह पदार्थ जो आँखों के सामने हो । नेत्रों का विषय । जैसे, वन और पर्वत का दृश्य । २. तमाशा । वह मनोरंजक व्यापार जो आँखों के सामने हो । ३. वह काव्य जो आभिनय द्वारा दर्शकों को दिखलाया जाय । नाटक । ४. गणित में ज्ञात या दी हुई सँख्या ।

दृश्यमान
वि० [सं०] १. जो दिखाई पड़ रहा हो । २. चमकीला । सुंदर ।

दृश्यावली
संज्ञा स्त्री० [सं०] दृश्यों की पंक्ति । दर्शनीय वस्तुओं का समूह । उ०—दृश्यावली सुघर दर्शक दर्शिका मनोहर । अपरा, पृ० १९४ ।

दृषत्
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. शिला । पर्वत की चट्टान । २. सिल । मट्टी । ३. पत्थर ।

दृषद्
संज्ञा स्त्री० [सं०] दे० 'दृषत्' ।

दृषद्वती (१)
संज्ञा स्त्री० [सं०] एक नदी जिसका नाम ऋग्वेद में आया है । इसे आजकल घग्घर और राखी कहते हैं । यह थानेश्वर से १३ मील दक्षिण है । महाभारत में यह कुरुक्षेत्र के अंतर्गत मानी गई है । मनुस्मृति में इसे ब्रह्मावर्त की सीमा पर लिखा है । २. विश्वामित्र की एक पत्नी का नाम । ३. दुर्गा का एक रूप (को०) ।

दृषद्वती
२ वि० [सं०] पथरीली ।

दृषद्वान्
वि० [सं० दृषद्वत्] [वि० स्त्री० दृषद्वती] पाषाणयुक्त । शिलामय । पथरीला ।

दृष्ट (१)
वि० [सं०] १. देखा हुआ । २. जाना हुआ । ज्ञात । प्रकट । ३. लौकिक और गोचर । प्रत्यक्ष । विशेष—पातंजल दर्शन में दो प्रकार के विषय दृष्ट बतलाए गए हैं अर्थात् स्त्री, अन्न, पान आदि लौकिक विषय जिन्हें इंद्रियाँ भोगती हैं और आनुश्रविक विषय जो वेद प्रतिपादित स्वर्ग आदि से संबंध रखते हैं । इन दोनों प्रकार के विषयों से एक साथ निस्पृह हो जाने से वशीकार नामक वैराग्य उत्पन्न होता है ।

दृष्ट (२)
संज्ञा पुं० १. दर्शन । २. साक्षात्कार । ३. सांख्य में तीन प्रकार के प्रमाणों में से एक । प्रत्यक्ष प्रमाण । ४. स्वचक्र और परचक्र से होनेवाला भय (को०) । ५. डाकुओं का डर (को०) ।

दृष्टकूट
संज्ञा पुं० [सं०] १. पहेली । २. कोई ऐसी कविता जिसका अर्थ केवल शब्दों के वाचकार्थ से न समझा जा सके बल्कि प्रसंग या रूढ़ अर्थों से जान जाय । जैसे,—हरिसुत पावक प्रगट भयो री । मारुत सुत भ्राता पितु प्रोहित ता प्रतिपालन छाँड़ि गयो री । हरसुत वाहन ता रिपु भोजन सों लागत अँग अनल भयो री । मृगमद स्वाद मोद नहिं भावत दधिसुत भानु समान भयो री । वारिधि सुतपति क्रोध कियो सखि मेटि धकार सकार लयो री । सूरदास प्रभु सिंधुसुता बिनु कोपि समर कर चाप लयो री ।—सूर (शब्द०) ।

दृष्टनष्ट
वि० [सं०] जो एक बार दिखाई देकर लुप्त हो जाय [को०] ।

दृष्टपृष्ट
वि० [सं०] पीठ दिखानेवाला । युद्धभूमि से भागा हुआ [को०] ।

दृष्टफल
संज्ञा पुं० [सं०] किसी कर्म का व्यक्त परिणाम (दर्शन) ।

दृष्टमान पु
वि० [सं० दृश्यमान] प्रकट । व्यक्त । उ०—(क) दृष्टमान नास सब होई । साक्षी व्यापक नसै न सोई ।—सूर (शब्द०) । (ख) दृष्टमान सब बिनसै अदृष्ट लखै न कोइ । दीन कोइ गाहक मिलै बहुतै सुख सो होइ ।—कबीर (शब्द०) ।

दृष्टरजा
संज्ञा स्त्री० [सं० दृष्टरजस्] वह लड़की जिसका रजोदर्शन हो गया हो ।

दृष्टवत्
वि० [सं०] १. प्रत्यक्ष के समान । २. लौकिक । सांसारिक ।

दृष्टवाद
संज्ञा पुं० [सं०] वह दार्शनिक सिद्धांत जो केवल प्रत्यक्ष को ही मानता है ।

दृष्टवान्
वि० [सं० दृष्टवत्] जो प्रत्यक्ष के तुल्य हो । देखे हुए के समान [को०] ।

दृष्टांत
संज्ञा पुं० [सं० दृष्टान्त] १. अज्ञात वस्तुओं या व्यापारों आदि का धर्म आदि बतलातो हुए समझाने के लिये समान धर्मवाली किसी ऐसी वस्तु या व्यापार का कथन जो सबको विदित हो । उदाहरण । मिसाल । जैसे,—(क) बहुत से पत्ते गोल होते है, जैसे, कमल के । (ख) जब मनुष्य एक बार पतित हो जाता है तब बराबर पतित ही होता जाता है । जैसे,— पत्थर का गोला जब पहाड़ पर से लुढ़कता है तब गिरता ही जाता है । इस दूसरे वाक्य में पत्थर के गोले के दृष्टांत द्वारा मनुष्य के पतित होने की दशा समझाई गई है । विशेष—न्यग्य के सोलह पदार्थों में से दृष्टांत भी एक है । न्याय के अनुसार जिस पदार्थ के संबंध में लौकिक (साधारण) जनों और परीक्षकों (तार्किकों) का एक मत हो उसे दृष्टांत कहते हैं । ऐसी प्रत्यक्ष बात जिसे सब जानते या मानते हों दृष्टांत है । 'जहाँ धूआँ होता है वहाँ आग होती है', इस बात को कहकर किसी ने कहा 'जैसे रसोईधर में' तो यह दृष्टांत हुआ । न्याय के अवयवों में उदाहरण के लिये इसकी कल्पना होती है अर्थात जिस दृष्टांत का व्यवहार तर्क में होता है उसे उदाहरण कहते हैं । २. एक अर्थालंकार जिसमें एक ओर तो उपमेय और उसके साधारण धर्म का वर्णन और दूसरी ओर बिंब प्रतिबिंब भाव से उपमान और उसके साधारण धर्म का वर्णन होता है । जैसे,— दुसह दुराज प्रजानि को क्यों न करे अति दंद । अधिक अँधेरो जग करत मिलि माक्स रविचंद ।—बिहारी । यहाँ उपमेय दुराज में अधिक द्वंद्व या अँधेरे का होना और उसी के अनुसार उपमान रविचंद मिलन में अधिक अँधेरे का होना वर्णित है । प्रतिवस्तूपमा से इस अलंकार में यह भेद है कि प्रतिवस्तूपमा में शब्दभेद से एक ही वस्तु का कथन होता है पर इसमें धर्म भिन्न भिन्न (जैसे, द्वंद्व होना और अँधेरा होना) होते हैं । पंडितराज जगन्नाथ ने इन दोनों में बहुत कम भेद माना है और कहा है कि इन्हें एक ही अलंकार के दो भेद सम- झना चाहिए । ३. शास्त्र । ४. मरण ।

दृष्टार्थ
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह शब्द जिसका अर्थ स्पष्ट हो । २. वह शब्द जिसके श्रवण से श्रोता को किसी अर्थ का बोध हो जिसका प्रत्यक्ष इस संसार में होता हो । जैसे, 'गंगा' इस शब्द के श्रवण मात्र से मनुष्य को एक ऐसी नदी का बोध होता है जो भारतवर्ष के उत्तरीय भाग में प्रत्यक्ष देखी जा सकती है । यह अदृष्टार्थ शब्द का विरोधी हैं । जैसे, स्वर्ग, नरक, क्षीरसमुद्र, अप्सरा, देवता आदि जो किसी स्थल में प्रत्यक्ष नहीं हो सकते ।

दृष्टि
संज्ञा स्त्री० [सं०] १. देखने की वृत्ति या शक्ति । आँख की ज्योति । मुहा०—दृष्टि मारी जाना = देखने की शक्ति न रह जाना । २. देखने के लिये नेत्रों की प्रवृत्ति । देखने के लिये आँख की पुतली के किसी वस्तु के सीध में होने की स्थिति । टक । दृकपात । अवलोकन । नजर । निगाह । क्रि० प्र०—डालना । मुहा०—दृष्टि करना = दृष्टि डालना । ताकना । दृष्टि चलाना = नजर डालना । दृष्टि चूकना = नजर का इधर उधर हो जाना । आँख का दूसरी ओर फिर जाना । जैसे,—जहाँ चूकी गिरे । दृष्टि देना = नजर डालना । ताकना । दृष्टि फिरना = (१) नेत्रों का दूसरी ओर प्रवृत्त होना । आँख का दूसरी ओर हो जाना । (२) कृपादृष्टि न रहना । हित का ध्यान या प्रीति न रहना । चित अप्रसन्न या खिन्न होना । दृष्टि फेंकना = नजर डालना । ताकना । दृष्टि फेरना = नजर हटा लेना । दूसरी ओर देखना । (किसी ओर) ताकते न रहना । (किसी से) दृष्टि फेरना = (किसी पर) कृपादृष्टि न रखना । अप्रसन्न या विरक्त होना । खिन्न होना । (किसी की) दृष्टि बचाना = (१) सामने होने से बचना । किसी के आँख के सामने न आना । जान बूझकर दिखाई न पड़ना । (भय, लज्जा आदि के कारण) । (२) (किसी से) छिपाना । न दिखाना । दृष्टि बाँधना = इस प्रकार का जादू करना कि आँखों को और का और दिखाई पड़े । इंद्रजाल फैलाना । दृष्टि लगाना = (१) स्थिर होकर ताकना । टकटकी बाँधना । (२) (किसी ओर देखने के लिये) आँख ले जाना । ताकना ।उ०—दसै दुवार का लेखा । उलटि दृष्टि जो लाव सो देखा ।—जायसी (शब्द०) । ३. आँख की ज्योति का प्रसार जिससे वस्तुओं के अस्तित्व, रूप, रंग आदि का बोध होता है । दृक्फत । मुहा०—दृष्टि आना = दे० 'दृष्टि में आना' । दृष्टि पड़ना = दिखाई पड़ना । उ०—(क) दृष्टि परी इंद्रासन पुरी ।— जायसी (शब्द०) ।—(ख) मेरी दृष्टि परे जा दिन तें ज्ञान मान हरि लीनो री ।—सूर (शब्द०) । दृष्टि पर चढ़ना = (१) देखने में बहुत अच्छा लगना । निगाह में जँचना । अच्छा लगने के कारण ध्यान में सदा बना रहना । पसंद आना । भाना । जैसे,—वह छड़ी तुम्हारी दृष्टि पर चढ़ी हुई है । (२) आँखों में खटकना । किसी वस्तु का इतना बुरा लगना कि उसका ध्यान सदा बना रहे । जैसे,—तुम उसकी दृष्टि पर चढ़े हुए हो, वह तुम्हें बिना मारे न छोड़ेगा । दृष्टि बिछाना = (१) प्रेम या श्रद्धावश किसी के आसरे में लगातार ताकते रहना । उत्कंठापूर्वक किसी के आगमन की प्रतीक्षा करना । उ०—पवन स्वास तातों मन लाई । जोवै मारग दृष्टि बिछाई ।—जायसी (शब्द०) । (२) किसी के आने पर अत्यंतं श्रद्धा या प्रेम प्रकट करना । दृष्टि में आना = देखने में आना । दिखाई पड़ना । उ०—जग कोउ दृष्टि न आवै पूरन होय सकाम ।—जायसी (शब्द०) । दृष्टि में पड़ना दिखाई पड़ना (क्व०) । दृष्टि से उतरना या गिरना = श्रद्धा, विश्वास या प्रेम का पात्र न रहना । (किसी के) विचार में अच्छा न रह जाना । तुच्छ या बुरा ठहरना । ४. देखने में बहुत नेत्र । देखने के लिये खुली हुई आँख । मुहा०—दृष्टि उठाना = ताकने के लिये आँख ऊपर करना । दृष्टि गड़ाना या जमाना = दृष्टि स्थिर करना । एकटक ताकना । (किसी से) दृष्टि चुराना = (लज्जा या भय से) सामने न आना । जान बूझकर दिखाई न पड़ना । नजर बचाना । (किसी से) दृष्टि जुड़ना = आँख मिलना । देख देखी होना । साक्षात्कार होना । (किसी से) दृष्टि जोड़ना = आँख मिलाना । देखादेखी करना । साक्षात्कार करना । दृष्टि फिसलना = चमक दमक के कारण नजर न ठहरना । आँख में चकाचौंध होना । दृष्टि भर देखना = जितनी देर तक इच्छा हो उतनी ही देर तक देखना । जी भर कर ताकना । उ०—करु मन नंदनंदन ध्यान । सेइ चरन सरोज सीतल तजु विषय रसपान । सूर श्री गोपाल की छवि दृष्टि भरि लखि लेहि । प्रानपति की निरखि शोभा पलक परन न देहि ।—सूर (शब्द०) । दृष्टि मारना = (१) आँख से इशारा करना । पलक गिराकर संकेत करना । (२) आँख के इशारे से रोकना । दृष्टि मिलना = नजर में जँचना । अच्छा लगने के कारण ध्यान में बना रहना । भाना । उ०—वह सभों की दृष्टि में समा गया ।—बेनिस का बाँका (शब्द०) । दृष्टि मिलना = दे० 'दृष्टि जोड़ना' । उ०—विहरत हिया करहु पिय टेका । दृष्टि मया करि मिलवहु एका ।—जायसी (शब्द०) । (किसी वस्तु पर) दृष्टि रखना = किसी वस्तु को देखते रहना जिससे वह इधर उधर न हो जाय निगरानी रखना । (किसी पर) दृष्टि रखना = देख रेख में रखना । चौकसी में रखना । दशा का निरीक्षण करते रहना । जैसे,—इस लड़के पर भी दृष्टि रखना, इधर उधर खेलने न पावे । दृष्टि लगना = (१) नजर पड़ना । दृष्टिपात होना । (२) देखा देखी होने से प्रेम होना । प्रीति होना । दृष्टि लगाना = (१) स्थिर होकर ताकना । टकटकी बाँधना । उ०—भूलि चकोर दृष्टि जो लावा । मेघ घटा मद चंब दिखावा ।—जायसी (शब्द०) । (२) किसी ओर देखने के लिये आँख ले जाना । ताकना । (३) प्रेम करना । प्रीति करना । (४) नजर लगाना । बुरी दृष्टि का प्रभाव डालना । (किसी से) दृष्टि खड़ना = (१) (किसी की) आँख के सामने आँख होना । धूरा धूरी होना । देखादेखी होना । (२) प्रेम होना । (किसी से) दृष्टि लड़ाना = आँख के सामने आँख किए रहना । घूरना । खूब ताकना । देर तक आँख से आँख मिलाना । ५. परख । पहचान । तमीज । अटकल । अंदाज । ६. कृपा- दृष्टि । हित का ध्यान । मिहरबानी की नजर । जैसे,—आज कल आपकी वह दृष्टि मेरे ऊपर नहीं है । उ०—(क) तपै बीज जस धरती सुख विरह के घाम । कब सो दृष्टि करि बरसै तन तरुवर होइ जाम ।—जायसी (शब्द०) । (ख) बिरवा लाइ न सूखन दीजै ।—जायसी (शब्द०) । ७. आशा की दृष्टि । आसरे में लगी हुई टकटकी । आस । उम्मीद । ८. ध्यान । विचार । अनुमान । जैसे,—मेरी दृष्टि में तो ऐसा करना अनुचित है । ९. उद्देश्य । अभिप्राय । नीयत । जैसे,—कुछ बुरी दृष्टि से मैंने ऐसा नहीं किया ।

दृष्टिकूट
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दृष्टकूट' ।

दृष्टिकृत्
संज्ञा पुं० [सं०] १. दर्शक । २. स्थल पद्म ।

दृष्टिकृत
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दृष्टिकृत्' [को०] ।

दृष्टिकोण
संज्ञा पुं० [सं०] देखने या समझने का अंदाज । विचार ।

दृष्टिक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] दृष्टिपात ।

दृष्टिगत (१)
वि० [सं०] जो दिखाई पड़ा हो । जो देखने में आया हो । क्रि० प्र०—होना । उ०—जो दृश्य दृष्टिगत हुए तुम्हें हो सके किसे वे दृष्टिगम्य ।—सागरिका, पृ० ११३ ।

दृष्टिगत (२)
संज्ञा पुं० १ . नेत्र का विषय । २. आँख का एक रोग ।

दृष्टिगम्य
वि० [सं०] जो देखने में आ सकें । दृष्टिगोचर । उ०— जो दृश्य दृष्टिगत हुए तुम्हें हो सके किसे वे दृष्टगम्य ।— सागरिका, पृ० ११३ ।

दृष्टिगुण
संज्ञा पुं० [सं०] लक्ष्य । निशाना [को०] ।

दृष्टगोचर
वि० [सं०] नेत्रेंद्रिय के द्वारा जिसका बोध हो । जो देखने में आ सके । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

दृष्टिदोष
संज्ञा पुं० [सं०] १. देखने का दूषित ढग । २. देखने का बुरा प्रभाव । नजर ।

दृष्टिधृक
संज्ञा पुं० [सं०] राजा इक्ष्वाकु के एक पुत्र का नाम ।

दृष्टिनिक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] दृष्टि फेंकना । नजर डालना । देखने की क्रिया । उ०—उसने क्षुधापीड़ित और क्षुब्ध मानवता की ओर दृष्टिनिक्षेप किया ।—बी० श० महा०, पृ० ४२ ।

दृष्टिनिपात
संज्ञा पुं० [सं०] दे० 'दृष्टिपात' ।

दृष्टिपथ
संज्ञा पुं० [सं०] दृष्टि का फैलाव । नजर की पहुँच । मुहा०—दृष्टिपथ में आना =दिखाई पड़ना ।

दृष्टिपात
संज्ञा पुं० [सं०] दृष्टि डालने की क्रिया या भाव । ताकने या देखने की क्रिया । अवलोकन । क्रि० प्र०—करना ।—होना ।

दृष्टिपूत
वि० [सं०] १. जो देखने में शुद्ध हो । जो देखने में शुद्ध जान पड़े । २. जिसके देखने से आँखें पवित्र हों । ३. अच्छी तरह देखा भाला हुआ ।

दृष्टिफल
संज्ञा पुं० [सं०] फलित ज्योतिष में एक राशि में स्थित ग्रह का दूसरी राशि में स्थित ग्रह पर दृष्टि फेरने से होनेवाला फल । विशेष—दे० 'दृष्टिस्थान' ।

दृष्टिबंध
संज्ञा पुं० [सं० दृष्टिबन्ध] १. वह क्रिया जिससे देखनेवालों की दृष्टि में भ्रम हो जाय । दीठबंदी । इंद्रजाल । माया । जादू । २.चालाकी । हाथ की सफाई । हस्तलाघव । उ०—राघौ दृष्टिबंध कल्हि खेला । सभा माँझ चेटक अस मेला ।—जायसी (शब्द०) ।

दृष्टिबंधु
संज्ञा पुं० [सं० दृष्टिबन्धु] खद्योत । जुगनू ।

दृष्टिभंगी
संज्ञा स्त्री० [सं० दृष्टिभङ्गी] देखने का ढंग । उ०— साहित्यकारों में उन्मुक्त स्वच्छंद दृष्टि विकसित हुई थी ।— हिं० का० प्र०, पृ० १४१ ।

दृष्टिमांद्य
संज्ञा पुं० [सं० दृष्टिमान्द्य] दृष्टि का कमजोर होना । कम दिखाई देना ।

दृष्टिमान्
वि० [सं० दृष्टिमत्] [वि० स्त्री० दृष्टिमती] जिसे दृष्टि हो । दीठवाला । आँखवाला ।

दृष्टिराग
संज्ञा पुं० [सं०] देखने का ढंग । दृष्टि का प्रभाव । २. दर्शजन्य अनुराग [को०] ।

दृष्टिरोध
संज्ञा पुं० [सं०] १. दृष्टि की रोक । नजर पहुँचने में रुकावट । २. आड़ । ओट । व्यवधान ।

दृष्टिवंत
वि० [सं० दृष्टि+ वंत (प्रत्य०)] दृष्टिवाला । २. ज्ञानी । ज्ञानवान् । जानकार । उ०—ना वह मिला न बिहरा ऐस रहा भरपूर । दृष्टिवंत कहं नियरे अंध मूरुखहिं दुर ।— जायसी (शब्द०) ।

दृष्टिवाद
संज्ञा पुं० [सं०] १. वह सिंद्धात जिसमें दृष्टि या प्रत्यक्ष प्रमाण ही की प्रधानता हो । २. जैनियों के बारह अंगों में से एक जिसकी रचना गणधर लोग तीर्थकरों के उपदेशों को लेकर करते हैं । विशेष—ये/??/धर्म के मूल ग्रंथ है । ग्यारह अंग तो मिलते हैं पर यह दृष्टिवाद नहीं मिलता । जैनाचार्य सकल कीर्ति रचित 'तत्वार्थसारदीपक' में इसका जो उल्लेख मिलता है उससे पाया जाता है कि इसमें चंद्र, सूर्य आदि की गति आयु आदि, प्रणापान चिकित्सा, मंत्र, तंत्र तथा अनेक प्रकार के विषय संमिलित हैं ।

दृष्टिविक्षेप
संज्ञा पुं० [सं०] १. कटाक्ष । तिरछी नजर । २. अवलोकन । देखना [को०] ।

दृष्टिविद्या
संज्ञा स्त्री० [सं०] प्रकाश विज्ञान । आलोक विज्ञान ।

दृष्टिविभ्रम
संज्ञा पुं० [सं०] दृष्टि का विलास । दृष्टिविक्षेप ।

दृष्टिविष
संज्ञा पुं० [सं०] एक प्रकार का साँप ।

दृष्टिस्थान
संज्ञा पुं० [सं०] कुंडली में वह स्थान जिसपर किसी दूसरे स्थान में स्थित ग्रह की दृष्टि पड़ती हो । विशेष—ग्रहों की दृष्टि का साधारण नियम यह है कि जिस स्थान में ग्रह हो उससे तीसरे और दसवें स्थानों को एक चरण से, नवें और पाँचवें को दो चरणों से, चौथे और आठवें को तीन चरणों से और सातवें को पूर्ण दृष्टि से देखेगा ।

दृष्ट्याकाश
संज्ञा पुं० [सं०] आकाश की ओर दृष्टि लगाए हुए । आकाश की ओर देखता हुआ । उ०—ऊर्द्ध लक्ष करे इहिं भाँती । दृष्टयाकाश ग्है दिन राती ।—सुंदर० ग्रं०, भा० १, पृ० १०५ ।